मोक्ष – कर्मों से स्वतंत्रता को प्राप्त करना

कर्म, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, एक ऐसी व्यवस्था है जो कि आपके और मेरे ऊपर कार्यरत् है। कर्म का अर्थ बहुत सी बातें हो सकती हैं, परन्तु इसका मौलिक विचार हमारे द्वारा किए हुए कामों से है और धार्मिक कार्यों के लाभ और बुरे कार्यों के लिए दण्ड हमारे प्राणों के साथ जुड़ा हुआ है। जब तक हमारे कार्य पूरी तरह से धार्मिक नहीं होते तब तक हम पर इनका दण्ड है, और जब तक यह दण्ड नहीं  दे दिया जाता हम बन्धन में पड़े हुए हैं।

हम सभी किसी न किसी तरीके से सहज बुद्धि से इनका अहसास करते हैं। और हमारी बुद्धि और ज्ञान के द्वारा हमने बहुत से ऐसे तरीकों को इन जमा किए हुए कर्मों से निपटारा करने के लिए आविष्कृत कर लिया है। एक मार्ग कर्म मार्ग है (कामों का एक मार्ग) जिसमें हम भले कामों के लिए बहुत ही कठिन मेहनत करते हैं। मंत्र और पूजा हैं जिनका उच्चारण किया जाता है। त्योहार और पवित्र स्नान जैसी बातें हैं जिनमें भाग लिया जाता है, जैसे कुम्भ मेला त्योहार। ये तरीके बहुत ही कठिन हैं और हमें कभी भी आश्वस्त नहीं किया गया है कि हमारे प्रयास पर्याप्त हैं। क्या हमारे कर्मों के पीछे की गई मंशा भली थी? क्या भले कर्मों की सँख्या की मात्रा पर्याप्त है? हम इसके लिए कभी भी सुनिश्चित नहीं हैं। और इसलिए, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, हम कर्मों में बने रहते हुए, स्वयं को मोक्ष प्राप्त करने और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सक्षम नहीं हैं। इसलिए ही पूजा करने से पहले अधिकांश लोग प्ररथास्नाना (या प्रतासना) मंत्र (“मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ। मैं पाप में उत्पन्न हुआ। मेरा प्राण पाप के अधीन है। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।”) का उच्चारण करते हैं।

प्रजापति/यहोवा: ऐसा परमेश्‍वर जो बलिदान में प्रबन्ध करता है 

इसलिए अब “बलिदान का यह प्रभु कौन है?” और यह कैसे हमें कर्मों की व्यवस्था से बचा सकता है? सबसे प्राचीन वेद  के लेखों में, परमेश्‍वर जो सारी सृष्टि का प्रभु था – जिसने इसे रचा और ब्रह्माण्ड को अपने नियंत्रण में रखता है – को प्रजापति कह कर पुकारा जाता था। यह प्रजापति ही है जिसके द्वारा बाकी का सब कुछ अस्तित्व में आया है।

ऋग्वेद के लिखे जाने के समय के आस पास ही, लगभग 1500 ईसा पूर्व पवित्रशास्त्र का एक और हिस्सा पृथ्वी की दूसरी छोर – जिसे अब मध्य पूर्व द्वीप कह कर पुकारा जाता है, पर लिखा जा रहा था। वेद पुस्तक (बाइबल) के ये आरम्भिक इब्रानी मूल प्रतियाँ को तोरह  के नाम से जाना जाता है। तोरह इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि एक ही परमेश्‍वर है जो इस  पूरे ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। मूल इब्रानी भाषा के लिप्यान्तरण में इस परमेश्‍वर को या तो इलोहीम  या फिर यहोवा  कह कर पुकारा जाता था, और इन नामों को एक दूसरे के स्थान पर और इन इब्रानी मूल प्रतियों में सभी स्थानों पर उपयोग किया जाता था। इस प्रकार, ऋग्वेद के प्रजापति के जैसे ही, तोरह का यहोवा  या इलोहीम  पूरी सृष्टि का प्रभु था (और है)।

तोरह के आरम्भ में, यहोवा ने स्वयं को उस परमेश्‍वर में प्रगट किया है जो एक ऋषि जिसे अब्राहम कह कर पुकारा जाता है, के साथ हुई मुठभेड़ में उल्लेखनीय तरीके से ‘प्रबन्ध करने वाले’ के रूप में स्वयं को प्रगट करता है। हम बाद में इस मुठभेड़ पर और अधिक विस्तार से देखेंगे। अभी कुछ पलों के लिए, मैं चाहता हूँ कि आप यहोवा जो प्रबन्ध करता है (इब्रानी भाषा के यहोवा-यिरे का लिप्यान्तरण) और ऋग्वेद के प्रजापति जो कि “सृजे हुओं का समर्थक और सुरक्षा करने वाला”  है, के मध्य पाई जाने वाली समानताओं  के ऊपर ध्यान दें।

किस तरीके में यहोवा प्रबन्ध करता है? हमने पहले ही इस आवश्यकता की ओर ध्यान दे दिया है कि हमें कर्मों से छुटकारा प्राप्त करना है, और हमने उस मंत्र के ऊपर भी ध्यान दे दिया है जिसमें ‘बलिदान वाले प्रभु’ से प्रार्थना की गई है। ऋग्वेद निम्न बात कहते हुए उसी के ऊपर और अधिक विस्तार करता है:

वास्तविक बलिदान स्वयं प्रजापति ही है”

[संस्कृति: प्रजापतिर य़ाञा:]

शतपथ ब्राह्मण का भाषान्तरण करते हुए संस्कृत के विद्वान ऐच. अगुलीआर निम्न टिप्पणी देते है:

“और वास्तव में, इस बलिदान को पूरा करने के लिए और कोई भी (पीड़ित) नहीं था, परन्तु केवल प्रजापति ही था और देवताओं ने उसे बलिदान के लिए तैयार कर दिया। इस कारण इस संदर्भ के सम्बन्ध में ऋषि ने कहा है, ‘कि देवताओं ने बलिदान की सहायता से इस बलिदान को भेंट में चढ़ा दिया – क्योंकि बलिदान की सहायता के द्वारा उन्होंने उस को (प्रजापति) भेंट में चढ़ा दिया, बलिदान – ये सबसे पहले विधान थे, क्योंकि व्यवस्थाएँ सबसे पहले स्थापित की गई थीं।” ऐच. अगुलीआर, ऋग्वेद में बलिदान

प्राचीन समय से वेद घोषणा करते आ रहे हैं कि प्रजापति (या यहोवा) ने हमारी आवश्यकता की पहचान कर ली थी इसलिए उसने हमारे कर्मों के लिए स्वयं-को-बलिदान के लिए देने का प्रबन्ध किया। उसने ऐसा कैसे किया हम बाद के लेखों में देखेंगे जब हम ऋग्वेद के पुरूषासूक्ता में पुरूषा-प्रजापति के बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करेंगे, परन्तु अभी के लिए केवल इतना ही सोचें कि यह कितना महत्वपूर्ण है। श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8 ऐसे कहता है:

‘अनन्त जीवन का अन्य कोई मार्ग नहीं है’ (संस्कृत में :णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

