पुरूषा का बलिदान: सभी वस्तुओं की उत्पत्ति

श्लोक 3 और 4 के पश्चात् पुरूषासूक्ता अपने घ्यान को पुरूषा के गुणों की ओर से पुरूषा के बलिदान के ऊपर केन्द्रित करता है। श्लोक 6 और 7 इस पर अपने ध्यान को इस तरीके से लगाता है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

पुरूषासूक्ता में श्लोक 6-7

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
य़त्पुरुसेन हविसादेवा यज्नम् अतन्वतावासन्तो अस्यसिद् अज्यम् ग़्रिस्मा इध्माह् सरद्धविह् तम् य़ज्नम् बर्हिसि पुरूषाकान्पुरूषाम् जतम्ग्रतह् तेना देवा अयाजन्त साध्य रास्यास च ये जब देवताओं ने बलि के रूप में पुरूषा का बलिदान किया, तब वंसत पिघले हुए घी की आहुति, ग्रीष्म ऋतु ईंधन, और शरद ऋतु इसकी बलि थी। पुआल में बलि के रूप में आरम्भ में उत्पन्न हुए पुरूषा को उन्होंने छिड़क दिया। देवताओं, साधुओं और ऋषियों ने उसे शिकार की तरह बलिदान कर दिया।

यद्यपि इन श्लोकों के सभी पहलू तुरन्त स्पष्ट नहीं होते हैं, परन्तु जो कुछ यहाँ पर स्पष्ट है वह यह है कि इसका ध्यान पुरूषा के बलिदान के ऊपर है। प्राचीन वैदिक टीकाकार शंकराचार्य ने इस तरह से टिप्पणी की थी:

“ऋषियों – मुनियों और देवताओं ने बलि के शिकार –  पुरूषा को – बलिदान की वेदी के साथ एक बलि किए जाने वाले यज्ञ पशु के रूप में बाँध लिया और अपने मनों से यज्ञ में उसकी भेंट चढ़ाई।” ऋग्वेद 10/90/7 के ऊपर शंकराचार्य की टीका

श्लोक 8-9 का आरम्भ वाक्यांश “तस्मद्यज्नत्सर्वहुतह्…” से होता है जिसका अर्थ है कि उसके बलिदान में पुरूषा ने सब कुछ भेंट चढ़ा दिया जो कुछ उसके पास था – उसने कुछ भी अपने पास न रख छोड़ा। इसने उस प्रेम को प्रदर्शित किया जो उसने अपने बलिदान को देने के द्वारा प्रकट किया। यही केवल वह प्रेम है जिसमें हम स्वयं को अन्यों को देने के लिए दे सकते हैं और अपने पास कुछ भी नहीं रख छोड़ते। यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने वेद पुस्तक (बाइबल) में कहा है कि:

“इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं: कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे” (यूहन्ना 15:13)

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने यह अपने शिष्यों से कहा जब वह स्वेच्छा से स्वयं को क्रूस के ऊपर जाने के द्वारा अपना बलिदान देने के लिए अर्पण कर रहा था। क्या पुरूषा के बलिदान और यीशु सत्संग के मध्य में कोई सम्बन्ध है? पुरूषासूक्ता श्लोक 5 (जिस हमने अभी तक छोड़ दिया है) हमें एक सुराग प्रदान करता है – परन्तु यह सुराग हमें सर्वप्रथम यह संकेत देगा कि इसमें कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ पर श्लोक 5 है

 पुरूषासूक्ता में श्लोक 5

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
तस्मद् विरालजयत विराजो अधि पुरूषाह् ष जतो अत्यरिच्यत पास्चद्भुमिम् अथो पुरह् उस से – पुरूषा के एक भाग से – ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था और इसे पुरूषा का सिंहासन बनाया गया और वह सर्वव्यापी बन गया।

पुरूषासूक्ता के अनुसार, पुरूषा का बलिदान समय के आरम्भ में कर दिया गया था और इसके परिणामस्वरूप ब्रह्माण्ड की सृष्टि हई । इस प्रकार यह बलिदान पृथ्वी पर नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह बलिदान ऐसा था जिसके द्वारा पृथ्वी निकल कर आई थी। श्लोक 13 स्पष्ट दिखाता है कि यह सृष्टि पुरूषा के बलिदान के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है। यह कहता है कि:

 पुरूषासूक्ता में श्लोक 13

संस्कृत में हिन्दी भाषान्तरण
चन्द्रम मनसो जतस् चक्सोह् सुर्यो अजयत्मुखद् ईन्द्र स्च आग्निस्च प्रनद् वायुर् अजयत् चन्द्रमा का जन्म उसके मन से हुआ था। सूर्य उसकी आँख से निकल कर आया। बिजली, वर्षा और अग्नि उसके मुँह से उत्पन्न हुए। उसकी श्वास से वायु का जन्म हुआ था।

वेद पुस्तक (बाइबल) की इस गहन समझ में, यह सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। हम इस स्पष्टता के आरम्भ को तब देखते हैं जब हम ऋषि (भविष्यद्वक्ता) मीका के रचनाओं को पढ़ते हैं। वह ईसा पूर्व 750 के आसपास रहा और यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के आगमन से 750 वर्षों तक रहते हुए उसने उसके आगमन को उस शहर के ऊपर ध्यान देते हुए देख लिया जिसमें उसका जन्म होना था। उसने ऐसे लिखा है कि:

हे बैतलहम एप्राता,

यदि तू ऐसा छोटा है

कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता,

तौभी तुझ में से मेरे लिये एक पुरूष निकलेगा,

जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा;

और उसका निकलना प्राचीनकाल से, 

वरन् अनदि काल से होता आया है। (मीका 5:2)

मीका ने भविष्यद्वाणी की थी कि प्रभुता करने वाला (या मसीह) बैतलहम के शहर से निकल कर आएगा। 750 वर्षों के पश्चात् यीशु मसीह (यीशु सत्संग) ने इस दर्शन की पूर्णता में इस शहर में जन्म लिया। सत्य के खोजी अक्सर अपने आश्चर्य को मीका के इस दर्शन के इस पहलू के ऊपर केन्द्रित करते हैं। कुछ भी हो, मैं इस समय हमारे ध्यान को इस आने वाले के उद्गमों  के विवरण के ऊपर केन्द्रित करना चाहता हूँ। मीका भविष्य में आने वाले की भविष्यद्वाणी की घोषणा करता है, परन्तु वह कहता है कि इस आने वाले का उद्गम अतीत की गहराई में है। उसका ‘निकलना प्राचीनकाल से वरन् अनादि काल से होता आया’ है। इस आने वाले का उद्गम उसके पृथ्वी पर प्रगट होने से पूर्वतिथि का है! ‘प्राचीनकाल से…’ के लिए कितनी अतीत में जाना होगा? यह अनादि काल के दिनों  तक चला जाता है। वेद पुस्तक (बाइबल) में दिए हुए सत्य ज्ञान के अन्य वचन इसे आगे स्पष्ट कर देते हैं। कुलुस्सियों 1:15 में ऋषि पौलुस (जिसने इसे लगभग 50 ईस्वी सन् में लिखा था) ने यीशु के बारे में ऐसी घोषणा की कि:

वह तो अदृश्य परमेश्‍वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है (कुलुस्सियों 1:15)

यीशु को ‘अदृश्य परमेश्‍वर का प्रतिरूप’ और ‘सारी सृष्टि में पहिलौठा होने’ की घोषणा की गई है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि यीशु का देहधारण अर्थात् अवतार लेना इतिहास में सटीक समय (ईसा पूर्व 4 – 30 ईस्वी सन्) में हुआ था, वह किसी भी वस्तु की सृष्टि से पहले – यहाँ तक कि अतीत में अनन्तकाल से अस्तित्व में था । उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि परमेश्‍वर (प्रजापति) सदैव अतीत के अनन्तकाल से अस्तित्व में है, और उसका ‘प्रतिरूप’ होने के कारण यीशु (यीशु सत्संग) भी सदैव से अस्तित्व में था।

जगत की सृष्टि से पहले किया हुआ बलिदान सब वस्तुओं की उत्पति 

परन्तु न केवल वह अतीत के अनन्तकाल से अस्तित्व में है, अपितु ऋषि (भविष्यद्वक्ता) यूहन्ना ने स्वर्ग के एक दर्शन में इस यीशु (यीशु सत्संग) का वर्णन इस तरह से किया है:

“मेम्ना…जो जगत की उत्पति के समय से घात हुआ है।” (प्रकाशितवाक्य 13:8)

क्या यह एक विरोधाभास नहीं है? क्या यीशु (यीशु सत्संग) को 30 ईस्वी सन् में घात नहीं किया गया था? यदि वह तब घात किया गया था, तब वह कैसे ‘जगत की उत्पति के समय’ भी घात किया जा सकता है? इस विरोधाभास में ही हम देखते हैं कि पुरूषासूक्ता और वेद पुस्तक (बाइबल) एक ही बात का विवरण दे रहे हैं। हमने देखा कि पुरूषासूक्ता का श्लोक 6 कहता है कि पुरूषा का बलिदान आरम्भ था। यूसुफ़ पदनीज़ेरकारा अपने द्वारा रचितप्राचीन वेदों में मसीह  नामक पुस्तक में संकेत देते हैं कि पुरूषासूक्ता के ऊपर संस्कृति की टीका हमें बताती है कि पुरूषा का आरम्भ में हुआ बलिदान ‘परमेश्‍वर के ह्दय में’ था (उसने इसका अनुवाद संस्कृति केयगम् के अर्थ से किया है)। वह साथ ही संस्कृति के विद्वान एन. जे. शिन्दे का उद्धरण देता है जो यह कहते हैं कि आरम्भ में हुए यह बलिदानमानसिक या प्रतीकात्मक रहा था (एन. जे. शिन्दे द्वारा लिखित पुस्तक ‘वैदिक साहित्य में पुरूषासूक्ता’ (संशोधित 10-90) (पूना विश्वविद्यालय, के संस्कृत के उच्च अध्ययन केंद्र द्वारा प्रकाशित)1965.

