शाखा : के नाम की घोषणा इसके आगमन से हजारों वर्षों पहले कर दी गई थी

यशायाह ने आने वाली शाखा  के बारे में सबसे पहले लिखा था। दाऊद के खत्म हो चुके राजवंश में एक आने वाले ‘पुरूष’ के पास बुद्धि और सामर्थ्य होगी। यिर्मयाह ने इसके आगे कहा कि इस शाखा  को यहोवा – के नाम से जाना जाएगा जो कि सृष्टिकर्ता के लिए यहूदियों के द्वारा उपयोग किया जाने वाला नाम और यही हमारी धार्मिकता होगा।

जकर्याह शाखा  के विषय को आगे बढ़ाता है

जकर्याह मन्दिर के पुनर्निर्माण के लिए बेबीलोन की बन्धुवाई में से वापस लौटा था
जकर्याह मन्दिर के पुनर्निर्माण के लिए बेबीलोन की बन्धुवाई में से वापस लौटा था

ऋषि – भविष्यद्वक्ता जकर्याह 520 ईसा पूर्व में रहा, वह तब रहता था, जब यहूदी उनकी प्रथम बन्धुवाई में से यरूशलेम की ओर वापस लौटने लगे थे। उनके वापस लौटने पर, यहूदी लोगों ने उनके नष्ट कर दिए गए मन्दिर को पुनर्निर्माण को आरम्भ किया। उस का महायाजक यहोशू  था, और वह मन्दिर में याजकीय सेवकाई का पुन: आरम्भ कर रहा था। ऋषि – भविष्यद्वक्ता जकर्याह, ने अपने साथी यहोशू, महायाजक के साथ मिलकर, यहूदी लोगों को वापस लौटने में अगुवाई प्रदान की थी। इस यहोशू के बारे में जो कुछ – जकर्याह – के द्वारा कहा गया है, वह यहाँ नीचे दिया गया है:

“हे यहोशू महायाजक, तू सुन ले, और तेरे भाईबन्धु जो तेरे सामने खड़े हैं, वे भी सुनें, क्योंकि वे मनुष्य शुभ शकुन हैं : सुनो, मैं अपने दासशाख को प्रगट करूँगा।”…,सेनाओं के यहोवा की वाणी है, “देख, मैं उस पत्थर को खोद देता हूँ, और इस देश के अधर्म को एक ही दिन में दूर कर दूँगा।” (यिर्मयाह 3:8-9)

शाख! 200 वर्षों पहले यशायाह के द्वारा आरम्भ की गई, यिर्मयाह के द्वारा 60 वर्षों पहले तक आगे वृद्धि करता हुए विषय, जकर्याह के द्वारा इसे और आगे ‘शाख’ के रूप में ही विस्तारित किया गया है, यद्यपि, इस राजवंश को समाप्त कर दिया गया था। एक बरगद के वृक्ष की तरह, यह शाखा इसकी एक मृत ठूँठ से पुनः जीवित हो उठते हुए आगे बढ़ती है। इस शाखा  को अब ‘मेरा सेवक’ – परमेश्‍वर का सेवक कह कर पुकारा गया है। किसी तरह से 520 ईसा पूर्व में यरूशलेम में रहने वाला जकर्याह का सहकर्मी यहोशू  महायाजक, आने वाली शाखा  का प्रतीक था। परन्तु कैसे? इसमें कहा गया है कि ‘एक ही दिन’ में परमेश्‍वर के द्वारा अधर्म को दूर कर दिया जाएगा। यह कैसे घटित हो जाएगा?      

शाखा : याजक और राजा को एक करती हुई

जकर्याह इसे कुछ समय पश्चात् वर्णित करता है। इसे समझने के लिए हमें याजक और राजा की भूमिकाओं को समझने की आवश्यकता है, जो कि पुराने नियम में बड़ी कठोरता के साथ एक दूसरे से पृथक थे। कोई भी राजा याजक नहीं हो सकता था और कोई भी याजक राजा नहीं बन सकता था। याजक की भूमिका परमेश्‍वर और मनुष्य के मध्य में पापों के प्रायश्चित के लिए भेंट में अर्पित किए जाने वाले बलिदानों के मध्य में मध्यस्थता का कार्य करना था, और राजाओं का उत्तरदायित्व अपने सिंहासन से धार्मिकता के साथ राज्य करना था। दोनों ही महत्वपूर्ण थे; परन्तु दोनों ही एक दूसरे से भिन्न थे। तथापि, जकर्याह ने लिखा कि भविष्य में:

 ‘यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा: “…सोना-चाँदी ले, और मुकुट बनाकर उन्हें यहोसादोक के पुत्र यहोशू महायाजक के सिर पर रख; और उससे यह कह, ‘सेनाओं का यहोवा यों कहता है, ‘उस पुरूष को देख जिस का नाम शाख है, वह अपने ही स्थान में उगकर यहोवा के मन्दिर को बनाएगा…और अपने सिंहासन पर विराजमान होकर प्रभुता करेगा। उसके सिंहासन के पास एक याजक भी रहेगा और दोनों के बीच मेल की सम्मति होगी” (जकर्याह 6:9-13)

यहाँ पर, पूर्व उदाहरण के विरूद्ध, जकर्याह के दिनों में (यहोशू) महायाजक के सिर पर शाखा को चिन्ह स्वरूप राजा के मुकुट के रूप में धारण करना था। (स्मरण रखें कि यहोशू ‘आने वाली बातों का प्रतीकात्मक’ था)। महायाजक, यहोशू एक राजकीय मुकुट को एक ही व्यक्ति में राजा और याजक को एकीकृत करते हुए धारण कर रहा था – जो कि याजक का सिंहासन के ऊपर विराजमान होना था। इसके अतिरिक्त, जकर्याह ने लिखा कि ‘यहोशू’ ही उस शाखा  का नाम था। इसका क्या अर्थ है?

‘यहोशू’ और ‘यीशु’ नाम  

इसे समझने के लिए हमें पुराने नियम के अनुवाद के इतिहास की समीक्षा करने की आवश्यकता है। इब्रानी भाषा का मूल पुराने नियम 250 ईसा पूर्व में यूनानी भाषा में अनुवादित हुआ था, जिसे हम सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद के नाम से जानते हैं। अभी भी यह व्यापक रूप से उपयोग होता है, हमने देखा है कि कैसे ‘मसीह’ ने सबसे पहले सेप्तुआजिन्त का उपयोग किया था और यहाँ पर हम ‘यहोशू’ के लिए उसी विश्लेषण का उपयोग करेंगे

'यहोशू'= 'यीशु' दोनों ही इब्रानी 'यहोशुआ' नाम से निकल कर आए हैं।
‘यहोशू’= ‘यीशु’ दोनों ही इब्रानी ‘यहोशुआ’ नाम से निकल कर आए हैं।

जैसा कि आप चित्र में देख सकते हैं, यहोशू  मूल इब्रानी नाम ‘यहोशुआ’  का अंग्रेजी लिप्यंतरण है। वृत्त-खण्ड # 1 से पता चलता है कि कैसे 520 ईसा पूर्व में जकर्याह ने ‘यहोशू’ को इब्रानी भाषा में लिखा था। यह अंग्रेजी में ‘यहोशू’ के नाम से लिप्यंतरित हुआ है (# 1 => # 3)। इब्रानी भाषा का ‘यहोशुआ’ अंग्रेजी भाषा यहोशू  ही है। जब सेप्तुआजिन्त का अनुवाद 250 ईसा पूर्व में इब्रानी भाषा से यूनानी भाषा में हुआ, तब यहोशुआ को लिप्यंतरण ईसोऊस (#1 => #2) में हुआ था। इब्रानी भाषा का ‘यहोशुआ’  यूनानी में ईसोऊस  ही है। जब यूनानी का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया गया, तब ईसोऊस का लिप्यंतरण ‘ज़ीजस’ अर्थात् यीशु (#2 => #3) में किया गया। यूनानी भाषा का ईसोऊस अंग्रेजी भाषा का यीशु  ही है।

जब इब्रानी में पुकारा जाता था, तब यीशु को यहोशुआ कह कर पुकारा जाता था, परन्तु यूनानी नए नियम में उसके नाम को ‘ईसोऊस’  कह कर लिखा गया है – सटीकता के साथ वैसे ही जैसे यूनानी के सेप्तुआजिन्त ने इस नाम को लिखा था। जब नए नियम को यूनानी से अंग्रेजी भाषा में अनुवादित किया गया (#2 => #3) तब ‘ईसोऊस’ ‘यीशु’ के नाम का एक पहचाना हुआ लिप्यंतरण था। इस तरह से, ‘यीशु’ का नाम = ‘यहोशू’, के साथ एक मध्यवर्ती यूनानी अवस्था में से होते हुए ‘यीशु’ के साथ, और ‘यहोशू’ के साथ इब्रानी भाषा में से सीधे ही निकल कर आता है। दोनों ही नासरत का यीशु और 520 ईसा पूर्व का यहोशू महायाजक एक ही व्यक्ति के नाम हैं, जिन्हें उनकी मूल इब्रानी भाषा में ‘यहोशुआ’  कह कर पुकारा जाता था। यूनानी में दोनों ही को ‘ईसोऊस’  कह कर पुकारा जाता है। यह बरगद = बड़ (लिप्यंतरण) = वट = फिकस बेंगलेंसिस (इसका लैटिन में शास्त्रीय नाम) के सदृश है।

नासरत का यीशु ही शाखा है

अब जकर्याह के द्वारा की हुई भविष्यद्वाणी अर्थ देती है। जिस भविष्यद्वाणी को 520 ईसा पूर्व में किया गया, उसमें आने वाली शाखा का नाम  यीशु होगा, जो सीधे ही नासरत के ‘यीशु’  की ओर संकेत कर रही है।

जकर्याह के अनुसार, यह आने वाला यीशु, राजा और याजक की भूमिकाओं को एकीकृत कर देगा। ऐसा कौन सा कार्य था, जिसे याजकों ने किया था? लोगों का प्रतिनिधित्व करते हुए, वे उनके पापों के लिए परमेश्‍वर के सामने प्रायश्चित के लिए भेंटों में बलिदान चढ़ाते थे। बलिदानों के द्वारा याजक लोगों के पापों को ढक दिया करते थे। इसी तरह से, आने वाली शाखा ‘यीशु’  एक ऐसा बलिदान होने वाला था जिसके द्वारा यहोवा परमेश्‍वर ‘एक ही दिन में लोगों के अधर्म को दूर कर देगा’ – यह वह दिन था, जिस दिन यीशु ने स्वयं को बलिदान के रूप में अर्पित किया था। पापों को हटा दिए जाने के द्वारा, मृत्यु की सामर्थ्य ने हमारे ऊपर से अपने अधिकार को खो दिया।

नासरत का यीशु सुसमाचारों से बाहर भी भली-भाँति पहचान रखता है। यहूदी ताल्मुद, जोसीफुस और इतिहास के अन्य लेखकों ने यीशु के बारे में, चाहे वे शत्रु रहे हों या मित्र, सदैव उसे ‘यीशु’ या ‘मसीह’ के रूप में उद्धृत किया है, इस कारण उसके नाम को सुसमाचारों के द्वारा अविष्कृत नहीं किया गया था।

क्योंकि यिशै और दाऊद उसके पूर्वज हैं, इसलिए, यीशु ‘यिशै की ठूँठ’ में निकल कर आया। यीशु के पास बुद्धि और समझ इस स्तर तक थी, कि जो उसे अन्य सभों से पृथक कर देती है। उनकी चतुराई, शान्ति और अन्तर्दृष्टि दोनों आलोचकों और अनुयायियों को निरन्तर प्रभावित करती है। सुसमाचारों में वर्णित उसके आश्चर्यकर्मों के माध्यम से उनकी सामर्थ्य को नकारा नहीं जा सकता है। कोई भी, उन पर विश्‍वास नहीं करना चुन सकता है; परन्तु, कोई भी, उन्हें अनदेखा नहीं कर सकता। यशायाह ने भविष्यद्वाणी की थी कि असाधारण बुद्धि और सामर्थ्य रखने की गुणवत्ता के साथ यीशु एक दिन इस शाखा  से आएगा।

अब नासरत के यीशु के जीवन के बारे में सोचो। उसने निश्चित रूप से एक राजा होने का दावा किया – वास्तव में वह राजा ही है। यही है मसीह शब्द का अर्थ। परन्तु जो कुछ उसने पृथ्वी पर किया वह वास्तव में याजकीय कार्य था। याजक का कार्य यहूदी लोगों की ओर से स्वीकारयोग्य भेंट के बलिदानों को अर्पित करना था। यीशु की मृत्यु इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि, यह भी परमेश्‍वर के सामने हमारी ओर से अर्पण की हुई एक भेंट थी। उसकी मृत्यु, न केवल यहूदियों को अपितु किसी भी व्यक्ति के पाप और आत्मग्लानि को प्रायश्चित करती है। पृथ्वी के पाप जैसा जकर्याह ने भविष्यद्वाणी की थी, उसके अनुसार एक ही दिन में हटा दिये गए थे – उस दिन जब यीशु मरा और उसने हमारे सारे पापों के दण्ड को चुका दिया। अपनी मृत्यु के द्वारा उसने एक याजक के रूप में सारी शर्तों को पूर्ण कर दिया है, जबकि उसे अधिकत्तर ‘मसीह’ या राजा के नाम से जाना गया था। तत्पश्चात् अपने पुनरुत्थान में, उसने मृत्यु के ऊपर अपनी सामर्थ्य और अधिकार को दिखाया। उसने इन दोनों भूमिकाओं को एकीकृत कर दिया था। शाखा, वही है, जिसे बहुत पहले ही ‘मसीह’, याजकीय-राजा कह कर पुकारा गया था। और इस नाम की भविष्यद्वाणी जकर्याह के द्वारा उसके जन्म से 500 वर्षों पहले कर दी गई थी।

भविष्यद्वाणी आधारित प्रमाण

उसके दिनों में, आज के दिनों की तरह ही, यीशु ने आलोचकों का सामना किया, जिन्होंने उसके अधिकार के ऊपर प्रश्‍न किया था। उसका उत्तर भविष्यद्वक्ताओं की ओर संकेत करता था, जो उससे पहले आए थे, जिन्होंने यह दावा किया था, कि उन्होंने उसके जीवन को पहले ही से देख लिया था। यहाँ पर एक उदाहरण दिया गया है, जिसमें यीशु ने उसके विरोध करने वालों को इस तरह से उत्तर दिया:

… यह वही पवित्रशास्त्र है, जो मेरी गवाही देता है…(यूहन्ना 5:39)

दूसरे शब्दों में, यीशु ने दावा किया कि पुराने नियम में बहुत पहले ही उसके जीवन के बारे में भविष्यद्वाणी कर दी गई थी। क्योंकि मानवीय सहज ज्ञान हजारों वर्षों के भविष्य को पूर्वकथित नहीं बता सकता है, इसलिए, यीशु  ने कहा कि यही वह प्रमाण है जो यह पुष्टि करते हैं कि वह वास्तव में मनुष्य के लिए परमेश्‍वर की योजना के अनुसार आया था। आज भी हमारे लिए इन बातों की पुष्टि के लिए पुराना नियम उपलब्ध है।

अभी तक जो कुछ पुराने नियम के भविष्यद्वक्ताओं ने कहा है, आइए उसे सारांशित करें। यीशु के आगमन का संकेत मानवीय इतिहास के आरम्भ में ही दे दिया गया था। तब अब्राहम ने उस स्थान की भविष्यद्वाणी की कि यीशु का बलिदान कहाँ पर होगा, जबकि फसह ने वर्ष के दिन की भविष्यद्वाणी की। हमने देखा था कि भजन संहिता 2 ऐसा भजन है, जिसमें आने वाले राजा के लिए मसीह नामक पदवी के उपयोग की भविष्यद्वाणी की गई है। यहाँ इस लेख में हमने उसके वंश की रेखा, उसकी याजकीय सेवकाई और उसके नाम की भविष्यद्वाणी को देखा है। क्या आप सोच सकते हैं कि इतिहास में कोई और ऐसा व्यक्ति है, जिसके लिए नासरत के यीशु के लिए पुराने नियम के कई भविष्यद्वक्ताओं की तुलना में इतनी अधिक सूक्ष्मता से भविष्यद्वाणी की गई हैं?

सारांश : जीवन के वृक्ष को सभों के लिए प्रस्तावित किया गया है

यह पहेली की शाखा कैसे और किस बात की भविष्यद्वाणी को पूरा करने के लिए की गई थी, सावित्री और सत्यवान् की कहानी को प्रकाशित करती है। शुद्ध सावित्री की तरह ही, शाखा अपने प्रेमी के लिए मृत्यु का सामना करती है। परन्तु पति के लिए पत्नी के प्रेम की अपेक्षा, इस शाखा के पास सामर्थी बलिदानात्मक प्रेम है, जो उसके लिए आत्मिक पत्नी को प्राप्त करता है, जो उसे सदैव के लिए मृत्यु से बचाए रखेगा।

एक बरगद के पेड़ की तरह एक अमर और निरन्तर बचे रहने वाले वृक्ष का चित्र, बाइबल के अन्तिम अध्याय में भी मिलता है, जहाँ यह एक बार फिर से भविष्य की ओर देखते हुए, अगले ब्रह्माण्ड को चित्रित करता है, जिसमें ‘जीवन के जल की नदी’ बहती है, जहाँ

नदी के इस पार और उस पार जीवन का वृक्ष था; उसमें बारह प्रकार के फल लगते थे, और वह हर महीने फलता था; और उस वृक्ष के पत्तों से जाति-जाति के लोग चंगे होते थे (प्रकाशितवाक्य 22:2)

इस तरह से, सभी जातियों के लोग – जिसमें आप भी सम्मिलित हैं – को दोनों मृत्यु से छुटकारे और जीवन के वृक्ष की समृद्धि – जो कि वास्तव में अमरता पाया हुआ बरगद का वृक्ष है – का अनुभव करने के लिए आमन्त्रित किया गया है। परन्तु पुराने नियम के ऋषि-भविष्यद्वक्ताओं ने हमारे लिए यह भविष्यद्वाणी की है कि इसके लिए सबसे पहले शाखा को “काट दिए” जाने की शर्त निर्धारित है, जिसे हम आगे देखेंगे।

एक दृढ़ बरगद की तरह वट सावित्री में : शाखा का चिन्ह

वट-वृक्ष, बरगद या बड़ का वृक्ष दक्षिण एशियाई आध्यात्मिकता में केन्द्रीय स्थान रखता है और यह भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है। यह यम के साथ जुड़ा है, जो कि मृत्यु का देवता है, इसलिए, इसे अक्सर शमशान भूमि के निकट लगाया जाता है। इसकी पुन: अँकुरित हो जाने की क्षमता के कारण इसके पास लम्बी आयु होती है और यह अमरता का प्रतीक है। एक घटना बरगद के वृक्ष के नीचे ही घटी थी, जिसमें सावित्री ने अपने मृत पति और राजा सत्यवान को जीवन दान दिए जाने के लिए यम से मोल भाव किया था, ताकि उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो सके – वट पूर्णिमा और वट सावित्री के वार्षिक उत्सवों को इसी के लिए स्मरण किया जाता है।

कुछ इसी के जैसा एक वृतान्त बाइबल के पुराने नियम में भी मिलता है। वहाँ पर एक मृत वृक्ष…पुन: जीवन में वापस लौट आते हुए…राजाओं की मृत वंश रेखा से एक नए पुत्र का प्रतिनिधित्व करता है। इस वृतान्त में सबसे बड़ा अन्तर यह है, इसमें एक भविष्य-की-ओर देखते हुए भविष्यद्वाणी दी गई है और इसे सैकड़ों वर्षों से विभिन्न भविष्यद्वक्ताओं (ऋषियों) के द्वारा विकसित किया गया था। यह मिश्रित कहानी किसी  के आगमन की भविष्यद्वाणी कर रही थी। जिस व्यक्ति ने पहली बार इस कहानी को बताया, वह यशायाह (750 ईसा पूर्व) था, जिसके ऊपर और अधिक विस्तार उसके पश्चात् आने वाले ऋषियों-भविष्यद्वक्ताओं ने – मृत वृक्ष से निकलने वाली शाखा  के रूप में किया।

यशायाह और शाखा

यशायाह ऐतिहासिक रूप से पुष्टि किए जाने वाले समय में रहा था, जिसे नीचे दी हुई  समयरेखा में देखा जा सकता है। यह समयरेखा यहूदियों के इतिहास से ली गई है

यशायाह को ऐतिहासिक समयरेखा में दिखाया गया। वह इस्राएल के दाऊदवंशीय राजाओं के समयकाल में रहा था।
यशायाह को ऐतिहासिक समयरेखा में दिखाया गया। वह इस्राएल के दाऊदवंशीय राजाओं के समयकाल में रहा था।