यदि आप कर्मों से बचने की रूचि रखते हैं, यदि आप मोक्ष या आत्म जागृति की इच्छा रखते हैं तब इस बात की जानकारी होना बुद्धिमानी है कि क्यों और कैसे प्रजापति (या यहोवा) ने हमारे लिए यीशु में स्वयं-के-बलिदान के द्वारा प्रबन्ध करते हुए प्रगट किया है ताकि हम कर्मों से बच सकें और स्वर्ग को प्राप्त कर सकें। और वेद हमें मार्ग में नहीं छोड़ देते हैं। ऋग्वेद में पुरूषासूकता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान होने का विवरण देता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को देखने के लिए क्लिक करें जो पुरूषा का विवरण वैसे ही देता है जैसे बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) का करती है और उसका बलिदान आप तक मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेकर आता है। इसके पश्चात् हम इन वेदों के अध्ययन को जारी रखेंगे और देखेंगे कि कैसे प्राचीन ऋषि अय्यूब कर्मों से स्वयं की स्वतन्त्रता की घोषणा और शाश्‍वत जीवन – उसे मोक्ष प्रदान किया गया था, की अपेक्षा कर सका।

बलिदान की विश्वव्यापी आवश्यकता

ऋषि और मुनिगण युगों से जानते थे कि लोग छल अर्थात् माया और पाप में जीवन व्यतीत करेंगे। यह सभी धर्मों, युगों के लोगों और शैक्षणिक योग्यताओं के स्तर पर एक सहज ज्ञान की जागरूकता के साथ प्रगट हुआ कि उन्हें किसी न किसी तरीके से ‘शुद्ध’ होने की आवश्यकता है। इसलिए ही बहुत से लोग कुम्भ मेले के त्योहार में भाग लेते हैं और क्यों पूजा करने से पहले लोग प्ररथास्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना करो करते हैं (“मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ। मैं पाप में उत्पन्न हुआ। मेरा प्राण पाप के अधीन है। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।”)। शुद्ध होने के इस सहज ज्ञान के साथ-साथ बलिदान देने की आवश्यकता का भाव भी है कि किसी न किसी तरीके से हमारे पापों के जुर्माने या हमारे जीवन के अन्धकार (तमस) को ‘अदा’ कर दिया जाए। और एक बार फिर से बलिदानों की पूजा में, या कुम्भ मेले और अन्य त्योहारों में लोग समय, धन, तपस्या को देते हैं ताकि बलिदान के इस सहज ज्ञान की आवश्यकता को पूर्ण कर सकें। मैंने सुना है कि लोग गाय को लेते हैं और उसकी पूँछ पकड़े हुए नदी के उस पार उतरते हैं। यह एक पूजा या बलिदान के रूप में क्षमा को कमाने के लिए किया जाता है।

बलिदान को देने की आवश्यकता तब तक हमारे चारों ओर रहेगी जब तक प्राचीनत्तम धार्मिक लेख हमारे चारों ओर रहेंगे। और ये लेख पुष्टि करते हैं कि जो कुछ हमारा सहज ज्ञान हमें कहता है – वह यह है कि बलिदान बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसे दिया ही जाना चाहिए। उदाहरण के लिए नीचे दी हुई शिक्षाओं के ऊपर विचार करें:

कठोपनिषद् (हिन्दू लेख) में नायक नचीकेता कहता है:

“मैं सचमुच में जानता हूँ कि बलिदान स्वर्ग की ओर ले चलते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति का मार्ग है”

कठोपनिषद् 1/14

हिन्दू पुस्तक कहती है:

“बलिदान के माध्यम से ही मनुष्य स्वर्ग पहुँचता है” शतपथब्राह्मण VII. 6/1/10

“बलिदान के तरीके से, न केवल मनुष्य अपितु देवता भी अमरत्व को प्राप्त कर लेते हैं” शतपथब्राह्मण II. 2/2/8-14

परिणामस्वरूप, बलिदान के माध्यम से ही हम अमरत्व और स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। परन्तु प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि किस तरह का बलिदान और कितना अधिक दण्ड की कीमत ‘अदा’ करने के लिए पर्याप्त है या हमारे पापों/तमस के विरूद्ध लाभ कमाने के लिए आवश्यक है? क्या 5 वर्षों की तपस्या इसके लिए पर्याप्त है? क्या गरीबों को धन देना एक बलिदान के लिए पर्याप्त है? और इसी तरह की अन्य बातें, कितना पर्याप्त है?

प्रजापति/यहोवा : बलिदान का प्रबन्ध करने वाला परमेश्‍वर

सबसे प्राचीनत्तम वेद के लेखों में, परमेश्‍वर जो सृष्टि का प्रभु था–जिसने इसे रचा और ब्रह्माण्ड को अपने नियंत्रण में रखता है – को प्रजापति कह कर पुकारा जाता था। यह प्रजापति ही है जिसके द्वारा बाकी का सब कुछ अस्तित्व में आया है।

ऋग्वेद के लिखे जाने के समय के आस पास ही, लगभग 1500 ईसा पूर्व पवित्रशास्त्र का एक और हिस्सा पृथ्वी की दूसरी छोर – जिसे अब मध्य पूर्व द्वीप कह कर पुकारा जाता है, पर लिखा जा रहा था। वेद पुस्तक (बाइबल) के ये आरम्भिक इब्रानी मूल प्रतियाँ को तोरह के नाम से जाना जाता है। तोरह इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि एक ही परमेश्‍वर है जो इस पूरे ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। मूल इब्रानी भाषा के लिप्यान्तरण में इस परमेश्‍वर को या तो इलोहीम या फिर यहोवा कह कर पुकारा जाता था, और इन नामों को एक दूसरे के स्थान पर और इन इब्रानी मूल प्रतियों में सभी स्थानों पर उपयोग किया जाता था। इस प्रकार, ऋग्वेद के प्रजापति के जैसे ही, तोरह का यहोवा या इलोहीम पूरी सृष्टि का प्रभु था (और है)।

तोरह के आरम्भ में, यहोवा स्वयं को प्रबन्ध करने वाले परमेश्‍वर के रूप में एक ऋषि जिसे अब्राहम कह कर पुकारा जाता है, के साथ हुई मुठभेड़ में उल्लेखनीय तरीके से स्वयं को प्रगट करता है। हम बाद में इस मुठभेड़ पर और अधिक विस्तार से देखेंगे। अभी कुछ पलों के लिए, मैं चाहता हूँ कि आप यहोवा जो प्रबन्ध करता है (इब्रानी भाषा के यहोवा-यिरे का लिप्यान्तरण) और ऋग्वेद के प्रजापति जो कि “सृजे हुओं का समर्थक और सुरक्षा करने वाला” है, के मध्य पाई जाने वाली समानताओं के ऊपर ध्यान दें।

किस तरीके में यहोवा प्रबन्ध करता है? हमने पहले ही इस लोगों के द्वारा बलिदान दिए जाने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान दे दिया है परन्तु इस बात की निश्चितता के बिना कि जिस बलिदान को हम ला रहे हैं वह पर्याप्त है। सबसे अधिक रूचिपूर्ण बात जो है वह यह है कि हमारी आवश्यकता के इस विशेष क्षेत्र में तन्डयामाहा ब्राह्मण यह घोषणा करता है कि कैसे हमारी आवश्यकता के लिए प्रजापति प्रबन्ध करेगा। यह कहता है:

