“राज्यपाल की तरह : यीशु मसीह के नाम में ‘मसीह’ का क्या अर्थ है?”

मैं कई बार लोगों से पूछता हूँ, कि यीशु का अन्तिम नाम क्या था। अक्सर वे उत्तर देते हैं,

“मैं सोचता हूँ, कि उसका अन्तिम नाम ‘मसीह’ था, परन्तु मैं इसके प्रति निश्चित नहीं हूँ।”

तब मैं पूछता हूँ,

“यदि यह सत्य है तो जब यीशु एक लड़का ही था तब क्या यूसुफ मसीह और मरियम मसीह छोटे यीशु मसीह को अपने साथ बाजार ले जाते थे?”

इसे इस तरह  से कहें, उन्होंने जान लिया था, कि यीशु का अन्तिम नाम ‘मसीह’ नहीं था। इस तरह से, अब ‘मसीह’ क्या है? यह कहाँ से आया है? इसका क्या अर्थ है? कइयों के लिए आश्चर्य की बात है, कि ‘मसीह’ एक ऐसी पदवी है, जिसका अर्थ ‘शासक’ या ‘शासन’ से है। यह पदवी उस राज की तरह नहीं है, जैसी कि ब्रिटिश राज में पाई जाती है, जिसने दक्षिण एशिया में कई दशकों तक राज किया था।

भाषान्तरण बनाम लिप्यन्तरण

इसे देखने के लिए, हमें सबसे पहले अनुवाद अर्थात् भाषान्तरण के कुछ सिद्धान्तों को देखना होगा। अनुवादक कभी कभी विशेष रूप से नाम और शीर्षक के लिए, अर्थ की अपेक्षा उसी तरह की ध्वनि  वाले शब्दों को भाषान्तरण के  लिए चुन लेते हैं। इसे लिप्यन्तरण  के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए, कुम्भ मेला हिन्दी के कुम्भ मेला का अंग्रेजी लिप्यन्तरण है। यद्यपि शब्द मेला का अर्थ ‘प्रदर्शनी’ या ‘त्योहार’ से है, परन्तु इसे अक्सर अंग्रेजी में समान ध्वनि वाले शब्द अर्थात् कुम्भ प्रदर्शनी की अपेक्षा कुम्भ मेला के रूप में ही उपयोग कर लिया जाता है। क्योंकि बाइबल के लिए, अनुवादकों को यह निर्णय लेना पड़ता है,  नाम और पदवियाँ सर्वोत्तम रूप से अनुवादित भाषा में भाषान्तरण (अर्थ के द्वारा) या लिप्यन्तरण (ध्वनि के द्वारा) किस के माध्यम उचित अर्थ देंगे। इसके लिए कोई विशेष नियम नहीं है।

सेप्तुआजिन्त

बाइबल सबसे पहले 250 ईसा पूर्व में तब अनुवादित हुई थी, जब इब्रानी पुराने नियम को यूनानी भाषा – उस समय की अन्तरराष्ट्रीय भाषा में भाषान्तरण किया गया था। इस भाषान्तरण को सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद (या LXX) के नाम से जाना जाता है, और यह बहुत ही अधिक प्रभावशाली है। क्योंकि नया नियम यूनानी भाषा में ही लिखा गया था, इसलिए इसमें दिए हुए पुराने नियम के कई उद्धरणों को सेप्तुआजिन्त से ही लिया गया है।

सेप्तुआजिन्त में भाषान्तरण एवं लिप्यन्तरण

नीचे दिया हुआ चित्र इसी प्रक्रिया को दिखाता है और यह कैसे आधुनिक-दिन की बाइबल को प्रभावित करता है

मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह
मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह

मूल इब्रानी पुराना नियम (1500 से लेकर – 400 ई.पू. तक लिखा गया) को चित्र-खण्ड के # 1 में दिखाया गया है। क्योंकि सेप्तुआजिन्त 250 ईसा पूर्व में लिखा गया था इसलिए इब्रानी –> यूनानी भाषान्तर को चित्र-खण्ड #1 से #2 की ओर जाते हुए तीर से दिखाया गया है। नया नियम यूनानी में लिखा गया था ( (50–90 ईस्वी सन्), इसलिए इसका अर्थ यह हुआ कि #2 में दोनों ही अर्थात् पुराना और नया नियम समाहित है। चित्र का निचला आधा हिस्सा (#3) बाइबल का एक आधुनिक भाषा में किया हुआ भाषान्तरण है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पुराने नियम को मूल इब्रानी भाषा (1 -> 3) और नए नियम को यूनानी (2 -> 3) में से भाषान्तरित किया गया है। जैसा कि पहले बताया गया, अनुवादकों को नामों और पदवियों को निर्धारित करना होता है। इसे हरे तीरों के प्रतीक चिन्हों के साथ लिप्यन्तरण और भाषान्तरण के शब्दों के साथ यह दर्शाते हुए दिखाया गया है, कि अनुवादक किसी भी दृष्टिकोण को ले सकता है।

‘मसीह’ की उत्पत्ति

अब हम ऊपर दी हुई प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे, परन्तु इस समय हम हमारे ध्यान को ‘मसीह’ शब्द के ऊपर केन्द्रित करेंगे।

बाइबल में शब्द 'मसीह' कहाँ से आया है?
बाइबल में शब्द ‘मसीह’ कहाँ से आया है?

हम देख सकते हैं, कि मूल इब्रानी पुराने नियम में पदवी ‘מָשִׁיחַ’ (मसीहीयाख़) दी हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अभिषिक्त या प्रतिष्ठित’ व्यक्ति से है जैसे कि एक राजा या शासक इत्यादि। पुराने नियम के समयावधि में इब्रानी राजाओं को राजा बनने से पहले (अनुष्ठानिक रीति से तेल मल कर) अभिषिक्त किया जाता था, इस प्रकार वे अभिषिक्त  या मसीहीयाख़  हो जाते थे। तब वे शासक बन जाते थे, परन्तु उनका शासन परमेश्‍वर के स्वर्गीय शासन की अधीनता में, उसकी व्यवस्था के अनुसार होता था। इस भावार्थ में, पुराने नियम का एक इब्रानी राजा दक्षिण एशिया के भूतपूर्व राज्यपाल के जैसे होता था। राज्यपाल दक्षिण एशिया के ब्रिटिश क्षेत्रों के ऊपर शासन करता था, परन्तु वह ऐसा ब्रिटेन की सरकार की अधीनता में, इसकी व्यवस्था का पालन करते हुए करता है।

पुराने नियम ने एक निश्चित रूप से विशेष मसीहायाख़  के आने की भविष्यद्वाणी (‘निश्चित’ शब्द के साथ) को किया था, जो एक विशेष राजा होगा। जब सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद को 250 ईस्वी सन् में भाषान्तरित किया गया, तब अनुवादको ने यूनानी भाषा में समानार्थ शब्द को क्रिओ  पर आधारित हो, Χριστός (क्रिस्टोस  जैसी ध्वनि वाले) का चुनाव किया, जिसका अर्थ अनुष्ठानिक रूप से तेल मलना होता है। इस तरह से इब्रानी भाषा का शब्द ‘मसीहीयाख़’ का भाषान्तरण अर्थ के द्वारा (न कि ध्वनि के द्वारा लिप्यन्तरण करते हुए) Χριστός (क्रिस्टोस  के उच्चारण) के रूप में यूनानी सेप्तुआजिन्त में किया गया था। नए नियम के लेखक निरन्तर शब्द क्रिस्टोस का उपयोग यीशु की पहचान के लिए करते रहे, जिसकी भविष्यद्वाणी ‘मसीहीयाख़’ के रूप में की गई थी।

परन्तु जब हम यूरोप की भाषाओं की बात करते हैं, तब हम पाते हैं, कि यूनानी शब्द ‘क्रिस्टोस’  के सामानार्थ कोई भी स्पष्ट शब्द नहीं पाया गया इसलिए इसका भाषान्तरण ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह में कर दिया गया। शब्द ‘मसीह’ पुराने नियम पर आधारित इब्रानी से यूनानी में भाषान्तरित  होते हुए और तब यूनानी से आधुनिक भाषाओं में लिप्यन्तरित  होते हुए एक बहुत ही विशेष शब्द है। इब्रानी पुराने नियम का भाषान्तरण सीधे ही कई आधुनिक भाषाओं में किया गया है और अनुवादकों ने मूल इब्रानी शब्द ‘मसीहीयाख़’ के सम्बन्ध में विभिन्न निर्णयों को लिया है। कुछ बाइबल शब्द ‘मसीहीयाख़’ का लिप्यन्तरण ‘मसीह’ शब्द के द्वारा रूपान्तरित करते हुए करती हैं, अन्य इसका अनुवाद ‘अभिषिक्त’ के अर्थ के द्वारा करती हैं, और अन्य उसका लिप्यन्तरण ‘क्राईस्ट’ शब्द के द्वरा रूपान्तरित करते हुए करती हैं। क्राईस्ट या ख्रीस्त (मसीह) के लिए हिन्दी शब्द को अरबी से लिप्यन्तरित किया गया है, जो बदले में मूल इब्रानी भाषा से लिप्यन्तरित हुआ था। इसलिए ‘मसीह’ का उच्चारण मूल इब्रानी भाषा के साथ बहुत निकटता से है, जबकि अन्य शब्द क्राईस्ट का लिप्यन्तरण अंग्रेजी ‘क्राईस्ट’ से हुआ है और इसकी ध्वनि ‘क्राइस्त’ जैसी है। क्राईस्ट (ख्रीष्टको) के लिए नेपाली शब्द का लिप्यन्तरण यूनानी क्रिस्टोस  से हुआ है और इसलिए इसे ख्रीष्टको  शब्द से उच्चारित किया जाता है।

क्योंकि हम पुराने नियम में शब्द ‘मसीह’ को सामान्य रूप से नहीं देखते हैं, इसलिए इसका सम्बन्ध पुराने नियम से सदैव प्रगट नहीं होता है। परन्तु इस अध्ययन से हम जानते हैं, कि बाइबल आधारित ‘क्राईस्ट’ = ‘मसीह’ = ‘अभिषिक्त’ सभी एक ही हैं और यह एक विशेष पदवी थी।

1ली सदी में प्रत्याशित मसीह

इस बोध के साथ, आइए सुसमाचारों से कुछ विचारों को प्राप्त करें। नीचे राजा हेरोदेस की तब की प्रतिक्रिया दी गई है, जब ज्योतिषी यहूदियों के राजा से मुलाकात करने के लिए उसके पास आए, जो कि क्रिसमिस की कहानी का एक बहुत अच्छी तरह से जाना-पहचाना हुआ हिस्सा है। ध्यान दें, मसीह के लिए ‘निश्चित’ वाक्य का उपयोग किया गया है, यद्यपि यह विशेष रूप से यीशु के बारे में उद्धृत नहीं कर रहा है।

यह सुनकर राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया। तब उसने लोगों के सब प्रधान याजकों और शास्त्रियों को इकट्ठा करके उनसे पूछा मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए। (मत्ती 2:3-4)

आप इस निश्चित वाक्य में ‘मसीह’ के विचार को देख सकते हैं, जिसे हेरोदेस और उसके प्रधानों के मध्य में अच्छी तरह से समझ लिया गया था – यहाँ तक कि इससे पहले कि यीशु का जन्म होता – और यह यहाँ पर विशेष रूप से यीशु के लिए उद्धृत हुए बिना उपयोग हुआ है। यह दिखाता है, कि ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह पुराने नियम में से आएगा, जो की 1ली सदी में लोगों के द्वारा (जैसे कि हेरोदेस और उसके प्रधानों के द्वारा) यूनानी के सेप्तुआजिन्त में पाया जाने वाला एक सामान्य पठन् था। ‘क्राईस्ट’  एक नाम नहीं, अपितु पदवी थी (और आज भी है), जो एक शासक या राजा का संकेत देती है। इसलिए ही हेरोदेस ‘परेशान था’ क्योंकि उसने एक और राजा होने की सम्भावना को स्वयं के लिए खतरा महसूस किया। हम इस हास्यास्पद विचार का इन्कार कर सकते हैं, कि ‘मसीह’ मसीही विश्‍वासियों के द्वारा आविष्कृत किया गया था या यह किसी बड़े व्यक्ति जैसे 300 ईस्वी सन् में सम्राट कॉन्सटेनटाईन के द्वारा आविष्कृत किया गया था। यह पदवी हजारों वर्षों पहले से किसी भी मसीही विश्‍वासी के आगमन या कॉन्सटेनटाईन के द्वारा शासन करने से बहुत पहले से ही प्रचलन में थी।