आप देख सकते हैं कि यशायाह की पुस्तक दाऊद के राजकीय वंशकाल (1000-600 ईसा पूर्व) के समय में यरूशलेम के शासन में लिखी गई थी। यशायाह के समय (750 ईसा पूर्व) में यह वंश और यहूदी साम्राज्य भ्रष्ट हो चुके थे। यशायाह ने राजाओं को परमेश्‍वर और मूसा की दस आज्ञाओं की भलाई और भावनाओं की ओर लौट आने का अनुरोध किया। परन्तु यशायाह जानता था कि इस्राएल पश्चाताप नहीं करेगा, और इसलिए उसने पहले से ही देख लिया कि यह राज्य नष्ट कर दिया जाएगा और इसके राजाओं का शासन करना समाप्त हो जाएगा।

उसने इस राजवंश के लिए एक प्रतीक का उपयोग किया, यह एक बड़ बरगद के वृक्ष की तरह चित्रित किया था। यह वृक्ष राजा दाऊद के पिता यिशै के जड़ पर आधारित था। यिशै पर आधारित हो राजाओं का राजवंश दाऊद के साथ आरम्भ हुआ था, और उसके उत्तराधिकारी, राजा सुलैमान के साथ आगे बढ़ा, और यह इसी तरह से एक के पश्चात् दूसरे राजा के आने के द्वारा आगे वृद्धि करता रहा। जैसा कि नीचे दिए हुए चित्र में चित्रित किया गया है, वृक्ष निरन्तर वृद्धि करता गया, जब राजवंश का अगला पुत्र राज्य करने लगा।

यशायाह के द्वारा राजवंश के लिए उपयोग किया हुआ चित्र एक बड़े बरगद के वृक्ष की तरह है, जो अपनी जड़ - यिशै से वृक्ष के तने का विस्तार करती है।
यशायाह के द्वारा राजवंश के लिए उपयोग किया हुआ चित्र एक बड़े बरगद के वृक्ष की तरह है, जो अपनी जड़ – यिशै से वृक्ष के तने का विस्तार करती है।

पहले एक वृक्ष…इसके पश्चात् एक ठूँठ….तत्पश्चात् एक शाखा

यशायाह ने चेतावनी दी थी कि इस वृक्ष को शीघ्र ही काटते हुए, इसे एक मृत ठूँठ के रूप में छोड़ दिया जाएगा। यहाँ पर दिया गया है कि उसने कैसे इस वृक्ष को चित्रित किया जो परिवर्तित होते हुए एक ठूँठ और शाखा की पहेली बन गया :

“तब यिशै के ठूँठ में से एक डाली फूट निकलेगी और उसकी जड़ में से एक शाखा निकलकर फलवन्त होगी। यहोवा आत्मा, बुद्धि और समझ का आत्मा, युक्ति और पराक्रम का आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय का आत्मा — उस पर ठहरा रहेगा।” (यशायाह 11:1-2)

यशायाह ने चेतावनी दी कि राजवंश एक दिन मृत ठूँठ की जैसे हो जाएगा
यशायाह ने चेतावनी दी कि राजवंश एक दिन मृत ठूँठ की जैसे हो जाएगा

इस ‘वृक्ष’ का काट दिया जाना लगभग 600 ईसा पूर्व, यशायाह के 150 वर्षों पश्चात् घटित हुआ, जब बेबीलोन ने यरूशलेम पर विजय प्राप्त करते हुए, इसके लोगों और राजा को बेबीलोन खींचते हुए बन्धुवाई में ले गए (ऊपर दी हुई समयरेखा में लाल रंग वाला समयकाल)। इससे यहूदियों की बन्धुवाई आरम्भ हुई – जिसमें से कुछ भारत में निर्वासित हो गए थे। यिशै राजा दाऊद का पिता था, और इस कारण वह दाऊद वंशीय राजवंश का मूल या ठूँठ था। “यिशै की ठूँठ” इस कारण बिखर गए दाऊद के राजवंश का एक रूपक था। सावित्री और सत्यवान् की कहानी में, एक राजा का मृत पुत्र – सत्यवान् मिलता है। भविष्यद्वाणी में राजाओं के राजवंश की राजकीय रेखा का अन्त एक ठूँठ में जाकर मृत्यु जाएगा और राजवंश स्वयं में ही मर जाएगा।

शाखा: आने वाले “उस” के रूप में एक दाऊद की बुद्धिमानी से है

यिशै के मृत ठूँठ में डाली का फूट निकलना
यिशै के मृत ठूँठ में डाली का फूट निकलना

परन्तु भविष्यद्वाणी ने भविष्य में एक बरगद के वृक्ष के साथ जुड़े हुए चित्र को राजाओं के रूप में काट डाले जाने की तुलना में कहीं दूर आगे  तक देखा। जब बरगद का बीज जीवन आरम्भ करते हैं, तो वे अक्सर अन्य वृक्षों के ठूँठों के ऊपर करते हैं। ठूँठ अँकुरित होने वाले बरगद के वृक्ष का पोषण करता है। परन्तु एक बार जब बरगद के बीजगणन की स्थापना हो जाती है, तब यह पोषित करने वाली ठूँठ कहीं अधिक वृद्धि कर जाता है और कहीं अधिक लम्बी आयु के जीवन को व्यतीत करता है। इस ठूँठ को यशायाह ने पहले से ही एक नए ठूँठ के रूप में इसकी जड़ से अकुँरित होते हुए – एक शाखा से एक बरगद के वृक्ष में परिवर्तित होते हुए देख लिया था। यशायाह ने इस चित्र का उपयोग किया और इसकी भविष्यद्वाणी की थी कि एक दिन भविष्य में एक ठूँठ, जिसे एक शाखा  के रूप में जाना जाएगा, एक मृत ठूँठ में प्रगट हो जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे बरगट की शाखाएँ वृक्ष की शाखाओं में ही फूट निकलती हैं। इस शाखा को “उस” कह कर उद्धृत किया गया है, इस तरह यशायाह एक विशेष व्यक्ति के लिए बात कर रहा है, जो राजवंश के नष्ट कर दिए जाने के पश्चात् दाऊद की राजकीय रेखा में निकल कर आता है। इस व्यक्ति के पास ज्ञान, सामर्थ्य और ऐसी बुद्धि की ऐसी क्षमता होगी कि मानो यह परमेश्‍वर का आत्मा ही इसके ऊपर वास कर रहा होगा।

एक पोषित करने वाली शाखा से बरगद का वृक्ष वृद्धि करता हुआ। शीघ्र ही इसकी और अधिक शाखाएँ और जड़ें फूट निकलेंगी।
एक पोषित करने वाली शाखा से बरगद का वृक्ष वृद्धि करता हुआ। शीघ्र ही इसकी और अधिक शाखाएँ और जड़ें फूट निकलेंगी।

पौराणिक कथाओं में बरगद का वृक्ष कई शताब्दियों तक अमरता का प्रतीक माना जाता रहा है। इसकी कल्पित जड़ें अतिरिक्त शाखाएँ बनाने वाली मिट्टी में वृद्धि करती हैं। यह दीर्घायु का प्रतीक है और इस प्रकार ईश्‍वरीय सृष्टिकर्ता का प्रतिनिधित्व करता है। यशायाह के द्वारा 750 ईसा पूर्व में इस शाखा को देख लिया गया था, जिसमें इसी तरह के ईश्‍वरीय गुण होंगे और यह राजवंशीय “ठूँठ” के लुप्त होने के पश्चात् लम्बी आयु तक जीवित रहेगा।

 

 

 

 

यिर्मयाह और शाखा

ऋषि-भविष्यद्वक्ता यशायाह ने एक मार्ग-सूचक स्तम्भ खड़ा किया था, ताकि लोग भविष्य की प्रगट होती हुई घटनाओं को समझ सकें। परन्तु यह कई चिन्हों में उसके द्वारा दिया हुआ एक चिन्ह था। यिर्मयाह, यशायाह से 150 वर्षों पूर्व, लगभग 600 ईसा पूर्व में, तब रहा जब दाऊद के राजवंश को उसकी आंखों के सामने नष्ट कर दिया गया था, उसने ऐसा लिखा है:

यहोवा की यह भी वाणी है : देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राजा बनकर बुद्धि से राज्य करेगा, और अपने देश में न्याय और धर्म से प्रभुता करेगा। उसके दिनों में यहूदी बचे रहेंगे, और इस्राएली लोग निडर बसे रहेंगे। और यहोवा उसका नाम: यहोवा हमारी धार्मिकता रखेगा।” (यिर्मयाह 23:5-6)

यिर्मयाह ने यशायाह द्वारा प्रदत्त दाऊद वंशीय राजवंश के शाखा  के चित्र को और अधिक विस्तारित किया है। यह शाखा एक राजा भी होगी। परन्तु यह दाऊद वंशीय पहले जैसे राजाओं की तरह नहीं होगी, जिन्हें ठूँठ तक काटा डाला गया था।

शाखा : यहोवा हमारी धार्मिकता

इस शाखा में भिन्नता इसके नाम में देखी जा सकती है। उसके पास परमेश्‍वर का ही नाम (‘यहोवा’ – परमेश्‍वर के लिए यहूदियों द्वारा उपयोग होने वाला नाम) होगा, इस कारण एक बरगद के वृक्ष की तरह इस शाखा को एक अलौकिक चित्र दिया गया है। वह साथ ही ‘हमारी’ (हम मनुष्यों की) धार्मिकता  भी होगा।

जब सावित्री ने यम के साथ अपने पति, सत्यवान् की मृत शरीर के लिए विवाद किया, तब यह उसकी धार्मिकता थी, जिसने उसे मृत्यु (यम) का सामना करने के लिए सामर्थ्य प्रदान की। परन्तु, जैसा कि कुम्भ मेला नामक लेख में ध्यान दिया गया है, हमारी समस्या हमारी भ्रष्टता और पाप है, और इस कारण हमारे पास ‘धार्मिकता’ की कमी है। बाइबल हमें बताती है कि इसलिए हमारे पास मृत्यु का सामना करने के लिए कोई सामर्थ्य नहीं है। सच्चाई तो यह है कि हम इसके विरूद्ध असहाय हैं… जिसके पास मृत्यु की सामर्थ्य है – अर्थात्, शैतान – और उन सभी को जो अपनी मृत्यु के डर से अपने सारे जीवन भर इसकी दासता में जीवन व्यतीत करते हैं, वह स्वतन्त्र कर दे (इब्रानियों 2:14ब-15)

बाइबल में यम को शैतान के रूप में दर्शाया गया है, जिसके पास हमारे ऊपर मृत्यु की सामर्थ्य प्रदान की गई है। सच्चाई तो यह है, कि ठीक वैसे ही जैसे यम सत्यवान् के शरीर के लिए विवाद कर रहा था, बाइबल एक स्थान पर शैतान के द्वारा एक शरीर के ऊपर विवाद करने के वृतान्त को प्रदान उल्लेखित करती है, जब

… प्रधान स्वर्गदूत मीकाईल ने, जब शैतान से मूसा के शव के विषय में वाद विवाद किया, तो उसको बुरा भला कहके दोष लगाने का साहस न किया पर यह कहा, “प्रभु तुझे डाँटे!” (यूहदा 1:9)

इसलिए, जबकि शैतान के पास सावित्री और सत्यवान् की कहानी में यम की तरह मूसा जैसे एक सज्जन भविष्यद्वक्ता के शरीर के ऊपर विवाद करने का अधिकार है, तब तो उसके पास निश्चित रूप से हमारे पाप और भ्रष्टता के कारण हम पर आने वाली मौत – के ऊपर अधिकार है। यहाँ तक कि प्रधान स्वर्गदूत ने यह भी यह स्वीकार किया केवल प्रभु – सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर – के पास ही मृत्यु के विषय में शैतान को डाँटने का अधिकार है। और यहाँ ‘शाखा’ में एक प्रतिज्ञा दी गई है कि भविष्य में प्रभु परमेश्‍वर हम में उसकी ‘धार्मिकता’ को रोपित करेगा, ताकि हम मृत्यु के ऊपर जय को प्राप्त कर सकें। परन्तु कैसे? जकर्याह इसी विषय के ऊपर और अधिक विस्तार करते हुए आगे के वृतान्त को आने वाली शाखा के नाम  की भविष्यद्वाणी को करते हुए पूरा करता है, जो कि सावित्री और सत्यवान् की मृत्यु (यम) के ऊपर जय प्राप्त करती हुई कहानी के समानान्तर है – जिसे हम अगले लेख में देखेंगे।

“राज्यपाल की तरह : यीशु मसीह के नाम में ‘मसीह’ का क्या अर्थ है?”

मैं कई बार लोगों से पूछता हूँ, कि यीशु का अन्तिम नाम क्या था। अक्सर वे उत्तर देते हैं,

“मैं सोचता हूँ, कि उसका अन्तिम नाम ‘मसीह’ था, परन्तु मैं इसके प्रति निश्चित नहीं हूँ।”

तब मैं पूछता हूँ,

“यदि यह सत्य है तो जब यीशु एक लड़का ही था तब क्या यूसुफ मसीह और मरियम मसीह छोटे यीशु मसीह को अपने साथ बाजार ले जाते थे?”

इसे इस तरह  से कहें, उन्होंने जान लिया था, कि यीशु का अन्तिम नाम ‘मसीह’ नहीं था। इस तरह से, अब ‘मसीह’ क्या है? यह कहाँ से आया है? इसका क्या अर्थ है? कइयों के लिए आश्चर्य की बात है, कि ‘मसीह’ एक ऐसी पदवी है, जिसका अर्थ ‘शासक’ या ‘शासन’ से है। यह पदवी उस राज की तरह नहीं है, जैसी कि ब्रिटिश राज में पाई जाती है, जिसने दक्षिण एशिया में कई दशकों तक राज किया था।

भाषान्तरण बनाम लिप्यन्तरण

इसे देखने के लिए, हमें सबसे पहले अनुवाद अर्थात् भाषान्तरण के कुछ सिद्धान्तों को देखना होगा। अनुवादक कभी कभी विशेष रूप से नाम और शीर्षक के लिए, अर्थ की अपेक्षा उसी तरह की ध्वनि  वाले शब्दों को भाषान्तरण के  लिए चुन लेते हैं। इसे लिप्यन्तरण  के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए, कुम्भ मेला हिन्दी के कुम्भ मेला का अंग्रेजी लिप्यन्तरण है। यद्यपि शब्द मेला का अर्थ ‘प्रदर्शनी’ या ‘त्योहार’ से है, परन्तु इसे अक्सर अंग्रेजी में समान ध्वनि वाले शब्द अर्थात् कुम्भ प्रदर्शनी की अपेक्षा कुम्भ मेला के रूप में ही उपयोग कर लिया जाता है। क्योंकि बाइबल के लिए, अनुवादकों को यह निर्णय लेना पड़ता है,  नाम और पदवियाँ सर्वोत्तम रूप से अनुवादित भाषा में भाषान्तरण (अर्थ के द्वारा) या लिप्यन्तरण (ध्वनि के द्वारा) किस के माध्यम उचित अर्थ देंगे। इसके लिए कोई विशेष नियम नहीं है।

सेप्तुआजिन्त

बाइबल सबसे पहले 250 ईसा पूर्व में तब अनुवादित हुई थी, जब इब्रानी पुराने नियम को यूनानी भाषा – उस समय की अन्तरराष्ट्रीय भाषा में भाषान्तरण किया गया था। इस भाषान्तरण को सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद (या LXX) के नाम से जाना जाता है, और यह बहुत ही अधिक प्रभावशाली है। क्योंकि नया नियम यूनानी भाषा में ही लिखा गया था, इसलिए इसमें दिए हुए पुराने नियम के कई उद्धरणों को सेप्तुआजिन्त से ही लिया गया है।

सेप्तुआजिन्त में भाषान्तरण एवं लिप्यन्तरण

नीचे दिया हुआ चित्र इसी प्रक्रिया को दिखाता है और यह कैसे आधुनिक-दिन की बाइबल को प्रभावित करता है

मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह
मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह

मूल इब्रानी पुराना नियम (1500 से लेकर – 400 ई.पू. तक लिखा गया) को चित्र-खण्ड के # 1 में दिखाया गया है। क्योंकि सेप्तुआजिन्त 250 ईसा पूर्व में लिखा गया था इसलिए इब्रानी –> यूनानी भाषान्तर को चित्र-खण्ड #1 से #2 की ओर जाते हुए तीर से दिखाया गया है। नया नियम यूनानी में लिखा गया था ( (50–90 ईस्वी सन्), इसलिए इसका अर्थ यह हुआ कि #2 में दोनों ही अर्थात् पुराना और नया नियम समाहित है। चित्र का निचला आधा हिस्सा (#3) बाइबल का एक आधुनिक भाषा में किया हुआ भाषान्तरण है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पुराने नियम को मूल इब्रानी भाषा (1 -> 3) और नए नियम को यूनानी (2 -> 3) में से भाषान्तरित किया गया है। जैसा कि पहले बताया गया, अनुवादकों को नामों और पदवियों को निर्धारित करना होता है। इसे हरे तीरों के प्रतीक चिन्हों के साथ लिप्यन्तरण और भाषान्तरण के शब्दों के साथ यह दर्शाते हुए दिखाया गया है, कि अनुवादक किसी भी दृष्टिकोण को ले सकता है।

‘मसीह’ की उत्पत्ति

अब हम ऊपर दी हुई प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे, परन्तु इस समय हम हमारे ध्यान को ‘मसीह’ शब्द के ऊपर केन्द्रित करेंगे।

बाइबल में शब्द 'मसीह' कहाँ से आया है?
बाइबल में शब्द ‘मसीह’ कहाँ से आया है?

हम देख सकते हैं, कि मूल इब्रानी पुराने नियम में पदवी ‘מָשִׁיחַ’ (मसीहीयाख़) दी हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अभिषिक्त या प्रतिष्ठित’ व्यक्ति से है जैसे कि एक राजा या शासक इत्यादि। पुराने नियम के समयावधि में इब्रानी राजाओं को राजा बनने से पहले (अनुष्ठानिक रीति से तेल मल कर) अभिषिक्त किया जाता था, इस प्रकार वे अभिषिक्त  या मसीहीयाख़  हो जाते थे। तब वे शासक बन जाते थे, परन्तु उनका शासन परमेश्‍वर के स्वर्गीय शासन की अधीनता में, उसकी व्यवस्था के अनुसार होता था। इस भावार्थ में, पुराने नियम का एक इब्रानी राजा दक्षिण एशिया के भूतपूर्व राज्यपाल के जैसे होता था। राज्यपाल दक्षिण एशिया के ब्रिटिश क्षेत्रों के ऊपर शासन करता था, परन्तु वह ऐसा ब्रिटेन की सरकार की अधीनता में, इसकी व्यवस्था का पालन करते हुए करता है।

पुराने नियम ने एक निश्चित रूप से विशेष मसीहायाख़  के आने की भविष्यद्वाणी (‘निश्चित’ शब्द के साथ) को किया था, जो एक विशेष राजा होगा। जब सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद को 250 ईस्वी सन् में भाषान्तरित किया गया, तब अनुवादको ने यूनानी भाषा में समानार्थ शब्द को क्रिओ  पर आधारित हो, Χριστός (क्रिस्टोस  जैसी ध्वनि वाले) का चुनाव किया, जिसका अर्थ अनुष्ठानिक रूप से तेल मलना होता है। इस तरह से इब्रानी भाषा का शब्द ‘मसीहीयाख़’ का भाषान्तरण अर्थ के द्वारा (न कि ध्वनि के द्वारा लिप्यन्तरण करते हुए) Χριστός (क्रिस्टोस  के उच्चारण) के रूप में यूनानी सेप्तुआजिन्त में किया गया था। नए नियम के लेखक निरन्तर शब्द क्रिस्टोस का उपयोग यीशु की पहचान के लिए करते रहे, जिसकी भविष्यद्वाणी ‘मसीहीयाख़’ के रूप में की गई थी।

परन्तु जब हम यूरोप की भाषाओं की बात करते हैं, तब हम पाते हैं, कि यूनानी शब्द ‘क्रिस्टोस’  के सामानार्थ कोई भी स्पष्ट शब्द नहीं पाया गया इसलिए इसका भाषान्तरण ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह में कर दिया गया। शब्द ‘मसीह’ पुराने नियम पर आधारित इब्रानी से यूनानी में भाषान्तरित  होते हुए और तब यूनानी से आधुनिक भाषाओं में लिप्यन्तरित  होते हुए एक बहुत ही विशेष शब्द है। इब्रानी पुराने नियम का भाषान्तरण सीधे ही कई आधुनिक भाषाओं में किया गया है और अनुवादकों ने मूल इब्रानी शब्द ‘मसीहीयाख़’ के सम्बन्ध में विभिन्न निर्णयों को लिया है। कुछ बाइबल शब्द ‘मसीहीयाख़’ का लिप्यन्तरण ‘मसीह’ शब्द के द्वारा रूपान्तरित करते हुए करती हैं, अन्य इसका अनुवाद ‘अभिषिक्त’ के अर्थ के द्वारा करती हैं, और अन्य उसका लिप्यन्तरण ‘क्राईस्ट’ शब्द के द्वरा रूपान्तरित करते हुए करती हैं। क्राईस्ट या ख्रीस्त (मसीह) के लिए हिन्दी शब्द को अरबी से लिप्यन्तरित किया गया है, जो बदले में मूल इब्रानी भाषा से लिप्यन्तरित हुआ था। इसलिए ‘मसीह’ का उच्चारण मूल इब्रानी भाषा के साथ बहुत निकटता से है, जबकि अन्य शब्द क्राईस्ट का लिप्यन्तरण अंग्रेजी ‘क्राईस्ट’ से हुआ है और इसकी ध्वनि ‘क्राइस्त’ जैसी है। क्राईस्ट (ख्रीष्टको) के लिए नेपाली शब्द का लिप्यन्तरण यूनानी क्रिस्टोस  से हुआ है और इसलिए इसे ख्रीष्टको  शब्द से उच्चारित किया जाता है।