प्रजापति (सारी सृष्टि के प्रभु) ने स्वयं-का-बलिदान को देवताओं की भेंट के लिए चढ़ा दिया” तन्डयामाहा ब्राह्मण, अध्याय 7 का 2रा काण्ड। [संस्कृत में – “प्रजापतिर्द्देवेभ्यम् अत्मनम्य़ज्नम्क्र्त्व प्रयच्चत्”]

यहाँ पर प्रजापति एक वचन है। केवल एक ही प्रजापति है, ठीक वैसे ही जैसे तोरह में एक ही यहोवा है। बाद में पुराणों के साहित्य (ईस्वी सन् 500-1000 में लिखे गए) में कई प्रजापतियों की पहचान की गई है। परन्तु सबसे प्राचीनत्तम लेखों में जैसा कि ऊपर लिखा गया है प्रजापति एकवचन है। और इस कथन में हम देखते हैं कि प्रजापति स्वयं को दे देता है या वह स्वयं बलिदान है और वह अन्यों के बदले में स्वयं को दे देता है। ऋग्वेद यह कहते हुए पुष्टि करते हैं:

“वास्तविक बलिदान स्वयं प्रजापति ही है” [संस्कृत: प्रजापतिरय़ाञा:]

शतपथब्राह्मण का भाषान्तरण करते हुए संस्कृत के विद्वान ऐच. अगुलीआर निम्न टिप्पणी देते हैं:

“और वास्तव में, इस बलिदान को पूरा करने के लिए और कोई भी (पीड़ित) नहीं था, परन्तु केवल प्रजापति ही था और देवताओं ने उसे बलिदान के लिए तैयार कर दिया। इस कारण इस संदर्भ के सम्बन्ध में ऋषि ने कहा है, ‘कि देवताओं ने बलिदान की सहायता से इस बलिदान को भेंट में चढ़ा दिया– क्योंकि बलिदान की सहायता के द्वारा उन्होंने उसको (प्रजापति) भेंट में चढ़ा दिया, बलिदान– ये सबसे पहले विधान थे, क्योंकि व्यवस्थाएँ सबसे पहले स्थापित की गई थी।” ऐच. अगुलीआर, ऋग्वेद में बलिदान

प्राचीन समय से वेद घोषणा करते आ रहे हैं कि प्रजापति (या यहोवा) ने हमारी आवश्यकता की पहचान कर ली थी इसलिए उसने हमारे कर्मों के लिए स्वयं-को-बलिदान के लिए देने का प्रबन्ध किया। उसने ऐसा कैसे किया हम बाद के लेखों में देखेंगे जब हम ऋग्वेद के पुरूषासूक्ता में पुरूषा-प्रजापति के बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करेंगे, परन्तु अभी के लिए केवल इतना ही सोचें कि यह कितना महत्वपूर्ण है। श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8 ऐसे कहता है:

‘अनन्त जीवन का अन्य कोई मार्ग नहीं है’ (संस्कृत में :णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

यदि आप शाश्‍वत जीवन में रूचि रखते हैं, यदि आप मोक्ष या आत्म जागृति की इच्छा रखते हैं तब इस बात की जानकारी होना बुद्धिमानी है कि क्यों और कैसे प्रजापति (या यहोवा) ने हमारे लिए यीशु में स्वयं-के-बलिदान के द्वारा प्रबन्ध करते हुए प्रगट किया है ताकि हम कर्मों से बच सकें और स्वर्ग को प्राप्त कर सकें। और वेद हमें मार्ग में नहीं छोड़ देते हैं। ऋग्वेद में पुरूषासूक्ता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान होने का विवरण देता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को देखने के लिए क्लिक करें जो पुरूषा का विवरण वैसे ही देता है जैसे बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) का करती है और उसका बलिदान आप तक मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेकर आता है। यहाँ पर यह समझने के लिए क्लिक करें कि यीशु के इस बलिदान से शुद्ध को कैसे प्राप्त किया जाए।

यीशु के बलिदान से कैसे शुद्धता के वरदान को प्राप्त किया जा सकता है?

यीशु सभी लोगों के लिए स्वयं का बलिदान देने के लिए आया । यही सन्देश प्राचीन ऋग्वेद के भजनों में प्रतिछाया स्वरूप और साथ ही साथ प्रतिज्ञाओं में और प्राचीन इब्रानी वेदों में मिलता है। यीशु उस प्रश्न का उत्तर है जिसे हम प्रत्येक बार उच्चारित की गईप्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना के समय पूछते हैं। ऐसे कैसे हो सकता है? बाइबल (वेद पुस्तक) कर्मों की एक ऐसी व्यवस्था की घोषणा करती है जो हम सभों को प्रभावित करती है:

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है…(रोमियों 6:23)

नीचे मैंने एक उदाहरण के द्वारा कर्मों की व्यवस्था को दिखलाया है। “मृत्यु” का अर्थ  सम्बन्ध विच्छेद से है। जब हमारे प्राण हमारे शरीर से अलग हो जाते हैं तो हम शारीरिक रूप से मर जाते हैं। इसी तरह से हम परमेश्‍वर से आत्मिक रूप से अलग हो जाते हैं। ऐसा इसलिये सत्य है क्योंकि परमेश्‍वर पवित्र (पाप रहित) है।

पाप ने मृत्यु की ओर जाता है - भगवान से जुदाई
हम परमेश्‍वर से अलग हमारे पापों के कारण ऐसे हैं जैसे कि दो चोटियों के बीच एक खाई होती है

हम स्वयं का चित्रण ऐसे कर सकते हैं जैसे एक चोटी पर तो हम हैं और दूसरी चोटी पर परमेश्‍वर स्वयं है और हम इस पाप की अथाह खाई से अलग किए हुए हैं ।

यह विच्छेद दोष और डर को उत्पन्न करता है। इसलिए हम स्वाभाविक रूप से एक पुल को निर्मित करने का प्रयास करते हैं जो हमें हमारी तरफ से (मृत्यु से) परमेश्‍वर की ओर ले जाए। हम बलिदानों को अर्पण करते हैं, पूजा पाठ करते हैं, तपस्या को करते हैं, त्योहारों में भागी होते हैं, मन्दिरों में जाते हैं, कई तरह की प्रार्थनाएँ करते हैं और यहाँ तक कि हम पाप को न करने या कम करने की कोशिशें करते हैं। कर्मों की यह सूची सद्कर्मों को प्राप्त करने के लिए हम में से कइयों के लिए लम्बी हो सकती है । समस्या यह है कि हमारे प्रयास, सद्गुण, बलिदान और तपस्या से भरे हुए कार्य आदि., यद्यपि स्वयं में बुरे नहीं हैं, परन्तु फिर भी पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि जिस कीमत की अदायगी (मजदूरी) की आवश्यकता हमारे पापों के लिए है वह मृत्यु है। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है।

धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।
धार्मिक सद्गुण – यद्यपि अच्छे हैं तौभी वह – हमारे और परमेश्‍वर के मध्य के सम्बन्ध विच्छेद के पुल को पाट नहीं सकते हैं ।