‘मसीह’ सम्बन्धी पुराने नियम की भविष्यद्वाणियाँ

पदवी ‘मसीह’ सबसे पहले भजन संहिता में दाऊद के द्वारा 1000 ईसा पूर्व – यीशु के जन्म से बहुत पहले लिखी हुई प्रगट हुई है। आइए इन सबसे पहले प्रगटीकरणों को देखें।

यहोवा और उसके अभिषिक्त के विरूद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं…वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा; प्रभु उनको ठट्ठों में उड़ाएगा…”मैं तो अपने ठहराए हुए राजा को अपने पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा चुका हूँ।” मैं उस वचन का प्रचार करूँगा : जो यहोवा ने मुझ से कहा, “तू मेरा पुत्र है, आज तू मुझ से उत्पन्न आ”…धन्य हैं वे जिनका भरोसा उस पर है। (भजन संहिता 2:2-7)

यहाँ पर यही संदर्भ दिया गया है परन्तु यह यूनानी भाषान्तरण सेप्तुआजिन्त पर आधारित है।

यहोवा और उसके क्राईस्ट के विरूद्ध…पृथ्वी के राजा मिलकर…और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं…वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा; प्रभु उन्हें ठट्ठों में … यह कहते हुए … उड़ाएगा…., (भजन संहिता 2)

अब आप इस संदर्भ में मसीह को 1ली सदी के पाठक की तरह ‘देख’ सकते हैं। भजन संहिता इस आने वाले मसीह के बारे में अधिक संदर्भों को देती चली जाती है। मैं इब्रानी भाषा-आधारित संदर्भ को यूनानी लिप्यन्तरण के आमने-सामने इसमें दिए हुए ‘मसीह’ शब्द के साथ रखता हूँ, ताकि आप इसे देख सकें।

भजन संहिता 132 इब्रानी भाषा से भजन संहिता 132 – यूनानी भाषी सेप्तुआजिन्त से
हे यहोवा,…10अपने दास दाऊद के लिये,
अपने अभिषिक्त की प्रार्थना की अनसुनी न कर। 11यहोवा ने दाऊद से सच्ची शपथ खाई है,
और वह उससे न मुकरेगा:
“मैं तेरी गद्दी पर तेरे एक निज पुत्र को बैठाऊँगा – … 17″यहाँ मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा,
मै ने अपने अभिषिक्त के लिये एक दीपक तैयार कर रखा है। 18मैं उसके शत्रुओं को तो लज्जा का वस्त्र पहिनाऊँगा,
परन्तु उस के सिर पर उसका मुकुट शोभायमान रहेगा।”
हे यहोवा,…10अपने दास दाऊद के लिये,
अपने अभिषिक्त की प्रार्थना की अनसुनी न कर। 11यहोवा ने दाऊद से सच्ची शपथ खाई है,
और वह उससे न मुकरेगा:
“मैं तेरी गद्दी पर तेरे एक निज पुत्र को बैठाऊँगा – … 17″यहाँ मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा,
मैं ने अपने अभिषिक्त के लिये एक दीपक तैयार कर रखा है। 18मैं उसके शत्रुओं को तो लज्जा का वस्त्र पहिनाऊँगा,
परन्तु उस के सिर पर उसका मुकुट शोभायमान रहेगा।”

आप देख सकते हैं, कि भजन संहिता 132 भविष्य वाक्य में बात करती है (“…मैं दाऊद का एक सींग उगाऊँगा…”)। यह मसीह के बारे में समझने के लिए अति महत्वपूर्ण है। यह जितना अधिक स्पष्ट हो सकता है, उतना ही है, कि पुराना नियम भविष्य-की-ओर देखते हुए ‘मसीह’ के बारे में भविष्यद्वाणियाँ करता है। हेरोदेस इससे परिचित था। उसे तो मात्र उसके प्रधानों की आवश्यकता इन भविष्यद्वाणियों की विशेषताओं को जानने के लिए थी। यहूदी सदैव से ही उनके मसीह (या क्राईस्ट) की प्रतीक्षा कर रहे थे। यह सच्चाई कि वे आज भी मसीह के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हैं, का यीशु या नए नियम से कोई लेन देन नहीं है, अपितु इसकी अपेक्षा पुराने नियम के इन भविष्य-की-ओर देखने वाले पूर्व-कथनों और भविष्यद्वाणियों के पूरा होने की ओर देख रहे हैं।

पुराने नियम में भविष्यद्वाणी किया हुआ यह क्राईस्ट (या मसीह या अभिषिक्त) भूतपूर्व ब्रिटिश राज के सम्बन्ध में एक बात में बहुत अधिक उसी तरह का होते हुए महत्वपूर्ण था। जैसा की एक राज्यपाल ने ब्रिट्रिश भारत के कई छोटे छोटे राजाओं के ऊपर शासन किया, जबकि ब्रिटेन की सरकार के अधिकार में रहते हुए, मसीह के लिए भविष्यद्वाणी की गई है, कि वह एक दिन ‘जातियों’ के ऊपर परमेश्‍वर के अधिकार के अधीन रहते हुए राज्य करेगा (भजन संहिता 2:1)।
यदि नासरत का यीशु नए नियम में घोषित यही भविष्यद्वाणी किया हुआ मसीह था, तब तो राज्यपाल और ‘मसीह’ के मध्य में कई महत्वपूर्ण भिन्नताएँ पाई जाती हैं। राज्यपाल सैन्य शक्ति के साथ आया था और उसने बड़ी सामर्थ के द्वारा बाहरी अधीनता को लागू कर दिया था। यीशु बहुत अधिक नम्रता के साथ और सेवक के रूप में आया था, कि उसके समय की हेरोदेस जैसी शक्तियाँ आश्चर्य में पड़ गए थे। यीशु मसीह ने सबसे पहले हमारी पाप और मृत्यु से स्वतंत्रता की आवश्यकता को पूरा किया, और हमें सबसे पहले प्रेम करने के द्वारा वह और यहाँ तक कि आज के दिन भी, हमारी निष्ठा को हमारे आन्तरिक मनों से प्राप्त करना चाहता है। सारी जातियों से स्वयं के निमित्त अपने लोगों को इस तरह से जीत लेने के पश्चात् ही वह अपने बाहरी शासन को स्थापित करेगा। यीशु ने इसे एक बड़े वैवाहिक भोज के निमंत्रण के साथ सम्बन्धित किया है, और बहुत से धनी और शक्ति प्राप्त लोगों के पास इस निमंत्रण को स्वीकार करने से इन्कार करने के लिए बहाने हैं। निर्धन, अपंग, अंधे और लंगड़े इस त्योहार में बड़ी सँख्या में आते हैं (देखें मत्ती 22)। बहुत से धनी, शक्तिशाली और इस जीवन से सम्बन्धित लोग उसके शासन के लाभों को गवाँ देते हैं । इस लिए विचार करने के लिए अति महत्वपूर्ण श्‍व यह है, कि क्या पुराने नियम का मसीह ही यीशु है। दुर्भाग्य से, पुराना नियम ही इसमें हमारी सहायता कर सकता है।

पुराने नियम की भविष्यवाणियाँ : एक ताला-और-कुँजी पद्धति में एक ताले की तरह हैं

क्योंकि पुराना नियम स्पष्टता के साथ भविष्य की भविष्यद्वाणी करता है, यह मानवीय साहित्य के विशाल समुद्र के पार एक बहुत ही छोटे से समूह के रूप में खड़ा हुआ है। यह एक दरवाजे के ताले की तरह । एक ताले को एक निश्चित आकार में निर्मित किया जाता है ताकि इसमें केवल एक निश्चित ‘कुँजी’ ही इसके आकार के अनुरूप कार्य करती हुई इसे खोल दे। इसी तरह से पुराने नियम एक ताले की तरह है। ‘मसीह’ सम्बन्धी स्पष्टीकरण भजन संहिता के केवल इन दो अध्यायों में ही नहीं हैं, जिन्हें हमने ऊपर देखा था, अपितु साथ ही यह अब्राहम के बलिदान, आदम की उत्पत्ति और मूसा के फसह में भी पाए जाते हैं। परन्तु यह पुराने नियम की 800-400 ईसा पूर्व की समयावधि में पाए जाने वाले भविष्यद्वक्ता हैं, जिनके द्वारा आने वाले मसीह के स्पष्टीकरण और भी अधिक स्पष्ट हो जाते हैं, जो हमें इस बात की जांच करने की अनुमति देते हैं, कि क्या यीशु ही वास्तव में भविष्यद्वाणी किया हुआ ‘मसीह’ था या नहीं – जिसका अध्ययन हम अगले लेख में करेंगे।

संसार के चारों ओर और भारत में : यहूदियों का इतिहास

भारतीय समुदाय में मूसा सम्बन्धी तानेबाने के भीतर एक छोटे से समाज को निर्मित करने के द्वारा, हजारों वर्षों से यहाँ रहते हुए, यहूदियों का भारत में एक लम्बा इतिहास है। अन्य अल्पसँख्यक समूहों से भिन्न (जैसे कि जैन, सिक्ख और बौद्ध धर्मावलम्बियों), यहूदी मूल रूप से अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हुए भारत में बाहर से आए थे। 2017 की गर्मियों में भारतीय प्रधान मंत्री मोदी की इस्राएल में की गई ऐतिहासिक यात्रा से ठीक पहले इस्राएल के प्रधानमन्त्री उन्होंने नेतन्याहू के साथ एक संयुक्त सह-लेखन को लिखा। जब उन्होंने निम्न कथन को लिखा तब उन्होंने भारत से यहूदियों के होने वाले देशान्तर गमन को स्वीकार किया है:

भारत में यहूदी समुदाय का सदैव गर्मजोशी और सम्मान के साथ स्वागत किया गया और इसने कभी भी किसी भी तरह के उत्पीड़न का सामना नहीं किया है।

भारत में यहूदी इतिहास

यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था
यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था

यहूदी समुदाय भारत में कितने समय से रह रहा है? द टाइम्स ऑफ इस्राएल समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक लेख को प्रकाशित किया है, जिसमें कहा गया है कि ’27 सदियों ‘के पश्चात् मनश्शे (बेन मनश्शे ) के गोत्र के लोग मिजोरम के भारतीय राज्य से इस्राएल वापस लौट रहे हैं। यह उन्हें उनके पूर्वजों को यहाँ पर मूल रूप से 700 ईसा पूर्व में पहुँचने की पुष्टि करता है। आंध्रा प्रदेश में रहने वाले एप्रैम के यहूदी गोत्र के तेलुगू-भाषी उनके भाई-बहन (बेन एप्रैम) की भी 1000 वर्षों से अधिक समय तक भारत में होने की सामूहिक स्मृति पाई जाती है, जो फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और इसके पश्चात् चीन में से भटकते हुए यहाँ पहुँचे थे। केरल के राज्य में, कोचीन के यहूदी यहाँ पर लगभग 2600 वर्षों से रह रहे हैं। सदियों के बीतने के पश्चात् उन्होंने स्वयं को छोटे परन्तु पूरे भारत में विशेष समुदायों में निर्मित कर लिया था। परन्तु अब वे इस्राएल वापस लौटने के लिए भारत को छोड़ रहे हैं।

कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।
कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।