इस तरह से अब पुरूषासूक्ता का रहस्य स्पष्ट हो जाता है। पुरूषा परमेश्‍वर और परमेश्‍वर का प्रतिरूप, अतीत के अनन्तकाल से था। वह किसी भी वस्तु के होने से पहले से था। वह सभी वस्तुओं में पहिलौठा था। परमेश्‍वर, अपने सर्वज्ञान में, पहले से ही जानता था कि मनुष्य की सृष्टि के लिए एक बलिदान की आवश्यकता होगी। इस बलिदान में उस सब की आवश्यकता होगी जिसका प्रबन्ध वह – पुरूषा के देहधारण अर्थात् अवतार के माध्यम से इस जगत में पापों की शुद्धता या शोधन को बलिदान के रूप में पूरा करेगा। इस समय परमेश्‍वर को यह निर्णय लेना था कि वह ब्रह्माण्ड तथा मानव जाति की रचना करे या नहीं। इस निर्णय में पुरूषा ने स्वयं के स्वेच्छा से बलिदान होने का निर्णय लिया, और इस तरह से सृष्टि की रचना हुई। इस तरह से, मानसिक रूप में, या परमेश्‍वर के हृदय में, पुरूषा “जगत की सृष्टि के समय से घात किया”हुआ था जैसा कि वेद पुस्तक (बाइबल) घोषणा करती है।

एक बार जब – यहाँ तक कि समय के आरम्भ होने से पहले – निर्णय ले लिया गया –परमेश्‍वर (प्रजापति – सारी सृष्टि के प्रभु) ने समय, ब्रह्माण्ड तथा मानव जाति की सृष्टि को रच दिया। इस तरह से पुरूषा के स्वेच्छा से होने वाले बलिदान ‘ब्रह्माण्ड की रचना’ (श्लोक 5), चन्द्रमा, सूर्य, बिजली और वर्षा (श्लोक 13), और यहाँ तक कि स्वयंसमय  के आरम्भ होने (श्लोक 6 में उल्लिखित वसंत्, ग्रीष्म और शरद ऋतु की रचना) का कारक बन गया। पुरूषा ही इन सभी का पहिलौठा था।

 वे देवतागण कौन हैं जिन्होंने पुरूषा का बलिदान किया था?

परन्तु एक पहेली अभी भी अनसुलझी बाकी है। पुरूषासूक्ता श्लोक 6 कहता है कि ‘देवतागणों’ (देवों) ने पुरूषा का बलिदान किया था? यह देवतागण कौन हैं? वेद पुस्तक (बाइबल) इसकी व्याख्या करती है। दाऊद नामक एक ऋषि ने ईसा पूर्व 1000 वर्षों पहले एक पवित्र स्तुतिगान में लिखा है जो यह प्रकाशित करता है कि कैसे परमेश्‍वर (प्रजापति) ने पुरूषों और स्त्रियों के लिए बोला:

“मैं ने कहा था, ‘तुम “ईश्‍वर” हो; और सब के सब परमप्रधान के पुत्र हो।'” (भजन संहिता 82:6)

1000 वर्षों पश्चात् यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने ऋषि दाऊद द्वारा रचित इस पवित्र स्तुतिगान के ऊपर यह कहते हुए टिप्पणी दी कि:

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम्हारी व्यवस्था में नहीं लिखा है, ‘मैंने कहा, तुम ईश्‍वर हो?’ 35 यदि उसने उन्हें ईश्‍वर कहा जिनके पास परमेश्‍वर का वचन पहुँचा – और पवित्रशास्त्र की बात असत्य नहीं हो सकती – 36 तो जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है, तुम उसके विषय में क्या कहते हो?” (यूहन्ना 10:34-36)

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) पुष्टि करते हैं कि ऋषि दाऊद ने सत्य पवित्रशास्त्र में शब्दावली देवता अर्थात् ‘ईश्‍वर’ का उपयोग किया है। उन्होंने ऐसा किन अर्थों में किया है? हम देखते हैं कि वेद पुस्तक (बाइबल) की सृष्टि के विवरण में हम ‘परमेश्‍वर के स्वरूप’ में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। इसी भाव में कदाचित् हमें देवता या ‘र्ईश्वर’ के रूप में माना जा सकता है क्योंकि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे गए हैं। परन्तु वेद पुस्तक (बाइबल) इसकी व्याख्या आगे करती है। यह घोषणा करती है कि वह जो पुरूषा के इस बलिदान को स्वीकार करते हैं उन्हें:

जैसा उसने हमें जगत की उत्पति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिये पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों (इफिसियों 1:4-5)

जब जगत की सृष्टि से पूर्व ही प्रजापति-पुरूषा ने पुरूषा के बलिदान को एक पूर्ण बलिदान के रूप में आहुति देने के लिए निर्णय ले लिया था, तब परमेश्‍वर ने उसके लोगों को भी  चुन लिया था।उसने उनका चुनाव किस कार्य के लिए किया था? यह बड़ी स्पष्टता से कहता है कि उसने हमारा चुनाव अपने पुत्र होने के लिए किया था।

दूसरे शब्दों में, वेद पुस्तक (बाइबल) घोषणा करती है कि पुरूष और स्त्रियों का चुनाव तब किया गया जब परमेश्‍वर ने स्वयं को पूर्ण बलिदान में आहुति देने के लिए चुनना तय किया ताकि वह उसके बलिदान के द्वारा परमेश्‍वर की सन्तान बन जाए। इन अर्थों में हमें ‘ईश्‍वर’ या देवता कहा गया है। यह उन लोगों के लिए सत्य है (जैसा कि यीशु सत्संग ऊपर घोषणा करते हैं) जिनके लिए परमेश्‍वर का वचन आया– अर्थात् उनके लिए जो उसके वचन को ग्रहण करते हैं। और इन्ही अर्थों में यह भविष्य की ईश्‍वर की सन्तान की आवश्कयता थी जिसने पुरूषा के बलिदान को विवश किया। जैसा कि पुरूषासूक्ता श्लोक 6 कहता है कि ‘जब देवताओं ने बलि के रूप में पुरूषा का बलिदान किया।’ पुरूषा का बलिदान हमारा शोधन था।

पुरूषा का बलिदान स्वर्ग का मार्ग

इस तरह से हम प्राचीन पुरूषासूक्ता और वेद पुस्तक में प्रकाशित दिए हुए ज्ञान में परमेश्‍वर की योजना को देखते हैं। यह एक विस्मित करने वाली योजना है – ऐसी जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। यह हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि जैसे पुरूषासूक्ता 16वें श्लोक में सार सहित समाप्त होता है कि:

संस्कृत में हिन्दी भाषान्तरण
य़ज्ञनान यज्नमजयन्त देवस्तनि धर्मनि प्रथमन्यसन् तेह नकम् महिमनह् सचन्त य़त्र् पुर्वे सध्यह् सन्तिदेवह् देवताओं ने पुरूषा को यज्ञपशु के रूप में बलि कर दिया। यह सबसे प्रथम स्थापित सिद्धान्त है। इसके माध्यम से ऋषियों ने स्वर्ग की प्राप्ति की।

एक ‘ऋषि’ एक बुद्धिमान व्यक्ति होता है। और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए तरसना वास्तव में एक बुद्धिमानी की बात है। यह हमारी पहुँच से परे नहीं है। यह असम्भव नहीं है। यह केवल सबसे अधिक तपस्वी पवित्र लोगों के लिए ही नहीं है जो अपने चरम अनुशासन और ध्यान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह केवल गुरूओं के  लिए नहीं है। इसके विपरीत यह एक ऐसा मार्ग है जिसे स्वयं पुरूषा ने यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के रूप में अपने देहधारण अर्थात् अवतार के द्वारा प्रबन्ध किया है।

पुरूषा का बलिदान स्वर्ग के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं 

सच्चाई तो यह है कि इसका प्रबन्ध न केवल हमारे लिए किया गया अपितु पुरूषासूक्ता श्लोक 15 और 16 के मध्य में शंकराचार्य की संस्कृति की टीका ऐसे कहती है कि:

संस्कृत में  हिन्दी भाषातंरण 
तमेव विद्वनम्र्त इह भवति णन्यह् पन्त अयनय वेद्यते इस तरह, वह जो इसे जानता है मृत्युहीनता की स्थिति में पहुँचने के लिए सक्षम हो जाता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए किसी अन्य मार्ग की पहचान नहीं की गई है

अनन्त जीवन (मृत्युहीनता) तक पहुँचने के लिए किसी अन्य मार्ग की पहचान नहीं की गई है! निश्चित रूप से इस विषय का अध्ययन थोड़ा अधिक अच्छे से करना बुद्धि की बात है। अभी तक मैंने वेद पुस्तक (बाइबल) के चारों ओर अध्ययन यह दिखाने के लिए किया है कि यह कैसे परमेश्‍वर, मनुष्य और वास्तविकता की एक व्यापक कथा को बतलाता है जो पुरूषासूक्ता में कही हुई कथा के साथ गूँजती है। परन्तु मैंने विस्तार या क्रम में इस कथा को नहीं देखा है। इसे सीखना बहुत अधिक बात है, बहुत अधिक ऋषि और स्तुतिगान और सिद्धान्त हैं जिन्हें प्रकाशित किया गया है। इस उद्देश्य के साथ, मैं आपको निमंत्रण देना चाहता हूँ कि मेरे साथ वेद पुस्तकों को और अधिक विस्तार के साथ, आरम्भ से शुरू करते हुए, सृष्टि के बारे में सीखते हुए अध्ययन करें, कि ऐसा क्या हुआ कि पुरूषा के बलिदान की आवश्यकता पड़ी,  उस जगत के साथ क्या हुआ जिसके कारण मनु (वेद पुस्तक में नूह) का जल प्रलय आया और कैसे जातियों ने सीखा और संरक्षित रखा कि एक पूर्ण बलिदान होगा जो मृत्यु से उन्हें छुटकारा देगा और स्वर्ग में अनन्त जीवन प्रदान करेगा निश्चित ही सीखने और इसके लिए जीवन यापन करने के लिए यह कोईयोग्य बात है। 

बाइबिल की शुरुआत में ही वादा देखें

श्लोक 3 एवं 4 – पुरूषा का देहधारण

पुरूषासूक्ता श्लोक 2 से आगे निम्न बातों के साथ जारी रहता है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

संस्कृत में

हिन्दी भाषान्तरण

इतवन् अस्य महिम अतो ज्ययम्स्च पुरूष:पादो-अस्य विस्व भ् उ तनि त्रिपद् अस्यम्र्त्म् दिवित्रिपद् उर्ध्व उदैत् पुरुष: पदोउ-अस्येह अ भवत् पुन: ततो विस्वन्न्वि अक्रमत् ससननसने अभि सृष्टि में पुरूषा की महिमा – उसकी महिमा अति प्रतापयोग्य है। वह इस सृष्टि से भी बहुत अधिक महान् है। पुरूषा [उसके व्यक्तितत्व] का एक चौथाई भाग इस जगत में है। उसका तीन चौथाई भाग अभी भी स्वर्ग की अनन्तता में वास कर रहा है। पुरूषा स्वयं की तीन चौथाइयों के साथ ऊपर की ओर उठा है। उसकी एक चौथाई का जन्म यहाँ हुआ था। जिससे उसने सभी जीवित प्राणियों में जीवन का विस्तार किया है।