हमारे धार्मिक प्रयासों के द्वारा हम ऐसे ‘पुल’ का निर्माण करते हैं जो कि परमेश्‍वर से अलग होने वाले मार्ग को पाटने की कोशिश करे। यद्यपि यह बुरा नहीं हैं, तौभी यह हमारी समस्या का समाधान  नहीं करता है क्योंकि यह दूसरी तरफ पहुँचाने में पूरी तरह से सफल नहीं होता है। हमारे प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। यह कैंसर (जिसका अन्त मृत्यु ही है) को केवल साग सब्जियों को खाकर ही ठीक करने के प्रयास जैसा ही है। साग सब्जियाँ खाना बहुत अच्छा है – परन्तु यह कैंसर को चंगा नहीं करता है । इसके लिए आपको पूरी तरह से एक भिन्न उपचार की अवश्यकता है । हम इन प्रयासों को एक धार्मिक सद्गुणों के एक ऐसे ‘पुल’ के रूप में चित्रित कर सकते हैं जो कि केवल-कुछ-दूरी तक ही खाई में जाते हुए – हमें फिर भी परमेश्‍वर से अलग ही रखता है।

कर्मों की व्यवस्था एक बुरा समाचार है – यह इतना बुरा है कि अक्सर हम इसके बारे में सुनना ही पसंद नहीं करते हैं और हम अक्सर अपने जीवनों को कई तरह की गतिविधियों और ऐसे बातों से यह आशा करते हुए भर देते हैं कि यह व्यवस्था चली जाएगी – और ऐसा तब तक करते हैं जब हमारी परिस्थितियों का बोझ हमारे प्राणों को चारों ओर से घेर लेता है।  परन्तु बाइबल कर्मों की व्यवस्था के साथ अन्त नहीं होती है।

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है परन्तु …(रोमियों 6:23)

छोटा सा शब्द ‘परन्तु’ यहाँ पर व्यवस्था की दिशा को दिखलाता है कि यह अब किसी और ही तरफ, अर्थात् शुभ सन्देश – सुसमाचार की ओर जाने के लिए तैयार है। यह वैसी कर्मों की व्यवस्था है जो मोक्ष और प्रकाशित होने वाले एक व्यक्ति के लिए आरक्षित की गई है। इस लिए अब मोक्ष की व्यवस्था क्या है?

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है (रोमियों 6:23)

सुसमाचार का शुभ सन्देश यह है कि यीशु की मृत्यु का बलिदान परमेश्‍वर और हमारे मध्य की खाई को पाटने वाले पुल के लिए पर्याप्त है। हम इसे जानते हैं क्योंकि अपनी मृत्यु के तीन दिन पश्चात् यीशु शारीरिक रूप से पुन: जी उठा, भौतिक रूप से पुनरूत्थान के द्वारा वह एक बार फिर से जीवित हो उठा । यद्यपि कुछ लोग आज यीशु के जी उठने में अविश्‍वास करना चुनते हैं परन्तु इसके विरोध में एक शक्तिशाली प्रमाण दिखाई देता है जिसे इस सार्वजनिक भाषण में दिया गया है जो कि मैंने एक विश्वविद्यालय में दिया था (इस विडियो लिंकको खोलें)।  प्रभु यीशु ने स्वर्ग में प्रवेश किया और स्वयं की भेंट परमेश्वर को चढ़ाई। एक अर्थ में, उसने ऐसी पूजा अर्थात् अराधना को, सभी लोगों के बदले में, स्वयं की भेंट चढाते हुए, पाप के शोधन के लिए स्वयं को अर्पण करते हुए किया, जो परमेश्वर को स्वीकारयोग्य है।

यीशु वह पुरूष है जिसने पूर्ण बलिदान को दिया । क्योंकि वह एक मनुष्य था इसलिए वह पुल को बनने के योग्य है जो उस खाई को पाट देती है और इस तरफ के मनुष्य हिस्से को छूता है और क्योंकि वह पूर्ण है इसलिए वह परमेश्‍वर की तरफ के हिस्से को भी छूता है। वह जीवन का पुल है और इसे नीचे इस तरह से चित्रित किया जा सकता है

यीशु के बलिदान के लिए पर्याप्त है
यीशु वह पुल है जो परमेश्‍वर और मनुष्य की मध्य की खाई को पाट देता है। उसका बलिदान हमारे पापों की कीमत को अदा करता है ।

इस बात में ध्यान दें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें दिया गया है । यह हमें एक …वरदान  अर्थात् उपहार के रूप में दिया गया है। इस वरदान अर्थात् उपहार के बारे में सोचें। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि यह वरदान क्या है, यदि यह वास्तव में एक वरदान है तो यह ऐसा है कि जिसके लिए आपने कुछ कार्य नहीं किया है और यह कि आप इसे अपने सद्गुणों के अनुसार कमा नहीं सकते हैं। यदि आप इसे कमा लेते हैं तो यह फिर एक उपहार के रूप में नहीं रह जाता है! इसी तरह से आप यीशु के बलिदान को सद्गुणों या अपनी कमाई से कमा नहीं सकते हैं। यह आपको वरदान अर्थात् उपहार के रूप में दिया जाता है।

और यह उपहार क्या है ? यह अनन्त जीवन है । इसका अर्थ यह है कि जो पाप आपके ऊपर मृत्यु को लाया वह अब निरस्त अर्थात् रद्द कर दिया गया है । यीशु का बलिदान वह पुल है जिसके ऊपर चल कर आप परमेश्‍वर के साथ सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं और जीवन को – जो सदैव बना रहेगा – प्राप्त कर सकते हैं । यह वरदान अर्थात् उपहार यीशु के द्वारा दिया गया है जो, मृतकों में जी उठने के द्वारा, स्वयं को ‘प्रभु’ के रूप में प्रकट करता है।

इस तरह कैसे मैं और आप जीवन के इस पुल को ‘पार’ करते हैं जिसे यीशु हमें एक वरदान के रूप में देता है? एक बार फिर से, उपहारों के बारे में सोचें। यदि कोई आपके पास आता है और आपको एक उपहार देता है ऐसा उपहार जिसके लिए आपने कोई कार्य नहीं किया है। परन्तु इस उपहार से लाभ पाने के लिए आपको इसके ‘प्राप्त’ कर लेना होगा। जब कभी भी किसी एक उपहार को दिया जाता है तो इसके दो विकल्प होते हैं। या तो उपहार को अस्वीकार कर दिया जाए (“नहीं, आपका धन्यवाद”) या इसे स्वीकार कर लिया जाए (“इस उपहार के लिए आपका धन्यवाद। मैं इसे ले लेता हूँ”)। इस तरह से यह उपहार जिसे यीशु आपको दे रहा है को भी स्वीकार कर लेना चाहिए। इसमें केवल साधारण रूप से ‘विश्‍वास’, इसका ‘अध्ययन’, या इसे ‘समझना’ मात्र ही नहीं किया जाना चाहिए। इसका चित्रण अगले चित्र में किया गया है जहाँ पर हम परमेश्‍वर की ओर मुड़ने के लिए पुल पर ‘चलते’ हैं और उस उपहार को प्राप्त करते हैं जिसे वह हमें देने का प्रस्ताव दे रहा है।