क्योंकि हम पुराने नियम में शब्द ‘मसीह’ को सामान्य रूप से नहीं देखते हैं, इसलिए इसका सम्बन्ध पुराने नियम से सदैव प्रगट नहीं होता है। परन्तु इस अध्ययन से हम जानते हैं, कि बाइबल आधारित ‘क्राईस्ट’ = ‘मसीह’ = ‘अभिषिक्त’ सभी एक ही हैं और यह एक विशेष पदवी थी।

1ली सदी में प्रत्याशित मसीह

इस बोध के साथ, आइए सुसमाचारों से कुछ विचारों को प्राप्त करें। नीचे राजा हेरोदेस की तब की प्रतिक्रिया दी गई है, जब ज्योतिषी यहूदियों के राजा से मुलाकात करने के लिए उसके पास आए, जो कि क्रिसमिस की कहानी का एक बहुत अच्छी तरह से जाना-पहचाना हुआ हिस्सा है। ध्यान दें, मसीह के लिए ‘निश्चित’ वाक्य का उपयोग किया गया है, यद्यपि यह विशेष रूप से यीशु के बारे में उद्धृत नहीं कर रहा है।

यह सुनकर राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया। तब उसने लोगों के सब प्रधान याजकों और शास्त्रियों को इकट्ठा करके उनसे पूछा मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए। (मत्ती 2:3-4)

आप इस निश्चित वाक्य में ‘मसीह’ के विचार को देख सकते हैं, जिसे हेरोदेस और उसके प्रधानों के मध्य में अच्छी तरह से समझ लिया गया था – यहाँ तक कि इससे पहले कि यीशु का जन्म होता – और यह यहाँ पर विशेष रूप से यीशु के लिए उद्धृत हुए बिना उपयोग हुआ है। यह दिखाता है, कि ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह पुराने नियम में से आएगा, जो की 1ली सदी में लोगों के द्वारा (जैसे कि हेरोदेस और उसके प्रधानों के द्वारा) यूनानी के सेप्तुआजिन्त में पाया जाने वाला एक सामान्य पठन् था। ‘क्राईस्ट’  एक नाम नहीं, अपितु पदवी थी (और आज भी है), जो एक शासक या राजा का संकेत देती है। इसलिए ही हेरोदेस ‘परेशान था’ क्योंकि उसने एक और राजा होने की सम्भावना को स्वयं के लिए खतरा महसूस किया। हम इस हास्यास्पद विचार का इन्कार कर सकते हैं, कि ‘मसीह’ मसीही विश्‍वासियों के द्वारा आविष्कृत किया गया था या यह किसी बड़े व्यक्ति जैसे 300 ईस्वी सन् में सम्राट कॉन्सटेनटाईन के द्वारा आविष्कृत किया गया था। यह पदवी हजारों वर्षों पहले से किसी भी मसीही विश्‍वासी के आगमन या कॉन्सटेनटाईन के द्वारा शासन करने से बहुत पहले से ही प्रचलन में थी।

‘मसीह’ सम्बन्धी पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ

पदवी ‘मसीह’ सबसे पहले भजन संहिता में दाऊद के द्वारा 1000 ईसा पूर्व – यीशु के जन्म से बहुत पहले लिखी हुई प्रगट हुई है। आइए इन सबसे पहले प्रगटीकरणों को देखें।

यहोवा और उसके अभिषिक्त के विरूद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं…वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा; प्रभु उनको ठट्ठों में उड़ाएगा…”मैं तो अपने ठहराए हुए राजा को अपने पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा चुका हूँ।” मैं उस वचन का प्रचार करूँगा : जो यहोवा ने मुझ से कहा, “तू मेरा पुत्र है, आज तू मुझ से उत्पन्न आ”…धन्य हैं वे जिनका भरोसा उस पर है। (भजन संहिता 2:2-7)

यहाँ पर यही संदर्भ दिया गया है परन्तु यह यूनानी भाषान्तरण सेप्तुआजिन्त पर आधारित है।

यहोवा और उसके क्राईस्ट के विरूद्ध…पृथ्वी के राजा मिलकर…और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं…वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा; प्रभु उन्हें ठट्ठों में … यह कहते हुए … उड़ाएगा…., (भजन संहिता 2)

अब आप इस संदर्भ में मसीह को 1ली सदी के पाठक की तरह ‘देख’ सकते हैं। भजन संहिता इस आने वाले मसीह के बारे में अधिक संदर्भों को देती चली जाती है। मैं इब्रानी भाषा-आधारित संदर्भ को यूनानी लिप्यन्तरण के आमने-सामने इसमें दिए हुए ‘मसीह’ शब्द के साथ रखता हूँ, ताकि आप इसे देख सकें।

भजन संहिता 132 इब्रानी भाषा से भजन संहिता 132 – यूनानी भाषी सेप्तुआजिन्त से
हे यहोवा,…10अपने दास दाऊद के लिये,
अपने अभिषिक्त की प्रार्थना की अनसुनी न कर। 11यहोवा ने दाऊद से सच्ची शपथ खाई है,
और वह उससे न मुकरेगा:
“मैं तेरी गद्दी पर तेरे एक निज पुत्र को बैठाऊँगा – … 17″यहाँ मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा,
मै ने अपने अभिषिक्त के लिये एक दीपक तैयार कर रखा है। 18मैं उसके शत्रुओं को तो लज्जा का वस्त्र पहिनाऊँगा,
परन्तु उस के सिर पर उसका मुकुट शोभायमान रहेगा।”
हे यहोवा,…10अपने दास दाऊद के लिये,
अपने अभिषिक्त की प्रार्थना की अनसुनी न कर। 11यहोवा ने दाऊद से सच्ची शपथ खाई है,
और वह उससे न मुकरेगा:
“मैं तेरी गद्दी पर तेरे एक निज पुत्र को बैठाऊँगा – … 17″यहाँ मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा,
मैं ने अपने अभिषिक्त के लिये एक दीपक तैयार कर रखा है। 18मैं उसके शत्रुओं को तो लज्जा का वस्त्र पहिनाऊँगा,
परन्तु उस के सिर पर उसका मुकुट शोभायमान रहेगा।”

आप देख सकते हैं, कि भजन संहिता 132 भविष्य वाक्य में बात करती है (“…मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा…”)। यह मसीह के बारे में समझने के लिए अति महत्वपूर्ण है। यह जितना अधिक स्पष्ट हो सकता है, उतना ही है, कि पुराना नियम भविष्य-की-ओर देखते हुए ‘मसीह’ के बारे में भविष्यद्वाणियाँ करता है। हेरोदेस इससे परिचित था। उसे तो मात्र उसके प्रधानों की आवश्यकता इन भविष्यद्वाणियों की विशेषताओं को जानने के लिए थी। यहूदी सदैव से ही उनके मसीह (या क्राईस्ट) की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह सच्चाई कि वे आज भी मसीह के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, का यीशु या नए नियम से कोई लेन देन नहीं है, अपितु इसकी अपेक्षा पुराने नियम के इन भविष्य-की-ओर देखने वाले पूर्व-कथनों और भविष्यद्वाणियों के पूरा होने की ओर देख रहे हैं।

पुराने नियम में भविष्यद्वाणी किया हुआ यह क्राईस्ट (या मसीह या अभिषिक्त) भूतपूर्व ब्रिटिश राज के सम्बन्ध में एक बात में बहुत अधिक उसी तरह का होते हुए महत्वपूर्ण था। जैसा की एक राज्यपाल ने ब्रिट्रिश भारत के कई छोटे छोटे राजाओं के ऊपर शासन किया, जबकि ब्रिटेन की सरकार के अधिकार में रहते हुए, मसीह के लिए भविष्यद्वाणी की गई है, कि वह एक दिन ‘जातियों’ के ऊपर परमेश्‍वर के अधिकार के अधीन रहते हुए राज्य करेगा (भजन संहिता 2:1)।
यदि नासरत का यीशु नए नियम में घोषित यही भविष्यद्वाणी किया हुआ मसीह था, तब तो राज्यपाल और ‘मसीह’ के मध्य में कई महत्वपूर्ण भिन्नताएँ पाई जाती हैं। राज्यपाल सैन्य शक्ति के साथ आया था और उसने बड़ी सामर्थ के द्वारा बाहरी अधीनता को लागू कर दिया था। यीशु बहुत अधिक नम्रता के साथ और सेवक के रूप में आया था, कि उसके समय की हेरोदेस जैसी शक्तियाँ आश्चर्य में पड़ गए थे। यीशु मसीह ने सबसे पहले हमारी पाप और मृत्यु से स्वतंत्रता की आवश्यकता को पूरा किया, और हमें सबसे पहले प्रेम करने के द्वारा वह और यहाँ तक कि आज के दिन भी, हमारी निष्ठा को हमारे आन्तरिक मनों से प्राप्त करना चाहता है। सारी जातियों से स्वयं के निमित्त अपने लोगों को इस तरह से जीत लेने के पश्चात् ही वह अपने बाहरी शासन को स्थापित करेगा। यीशु ने इसे एक बड़े वैवाहिक भोज के निमंत्रण के साथ सम्बन्धित किया है, और बहुत से धनी और शक्ति प्राप्त लोगों के पास इस निमंत्रण को स्वीकार करने से इन्कार करने के लिए बहाने हैं। निर्धन, अपंग, अंधे और लंगड़े इस त्योहार में बड़ी सँख्या में आते हैं (देखें मत्ती 22)। बहुत से धनी, शक्तिशाली और इस जीवन से सम्बन्धित लोग उसके शासन के लाभों को गवाँ देते हैं । इस लिए विचार करने के लिए अति महत्वपूर्ण श्‍व यह है, कि क्या पुराने नियम का मसीह ही यीशु है। दुर्भाग्य से, पुराना नियम ही इसमें हमारी सहायता कर सकता है।

पुराने नियम की भविष्यवाणियाँ : एक ताला-और-कुँजी पद्धति में एक ताले की तरह हैं

क्योंकि पुराना नियम स्पष्टता के साथ भविष्य की भविष्यद्वाणी करता है, यह मानवीय साहित्य के विशाल समुद्र के पार एक बहुत ही छोटे से समूह के रूप में खड़ा हुआ है। यह एक दरवाजे के ताले की तरह । एक ताले को एक निश्चित आकार में निर्मित किया जाता है ताकि इसमें केवल एक निश्चित ‘कुँजी’ ही इसके आकार के अनुरूप कार्य करती हुई इसे खोल दे। इसी तरह से पुराने नियम एक ताले की तरह है। ‘मसीह’ सम्बन्धी स्पष्टीकरण भजन संहिता के केवल इन दो अध्यायों में ही नहीं हैं, जिन्हें हमने ऊपर देखा था, अपितु साथ ही यह अब्राहम के बलिदान, आदम की उत्पत्ति और मूसा के फसह में भी पाए जाते हैं। परन्तु यह पुराने नियम की 800-400 ईसा पूर्व की समयावधि में पाए जाने वाले भविष्यद्वक्ता हैं, जिनके द्वारा आने वाले मसीह के स्पष्टीकरण और भी अधिक स्पष्ट हो जाते हैं, जो हमें इस बात की जांच करने की अनुमति देते हैं, कि क्या यीशु ही वास्तव में भविष्यद्वाणी किया हुआ ‘मसीह’ था या नहीं – जिसका अध्ययन हम अगले लेख में करेंगे।

संसार के चारों ओर और भारत में : यहूदियों का इतिहास

भारतीय समुदाय में मूसा सम्बन्धी तानेबाने के भीतर एक छोटे से समाज को निर्मित करने के द्वारा, हजारों वर्षों से यहाँ रहते हुए, यहूदियों का भारत में एक लम्बा इतिहास है। अन्य अल्पसँख्यक समूहों से भिन्न (जैसे कि जैन, सिक्ख और बौद्ध धर्मावलम्बियों), यहूदी मूल रूप से अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हुए भारत में बाहर से आए थे। 2017 की गर्मियों में भारतीय प्रधान मंत्री मोदी की इस्राएल में की गई ऐतिहासिक यात्रा से ठीक पहले इस्राएल के प्रधानमन्त्री उन्होंने नेतन्याहू के साथ एक संयुक्त सह-लेखन को लिखा। जब उन्होंने निम्न कथन को लिखा तब उन्होंने भारत से यहूदियों के होने वाले देशान्तर गमन को स्वीकार किया है:

भारत में यहूदी समुदाय का सदैव गर्मजोशी और सम्मान के साथ स्वागत किया गया और इसने कभी भी किसी भी तरह के उत्पीड़न का सामना नहीं किया है।

भारत में यहूदी इतिहास

यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था
यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था

यहूदी समुदाय भारत में कितने समय से रह रहा है? द टाइम्स ऑफ इस्राएल समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक लेख को प्रकाशित किया है, जिसमें कहा गया है कि ’27 सदियों ‘के पश्चात् मनश्शे (बेन मनश्शे ) के गोत्र के लोग मिजोरम के भारतीय राज्य से इस्राएल वापस लौट रहे हैं। यह उन्हें उनके पूर्वजों को यहाँ पर मूल रूप से 700 ईसा पूर्व में पहुँचने की पुष्टि करता है। आंध्रा प्रदेश में रहने वाले एप्रैम के यहूदी गोत्र के तेलुगू-भाषी उनके भाई-बहन (बेन एप्रैम) की भी 1000 वर्षों से अधिक समय तक भारत में होने की सामूहिक स्मृति पाई जाती है, जो फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और इसके पश्चात् चीन में से भटकते हुए यहाँ पहुँचे थे। केरल के राज्य में, कोचीन के यहूदी यहाँ पर लगभग 2600 वर्षों से रह रहे हैं। सदियों के बीतने के पश्चात् उन्होंने स्वयं को छोटे परन्तु पूरे भारत में विशेष समुदायों में निर्मित कर लिया था। परन्तु अब वे इस्राएल वापस लौटने के लिए भारत को छोड़ रहे हैं।

कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।
कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।

यहूदी कैसे भारत में रहने के लिए आ गए? वे इतने लम्बे समय के पश्चात् इस्राएल वापस क्यों लौट रहे हैं? हमारे पास उनके इतिहास के बारे में किसी भी अन्य जाति से कहीं अधिक तथ्य पाए जाते हैं। हम इन जानकारियों का उपयोग समय रेखा में उनके इतिहास को सारांशित करते हुए करेंगे।

अब्राहम : यहूदी परिवार के वंश का आरम्भ होना

समय रेखा अब्राहम से आरम्भ होती है। उसे उसके वंश में से जातियों की एक प्रतिज्ञा दी गई थी और उसकी मुठभेड़ परमेश्‍वर को उसके पुत्र इसहाक के प्रतीकात्मक बलिदान के साथ अन्त होती है। यह बलिदान यीशु (यीशु सत्संग) की ओर संकेत करता हुआ एक चिन्ह भविष्य के उस स्थान को चिन्हित करते हुए था जहाँ पर उसका बलिदान होगा। इसहाक के पुत्र का नाम परमेश्‍वर के द्वारा इस्राएल  रखा गया। यह समय रेखा हरे रंग में आगे बढ़ती है जब इस्राएल की सन्तान को मिस्र में दासत्व के बन्धन में आई थी। यह अवधि उस समय आरम्भ होती है, जब इस्राएल का पुत्र यूसुफ (वंशावली यह थी : अब्राहम -> इसहाक -> इस्राएल (जिसे याकूब भी जाना गया था) -> यूसुफ), इस्राएलियों को मिस्र में ले गया, जब वे लोग बाद में दास बन गए।

फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए
फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए

मूसा : परमेश्‍वर की अधीनता में इस्राएल एक राष्ट्र बन गया

मूसा ने इस्राएलियों को फसह की विपत्ति के साथ मिस्र से बाहर निकलने में मार्गदर्शन दिया, जिसने मिस्र को नष्ट कर दिया था और इस्राएलियों को मिस्र में मिस्रियों के हाथों बाहर निकल जाने में सहायता प्रदान की थी। मूसा की मृत्यु से पहले, मूसा ने इस्राएलियों के ऊपर आशीषों और श्रापों की घोषणा की (जब समय रेखा हरे रंग से पीले रंग की ओर जाती है)। उन्हें तब आशीष मिलेगी जब वे परमेश्‍वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हैं, परन्तु यदि वे आज्ञाकारी नहीं रहते तो श्राप का अनुभव करेंगे। ये आशीषें और श्राप इस्राएल के बाद के इतिहास के साथ भी बँधी हुई थीं।

हजारों वर्षों तक इस्राएली अपनी जन्म भूमि के ऊपर रहे परन्तु उनके पास अपना कोई भी राजा नहीं था, न ही यरूशलेम जैसी कोई राजधानी उनके पास थी – यह उस समय अन्य लोगों के पास थी। तथापि, इसमें 1000 ईसा पूर्व राजा दाऊद के आने के पश्चात् परिवर्तन हो गया।

यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना
यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना

दाऊद यरूशलेम में एक शाही राजवंश की स्थापना करता है

दाऊद ने यरूशलेम को जीत लिया और इसे अपनी राजधानी बना लिया। उसने ‘मसीह’ के आगमन की प्रतिज्ञा को प्राप्त किया और उस समय से यहूदी लोग मसीह के आगमन के लिए प्रतीक्षारत् हैं। उसके पुत्र सुलैमान, बिना किसी सन्तुष्टि के परन्तु धनी और प्रसिद्ध, उसका उत्तराधिकारी हुआ और सुलैमान ने यहूदियों के पहले मन्दिर को यरूशलेम में मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर निर्मित किया। राजा दाऊद के वंशज् निरन्तर लगभग 400 वर्षों तक राज्य करते रहे और इस अवधि को हल्के-नीले रंग (1000 – 600 ईसा पूर्व) से दर्शाया गया है। यह अवधि इस्राएल की उन्नति का समय था – उनके पास प्रतिज्ञा की हुई आशीषें थीं। वे एक शक्तिशाली जाति थे; उनके समाज, संस्कृति और उनका मन्दिर उन्नत था। परन्तु पुराना नियम साथ ही उनमें बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार और इस समय होने वाली मूर्ति पूजा का भी विवरण देता है। इस अवधि में बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने इस्राएलियों को चेतावनी दी कि यदि वे मन परिवर्तन नहीं करते, तो उनके ऊपर मूसा के श्राप आप पड़ेंगे। इन चेतावनियों को अनदेखा कर दिया गया। इस समय के मध्य में इस्राएली दो पृथक राज्यों : इस्राएल और एप्रैम का उत्तरी राज्य और यहूदा के दक्षिण राज्य में विभाजित हो गए (जैसे कि आज के समय कोरिया है, एक ही लोग दो देशों में विभाजित हो गए हैं – उत्तरी ओर दक्षिण कोरिया)।

यहूदियों की पहली बन्धुवाई : अश्शूर और बेबीलोन

अन्त में, दो चरणों में श्राप उनके ऊपर आ पड़ा। अश्शूर ने एप्रैम के उत्तरी राज्य को 722 ईसा पूर्व में नष्ट कर दिया और इसमें रहने वाले इस्राएलियों को बड़े पैमाने पर अपने विस्तृत साम्राज्य में भेज दिया गया। मिजोरम के बेन मनश्शे और आन्ध्रा प्रदेश के बेन एप्रैम इन्हीं निर्वासित किए हुए इस्राएलियों के वंशज् हैं। तब 586 ईसा पूर्व में नबूकदनेस्सर, बेबीलोन का एक शक्तिशाली राजा आया – ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने 900 वर्षों पहले भविष्यद्वाणी की थी, जब उसने अपने इन श्रापों को लिखा था:

यहोवा तेरे विरूद्ध दूर से, वरन् पृथ्वी के छोर से वेग से उड़नेवाले उकाब सी एक जाति को चढ़ा लाएगा जिसकी भाषा तू नहीं समझेगा; उस जाति के लोगों का व्यवहार क्रूर होगा, वे न तो बूढ़ों का मुँह देखकर आदर करेंगे, और न बालकों पर दया करेंगे; और वे तेरे पशुओं के बच्चे और भूमि की उपज यहाँ तक खा जाएँगे कि तू नष्ट हो जाएगा; और वे तेरे लिये न अन्न, और न नया दाखमधु, और न टटका तेल, और न बछड़े, न मेम्ने छोड़ेंगे, यहाँ तक कि तू नष्ट हो जाएगा। और वे तेरे परमेश्वर यहोवा के दिये हुए सारे देश के सब फाटकों के भीतर तुझे घेर रखेंगे; वे तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे उस समय तक घेरेंगे, जब तक तेरे सारे देश में तेरी ऊँची ऊँची और दृढ़ शहरपनाहें जिन पर तू भरोसा करेगा गिर न जाएँ।  (व्यवस्थाविवरण 28:49-52)

नबूकदनेस्सर ने यरूशलेम को जीत लिया, इसे जला दिया और इसके उस मन्दिर को नष्ट कर दिया जिसे सुलैमान ने निर्मित किया। उसने तब इस्राएलियों को बेबीलोन में बन्धुवा बना लिया। इसने मूसा के इस भविष्यद्वाणी को पूरा कर दिया कि

और जैसे अब यहोवा को तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता है, वैसे ही तब उसको तुम्हारा नाश वरन् सत्यानाश करने से हर्ष होगा; और जिस भूमि के अधिकारी होने को तुम जा रहे हो उस पर से तुम उखाड़े जाओगे। और यहोवा तुझ को पृथ्वी के इस छोर से लेकर उस छोर तक के सब देशों के लोगों में तित्तर बित्तर करेगा; और वहाँ रहकर तू अपने और अपने पुरखाओं के अनजान काठ और पत्थर के दूसरे देवताओं की उपासना करेगा।  (व्यवस्थाविवरण 28:63-64)

जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया
जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया

केरल के कोचीन के यहूदी बन्धुवाई में रहने वाले इन्हीं इस्राएलियों के वंशज् हैं। क्योंकि 70 वर्षों से, इस अवधि को लाल रंग से दिखाया गया है, ये इस्राएलियों (या यहूदी जैसा कि अब इन्हें पुकारा जाता है) निर्वासन में अब्राहम और उसके वंशज् को प्रतिज्ञा की हुई भूमि से दूर रह रहे थे।

फारसियों की अधीनता में बन्धुवाई से वापस लौटना

इसके पश्चात्, फारसी सम्राट कुस्रू ने बेबीलोन को जीत लिया और कुस्रू संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसने यहूदियों को उनकी भूमि के ऊपर वापस लौटने की अनुमति प्रदान की।

उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है

तथापि वे अब और अधिक आगे को एक स्वतंत्र देश नहीं थे, वे अब फारसी साम्राज्य के एक प्रान्त के रूप में थे। ऐसी स्थिति लगभग 200 वर्षों तक बनी रही और इसे समय रेखा में गुलाबी रंग से दिखाया गया है। इस समय में यहूदियों का मन्दिर (जिसे 2रे मन्दिर के रूप में जाना जाता है) और यरूशलेम के मन्दिर को पुनः निर्मित किया गया। यद्यपि यहूदियों को इस्राएल में वापस लौटने की अनुमति प्रदान कर दी गई, तथापि, उन में से बहुत से बन्धुवाई में ही रह गए।

यूनानियों का समयकाल

सिकन्दर महान् ने फारसी साम्राज्य को जीत लिया और इस्राएल को आगे के लगभग 200 वर्षों के लिए यूनानी साम्राज्य का एक प्रान्त बना दिया। इसे गहरे नीले रंग से दिखाया गया है।

उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है

रोमियों का समयकाल

इसके पश्चात् रोमियों ने यूनानी साम्राज्य को पराजित कर दिया और वे प्रमुख विश्‍व शक्ति बन गए। इस साम्राज्य में यहूदी एक बार फिर से एक प्रान्त बन गए और इसे हल्के पीले रंग से दिखाया गया है। यह वह समय था जब यीशु इस पृथ्वी पर रहा। यह विवरण देता है, कि क्यों सुसमाचारों में रोमी सैनिक पाए जाते हैं  – क्योंकि रोमियों के द्वारा इस्राएलियों की भूमि पर रहने वाले यहूदियों के ऊपर यीशु के समय में शासन किया जाता था।

उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है

रोमियों की अधीनता में यहूदियों का दूसरी बार निर्वासित होना

बेबीलोनियों के समय लेकर (586 ईसा पूर्व) यहूदी कभी उस तरह से स्वतंत्र नहीं रहे जिस तरह से वे राजा दाऊद की अधीनता में थे। वे एक के बाद दूसरे साम्राज्य के अधीन शासित हुए, ठीक वैसे ही जैसा कि भारत के ऊपर बिट्रेन का शासन रहा है। यहूदियों को इसके प्रति बुरा लगा और उन्होंने रोमी शासन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। रोमी आए और उन्होंने यरूशेलम को (70 ईस्वी सन्) में नष्ट कर दिया, इसके 2रे मन्दिर को जला दिया गया और यहूदियों को रोमी साम्राज्य में दासों के रूप में निर्वासित कर दिया गया। यह यहूदियों का दूसरी  बार बन्धुवाई में जाना हुआ था। क्योंकि रोम बहुत बड़ा था, परिणामस्वरूप यहूदी अन्त में पूरे संसार में ही बिखर गए।

यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।
यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।

और इस तरह से यहूदी लोग अतीत के लगभग 2000 वर्षों रहे हैं: विदेशी भूमि पर बिखरे हुए और उन्हें कभी भी इस भूमि पर स्वीकार नहीं किया गया। इन विभिन्न देशों में उन्होंने निरन्तर बड़े सतावों से दु:ख उठाया है। यहूदियों के ऊपर आया हुआ सताव यूरोप के संदर्भ में विशेष रूप से सच्चा है। पश्चिमी यूरोप में, स्पेन से लेकर रूस तक यहूदियों को इन देशों में अक्सर खतरनाक परिस्थितियों में रहना पड़ा है। इन सतावों से बचने के लिए यहूदी निरन्तर कोचीन में पहुँचते रहे। 17वीं व 18वीं सदी में भारत के अन्य भागों में मध्य पूर्वी देशों से यहूदियों का आगमन हुआ और उन्हें बगदादी यहूदी के रूप में पहचाना गया, जो मुख्य रूप से मुम्बई, दिल्ली और कोलकाता में बस गए थे। 1500 ईसा पूर्व मूसा के द्वारा दिए हुए श्राप उनके विवरणों के अनुरूप है, कि कैसे उन्होंने जीवन को यापन किया था।

 डेविड सासोन और उसके पुत्र - भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी
डेविड सासोन और उसके पुत्र – भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी

और उन जातियों में तू कभी चैन न पाएगा, और न तेरे पाँव को ठिकाना मिलेगा; क्योंकि वहाँ यहोवा ऐसा करेगा कि तेरा हृदय काँपता रहेगा, और तेरी आँखे धुँधली पड़ जाएँगी, और तेरा मन व्याकुल रहेगा (व्यवस्थाविवरण 28:65)

इस्राएलियों के विरूद्ध दिए हुए श्राप लोगों को यह पूछने के लिए दिए गए थे :

और सब जातियों के लोग पूछेंगे: “यहोवा ने इस देश से ऐसा क्यों किया? और इस बड़े कोप के भड़कने का क्या कारण है? (व्यवस्थाविवरण 29:24)

और इसका उत्तर यह था :

तब लोग यह उत्तर देंगे, “उनके पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने जो वाचा उनके साथ मिस्र देश से निकालने के समय बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ा है। और पराए देवताओं की उपासना की है जिन्हें वे पहिले नहीं जानते थे, और यहोवा ने उनको नहीं दिया था; इसलिये यहोवा का कोप इस देश पर भड़क उठा है, कि पुस्तक मे लिखे हुए सब शाप इस पर आ पडें; और यहोवा ने कोप, और जलजलाहट, और बड़ा ही क्रोध करके उन्हें उनके देश में से उखाड़कर दूसरे देश में फेंक दिया, जैसा कि आज प्रगट है।” (व्यवस्थाविवरण 29:25-28)

नीचे दी हुई समय रेखा इस 1900 वर्षों की अवधि को दर्शाती है। इस अवधि को लाल रंग की मोटी रेखा से दर्शाया गया है।

आप देख सकते हैं, कि उनके इतिहास में यहूदी लोग बन्धुवाई की दो अवधियों में से होकर निकले परन्तु दूसरी बन्धुवाई पहली बन्धुवाई से अधिक लम्बी समय की थी।

बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई - यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा
बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई – यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा

20वीं सदी का नरसंहार

यहूदियों के विरूद्ध सताव अपने चरम पर तब पहुँचा जब हिटलर ने, नाजी जर्मनी के द्वारा, यूरोप में रहने वाले सभी यहूदियों को पूर्ण रीति से नष्ट करने का प्रयास किया। वह लगभग सफल भी हो गया था परन्तु उसकी पराजय हो गई और यहूदियों में से थोड़े से बचे रह गए।

आधुनिक इस्राएल की पुन: – स्थापना

मात्र इस तथ्य ने, कि ऐसे लोग, जो स्वयं को ‘यहूदियों’ के रूप में पहचानते हुए हजारों वर्षों के पश्चात् भी बिना किसी भी जन्म भूमि के अस्तित्व में हैं, अपने आप में ही उल्लेखनीय था। परन्तु इसने 3500 वर्षों पहले मूसा के द्वारा लिखे हुए वचनों को सत्य प्रमाणित कर दिया। 1948 में यहूदियों नें, संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इस्राएल के आधुनिक देश के रूप में पुन: स्थापित होते हुए देखना अपने आप में ही उल्लेखनीय था, ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने सदियों पहले लिखा था:

तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा। चाहे धरती के छोर तक तेरा बरबस पहुँचाया जाना हो, तौभी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को वहाँ से ले आकर इकट्ठा करेगा। और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उसी देश में पहुँचाएगा जिसके तेरे पुरखा अधिकारी हुए थे, और तू फिर उसका अधिकारी होगा; और वह तेरी भलाई करेगा, और तुझ को तेरे पुरखाओं से भी गिनती में अधिक बढ़ाएगा। (व्यवस्थाविवरण 30:3-5)

बड़े विरोध के पश्चात् भी इस देश की स्थापना स्वयं में ही उल्लेखनीय है। इसके चारों ओर के अधिकांश देशों ने इस्राएल के विरूद्ध 1948 विरूद्ध… इसके पश्चात् 1956 में … इसके पश्चात् 1967 में और एक बार फिर से 1973 में युद्ध छेड़ा था। इस्राएल एक बहुत ही छोटा सा देश है, जो कई बार एक ही समय में पाँच देशों के साथ युद्ध कर रहा होता था। इतने पर भी, इस्राएल न केवल बचा रहा, अपितु इसका क्षेत्रफल भी बढ़ता चला गया। 1967 के युद्ध में इस्राएल ने यरूशलेम को प्राप्त किया, जो उनकी दाऊद के द्वारा लगभग 3000 वर्षों पहले स्थापित की हुई ऐतिहासिक राजधानी थी। इस्राएल के देश की स्थापना, और उन युद्धों के परिणामों ने आज के हमारे संसार में सबसे कठिन राजनैतिक समस्याओं को जन्म दिया है।

जैसा कि मूसा के द्वारा भविष्यद्वाणी की गई थी और जिन्हें यहाँ पर विस्तार सहित देखा जा सकता, इस्राएल की पुन: स्थापना इस्राएल की ओर लौटने के लिए भारत में रहने वाले विभिन्न यहूदियों के लिए एक प्रोत्साहन को उत्पन्न करता है। इस समय इस्राएल में 80,000 ऐसे यहूदी रहते हैं, जिनका एक अभिभावक भारत से है और भारत में अब केवल 5000 यहूदी ही शेष रह गए हैं। जहाँ तक मूसा की आशीषों का संदर्भ है, उन्हें बहुत ही “दूर के देशों” से इकट्ठा” किया जा रहा है (जैसे कि मिजोरम) और उन्हें “वापस” लाया जा रहा है। इसके निहितार्थ यहूदियों और गैर-यहूदियों दोनों के लिए यहाँ पर प्रकाश डालते हुए एक दूसरे के तुल्य ही हैं।

मूसा की आशीषें और श्राप : ये आज भी गूँज रहे हैं

मूसा लगभग 3500 वर्षों रहा और उसने बाइबल की पहली पाँच पुस्तकों के लिखा  – पंचग्रन्थ  या तोराह । पाँचवी पुस्तक, व्यवस्थाविवरण, में उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसके द्वारा बोले गए अन्तिम वचन पाए जाते हैं। ये इस्राएल के लोगों – यहूदियों के लिए उसकी आशीषें हैं, परन्तु साथ ही इसमें श्राप भी मिलते हैं। मूसा ने लिखा कि ये आशीषें और श्राप संसार के इतिहास को आकार प्रदान करेंगे और इन पर न केवल यहूदियों के द्वारा ही, अपितु अन्य दूसरी जातियों के द्वारा भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इन आशीषों और श्रापों ने भारत के इतिहास को भी प्रभावित किया है। इसलिए इनका लिखा जाना हमारे आत्म – चिन्तन के लिए है। आशीषों और श्रापों की पूरी सूची यहाँ पर दी गई है। इसका सार नीचे दिया गया है।

मूसा की आशीषें

मूसा ने उन आशीषों को वर्णन करना आरम्भ किया जिन्हें इस्राएल के लोग तब प्राप्त करते जब वे व्यवस्था का पालन करते, जिसमें दस आज्ञाएँ भी सम्मिलित हैं। परमेश्‍वर की ओर से आने वाली आशीष इतनी बड़ी होगी कि अन्य जातियों भी इन आशीषों को पहचानेंगी। इन आशीषों के परिणाम निम्न लिखित होंगे:

 और पृथ्वी के देश देश के सब लोग यह देखकर, कि तू यहोवा का कहलाता है, तुझ से डर जाएँगे (व्यवस्थाविवरण 28:10)

… और श्राप

परन्तु, यदि इस्राएली आज्ञाओं को पालन करने में असफल हो जाते हैं, तब वे श्रापों को प्राप्त करेंगे जो आशीषों के स्थान पर होंगे और उन्हीं की तुलना के अनुरूप होंगे। इन आशीषों को भी चारों की ओर की जातियों के द्वारा देखा जाएगा ताकि :

और उन सब जातियों में जिनके मध्य में यहोवा तुझ को पहुँचाएगा, वहाँ के लोगों के लिये तू चकित होने का, और दृष्टान्त और शाप का कारण समझा जाएगा। (व्यवस्थाविवरण 28:37)

और ये श्राप आने वाले इतिहास तक विस्तारित हो जाएँगे।

 और वे तुझ पर और तेरे वंश पर सदा के लिये बने रहकर चिन्ह और चमत्कार ठहरेंगे। (व्यवस्थाविवरण 28:46)

परन्तु परमेश्‍वर ने चेतावनी दी कि श्रापों के सबसे बुरे अंश का आना अन्य जातियों की ओर से होगा।

यहोवा तेरे विरूद्ध दूर से, वरन् पृथ्वी के छोर से वेग से उड़नेवाले उकाब सी एक जाति को चढ़ा लाएगा जिसकी भाषा को तू नहीं समझेगा; उस जाति के लोगों का व्यवहार क्रूर होगा, वे न तो बूढ़ों का मुँह देखकर आदर करेंगे, और न बालकों पर दया करेंगे; और वे तेरे पशुओं के बच्चे और भूमि की उपज यहाँ तक खा जाएँगे कि तू नष्ट हो जाएगा; और वे तेरे लिये न अन्न, और न नया दाखमधु, और न टटका तेल, और न बछड़े, न मेम्ने छोड़ेंगे, यहाँ तक कि तू नष्ट हो जाएगा। और वे तेरे परमेश्वर यहोवा के दिए हुए सारे देश के सब फाटकों के भीतर तुझे घेर रखेंगे; वे तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे उस समय तक घेरेंगे, जब तक तेरे सारे देश में तेरी ऊँची ऊँची और दृढ़ शहरपनाहें जिन पर तू भरोसा करेगा गिर न जाएँ।  (व्यवस्थाविवरण 28:49-52)

ये बुरे से अत्याधिक बुरे हो जाएँगे।

और जैसे अब यहोवा की तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता है, वैसे ही तब उसको तुम्हें नाश वरन् सत्यानाश करने से हर्ष होगा; और जिस भूमि के अधिकारी होने को तुम जा रहे हो उस पर से तुम उखाड़े जाओगे। …और उन जातियों में तू कभी चैन न पाएगा, और न तेरे पाँव को ठिकाना मिलेगा; क्योंकि वहाँ यहोवा ऐसा करेगा कि तेरा हृदय काँपता रहेगा, और तेरी आँखे धुँधली पड़ जाएँगी, और तेरा मन कलपता रहेगा। (व्यवस्थाविवरण 28:63-65)

परमेश्‍वर और इस्राएलियों के मध्य में औपचारिक सहमति के द्वारा इन आशीषों और श्रापों को स्थापित किया गया था।

कि जो वाचा तेरा परमेश्वर यहोवा आज तुझ से बाँधता है… और उस शपथ के अनुसार जो उसने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब, तेरे पूर्वजों से खाई थी, वह आज तुझ को अपनी प्रजा ठहराए, और आप तेरा परमेश्वर ठहरे … परन्तु उनको भी, जो आज हमारे संग यहाँ हमारे परमेश्वर यहोवा के सामने खड़े हैं।  (व्यवस्थाविवरण 29:12-15)

इस कारण यह वाचा सन्तान और भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर निर्मित होगी। सच्चाई तो यह है, कि यह वाचा भविष्य की पीढ़ियों – दोनों अर्थात् इस्राएलियों और परदेशियों के ओर ही निर्देशित की गई है।

और आनेवाली पीढ़ियों में तुम्हारे वंश के लोग जो तुम्हारे बाद उत्पन्न होंगे, और परदेशी मनुष्य भी जो दूर देश से आएँगे, वे उस देश की विपत्तियों और उस में यहोवा के फैलाए हुए रोग देखकर… न कुछ बोया जाता, और न कुछ जम सकता, और न घास उगती है… और सब जातियों के लोग पूछेंगे, “यहोवा ने इस देश से ऐसा क्यों किया? और इस बड़े कोप के भड़कने का क्या कारण है?” (व्यवस्थाविवरण 29:22-24)

और इसका उत्तर यह होगा:

“तब लोग यह उत्तर देंगे, ‘उनके पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने जो वाचा उनके साथ मिस्र देश से निकालने के समय बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ा है… इसलिये यहोवा का कोप इस देश पर भड़क उठा है, कि पुस्तक मे लिखे हुए सब शाप इस पर आ पडें;  और यहोवा ने कोप, और जलजलाहट, और बड़ा ही क्रोध करके उन्हें उनके देश में से उखाड़ कर दूसरे देश में फेंक दिया, जैसा कि आज प्रगट है। (व्यवस्थाविवरण 29:25-28)

क्या आशीषें और श्राप घटित होते हैं?