यहाँ पर ऐसी कल्पना का प्रयोग हुआ है जिसे समझना कठिन है। परन्तु फिर भी, यह स्पष्ट है कि ये श्लोक पुरूषा की महानता और प्रताप के बारे में बात कर रहे हैं। यह बहुत स्पष्ट कहता है कि वह अपनी सृष्टि की तुलना में अधिक महान् है। हम यह भी समझ सकते हैं कि इस जगत में उसकी महानता का केवल एक ही भाग प्रगट हुआ है। परन्तु साथ ही यह इस जगत में उसके देहधारण अर्थात् अवतरण की भी बात करता है – ऐसे जगत के लोगों से जहाँ मैं और आप रहते हैं (‘उसकी एक चौथाई का जन्म यहाँ हुआ था’)। इस तरह से जब परमेश्‍वर ने देहधारण किया तो इस जगत में उसकी महिमा का केवल एक भाग ही प्रगट हुआ। जब उसने जन्म लिया तो उसने स्वयं को इस तरह से शून्य कर दिया। यह श्लोक 2 में पुरूषा ने – स्वयं को ‘दस अंगुलियों में सीमित कर दिया’ के वर्णन के अनुरूप है।

साथ ही यह जिस तरह से वेद पुस्तक (बाइबल) में नासरी के यीशु के देहधारण अर्थात् अवतार के वर्णन के अनुरूप भी है। यह उसके लिए ऐसा कहा गया है कि:

मेरा ध्येय यह है कि…उनके मनों में शान्ति हो और वे प्रेम से आपस में गठे रहें, और वे पूरी समझ का सारा धन प्राप्त करें, और परमेश्‍वर पिता के भेद को अर्थात् मसीह को पहचान लें। जिसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं। (कुलुस्सियों 2:2-3)

इस तरह से परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतरण मसीह था परन्तु इसका प्रगटीकरण बहुत अधिक मात्रा में ‘छिपा’ हुआ था। यह कैसे ‘छिपा’ हुआ था? इसकी व्याख्या आगे दी गई है:

 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो:

6 जिसने, परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी

परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में

रखने की वस्तु न समझा;
7 वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया,

और दास का स्वरूप धारण किया,

और मनुष्य की समानता में हो गया।

8 और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने

आप को दीन किया,

और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु –

हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली!

इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान् भी किया,

और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेण्ठ है, (फिलिप्पियों 2:5-9)

इस तरह से अपने देहधारण अर्थात् अवतरण में यीशु ने ‘स्वयं को शून्य’ कर दिया और उस स्थिति में स्वयं को बलिदान देने के लिए तैयार किया। उसने अपनी महिमा का केवल आंशिक ही प्रकट किया, ठीक वैसे ही जैसे पुरूषासूक्ता कहता है। ऐसा उसके आने वाले बलिदान के कारण हुआ। पुरूषासूक्ता इसी विषय का अनुसरण करता है क्योंकि इन श्लोकों के पश्चात् यह पुरूषा की आंशिक महिमा से उसके बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करने के वर्णन की ओर मुड़ जाता है। इसे हम हमारे अगली पोस्ट अर्थात लेख में देखेंगे।

श्लोक 2- पुरूषा अमरत्व का प्रभु है

हमने पुरूषासूक्ता के प्रथम श्लोक में देखा कि पुरूषा का विवरण अच्छी तरह से सर्व-ज्ञानी, सर्व-सामर्थी और सर्व-व्यापी के रूप में वर्णित किया गया था। तब हमने यह प्रश्न पूछा था कि क्या यह पुरूषा यीशु सत्संग (यीशु मसीह) हो सकता है या नहीं और इस प्रश्न को ध्यान में रखते हुए पुरूषासूक्ता के माध्यम से अध्ययन की यात्रा का आरम्भ किया था। इस तरह से हम पुरूषासूक्ता के दूसरे श्लोक तक आ पहुँचे हैं जो निरन्तर पुरूषा नामक इस व्यक्ति का वर्णन बहुत ही असामान्य शब्दों में करता चला जाता है। यहाँ पर संस्कृति और उसका हिन्दी भाषान्तरण दिया हुआ है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

पुरूषासूक्ता का दूसरा श्लोक

संस्कृत में

हिन्दी भाषान्तरण

पुरूष: एवेदम् सर्वम् यद्भुतम् यच्च भव्यम् उतम्र्तत्वस्येसनो यदन्नेनतिरोहति पुरूष: ही पूर्ण ब्रह्माण्ड है, जो कुछ है और जो कुछ होगा। और वह अमरत्व का प्रभु है, जिसे वह भोजन [प्राकृतिक पदार्थ] रहित प्रबन्ध करता है

पुरूषा की योग्यताएँ

पुरूषा ब्रह्माण्ड (अंतरिक्ष और पदार्थ की पूरी सीमा) में सर्वोच्च है और समय का प्रभु है (‘जो कुछ है और जो कुछ होगा’) साथ ही साथ वह ‘अमरत्व का प्रभु’– अर्थात् अनन्त जीवन है। हिंदु पौराणिक कथाओं में बहुत से देवतागण पाए जाते हैं,  परन्तु किसी को भी इस तरह की अनन्त योग्यताएँ नहीं दी गई हैं।

यह ऐसी विस्मित करने वाले प्रेरणादायक गुण हैं जो केवल एक सच्चे परमेश्‍वर– स्वयं सृष्टि के प्रभु से ही सम्बन्धित हो सकते हैं। यह ऋग्वेद का प्रजापति होगा (इब्रानी पुराने नियम के यहोवा का पर्यायवाची)। इस प्रकार, यह व्यक्ति पुरूषा, ही केवल इस एक परमेश्‍वर– सारी सृष्टि के प्रभु का देहधारी अर्थात् अवतार हो सकता है।

परन्तु हमारे लिए इससे भी अधिक प्रासंगिक यह है कि यह पुरूषा हमारे लिए अमरत्व (अनन्त जीवन) का ‘प्रबन्ध’ करता है। वह ऐसा प्राकृतिक पदार्थ का उपयोग करते हुए नहीं करता, अर्थात् वह अनन्त जीवन देने या प्रदान करने के लिए ब्रह्माण्ड की प्राकृतिक प्रक्रियाओं या प्राकृतिक पदार्थ/उर्जा का उपयोग नहीं करता है। हम सभी मृत्यु और कर्म के अभिशाप के अधीन हैं। यह हमारे अस्तित्व की निरर्थकता है जिससे हम छुटकारा पाने की लालसा रखते हैं और जिसके लिए हम पूजा, पवित्र स्नान और अन्य तपस्वी प्रथाओं को करने वाले कठिन कार्यों को करते हैं। यदि यहाँ पर थोड़ी सी भी सम्भावना है कि यह सत्य है और यह कि पुरूषा के पास दोनों अर्थात् अमरत्व को प्रदान करने की इच्छा और सामर्थ्य है, तो यह बुद्धिमानी होगा कि कम से कम इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर ली जाए।

वेद पुस्तक (बाइबल) के ऋषियों के साथ तुलना 

इस बात को ध्यान में रखते हुए आइए मानवीय इतिहास की सबसे प्राचीन पवित्र रचनाओं में से एक के ऊपर ध्यान दें। यह इब्रानी नियम (जिसे बाइबल का पुराना नियम या वेद पुस्तक कह कर पुकारा जाता है) में पाई जाती है। ऋग्वेद की तरह ही, यह पुस्तक विभिन्न ऋषियों की देववाणियों, स्तुतिगान, इतिहास और भविष्यद्वाणियों का एक संग्रह है, यद्यपि जिन्होंने उन्हें बहुत पहले ही लिख दिया था, वह इतिहास के विभिन्न युगों में रहे और लिखा। इस तरह से पुराना नियम विचारों का एक सर्वोत्तम संग्रह या विभिन्न प्रेरणाप्रदत्त रचनाओं का पुस्तकालय एक पुस्तक के रूप में संकलित है। इन ऋषियों की अधिकांश रचनाएँ इब्रानी में थीं और इस प्रकार यह महान् ऋषि अब्राहम के वंशज् थे जो लगभग 2000 ईसा पूर्व रहे। परन्तु फिर भी, एक रचना ऐसी है, जिसे ऋषि अय्यूब के द्वारा लिखा गया था जो अब्राहम से भी बहुत पहले रहे थे। उनके रहने के समय तक इब्रानी जाति उत्पन्न नहीं हुई। वे जिन्होंने अय्यूब का अध्ययन किया है यह अनुमान लगाते हैं कि वह लगभग 2200 ईसा पूर्व, अर्थात् 4000 वर्षों पहले रहे थे।

…अय्यूब की पुस्तक में

अपनी पवित्र पुस्तक, जिसे अय्यूब के नाम से पुकारा जाता है, हम निम्न वचन को उसके साथियों को कहते हुए सुनते हैं:

मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है,

और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।

और अपनी खाल के इस  प्रकार नष्ट हो जाने के बाद भी,

मैं शरीर में होकर परमेश्‍वर का दर्शन पाऊँगा।

उसका दर्शन मैं आप अपनी आँखों से

अपने लिये करूँगा – और कोई दूसरा नहीं।

यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर भी हो जाए! (अय्यूब 19:25-27)

अय्यूब एक आने वाले छुड़ानेवाले अर्थात् ‘उद्धारक’ की बात करता है। हम जानते हैं कि अय्यूब भविष्य की ओर देखता है क्योंकि उद्धारक पृथ्वी के ऊपर खड़ा ‘होगा’ (अर्थात् भविष्य काल में)। परन्तु यह उद्धारक वर्तमान काल में भी रहता है – यद्यपि पृथ्वी के ऊपर नहीं। इस कारण यह उद्धारक, पुरूषासूक्ता के इस श्लोक में पुरूषा की तरह ही, समय का प्रभु है क्योंकि उसका अस्तित्व हमारी तरह समय के साथ बँधा हुआ नहीं है।