यहूदी कैसे भारत में रहने के लिए आ गए? वे इतने लम्बे समय के पश्चात् इस्राएल वापस क्यों लौट रहे हैं? हमारे पास उनके इतिहास के बारे में किसी भी अन्य जाति से कहीं अधिक तथ्य पाए जाते हैं। हम इन जानकारियों का उपयोग समय रेखा में उनके इतिहास को सारांशित करते हुए करेंगे।

अब्राहम : यहूदी परिवार के वंश का आरम्भ होना

समय रेखा अब्राहम से आरम्भ होती है। उसे उसके वंश में से जातियों की एक प्रतिज्ञा दी गई थी और उसकी मुठभेड़ परमेश्‍वर को उसके पुत्र इसहाक के प्रतीकात्मक बलिदान के साथ अन्त होती है। यह बलिदान यीशु (यीशु सत्संग) की ओर संकेत करता हुआ एक चिन्ह भविष्य के उस स्थान को चिन्हित करते हुए था जहाँ पर उसका बलिदान होगा। इसहाक के पुत्र का नाम परमेश्‍वर के द्वारा इस्राएल  रखा गया। यह समय रेखा हरे रंग में आगे बढ़ती है जब इस्राएल की सन्तान को मिस्र में दासत्व के बन्धन में आई थी। यह अवधि उस समय आरम्भ होती है, जब इस्राएल का पुत्र यूसुफ (वंशावली यह थी : अब्राहम -> इसहाक -> इस्राएल (जिसे याकूब भी जाना गया था) -> यूसुफ), इस्राएलियों को मिस्र में ले गया, जब वे लोग बाद में दास बन गए।

फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए
फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए

मूसा : परमेश्‍वर की अधीनता में इस्राएल एक राष्ट्र बन गया

मूसा ने इस्राएलियों को फसह की विपत्ति के साथ मिस्र से बाहर निकलने में मार्गदर्शन दिया, जिसने मिस्र को नष्ट कर दिया था और इस्राएलियों को मिस्र में मिस्रियों के हाथों बाहर निकल जाने में सहायता प्रदान की थी। मूसा की मृत्यु से पहले, मूसा ने इस्राएलियों के ऊपर आशीषों और श्रापों की घोषणा की (जब समय रेखा हरे रंग से पीले रंग की ओर जाती है)। उन्हें तब आशीष मिलेगी जब वे परमेश्‍वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हैं, परन्तु यदि वे आज्ञाकारी नहीं रहते तो श्राप का अनुभव करेंगे। ये आशीषें और श्राप इस्राएल के बाद के इतिहास के साथ भी बँधी हुई थीं।

हजारों वर्षों तक इस्राएली अपनी जन्म भूमि के ऊपर रहे परन्तु उनके पास अपना कोई भी राजा नहीं था, न ही यरूशलेम जैसी कोई राजधानी उनके पास थी – यह उस समय अन्य लोगों के पास थी। तथापि, इसमें 1000 ईसा पूर्व राजा दाऊद के आने के पश्चात् परिवर्तन हो गया।

यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना
यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना

दाऊद यरूशलेम में एक शाही राजवंश की स्थापना करता है

दाऊद ने यरूशलेम को जीत लिया और इसे अपनी राजधानी बना लिया। उसने ‘मसीह’ के आगमन की प्रतिज्ञा को प्राप्त किया और उस समय से यहूदी लोग मसीह के आगमन के लिए प्रतीक्षारत् हैं। उसके पुत्र सुलैमान, बिना किसी सन्तुष्टि के परन्तु धनी और प्रसिद्ध, उसका उत्तराधिकारी हुआ और सुलैमान ने यहूदियों के पहले मन्दिर को यरूशलेम में मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर निर्मित किया। राजा दाऊद के वंशज् निरन्तर लगभग 400 वर्षों तक राज्य करते रहे और इस अवधि को हल्के-नीले रंग (1000 – 600 ईसा पूर्व) से दर्शाया गया है। यह अवधि इस्राएल की उन्नति का समय था – उनके पास प्रतिज्ञा की हुई आशीषें थीं। वे एक शक्तिशाली जाति थे; उनके समाज, संस्कृति और उनका मन्दिर उन्नत था। परन्तु पुराना नियम साथ ही उनमें बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार और इस समय होने वाली मूर्ति पूजा का भी विवरण देता है। इस अवधि में बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने इस्राएलियों को चेतावनी दी कि यदि वे मन परिवर्तन नहीं करते, तो उनके ऊपर मूसा के श्राप आप पड़ेंगे। इन चेतावनियों को अनदेखा कर दिया गया। इस समय के मध्य में इस्राएली दो पृथक राज्यों : इस्राएल और एप्रैम का उत्तरी राज्य और यहूदा के दक्षिण राज्य में विभाजित हो गए (जैसे कि आज के समय कोरिया है, एक ही लोग दो देशों में विभाजित हो गए हैं – उत्तरी ओर दक्षिण कोरिया)।

यहूदियों की पहली बन्धुवाई : अश्शूर और बेबीलोन

अन्त में, दो चरणों में श्राप उनके ऊपर आ पड़ा। अश्शूर ने एप्रैम के उत्तरी राज्य को 722 ईसा पूर्व में नष्ट कर दिया और इसमें रहने वाले इस्राएलियों को बड़े पैमाने पर अपने विस्तृत साम्राज्य में भेज दिया गया। मिजोरम के बेन मनश्शे और आन्ध्रा प्रदेश के बेन एप्रैम इन्हीं निर्वासित किए हुए इस्राएलियों के वंशज् हैं। तब 586 ईसा पूर्व में नबूकदनेस्सर, बेबीलोन का एक शक्तिशाली राजा आया – ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने 900 वर्षों पहले भविष्यद्वाणी की थी, जब उसने अपने इन श्रापों को लिखा था:

यहोवा तेरे विरूद्ध दूर से, वरन् पृथ्वी के छोर से वेग से उड़नेवाले उकाब सी एक जाति को चढ़ा लाएगा जिसकी भाषा तू नहीं समझेगा; उस जाति के लोगों का व्यवहार क्रूर होगा, वे न तो बूढ़ों का मुँह देखकर आदर करेंगे, और न बालकों पर दया करेंगे; और वे तेरे पशुओं के बच्चे और भूमि की उपज यहाँ तक खा जाएँगे कि तू नष्ट हो जाएगा; और वे तेरे लिये न अन्न, और न नया दाखमधु, और न टटका तेल, और न बछड़े, न मेम्ने छोड़ेंगे, यहाँ तक कि तू नष्ट हो जाएगा। और वे तेरे परमेश्वर यहोवा के दिये हुए सारे देश के सब फाटकों के भीतर तुझे घेर रखेंगे; वे तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे उस समय तक घेरेंगे, जब तक तेरे सारे देश में तेरी ऊँची ऊँची और दृढ़ शहरपनाहें जिन पर तू भरोसा करेगा गिर न जाएँ।  (व्यवस्थाविवरण 28:49-52)

नबूकदनेस्सर ने यरूशलेम को जीत लिया, इसे जला दिया और इसके उस मन्दिर को नष्ट कर दिया जिसे सुलैमान ने निर्मित किया। उसने तब इस्राएलियों को बेबीलोन में बन्धुवा बना लिया। इसने मूसा के इस भविष्यद्वाणी को पूरा कर दिया कि

और जैसे अब यहोवा को तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता है, वैसे ही तब उसको तुम्हारा नाश वरन् सत्यानाश करने से हर्ष होगा; और जिस भूमि के अधिकारी होने को तुम जा रहे हो उस पर से तुम उखाड़े जाओगे। और यहोवा तुझ को पृथ्वी के इस छोर से लेकर उस छोर तक के सब देशों के लोगों में तित्तर बित्तर करेगा; और वहाँ रहकर तू अपने और अपने पुरखाओं के अनजान काठ और पत्थर के दूसरे देवताओं की उपासना करेगा।  (व्यवस्थाविवरण 28:63-64)

जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया
जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया

केरल के कोचीन के यहूदी बन्धुवाई में रहने वाले इन्हीं इस्राएलियों के वंशज् हैं। क्योंकि 70 वर्षों से, इस अवधि को लाल रंग से दिखाया गया है, ये इस्राएलियों (या यहूदी जैसा कि अब इन्हें पुकारा जाता है) निर्वासन में अब्राहम और उसके वंशज् को प्रतिज्ञा की हुई भूमि से दूर रह रहे थे।

फारसियों की अधीनता में बन्धुवाई से वापस लौटना

इसके पश्चात्, फारसी सम्राट कुस्रू ने बेबीलोन को जीत लिया और कुस्रू संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसने यहूदियों को उनकी भूमि के ऊपर वापस लौटने की अनुमति प्रदान की।

उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है

तथापि वे अब और अधिक आगे को एक स्वतंत्र देश नहीं थे, वे अब फारसी साम्राज्य के एक प्रान्त के रूप में थे। ऐसी स्थिति लगभग 200 वर्षों तक बनी रही और इसे समय रेखा में गुलाबी रंग से दिखाया गया है। इस समय में यहूदियों का मन्दिर (जिसे 2रे मन्दिर के रूप में जाना जाता है) और यरूशलेम के मन्दिर को पुनः निर्मित किया गया। यद्यपि यहूदियों को इस्राएल में वापस लौटने की अनुमति प्रदान कर दी गई, तथापि, उन में से बहुत से बन्धुवाई में ही रह गए।

यूनानियों का समयकाल

सिकन्दर महान् ने फारसी साम्राज्य को जीत लिया और इस्राएल को आगे के लगभग 200 वर्षों के लिए यूनानी साम्राज्य का एक प्रान्त बना दिया। इसे गहरे नीले रंग से दिखाया गया है।

उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है

रोमियों का समयकाल

इसके पश्चात् रोमियों ने यूनानी साम्राज्य को पराजित कर दिया और वे प्रमुख विश्‍व शक्ति बन गए। इस साम्राज्य में यहूदी एक बार फिर से एक प्रान्त बन गए और इसे हल्के पीले रंग से दिखाया गया है। यह वह समय था जब यीशु इस पृथ्वी पर रहा। यह विवरण देता है, कि क्यों सुसमाचारों में रोमी सैनिक पाए जाते हैं  – क्योंकि रोमियों के द्वारा इस्राएलियों की भूमि पर रहने वाले यहूदियों के ऊपर यीशु के समय में शासन किया जाता था।

उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है

रोमियों की अधीनता में यहूदियों का दूसरी बार निर्वासित होना

बेबीलोनियों के समय लेकर (586 ईसा पूर्व) यहूदी कभी उस तरह से स्वतंत्र नहीं रहे जिस तरह से वे राजा दाऊद की अधीनता में थे। वे एक के बाद दूसरे साम्राज्य के अधीन शासित हुए, ठीक वैसे ही जैसा कि भारत के ऊपर बिट्रेन का शासन रहा है। यहूदियों को इसके प्रति बुरा लगा और उन्होंने रोमी शासन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। रोमी आए और उन्होंने यरूशेलम को (70 ईस्वी सन्) में नष्ट कर दिया, इसके 2रे मन्दिर को जला दिया गया और यहूदियों को रोमी साम्राज्य में दासों के रूप में निर्वासित कर दिया गया। यह यहूदियों का दूसरी  बार बन्धुवाई में जाना हुआ था। क्योंकि रोम बहुत बड़ा था, परिणामस्वरूप यहूदी अन्त में पूरे संसार में ही बिखर गए।

यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।
यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।

और इस तरह से यहूदी लोग अतीत के लगभग 2000 वर्षों रहे हैं: विदेशी भूमि पर बिखरे हुए और उन्हें कभी भी इस भूमि पर स्वीकार नहीं किया गया। इन विभिन्न देशों में उन्होंने निरन्तर बड़े सतावों से दु:ख उठाया है। यहूदियों के ऊपर आया हुआ सताव यूरोप के संदर्भ में विशेष रूप से सच्चा है। पश्चिमी यूरोप में, स्पेन से लेकर रूस तक यहूदियों को इन देशों में अक्सर खतरनाक परिस्थितियों में रहना पड़ा है। इन सतावों से बचने के लिए यहूदी निरन्तर कोचीन में पहुँचते रहे। 17वीं व 18वीं सदी में भारत के अन्य भागों में मध्य पूर्वी देशों से यहूदियों का आगमन हुआ और उन्हें बगदादी यहूदी के रूप में पहचाना गया, जो मुख्य रूप से मुम्बई, दिल्ली और कोलकाता में बस गए थे। 1500 ईसा पूर्व मूसा के द्वारा दिए हुए श्राप उनके विवरणों के अनुरूप है, कि कैसे उन्होंने जीवन को यापन किया था।