इनके बारे में कुछ भी तटस्थता नहीं है। आशीषें हर्षदायी थी और श्राप डरावने थे, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जिसे हम पूछ सकते हैं, वह यह है : ‘क्या ये घटित होते हैं?’ पुराने नियम का लिपिबद्ध वृतान्त का एक बड़ा भाग इस्राएलियों का इतिहास है, इस तरह हम उनके इतिहास को जानते हैं। साथ ही हमारे पास पुराने नियम से बाहर का ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्मारकों का लिपिबद्ध वृतान्त पाया जाता है। वे सभी के सभी इस्राएलियों या यहूदियों के इतिहास के एक स्थाई चित्र को प्रस्तुत करते हैं। इस यहाँ पर समय रेखा के द्वारा दिया गया है। आप स्वयं पढ़ें और आंकलन करें कि क्या मूसा के श्राप पूरे हुए हैं या नहीं। यह साथ ही इस बात का भी उत्तर देता है, कि क्यों यहूदी समूह 2700 वर्षों पहले से आरम्भ होते हुए भारत में स्थानान्तरित हुए थे (उदाहरण के लिए मिजोरम के बेन मनश्शे)। वे अश्शूरी और बेबीलोन क विजयी अभियानों के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पूरे भारत में बिखर गए – ठीक वैसे ही जैसा मूसा ने चेतावनी दी थी।

मूसा की आशीषों और श्रापों का निष्कर्ष

मूसा के अन्तिम वचन श्रापों के साथ अन्त नहीं होते हैं। यहाँ पर दिया गया है, कि कैसे मूसा ने अपनी अन्तिम घोषणाओं को दिया था।

फिर जब आशीष और शाप की ये सब बातें जो मैं ने तुझ को कह सुनाई हैं तुझ पर घटें, और तू उन सब जातियों के मध्य में रहकर, जहाँ तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बरबस पहुँचाएगा, इन बातों को स्मरण करे, और अपनी सन्तान सहित अपने सारे मन और सारे प्राण से अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरकर उसके पास लौट आए, और इन सब आज्ञाओं के अनुसार जो मैं आज तुझे सुनाता हूँ उसकी बातें माने; तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा। चाहे धरती के छोर तक तेरा बरबस पहुँचाया जाना हो, तौभी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को वहाँ से ले आकर इकट्ठा करेगा। और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उसी देश में पहुँचाएगा जिसके तेरे पुरखा अधिकारी हुए थे, और तू फिर उसका अधिकारी होगा; और वह तेरी भलाई करेगा, और तुझ को तेरे पुरखाओं से भी गिनती में अधिक बढ़ाएगा। (व्यवस्थाविवरण 30:1-5)

हजारों वर्षों तक निर्वासित रहने के पश्चात्, 1948 में – जिनमें से आज भी कई लोग जीवित हैं, उनके जीवनकाल में ही – इस्राएल का आधुनिक राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के द्वारा पुन: स्थापित किया गया और यहूदियों ने संसार के चारों ओर से इसमें फिर से वापस लौटना आरम्भ कर दिया – ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने भविष्यद्वाणी की थी। भारत में आज, कोचीन, आन्ध्रा प्रदेश और मिजोरम में रहने वाली हजारों वर्षों पुराना यहूदी समाज तेजी से घटते जा रहा है, क्योंकि यहूदी अपने पूर्वजों की भूमि में वापस लौट रहे हैं। भारत में केवल 5000 यहूदी ही बच गए हैं। हमारी आँखों के सामने ही मूसा की आशीषें पूरी हो रही हैं, निश्चित रूप से श्रापों ने उनके इतिहास को निर्मित किया था।

हमारे लिए इसके कई निहितार्थ पाए जाते हैं। प्रथम, आशीषों और श्रापों ने अपने अधिकार और सामर्थ्य को बाइबल के परमेश्‍वर से प्राप्त किया था। मूसा मात्र एक आत्म जागृत व्यक्ति – एक ऋषि था। सच्चाई तो यह है, कि ये आशीष और श्राप हजारों वर्षों तक आते हुए, पूरे संसार की जातियों में विस्तारित होती हैं, और इनके द्वारा करोड़ों लोगों को प्रभावित करना (यहूदियों के इस्राएल में वापस लौटने ने उथल पुथल को उत्पन्न कर दिया है – ये नियमित रूप से वैश्विक सुर्खियाँ बनाने वाली घटनाओं का कारण बन रही हैं) यह प्रमाण है, कि परमेश्‍वर के पास सामर्थ्य और अधिकार है, जिसकी पुष्टि बाइबल (वेद पुस्तक) करती है कि उसके पास है। उसी तोराह में उसने साथ ही यह प्रतिज्ञा भी की है कि पृथ्वी के सभी लोग आशीष पाएँगे। ‘पृथ्वी के सभी लोगों’ में आप और मैं भी सम्मिलित हैं। इसके पश्चात् अब्राहम के पुत्र के बलिदान में, परमेश्‍वर पुनः पुष्टि करता है कि ‘सभी जातियाँ आशीष पाएँगी’। इस बलिदान का अद्भुत स्थान और वर्णन हमें इस बात को जानने में सुराग देते हुए सहायता प्रदान करता है कि इस आशीष को कैसे प्राप्त किया जाए। आशीष को अब मिजोरम, आन्ध्रा प्रदेश और केरल से लौटने वाले यहूदियों के ऊपर उण्डेल दिया गया, जो एक ऐसा चिन्ह है, कि परमेश्‍वर जैसा कि उसने अपने वचन में प्रतिज्ञा की है, भारत के सभी राज्यों और इस संसार की अन्य सभी जातियों में समान रूप से आशीष को दे सकता और देना चाहता है। यहूदियों की तरह ही, हम भी हमारे श्राप के मध्य में आशीषों को दिए जाने की प्रस्ताव दिया गया है। क्यों नहीं आशीष के इस वरदान को प्राप्त किया जाए?

क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है?

परमेश्‍वर ने इतिहास में कैसे कार्य किया को वर्णित करते हुए बाइबल आत्मिक सत्यों को प्रदान करती है। यह वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ परमेश्‍वर ने मनुष्य की सृष्टि अपने स्वरूप में की और फिर प्रथम मनुष्य का सामना किया और एक बलिदान के लिए बोला जो आने वाला था और जिसका बलिदान होगा। इसके पश्चात् ऋषि अब्राहम के पुत्र के स्थान पर एक मेढ़े के बलिदान की विशेष घटना और ऐतिहासिक फसह की घटना घटित हुई। यह प्राचीन ऋग वेद के सामान्तर चलता है जहाँ पर हमारे पापों के लिए बलिदान की मांग की गई है और यह प्रतिज्ञा दी गई है कि यह पुरूषा के बलिदान के साथ प्रगट होगा। ये प्रतिज्ञाएँ प्रभु यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के जीवन, शिक्षाएँ, मृत्यु एवं पुनरूत्थान से पूरी हो गई। परन्तु प्रतिज्ञाएँ और पूर्णताएँ ऐतिहासिक हैं। इसलिए, यदि बाइबल को आत्मिक सत्यों को प्रदान करने के लिए सत्य होना हो तो इसे ऐतिहासिक रूप से विश्‍वसनीय भी होना चाहिए। यह हमें हमारे किए हुए प्रश्न की ओर ले जाता है : क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है? और कैसे कोई यह जान सकता है यह है या नहीं?

हम यह कहते हुए आरम्भ करते हैं कि कहीं समय के बीतने के साथ बाइबल का मूलपाठ (के शब्द) कहीं परिवर्तित तो नहीं हो गए हैं। जिसे साहित्यिक विश्‍वसनीयता  से जाना जाता है, यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि बाइबल अत्यधिक प्राचीन है। बहुत सी पुस्तकें हैं जिनसे मिलकर बाइबल का निर्माण हुआ है, और सबसे अन्तिम पुस्तक लगभग दो हज़ार वर्षों पहले लिखी गई थी। अधिकांश मध्यवर्ती सदियों में छपाई, फोटोकॉपी मशीन या प्रकाशन कम्पनियों की कोई सुविधा नहीं थी। इसलिए इन पुस्तकों को हाथों के द्वारा लिखा जाता था, एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी के आने पर, भाषाएँ समाप्त होती गई और नई भाषाएँ आती गईं, साम्राज्य परिवर्तित होते गए और नई शक्तियाँ आती गईं। क्योंकि मूल पाण्डुलिपियाँ बहुत पहले ही लोप हो गई थीं, इसलिए हम कैसे यह जान सकते हैं कि आज हम बाइबल में जो कुछ पढ़ते हैं उसे वास्तव में मूल लेखकों ने ही बहुत पहले लिखा था?क्या यह जानने के लिए कोई ‘वैज्ञानिक’ तरीका है कि जिसे आज हम पढ़ते हैं वह बहुत पहले लिखे हुए मूल लेखों जैसा ही है या भिन्न है?

साहित्यिक आलोचना के सिद्धान्त

यह प्रश्न किसी भी प्राचीन लेख के लिए सत्य है। नीचे दिया हुआ आरेख उस प्रक्रिया को चित्रित करता है जिसमें अतीत के सभी प्राचीन लेखों को समय के व्यतीत होने के साथ सुरक्षित रखा जाता था ताकि हम उन्हें आज पढ़ सकें। नीचे दिया हुआ आरेख 500 ईसा पूर्व (इस तिथि को केवल एक उदाहरण को दर्शाने के लिए चुना गया है) के एक प्राचीन दस्तावेज के उदाहरण को प्रदर्शित करता है।

समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।
समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।

मौलिक रूप अनिश्चितकाल तक के लिए नहीं रहता है, इसलिए इससे पहले की यह नष्ट होने लगे, खो जाए, या नाश हो जाए, एक पाण्डुलिपि (पाण्डु लि) की प्रतिलिपि तैयार कर ली जाती है (1ली प्रतिलिपि)।अनुभवी व्यक्ति की एक श्रेणी जिन्हें शास्त्री कह कर पुकारा जाता है प्रतिलिपि को बनाने का कार्य करते हैं। जैसे जैसे समय व्यतीत होता है, प्रतिलिपियों से और प्रतिलिपि (2री प्रतिलिपि और 3री प्रतिलिपि) तैयार की जाती है। किसी समय पर एक प्रतिलिपि को संरक्षित कर लिया जाता है जो कि आज भी अस्तित्व में है (3री प्रतिलिपि)। हमारे उदाहरण दिए हुए आरेख में इस अस्तित्व में पड़ी हुई प्रतिलिपि को 500 ईसा पूर्व में बनाया हुआ दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि जितना अधिक पहले के मूलपाठ के दस्तावेज की अवस्था को हम जानते हैं वह केवल 500 ईसा पूर्व या इसके बाद का है क्योंकि इसके पहले की सभी पाण्डुलिपियाँ लोप हो गई हैं। 500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी सन् के मध्य के 1000 वर्ष (जिन्हें आरेख में x के चिन्ह से दिखाया गया है) वह अवधि है जिसमें हम किसी भी प्रतिलिपि की जाँच नहीं कर सकते हैं क्योंकि सभी पाण्डुलिपियाँ इस अवधि में लोप हो गई हैं। उदाहरण के लिए, यदि प्रतिलिपि बनाते समय कोई त्रुटि (अन्जाने में या जानबूझकर) हुई है जिस समय 2री प्रतिलिपि को 1ली प्रतिलिपि से बनाया जा रहा था, तो हम उसका पता  लगाने के लिए सक्षम नहीं होंगे क्योंकि इनमें से कोई भी दस्तावेज अब एक दूसरे से तुलना करने के लिए उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध प्रतिलिपियों (x अवधि) की उत्पति होने से पहले की यह समयावधि इसलिए साहित्यिक अनिश्चितता का अन्तराल है। परिणामस्वरूप, एक सिद्धान्त जो साहित्यिक विश्‍वसनीयता के बारे में हमारे प्रश्न का उत्तर देता है वह यह है कि जितना अधिक छोटा यह अन्तराल x होगा उतना अधिक हम हमारे आधुनिक दिनों में दस्तावेज के सटीक रूप से संरक्षण में अपनी विश्‍वसनीयता को रख सकते हैं, क्योंकि अनिश्चयता की अवधि कम हो जाती है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि आज अक्सर एक पाण्डुलिपि की एक से ज्यादा दस्तावेज की प्रतिलिपि अस्तित्व में है। मान लीजिए हमारे पास इस तरह की दो पाण्डुलिपियों की प्रतिलिपियाँ हैं और हम उन दोनों के एक ही भाग में इस निम्नलिखित वाक्यांश को पाते हैं (मैं इसे अंग्रेजी में उदाहरण के कारण लिख रहा हूँ, परन्तु वास्तविक पाण्डुलिपि यूनानी, लैटिन या संस्कृत जैसी भाषाओं में होगी):

कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

मूल लेख में या तो सुरेश के बारे में लिखा है या फिर सुमेश के बारे लिखा है, और बाकी के इन अन्य पाण्डुलिपियों में प्रतिलिपि बनाते समय त्रुटि पाई जाती है। प्रश्न यह उठता है – कि इनमें से किस में त्रुटि पाई जाती है?उपलब्ध प्रमाण से इसे निर्धारित करना अत्यन्त कठिन है।

अब मान लीजिए हमने एक ही लेख की दो से अधिक पाण्डुलिपियों को प्राप्त किया है, जैसा कि नीचे दिखाया गया है:

कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

 

अब यह तार्किक परिणाम निकालना आसान है कि किस पाण्डुलिपि में त्रुटि है। अब यह सम्भावना ज्यादा है कि त्रुटि एक बार हुई हो, इसकी अपेक्षा की एक ही जैसी त्रुटि की तीन बार पुनरावृत्ति हुई हो, इसलिए यह सम्भावना अधिक है पाण्डुलिपि #2 की प्रतिलिपि में त्रुटि हो, और लेखक सुरेश  के बारे में लिख रहा हो, न कि सुमेश के बारे में।

यह सरल उदाहरण दर्शाता है कि एक दूसरा सिद्धान्त जिसे हम पाण्डुलिपि के साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय होने की जाँच के लिए उपयोग कर सकते हैं वह:जितनी ज्यादा प्रचलित पाण्डुलिपियाँ हैं जो उपलब्ध हैं, उतना ही अधिक मूल लेख के शब्दों की सही त्रुटियों को पता लगाना और सही करना और निर्धारित करना आसान होता है।

पश्चिम की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

हमारे पास बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता को निर्धारित करने के लिए दो संकेतक हैं:

  1. वास्तविक संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपियों के मध्य में समय को मापना, और
  2. प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि के सँख्या की गणना करना।

क्योंकि ये संकेतक किसी भी प्राचीन लेख के ऊपर लागू होते हैं इसलिए हम इनका उपयोग दोनों अर्थात् बाइबल और साथ ही साथ अन्य प्राचीन लेखों के ऊपर लागू कर सकते हैं, जैसा कि नीचे दी हुई तालिकाओं में दिया हुआ है।

लेखक कब लिखा गया प्रारम्भिक प्रतिलिपि समय की अवधि #
 कैसर 50 ई. पूर्व 900 ई. सन् 950 10
प्लेटो अर्थात् अफलातून 350 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1250 7
अरस्तू* 300 ई. पूर्व 1100 ई. सन् 1400 5
थियूसीडाईडस 400 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1300 8
हेरोडोटस 400 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1300 8
सैफोक्लेस 400 ई. पूर्व 1000 ई. सन् 1400 100
टाईटस 100 ई. सन् 1100 ई. सन् 1000 20
पिल्नी 100 ई. सन् 850 ई. सन् 750 7

ये लेखक पश्चिमी इतिहास के प्रमुख शास्त्रीय लेखन – अर्थात् ऐसे लेख जिनका विकास पश्चिमी सभ्यता के विकास के साथ निर्मित हुआ को प्रस्तुत करते हैं। औसत दर पर, उन्हें हम तक 10-100 पाण्डुलिपियों के रूप में एक से दूसरी पीढ़ी के द्वारा पहुँचाया गया है जिन्हें मूल लेख के लिखे जाने के पश्चात् लगभग 1000 वर्षों के पश्चात् आरम्भ करते हुए संरक्षित किया गया था।

पूर्व की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम प्राचीन संस्कृति के महाकाव्यों को देखें जो हमें दक्षिण एशिया के इतिहास और दर्शन के ऊपर बहुत अधिक समझ को प्रदान करते हैं। इन लेखों में सबसे प्रमुख महाभारत के लेख हैं, जिनमें अन्य लेखों के साथ ही, भगवद् गीता और कुरूक्षेत्र की लड़ाई का वृतान्त भी सम्मिलित है। विद्वान आंकलन करते हैं कि महाभारत का विकास इसके आज के लिखित स्वरूप में लगभग 900 ईसा पूर्व से हुआ, परन्तु सबसे से प्राचीन पाण्डुलिपि के आज भी अस्तित्व में पाए जाने वाले अंश लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास मूल संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि से लगभग 500 वर्षों के अन्तराल को देते हुए पाए जाते हैं (संदर्भ के लिए विकी का लिंक)। हैदराबाद की उस्मानिया विश्‍वविद्यालय गर्व से कहता है कि उसके पुस्तकालय में दो पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ पड़ी हुई हैं, परन्तु इन दोनों की तिथि केवल 1700 ईस्वी सन् और 1850 ईस्वी सन् है – जो कि मूल संकलन (संदर्भ लिंक) के हज़ारों वर्षों के पश्चात् की हैं। न केवल पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ बाद की तिथि की हैं, अपितु यह जानकारी कि महाभारत  एक लोकप्रिय लेखन कार्य था यह इसकी भाषा और शैली में परिवर्तन की पुष्टि करता है, इसमें और प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि में बहुत ही उच्च श्रेणी की साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है। विद्वान जो यह आंकलन लगाते हैं कि महाभारत में लिखी हुई साहित्यिक भिन्नता ऐसे व्यक्त करती है:

“भारत का राष्ट्रीय महाकाव्य, महाभारत, ने तो बहुत ही ज्यादा भ्रष्टता का सामना किया है। यह लगभग…250 000 पँक्तियों का है। इनमें से, कोई 26 000 पँक्तियों में साहित्यिक भ्रष्टता (10 प्रतिशत) पाई जाती है”– (गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1968. पृ 367)

अन्य महान् महाकाव्य, रामायण  है, जो लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास संकलित हुआ था परन्तु इसकी प्रारम्भिक प्रचलित प्रतिलिपि, नेपाल से आई है, जिसकी तिथि 11 ईस्वी सन् की सदी पाई जाती है (संदर्भ लिंक) –जो मूल संकलन से लगभग 1500 वर्षों के आसपास पाई जाने वाली प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि में अन्तराल को देती है। रामायण की अब कई हज़ारों प्रचलित प्रतिलिपियाँ पाई जाती हैं। इनमें आपस में ही व्यापक साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है, विशेषकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत/दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य में। विद्वानों ने इन साहित्यिक विभिन्नताओं के कारण इन पाण्डुलिपियों को 300 भिन्न समूहों में वर्गीकृत किया है।

नए नियम की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम बाइबल के लिए पाण्डुलिपि आधारित तथ्य की जाँच करें। नीचे दी हुई तालिका नए नियम की सबसे प्राचीनत्तम प्रतिलिपियों को सूचीबद्ध करती है। इनमें से प्रत्येक का एक नाम दिया गया है (अक्सर पाण्डुलिपि को खोजकर्ता के नाम के ऊपर)

पाण्डुलिपि कब लिखी गई पाण्डुलिपि की तिथि समय की अवधि
 जॉन राएलॉन 90 ई. सन् 130 ई. सन् 40 yrs
बोड़मेर पपाईरस 90 ई. सन् 150-200 ई. सन् 110 yrs
चेस्टर बेट्टी 60 ई. सन् 200 ई. सन् 20 yrs
कोड्डक्स वेटीकानुस 60-90ई. सन् 325 ई. सन् 265 yrs
कोड्डक्स

सिनाटिक्स

60-90 ई. सन् 350 ई. सन् 290 yrs

नए नियम की पाण्डुलिपियाँ सँख्या में इतनी अधिक हैं कि उन सभी को एक ही तालिका में सूचीबद्ध करना अत्यन्त ही कठिन होगा। जैसा कि एक विद्वान जिसने इस विषय के ऊपर अध्ययन करने के लिए कई वर्षों के समय को व्यतीत किया ने व्यक्त किया है:

“हमारे पास आज नए नियम के अंशों की24000 पाण्डुलिपि से अधिक प्रतिलिपियों के अंश पाए जाते हैं… प्राचीन काल का कोई भी दस्तावेज इतनी अधिक सँख्या और प्रामाणिकता की पहुँच से आरम्भ नहीं होता है। इसकी तुलना में कवि होमर लिखित इलियड है जो 643 पाण्डुलिपियों के साथ दूसरे स्थान पर आज भी अस्तित्व में है।” मैक्डावेल, जे. प्रमाण जो न्याय की मांग करते हैं. 1979. पृ. 40)

ब्रिट्रिश संग्रहालय का एक अग्रणी विद्वान यह पुष्टि करता है कि:

“विद्वान एक बड़ी सीमा तक संतुष्ट हैं कि मुख्य यूनानी और रोमन लेखक अपने मूलपाठ में सच्चे थे…तौभी उनके लेखनकार्य के प्रति हमारा ज्ञान केवल कुछ थोड़ी सी ही पाण्डुलिपियों के ऊपर आधारित हैं जबकि नए नियम की पाण्डुलिपियों की गणना…हज़ारों के द्वारा हुई है” (केन्योन, एफ. जी. – ब्रिट्रिश संग्रहालय का पूर्व निदेशक – हमारी बाइबल और प्राचीन पाण्डुलिपि. 1941 पृ. 23)

और इन पाण्डुलिपियों की एक निश्चित सँख्या अत्यन्त ही प्राचीन है। मेरे पास प्रारम्भिक नए नियम के दस्तावेजों के बारे में एक पुस्तक है। इसका परिचय इस तरह से आरम्भ होता है:

“यह पुस्तक प्रारम्भिक नए नियम की 69 पाण्डुलिपियों का लिप्यंतरण…2री सदी से आरम्भ करती हुई 4थी सदी (100-300 ईस्वी सन्) के आरम्भ तक…नए नियम के मूलपाठ का लगभग 2/3 हिस्से को उपलब्ध कराती है” (पृ. सांत्वना, नए नियम की यूनानी पाण्डुलिपि के प्रारम्भिक मूलपाठ”. प्रस्तावना पृ. 17. 2001)