अय्यूब तब घोषणा करता है कि ‘अपनी खाल के इस प्रकार नष्ट हो जाने के बाद,’ (अर्थात् अपनी मृत्यु के पश्चात्) वह उसे (इस उद्धारक को) देखेगा और उसी समय वह ‘परमेश्‍वर को देखता’ है। दूसरे शब्दों में आने वाला यह उद्धारक परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतार है, ठीक वैसे ही जैसे पुरूषा प्रजापति का देहधारण है। परन्तु कैसे अय्यूब उसे अपनी मृत्यु के पश्चात देख सकता है? और इस बात को सुनिश्चित करने के लिए हम इस बात अनजान न रह जाएं कि अय्यूब यह घोषणा करता है कि ‘मेरे स्वयं की आँखों से – मैं और कोई और नहीं’ जगत पर खड़े हुए इस छुड़ानेवाले को देखेगा। इसकी केवल एक ही व्याख्या है कि इस उद्धारक ने अय्यूब को अमरत्व प्रदान किया है और वह उस दिन की अपेक्षा कर रहा है जब छुड़ानेवाला, जो परमेश्‍वर है, जगत के ऊपर चलेगा और उसने अय्यूब को अमरत्व प्रदान किया है ताकि वह भी फिर से पृथ्वी के ऊपर चले और छुड़ानेवाले को अपनी स्वयं की आँखों से देखे। इस दिन की अपेक्षा ने उसे इतना अधिक मंत्र मुग्ध कर दिया है कि उसका ‘हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर’ हो जाता है। यह वह मंत्र है जिसने उसे परिवर्तित कर दिया था।

…और यशायाह

इब्रानी ऋषि ने आने वाले एक व्यक्ति के विषय में भी बोला है जिसका विवरण बहुत अधिक अय्यूब के छुड़ानेवाले और पुरूषा के इस विवरण के जैसा दिखाई देता है। यशायाह एक ऐसा ऋषि है जो लगभग 750 ईसा पूर्व रहा। उसने बहुत से वचनों को ईश्वरीय प्रेरणा से लिखा। वह अब आने वाले इस व्यक्ति का वर्णन करता है:

तौभी संकट भरा अन्धकार जाता रहेगा। पहले तो उसने जबूलून और नप्ताली के देशों का अपमान किया परन्तु अन्तिम दिनों में ताल की ओर यरदन के पार की अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा –

2 जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे

उन्होंने बड़ा उजियाला देखा;

और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे,

उन पर ज्योति चमकी…

6 क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ,

हमें एक पुत्र दिया गया है;

और उसका नाम

अद्भुत युक्ति करनेवाला, पराक्रमी परमेश्‍वर

अनन्तकाल का पिता, शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। (यशायाह 9:1-2, 6)

दूसरे शब्दों में, ऋषि यशायाह एक पुत्र के जन्म को पहले से देख रहा था और उसकी भविष्यद्वाणी कर रहा था और इस पुत्र को ‘पराक्रमी परमेश्‍वर… कह कर पुकारा जाएगा’। यह समाचार विशेषकर उन लोगों के लिए सहायतापूर्ण था जो ‘घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे’। इसका क्या अर्थ है? हमारा जीवन इस बात को जानते हुए यापन होता है कि हम अपनी आने वाली मृत्यु और उन कर्मों से जो हमारे ऊपर शासन करते हैं, से बच नहीं सकते हैं। इसलिए हम वास्तव में ‘मृत्यु की छाया में’ जीवन यापन करते हैं। इस तरह से आने वाले इस पुत्र को ‘पराक्रमी परमेश्‍वर’ कह कर पुकारा जाएगा, जो हम लोगों के लिए बड़ा उजियाला या आशा होगी जो अपनी आनेवाली मृत्यु की छाया में जीवन यापन करते हैं।

… और मीका

एक और ऋषि जो यशायाह (750 ईसा पूर्व) के समय में ही रहे थे, ने भी आने वाले व्यक्ति के बारे में ईश्वरीय वचन को कहा है। उन्होंने लिखा है कि:

हे बैतलहम एप्राता,

यदि तू ऐसा छोटा है कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता,

तौभी तुझ में से मेरे लिये एक पुरूष निकलेगा,

जो इस्राएलियों में प्रभुता करने वाला होगा;

और उसका निकलना प्रचीनकाल से, 

वरन् अनादि काल से होता आया है। (मीका 5:2)

मीका ने कहा कि एक व्यक्ति एप्राता क्षेत्र के बैतलहम नामक शहर से निकल कर आएगा, जहाँ पर यहूदा का गोत्र (अर्थात् यहूदी लोग) रहता था। इस व्यक्ति के लिए सबसे अनूठा यह है कि यद्यपि यह इतिहास में एक निश्चित समय पर बैतलहम से ‘निकल कर आएगा,’ परन्तु वह अपने मूल में पूर्व से ही समय के आरम्भ से अस्तित्व में था। इस प्रकार पुरूषासूक्ता के श्लोक 2 और अय्यूब के आनेवाले छुड़ानेवाले की तरह, यह व्यक्ति भी हमारी तरह समय के बन्धन में बँधा हुआ नहीं होगा। वह समय का प्रभु होगा। यह ईश्वरीय योग्यता है, न कि मानवीय, और इस तरह से वह सभी एक ही व्यक्ति को उदधृत कर रहे हैं।

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) में पूर्ण होना

परन्तु यह व्यक्ति कौन है? मीका इसके लिए हमें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुराग देता है। आने वाला व्यक्ति बैतलहम से आएगा। बैतलहम एक वास्तविक शहर है जो कि हजारों वर्षों से आज तक अस्तित्व में है जिसे आज के समय इस्राएल/वेस्ट बैंक के नाम से पुकारा जाना जाता है। आप इसको गूगल की पृथ्वी पर पा सकते और मानचित्र पर देख सकते हैं। यह एक बड़ा शहर नहीं है, और न ही कभी रहा है। परन्तु यह संसार में प्रसिद्ध है और वार्षिक वैश्विक समाचारों में बना रहता है। क्यों? क्योंकि यह यीशु मसीह (या यीशु सत्संग) का जन्म स्थान है। यह वह शहर है जहाँ पर उसने लगभग 2000 वर्षों पहले जन्म लिया था। यशायाह हमें एक और सुराग को देता है क्योंकि वह कहता है कि यह व्यक्ति गलील के ऊपर प्रभाव डालेगा।और यद्यपि यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने बैतलहम (जैसा की मीका ने पहले से ही देख लिया था) में जन्म लिया था, वह गलील में पला बढ़ा और एक शिक्षक के रूप में उसने वहाँ सेवा की, जैसा कि यशायाह ने पहिले से ही भविष्यद्वाणी कर दी थी। बैतलहम उसका जन्मस्थान होने के कारण और गलील उसकी सेवकाई का स्थान होने के कारण यीशु सत्संग (यीशु मसीह) के जीवन के सबसे अधिक जाने जाने वाले दो स्थान हैं। इस तरह से हम यहाँ विभिन्न ऋषियों के द्वारा की गई भविष्यद्वाणियों को देखते हैं जो यीशु मसीह (यीशु सत्संग) में पूर्ण हो जाती हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि यीशु ही वह पुरूषा/छुड़ानेवाला/शासक हो जिसे इन प्राचीन ऋषियों ने पहले से देख लिया था? इस प्रश्न का यह उत्तर ऐसी कुँजी हो सकती है जो इस बात को खोल देती है कि कैसे हम जो ‘मृत्यु की छाया’ (और कर्मों) में रह रहे हैं को ‘अमरत्व’ प्रदान किया जा सकता है, इस बात पर हमारी सोच निश्चित ही हमारे समय में विचारयोग्य है। इस कारण हम अपनी खोजबीन को जारी रखेंगे जब हम पुरूषासूक्ता के अध्ययन के माध्यम से और आगे बढ़ते हैं और इब्रानी वेद पुस्तकों के ऋषियों से इसकी तुलना करेंगे।

पुरूषासूक्ता पर ध्यान देना – पूरूषा की स्तुति का भजन

कदाचित् ऋग्वेद की सबसे प्रसिद्ध कविता या प्रार्थना पुरूषासूक्ता (पुरूषा सुक्तम्) है। यह 90वें अध्याय और 10वें मंडल में पाई जाती है। यह एक विशेष व्यक्ति –पुरूष: (जिसे पुरूषा के नाम से पुकारा जाता है) के लिए गाया गया गीत है। क्योंकि यह ऋग्वेद में पाया जाता है, इसलिए यह संसार का सबसे प्राचीन मंत्र है, इस कारण इस का अध्ययन यह देखने के लिए लाभप्रद है कि हम कैसे मुक्ति या मोक्ष (ज्ञानोदय) के तरीके को सीख सकते हैं।

अब पुरूषा कौन है? वैदिक ग्रंथ हमें बताते हैं कि

 “पुरूषा और प्रजापति एक और एक ही व्यक्ति है।” (संस्कृत में पुरूषोही प्रजा पति)

माध्यन्दिनी शतपथ ब्राह्मण VII. 4/1/156

उपनिषद् इसी सोच को जारी रखते हुए कहते हैं कि

“पुरूषा सभी बातों में सर्वश्रेष्ठ है। कुछ भी [कोई भी] पुरूषा से श्रेष्ठ नहीं है। वही अन्त है और उच्चतम लक्ष्य है” (अव्यक्त पुरूष: परह्। पुरूषान परम् किन्चित्स कस्थ स पर गति) कठोपनिषद् 3/11

“और वास्तव में सर्वोच्च पुरूषा अव्यक्त से परे है…वह जो उसे जानता है वह मुक्त हो जाता है और अमरत्व को प्राप्त कर लेता है (अव्यक्त उ परह् पुरूष:…यज्न त्व मुच्यते ज़न्तुरम्तत्वम् च गच्चति) कठोपनिषद् 6/8

इस तरह से पुरूषा ही प्रजापति (सारी सृष्टि का प्रभु) है। परन्तु,कदाचित् इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सीधे उसे जानना है जो आपको और मुझे प्रभावित करता है। उपनिषद् कहता है कि:

“अनन्त जीवन का (पुरूषा को छोड़कर) अन्य कोई मार्ग नहीं है” (णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

इस कारण हम पुरूषासूक्ता, ऋग्वेद के भजन का अध्ययन करेंगे, जो पुरूषा का विवरण देते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो मैं कदाचित् एक विलक्षण एवम् अनूठे विचार को हमारे सोचने के लिए रखूँगा: क्या पुरूषासूक्ता में कहा गया यह पुरूष लगभग 2000 वर्षों पहले यीशु सत्संग (नासरी के यीशु) में देहधारी हुआ? जैसा कि कहा गया है, कदाचित् यह एक विलक्षण धारणा है, परन्तु यीशु सत्संग (नासरी का यीशु) सभी धर्मो में एक पवित्र व्यक्ति के रूप में जाना जाता है और उसने परमेश्‍वर के देहधारण अर्थात् अवतार होने का दावा किया था, और दोनों अर्थात् परमेश्‍वर और पुरूषा का बलिदान (जैसा कि हम देखेंगे) हुआ, इस कारण यह हमें इस विचार के ऊपर विचार करने और इसका पता लगाने के लिए अच्छे कारण देता है। संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।