 डेविड सासोन और उसके पुत्र - भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी
डेविड सासोन और उसके पुत्र – भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी

और उन जातियों में तू कभी चैन न पाएगा, और न तेरे पाँव को ठिकाना मिलेगा; क्योंकि वहाँ यहोवा ऐसा करेगा कि तेरा हृदय काँपता रहेगा, और तेरी आँखे धुँधली पड़ जाएँगी, और तेरा मन व्याकुल रहेगा (व्यवस्थाविवरण 28:65)

इस्राएलियों के विरूद्ध दिए हुए श्राप लोगों को यह पूछने के लिए दिए गए थे :

और सब जातियों के लोग पूछेंगे: “यहोवा ने इस देश से ऐसा क्यों किया? और इस बड़े कोप के भड़कने का क्या कारण है? (व्यवस्थाविवरण 29:24)

और इसका उत्तर यह था :

तब लोग यह उत्तर देंगे, “उनके पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने जो वाचा उनके साथ मिस्र देश से निकालने के समय बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ा है। और पराए देवताओं की उपासना की है जिन्हें वे पहिले नहीं जानते थे, और यहोवा ने उनको नहीं दिया था; इसलिये यहोवा का कोप इस देश पर भड़क उठा है, कि पुस्तक मे लिखे हुए सब शाप इस पर आ पडें; और यहोवा ने कोप, और जलजलाहट, और बड़ा ही क्रोध करके उन्हें उनके देश में से उखाड़कर दूसरे देश में फेंक दिया, जैसा कि आज प्रगट है।” (व्यवस्थाविवरण 29:25-28)

नीचे दी हुई समय रेखा इस 1900 वर्षों की अवधि को दर्शाती है। इस अवधि को लाल रंग की मोटी रेखा से दर्शाया गया है।

आप देख सकते हैं, कि उनके इतिहास में यहूदी लोग बन्धुवाई की दो अवधियों में से होकर निकले परन्तु दूसरी बन्धुवाई पहली बन्धुवाई से अधिक लम्बी समय की थी।

बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई - यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा
बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई – यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा

20वीं सदी का नरसंहार

यहूदियों के विरूद्ध सताव अपने चरम पर तब पहुँचा जब हिटलर ने, नाजी जर्मनी के द्वारा, यूरोप में रहने वाले सभी यहूदियों को पूर्ण रीति से नष्ट करने का प्रयास किया। वह लगभग सफल भी हो गया था परन्तु उसकी पराजय हो गई और यहूदियों में से थोड़े से बचे रह गए।

आधुनिक इस्राएल की पुन: – स्थापना

मात्र इस तथ्य ने, कि ऐसे लोग, जो स्वयं को ‘यहूदियों’ के रूप में पहचानते हुए हजारों वर्षों के पश्चात् भी बिना किसी भी जन्म भूमि के अस्तित्व में हैं, अपने आप में ही उल्लेखनीय था। परन्तु इसने 3500 वर्षों पहले मूसा के द्वारा लिखे हुए वचनों को सत्य प्रमाणित कर दिया। 1948 में यहूदियों नें, संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इस्राएल के आधुनिक देश के रूप में पुन: स्थापित होते हुए देखना अपने आप में ही उल्लेखनीय था, ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने सदियों पहले लिखा था:

तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा। चाहे धरती के छोर तक तेरा बरबस पहुँचाया जाना हो, तौभी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को वहाँ से ले आकर इकट्ठा करेगा। और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उसी देश में पहुँचाएगा जिसके तेरे पुरखा अधिकारी हुए थे, और तू फिर उसका अधिकारी होगा; और वह तेरी भलाई करेगा, और तुझ को तेरे पुरखाओं से भी गिनती में अधिक बढ़ाएगा। (व्यवस्थाविवरण 30:3-5)

बड़े विरोध के पश्चात् भी इस देश की स्थापना स्वयं में ही उल्लेखनीय है। इसके चारों ओर के अधिकांश देशों ने इस्राएल के विरूद्ध 1948 विरूद्ध… इसके पश्चात् 1956 में … इसके पश्चात् 1967 में और एक बार फिर से 1973 में युद्ध छेड़ा था। इस्राएल एक बहुत ही छोटा सा देश है, जो कई बार एक ही समय में पाँच देशों के साथ युद्ध कर रहा होता था। इतने पर भी, इस्राएल न केवल बचा रहा, अपितु इसका क्षेत्रफल भी बढ़ता चला गया। 1967 के युद्ध में इस्राएल ने यरूशलेम को प्राप्त किया, जो उनकी दाऊद के द्वारा लगभग 3000 वर्षों पहले स्थापित की हुई ऐतिहासिक राजधानी थी। इस्राएल के देश की स्थापना, और उन युद्धों के परिणामों ने आज के हमारे संसार में सबसे कठिन राजनैतिक समस्याओं को जन्म दिया है।

जैसा कि मूसा के द्वारा भविष्यद्वाणी की गई थी और जिन्हें यहाँ पर विस्तार सहित देखा जा सकता, इस्राएल की पुन: स्थापना इस्राएल की ओर लौटने के लिए भारत में रहने वाले विभिन्न यहूदियों के लिए एक प्रोत्साहन को उत्पन्न करता है। इस समय इस्राएल में 80,000 ऐसे यहूदी रहते हैं, जिनका एक अभिभावक भारत से है और भारत में अब केवल 5000 यहूदी ही शेष रह गए हैं। जहाँ तक मूसा की आशीषों का संदर्भ है, उन्हें बहुत ही “दूर के देशों” से इकट्ठा” किया जा रहा है (जैसे कि मिजोरम) और उन्हें “वापस” लाया जा रहा है। इसके निहितार्थ यहूदियों और गैर-यहूदियों दोनों के लिए यहाँ पर प्रकाश डालते हुए एक दूसरे के तुल्य ही हैं।

क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है?

परमेश्‍वर ने इतिहास में कैसे कार्य किया को वर्णित करते हुए बाइबल आत्मिक सत्यों को प्रदान करती है। यह वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ परमेश्‍वर ने मनुष्य की सृष्टि अपने स्वरूप में की और फिर प्रथम मनुष्य का सामना किया और एक बलिदान के लिए बोला जो आने वाला था और जिसका बलिदान होगा। इसके पश्चात् ऋषि अब्राहम के पुत्र के स्थान पर एक मेढ़े के बलिदान की विशेष घटना और ऐतिहासिक फसह की घटना घटित हुई। यह प्राचीन ऋग वेद के सामान्तर चलता है जहाँ पर हमारे पापों के लिए बलिदान की मांग की गई है और यह प्रतिज्ञा दी गई है कि यह पुरूषा के बलिदान के साथ प्रगट होगा। ये प्रतिज्ञाएँ प्रभु यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के जीवन, शिक्षाएँ, मृत्यु एवं पुनरूत्थान से पूरी हो गई। परन्तु प्रतिज्ञाएँ और पूर्णताएँ ऐतिहासिक हैं। इसलिए, यदि बाइबल को आत्मिक सत्यों को प्रदान करने के लिए सत्य होना हो तो इसे ऐतिहासिक रूप से विश्‍वसनीय भी होना चाहिए। यह हमें हमारे किए हुए प्रश्न की ओर ले जाता है : क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है? और कैसे कोई यह जान सकता है यह है या नहीं?

हम यह कहते हुए आरम्भ करते हैं कि कहीं समय के बीतने के साथ बाइबल का मूलपाठ (के शब्द) कहीं परिवर्तित तो नहीं हो गए हैं। जिसे साहित्यिक विश्‍वसनीयता  से जाना जाता है, यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि बाइबल अत्यधिक प्राचीन है। बहुत सी पुस्तकें हैं जिनसे मिलकर बाइबल का निर्माण हुआ है, और सबसे अन्तिम पुस्तक लगभग दो हज़ार वर्षों पहले लिखी गई थी। अधिकांश मध्यवर्ती सदियों में छपाई, फोटोकॉपी मशीन या प्रकाशन कम्पनियों की कोई सुविधा नहीं थी। इसलिए इन पुस्तकों को हाथों के द्वारा लिखा जाता था, एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी के आने पर, भाषाएँ समाप्त होती गई और नई भाषाएँ आती गईं, साम्राज्य परिवर्तित होते गए और नई शक्तियाँ आती गईं। क्योंकि मूल पाण्डुलिपियाँ बहुत पहले ही लोप हो गई थीं, इसलिए हम कैसे यह जान सकते हैं कि आज हम बाइबल में जो कुछ पढ़ते हैं उसे वास्तव में मूल लेखकों ने ही बहुत पहले लिखा था?क्या यह जानने के लिए कोई ‘वैज्ञानिक’ तरीका है कि जिसे आज हम पढ़ते हैं वह बहुत पहले लिखे हुए मूल लेखों जैसा ही है या भिन्न है?

साहित्यिक आलोचना के सिद्धान्त

यह प्रश्न किसी भी प्राचीन लेख के लिए सत्य है। नीचे दिया हुआ आरेख उस प्रक्रिया को चित्रित करता है जिसमें अतीत के सभी प्राचीन लेखों को समय के व्यतीत होने के साथ सुरक्षित रखा जाता था ताकि हम उन्हें आज पढ़ सकें। नीचे दिया हुआ आरेख 500 ईसा पूर्व (इस तिथि को केवल एक उदाहरण को दर्शाने के लिए चुना गया है) के एक प्राचीन दस्तावेज के उदाहरण को प्रदर्शित करता है।

समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।
समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।

मौलिक रूप अनिश्चितकाल तक के लिए नहीं रहता है, इसलिए इससे पहले की यह नष्ट होने लगे, खो जाए, या नाश हो जाए, एक पाण्डुलिपि (पाण्डु लि) की प्रतिलिपि तैयार कर ली जाती है (1ली प्रतिलिपि)।अनुभवी व्यक्ति की एक श्रेणी जिन्हें शास्त्री कह कर पुकारा जाता है प्रतिलिपि को बनाने का कार्य करते हैं। जैसे जैसे समय व्यतीत होता है, प्रतिलिपियों से और प्रतिलिपि (2री प्रतिलिपि और 3री प्रतिलिपि) तैयार की जाती है। किसी समय पर एक प्रतिलिपि को संरक्षित कर लिया जाता है जो कि आज भी अस्तित्व में है (3री प्रतिलिपि)। हमारे उदाहरण दिए हुए आरेख में इस अस्तित्व में पड़ी हुई प्रतिलिपि को 500 ईसा पूर्व में बनाया हुआ दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि जितना अधिक पहले के मूलपाठ के दस्तावेज की अवस्था को हम जानते हैं वह केवल 500 ईसा पूर्व या इसके बाद का है क्योंकि इसके पहले की सभी पाण्डुलिपियाँ लोप हो गई हैं। 500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी सन् के मध्य के 1000 वर्ष (जिन्हें आरेख में x के चिन्ह से दिखाया गया है) वह अवधि है जिसमें हम किसी भी प्रतिलिपि की जाँच नहीं कर सकते हैं क्योंकि सभी पाण्डुलिपियाँ इस अवधि में लोप हो गई हैं। उदाहरण के लिए, यदि प्रतिलिपि बनाते समय कोई त्रुटि (अन्जाने में या जानबूझकर) हुई है जिस समय 2री प्रतिलिपि को 1ली प्रतिलिपि से बनाया जा रहा था, तो हम उसका पता  लगाने के लिए सक्षम नहीं होंगे क्योंकि इनमें से कोई भी दस्तावेज अब एक दूसरे से तुलना करने के लिए उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध प्रतिलिपियों (x अवधि) की उत्पति होने से पहले की यह समयावधि इसलिए साहित्यिक अनिश्चितता का अन्तराल है। परिणामस्वरूप, एक सिद्धान्त जो साहित्यिक विश्‍वसनीयता के बारे में हमारे प्रश्न का उत्तर देता है वह यह है कि जितना अधिक छोटा यह अन्तराल x होगा उतना अधिक हम हमारे आधुनिक दिनों में दस्तावेज के सटीक रूप से संरक्षण में अपनी विश्‍वसनीयता को रख सकते हैं, क्योंकि अनिश्चयता की अवधि कम हो जाती है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि आज अक्सर एक पाण्डुलिपि की एक से ज्यादा दस्तावेज की प्रतिलिपि अस्तित्व में है। मान लीजिए हमारे पास इस तरह की दो पाण्डुलिपियों की प्रतिलिपियाँ हैं और हम उन दोनों के एक ही भाग में इस निम्नलिखित वाक्यांश को पाते हैं (मैं इसे अंग्रेजी में उदाहरण के कारण लिख रहा हूँ, परन्तु वास्तविक पाण्डुलिपि यूनानी, लैटिन या संस्कृत जैसी भाषाओं में होगी):

कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

मूल लेख में या तो सुरेश के बारे में लिखा है या फिर सुमेश के बारे लिखा है, और बाकी के इन अन्य पाण्डुलिपियों में प्रतिलिपि बनाते समय त्रुटि पाई जाती है। प्रश्न यह उठता है – कि इनमें से किस में त्रुटि पाई जाती है?उपलब्ध प्रमाण से इसे निर्धारित करना अत्यन्त कठिन है।

अब मान लीजिए हमने एक ही लेख की दो से अधिक पाण्डुलिपियों को प्राप्त किया है, जैसा कि नीचे दिखाया गया है:

कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

 

अब यह तार्किक परिणाम निकालना आसान है कि किस पाण्डुलिपि में त्रुटि है। अब यह सम्भावना ज्यादा है कि त्रुटि एक बार हुई हो, इसकी अपेक्षा की एक ही जैसी त्रुटि की तीन बार पुनरावृत्ति हुई हो, इसलिए यह सम्भावना अधिक है पाण्डुलिपि #2 की प्रतिलिपि में त्रुटि हो, और लेखक सुरेश  के बारे में लिख रहा हो, न कि सुमेश के बारे में।

यह सरल उदाहरण दर्शाता है कि एक दूसरा सिद्धान्त जिसे हम पाण्डुलिपि के साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय होने की जाँच के लिए उपयोग कर सकते हैं वह:जितनी ज्यादा प्रचलित पाण्डुलिपियाँ हैं जो उपलब्ध हैं, उतना ही अधिक मूल लेख के शब्दों की सही त्रुटियों को पता लगाना और सही करना और निर्धारित करना आसान होता है।

पश्चिम की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

हमारे पास बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता को निर्धारित करने के लिए दो संकेतक हैं:

  1. वास्तविक संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपियों के मध्य में समय को मापना, और
  2. प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि के सँख्या की गणना करना।

क्योंकि ये संकेतक किसी भी प्राचीन लेख के ऊपर लागू होते हैं इसलिए हम इनका उपयोग दोनों अर्थात् बाइबल और साथ ही साथ अन्य प्राचीन लेखों के ऊपर लागू कर सकते हैं, जैसा कि नीचे दी हुई तालिकाओं में दिया हुआ है।

लेखक कब लिखा गया प्रारम्भिक प्रतिलिपि समय की अवधि #
 कैसर 50 ई. पूर्व 900 ई. सन् 950 10
प्लेटो अर्थात् अफलातून 350 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1250 7
अरस्तू* 300 ई. पूर्व 1100 ई. सन् 1400 5
थियूसीडाईडस 400 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1300 8
हेरोडोटस 400 ई. पूर्व 900 ई. सन् 1300 8
सैफोक्लेस 400 ई. पूर्व 1000 ई. सन् 1400 100
टाईटस 100 ई. सन् 1100 ई. सन् 1000 20
पिल्नी 100 ई. सन् 850 ई. सन् 750 7

ये लेखक पश्चिमी इतिहास के प्रमुख शास्त्रीय लेखन – अर्थात् ऐसे लेख जिनका विकास पश्चिमी सभ्यता के विकास के साथ निर्मित हुआ को प्रस्तुत करते हैं। औसत दर पर, उन्हें हम तक 10-100 पाण्डुलिपियों के रूप में एक से दूसरी पीढ़ी के द्वारा पहुँचाया गया है जिन्हें मूल लेख के लिखे जाने के पश्चात् लगभग 1000 वर्षों के पश्चात् आरम्भ करते हुए संरक्षित किया गया था।

पूर्व की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम प्राचीन संस्कृति के महाकाव्यों को देखें जो हमें दक्षिण एशिया के इतिहास और दर्शन के ऊपर बहुत अधिक समझ को प्रदान करते हैं। इन लेखों में सबसे प्रमुख महाभारत के लेख हैं, जिनमें अन्य लेखों के साथ ही, भगवद् गीता और कुरूक्षेत्र की लड़ाई का वृतान्त भी सम्मिलित है। विद्वान आंकलन करते हैं कि महाभारत का विकास इसके आज के लिखित स्वरूप में लगभग 900 ईसा पूर्व से हुआ, परन्तु सबसे से प्राचीन पाण्डुलिपि के आज भी अस्तित्व में पाए जाने वाले अंश लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास मूल संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि से लगभग 500 वर्षों के अन्तराल को देते हुए पाए जाते हैं (संदर्भ के लिए विकी का लिंक)। हैदराबाद की उस्मानिया विश्‍वविद्यालय गर्व से कहता है कि उसके पुस्तकालय में दो पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ पड़ी हुई हैं, परन्तु इन दोनों की तिथि केवल 1700 ईस्वी सन् और 1850 ईस्वी सन् है – जो कि मूल संकलन (संदर्भ लिंक) के हज़ारों वर्षों के पश्चात् की हैं। न केवल पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ बाद की तिथि की हैं, अपितु यह जानकारी कि महाभारत  एक लोकप्रिय लेखन कार्य था यह इसकी भाषा और शैली में परिवर्तन की पुष्टि करता है, इसमें और प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि में बहुत ही उच्च श्रेणी की साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है। विद्वान जो यह आंकलन लगाते हैं कि महाभारत में लिखी हुई साहित्यिक भिन्नता ऐसे व्यक्त करती है:

“भारत का राष्ट्रीय महाकाव्य, महाभारत, ने तो बहुत ही ज्यादा भ्रष्टता का सामना किया है। यह लगभग…250 000 पँक्तियों का है। इनमें से, कोई 26 000 पँक्तियों में साहित्यिक भ्रष्टता (10 प्रतिशत) पाई जाती है”– (गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1968. पृ 367)

अन्य महान् महाकाव्य, रामायण  है, जो लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास संकलित हुआ था परन्तु इसकी प्रारम्भिक प्रचलित प्रतिलिपि, नेपाल से आई है, जिसकी तिथि 11 ईस्वी सन् की सदी पाई जाती है (संदर्भ लिंक) –जो मूल संकलन से लगभग 1500 वर्षों के आसपास पाई जाने वाली प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि में अन्तराल को देती है। रामायण की अब कई हज़ारों प्रचलित प्रतिलिपियाँ पाई जाती हैं। इनमें आपस में ही व्यापक साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है, विशेषकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत/दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य में। विद्वानों ने इन साहित्यिक विभिन्नताओं के कारण इन पाण्डुलिपियों को 300 भिन्न समूहों में वर्गीकृत किया है।

नए नियम की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम बाइबल के लिए पाण्डुलिपि आधारित तथ्य की जाँच करें। नीचे दी हुई तालिका नए नियम की सबसे प्राचीनत्तम प्रतिलिपियों को सूचीबद्ध करती है। इनमें से प्रत्येक का एक नाम दिया गया है (अक्सर पाण्डुलिपि को खोजकर्ता के नाम के ऊपर)

पाण्डुलिपि कब लिखी गई पाण्डुलिपि की तिथि समय की अवधि
 जॉन राएलॉन 90 ई. सन् 130 ई. सन् 40 yrs
बोड़मेर पपाईरस 90 ई. सन् 150-200 ई. सन् 110 yrs
चेस्टर बेट्टी 60 ई. सन् 200 ई. सन् 20 yrs
कोड्डक्स वेटीकानुस 60-90ई. सन् 325 ई. सन् 265 yrs
कोड्डक्स

सिनाटिक्स

60-90 ई. सन् 350 ई. सन् 290 yrs

नए नियम की पाण्डुलिपियाँ सँख्या में इतनी अधिक हैं कि उन सभी को एक ही तालिका में सूचीबद्ध करना अत्यन्त ही कठिन होगा। जैसा कि एक विद्वान जिसने इस विषय के ऊपर अध्ययन करने के लिए कई वर्षों के समय को व्यतीत किया ने व्यक्त किया है:

“हमारे पास आज नए नियम के अंशों की24000 पाण्डुलिपि से अधिक प्रतिलिपियों के अंश पाए जाते हैं… प्राचीन काल का कोई भी दस्तावेज इतनी अधिक सँख्या और प्रामाणिकता की पहुँच से आरम्भ नहीं होता है। इसकी तुलना में कवि होमर लिखित इलियड है जो 643 पाण्डुलिपियों के साथ दूसरे स्थान पर आज भी अस्तित्व में है।” मैक्डावेल, जे. प्रमाण जो न्याय की मांग करते हैं. 1979. पृ. 40)

ब्रिट्रिश संग्रहालय का एक अग्रणी विद्वान यह पुष्टि करता है कि:

“विद्वान एक बड़ी सीमा तक संतुष्ट हैं कि मुख्य यूनानी और रोमन लेखक अपने मूलपाठ में सच्चे थे…तौभी उनके लेखनकार्य के प्रति हमारा ज्ञान केवल कुछ थोड़ी सी ही पाण्डुलिपियों के ऊपर आधारित हैं जबकि नए नियम की पाण्डुलिपियों की गणना…हज़ारों के द्वारा हुई है” (केन्योन, एफ. जी. – ब्रिट्रिश संग्रहालय का पूर्व निदेशक – हमारी बाइबल और प्राचीन पाण्डुलिपि. 1941 पृ. 23)

और इन पाण्डुलिपियों की एक निश्चित सँख्या अत्यन्त ही प्राचीन है। मेरे पास प्रारम्भिक नए नियम के दस्तावेजों के बारे में एक पुस्तक है। इसका परिचय इस तरह से आरम्भ होता है:

“यह पुस्तक प्रारम्भिक नए नियम की 69 पाण्डुलिपियों का लिप्यंतरण…2री सदी से आरम्भ करती हुई 4थी सदी (100-300 ईस्वी सन्) के आरम्भ तक…नए नियम के मूलपाठ का लगभग 2/3 हिस्से को उपलब्ध कराती है” (पृ. सांत्वना, नए नियम की यूनानी पाण्डुलिपि के प्रारम्भिक मूलपाठ”. प्रस्तावना पृ. 17. 2001)

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पाण्डुलिपियाँ आरम्भिक अवधि से निकल कर आई हैं जब सुसमाचार के अनुयायी सरकारी शक्ति में नहीं थे, अपितु इसकी अपेक्षा रोमी साम्राज्य के द्वारा तीव्र सताव के अधीन थे। यह वह अवधि थी जब सुसमाचार दक्षिण भारत, के केरल में आया, और यहाँ भी सुसमाचार के अनुयायियों के समाज के पास किसी भी तरह से सरकारी शक्ति नहीं थी जिससे की कोई राजा पाण्डुलिपियों के साथ किसी तरह की कोई चालाकी कर सकता। नीचे दिया हुआ आरेख पाण्डुलिपियों के उस अवधि को दर्शाता है जिस पर बाइबल का नया नियम आधारित है।