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पाण्डुलिपियाँ आरम्भिक अवधि से निकल कर आई हैं जब सुसमाचार के अनुयायी सरकारी शक्ति में नहीं थे, अपितु इसकी अपेक्षा रोमी साम्राज्य के द्वारा तीव्र सताव के अधीन थे। यह वह अवधि थी जब सुसमाचार दक्षिण भारत, के केरल में आया, और यहाँ भी सुसमाचार के अनुयायियों के समाज के पास किसी भी तरह से सरकारी शक्ति नहीं थी जिससे की कोई राजा पाण्डुलिपियों के साथ किसी तरह की कोई चालाकी कर सकता। नीचे दिया हुआ आरेख पाण्डुलिपियों के उस अवधि को दर्शाता है जिस पर बाइबल का नया नियम आधारित है।

समयरेखा यह दिखा रही है कि नए नियम की 24000 प्रचलित पाण्डुलिपियों में से, सबसे प्रारम्भिक वाली को उपयोग आधुनिक अनुवादकों ने (उदाहरण, अंग्रेजी, नेपाली या हिन्दी) बाइबल के लिए किया है। यह कॉन्स्टेनटाईन (325 ईस्वी सन्) के समय से पहले से आई हैं जो रोम का पहला मसीही सम्राट था।
समयरेखा यह दिखा रही है कि नए नियम की 24000 प्रचलित पाण्डुलिपियों में से, सबसे प्रारम्भिक वाली को उपयोग आधुनिक अनुवादकों ने (उदाहरण, अंग्रेजी, नेपाली या हिन्दी) बाइबल के लिए किया है। यह कॉन्स्टेनटाईन (325 ईस्वी सन्) के समय से पहले से आई हैं जो रोम का पहला मसीही सम्राट था।

इन सभी हज़ारों पाण्डुलिपियों के मध्य में अनुमानित साहित्यिक भिन्नता केवल

“20000 में से 400 पँक्तियाँ हैं।”(गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1988. पृ 366)

इस तरह से मूलपाठ इन सभी पाण्डुलिपियों से 99.5%  मेल खाता है।

पुराने नियम की साहित्यिक आलोचना

ऐसा ही कुछ पुराने नियम के साथ में है। पुराने नियम की 39 पुस्तकें 1500-400 ईसा पूर्व के मध्य में लिखी गई थीं। यह नीचे दिए हुए आरेख में दिखाई गई हैं जहाँ पर वह अवधि जिसमें मूल पुस्तकें लिखी गईं को समयरेखा के ऊपर एक दण्ड के रूप में दिखाया गया है। हमारे पास पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की दो श्रेणियाँ हैं। पाण्डुलिपियों की पारम्परिक श्रेणी मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ है जिन्हें लगभग 900 ईस्वी सन् में प्रतिलिपित किया गया था। तथापि 1948 में पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की एक और श्रेणी जो इससे भी अधिक प्राचीन है – अर्थात् 200 ईसा पूर्व से है और जिसे मृतक सागर कुण्डल पत्र (मृ सा कुं पत्र) कह कर पुकारा जाता है की खोज हुई। यह दोनों पाण्डुलिपियों की श्रेणियाँ आरेख में दिखाई गई हैं। सबसे अधिक जो आश्चर्यजनक है वह यह है कि भले ही ये समय के एक लम्बे अन्तराल लगभग 1000 वर्षों का अन्तर रखती हैं, इनके मध्य में भिन्नता लगभग न के बराबर है। जैसा कि एक विद्वान ने इनके बारे में ऐसा कहा है:

‘ये[मृ सा कुं पत्र]मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ की सटीकता की पुष्टि करते हैं…केवल कुछ ही उदाहरणों को छोड़कर जहाँ पर मृतक सागर कुण्डल पत्रों और मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ के मध्य में वर्तनी और व्याकरण की भिन्नता पाई जाती है, ये दोनों आश्चर्यजनक रूप से एक जैसे हैं’ (ऐम. और. नॉर्टन, बाइबल की उत्पत्ति में पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ)

उदाहरण के लिए, जब हम इसे रामायण की साहित्यिक भिन्नता के साथ तुलना करते हैं, तो पुराने नियम के मूलपाठ का स्थायित्व बड़ी सरलता से ही उल्लेखनीय रूप में पाया जाता है।

यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।
यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।

सारांश: बाइबल साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है

अब हम इस तथ्य से क्या सारांश निकाल सकते हैं? निश्चित रूप से कम से कम हम निष्पक्षता से यह गणना कर सकते हैं (पाण्डुलिपियों की सँख्या की मात्रा, मूल और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि के मध्य में समय की अवधि, और पाण्डुलिपियों के मध्य में साहित्यिक भिन्नता का स्तर) कि बाइबल किसी भी अन्य प्राचीन लेखन कार्य की अपेक्षा बड़े उच्च स्तर में सत्यापित होती है। यह निर्णय जो हमें प्रमाणों सहित आगे की ओर बढ़ाता है अपने सर्वोत्तम रूप में निम्नलिखित अभिव्यक्ति के द्वारा प्रगट किया है:

नए नियम के अनुप्रमाणित मूलपाठ के प्रति सन्देहवादी होना शास्त्रीय प्राचीनता को अस्पष्टता में खो देना है, क्योंकि प्राचीन समयकाल के किसी भी दस्तावेज के संदर्भग्रन्थ की उतनी अच्छी पुष्टि नहीं हुई है जितनी अच्छी नया नियम की हुई है” (मोन्टागोमरी, मसीहियत का इतिहास. 1971, पृ. 29)

वह जो कुछ कह रहा है उसे तर्कयुक्त होना चाहिए, यदि हम बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता के ऊपर सन्देह करें तब हम साथ ही उस सब का इन्कार कर देंगे जिसे हम इतिहास के बारे में सामान्य रूप से जानते हैं – और इसे किसी भी सूचित इतिहासकार ने कभी नहीं किया है। हम जानते हैं कि बाइबल का मूलपाठ कभी भी परिवर्तित नहीं हुआ है जबकि सदियाँ, भाषाएँ और साम्राज्य आए और गए जबकि प्रारम्भिक पाण्डुलिपियाँ इन सभी घटनाओं से पहले की तिथि की हैं। बाइबल एक विश्‍वसनीय पुस्तक है।

मूसा के फसह के पर्व में चिन्ह और यीशु

हमने देख लिया है कि कैसे ऋषि अब्राहम के द्वारा उसके पुत्र इसहाक का बलिदान यीशु के बलिदान की ओर संकेत कर रहा था। अब्राहम की मृत्यु के पश्चात्, उसके पुत्र इसहाक के वंशज, जिन्हें अब इस्राएली कह कर पुकारा जाता है, एक बड़ी सँख्या के लोग बन गए थे परन्तु साथ ही वे मिस्र में दास अर्थात् गुलाम बन गए थे।

फसह का पर्व

अब हम एक बड़े ही नाटकीय संघर्ष में आ जाते हैं जो एक व्यक्ति जिसे मूसा कहा जाता है, के द्वारा केन्द्रित है और जिसका उल्लेख इब्रानी वेद बाइबल की निर्गमन नामक पुस्तक में मिलता है। इसका नाम ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें यह वृतान्त मिलता है कि कैसे मूसा अब्राहम के 500 वर्षों के पश्चात्, लगभग 1500 ईसा पूर्व में इस्राएलियों के मिस्र के दासत्व से बाहर निकाल कर लाया। मूसा को सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर (प्रजापति) के द्वारा आज्ञा दी गई थी कि वह मिस्र के फिरौन (शासक) का सामना करे और इसका परिणाम मूसा और फिरौन की इच्छाओं में प्रतिस्पर्धा के रूप में निकला। इस प्रतिस्पर्धा ने मिस्र के विरोध में दस विपत्तियों या अपदाओं को भी उत्पन्न किया। परन्तु फिरौन मिस्रियों को छोड़ देने के लिए सहमत नही हुआ इसलिए परमेश्‍वर 10वीं और अन्तिम विपत्ति उनके ऊपर लाने पर था। आप 10वीं विपत्ति के पूरे वृतान्त को इस लिंक पर यहाँ निर्गमन में पढ़ सकते हैं क्योंकि यह नीचे दिए गए विवरण में आपकी सहायता करेगा।

परमेश्‍वर के द्वारा 10वीं विपत्ति की आज्ञा यह थी कि मृत्यु का दूत (आत्मा) मिस्र के प्रत्येक घर के आगे से निकलेगा। उस देश की पूरी भूमि पर एक विशेष रात्रि में प्रत्येक पहिलौठा उन लोगों के घरों को छोड़कर मर जाएगा जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया है और इसके लहू को उस घर के द्वार की चौखटों पर लगाया हुआ है। फिरौन का विनाश उसके पुत्र और उसके सिंहासन के उत्तराधिकारी के मरने से होता है, यदि वह आज्ञा का पालन नहीं करता और मेम्ने के लहू को द्वार पर नहीं लगाता है। और मिस्र का प्रत्येक घर पहिलौठे पुत्र को खो देगा यदि वे मेम्ने का बलिदान नहीं करते और उसके लहू को चौखटों के ऊपर नहीं लगाते हैं। इस तरह से मिस्र राष्ट्रीय संकट का सामना करता है।

परन्तु वे घर जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया था और उसके लहू को चौखटों के ऊपर लगाया गया था के लिए यह प्रतिज्ञा दी गई थी ऐसा प्रत्येक घर सुरक्षित रहेगा। मृत्यु के दूत ने उस घर को छोड़ दिया। इस तरह से इस दिन को फसह कह कर पुकारा गया (क्योंकि मृत्यु ने उन सभी घरों को छोड़ दिया  था जहाँ पर द्वारों पर लहू को लगाया गया था)।

फसह का चिन्ह

अब जिन्होंने इस कहानी को सुना, उन्होंने यह मान लिया कि द्वारों पर लगा हुआ लहू का निशान मृत्यु के दूत के लिए निशान था। परन्तु 3500 वर्षों पहले लिखे हुए वृतान्त में से जिज्ञासा भरे हुए विवरण के ऊपर ध्यान दें।

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा….“…मैं यहोवा हूँ। जिन घरों में तुम रहते हो उन पर [फसह के मेम्ने का] वह लहू

तुम्हारे लिए चिन्ह ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊँगा। (निर्गमन 12:13)

यद्यपि परमेश्‍वर द्वार के ऊपर लहू को देख रहा था, और जब वह उसे देखता है तो मृत्यु उसके घर को छोड़ देगी, लहू परमेश्‍वर के लिए चिन्ह नहीं था। यह बड़ी ही स्पष्टता से कहता है, कि लहू ‘आपके लिए एक चिन्ह’– अर्थात् लोगों के लिए चिन्ह था। यह साथ ही हम सभों के लिए भी चिन्ह है जो इस वृतान्त को पढ़ते हैं। परन्तु कैसे यह एक चिन्ह है? एक महत्वपूर्ण सुराग यह है कि इस घटना के घटित हो जाने के पश्चात् परमेश्‍वर ने उन्हें यह आज्ञा दी:

इस कारण वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर माना जाए। जब तुम उस देश में प्रवेश करो…तब यह काम किया करना…यह परमेश्‍वर के लिए फसह का बलिदान होगा (निर्गमन 12:17)

Jewish man with lamb at Passover
फसह के पर्व पर मेम्ने के साथ एक यहूदी व्यक्ति

यहूदी इस्राएलियों को प्रत्येक वर्ष के उसी दिन फसह का पर्व मानने की आज्ञा दी गई थी। यहूदी पंचाँग, चन्द्रमा आधारित पंचाँग होने के कारण, पश्चिमी पंचाँग से थोड़ा सा भिन्न है,यदि आप इसका आंकलन पश्चिमी पंचाँग के अनुसार करें तो आप पाएंगे कि वर्ष में दिनों की गिनती प्रत्येक वर्ष परिवर्तित होती ही जाती है। परन्तु आज के दिन भी, लगभग 3500 वर्षों के पश्चात्, यहूदी लोग निरन्तर फसह के पर्व अर्थात् त्योहार को प्रत्येक वर्ष उसी दिन दी हुई आज्ञा का पालन करते हुए इस घटना की स्मृति में मनाते हैं।

फसह का चिन्ह प्रभु यीशु की ओर संकेत कर रहा है

और इतिहास में इस पर्व की खोज करते हुए हम कुछ असाधारण बातों को नोट कर सकते हैं। आप इसे सुसमाचारों में भी ध्यान से नोट कर सकते हैं जहाँ पर यह यीशु के पकड़े और जाँचे जाने (प्रथम फसह की विपत्ति के 1500 वर्षों को पश्चात्) के विवरणों को उल्लेख करता है:

“तब वे यीशु को…रोमी राज्यपाल [पीलातुस] के किले ले गए…परन्तु वे आप किले के भीतर नहीं गए ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें”… [पीलातुस]ने [यहूदी अगुवों से] कहा “…पर तुम्हारी यह रीति है कि मैं फसह के समय में तुम्हारे लिये एक व्यक्ति को छोड़ दूँ। अत: क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये ‘यहूदियों के राजा’ को छोड़ दूँ?” तब उन्होंने फिर चिल्ला कर कहा, “इसे नहीं…”(यूहन्ना 18:28, 39-40)

दूसरे शब्दों में, यीशु को पकड़ लिया गया था और कूस्रीकरण के लिए यहूदी पंचाँग के अनुसार ठीक फसह के दिन  ही भेजा गया था। यीशु को दी हुई पदवियों में से एक यह थी

दूसरे दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था’” (यूहन्ना 1:29-30)

यहाँ पर हम देखते हैं कि कैसे फसह का नाटक हमारे लिए एक चिन्ह है। यीशु, परमेश्‍वर के मेम्ने को वर्ष के ठीक उसी दिन  क्रूसित (अर्थात् बलिदान) किया गया था जब सभी यहूदी प्रथम फसह के स्मरण में मेम्ने का बलिदान कर रहे थे जो 1500 वर्षों पहले घटित हुई था। यह दो छुट्टियों के वार्षिक समय की व्याख्या करते हैं जो प्रत्येक वर्ष – समानान्तर रूप में घटित होती है जिस पर हममें से थोड़े ही ध्यान देते हैं और यहाँ तक कि बहुत ही थोड़े पूछते हैं कि ‘क्यों’ ऐसा घटित होता है? यहूदियों का फसह का पर्व प्रत्येक वर्ष लगभग उसी समय घटित होता है जब मसीहियों का ईस्टर का पर्व आता है – अपने पंचाँग को जाँचें। (प्रत्येक 19वें वर्ष के एक महीने में विचलन यहूदियों के पंचाँग के चन्द्र-आधारित लीप वर्ष के चक्र के कारण होता है)। इसलिए ही ईस्टर आगे की ओर बढ़ जाता है क्योंकि यह फसह के ऊपर आधारित है और फसह का समय यहूदी पंचाँग के द्वारा निर्धारित होता है जो वर्ष की गणना पश्चिमी पंचाँग से भिन्न रूप में करता है।

अब एक मिनट के लिए यह विचार करें चिन्ह  क्या करते हैं। आप कुछ चिन्हों को नीचे यहाँ पर देख सकते हैं।

Flag_of_India
भारत का एक चिन्ह

व्यावसायिक चिन्ह हमें मैक्डोनाल्डस् और नाईक को सोचने के लिए मजबूर करते हैं

झण्डा या ध्वज भारत का चिन्ह या प्रतीक है। हम केवल एक नांरगी और एक हरी पट्टी को ही आयताकार रूप में नहीं ‘देखते’ हैं। नहीं, जब भी हम झण्डे को देखते हैं, हम भारत को सोचते हैं। ‘सुनहरी मेहराबें’ हमें मैक्डोनाल्डस् को सोचने के बारे में मजबूर करती हैं। टेनीस खिलाड़ी नाडॉल के सिर पर बँधी हुई पट्टी पर दिया हुआ चिन्ह ‘√’ नाईक के लिए सोचने पर मजबूर करता है। नाईक चाहता है कि हम उनके बारे में सोचें जब भी हम नाडॉल के सिर पर बँधी पट्टी पर दिए हुए चिन्ह को देखते हैं। दूसरे शब्दों में, चिन्ह हमारे मनों के लिए ऐसे संकेत हैं जो हमारी सोच को इच्छित की हुई वस्तु की ओर निर्देशित करते हैं।

Signsइब्रानी वेद के निर्गमन में दिए हुए फसह का वृतान्त स्पष्ट रूप से यह कहता है कि चिन्ह लोगों के लिए दिया गया था,  न कि सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर के लिए (यद्यपि वह अभी भी लहू की ओर देखगा और यदि वह इसे उन घरों पर देखता है तो उन्हें छोड़ देगा)। किसी भी दिए हुए चिन्ह की तरह, जब हम फसह की ओर देखते हैं तो वह हमारे मनों की सोच से क्या इच्छा रखता है? मेम्ने के बलिदान का उल्लेखनीय समय वही दिन था जिस दिन यीशु का बलिदान हुआ था, इसलिए यह यीशु के बलिदान की ओर एक संकेत करने वाला  होना चाहिए।

यह हमारे मनों में उसी तरह से कार्य करता है जैसा मैंने नीचे दिए आरेख में दिखाया है। चिन्ह वहाँ पर यीशु के बलिदान की ओर संकेत करने के लिए दिया गया था।

फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था
फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था

प्रथम फसह के समय मेम्नों का बलिदान हुआ था और लहू को लगाया गया था ताकि लोग बचाए जा सकें। और इसी प्रकार, यह चिन्ह यीशु की ओर हमें यह बताने के लिए संकेत कर रहा है कि, ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ मृत्यु के लिए बलिदान होने के लिए दिया गया था और उसका लहू बहाया गया ताकि हम जीवन को प्राप्त कर सकें।

हमने अब्राहम के चिन्ह लेख में देखा था जिस स्थान पर अब्राहम की परीक्षा उसके पुत्र को मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर बलिदान देने के द्वारा की गई थी। वहीं पर एक मेम्ने को मरना था ताकि अब्राहम का पुत्र जीवित रह सके। मोरिय्याह पहाड़

अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था
अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था

ठीक वही स्थान था जहाँ पर यीशु का बलिदान हुआ था। यह चिन्ह हमें उस स्थान की ओर संकेत करते हुए उसकी मृत्यु के अर्थ को ‘देखने’ के लिए दिया गया था। फसह में हम एक ओर सूचक कोवर्ष के ठीक उसी दिन  को यीशु के बलिदान की ओर संकेत करता हुआ पाते हैं। एक बार फिर से मेम्ने के बलिदान का उपयोग – यह दिखाने के लिए किया गया है कि यह यीशु के बलिदान की ओर संकेत करती हुई – घटना का एक संयोग मात्र नहीं है। दो भिन्न तरीकों से (स्थान के द्वारा और समय के द्वारा) पवित्र इब्रानी वेदों में दिए हुए दो अति महत्वपूर्ण त्योहार यीशु के बलिदान की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। मैं इतिहास में किसी भी अन्य व्यक्ति के बारे में नहीं सोच सकता हूँ जिसकी मृत्यु की प्रतिछाया इस तरह से नाटकीय तरीके में इस तरह की समानताओं के साथ दी गई हो। क्या आप सोच सकते हैं?

यह चिन्ह इसलिए दिए गए हैं कि हम उस पर आश्वस्त हो सकें कि यीशु का बलिदान वास्वत में परमेश्‍वर की ओर से योजनाबद्ध और ठहराया हुआ था। यह उदाहरण के रूप में दिया हुआ है ताकि हम यह कल्पना कर सकें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें मृत्यु से बचाता है और पाप से शुद्ध करता है –परमेश्‍वर की ओर से उन सभों को दिया हुआ उपहार है जिसे सभी प्राप्त कर सकते हैं।

ऋषि अब्राहम के बलिदान का चिन्ह

हमने देखा कि कैसे अब्राहम को, बहुत पहले, जातियों की प्रतिज्ञा दी गई। यहूदी और अरब के लोग आज अब्राहम से ही निकल कर आए हैं, इस कारण हम जानते हैं कि प्रतिज्ञा सच्ची ठहरी और यह कि वह इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।क्योंकि अब्राहम ने इस प्रतिज्ञा के ऊपर भरोसा किया इसलिए उसे धार्मिकता दी गई –उसने मोक्ष को प्राप्त कर लिया परन्तु किसी कठोर परिश्रम के द्वारा अपितु उसने बस केवल इसे किसी एक मुफ्त उपहार की तरह पा लिया था।

कुछ समय के पश्चात्, अब्राहम ने लम्बे समय से प्रतिक्षा किए जा रहे पुत्र इसहाक (जिसमें से यहूदी अपने पूर्वजों को निकल कर आया हुआ पाते हैं) को प्राप्त कर लिया। इसहाक एक नौजवान पुरूष बन गया। परन्तु तब परमेश्‍वर ने अब्राहम की नाटकीय तरीके से जाँच की। आप इसके पूरे वृतान्त को यहाँ पर पढ़ सकते हैं और तब इस रहस्यमयी जाँच के अर्थों के मुख्य तथ्यों को खोलने के लिए आगे बढ़ सकते हैं – जो हमारी इस बात में सहायता करता है कि कैसे हमारे लिए धार्मिकता को देने के लिए अदा किया जाएगा।

अब्राहम की जाँच

इस जाँच का आरम्भ परमेश्‍वर के द्वारा एक नाटकीय आदेश को दिए जाने के द्वारा होता है:

परमेश्‍वर   ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र – इसहाक को – जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।” (उत्पत्ति 22:2)

अब्राहम, आदेश के आज्ञापालन में ‘अगले सबेरे तड़के’ उठा और ‘तीन दिन की यात्रा’ के पश्चात् वे उस पहाड़ पर पहुँच गए। तब

9जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। 10फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे। (उत्पत्ति 22:9-10)

अब्राहम आदेश की आज्ञापालन किए जाने के लिए तत्पर था। परन्तु तब कुछ उल्लेखनीय घटना घट गई:

11तब यहोवा परमेश्‍वर के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकार के कहा, “हे अब्राहम ! हे अब्राहम!”