यीशु के बलिदान एक उपहार है कि हम प्राप्त करना चाहिए है
यीशु का बलिदान एक ऐसा उपहार है जिसे हम में से प्रत्येक को प्राप्त कर लेने के लिए चुन लेना चाहिए

इस लिए अब कैसे इस उपहार को प्राप्त किया जाता है ? बाइबल कहती है कि

जो कोई प्रभु का नाम लेगा, वह उद्धार पाएगा (रोमियों 10:12)

ध्यान दें यह प्रतिज्ञा ‘हर किसी’ के लिए है, न कि किसी विशेष धर्म, जाति या देश के लिए । क्योंकि वह मृतकों में जी उठा है इसलिए यीशु यहाँ तक कि अब भी जीवित है और वह ‘प्रभु’ है। इसलिए यदि आप उसको पुकारेंगे तो वह सुनेगा आपको अपने जीवन का उपहार देगा। आपको उसे – उसके साथ वार्तालाप करते हुए – पुकारना चाहिए और उससे माँगना चाहिए । कदाचित् आपने यह कभी नहीं किया होगा। यहाँ पर दिशानिर्देश दिया गया है जो कि आपको उसके साथ वार्तालाप करने और उससे प्रार्थना करने में सहायता प्रदान कर सकता है । यह कोई जादू से भरा हुआ मंत्र नहीं है। ये कोई विशेष शब्द नहीं हैं जो कि सामर्थ्य देते हैं। यह उसकी योग्यता और उसके द्वारा हमें उपहार देने की इच्छा के ऊपर भरोसा करना है। जब हम उस पर भरोसा करते हैं तो वह हमारी सुनता है और उत्तर देता है । इसलिए इस दिशानिर्देश का अनुसरण करने के लिए स्वतंत्रता को महसूस करें जब आप ऊँची आवाज में या अपनी आत्मा में यीशु से बात करते हैं और उसके उपहार को प्राप्त करते हैं ।

हे प्यारे प्रभु यीशु, मैं समझता हूँ कि मेरे जीवन के पापों के साथ मैं परमेश्‍वर से अलग हूँ। यद्यपि मैंने अपनी सर्वोत्तम कोशिशें की हैं, तौभी मेरा कोई प्रयास और बलिदान इस सम्बन्ध विच्छेद को पाट नहीं सकता है । परन्तु मैं समझता हूँ कि आपकी मृत्यु एक ऐसा बलिदान है जो हमारे सारे पापों को धो डालता है – यहाँ तक कि मेरे पापों को भी । मैं विश्‍वास करता हूँ कि आप अपने बलिदान के पश्चात मृतकों में जी उठे इस तरह से मैं जानता हूँ कि आपका बलिदान पर्याप्त है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे मेरे पापों से शुद्ध करें और मुझे परमेश्‍वर के पास ले आएँ ताकि मैं अनन्त जीवन को प्राप्त कर सकूँ । मैं ऐसे जीवन को नहीं चाहता हूँ जो पाप का गुलाम हो इसलिए कृप्या करके मुझे इन पापों से शुद्ध करें जिन्होंने मुझे कर्म बन्धन में जकड़ा हुआ है। हे प्रभु यीशु, मेरे लिए यह सब कुछ करने के लिए और अब निरन्तर मुझे मेरे जीवन में मेरे प्रभु के रूप में मार्गदर्शन देते रहने के लिए आपका धन्यवाद।  

दिवाली और प्रभु यीशु

diwali-lamps
दीवाली के लैंप

पहली बार जब मैंने ‘बड़ी निकटता’ के साथ दिवाली का अनुभव उस समय किया जब मैं भारत में कार्यरत् था। मैं यहाँ पर एक महीने रहने के लिए आया था और मेरे रहने के दिनों के आरम्भ के दिनों में दिवाली का त्योहार मेरे चारों तरफ मनाया गया था। जो मुझे सबसे ज्यादा स्मरण है वह पटाखे हैं – हवा धुएँ से भरी हुई थी और इससे मेरी आँखों में थोड़ी सी जलन हो रही थी। मेरे चारों तरफ घटित हो रहे उत्साह के साथ मैं दिवाली के बारे में जानना चाहता था, कि यह क्या है और इसका क्या अर्थ है । और मैं इसके प्रेम में पड़ गया।

‘ज्योतियों या प्रकाश के त्योहार’ ने मुझे प्रेरणा से भर दिया क्योंकि मैं एक विश्वासी हूँ, और यीशु सत्संग जिसे प्रभु यीशु के नाम से भी जाना जाता है, का अनुयायी हूँ। और उसके सन्देश की मुख्य शिक्षा यह है कि उसकी ज्योति अर्थात् प्रकाश हमारे बीच के अन्धेरे के ऊपर विजय को पा लेगा। इस तरह से दिवाली का प्रभु यीशु के साथ मजबूती का सम्पर्क था।

हम में से बहुत से लोग यह जानते हैं कि हमारे बीच के अन्धेरे के साथ एक समस्या है। इस लिए ही कई लाखों की संख्या में कुम्भ मेले के त्योहार में भाग लेते हैं – क्योंकि हम में से लाखों यह जानते हैं कि हमने पाप किया है और यह कि हमें इन्हें धोने और स्वयं को शुद्ध करने की आवश्यकता है। इसी के साथ, प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्राचीन जानी-पहचानी प्रार्थना इस पाप को या हमारे भीतर के अन्धेरे को स्वीकार करती है।

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

परन्तु अन्धकार, या पाप के हमारे भीतर के ये सारे विचार, हमें उत्साहित नहीं करते हैं। सच्चाई तो यह है कि हम कई बार इन्हें ‘बुरे समाचारों’ के रूप में सोचते हैं। इसी कारण अन्धकार के ऊपर विजय पाता हुआ ज्योति का विचार हमें बहुत अधिक आशा और हर्ष देता है। और इसलिए, मोमबत्तियों, मिठाइयों और पटाखों के साथ, दिवाली इस आशा को व्यक्त करती है कि प्रकाश अन्धकार के ऊपर जय पा लेता है।

प्रभु यीशु – संसार में ज्योति

यही कुछ वास्तव में प्रभु यीशु ने किया। वेद पुस्तक (या बाइबल) में सुसमाचार यीशु को इस तरीके से वर्णित करते हैं:

आदि में वचन था, और वचन परमेश्‍वर के साथ था, और वचन परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ है; उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई। उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति थी। ज्योति अन्धकार में चमकती थी, और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया । (यूहन्ना 1:1-5)

इस तरह से आप देखते हैं, यह ‘शब्द’ उस आशा की पूर्णता है जिसे दिवाली व्यक्त करती है। और यह आशा परमेश्‍वर की ओर से इस ‘शब्द’ में आती है, जिसकी यूहन्ना ने बाद में प्रभु यीशु के रूप में पहचान की। सुसमाचार निरन्तर यह कहता चला जाता है कि

सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी। वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना। वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया । परन्तु जितनों ने उसके ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं – वे न तो लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु  परमेश्‍वर से उत्पन्न हुए हैं । (यूहन्ना 1:9-13)