समयरेखा यह दिखा रही है कि नए नियम की 24000 प्रचलित पाण्डुलिपियों में से, सबसे प्रारम्भिक वाली को उपयोग आधुनिक अनुवादकों ने (उदाहरण, अंग्रेजी, नेपाली या हिन्दी) बाइबल के लिए किया है। यह कॉन्स्टेनटाईन (325 ईस्वी सन्) के समय से पहले से आई हैं जो रोम का पहला मसीही सम्राट था।

इन सभी हज़ारों पाण्डुलिपियों के मध्य में अनुमानित साहित्यिक भिन्नता केवल

“20000 में से 400 पँक्तियाँ हैं।”(गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1988. पृ 366)

इस तरह से मूलपाठ इन सभी पाण्डुलिपियों से 99.5%  मेल खाता है।

पुराने नियम की साहित्यिक आलोचना

ऐसा ही कुछ पुराने नियम के साथ में है। पुराने नियम की 39 पुस्तकें 1500-400 ईसा पूर्व के मध्य में लिखी गई थीं। यह नीचे दिए हुए आरेख में दिखाई गई हैं जहाँ पर वह अवधि जिसमें मूल पुस्तकें लिखी गईं को समयरेखा के ऊपर एक दण्ड के रूप में दिखाया गया है। हमारे पास पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की दो श्रेणियाँ हैं। पाण्डुलिपियों की पारम्परिक श्रेणी मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ है जिन्हें लगभग 900 ईस्वी सन् में प्रतिलिपित किया गया था। तथापि 1948 में पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की एक और श्रेणी जो इससे भी अधिक प्राचीन है – अर्थात् 200 ईसा पूर्व से है और जिसे मृतक सागर कुण्डल पत्र (मृ सा कुं पत्र) कह कर पुकारा जाता है की खोज हुई। यह दोनों पाण्डुलिपियों की श्रेणियाँ आरेख में दिखाई गई हैं। सबसे अधिक जो आश्चर्यजनक है वह यह है कि भले ही ये समय के एक लम्बे अन्तराल लगभग 1000 वर्षों का अन्तर रखती हैं, इनके मध्य में भिन्नता लगभग न के बराबर है। जैसा कि एक विद्वान ने इनके बारे में ऐसा कहा है:

‘ये[मृ सा कुं पत्र]मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ की सटीकता की पुष्टि करते हैं…केवल कुछ ही उदाहरणों को छोड़कर जहाँ पर मृतक सागर कुण्डल पत्रों और मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ के मध्य में वर्तनी और व्याकरण की भिन्नता पाई जाती है, ये दोनों आश्चर्यजनक रूप से एक जैसे हैं’ (ऐम. और. नॉर्टन, बाइबल की उत्पत्ति में पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ)

उदाहरण के लिए, जब हम इसे रामायण की साहित्यिक भिन्नता के साथ तुलना करते हैं, तो पुराने नियम के मूलपाठ का स्थायित्व बड़ी सरलता से ही उल्लेखनीय रूप में पाया जाता है।

यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।
यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।

सारांश: बाइबल साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है

अब हम इस तथ्य से क्या सारांश निकाल सकते हैं? निश्चित रूप से कम से कम हम निष्पक्षता से यह गणना कर सकते हैं (पाण्डुलिपियों की सँख्या की मात्रा, मूल और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि के मध्य में समय की अवधि, और पाण्डुलिपियों के मध्य में साहित्यिक भिन्नता का स्तर) कि बाइबल किसी भी अन्य प्राचीन लेखन कार्य की अपेक्षा बड़े उच्च स्तर में सत्यापित होती है। यह निर्णय जो हमें प्रमाणों सहित आगे की ओर बढ़ाता है अपने सर्वोत्तम रूप में निम्नलिखित अभिव्यक्ति के द्वारा प्रगट किया है:

नए नियम के अनुप्रमाणित मूलपाठ के प्रति सन्देहवादी होना शास्त्रीय प्राचीनता को अस्पष्टता में खो देना है, क्योंकि प्राचीन समयकाल के किसी भी दस्तावेज के संदर्भग्रन्थ की उतनी अच्छी पुष्टि नहीं हुई है जितनी अच्छी नया नियम की हुई है” (मोन्टागोमरी, मसीहियत का इतिहास. 1971, पृ. 29)

वह जो कुछ कह रहा है उसे तर्कयुक्त होना चाहिए, यदि हम बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता के ऊपर सन्देह करें तब हम साथ ही उस सब का इन्कार कर देंगे जिसे हम इतिहास के बारे में सामान्य रूप से जानते हैं – और इसे किसी भी सूचित इतिहासकार ने कभी नहीं किया है। हम जानते हैं कि बाइबल का मूलपाठ कभी भी परिवर्तित नहीं हुआ है जबकि सदियाँ, भाषाएँ और साम्राज्य आए और गए जबकि प्रारम्भिक पाण्डुलिपियाँ इन सभी घटनाओं से पहले की तिथि की हैं। बाइबल एक विश्‍वसनीय पुस्तक है।

संस्कृत और इब्रानी वेदों का सम्मिलन: क्यों?

मेरी पिछली पोस्ट अर्थात् लेख में मैंने संस्कृत वेदों में मनु के वृतान्त और इब्रानी वेदों में नूह के वृतान्त के मध्य में कई समानताओं को देखा था। और यह सम्मिलन जल प्रलय के वृतान्त से बहुत आगे की ओर चला जाता है। जैसा कि हमने देखा था, उत्पत्ति नामक इब्रानी पुस्तक में दिए हुए प्रतिज्ञात् वंश और समय के उदय होने के साथ ही पुरूषा की प्रतिज्ञा  के मध्य में एक जैसा ही सम्मिलन पाया जाता है। इस तरह से हम कैसे इन सम्मिलनों को देखते हैं? क्या यह कोई संयोग के कारण है? क्या कोई वृतान्त किसी अन्य के वृतान्त का उपयोग कर रहा है या दूसरे की सामग्री को चोरी कर के लिख रहा है? यहाँ पर मैं एक सुझाव को प्रस्तुत करता हूँ।

बाबुल का गुम्मट – जल प्रलय के पश्चात् का वृतान्त

नूह के वृतान्त के पश्चात्, वेद पुस्तक (बाइबल) उसके तीनों पुत्रों के वंशजों का उल्लेख करता चला जाता है और यह कहता है कि, “जल प्रलय के पश्चात् पृथ्वी भर की जातियाँ इन्हीं में से होकर बँट गईं।” (उत्पत्ति 10:32)। संस्कृत के वेद साथ ही यह भी घोषणा करते हैं कि मनु के तीन पुत्र थे जिनसे सारी मानवजाति उत्पन्न हुई। परन्तु कैसे पृथ्वी पर “फैलने का” यह कार्य प्रगट हुआ?

प्राचीन इब्रानी वृतान्त नूह के इन तीन पुत्रों के वंशजों के नाम और सूची का विवरण देता है। आप इसे यहाँ पर सम्पूर्ण सूची को पढ़ सकते हैं। तब यह वृतान्त यह विवरण देते चला जाता है कि कैसे इन सन्तानों ने इलोहीम या प्रजापति – सृष्टिकर्ता के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की, जिसने उन्हें इस ‘पृथ्वी को भर देने’ के लिए आदेश दिया था (उत्पत्ति 9:1)। परन्तु इसकी अपेक्षा ये लोग एक गुम्मट का निर्माण करने के लिए इकट्ठे साथ रहने लगे। आप इस वृतान्त को यहाँ  पर पढ़ सकते हैं। यह वृतान्त यह कहता है कि यह एक ऐसा गुम्मट था ‘जिसकी चोटी आकाश से बातें करती थी’ (उत्पत्ति 11:4)। इसका अर्थ यह हुआ कि नूह की इस पहली सन्तान के द्वारा गुम्मट के निर्माण का उद्देश्य सृष्टिकर्ता की उपासना करने की अपेक्षा तारों और सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों आदि की पूजा करने का था। यह एक जानी-पहचानी सच्चाई है कि तारों की पूजा का आरम्भ मेसोपोटामिया में हुआ था (जहाँ पर ये सन्तानें रह रही थीं) और इसके पश्चात् यह यहाँ से पूरे संसार में फैल गई। धर्म शब्दकोष संदर्भ तारों की आराधना के लिए ऐसे कहता है:

यह निश्चित रूप से मेसोपोटामिया में ईसा पूर्व दो शताब्दियों [10: i–iii ] पूर्व और केन्द्रीय अमेरिका के माया के मध्य में [9: v ] हुआ। तारों-की-आराधना कदाचित् प्रागैतिहासिक उत्तरी यूरोप के महा पाषण सम्बन्धी खगोलीय स्थलों में पाई जाती थी [9: ii–iii; उदा. के लिए., स्टोनहँन्ज अर्थात् एक महापाषाण शिलावर्त] और ऐसे ही स्थल उत्तरी अमेरिका में पाए जाते हैं [9: iv; उदा. के लिए., बिग हार्न मेडीसन व्हिल the Big Horn medicine wheel].मेसोपोटामिया से तारों की आराधना यूनानी-रोमन संस्कृति में आ गई…

इस तरह से सृष्टिकर्ता की आराधना करने की अपेक्षा, हमारे पूर्वजों ने तारों की आराधना की। फिर यह वृतान्त हताश करने के लिए ऐसे कहता है ताकि भ्रष्टाचार की आराधना अपरिवर्तनीय न बन जाए, सृष्टिकर्ता ने यह निर्णय लिया कि

वह उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल देगा ताकि वह एक दूसरे को समझ न सकें। (उत्पत्ति 11:7)

जिसके परिणामस्वरूप, नूह की इस पहली सन्तान ने एक दूसरे को समझ न सकी और इस तरह से सृष्टिकर्ता ने

उन्हें वहाँ से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया (उत्पत्ति 11:8)

दूसरे शब्दों में, एक बार जब ये लोग और अधिक आपस में बात न कर सके, तो वे एक दूसरे, अपने नवगठित भाषाई समूहों में बिखर गए, और इस प्रकार वे ‘फैल’ गए। यह विवरण देता है कि कैसे विभिन्न लोगों के समूह आज संसार में एक दूसरे से बहुत ही भिन्न भाषा को बोलते हैं, जबकि यह सभी मेसोपोटामिया में अपने मूल केन्द्र में से निकल कर (कभी कभी कई पीढ़ियों के पश्चात्) ऐसे स्थानों में फैले थे जहाँ वह आज पाए जाते हैं। इस प्रकार उनसे सम्बन्धित इतिहास इस स्थान से आगे एक दूसरे से भिन्न हो जाता है। परन्तु प्रत्येक भाषाई समूह (जिन्होंने इन प्रथम जातियों गठन किया) का इस स्थान  तक एक सामान्य इतिहास रहा है। इस सामान्य इतिहास में पुरूषा के बलिदान के द्वारा मोक्ष की प्रतिज्ञा और मनु (नूह) के जल प्रलय का वृतान्त सम्मिलित है। संस्कृत के ऋषियों ने इन वृतान्तों को उनके वेदों के द्वारा स्मरण किया है और इब्रानियों ने इस जैसी ही घटनाओं को उनके वेदों (ऋषि मूसा की तोराह) के द्वारा स्मरण किया है।

समय के आरम्भ से – विभिन्न जल प्रलयों के वृतान्तों की गवाही

यह वृतान्त इन प्रारम्भिक वेदों के मध्य में पाई जाने वाली समानताओं और सम्मिलनों का वर्णन करता है। परन्तु क्या इस स्पष्टीकरण के समर्थन में और आगे प्रमाण पाए जाते हैं? दिलचस्प बात यह है, कि जल प्रलय के वृतान्त को केवल प्राचीन इब्रानी और संस्कृत वेदों में ही स्मरण नहीं किया गया है। विश्व भर में विभिन्न लोगों के समूहों ने उनसे सम्बन्धित इतिहासों में जल प्रलय के वृतान्त को स्मरण किया है। निम्न चार्ट इसे दर्शाता है।