उसने कहा, “देख, मैं यहाँ पर हूँ।”

12उसने कहा, “उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उससे कुछ कर; क्योंकि तू ने जो मुझ से अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते को भी नहीं रख छोड़ा; इससे मैं अब जान गया कि तू परमेश्‍वर का भय मानता है।”

13 तब अब्राहम ने आँखें उठाईं, और क्या देखा कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपने सींगों से एक झाड़ी में फँसा हुआ है; अत: अब्राहम ने जा के उस मेढ़े को लिया, और अपने पुत्र के स्थान पर उसे होमबलि करके चढ़ाया। (उत्पत्ति 22:11-13)

अन्तिम क्षणों में इसहाक मृत्यु से बच गया और अब्राहम ने एक नर मेढ़े को देखा और उसकी अपेक्षा उसे बलिदान किया। परमेश्‍वर ने एक मेम्ने का प्रबन्ध किया था और मेम्ने ने इसहाक का स्थान ले लिया।

भविष्य की ओर देखते हुए : बलिदान

अब्राहम तब उस स्थान का नाम रखता है। ध्यान दें कि वह क्या नाम रखता है।

अब्राहम ने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है कि “यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। (उत्पत्ति 22:14)

अब्राहम ने उसका नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा कह कर रखा। यहाँ पर एक प्रश्न है। यह नाम भूत काल, वर्तमान काल या भविष्य काल किस में लिखा हुआ है? क्या यह स्पष्ट रूप से भविष्य काल में है। और आगे आने वाली टिप्पणी और भी अधिक स्पष्ट रूप से दुहराती है “…इसका उपाय किया जाएगा” यह भी भविष्य काल में लिखा हुआ है – इस तरह से यह भी भविष्य की ओर देख रहा है। परन्तु नाम रखने का यह कार्य इसहाक के स्थान पर मेम्ने (एक नर भेड़) के बलिदान के पश्चात्  हुआ है। अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि जब अब्राहम, उस स्थान का नाम रख रहा था, तब वह उस झाड़ी में फँसे हुए और अपने पुत्र के स्थान पर बलिदान किए जाने वाले मेढ़े की ओर संकेत कर रहा था। परन्तु अब तक तो वह पहले ही बलिदान कर दिया गया और जला दिया जा चुका था। यदि अब्राहम मेढ़े के बारे में सोच रहा था – जो पहले से बलिदान कर दिया, मर चुका और जला दिया गया था –तब तो उसने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर ने प्रबन्ध किया है, करके रखा होता, अर्थात् भूत काल वाक्य में। और टिप्पणी ऐसी लिखी गई होती ‘और आज तक भी यह कहा जाता है कि “यहोवा परमेश्‍वर के पहाड़ पर उपाय किया गया था।’” परन्तु अब्राहम ने स्पष्ट रूप से इसे भविष्य काल में लिखा है और इसलिए वह यह नहीं सोच रहा था कि वह पहले से मर चुका है और उसने मेढ़े का बलिदान कर दिया है। वह कुछ भिन्न तरह की बात से आत्म जागृत हुआ था। उसके पास भविष्य के बारे में कुछ आत्मबोध थे।  परन्तु वे क्या थे?

जहाँ पर बलिदान की घटना घटित हुई

उस पहाड़ को स्मरण रखें जहाँ पर अब्राहम को इस बलिदान को चढ़ाने के लिए भेजा गया था:

तब परमेश्‍वर ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा…” (वचन 2)

इस तरह से यह ‘मोरिय्याह’ में घटित हुआ। यह कहाँ पर है? यद्यपि यह अब्राहम के दिनों में (2000 ईसा पूर्व) जंगली क्षेत्र था, परन्तु एक हजार वर्षों (1000 ईसा पूर्व) के पश्चात् राजा दाऊद ने यहाँ पर यरूशलेम नगर की स्थापना की थी और उसके पुत्र सुलैमान ने यहाँ पर पहले मन्दिर का निर्माण किया था। हम इसे बाद में पुराने नियम की ऐतिहासिक पुस्तकों में पढ़ते हैं:

तब सुलैमान ने यरूशलेम में मोरिय्याह नामक पहाड़ पर उसी स्थान में यहोवा परमेश्‍वर का भवन बनाना आरम्भ किया, जिसे उसके पिता दाऊद ने दर्शन पाकर तैयार किया था (2 इतिहास 3:1)

दूसरे शब्दों में, अब्राहम के दिनों में (4000 ईसा पूर्व) ‘मोरिय्याह का पहाड़’ जंगल में एक सुनसान पहाड़ी था परन्तु 1000 वर्षों के पश्चात् दाऊद और सुलैमान के द्वारा यह इस्राएलियों के लिए एक केन्द्रीय नगर बन गया  जहाँ पर उन्होंने सृष्टिकर्ता का मन्दिर का निर्माण किया। और आज के दिन तक भी इसे यहूदी लोगों का एक पवित्र स्थान और इस्राएल की राजधानी माना जाता है।

यीशु – येसू सत्संग – और अब्राहम का बलिदान

अब यीशु की पदवियों के बारे में सोचें। यीशु से सम्बन्धित बहुत सी पदवियाँ हैं। कदाचित् सबसे अधिक जानी-पहचानी पदवी ‘मसीह’ की है।परन्तु उसे एक अन्य पदवी भी दी गई है जो कि अति महत्वपूर्ण है। हम इसे यूहन्ना के सुसमाचार में देखते हैं जहाँ पर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला उसके विषय में ऐसा कहता है:

दूसरे दिन उसने (अर्थात् यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला) यीशु (अर्थात् येसू सत्संगी) को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत के पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था।’” (यूहन्ना 1:29-30)

दूसरे शब्दों में, यीशु को परमेश्‍वर का मेम्ना  के रूप में जाना जाता था। अब यीशु के जीवन के अन्त के ऊपर ध्यान दें। उसे कहाँ पर पकड़ा और क्रूसित किया गया? यह यरूशलेम में हुआ था (जिसे हमने =‘मोरिय्याह पहाड़’ के रूप में ऐसे देखा है)। इसे बिल्कुल ही स्पष्ट शब्दों में उसके पकड़े जाने के समय पर कहा गया है:

और [पिलातुस] यह जानकर कि वह हेरोदेस की रियासत का है, उसे हेरोदेस के पास भेज दिया, क्योंकि उन दिनों में वह भी यरूशलेम में था। (लूका 23:7)

यीशु का पकड़ा जाना, उसकी जाँच और क्रूसीकरण यरूशलेम (=मोरिय्याह पहाड़) में घटित हुए। नीचे दी गई समयरेखा उन घटनाओं को दर्शाती है जो मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई।

मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ
मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ

 

 

आइए अब पुन: अब्राहम के बारे में सोचें। क्यों उसने उस स्थान का नाम भविष्य काल के वाक्य ‘यहोवा परमेश्‍वर उपाय करेगा’ से रखा? कैसे वह यह जान सकता है कि भविष्य में किसी ऐसी बात का ‘प्रबन्ध’ किया जाएगा जो अत्यधिक निकटता से वैसे ही घटित होगी जैसा कि उसने मोरिय्याह पहाड़ पर किया था? इसके बारे में सोचें– उसकी परीक्षा में इसहाक (उसका पुत्र) अन्तिम क्षणों में मृत्यु से बचा लिया गया था क्योंकि एक मेम्ना उसके स्थान पर बलिदान हो गया था। दो हजार वर्षों पश्चात्, यीशु को ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ कह कर पुकारा गया है और उसे उसी स्थान  के ऊपर बलिदान किया गया! कैसे अब्राहम यह जान पाया कि यही ‘वह स्थान’ होगा? वह केवल इसे इस तरह से ही जान सकता था और कुछ घटित होने वाला था, की भविष्यद्वाणी कर सकता था जो कि उल्लेखनीय हो जब उसे स्वयं सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर, प्रजापति की ओर से आत्मजागृति प्राप्त न हुई हो।

ईश्‍वरीय  मन प्रकाशित हुआ है

यह ऐसा है मानो कि वहाँ पर ऐसा मन था जिसने इन दोनों घटनाओं को अपने स्थान के कारण आपस में सम्बद्ध कर दिया है यद्यपि यह दोनों इतिहास के 2000 वर्षों में एक दूसरे से पृथक हैं।

अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।
अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।

 

 

 

 

 

 

उपरोक्त चित्र यह दर्शाता है कि कैसे पहले की घटना (अब्राहम का बलिदान) बाद की घटना (यीशु के बलिदान) की ओर संकेत करती है और इसकी रचना हमें इस बाद वाली घटना को स्मरण दिलाने के लिए की गई थी। यह प्रमाणित करता है कि यह मन (सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर  ) हम पर स्वयं को हजारों वर्षों में घटित हुई पृथक घटनाओं को संयोजित करते हुए प्रकाशित कर रहा है। यह एक चिन्ह है जिसे परमेश्‍वर ने अब्राहम के द्वारा बोला।

आपके और मेरे लिए शुभ सन्देश

यह वृतान्त हमारे लिए और अधिक व्यक्तिगत् कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। सार में यह कहना, कि परमेश्‍वर   ने अब्राहम के लिए यह घोषणा की:

“…और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी : क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है” (उत्पत्ति 22:18)

क्या आप इस ‘पृथ्वी की सभी जातियों’ में एक से सम्बन्धित नहीं हैं – यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि आप चाहे किसी भी भाषा, धर्म, शिक्षा, उम्र, लिंग या सम्पन्नता से क्यों न सम्बद्ध हों? अब यह एक ऐसी प्रतिज्ञा है जिसे विशेष रूप से आपको दिया गया है! और ध्यान दें यह प्रतिज्ञा क्या है – यह स्वयं परमेश्‍वर की ओर से एक ‘आशीष’ है! यह केवल यहुदियों के लिए नहीं है, अपितु इस संसार के सभी लोगों के लिए है।

यह ‘आशीष’ कैसे दी गई है? शब्द ‘वंश’ यहाँ पर एकवचन  है। यह कई सन्तानों या लोगों में ‘वंशों’ के रूप में नहीं दिया गया है, परन्तु यह एकवचन में दिया गया है जैसे यह ‘वह’ में होता है। यह कई लोगों या लोगों के समूह के द्वारा नहीं है जैसा कि ‘वे’ में होता है। यह इतिहास के आरम्भ में दी हुई प्रतिज्ञा के अक्षरश:समान्तर है, जब ‘वह’ इब्रानी वेदों में वर्णित सर्प की ‘ऐड़ी को डसेगा’ और साथ ही पुरूषासूक्ता में दिए हुए (‘वह’ अर्थात्) पुरूषा के बलिदान की प्रतिज्ञा के सामान्तर भी है। इस चिन्ह के साथ वही स्थान– अर्थात् मोरिय्याह पहाड़ (=यरूशलेम) – की भविषद्वाणी इन प्राचीन प्रतिज्ञाओं का और अधिक विस्तार देते हुए की गई है। अब्राहम के बलिदान के नाटक का वर्णन हमें यह समझने में सहायता करता है कि कैसे इस आशीष को दिया गया है, और कैसे धार्मिकता की कीमत को अदा किया जाएगा।

परमेश्‍वर की आशीष को कैसे प्राप्त किया जाता है?

ठीक वैसे ही जैसे एक मेढ़े ने इसहाक को मृत्यु से उसके स्थान पर बलिदान होते हुए बचा लिया, ठीक वैसे ही परमेश्‍वर का मेम्ना, अपनी बलिदानात्मक मृत्यु के द्वारा, हमें मृत्यु की सामर्थ्य और इसके जुर्माने से बचाता है। बाइबल यह घोषणा करती है

…पाप की मजदूरी तो मृत्यु है (रोमियों 6:23)

यह एक और तरीका है जिसके द्वारा यह कहा जाता है कि जिन पापों को हम करते हैं वह ऐसे कर्मों को उत्पन्न करते हैं जिनका परिणाम मृत्यु है। परन्तु मृत्यु को मेम्ने ने इसहाक के स्थान पर बलिदान होते हुए अदा कर दिया। अब्राहम और इसहाक को तो बस स्वीकार करना था। वह इसके योग्य नहीं था और न ही हो सकता था। परन्तु वह इसे एक उपहार के रूप में स्वीकार कर सकता था। यही वास्तव में वह बात है कि उसने कैसे मोक्ष को प्राप्तकिया।

यह हमें उस पद्धति को दिखाती है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। यीशु ‘परमेश्‍वर का मेम्ना था जो जगत के पापों को उठा ले जाता है’। इसमें आपके स्वयं के पाप भी सम्मिलित हैं। इस तरह से यीशु, जो मेम्ना है, आपके पापों को उठा ले जाने का प्रस्ताव देता है क्योंकि उसने कीमत को अदा कर दिया है। आप इसके योग्य नहीं हैं परन्तु आप इसे उपहार के रूप में पा सकते हैं। यीशु से प्रार्थना कीजिए,जो पुरूषा है, और उससे कहें कि वह आपके पापों को अपने ऊपर ले ले। उसका बलिदान उसके इस सामर्थ्य को प्रदान करता है। हम इसे इसलिए जानते हैं क्योंकि यह संयोग से मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर अब्राहम के द्वारा बलिदान किए हुए उल्लेखनीय वृतान्त की प्रतिछाया था, ठीक उसी स्थान की जहाँ 2000 वर्षों पश्चात् इसका ‘प्रबन्ध यीशु के द्वारा’ किया गया था।

मोक्ष प्राप्ति के लिए अब्राहम का साधारण तरीका

जब मैं इस लेख को आज लिख रहा हूँ तब इस समय संसार का ध्यान फीफा विश्‍व कप की ओर केन्द्रित है।जबकि इसके कई प्रशंसक इसमें खोए हुए हैं परन्तु फिर भी बाकी बचे हुए संसार का ध्यान थाईलैंड और यूक्रेन की अशान्ति और दंगों के ऊपर केन्द्रित है। इसके साथ सीरिया में चल रहा गृह युद्ध भी है जो कि उग्र होता जा रहा है। और साथ ही यह यह भी कि…नेल्सन मंडेला का निधन हो गया है।

परन्तु कदाचित् जिस समय आप इस लेख को पढ़ रहे होंगे ये घटनाएँ लगभग भूला दी गई होंगी। जिस बात के ऊपर आज संसार बहुत अधिक ध्यान देता है उन्हें शीघ्र ही भूला दिया जाता है क्योंकि हम अन्य तरह के मनोरंजन, खेल की प्रतियोगताएँ या राजनीतिक संकटों की ओर आगे बढ जाते हैं। आगे की ओर का ध्यान एक दिन शीघ्र ही बीती हुई बातों का इतिहास बन जाता है।

हमने हमारे पिछले लेख में देखा की यही कुछ अब्राहम के समय प्राचीन समय में सत्य था। 4000 वर्षों पहले रहने वाले लोगों के लिए जो बातें महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रतियोगताएँ, उपलब्धियाँ और गप्पबाजियाँ की थी वह आज पूर्णतया भूला दी गई हैं, परन्तु एक गंभीर प्रतिज्ञा बड़ी शान्ति के साथ एक व्यक्ति के साथ बान्धी गई थी, यद्यपि इसे उस समय के सारे संसार के द्वारा अनदेखा कर दिया गया था, यह आज हमारी आँखों के सामने वृद्धि कर रही और खुलती जा रही है। मैंने स्पष्ट, परन्तु अक्सर अनदेखे तथ्य की ओर संकेत किया है, कि 4000 वर्षों पहले अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा यथार्थ,ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है। यह हमें इसे स्वीकार करने के लिए कारण बननी चाहिए कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा इस ओर संकेत करती है कि बाइबल (वेद पुस्तक)में प्रकाशित परमेश्‍वर धर्मी है और वह अपनी प्रतिज्ञा के पूरे होने की ओर कार्य कर रहा है। यह कोई केवल एक कथा या कोई संक्षेप रूपक मात्र नहीं है।

अब्राहम का वृतान्त इस प्रतिज्ञा करने वाले-परमेश्‍वर के साथ दो और मुख्य बातों का सामना या मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ता है। अब्राहम (और जैसा कि हम उसकी यात्रा का अनुसरण करते हैं) और अधिक शिक्षा को पाता है – यहाँ तक कि इस बात की पराकाष्ठा को देखने के लिए यह प्रतिज्ञा इतिहास के झरोखे से मोक्ष की प्राप्ति की ओर, परन्तु जैसे हम अपेक्षा करते हैं वैसे नहीं अपितु एक बहुत ही भिन्न तरीके – एक साधारण से तरीके – से आगे बढ़ें। अब्राहम की कहानी आज के खेलों की घटनाओं के जैसे शीघ्र से भूला दी जानी वाली नहीं है; यह एक न ध्यान दिए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा सनातनकाल की प्राप्ति की समझ को पाने के लिए नींव को रखना है, इसलिए हमें इसके ऊपर ध्यान देने के लिए बुद्धिमान होना चाहिए।

अब्राहम की शिकायत

अब्राहम के जीवन में उत्पत्ति 12 में वर्णित प्रतिज्ञा को बोले हुए बहुत अधिक वर्ष बीत चुके थे। अब्राहम कनान (प्रतिज्ञात् भूमि) की ओर इस प्रतिज्ञा की आज्ञाकारिता के प्रति बढ़ चुका था जो आज के समय का इस्राएल है। अन्य कई घटनाएँ उसकी जीवन में घटित हुईं उसे छोड़कर जिसे वह बहुत अधिक चाहता था – जो उसके द्वारा एक पुत्र के उत्पन्न होने की थी जिसके द्वारा यह प्रतिज्ञा पूरी होगी। इसलिए हम इस वृतान्त के अध्ययन को अब्राहम की शिकायत के साथ आरम्भ करते हैं:

इन बातों के पश्चात् यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुँचा :

“हे अब्राम, मत डर।

तेरी ढाल और

तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल मैं हूँ।”

अब्राम ने कहा, “हे प्रभु यहोवा, मैं तो निर्वंश हूँ, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्कवासी एलीएजेर होगा, अत: तू मुझे क्या देगा?” और अब्राम ने कहा, “मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूँ कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा।” (उत्पत्ति 15:1-3)

परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा

अब्राहम उस भूमि में तम्बुओं में इस प्रतिज्ञा के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था कि वह एक ‘बड़ी जाति’ को आरम्भ करे जिसकी उसे प्रतिज्ञा दी गई थी। परन्तु अभी तक कुछ भी नहीं हुआ था और इस समय वह लगभग 85 वर्षों का हो गया था। उसने शिकायत की कि परमेश्‍वर उसको दी हुई प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर रहा था। उसका वार्तालाप इस तरह से आगे बढ़ता है:

तब यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन उसके पास पहुँचा: “यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा।” और उसने उसको बाहर ले जा कर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन – क्या तू उनको गिन सकता है?” फिर उसने उससे कहा, “तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (उत्पत्ति 15:4-6)

अपने वार्तालाप में परमेश्‍वर ने अपनी प्रतिज्ञा को यह घोषणा करते हुए नवीकृत किया कि अब्राहम का स्वयं एक पुत्र होगा जो इतने लोगों में परिवर्तित हो जाएगा कि उनकी गिनती आकाश के तारों के जैसे होगी – निश्चित ही बहुत अधिक, परन्तु उनकी गिनती करना कठिन है।

अब्राहम का प्रतिउत्तर : पूजा की तरह स्थाई प्रभाव

अब फिर से गेंद अब्राहम के पाले में थी। वह कैसे इस नवीकृत की हुई प्रतिज्ञा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?जो कुछ इसके पश्चात् आता है वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण वाक्यों में से एक है (क्योंकि इस वाक्य को बाद में बहुत बार उद्धृत किया गया है)। यह एक अटल सत्य को समझने की नींव को रखता है। यह कहता है:

उसने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

कदाचित् इस वाक्य को समझना और भी अधिक आसान है यदि हम इसके सर्वनामों को नामों में परिवर्तित करने दें, तो इस तरह से यह ऐसे पढ़ा जाएगा:

अब्राम ने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को अब्राम के लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