यह विवरण देता है कि कैसे प्रभु यीशु ‘हर एक को ज्योति’ या प्रकाश देने के लिए आया था। कुछ लोग सोचते हैं कि यह केवल कुछ ही लोगों के ऊपर लागू होता है, परन्तु ध्यान दें यह कहता है कि यह प्रस्ताव इस ‘संसार’ में रहने वाले ‘हरेक’ के लिए है कि वह ‘परमेश्‍वर की सन्तान’ बन जाए। यह ऐसा प्रस्ताव है कि हरेक, कम से कम हरेक जो दिवाली जैसे त्योहार में रूचि रखता है, के भीतर के अन्धकार पर प्रकाश विजय पाता है।

प्रभु यीशु के जीवन को पहले से ही हजारों वर्षों पहले भविष्यद्वाणी कर दिया गया था  

प्रभु यीशु के बारे में असाधारण यह है कि उसका देहधारण या मानवातरण होना विभिन्न तरीकों से और आरम्भिक मानवीय इतिहास की घटनाओं में कई तरह से पहले ही भविष्यद्वाणी की गई थी और सूचित कर दिया गया था और इब्रानी वेदों में इसका उल्लेख किया हुआ है। इसलिए उसके बारे में पहले से लिख दिया गया था जबकि वह अभी पृथ्वी पर आया ही नहीं था। और उसके देहधारण के कई भविष्यद्वाणियों को सबसे प्राचीन ऋग्वेद के भजनों में स्मरण किया गया है, जो आने वाले पुरूषा की स्तुति करते हैं, और मानवीय इतिहास की कुछ आरम्भिक घटनाओं का उल्लेख करते हैं, जैसे कि मनु की जल प्रलय, वही व्यक्ति जिसे की बाइबल – अर्थात् वेद पुस्तक –’नूह’ के नाम से पुकारती है। यह प्राचीन विवरण लोगों के पापों के अन्धकार को दर्शाते हैं, जबकि पुरूषा, या प्रभु यीशु के आगमन की आशा का प्रस्ताव देते हैं।

ऋग्वेद की भविष्यद्वाणियों में, पूरूषा, अर्थात् परमेश्‍वर का देहधारण और पूर्ण मनुष्य को बलिदान होने के लिए आ रहा था। यह बलिदान हमारे पापों के कर्मों की कीमत को अदा करने और साथ ही यह हमें भीतर से शुद्ध करने के लिए पर्याप्त था। शुद्धीकरण और पूजा पाठ अच्छे हैं, परन्तु यह हमें केवल बाहर तक ही सीमित रखते हैं। हमें भीतर से शुद्ध होने के लिए बेहतर बलिदान की आवश्यकता है।

प्रभु यीशु की इब्रानी वेदों में भविष्यद्वाणी कर दी गई थी

ऋग्वेद के इन भजनों के साथ ही, इब्रानी वेदों ने इस आगमन के बारे में भविष्यद्वाणी की थी। इब्रानी वेदों में महत्वपूर्ण ऋषि यशायाह हैं (जो 750 ईसा पूर्व रहे, दूसरे शब्दों में प्रभु यीशु के इस पृथ्वी पर आने के 750 वर्षों पूर्व)। उसने उनके आगमन के प्रति कई अन्तर्दृष्टियों को दिया है। उसने दिवाली का पूर्वानुमान लगा लिया था जब उसने प्रभु यीशु के बारे में घोषणा की:

जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे उन्होंने बड़ा उजियाला देखा; और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे, उन पर ज्योति चमकी (यशायाह 9:2)।

ऐसी घटना क्यों घटित होगी?  वह निरन्तर आगे बताता है:

क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके काँधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत युक्ति करनेवाला पराक्रमी परमेश्‍वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। (यशायाह 9:6)

परन्तु यद्यपि उसने देहधारण किया, वह हमारे लिए एक गुलाम बन गया, कि हमारी अन्धकारमयी आवश्यकता में हमें सहायता दे।

निश्चय उस ने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्‍वर का मारा- कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के हेतु कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी कि उसके कोड़े खाने से हम चंगे हो जाएँ। हम तो सब के सब भेड़ों की समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। (यशायाह 53:4-6)।

ऋषि यशायाह प्रभु यीशु के क्रूसीकरण का विवरण दे रहे हैं। वह ऐसे वर्णन करते हैं जैसे कि यह 750 वर्षों पहले घटित हुआ है, और वह साथ ही क्रूसीकरण का विवरण इस तरह के बलिदान के रूप में करते हैं जो कि हमें चंगा करता है। और यह कार्य जिसका प्रस्ताव यह गुलाम देगा ऐसा होगा कि जिसे उसे ऐसा करने के लिए परमेश्‍वर कहेगा।

मैं तुझे जाति-जाति (गैर-यहूदी) के लिये ज्योति ठहराऊँगा कि मेरा उद्धार पृथ्वी की एक ओर से दूसरी ओर तक फैल जाए (यशायाह 49:6-7)

इस तरह से आप देख सकते हैं ! यह मेरे लिए है और यह आपके लिए है। यह हर एक के लिए है।

पौलुस का उदाहरण

सच्चाई तो यह है कि, एक व्यक्ति जिसने निश्चित ही यह नहीं सोचा कि प्रभु यीशु का बलिदान उसके लिए था वह पौलुस था जिसने यीशु के नाम का विरोध किया। परन्तु उसका सामना प्रभु यीशु के साथ हुआ जिसके परिणाम स्वरूप उसने बाद में कुछ इस तरह से लिखा

इसलिये कि परमेश्‍वर ही है, जिसने कहा, “अन्धकार में से ज्योति चमके,” और वही हमारे हृदयों में चमका कि परमेश्‍वर की महिमा की पहिचान की ज्योति यीशु मसीह के चेहरे से प्रकाशमान हो। (2 कुरिन्थियों 4:6)

पौलुस का प्रभु यीशु के साथ व्यक्तिगत् सामना हुआ जिसके परिणामस्वरूप ज्योति उसके ‘हृदय में चमकने’ लगी।

यीशु की ज्योति को आपके स्वयं के लिए अनुभव करना

इसलिए अन्धकार और पाप से ज्योति बनने के लिए इस ‘उद्धार’ को पाने के लिए क्या करें जिसके बारे में ऋषि यशायाह ने भविष्यद्वाणी की है, जो प्रभु यीशु के पास है, और जिसका अनुभव पौलुस ने किया? पौलुस इस प्रश्न का उत्तर अपने एक अन्य पत्र में देता है जहाँ पर वह ऐसे लिखता है कि

क्योंकि पाप की मजदूरी तो मृत्यु है, परन्तु परमेश्‍वर का वरदान हमारे प्रभु मसीह यीशु में अनन्त जीवन है (रोमियों 6:23)

ध्यान दें कि वह कैसे कहता है कि यह एक ‘वरदान’ या उपहार है। एक उपहार, अपनी परिभाषा से ही कमाया नहीं जा सकता है। कोई बस केवल आपको यूँ ही एक उपहार दे देता है जिसे आपने कमाया नहीं है जिसके लिए आपने अच्छे कर्मों को नहीं किया

है। परन्तु यह उपहार तब तक आपको कोई लाभ नहीं देगा, जब तक यह आपकी अपनी सम्पत्ति, आपके द्वारा ‘प्राप्त’ कर लिए जाने के द्वारा नहीं बन जाता। इसलिए ही यूहन्ना, जिसका उद्धरण मैंने आरम्भ में किया है ऐसे लिखता है कि

परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उसने उन्हें परमेश्‍वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात् उन्हें जो उसके नाम पर विश्‍वास रखते हैं (यूहन्ना 1:12)

इसलिए आपको केवल बस इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। आप इसे उससे माँगने के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं जो कि आपको मुफ्त में दिया जाता है । क्योंकि वह जीवित है इसलिए आप उससे माँग सकते हैं। हाँ, वह आपके पापों के लिए बलिदान हुआ, परन्तु तीन दिनों के पश्चात् वापस जीवित हो गया, ठीक वैसे ही जैसे ऋषि यशायाह ने हज़ारों वर्षों पहले भविष्यद्वाणी कर दी थी जब उसने दु:ख उठाने वाले सेवक के बारे में लिखा था

वह अपने प्राणों का दु:ख उठाकर उसे देखेगा और तृप्त होगा; अपने ज्ञान के द्वारा मेरा धर्मी दास बहुतेरों को धर्मी ठहराएगा, और उनके अधर्म के कामों का बोझ आप उठा लेगा (यशायाह 53:11)

इस तरह से प्रभु यीशु जीवित है और आपकी प्रार्थना को उस समय सुन सकता है जब वह आप इसे उससे करते हैं। आप प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना को उससे कर सकते हैं और वह आपकी सुनेगा और बचा लेगा क्योंकि उसने अपने बलिदान को आपके लिए दे दिया है और अब उसके पास सभी तरह का अधिकार है। यहाँ एक बार फिर से वह प्रार्थना दी गई है जिसे आप उससे कर सकते हैं।

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

आपका अन्य लेखों को भी यहाँ से पढ़ने के लिए स्वागत है। ये मानवीय इतिहास से आरम्भ होते हैं और संस्कृति और इब्रानी वेदों में दी हुई अन्धकार से हमें बचाने की और ज्योति में ले आने की परमेश्‍वर की इस योजना को मात्र एक उपहार के रूप में दिखाते हैं। जैसे जैसे मुझे समय मिलता है मैं और भी अन्य लेखों को इनमें जोड़ता चला जाऊँगा । यदि आपके पास कोई प्रश्न है तो आपका मुझसे सम्पर्क करने के लिए स्वागत है।

इस दिवाली पर, जब आप मोमबत्तियों को जलाते हैं और उपहारों को एक दूसरे को देते हैं, मेरी प्रार्थना है कि आप आन्तरिक ज्योति अर्थात् प्रकाश के उपहार का अनुभव प्रभु यीशु की ओर से करें जैसे पौलुस ने अनुभव किया था और कई वर्षों पहले परिवर्तित हो गया था और जिसका देने के लिए आपको भी प्रस्ताव दिया गया है । दिवाली मुबारक हो!

कुम्भ मेला महोत्सव: पाप का बुरा समाचार और हमारी शुद्धता की आवश्यकता को दिखा रहा है

मानवीय इतिहास में जनसमूह का एक सबसे बड़ा रूप में इकट्ठा होना इस वर्ष 2013 में घटित हुआ– कुम्भ मेले का त्योहार 12 वर्षों में केवल एक ही बार मनाया जाता है। चौंका देने वाली सँख्या में 10 करोड़ लोग 55 दिनों के त्योहार को मनाने के लिए गंगा नदी के किनारों पर इलाहाबाद शहर में पहुँच गए, जिसमें से 1 करोड़ ने तो गंगा में त्योहार के आरम्भ होने केपहले ही दिन स्नान कर लिया था।

लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु
लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु

एन. डी टी. वी. के अनुसार, आयोजकों ने फरवरी 15 को स्नान के अन्तिम दिन में 2 करोड़ लोगों के द्वारा स्नान किए जाने का अनुमान लगाया था । मैं इलाहाबाद आया हूँ और मैं यह कल्पना नहीं कर सकता हूँ कि कैसे इतने सारे लोग लाखों की सँख्या में एक दम से बिना किसी कार्यों को रोकते हुए वहाँ पर एकत्र हो सकते हैं। बी. बी. सी ने रिपोर्ट दी कि इन लोगों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चिकित्सकों और शौचालयों जैसी वस्तुओं को इकट्ठा करने के लिए भारी प्रयासों को किया गया था। कुम्भ मेले में लोगों की इतनी अधिक सँख्या ने सालाना मक्का के लिए हज को जाने वाले तीर्थ यात्रियों की सँख्या जैसे कि मुसलमानों की कुल सँख्या – 2012 में केवल 31 लाख थी, को ठिगना सा कर दिया।

इस कारण क्यों 10 करोड़ लोगों को 120 अरब रूपये गंगा नदी में स्नान करने के लिए खर्च करने पड़े? नेपाल से आने वाले एक श्रद्धालु ने बी. बी. सी को ऐसा बताया कि

“कि मैंने अपने पापों को धो लिया है।”

रायटर्स समाचार एजेंसी रिपोर्ट देती है कि,

77 वर्षीय घुमक्कड़ तपस्वी स्वामी शंकरानन्द सरस्वती, जो ठण्ड में खड़ा नंगा काँप रहा था, ने ऐसे कहा कि,”मैंने इस और पहले के जीवन के अपने सारे पापों को धो लिया है,”

एन. डी टी. वी. हमें बताता है कि

भक्तगण, जो यह विश्वास करते हैं कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से उनके पाप शुद्ध हो जाते हैं,

पिछले वर्ष 2001 के त्योहार में मैंने बी. बी. सी. के द्वारा तब के लिए हुए साक्षात्कार पर ध्यान दिया था कि तीर्थ यात्री मोहन शर्मा ने ऐसे बताया था कि “जिन पापों को हमने उत्पन्न किया है वह यहाँ पर धुल जाते हैं।”

पाप की विश्वव्यापी भावना

दूसरे शब्दों में, लाखों की सँख्या में लोग धन को खर्च करेंगे, भीड़ से भरी हुई ट्रेनों में यात्रा करेंगे, भीड़भाड़ से भरी हुई परिस्थितियों का सामना करेंगे और अपने पापों के ‘धुल जाने के लिए’ गंगा नदी में जाकर स्नान करेंगे । इससे पहले कि हम यह देखें कि यह श्रद्धालु क्या कर रहे हैं, आइए हम उस समस्या पर ध्यान दें जो कि उन्होंने स्वयं ही अपने जीवन में पहचान की है जो कि – पाप है।

श्री सत्य साईं बाबा और सही और गलत

आइए इसका अध्ययन हिन्दी गुरू श्री सत्य साईं बाबा के उपदेशों को देखते हुए, जिसकी सोच मैं सोचता हूँ कि सराहनीय हैं। मैं इन्हें नीचे लिख देता हूँ। जब आप इन्हें पढ़ते हैं तो स्वयं से पूछें, “कि क्या ऐसे नैतिक उपदेश हैं जिनके सहारे जीवन यापन किया जा सकता है? क्या मुझे इनके अनुसार जीवन यापन करना चाहिए?”