Flood accounts from cultures around the world compared to the flood account in the Bible
संसार के चारों ओर की संस्कृतियों के जल प्रलय की बाइबल में पाए जाने वाले जल प्रलय के वृतान्त के साथ तुलना

चार्ट के शीर्ष पर यह विभिन्न भाषाओं के समूहों को दिखाता है जो संसार में चारों ओर – प्रत्येक महाद्वीप में रहते हैं। चार्ट में दिए हुए कक्ष यह सूचित करते हैं कि इब्रानी जल प्रलय का वृतान्त (चार्ट में बाएँ तरफ नीचे की ओर सूचीबद्ध किया हुआ है) उनके अपने जल प्रलय के वृतान्त को भी निहित करता है या नहीं। काले कक्ष सूचित करते हैं कि यह वर्णन उनके जल प्रलय के वृतान्त में नहीं  पाए जाते हैं, जबकि काले कक्ष यह सूचित करते हैं कि यह वर्णन उनके अपने स्थानीय वृतान्त में नहीं  पाया जाता है। आप देख सकते हैं कि लगभग इन सभी समूहों में कम से कम उनके ‘स्मरण’ में सामान्य एक बात यह है कि जल प्रलय सृष्टिकर्ता की ओर से एक न्याय के रूप में आया था परन्तु यह कि कुछ मनुष्यों को एक बड़ी किश्ती में बचा लिया गया था। दूसरे शब्दों में, इस जल प्रलय का स्मरण न केवल संसार की अन्य सांस्कृतिक इतिहासों और महाद्वीपों को छोड़कर अपितु संस्कृत अपितु इब्रानी वेदों में भी पाया जाता है। यह इस घटना की ओर संकेत करता है कि यह हमारे सुदूर अतीत में घटित हुआ है।

हिन्दी पंचाँग की गवाही

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हिन्दी पंचाँग –महीने के दिन ऊपर से नीचे की ओर आते हैं, परन्तु एक सप्ताह 7-दिनों का होता है

यह तब की बात है जब मैंने भारत की यात्रा की और इसमें कार्य किया तब मुझे एक अन्य समर्थन देने वाली गवाही के प्रति पता लग गया – परन्तु जब आप इसके बारे में जानेंगे तो यह आपके लिए और भी अधिक उल्लेखनीय बन जाएगी। यह एक स्पष्टीकरण को देने के लिए विशेष है। जब मैं भारत में कार्य कर रहा था तो मैंने कई हिन्दी पंचाँगों को देखा। मैंने ध्यान दिया कि वे पश्चिमी पंचाँगों से बहुत अधिक भिन्न थे। इस स्पष्ट सी दिखाई देने वाली भिन्नता यह थी इन पंचाँगों का निर्माण इस तरह से हुआ है ताकि दिनों के स्तम्भ (ऊपर से नीचे) पँक्तियों (बाएँ से दाएँ) में चलने की अपेक्षा नीचे की ओर जाएँ, जो कि पश्चिम में संकेत चिन्ह के लिए विश्वव्यापी तरीका है। कुछ पंचाँगों में पश्चात्य ‘1, 2, 3…’ की अपेक्षा भिन्न अंक पाए जाते हैं क्योंकि वे हिन्दी लिपि (१, २,  ३ …) का उपयोग करते हैं। मैं समझ सकता था, और मैंने इस तरह की भिन्नता की अपेक्षा भी की क्योंकि एक पंचाँग को सूचित करने के लिए कोई एक ‘सही’ तरीका है ही नहीं। परन्तु यह केन्द्रीय सम्मिलन की बात थी – इन सभी भिन्नताओं के मध्य में – इसने मेरे ध्यान को आकर्षित कर लिया। हिन्दी के पंचाँग ने 7-दिन के सप्ताह का उपयोग किया – ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य संसार में किया जाता है। क्यों ? मैं समझ सकता था कि क्यों पंचाँग वर्षों और महीनों में बाँटा हुआ था ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य के पंचाँग में होता है क्योंकि यह सूर्य के चारों ओर पृथ्वी और पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमाओं के ऊपर आधारित होते हैं – इस प्रकार सभी लोगों को विश्वव्यापी खगोलीय नींव को प्रदान करते हैं। परन्तु ‘सप्ताह’ के लिए कोई भी खगोलीय समय का आधार नहीं है। जब मैंने लोगों को पूछा तो उन्होंने कहा कि यह प्रथा और परम्परा आधारित थे जो उनके इतिहास की ओर ले चलती है (कितनी दूर तक इसका किसी को भी पता नहीं है)।

…और बौद्ध थाई पंचाँग     

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थाई पंचाँग बाएँ से दाईं ओर चलता है, परन्तु पश्चिम की अपेक्षा एक भिन्न वर्ष का होता है, तथापि 7-दिन के सप्ताह का ही होता है

मुझे साथ ही थाईलैंड में रहने और कार्य करने का अवसर मिला है। जब मैं वहाँ रहता था तो मैं उनके पंचाँगों को देखता था। एक बौद्ध देश होने के कारण, थाई अपने पंचाँग का आरम्भ बुद्ध के जीवन से आरम्भ करते हैं जिस कारण उनके वर्ष सदैव पश्चिम के देशों के पंचाँगों से 543 वर्ष ज्यादा होते हैं (उदा. के लिए., ईस्वी सन् 2013 का अर्थ थाई पंचाँग में – बुद्ध युग का – 2556 वर्ष हुआ)। परन्तु एक बार फिर से वे 7-दिन के सप्ताह का ही उपयोग करते थे। इसे उन्होंने कहाँ से प्राप्त किया? क्यों विभिन्न देशों में पंचाँग आपस में कई तरीकों से इतनी अधिक भिन्नता रखते हुए भी 7-दिन के सप्ताह के ऊपर ही आधारित है जबकि इस पंचाँग के समय की इकाई का वास्तव में कोई खगोलीय आधार नहीं है?

सप्ताह के ऊपर प्राचीन यूनानियों का गवाही

हिन्दी और थाई पंचाँगों की इन टिप्पणियों ने मुझे यह देखने के लिए मजबूर कर दिया कि क्या 7-दिन का सप्ताह अन्य प्राचीन संस्कृतियों में भी दिखाई देता है या नहीं। और यह दिखाई देता है।

प्राचीन यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स, जो लगभग 400 ईसा पूर्व रहते थे जिन्हें आधुनिक चिकित्सा का पिता माना जाता है और उन्होंने ऐसी पुस्तकों को लिखा है, जिसमें उनकी चिकित्सीय टिप्पणियों की रिकॉर्डिंग पाई जाती है को,आज के दिन तक संरक्षित रखा गया है। ऐसा करने के लिए उन्होंने समय की इकाई को ‘सप्ताह’ के रूप में ही उपयोग किया है। किसी एक निश्चित बीमारी के बढ़ते हुए लक्षणों के बारे में उन्होंने ऐसा लिखा है:

चौथा दिन साँतवें का संकेत करता है; आठवाँ दूसरे सप्ताह का आरम्भ है; और इस तरह से ग्यारहवाँ दूसरे सप्ताह का चौथा, भी संकेतात्मक है; और एक बार फिर से, सातवाँ चौदवें से चौथा, और ग्यारहवें से सातवाँ होने के कारण संकेतात्मक है (हिप्पोक्रेट्स, सूक्तियाँ. #24)

अरस्तू, 350 ईसा पूर्व में अपने लेखन कार्य में निरन्तर समय के बँटवारे के लिए ‘सप्ताह’ का उपयोग करता है। उदाहरण के रूप में वह लिखता है कि:

शिशुकाल में होने वाली मौतों का बहुमत बच्चे के एक सप्ताह की उम्र में ही प्रगट होते है इसलिए इस उम्र में ही बच्चे का नामकरण करने की परम्परा, इस मान्यता से पाई जाती है कि अब उसके बचने के अवसर अधिक उत्तम हैं। (अरस्तु, पशुओं का इतिहास. भाग 12, 350 ईसा पूर्व)

इस तरह से कहाँ से इन प्राचीन यूनानी लेखकों ने, जो भारत और थाईलैंड से दूर थे, ने इस तरह से एक ‘सप्ताह’ के विचार को पाया जिसका उन्होंने उपयोग यह अपेक्षा करते हुआ किया कि उनके यूनानी पाठक यह पहले से ही जानते हैं कि एक सप्ताह क्या होता है? कदाचित् अतीत में इन सभी संस्कृतियों में कोई एक ऐतिहासिक घटना घटित हुई थी (यद्यपि हो सकता है कि वे इसे भूल गए होंगे) जिसने 7-दिन के सप्ताह की स्थापना की थी?

इब्रानी वेद इस तरह की एक घटना – संसार की आरम्भिक सृष्टि का वर्णन करता है। इस विस्तृत और प्राचीन वृतान्त में सृष्टिकर्ता संसार की रचना करता और पहले लोगों को 7 दिनों (वास्तव में 6 दिनों और एक 7वें दिन आराम के साथ) में निर्मित करता है। इस कारण से, प्रथम मानवीय जोड़े ने तब 7-दिन के इतिहास को अपने पंचाँग में समय की इकाई के रूप में उपयोग किया। जब मानवजाति उत्तरोत्तर काल में भाषा की गड़बड़ी के कारण बिखर गई तब ये मुख्य घटनाएँ जो ‘बिखरने’ से पहले घटित हुई थीं तब इनमें से कुछ  विभिन्न भाषाई समूहों के द्वारा स्मरण रखा गया, जिसमें आने वाले बलिदान की प्रतिज्ञा, एक विनाशकारी जल प्रलय का वृतान्त और साथ ही 7-दिन का सप्ताह सम्मिलित हैं। ये स्मृतियाँ आरम्भिक मानवजाति की कलाकृतियाँ और इन वेदों में वर्णित इन घटनाओं के इतिहास के लिए एक विधान है। यह स्पष्टीकरण निश्चित रूप से इब्रानी और संस्कृत वेदों के सम्मिलन की व्याख्या के लिए सबसे अधिक स्पष्ट और साधारण तरीका है। बहुत से लोग आज इन प्राचीन रचनाओं को मात्र पौराणिक कथाएँ मानते हुए स्वीकार नहीं करते हैं परन्तु ये सम्मिलन हमें इस पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करना चाहिए।

इस तरह से आरम्भिक मानवजाति का एक सामान्य इतिहास था, और इस इतिहास में सृष्टिकर्ता की ओर से मोक्ष की प्रतिज्ञा सम्मिलित थी। परन्तु कैसे यह प्रतिज्ञा पूर्ण होगी? हम अपने अध्ययन को एक पवित्र पुरूष के वृतान्त से आगे बढ़ाएंगे जो भाषाओं में गड़बड़ी के कारण लोगों के बिखर जाने के तुरन्त पश्चात् रहा। हम हमारे अगले लेख में आगे जारी रखेंगे।

यीशु के बलिदान से कैसे शुद्धता के वरदान को प्राप्त किया जा सकता है?