यह एक छोटा सा और अप्रत्यक्ष वाक्य है। यह बिना किसी समाचार के धूमधाम के साथ आते हुए शीर्षक के साथ आता है और चला जाता है और इसलिए हमारे लिए इसे खो देना युक्तिसंगत होगा। परन्तु यह वास्तव में महत्वपूर्ण है – और इसमें सनातनकाल के बीज निहित हैं। क्यों? क्योंकि इस छोटे से वाक्य में अब्राहम धार्मिकता को प्राप्त कर लेता है। यह पूजा के पुण्यों को प्राप्त करने जैसा है जो कभी भी कम न होंगे न ही कभी खोए जाएंगे। धार्मिकता ही केवल एक – और केवल एक ऐसा – गुण है जिसकी आवश्यकता हमें परमेश्‍वर के सामने खराई से खड़े होने के लिए है।

हमारी समस्या : भ्रष्टता की समीक्षा

परमेश्‍वर के दृष्टिकोण से, यद्यपि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में निर्मित हुए थे परन्तु कुछ ऐसा घटित हो गया जिसने इस स्वरूप को भ्रष्ट कर दिया। अब न्याय यह दिया गया है

परमेश्‍वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है कि देखे कि कोई बुद्धमान, कोई परमेश्‍वर का खोजी है या नहीं। वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं। (भजन संहिता 14:2-3)

इस भ्रष्टता को हम सहजबोध ही महसूस करते हैं। इसलिए ही हम ऐसे त्योहारों, जैसे कि कुम्भ मेले का त्योहार, जिस में इतनी अच्छी तरह से भाग लेते हैं क्योंकि हमें हमारे पापों और इनकी सफाई किए जाने का बोध होता है। प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र भी इसी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है जो हमारे स्वयं के बारे में है:

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

हमारी भ्रष्टता का अन्तिम परिणाम यह है कि हम स्वयं को एक धर्मी परमेश्‍वर से अलग किया हुआ पाते हैं क्योंकि हमारे स्वयं में किसी तरह की कोई भी धार्मिकता नहीं है। हमारी भ्रष्टता हमारे नकारात्मक कर्मों के वृद्धि करने में दिखाई देती है – जिसकी सचेतता व्यर्थता और मृत्यु के फल की कटाई में है। यदि आपको सन्देह है तो समाचार के मुख्य अंशों को देख लें और देखें पिछले 24 घण्टे में लोगों के साथ क्या कुछ हुआ है। हम जीवन के निर्माता से पृथक हो चुके हैं और इसलिए वेद पुस्तक (बाइबल) में ऋषि यशायाह के दिए हुए शब्द सत्य प्रमाणित हुए हैं

हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है। (यशायाह 64:8, 750 ईसा पूर्व लिखा गया)

अब्राहम और धार्मिकता

परन्तु यहाँ पर अब्राहम और परमेश्‍वर के वार्तालाप में हम पाते हैं, कि यह घोषणा कि अब्राहम ने उस तरह की धार्मिकताको प्राप्त किया है – जैसी परमेश्‍वर अपेक्षा करता था, को बड़े ही शान्त तरीके से छोड़ दिया गया है, जिसे हम लगभग पकड़ ही नहीं पाते हैं। इस कारण अब अब्राहम ने इस धार्मिकता को प्राप्त करने के लिए क्या किया? एक बार फिर, हम इतने अधिक पृथक हैं कि हम मुख्य बात को खो देने के खतरे में हैं, यह अब्राहम के लिए साधारण रुप से यह इस बात को कहता है कि उसने विश्‍वास किया। बस केवल इतना ही?! हम भ्रष्ट होने के कारण बहुत अधिक दुर्गम समस्या में पड़ गए हैं और इसलिए युगों से हमारा प्राकृतिक झुकाव जटिल और कठिन धर्मों, प्रयासों, पूजाओं, नैतिकताओं, तपस्वी कर्म काण्डों, शिक्षाओं आदि की ओर – धार्मिकता को पाने के लिए देखने लगा है। परन्तु इस व्यक्ति अब्राहम ने मात्र ‘विश्‍वास’ करने के द्वारा धार्मिकता के पुरस्कार को प्राप्त कर लिया था। यह इतना आसान है कि हम इसे लगभग गवाँ देते हैं।

अब्राहम ने धार्मिकता को ‘कमाया’ नहीं था; यह उसके लेखे में ‘गिनी’ गई थी। इसमें क्या भिन्नता है? ठीक है, यदि आपने कुछ कार्य किया है – तो आपने इसे मेहनत से ‘कमाया’ है – आप इसे पाने के योग्य हैं। यह ऐसा है कि आपके द्वारा किए हुए कार्य की मजदूरी को प्राप्त करना है। परन्तु जब कोई बात आपके लेखे में गिनी जाती है, तो यह आपको दे दी जाती है। जैसे कि कोई  मुफ्त में दिया जाने वाला उपहार कमाया नहीं जाता, न ही आप इसके योग्य होते हैं, परन्तु आप तो इसे बस यों ही पा लेते हैं।

अब्राहम का यह वृतान्त पाए जाने वाली प्रचलित समझ को जो हमारी धार्मिकता के बारे में है को उलट देता है चाहे वह इस सोच के साथ हो जो परमेश्‍वर के अस्तित्व में होने की मान्यता के साथ आती है, या फिर उस धार्मिकता के साथ जिसे हम पर्याप्त मात्रा में की जाने वाली भली या धार्मिक गतिविधियों के द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। उसने तो बस उस प्रतिज्ञा में ही विश्‍वास किया जो उस तक विस्तारित की गई थी और वह उसके लेखे में गिनी गई, या उसे इसके लिए धार्मिकता दे दी गई।

बाकी की बाइबल इस मुठभेड़ को हमारे लिए एक चिन्ह के रूप में उपयोग करती है। परमेश्‍वर की ओर से दी गई प्रतिज्ञा में अब्राहम का विश्‍वास, और धार्मिकता का उसके लेखे में गिना जाना, हमें एक पद्धति  दी गई है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। सम्पूर्ण सुसमाचार प्रतिज्ञाओं के ऊपर आधारित है जिसे परमेश्‍वर हम में से सभों को और प्रत्येक को देता है परन्तु अब कौन धार्मिकता के लिए अदा करता या इसे कमाता है? हम इस विषय को हमारे अगले लेख में देखेंगे।

 

अब्राहम की आशीष के द्वारा : ज्ञानोदय के लिए उद्धार की योजना

हमने हमारे पिछले लेखमें यह देखा कि मनुष्य ने सृष्टिकर्ता प्रजापति की आराधना को तारों और ग्रहों की आराधना करते हुए दूषित कर दिया था। इस कारण प्रजापति ने मनु/नूह के तीन पुत्रों (जो जल प्रलय से बच गए थे) के वंशजों को उनकी भाषाओं के द्वारा अलग करते हुए पूरी पृथ्वी में बिखरा दिया था। इसलिये ही आज बहुत सी जातियाँ भाषा के कारण एक दूसरे से भिन्न हैं। मनुष्य के बीते हुए इतिहास की गूँज को 7-दिनों के पंचागों में देखा जा सकता है जिसे आज पूरे संसार में और उस बड़े जल-प्रलय की स्मृति को भिन्न रूपों में स्मरण रखने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रजापति ने इतिहास के आरम्भ में ही प्रतिज्ञा कर दी थी कि एक सिद्ध व्यक्ति के बलिदान के द्वारा ‘विद्वान लोग अमरत्व को प्राप्त करेंगे’। यह बलिदान एक पूर्णता के रूप में कार्य करेगा जो हमें मात्र हमारे बाहरी तौर से शुद्ध करने की अपेक्षा आन्तरिक रूप से शुद्ध करेगा। तथापि, सृष्टिकर्ता की दूषित हो गई आराधना के साथ, बिखरी हुई ये नई स्थापित जातियाँ इस आरम्भिक प्रतिज्ञा को भूल गईं। इसे केवल आज के समय कुछ ही स्रोतों के माध्यम से स्मरण किया जाता है जिसमें प्राचीन ऋग्वेद और वेद पुस्तक – बाइबल सम्मिलित है।

इस तरह से प्रजापति ने एक योजना को बनाया। यह योजना कुछ ऐसी नहीं थी जिसकी मैं और आप यह अपेक्षा करते क्योंकि यह (हमें) बहुत ही छोटी और वस्तुओं को परिवर्तित करने के लिए अमहत्वपूर्ण जान पड़ सकती है। परन्तु यही वह योजना थी जिसका उसने चुनाव किया। इस योजना में लगभग 2000 ईसा पूर्व (अर्थात् 4000 वर्षों पहले) एक व्यक्ति की बुलाहट और उसका परिवार और उसको और उसके वंशजों को आशीष देने की प्रतिज्ञा यदि वह उस आशीष को प्राप्त करना चुनता है, सम्मिलित है। यहाँ नीचे बताया गया है कि कैसे बाइबल इस वृतान्त का वर्णन करती है।

अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा

यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।

मैं तुझसे एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम बड़ा करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।”

4 यहोवा परमेश्‍वर के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था। 5 इस प्रकार अब्राम अपनी पत्नी सारै, और अपने भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया था, और जो प्राणी उन्होंने

हारान में प्राप्त किए थे, सबको लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ गए…7 तब यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, “यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा।”और उसने वहाँ यहोवा परमेश्‍वर के लिये जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई।

हम में बहुत से लोग आज उलझन में रहते हैं कि क्या कोई ऐसा व्यक्तिगत् परमेश्‍वर है जो हमारी इतनी चिन्ता करता है कि सीधे ही हमारे परेशान जीवनों में आशा देने के लिए हस्तक्षेप करता हो। इस वृतान्त के माध्यम से हम इस विचार की जाँच कर सकते हैं क्योंकि इसमें एक व्यक्तिगत् प्रतिज्ञा एक विशेष व्यक्ति के साथ बान्धी गई है, जिसके भागों को हम सत्यापित कर सकते हैं। यह वृतान्त वर्णित करता है कि यहोवा परमेश्‍वर ने सीधे ही अब्राहम के साथ प्रतिज्ञा की कि ‘मैं तेरे नाम को महान् करूँगा’। हम 21वीं सदी में – 4000 वर्षों के पश्चात् रहते हैं – और अब्राम/अब्राहम का नाम विश्वव्यापी रूप से इतिहास के नामों में सबसे अधिक पहचान रखता है। यह प्रतिज्ञा शाब्दिक, ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है।

बाइबल की सबसे प्राचीन विद्यमान प्रति मृतक सागर के कुण्डल पत्र हैं जो 200-100 ईसा पूर्व में लिखी गई थीं। जिसका अर्थ है कि इस प्रतिज्ञा को लिखित स्वरूप, लेखनकाल के सबसे आरम्भिक समय में ही दे दिया गया था। परन्तु यहाँ तक कि 200 ईसा पूर्व भी अब्राहम नामक व्यक्ति और उसका नाम केवल अल्पसंख्यक समूह यहूदी को छोड़कर बहुत अधिक-प्रसिद्ध नहीं था। इसलिए हम यह पुष्टि कर सकते हैं कि उसकी पूर्णता केवल तब आई जब इसे नवीनतम समयों में लिखा गया। एक प्रतिज्ञा की “पूर्णता” के घटित होने के पश्चात् इसे लिखा जाना इस घटना में नहीं हुआ है।

…उसकी महान् जाति के कारणों से

जो बात समान रूप से आश्चर्यचकित करती है वह यह है कि अब्राहम ने वास्तव में कोई उल्लेखनीय कार्य अपने जीवन में कभी नहीं किया था – ऐसा कोई कार्य जो सामान्यतया एक व्यक्ति को ‘महान्’ बनाता हो। उसने ऐसा कुछ असाधारण लेखनकार्य नहीं लिखा (जैसे व्यास ने महाभारत को लिख कर किया है), उसने कोई ध्यान देने वाले भवन का निर्माण भी नहीं किया (जैसे शाहजहाँ ने ताज महल को निर्मित करके किया है), उसने किसी ऐसी प्रभावशाली सैन्य कौशल से पूर्ण सेना का नेतृत्व भी नहीं किया (जैसा अर्जुन ने भगवद् गीता में किया है), न ही उसने राजनैतिक रूप से कोई नेतृत्व प्रदान किया है (जैसे महात्मा गाँधी ने किया है)। उसने तो यहाँ तक एक राजा के रूप में किसी राज्य का शासन भी नहीं किया है। उसने वास्तव में जंगल में तम्बू गाड़ने और प्रार्थना करने को छोड़कर और तब एक पुत्र को जन्म देने के सिवाय और कुछ नहीं किया है।

यदि आप उसके दिनों में होते हुए यह भविष्यद्वाणी करते कि कौन हज़ारों वर्षों के पश्चात् सबसे अधिक स्मरण किया जाएगा, तो आप उस समय के राजाओं, सेनापतियों, योद्धाओं, या दरबार के कवियों के ऊपर शर्त लगा सकते थे कि यही इतिहास को महान् बनाएंगे। परन्तु उन सभी के नामों को भूला दिया गया है – परन्तु एक व्यक्ति जो बड़ी कठिनाई से जंगल में अपने परिवार का पालन पोषण करने की कोशिश करता रहा को पूरे संसार में स्मरण किया जाता है। उसका नाम इसलिए महान है क्योंकि वे जातियाँ जो उसमें से निकल कर आईं ने उसके वृतान्त को स्मरण रखा है – और तब लोग और जातियाँ जो उसमें से निकल आईं महान् बन गईं। यही अक्षरश: वैसे ही है जैसे बहुत पहले प्रतिज्ञा की गई थी (“मैं तुझ में एक बड़ी जाति बनाऊँगा…मैं तेरा नाम महान् करूँगा”)। मैं सोचता हूँ कि कोई भी अभी तक के इतिहास में इतना अधिक प्रसिद्ध नहीं हुआ है केवल इसलिए कि उसके वंशज् के लोग उसमें से निकल कर आए हैं इसकी अपेक्षा की उसने अपने जीवन में बड़े बड़े कार्यों को प्राप्त किया है।

…प्रतिज्ञा-करने वाले की इच्छा के माध्यम से

और आज जो लोग अब्राहम के वंश के हैं – यहूदी – कभी वास्तव में एक जाति के रूप में नहीं थे जिसे हम विशेष रूप से बड़ी महानता के साथ सम्बद्ध करते हैं। उन्होंने कभी भी मिस्र के पिरामिडों – और निश्चित रूप से ताज महल की तरह बड़ी बड़ी महान् वास्तुशिल्प निर्माणों को नहीं किया, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह दर्शन शास्त्रों को लिखा, या ब्रिटिश लोगों की तरह दूरस्थ क्षेत्रों के प्रशासन का भी प्रबन्ध नहीं किया। इन सभी जातियों ने यह सभी कार्य स्वयं को विश्व-शक्ति के साम्राज्यों के संदर्भ में स्थापित करते हुए किए जिसने उनकी सीमाओं को व्यापक असाधारण सैन्य-शक्ति के कारण बहुत दूर तक विस्तारित कर दिया था – ऐसा कभी भी यहूदियों ने नहीं किया। यहूदी लोगों की महानता अधिकत्तर व्यवस्था और धर्म पुस्तक (वेद पुस्तक या बाइबल)के कारण हैं, जिसे उन्होंने कुछ उल्लेखनीय लोगों के द्वारा जन्म दिया; जो उनकी जाति में से निकल कर आए थे; और यह कि वे इन हज़ारों वर्षों में एक भिन्न और कुछ सीमा तक विशेष लोगों के समूह के रूप में बने रहे। उनकी महानता इसलिए नहीं कि उन्होंने वास्तव में कुछ विशेष किया है, अपितु इसकी अपेक्षा जो कुछ उनके साथ किया गया और जो कुछ उनके माध्यम से किया गया था।

अब आइए उस कारण को देखें जो इस प्रतिज्ञा को आगे ले कर चलता है। वहाँ पर, पूर्णतः स्पष्ट रीति से, यह निरन्तर कहता है कि, “मैं करूँगा…।” वह विशेष तरीका जिसमें उनकी महानता इतिहास में कार्य करती है एक बार फिर से इस उदघोषणा का ऐसा उल्लेखनीय तरीका है कि यह सृष्टिकर्ता है जो इसे पूर्ण करेगा न कि इस ‘महान् जाति’ की कुछ अन्तर्निहित योग्यताएँ, विजय या सामर्थ्य। ध्यान योग्य बात यह है कि आज के संसार में संचार माध्यम अपने बहुत अधिक ध्यान को इस्राएल, आधुनिक यहूदी जाति की घटनाओं के ऊपर देता है। क्या आप निरन्तर हंगरी, नार्वे, पापुआ न्यू गिनी, बोलीविया या मध्य अफ्रीकी गणराज्य जैसे देशों के समाचारों को सुनते हैं –जो कि सभी संसार में एक ही आकार के देश हैं? परन्तु इस्राएल, एक 60 लाख लोगों को छोटा सा देश, निरन्तर और नियमित रूप से समाचार में बना रहता है।

इतिहास में या मानवीय घटनाओं में ऐसा कुछ भी अन्तर्निहित नहीं है जो इस प्राचीन प्रतिज्ञा को ठीक वैसे ही खोल कर रखने का कारण बने जैसा कि इसे इस प्राचीन व्यक्ति के साथ घोषित किया गया था, क्योंकि उसने इस प्रतिज्ञा में विश्‍वास करते हुए विशेष पथ पर चलने को चुना था। उन सम्भावनाओं को सोचे जिसमें यह प्रतिज्ञा कुछ तरीकों से असफल हो सकती थी। परन्तु इसकी अपेक्षा यह खुलती चली गई और निरन्तर खुलती चली जा रही है, मानो कि इसे उन हज़ारों वर्षों पहले उदघोषित किया गया था। वास्तव में यह विषय बहुत ही मजबूत है क्योंकि यह पूर्ण रूप से प्रतिज्ञा-करने वाले की सामर्थ्य और अधिकार के ऊपर आधारित है कि जिससे यह पूर्ण हुआ है।

वह पथ जो अभी भी संसार को हिलाता है

This map shows the route of Abraham's Journey
यह नक्शा अब्राहम की यात्रा के मार्ग को दर्शाता है

बाइबल वर्णित करती है, “यहोवा के वचन के अनुसार अब्राम चला” (वचन 4)। उसने एक मार्ग को चुन लिया, जिसे नक्शे में दर्शाया गया है जो अभी भी इतिहास को बना रहा है।

हमारे लिए आशीष

परन्तु यह यहीं समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि इस प्रतिज्ञा के साथ और भी कुछ दिया हुआ है। आशीष केवल अब्राहम ही के लिए नहीं दी गई थी क्योंकि इसमें यह भी कहा गया है

“और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (वचन 4)।

इस पर मुझे और आपको ध्यान देना चाहिए। चाहे हम आर्य, द्रविड़, तमिल, नेपाली या किसी भी जाति के क्यों न हों; चाहे हमारी जाति कोई भी क्यों न हो; चाहे हमारा धर्म कोई भी क्यों न हो, अर्थात् चाहे हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिख या ईसाई; चाहे हम अमीर या गरीब, बीमार या स्वस्थ, पढ़े लिखे या अनपढ़ ही क्यों न हों–‘भूमण्डल के सारे कुल’ इसमें आप को और साथ ही मुझे भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस प्रतिज्ञा का कार्यक्षेत्र तब से लेकर अब आज तक दिन तक प्रत्येक जीवित व्यक्ति को आशीष के लिए सम्मिलित किया जाना है – इसका अर्थ है आप भी इसमें सम्मिलित हैं? कब? किस तरह की आशिष? इसे यहाँ पर स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है परन्तु यह कुछ ऐसी बातों को जन्म देता है जो आपके साथ मुझे भी प्रभावित करता है।

हमने अभी अभी ऐतिहासिक और शाब्दिक रूप से यह पुष्टि की है कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा का प्रथम भाग सत्य हो गया है। तब हमारे पास क्या एक अच्छा कारण नहीं है कि हम प्रतिज्ञा के उस भाग के ऊपर उसके सत्य होने के लिए भी विश्‍वास करें जो आपके और मेरे लिए दिया गया है? क्योंकि यह प्रतिज्ञा सत्य रूप से विश्वव्यापी और अपरिवर्तनशील है। परन्तु हमें इस प्रतिज्ञा के सत्य को समझने के लिए – इसे खोलने की आवश्यकता है। हमें ज्ञानोदय की आवश्यकता है ताकि हम यह समझ सकें कि कैसे यह प्रतिज्ञा हमें “छू” सकती है। और हम इस ज्ञान को अब्राहम की यात्रा का अनुसरण करते हुए पाते हैं। मोक्ष वह कुँजी है, जिसकी प्राप्ति के ऊपर बहुत से लोग बहुत अधिक कठिन मेहनत करते हुए कार्य कर रहे हैं, हम पर प्रकाशित किया गया है जब हम निरन्तर इस विलक्षण व्यक्ति के वृतान्त का अनुसरण करते हैं।