“और धर्म क्या है (हमारा नैतिक कर्तव्य)? जो कुछ आप उपदेश देते हैं उसे अभ्यास में लाना, जो कुछ आप कहते हैं उसे वैसे ही करना जैसे कहा जा रहा है, उपदेश को मानते हुए और इसे अभ्यास में लाते हुए । भले कर्मों को कमाना, धर्म की लालसा करना; परमेश्वर के भय में जीवन यापन करना, परमेश्वर तक पहुँचने के लिए जीवन यापन करना: यही धर्म है”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 339.

“वास्तव में आपका कर्तव्य क्या है?….

  • सबसे पहले अपने माता पिता की प्रेम और आदर और कृतज्ञता के साथ सेवा करनी ।
  • दूसरा, सत्य बोलना और भले कर्मों में व्यवहार करना ।
  • तीसरा, जब कभी आपके पास कुछ समय बचे, तब प्रभु के न को वह जिस भी रूप में आपके मन में है, दुहराते रहना ।
  • चौथा, दूसरे के बारे में बुरा बोलने में लिप्त न होना या दूसरों की कमजोरियों की खोज करने का प्रयास नहीं करना।
  • और अन्त में, किसी भी रूप में अन्यों को दु:ख नहीं पहुँचाना”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 348-349.

“जो कोई अपने अंहकार को अपने अधीन कर लेता है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं पर जय प्राप्त कर लेता है, अपनी वहशी भावनाओं और आवेगों को नष्ट कर देता है, और अपने शरीर को प्रेम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का दमन करता है, वह निश्चित ही धर्म के पथ पर अग्रसर है” धर्म वाहिनी, पृ. 4

जब मैंने इसे पढ़ा तो पाया कि ये वे उपदेश हैं जिनके अनुसार मुझे जीवन यापन – केवल एक साधारण नैतिक कर्तव्य के रूप में करना चाहिए । परन्तु क्या आप वास्तव में इनके ऊपर जीवन यापन कर रहे हैं? क्या आपने (और मैंने) कभी इनके प्रति सोचा है? उस समय क्या होगा यदि इन उपदेशों को पालन करने में चूक जाएँ और इनके अनुसार जीवन यापन न कर पाएँ । सत्य साईं बाबा इस प्रश्न का उत्तर निम्न तरीके से उपदेश देते हुए जारी रखते हैं कि

“सामान्य रूप में, मैं मीठा बोलता हूँ, परन्तु अनुशासन के विषय में, मैं किसी भी तरह की कोई रियायत देना स्वीकार नहीं करूँगा…मैं कठोर अनुशासन के ऊपर जोर दूँगा। मैं किसी भी तरह से आपके स्तर के अनुरूप कठोरता को कम नहीं करूँगा,” सत्य साईं बोलते हैं 2, पृ. 186.

कठोरता का स्तर ठीक है – यदि आप सदैव शर्तों को पूरा करते हैं । परन्तु यदि आप इसे पूरी नहीं करते हैं? तब यही वह स्थान है जहाँ पर तब “पाप” की अवधारणा आ जाती है। जब मैं नैतिक लक्ष्य को पूरा करने से चूक जाता हूँ, या जिसे मैं जानता हूँ कि इसे पूरा करना चाहिए, को पूरा करने में असफल हो जाता हूँ तब मैं पाप करता हूँ और मैं एक पापी हूँ । कभी भी यह सुनना पसन्द नहीं करेगा कि वह एक ‘पापी’ है – यह कुछ ऐसी बात है जो आपको असहज और दोषी ठहराती है, और सच्चाई तो यह है कि हम बहुत अधिक मानसिक और भावनात्मक उर्जा को इन विचारों को युक्तिसंगत तरीके से हटा देने के प्रयास में खर्च कर देते हैं। कदाचित् हम सत्य साईं बाबा के अलावा किसी अन्य शिक्षक की ओर देखने लगते हैं, परन्तु यदि वह एक ‘अच्छा’ शिक्षक है, तो उसके नैतिक उपदेश बहुत अधिक वैसे ही – पालन करने के लिए कठोरता से भरे हुए होंगे।

बाइबल (वेद पुस्तक) कहती है कि हम सभी पाप के इस भाव को महसूस करते हैं, चाहे हम किसी भी धर्म के क्यों न हो या हमारी शिक्षा का स्तर कैसे भी क्यों न हो क्योंकि पाप का यह भाव हमारे विवेक से आता है। वेद पुस्तक इसे इस तरह से व्यक्त करती है

फिर, जब अन्यजाति लोग (अर्थात् गैर-यहूदी), जिनके पास व्यवस्था नहीं (बाइबल में दी हुई दस आज्ञाएँ), स्वभाव से ही व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उनके पास न होने पर भी वे अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं । वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखाते हैं और उनके विवेक भी गवाही देते हैं, और उनके विचार परस्पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं (रोमियों 2:14-15)।

इस प्रकार लाखों की सँख्या में तीर्थ यात्री उनके अपने पाप को महसूस करते हैं । ठीक उसी प्रकार से जैसे कि वेद पुस्तक (बाइबल) कहती है

सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23)

पाप प्रतासना मंत्र में व्यक्त किया गया है

इसकी धारणा प्रसिद्ध .प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र में व्यक्त की गई है जिसे मैंने नीचे लिखा है

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

सुसमाचार हमारे पापों को धो डालता है

सुसमाचार ठीक उसी विषय को सम्बोधित करता है जिसका समाधान यह समर्पित तीर्थयात्री खोज रहे हैं – कि ‘उनके पाप धो दिए जाए।’ यह उन लोगों को एक ऐसी प्रतिज्ञा देता है जो अपने ‘वस्त्रों’ (अर्थात् उनके अपने नैतिक कार्यों) को धो लेते हैं । इसकी आशीष स्वर्ग (‘उस शहर’) की एक अमरता (जीवन का वृक्ष) से है।

“धन्य हैं वे, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे।” (प्रकाशितवाक्य 22:14)।

कुम्भ के मेले का त्योहार हमें हमारे पाप की वास्तविकता के ‘बुरे समाचार’ को दिखाता है, और यह इस प्रकार हमें हमारी शुद्धता को पाने के लिए जागरूक करना चाहिए। भले ही इसमें केवल एक सदूर संभावना ही दिखाई देती हो कि सुसमाचार की यह प्रतिज्ञा एक सत्य है, क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह निश्चित ही अधिक गहन रूप में जाँच किए जाने के लिए लाभप्रद है।

यदि आप अनन्त जीवन को पाने के लिए रूचि रखते हैं, यदि आप पाप से स्वतन्त्रता पाने की इच्छा रखते हैं तब इन बातों का अध्ययन करके देखना अधिक बुद्धिमानी होगा कि प्रजापति (या यहोवा) के बारे में क्या प्रगट किया गया है और कैसे और क्यों उसने हमारे लिए स्वयं के बलिदान को दे दिया ताकि हम स्वर्ग को प्राप्त करें। और वेद हमें असमंजस में ही छोड़ नहीं देते हैं। ऋग्वेद पुरूषासूक्ता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान दिए जाने का वर्णन करता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को जानने के लिए क्लिक (करें) जो जिस तरह से बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) और आपके लिए मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेने के लिए बलिदान का वर्णन करती है वैसे ही पुरूष का विवरण देता है।