यीशु सभी लोगों के लिए स्वयं का बलिदान देने के लिए आया । यही सन्देश प्राचीन ऋग्वेद के भजनों में प्रतिछाया स्वरूप और साथ ही साथ प्रतिज्ञाओं में और प्राचीन इब्रानी वेदों में मिलता है। यीशु उस प्रश्न का उत्तर है जिसे हम प्रत्येक बार उच्चारित की गईप्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना के समय पूछते हैं। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबल (वेद पुस्तक) कर्मों की एक ऐसी व्यवस्था की घोषणा करती है जो हम सभों को प्रभावित करती है:

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है…(रोमियों 6:23)

नीचे मैंने एक उदाहरण के द्वारा कर्मों की व्यवस्था को दिखलाया है। “मृत्यु” का अर्थ  सम्बन्ध विच्छेद से है। जब हमारे प्राण हमारे शरीर से अलग हो जाते हैं तो हम शारीरिक रूप से मर जाते हैं। इसी तरह से हम परमेश्‍वर से आत्मिक रूप से अलग हो जाते हैं। ऐसा इसलिये सत्य है क्योंकि परमेश्‍वर पवित्र (पाप रहित) है।

पाप ने मृत्यु की ओर जाता है - भगवान से जुदाई
हम परमेश्‍वर से अलग हमारे पापों के कारण ऐसे हैं जैसे कि दो चोटियों के बीच एक खाई होती है

हम स्वयं का चित्रण ऐसे कर सकते हैं जैसे एक चोटी पर तो हम हैं और दूसरी चोटी पर परमेश्‍वर स्वयं है और हम इस पाप की अथाह खाई से अलग किए हुए हैं ।

यह विच्छेद दोष और डर को उत्पन्न करता है। इसलिए हम स्वाभाविक रूप से एक पुल को निर्मित करने का प्रयास करते हैं जो हमें हमारी तरफ से (मृत्यु से) परमेश्‍वर की ओर ले जाए। हम बलिदानों को अर्पण करते हैं, पूजा पाठ करते हैं, तपस्या को करते हैं, त्योहारों में भागी होते हैं, मन्दिरों में जाते हैं, कई तरह की प्रार्थनाएँ करते हैं और यहाँ तक कि हम पाप को न करने या कम करने की कोशिशें करते हैं। कर्मों की यह सूची सद्कर्मों को प्राप्त करने के लिए हम में से कइयों के लिए लम्बी हो सकती है । समस्या यह है कि हमारे प्रयास, सद्गुण, बलिदान और तपस्या से भरे हुए कार्य आदि., यद्यपि स्वयं में बुरे नहीं हैं, परन्तु फिर भी पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि जिस कीमत की अदायगी (मजदूरी) की आवश्यकता हमारे पापों के लिए है वह मृत्यु है। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है।

धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।
धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।

हमारे धार्मिक प्रयासों के द्वारा हम ऐसे ‘पुल’ का निर्माण करते हैं जो कि परमेश्‍वर से अलग होने वाले मार्ग को पाटने की कोशिश करे। यद्यपि यह बुरा नहीं हैं, तौभी यह हमारी समस्या का समाधान  नहीं करता है क्योंकि यह दूसरी तरफ पहुँचाने में पूरी तरह से सफल नहीं होता है। हमारे प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। यह कैंसर (जिसका अन्त मृत्यु ही है) को केवल साग सब्जियों को खाकर ही ठीक करने के प्रयास जैसा ही है। साग सब्जियाँ खाना बहुत अच्छा है – परन्तु यह कैंसर को चंगा नहीं करता है । इसके लिए आपको पूरी तरह से एक भिन्न उपचार की अवश्यकता है । हम इन प्रयासों को एक धार्मिक सद्गुणों के एक ऐसे ‘पुल’ के रूप में चित्रित कर सकते हैं जो कि केवल-कुछ-दूरी तक ही खाई में जाते हुए – हमें फिर भी परमेश्‍वर से अलग ही रखता है।

कर्मों की व्यवस्था एक बुरा समाचार है – यह इतना बुरा है कि अक्सर हम इसके बारे में सुनना ही पसंद नहीं करते हैं और हम अक्सर अपने जीवनों को कई तरह की गतिविधियों और ऐसे बातों से यह आशा करते हुए भर देते हैं कि यह व्यवस्था चली जाएगी – और ऐसा तब तक करते हैं जब हमारी परिस्थितियों का बोझ हमारे प्राणों को चारों ओर से घेर लेता है।  परन्तु बाइबल कर्मों की व्यवस्था के साथ अन्त नहीं होती है।

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है परन्तु …(रोमियों 6:23)

छोटा सा शब्द ‘परन्तु’ यहाँ पर व्यवस्था की दिशा को दिखलाता है कि यह अब किसी और ही तरफ, अर्थात् शुभ सन्देश – सुसमाचार की ओर जाने के लिए तैयार है। यह वैसी कर्मों की व्यवस्था है जो मोक्ष और प्रकाशित होने वाले एक व्यक्ति के लिए आरक्षित की गई है। इस लिए अब मोक्ष की व्यवस्था क्या है?

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है (रोमियों 6:23)

सुसमाचार का शुभ सन्देश यह है कि यीशु की मृत्यु का बलिदान परमेश्‍वर और हमारे मध्य की खाई को पाटने वाले पुल के लिए पर्याप्त है। हम इसे जानते हैं क्योंकि अपनी मृत्यु के तीन दिन पश्चात् यीशु शारीरिक रूप से पुन: जी उठा, भौतिक रूप से पुनरूत्थान के द्वारा वह एक बार फिर से जीवित हो उठा । यद्यपि कुछ लोग आज यीशु के जी उठने में अविश्‍वास करना चुनते हैं परन्तु इसके विरोध में एक शक्तिशाली प्रमाण दिखाई देता है जिसे इस सार्वजनिक भाषण में दिया गया है जो कि मैंने एक विश्वविद्यालय में दिया था (इस विडियो लिंकको खोलें)।  प्रभु यीशु ने स्वर्ग में प्रवेश किया और स्वयं की भेंट परमेश्वर को चढ़ाई। एक अर्थ में, उसने ऐसी पूजा अर्थात् अराधना को, सभी लोगों के बदले में, स्वयं की भेंट चढाते हुए, पाप के शोधन के लिए स्वयं को अर्पण करते हुए किया, जो परमेश्वर को स्वीकारयोग्य है।

यीशु वह पुरूष है जिसने पूर्ण बलिदान को दिया । क्योंकि वह एक मनुष्य था इसलिए वह पुल को बनने के योग्य है जो उस खाई को पाट देती है और इस तरफ के मनुष्य हिस्से को छूता है और क्योंकि वह पूर्ण है इसलिए वह परमेश्‍वर की तरफ के हिस्से को भी छूता है। वह जीवन का पुल है और इसे नीचे इस तरह से चित्रित किया जा सकता है

यीशु के बलिदान के लिए पर्याप्त है
यीशु वह पुल है जो परमेश्‍वर और मनुष्य की मध्य की खाई को पाट देता है। उसका बलिदान हमारे पापों की कीमत को अदा करता है ।

इस बात में ध्यान दें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें दिया गया है । यह हमें एक …वरदान  अर्थात् उपहार के रूप में दिया गया है। इस वरदान अर्थात् उपहार के बारे में सोचें। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यह वरदान क्या है, यदि यह वास्तव में एक वरदान है तो यह ऐसा है कि जिसके लिए आपने कुछ कार्य नहीं किया है और यह कि आप इसे अपने सद्गुणों के अनुसार कमा नहीं सकते हैं। यदि आप इसे कमा लेते हैं तो यह फिर एक उपहार के रूप में नहीं रह जाता है! इसी तरह से आप यीशु के बलिदान को सद्गुणों या अपनी कमाई से कमा नहीं सकते हैं। यह आपको वरदान अर्थात् उपहार के रूप में दिया जाता है।

और यह उपहार क्या है ? यह अनन्त जीवन है । इसका अर्थ यह है कि जो पाप आपके ऊपर मृत्यु को लाया वह अब निरस्त अर्थात् रद्द कर दिया गया है । यीशु का बलिदान वह पुल है जिसके ऊपर चल कर आप परमेश्‍वर के साथ सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं और जीवन को – जो सदैव बना रहेगा – प्राप्त कर सकते हैं । यह वरदान अर्थात् उपहार यीशु के द्वारा दिया गया है जो, मृतकों में जी उठने के द्वारा, स्वयं को ‘प्रभु’ के रूप में प्रकट करता है।

इस तरह कैसे मैं और आप जीवन के इस पुल को ‘पार’ करते हैं जिसे यीशु हमें एक वरदान के रूप में देता है? एक बार फिर से, उपहारों के बारे में सोचें। यदि कोई आपके पास आता है और आपको एक उपहार देता है ऐसा उपहार जिसके लिए आपने कोई कार्य नहीं किया है। परन्तु इस उपहार से लाभ पाने के लिए आपको इसके ‘प्राप्त’ कर लेना होगा। जब कभी भी किसी एक उपहार को दिया जाता है तो इसके दो विकल्प होते हैं। या तो उपहार को अस्वीकार कर दिया जाए (“नहीं, आपका धन्यवाद”) या इसे स्वीकार कर लिया जाए (“इस उपहार के लिए आपका धन्यवाद। मैं इसे ले लेता हूँ”)। इस तरह से यह उपहार जिसे यीशु आपको दे रहा है को भी स्वीकार कर लेना चाहिए। इसमें केवल साधारण रूप से ‘विश्‍वास’, इसका ‘अध्ययन’, या इसे ‘समझना’ मात्र ही नहीं किया जाना चाहिए। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है जहाँ पर हम परमेश्‍वर की ओर मुड़ने के लिए पुल पर ‘चलते’ हैं और उस उपहार को प्राप्त करते हैं जिसे वह हमें देने का प्रस्ताव दे रहा है।

यीशु के बलिदान एक उपहार है कि हम प्राप्त करना चाहिए है
यीशु का बलिदान एक ऐसा उपहार है जिसे हम में से प्रत्येक को प्राप्त कर लेने के लिए चुन लेना चाहिए

इस लिए अब कैसे इस उपहार को प्राप्त किया जाता है ? बाइबल कहती है कि

जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा (रोमियों 10:12)

ध्यान दें यह प्रतिज्ञा ‘हर किसी’ के लिए है, न कि किसी विशेष धर्म, जाति या देश के लिए । क्योंकि वह मृतकों में जी उठा है इसलिए यीशु यहाँ तक कि अब भी जीवित है और वह ‘प्रभु’ है। इसलिए यदि आप उसको पुकारेंगे तो वह सुनेगा आपको अपने जीवन का उपहार देगा। आपको उसे – उसके साथ वार्तालाप करते हुए – पुकारना चाहिए और उससे माँगना चाहिए । कदाचित् आपने यह कभी नहीं किया होगा। यहाँ पर दिशानिर्देश दिया गया है जो कि आपको उसके साथ वार्तालाप करने और उससे प्रार्थना करने में सहायता प्रदान कर सकता है । यह कोई जादू से भरा हुआ मंत्र नहीं है। ये कोई विशेष शब्द नहीं हैं जो कि सामर्थ्य देते हैं। यह उसकी योग्यता और उसके द्वारा हमें उपहार देने की इच्छा के ऊपर भरोसा करना है। जब हम उस पर भरोसा करते हैं तो वह हमारी सुनता है और उत्तर देता है । इसलिए इस दिशानिर्देश का अनुसरण करने के लिए स्वतंत्रता को महसूस करें जब आप ऊँची आवाज में या अपनी आत्मा में यीशु से बात करते हैं और उसके उपहार को प्राप्त करते हैं ।

हे प्यारे प्रभु यीशु, मैं समझता हूँ कि मेरे जीवन के पापों के साथ मैं परमेश्‍वर से अलग हूँ। यद्यपि मैंने अपनी सर्वोत्तम कोशिशें की हैं, तौभी मेरा कोई प्रयास और बलिदान इस सम्बन्ध विच्छेद को पाट नहीं सकता है । परन्तु मैं समझता हूँ कि आपकी मृत्यु एक ऐसा बलिदान है जो हमारे सारे पापों को धो डालता है – यहाँ तक कि मेरे पापों को भी । मैं विश्‍वास करता हूँ कि आप अपने बलिदान के पश्चात मृतकों में जी उठे इस तरह से मैं जानता हूँ कि आपका बलिदान पर्याप्त है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे मेरे पापों से शुद्ध करें और मुझे परमेश्‍वर के पास ले आएँ ताकि मैं अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकूँ । मैं ऐसे जीवन को नहीं चाहता हूँ जो पाप का गुलाम हो इसलिए कृप्या करके मुझे इन पापों से शुद्ध करें जिन्होंने मुझे कर्म बन्धन में जकड़ा हुआ है। हे प्रभु यीशु, मेरे लिए यह सब कुछ करने के लिए और अब निरन्तर मुझे मेरे जीवन में मेरे प्रभु के रूप में मार्गदर्शन देते रहने के लिए आपका धन्यवाद।