पुरूषासूक्ता का प्रथम श्लोक

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
षहस्र सिर्सा-पुरूषाह्षहस्र क्सह् सह्स्रपत्ष भुमिम् विस्वतो व् र्त्वात्यतिस्थद्दसन्गुलम् पुरूषा के एक हज़ार सिर, एक हज़ार आँखें और एक हज़ार पैर हैं। सृष्टि को चहूँ ओर से घेरते हुए, वह चमकता है। और वह स्वयं को दस अंगुलियों में सीमित है।

जैसा कि हमने ऊपर देखा कि पुरूषा ही प्रजापति है। प्रजापति, जैसा कि यहाँ विवरण दिया गया,कि उसे प्राचीन वेदों में ऐसा परमेश्‍वर माना जाता था, जिसने सब कुछ की रचना की है – वह “सारी सृष्टि का प्रभु” था।

पुरूषासूक्ता के आरम्भ में ही हम पुरूषा के ‘एक हज़ार सिर, एक हज़ार आँखें और एक हज़ार पैर हैं,’ को देखते हैं, इसका क्या अर्थ है? ‘हज़ार’ का अर्थ यहाँ किसी विशेष गिनती की हुई संख्या से नहीं है, अपितु इसका अर्थ ‘अगणित’ या ‘सीमा से परे’ के अर्थो से है। इस तरह से पुरूषा का सीमारहित ज्ञान (‘सिर’) है। कि सृष्टि को चहूँ ओर से घेरते हुए, वह चमकता है। और वह स्वयं दस अंगुलियों में सीमित है। आज की भाषा में हम कह सकते हैं कि वह सर्वज्ञानी या सब-कुछ जानने वाला है। यह परमेश्‍वर (प्रजापति) का एक गुण है जो केवल एक ही ऐसा है जिसे सब-कुछ का पता है। साथ ही, परमेश्‍वर देखता और सब बातों की जानकारी भी रखता है। पुरूषा की ‘एक हज़ार आँखें’ हैं के कहने का अर्थ यह है कि पुरूषा सर्वव्यापी है – वह सब बातों को जानता है क्योंकि वह सभी स्थानों में उपस्थित है। इसी तरह से, ‘एक हज़ार पैर’– सर्वसामर्थ्य अर्थात् सर्वशक्तिमत्ता– असीमित शक्ति को प्रस्तुत करते हैं।

इस तरह से हम पुरूषासूक्ता के आरम्भ में ही देखते हैं कि पुरूषा को सर्वज्ञानी, सर्वव्यापी और सर्वसामर्थी व्यक्ति के रूप में परिचित कराया गया है। परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतार ही केवल इस तरह का व्यक्ति हो सकता है। तौभी, यह श्लोक यह कहते हुए समाप्त होता है कि ‘उसने स्वयं को दस अंगुलियों में सीमित किया है।’ इसका क्या अर्थ है? एक देहधारी व्यक्ति होने के नाते, पुरूषा ने स्वयं को ऐसा शून्य कर दिया कि उसने अपनी ईश्वरीय शक्तियों को छोड़ दिया और एक सामान्य मानव के स्वरूप में  – ‘दस अंगुलियों’ जितना सीमित कर दिया। इस तरह से, यद्यपि पुरूषा ईश्र्वर था, ईश्‍वरत्व के सभी गुणों के होने पर भी, उसने स्वयं के देहधारण में, स्वयं को मनुष्य की समानता में कर लिया।

वेद पुस्तक (बाइबल), जब यीशु सत्संग (नासरी के यीशु) के लिए बोलती है तो इसी विचार को अक्षरश: व्यक्त करती है। वह कहती है कि:

…जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो:

6 जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी

परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में

रखने की वस्तु न समझा; 7 वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया,

और दास का स्वरूप धारणा किया,

और मनुष्य की समानता में हो गया।

8 और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने

आप को दीन किया,

और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु –

हाँ, कूस्र की मृत्यु भी सह ली! (फिलिप्पियों 2:5-8)

आप देख सकते हैं कि वेद पुस्तक (बाइबल) अक्षरश: वैसे ही विचारों – असीमित परमेश्‍वर का एक सीमित मनुष्य में देहधारण होने – का उपयोग करती है जैसे कि पुरूषा को परिचित कराने के लिए पुरूषासूक्ता में दिए गए हैं। परन्तु बाइबल का यह प्रसंग शीघ्रता से उसके बलिदान का विवरण– जैसा कि पुरूषासूक्ता भी करेगा –करने की ओर बढ़ता चला जाता है। इस लिए इन भविष्यवाणियों का पता लगाना किसी भी उस व्यक्ति के लिए सार्थक है जो मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखता है, क्योंकि, जैसा कि उपनिषदों में कहा गया है कि:

“अनन्त जीवन का (पुरूषा को छोड़कर) अन्य कोई मार्ग नहीं है” (णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

हम पुरूषासूक्ता श्लोक 2 में यहाँ जारी रखेंगे।

यीशु के बलिदान से कैसे शुद्धता के वरदान को प्राप्त किया जा सकता है?

यीशु सभी लोगों के लिए स्वयं का बलिदान देने के लिए आया । यही सन्देश प्राचीन ऋग्वेद के भजनों में प्रतिछाया स्वरूप और साथ ही साथ प्रतिज्ञाओं में और प्राचीन इब्रानी वेदों में मिलता है। यीशु उस प्रश्न का उत्तर है जिसे हम प्रत्येक बार उच्चारित की गईप्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना के समय पूछते हैं। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबल (वेद पुस्तक) कर्मों की एक ऐसी व्यवस्था की घोषणा करती है जो हम सभों को प्रभावित करती है:

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है…(रोमियों 6:23)

नीचे मैंने एक उदाहरण के द्वारा कर्मों की व्यवस्था को दिखलाया है। “मृत्यु” का अर्थ  सम्बन्ध विच्छेद से है। जब हमारे प्राण हमारे शरीर से अलग हो जाते हैं तो हम शारीरिक रूप से मर जाते हैं। इसी तरह से हम परमेश्‍वर से आत्मिक रूप से अलग हो जाते हैं। ऐसा इसलिये सत्य है क्योंकि परमेश्‍वर पवित्र (पाप रहित) है।

पाप ने मृत्यु की ओर जाता है - भगवान से जुदाई
हम परमेश्‍वर से अलग हमारे पापों के कारण ऐसे हैं जैसे कि दो चोटियों के बीच एक खाई होती है

हम स्वयं का चित्रण ऐसे कर सकते हैं जैसे एक चोटी पर तो हम हैं और दूसरी चोटी पर परमेश्‍वर स्वयं है और हम इस पाप की अथाह खाई से अलग किए हुए हैं ।

यह विच्छेद दोष और डर को उत्पन्न करता है। इसलिए हम स्वाभाविक रूप से एक पुल को निर्मित करने का प्रयास करते हैं जो हमें हमारी तरफ से (मृत्यु से) परमेश्‍वर की ओर ले जाए। हम बलिदानों को अर्पण करते हैं, पूजा पाठ करते हैं, तपस्या को करते हैं, त्योहारों में भागी होते हैं, मन्दिरों में जाते हैं, कई तरह की प्रार्थनाएँ करते हैं और यहाँ तक कि हम पाप को न करने या कम करने की कोशिशें करते हैं। कर्मों की यह सूची सद्कर्मों को प्राप्त करने के लिए हम में से कइयों के लिए लम्बी हो सकती है । समस्या यह है कि हमारे प्रयास, सद्गुण, बलिदान और तपस्या से भरे हुए कार्य आदि., यद्यपि स्वयं में बुरे नहीं हैं, परन्तु फिर भी पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि जिस कीमत की अदायगी (मजदूरी) की आवश्यकता हमारे पापों के लिए है वह मृत्यु है। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है।

धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।
धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।

हमारे धार्मिक प्रयासों के द्वारा हम ऐसे ‘पुल’ का निर्माण करते हैं जो कि परमेश्‍वर से अलग होने वाले मार्ग को पाटने की कोशिश करे। यद्यपि यह बुरा नहीं हैं, तौभी यह हमारी समस्या का समाधान  नहीं करता है क्योंकि यह दूसरी तरफ पहुँचाने में पूरी तरह से सफल नहीं होता है। हमारे प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। यह कैंसर (जिसका अन्त मृत्यु ही है) को केवल साग सब्जियों को खाकर ही ठीक करने के प्रयास जैसा ही है। साग सब्जियाँ खाना बहुत अच्छा है – परन्तु यह कैंसर को चंगा नहीं करता है । इसके लिए आपको पूरी तरह से एक भिन्न उपचार की अवश्यकता है । हम इन प्रयासों को एक धार्मिक सद्गुणों के एक ऐसे ‘पुल’ के रूप में चित्रित कर सकते हैं जो कि केवल-कुछ-दूरी तक ही खाई में जाते हुए – हमें फिर भी परमेश्‍वर से अलग ही रखता है।

कर्मों की व्यवस्था एक बुरा समाचार है – यह इतना बुरा है कि अक्सर हम इसके बारे में सुनना ही पसंद नहीं करते हैं और हम अक्सर अपने जीवनों को कई तरह की गतिविधियों और ऐसे बातों से यह आशा करते हुए भर देते हैं कि यह व्यवस्था चली जाएगी – और ऐसा तब तक करते हैं जब हमारी परिस्थितियों का बोझ हमारे प्राणों को चारों ओर से घेर लेता है।  परन्तु बाइबल कर्मों की व्यवस्था के साथ अन्त नहीं होती है।

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है परन्तु …(रोमियों 6:23)

छोटा सा शब्द ‘परन्तु’ यहाँ पर व्यवस्था की दिशा को दिखलाता है कि यह अब किसी और ही तरफ, अर्थात् शुभ सन्देश – सुसमाचार की ओर जाने के लिए तैयार है। यह वैसी कर्मों की व्यवस्था है जो मोक्ष और प्रकाशित होने वाले एक व्यक्ति के लिए आरक्षित की गई है। इस लिए अब मोक्ष की व्यवस्था क्या है?

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है (रोमियों 6:23)

सुसमाचार का शुभ सन्देश यह है कि यीशु की मृत्यु का बलिदान परमेश्‍वर और हमारे मध्य की खाई को पाटने वाले पुल के लिए पर्याप्त है। हम इसे जानते हैं क्योंकि अपनी मृत्यु के तीन दिन पश्चात् यीशु शारीरिक रूप से पुन: जी उठा, भौतिक रूप से पुनरूत्थान के द्वारा वह एक बार फिर से जीवित हो उठा । यद्यपि कुछ लोग आज यीशु के जी उठने में अविश्‍वास करना चुनते हैं परन्तु इसके विरोध में एक शक्तिशाली प्रमाण दिखाई देता है जिसे इस सार्वजनिक भाषण में दिया गया है जो कि मैंने एक विश्वविद्यालय में दिया था (इस विडियो लिंकको खोलें)।  प्रभु यीशु ने स्वर्ग में प्रवेश किया और स्वयं की भेंट परमेश्वर को चढ़ाई। एक अर्थ में, उसने ऐसी पूजा अर्थात् अराधना को, सभी लोगों के बदले में, स्वयं की भेंट चढाते हुए, पाप के शोधन के लिए स्वयं को अर्पण करते हुए किया, जो परमेश्वर को स्वीकारयोग्य है।

यीशु वह पुरूष है जिसने पूर्ण बलिदान को दिया । क्योंकि वह एक मनुष्य था इसलिए वह पुल को बनने के योग्य है जो उस खाई को पाट देती है और इस तरफ के मनुष्य हिस्से को छूता है और क्योंकि वह पूर्ण है इसलिए वह परमेश्‍वर की तरफ के हिस्से को भी छूता है। वह जीवन का पुल है और इसे नीचे इस तरह से चित्रित किया जा सकता है

यीशु के बलिदान के लिए पर्याप्त है
यीशु वह पुल है जो परमेश्‍वर और मनुष्य की मध्य की खाई को पाट देता है। उसका बलिदान हमारे पापों की कीमत को अदा करता है ।

इस बात में ध्यान दें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें दिया गया है । यह हमें एक …वरदान  अर्थात् उपहार के रूप में दिया गया है। इस वरदान अर्थात् उपहार के बारे में सोचें। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यह वरदान क्या है, यदि यह वास्तव में एक वरदान है तो यह ऐसा है कि जिसके लिए आपने कुछ कार्य नहीं किया है और यह कि आप इसे अपने सद्गुणों के अनुसार कमा नहीं सकते हैं। यदि आप इसे कमा लेते हैं तो यह फिर एक उपहार के रूप में नहीं रह जाता है! इसी तरह से आप यीशु के बलिदान को सद्गुणों या अपनी कमाई से कमा नहीं सकते हैं। यह आपको वरदान अर्थात् उपहार के रूप में दिया जाता है।

और यह उपहार क्या है ? यह अनन्त जीवन है । इसका अर्थ यह है कि जो पाप आपके ऊपर मृत्यु को लाया वह अब निरस्त अर्थात् रद्द कर दिया गया है । यीशु का बलिदान वह पुल है जिसके ऊपर चल कर आप परमेश्‍वर के साथ सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं और जीवन को – जो सदैव बना रहेगा – प्राप्त कर सकते हैं । यह वरदान अर्थात् उपहार यीशु के द्वारा दिया गया है जो, मृतकों में जी उठने के द्वारा, स्वयं को ‘प्रभु’ के रूप में प्रकट करता है।

इस तरह कैसे मैं और आप जीवन के इस पुल को ‘पार’ करते हैं जिसे यीशु हमें एक वरदान के रूप में देता है? एक बार फिर से, उपहारों के बारे में सोचें। यदि कोई आपके पास आता है और आपको एक उपहार देता है ऐसा उपहार जिसके लिए आपने कोई कार्य नहीं किया है। परन्तु इस उपहार से लाभ पाने के लिए आपको इसके ‘प्राप्त’ कर लेना होगा। जब कभी भी किसी एक उपहार को दिया जाता है तो इसके दो विकल्प होते हैं। या तो उपहार को अस्वीकार कर दिया जाए (“नहीं, आपका धन्यवाद”) या इसे स्वीकार कर लिया जाए (“इस उपहार के लिए आपका धन्यवाद। मैं इसे ले लेता हूँ”)। इस तरह से यह उपहार जिसे यीशु आपको दे रहा है को भी स्वीकार कर लेना चाहिए। इसमें केवल साधारण रूप से ‘विश्‍वास’, इसका ‘अध्ययन’, या इसे ‘समझना’ मात्र ही नहीं किया जाना चाहिए। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है जहाँ पर हम परमेश्‍वर की ओर मुड़ने के लिए पुल पर ‘चलते’ हैं और उस उपहार को प्राप्त करते हैं जिसे वह हमें देने का प्रस्ताव दे रहा है।

यीशु के बलिदान एक उपहार है कि हम प्राप्त करना चाहिए है
यीशु का बलिदान एक ऐसा उपहार है जिसे हम में से प्रत्येक को प्राप्त कर लेने के लिए चुन लेना चाहिए

इस लिए अब कैसे इस उपहार को प्राप्त किया जाता है ? बाइबल कहती है कि

जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा (रोमियों 10:12)

ध्यान दें यह प्रतिज्ञा ‘हर किसी’ के लिए है, न कि किसी विशेष धर्म, जाति या देश के लिए । क्योंकि वह मृतकों में जी उठा है इसलिए यीशु यहाँ तक कि अब भी जीवित है और वह ‘प्रभु’ है। इसलिए यदि आप उसको पुकारेंगे तो वह सुनेगा आपको अपने जीवन का उपहार देगा। आपको उसे – उसके साथ वार्तालाप करते हुए – पुकारना चाहिए और उससे माँगना चाहिए । कदाचित् आपने यह कभी नहीं किया होगा। यहाँ पर दिशानिर्देश दिया गया है जो कि आपको उसके साथ वार्तालाप करने और उससे प्रार्थना करने में सहायता प्रदान कर सकता है । यह कोई जादू से भरा हुआ मंत्र नहीं है। ये कोई विशेष शब्द नहीं हैं जो कि सामर्थ्य देते हैं। यह उसकी योग्यता और उसके द्वारा हमें उपहार देने की इच्छा के ऊपर भरोसा करना है। जब हम उस पर भरोसा करते हैं तो वह हमारी सुनता है और उत्तर देता है । इसलिए इस दिशानिर्देश का अनुसरण करने के लिए स्वतंत्रता को महसूस करें जब आप ऊँची आवाज में या अपनी आत्मा में यीशु से बात करते हैं और उसके उपहार को प्राप्त करते हैं ।

हे प्यारे प्रभु यीशु, मैं समझता हूँ कि मेरे जीवन के पापों के साथ मैं परमेश्‍वर से अलग हूँ। यद्यपि मैंने अपनी सर्वोत्तम कोशिशें की हैं, तौभी मेरा कोई प्रयास और बलिदान इस सम्बन्ध विच्छेद को पाट नहीं सकता है । परन्तु मैं समझता हूँ कि आपकी मृत्यु एक ऐसा बलिदान है जो हमारे सारे पापों को धो डालता है – यहाँ तक कि मेरे पापों को भी । मैं विश्‍वास करता हूँ कि आप अपने बलिदान के पश्चात मृतकों में जी उठे इस तरह से मैं जानता हूँ कि आपका बलिदान पर्याप्त है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे मेरे पापों से शुद्ध करें और मुझे परमेश्‍वर के पास ले आएँ ताकि मैं अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकूँ । मैं ऐसे जीवन को नहीं चाहता हूँ जो पाप का गुलाम हो इसलिए कृप्या करके मुझे इन पापों से शुद्ध करें जिन्होंने मुझे कर्म बन्धन में जकड़ा हुआ है। हे प्रभु यीशु, मेरे लिए यह सब कुछ करने के लिए और अब निरन्तर मुझे मेरे जीवन में मेरे प्रभु के रूप में मार्गदर्शन देते रहने के लिए आपका धन्यवाद।  

दिवाली और प्रभु यीशु

diwali-lamps
दीवाली के लैंप

पहली बार जब मैंने ‘बड़ी निकटता’ के साथ दिवाली का अनुभव उस समय किया जब मैं भारत में कार्यरत् था। मैं यहाँ पर एक महीने रहने के लिए आया था और मेरे रहने के दिनों के आरम्भ के दिनों में दिवाली का त्योहार मेरे चारों तरफ मनाया गया था। जो मुझे सबसे ज्यादा स्मरण है वह पटाखे हैं – हवा धुएँ से भरी हुई थी और इससे मेरी आँखों में थोड़ी सी जलन हो रही थी। मेरे चारों तरफ घटित हो रहे उत्साह के साथ मैं दिवाली के बारे में जानना चाहता था, कि यह क्या है और इसका क्या अर्थ है । और मैं इसके प्रेम में पड़ गया।

‘ज्योतियों या प्रकाश के त्योहार’ ने मुझे प्रेरणा से भर दिया क्योंकि मैं एक विश्वासी हूँ, और यीशु सत्संग जिसे प्रभु यीशु के नाम से भी जाना जाता है, का अनुयायी हूँ। और उसके सन्देश की मुख्य शिक्षा यह है कि उसकी ज्योति अर्थात् प्रकाश हमारे बीच के अन्धेरे के ऊपर विजय को पा लेगा। इस तरह से दिवाली का प्रभु यीशु के साथ मजबूती का सम्पर्क था।

हम में से बहुत से लोग यह जानते हैं कि हमारे बीच के अन्धेरे के साथ एक समस्या है। इस लिए ही कई लाखों की संख्या में कुम्भ मेले के त्योहार में भाग लेते हैं – क्योंकि हम में से लाखों यह जानते हैं कि हमने पाप किया है और यह कि हमें इन्हें धोने और स्वयं को शुद्ध करने की आवश्यकता है। इसी के साथ, प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्राचीन जानी-पहचानी प्रार्थना इस पाप को या हमारे भीतर के अन्धेरे को स्वीकार करती है।

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

परन्तु अन्धकार, या पाप के हमारे भीतर के ये सारे विचार, हमें उत्साहित नहीं करते हैं। सच्चाई तो यह है कि हम कई बार इन्हें ‘बुरे समाचारों’ के रूप में सोचते हैं। इसी कारण अन्धकार के ऊपर विजय पाता हुआ ज्योति का विचार हमें बहुत अधिक आशा और हर्ष देता है। और इसलिए, मोमबत्तियों, मिठाइयों और पटाखों के साथ, दिवाली इस आशा को व्यक्त करती है कि प्रकाश अन्धकार के ऊपर जय पा लेता है।

प्रभु यीशु – संसार में ज्योति

यही कुछ वास्तव में प्रभु यीशु ने किया। वेद पुस्तक (या बाइबल) में सुसमाचार यीशु को इस तरीके से वर्णित करते हैं:

आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ है; उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई। उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी। ज्योति अन्धकार में चमकती थी, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया । (यूहन्ना 1:1-5)

इस तरह से आप देखते हैं, यह ‘शब्द’ उस आशा की पूर्णता है जिसे दिवाली व्यक्त करती है। और यह आशा परमेश्‍वर की ओर से इस ‘शब्द’ में आती है, जिसकी यूहन्ना ने बाद में प्रभु यीशु के रूप में पहचान की। सुसमाचार निरन्तर यह कहता चला जाता है कि

सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना। वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया । परन्तु जितनों ने उसके ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं – वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु  परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं । (यूहन्ना 1:9-13)

यह विवरण देता है कि कैसे प्रभु यीशु ‘हर एक को ज्योति’ या प्रकाश देने के लिए आया था। कुछ लोग सोचते हैं कि यह केवल कुछ ही लोगों के ऊपर लागू होता है, परन्तु ध्यान दें यह कहता है कि यह प्रस्ताव इस ‘संसार’ में रहने वाले ‘हरेक’ के लिए है कि वह ‘परमेश्‍वर की सन्तान’ बन जाए। यह ऐसा प्रस्ताव है कि हरेक, कम से कम हरेक जो दिवाली जैसे त्योहार में रूचि रखता है, के भीतर के अन्धकार पर प्रकाश विजय पाता है।

प्रभु यीशु के जीवन को पहले से ही हजारों वर्षों पहले भविष्यद्वाणी कर दिया गया था  

प्रभु यीशु के बारे में असाधारण यह है कि उसका देहधारण या मानवातरण होना विभिन्न तरीकों से और आरम्भिक मानवीय इतिहास की घटनाओं में कई तरह से पहले ही भविष्यद्वाणी की गई थी और सूचित कर दिया गया था और इब्रानी वेदों में इसका उल्लेख किया हुआ है। इसलिए उसके बारे में पहले से लिख दिया गया था जबकि वह अभी पृथ्वी पर आया ही नहीं था। और उसके देहधारण के कई भविष्यद्वाणियों को सबसे प्राचीन ऋग्वेद के भजनों में स्मरण किया गया है, जो आने वाले पुरूषा की स्तुति करते हैं, और मानवीय इतिहास की कुछ आरम्भिक घटनाओं का उल्लेख करते हैं, जैसे कि मनु की जल प्रलय, वही व्यक्ति जिसे की बाइबल – अर्थात् वेद पुस्तक –’नूह’ के नाम से पुकारती है। यह प्राचीन विवरण लोगों के पापों के अन्धकार को दर्शाते हैं, जबकि पुरूषा, या प्रभु यीशु के आगमन की आशा का प्रस्ताव देते हैं।

ऋग्वेद की भविष्यद्वाणियों में, पूरूषा, अर्थात् परमेश्‍वर का देहधारण और पूर्ण मनुष्य को बलिदान होने के लिए आ रहा था। यह बलिदान हमारे पापों के कर्मों की कीमत को अदा करने और साथ ही यह हमें भीतर से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त था। शुद्धीकरण और पूजा पाठ अच्छे हैं, परन्तु यह हमें केवल बाहर तक ही सीमित रखते हैं। हमें भीतर से शुद्ध होने के लिए बेहतर बलिदान की आवश्यकता है।

प्रभु यीशु की इब्रानी वेदों में भविष्यद्वाणी कर दी गई थी

ऋग्वेद के इन भजनों के साथ ही, इब्रानी वेदों ने इस आगमन के बारे में भविष्यद्वाणी की थी। इब्रानी वेदों में महत्वपूर्ण ऋषि यशायाह हैं (जो 750 ईसा पूर्व रहे, दूसरे शब्दों में प्रभु यीशु के इस पृथ्वी पर आने के 750 वर्षों पूर्व)। उसने उनके आगमन के प्रति कई अन्तर्दृष्टियों को दिया है। उसने दिवाली का पूर्वानुमान लगा लिया था जब उसने प्रभु यीशु के बारे में घोषणा की:

जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे उन्होंने बड़ा उजियाला देखा; और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे, उन पर ज्योति चमकी (यशायाह 9:2)।

ऐसी घटना क्यों घटित होगी?  वह निरन्तर आगे बताता है:

क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके काँधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्‍वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। (यशायाह 9:6)

परन्तु यद्यपि उसने देहधारण किया, वह हमारे लिए एक गुलाम बन गया, कि हमारी अन्धकारमयी आवश्यकता में हमें सहायता दे।

निश्चय उस ने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्‍वर का मारा- कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएँ। हम तो सब के सब भेड़ों की समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। (यशायाह 53:4-6)।

ऋषि यशायाह प्रभु यीशु के क्रूसीकरण का विवरण दे रहे हैं। वह ऐसे वर्णन करते हैं जैसे कि यह 750 वर्षों पहले घटित हुआ है, और वह साथ ही क्रूसीकरण का विवरण इस तरह के बलिदान के रूप में करते हैं जो कि हमें चंगा करता है। और यह कार्य जिसका प्रस्ताव यह गुलाम देगा ऐसा होगा कि जिसे उसे ऐसा करने के लिए परमेश्‍वर कहेगा।

मैं तुझे जाति-जाति (गैर-यहूदी) के लिये ज्योति ठहराऊँगा कि मेरा उद्धार पृथ्वी की एक ओर से दूसरी ओर तक फैल जाए (यशायाह 49:6-7)

इस तरह से आप देख सकते हैं ! यह मेरे लिए है और यह आपके लिए है। यह हर एक के लिए है।

पौलुस का उदाहरण

सच्चाई तो यह है कि, एक व्यक्ति जिसने निश्चित ही यह नहीं सोचा कि प्रभु यीशु का बलिदान उसके लिए था वह पौलुस था जिसने यीशु के नाम का विरोध किया। परन्तु उसका सामना प्रभु यीशु के साथ हुआ जिसके परिणाम स्वरूप उसने बाद में कुछ इस तरह से लिखा

इसलिये कि परमेश्‍वर ही है, जिसने कहा, “अन्धकार में से ज्योति चमके,” और वही हमारे हृदयों में चमका कि परमेश्‍वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो। (2 कुरिन्थियों 4:6)

पौलुस का प्रभु यीशु के साथ व्यक्तिगत् सामना हुआ जिसके परिणामस्वरूप ज्योति उसके ‘हृदय में चमकने’ लगी।

यीशु की ज्योति को आपके स्वयं के लिए अनुभव करना

इसलिए अन्धकार और पाप से ज्योति बनने के लिए इस ‘उद्धार’ को पाने के लिए क्या करें जिसके बारे में ऋषि यशायाह ने भविष्यद्वाणी की है, जो प्रभु यीशु के पास है, और जिसका अनुभव पौलुस ने किया? पौलुस इस प्रश्न का उत्तर अपने एक अन्य पत्र में देता है जहाँ पर वह ऐसे लिखता है कि

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है (रोमियों 6:23)

ध्यान दें कि वह कैसे कहता है कि यह एक ‘वरदान’ या उपहार है। एक उपहार, अपनी परिभाषा से ही कमाया नहीं जा सकता है। कोई बस केवल आपको यूँ ही एक उपहार दे देता है जिसे आपने कमाया नहीं है जिसके लिए आपने अच्छे कर्मों को नहीं किया

है। परन्तु यह उपहार तब तक आपको कोई लाभ नहीं देगा, जब तक यह आपकी अपनी सम्पत्ति, आपके द्वारा ‘प्राप्त’ कर लिए जाने के द्वारा नहीं बन जाता। इसलिए ही यूहन्ना, जिसका उद्धरण मैंने आरम्भ में किया है ऐसे लिखता है कि

परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं (यूहन्ना 1:12)

इसलिए आपको केवल बस इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आप इसे उससे माँगने के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं जो कि आपको मुफ्त में दिया जाता है । क्योंकि वह जीवित है इसलिए आप उससे माँग सकते हैं। हाँ, वह आपके पापों के लिए बलिदान हुआ, परन्तु तीन दिनों के पश्चात् वापस जीवित हो गया, ठीक वैसे ही जैसे ऋषि यशायाह ने हज़ारों वर्षों पहले भविष्यद्वाणी कर दी थी जब उसने दु:ख उठाने वाले सेवक के बारे में लिखा था

वह अपने प्राणों का दु:ख उठाकर उसे देखेगा और तृप्त होगा; अपने ज्ञान के द्वारा मेरा धर्मी दास बहुतेरों को धर्मी ठहराएगा, और उनके अधर्म के कामों का बोझ आप उठा लेगा (यशायाह 53:11)

इस तरह से प्रभु यीशु जीवित है और आपकी प्रार्थना को उस समय सुन सकता है जब वह आप इसे उससे करते हैं। आप प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना को उससे कर सकते हैं और वह आपकी सुनेगा और बचा लेगा क्योंकि उसने अपने बलिदान को आपके लिए दे दिया है और अब उसके पास सभी तरह का अधिकार है। यहाँ एक बार फिर से वह प्रार्थना दी गई है जिसे आप उससे कर सकते हैं।

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

आपका अन्य लेखों को भी यहाँ से पढ़ने के लिए स्वागत है। ये मानवीय इतिहास से आरम्भ होते हैं और संस्कृति और इब्रानी वेदों में दी हुई अन्धकार से हमें बचाने की और ज्योति में ले आने की परमेश्‍वर की इस योजना को मात्र एक उपहार के रूप में दिखाते हैं। जैसे जैसे मुझे समय मिलता है मैं और भी अन्य लेखों को इनमें जोड़ता चला जाऊँगा । यदि आपके पास कोई प्रश्न है तो आपका मुझसे सम्पर्क करने के लिए स्वागत है।

इस दिवाली पर, जब आप मोमबत्तियों को जलाते हैं और उपहारों को एक दूसरे को देते हैं, मेरी प्रार्थना है कि आप आन्तरिक ज्योति अर्थात् प्रकाश के उपहार का अनुभव प्रभु यीशु की ओर से करें जैसे पौलुस ने अनुभव किया था और कई वर्षों पहले परिवर्तित हो गया था और जिसका देने के लिए आपको भी प्रस्ताव दिया गया है । दिवाली मुबारक हो!

कुम्भ मेला महोत्सव: पाप का बुरा समाचार और हमारी शुद्धता की आवश्यकता को दिखा रहा है

मानवीय इतिहास में जनसमूह का एक सबसे बड़ा रूप में इकट्ठा होना इस वर्ष 2013 में घटित हुआ– कुम्भ मेले का त्योहार 12 वर्षों में केवल एक ही बार मनाया जाता है। चौंका देने वाली सँख्या में 10 करोड़ लोग 55 दिनों के त्योहार को मनाने के लिए गंगा नदी के किनारों पर इलाहाबाद शहर में पहुँच गए, जिसमें से 1 करोड़ ने तो गंगा में त्योहार के आरम्भ होने केपहले ही दिन स्नान कर लिया था।

लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु
लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु

एन. डी टी. वी. के अनुसार, आयोजकों ने फरवरी 15 को स्नान के अन्तिम दिन में 2 करोड़ लोगों के द्वारा स्नान किए जाने का अनुमान लगाया था । मैं इलाहाबाद आया हूँ और मैं यह कल्पना नहीं कर सकता हूँ कि कैसे इतने सारे लोग लाखों की सँख्या में एक दम से बिना किसी कार्यों को रोकते हुए वहाँ पर एकत्र हो सकते हैं। बी. बी. सी ने रिपोर्ट दी कि इन लोगों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चिकित्सकों और शौचालयों जैसी वस्तुओं को इकट्ठा करने के लिए भारी प्रयासों को किया गया था। कुम्भ मेले में लोगों की इतनी अधिक सँख्या ने सालाना मक्का के लिए हज को जाने वाले तीर्थ यात्रियों की सँख्या जैसे कि मुसलमानों की कुल सँख्या – 2012 में केवल 31 लाख थी, को ठिगना सा कर दिया।

इस कारण क्यों 10 करोड़ लोगों को 120 अरब रूपये गंगा नदी में स्नान करने के लिए खर्च करने पड़े? नेपाल से आने वाले एक श्रद्धालु ने बी. बी. सी को ऐसा बताया कि

“कि मैंने अपने पापों को धो लिया है।”

रायटर्स समाचार एजेंसी रिपोर्ट देती है कि,

77 वर्षीय घुमक्कड़ तपस्वी स्वामी शंकरानन्द सरस्वती, जो ठण्ड में खड़ा नंगा काँप रहा था, ने ऐसे कहा कि,”मैंने इस और पहले के जीवन के अपने सारे पापों को धो लिया है,”

एन. डी टी. वी. हमें बताता है कि

भक्तगण, जो यह विश्वास करते हैं कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से उनके पाप शुद्ध हो जाते हैं,

पिछले वर्ष 2001 के त्योहार में मैंने बी. बी. सी. के द्वारा तब के लिए हुए साक्षात्कार पर ध्यान दिया था कि तीर्थ यात्री मोहन शर्मा ने ऐसे बताया था कि “जिन पापों को हमने उत्पन्न किया है वह यहाँ पर धुल जाते हैं।”

पाप की विश्वव्यापी भावना

दूसरे शब्दों में, लाखों की सँख्या में लोग धन को खर्च करेंगे, भीड़ से भरी हुई ट्रेनों में यात्रा करेंगे, भीड़भाड़ से भरी हुई परिस्थितियों का सामना करेंगे और अपने पापों के ‘धुल जाने के लिए’ गंगा नदी में जाकर स्नान करेंगे । इससे पहले कि हम यह देखें कि यह श्रद्धालु क्या कर रहे हैं, आइए हम उस समस्या पर ध्यान दें जो कि उन्होंने स्वयं ही अपने जीवन में पहचान की है जो कि – पाप है।

श्री सत्य साईं बाबा और सही और गलत

आइए इसका अध्ययन हिन्दी गुरू श्री सत्य साईं बाबा के उपदेशों को देखते हुए, जिसकी सोच मैं सोचता हूँ कि सराहनीय हैं। मैं इन्हें नीचे लिख देता हूँ। जब आप इन्हें पढ़ते हैं तो स्वयं से पूछें, “कि क्या ऐसे नैतिक उपदेश हैं जिनके सहारे जीवन यापन किया जा सकता है? क्या मुझे इनके अनुसार जीवन यापन करना चाहिए?”

“और धर्म क्या है (हमारा नैतिक कर्तव्य)? जो कुछ आप उपदेश देते हैं उसे अभ्यास में लाना, जो कुछ आप कहते हैं उसे वैसे ही करना जैसे कहा जा रहा है, उपदेश को मानते हुए और इसे अभ्यास में लाते हुए । भले कर्मों को कमाना, धर्म की लालसा करना; परमेश्वर के भय में जीवन यापन करना, परमेश्वर तक पहुँचने के लिए जीवन यापन करना: यही धर्म है”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 339.

“वास्तव में आपका कर्तव्य क्या है?….

  • सबसे पहले अपने माता पिता की प्रेम और आदर और कृतज्ञता के साथ सेवा करनी ।
  • दूसरा, सत्य बोलना और भले कर्मों में व्यवहार करना ।
  • तीसरा, जब कभी आपके पास कुछ समय बचे, तब प्रभु के न को वह जिस भी रूप में आपके मन में है, दुहराते रहना ।
  • चौथा, दूसरे के बारे में बुरा बोलने में लिप्त न होना या दूसरों की कमजोरियों की खोज करने का प्रयास नहीं करना।
  • और अन्त में, किसी भी रूप में अन्यों को दु:ख नहीं पहुँचाना”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 348-349.

“जो कोई अपने अंहकार को अपने अधीन कर लेता है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं पर जय प्राप्त कर लेता है, अपनी वहशी भावनाओं और आवेगों को नष्ट कर देता है, और अपने शरीर को प्रेम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का दमन करता है, वह निश्चित ही धर्म के पथ पर अग्रसर है” धर्म वाहिनी, पृ. 4

जब मैंने इसे पढ़ा तो पाया कि ये वे उपदेश हैं जिनके अनुसार मुझे जीवन यापन – केवल एक साधारण नैतिक कर्तव्य के रूप में करना चाहिए । परन्तु क्या आप वास्तव में इनके ऊपर जीवन यापन कर रहे हैं? क्या आपने (और मैंने) कभी इनके प्रति सोचा है? उस समय क्या होगा यदि इन उपदेशों को पालन करने में चूक जाएँ और इनके अनुसार जीवन यापन न कर पाएँ । सत्य साईं बाबा इस प्रश्न का उत्तर निम्न तरीके से उपदेश देते हुए जारी रखते हैं कि

“सामान्य रूप में, मैं मीठा बोलता हूँ, परन्तु अनुशासन के विषय में, मैं किसी भी तरह की कोई रियायत देना स्वीकार नहीं करूँगा…मैं कठोर अनुशासन के ऊपर जोर दूँगा। मैं किसी भी तरह से आपके स्तर के अनुरूप कठोरता को कम नहीं करूँगा,” सत्य साईं बोलते हैं 2, पृ. 186.

कठोरता का स्तर ठीक है – यदि आप सदैव शर्तों को पूरा करते हैं । परन्तु यदि आप इसे पूरी नहीं करते हैं? तब यही वह स्थान है जहाँ पर तब “पाप” की अवधारणा आ जाती है। जब मैं नैतिक लक्ष्य को पूरा करने से चूक जाता हूँ, या जिसे मैं जानता हूँ कि इसे पूरा करना चाहिए, को पूरा करने में असफल हो जाता हूँ तब मैं पाप करता हूँ और मैं एक पापी हूँ । कभी भी यह सुनना पसन्द नहीं करेगा कि वह एक ‘पापी’ है – यह कुछ ऐसी बात है जो आपको असहज और दोषी ठहराती है, और सच्चाई तो यह है कि हम बहुत अधिक मानसिक और भावनात्मक उर्जा को इन विचारों को युक्तिसंगत तरीके से हटा देने के प्रयास में खर्च कर देते हैं। कदाचित् हम सत्य साईं बाबा के अलावा किसी अन्य शिक्षक की ओर देखने लगते हैं, परन्तु यदि वह एक ‘अच्छा’ शिक्षक है, तो उसके नैतिक उपदेश बहुत अधिक वैसे ही – पालन करने के लिए कठोरता से भरे हुए होंगे।

बाइबल (वेद पुस्तक) कहती है कि हम सभी पाप के इस भाव को महसूस करते हैं, चाहे हम किसी भी धर्म के क्यों न हो या हमारी शिक्षा का स्तर कैसे भी क्यों न हो क्योंकि पाप का यह भाव हमारे विवेक से आता है। वेद पुस्तक इसे इस तरह से व्यक्त करती है

फिर, जब अन्यजाति लोग (अर्थात् गैर-यहूदी), जिनके पास व्यवस्था नहीं (बाइबल में दी हुई दस आज्ञाएँ), स्वभाव से ही व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उनके पास न होने पर भी वे अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं । वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखाते हैं और उनके विवेक भी गवाही देते हैं, और उनके विचार परस्पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं (रोमियों 2:14-15)।

इस प्रकार लाखों की सँख्या में तीर्थ यात्री उनके अपने पाप को महसूस करते हैं । ठीक उसी प्रकार से जैसे कि वेद पुस्तक (बाइबल) कहती है

सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23)

पाप प्रतासना मंत्र में व्यक्त किया गया है

इसकी धारणा प्रसिद्ध .प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र में व्यक्त की गई है जिसे मैंने नीचे लिखा है

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

सुसमाचार हमारे पापों को धो डालता है

सुसमाचार ठीक उसी विषय को सम्बोधित करता है जिसका समाधान यह समर्पित तीर्थयात्री खोज रहे हैं – कि ‘उनके पाप धो दिए जाए।’ यह उन लोगों को एक ऐसी प्रतिज्ञा देता है जो अपने ‘वस्त्रों’ (अर्थात् उनके अपने नैतिक कार्यों) को धो लेते हैं । इसकी आशीष स्वर्ग (‘उस शहर’) की एक अमरता (जीवन का वृक्ष) से है।

“धन्य हैं वे, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे।” (प्रकाशितवाक्य 22:14)।

कुम्भ के मेले का त्योहार हमें हमारे पाप की वास्तविकता के ‘बुरे समाचार’ को दिखाता है, और यह इस प्रकार हमें हमारी शुद्धता को पाने के लिए जागरूक करना चाहिए। भले ही इसमें केवल एक सदूर संभावना ही दिखाई देती हो कि सुसमाचार की यह प्रतिज्ञा एक सत्य है, क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह निश्चित ही अधिक गहन रूप में जाँच किए जाने के लिए लाभप्रद है।

यदि आप अनन्त जीवन को पाने के लिए रूचि रखते हैं, यदि आप पाप से स्वतन्त्रता पाने की इच्छा रखते हैं तब इन बातों का अध्ययन करके देखना अधिक बुद्धिमानी होगा कि प्रजापति (या यहोवा) के बारे में क्या प्रगट किया गया है और कैसे और क्यों उसने हमारे लिए स्वयं के बलिदान को दे दिया ताकि हम स्वर्ग को प्राप्त करें। और वेद हमें असमंजस में ही छोड़ नहीं देते हैं। ऋग्वेद पुरूषासूक्ता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान दिए जाने का वर्णन करता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को जानने के लिए क्लिक (करें) जो जिस तरह से बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) और आपके लिए मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेने के लिए बलिदान का वर्णन करती है वैसे ही पुरूष का विवरण देता है।