मोक्ष प्राप्ति के लिए अब्राहम का साधारण तरीका

जब मैं इस लेख को आज लिख रहा हूँ तब इस समय संसार का ध्यान फीफा विश्‍व कप की ओर केन्द्रित है।जबकि इसके कई प्रशंसक इसमें खोए हुए हैं परन्तु फिर भी बाकी बचे हुए संसार का ध्यान थाईलैंड और यूक्रेन की अशान्ति और दंगों के ऊपर केन्द्रित है। इसके साथ सीरिया में चल रहा गृह युद्ध भी है जो कि उग्र होता जा रहा है। और साथ ही यह यह भी कि…नेल्सन मंडेला का निधन हो गया है।

परन्तु कदाचित् जिस समय आप इस लेख को पढ़ रहे होंगे ये घटनाएँ लगभग भूला दी गई होंगी। जिस बात के ऊपर आज संसार बहुत अधिक ध्यान देता है उन्हें शीघ्र ही भूला दिया जाता है क्योंकि हम अन्य तरह के मनोरंजन, खेल की प्रतियोगताएँ या राजनीतिक संकटों की ओर आगे बढ जाते हैं। आगे की ओर का ध्यान एक दिन शीघ्र ही बीती हुई बातों का इतिहास बन जाता है।

हमने हमारे पिछले लेख में देखा की यही कुछ अब्राहम के समय प्राचीन समय में सत्य था। 4000 वर्षों पहले रहने वाले लोगों के लिए जो बातें महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रतियोगताएँ, उपलब्धियाँ और गप्पबाजियाँ की थी वह आज पूर्णतया भूला दी गई हैं, परन्तु एक गंभीर प्रतिज्ञा बड़ी शान्ति के साथ एक व्यक्ति के साथ बान्धी गई थी, यद्यपि इसे उस समय के सारे संसार के द्वारा अनदेखा कर दिया गया था, यह आज हमारी आँखों के सामने वृद्धि कर रही और खुलती जा रही है। मैंने स्पष्ट, परन्तु अक्सर अनदेखे तथ्य की ओर संकेत किया है, कि 4000 वर्षों पहले अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा यथार्थ,ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है। यह हमें इसे स्वीकार करने के लिए कारण बननी चाहिए कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा इस ओर संकेत करती है कि बाइबल (वेद पुस्तक)में प्रकाशित परमेश्‍वर धर्मी है और वह अपनी प्रतिज्ञा के पूरे होने की ओर कार्य कर रहा है। यह कोई केवल एक कथा या कोई संक्षेप रूपक मात्र नहीं है।

अब्राहम का वृतान्त इस प्रतिज्ञा करने वाले-परमेश्‍वर के साथ दो और मुख्य बातों का सामना या मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ता है। अब्राहम (और जैसा कि हम उसकी यात्रा का अनुसरण करते हैं) और अधिक शिक्षा को पाता है – यहाँ तक कि इस बात की पराकाष्ठा को देखने के लिए यह प्रतिज्ञा इतिहास के झरोखे से मोक्ष की प्राप्ति की ओर, परन्तु जैसे हम अपेक्षा करते हैं वैसे नहीं अपितु एक बहुत ही भिन्न तरीके – एक साधारण से तरीके – से आगे बढ़ें। अब्राहम की कहानी आज के खेलों की घटनाओं के जैसे शीघ्र से भूला दी जानी वाली नहीं है; यह एक न ध्यान दिए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा सनातनकाल की प्राप्ति की समझ को पाने के लिए नींव को रखना है, इसलिए हमें इसके ऊपर ध्यान देने के लिए बुद्धिमान होना चाहिए।

अब्राहम की शिकायत

अब्राहम के जीवन में उत्पत्ति 12 में वर्णित प्रतिज्ञा को बोले हुए बहुत अधिक वर्ष बीत चुके थे। अब्राहम कनान (प्रतिज्ञात् भूमि) की ओर इस प्रतिज्ञा की आज्ञाकारिता के प्रति बढ़ चुका था जो आज के समय का इस्राएल है। अन्य कई घटनाएँ उसकी जीवन में घटित हुईं उसे छोड़कर जिसे वह बहुत अधिक चाहता था – जो उसके द्वारा एक पुत्र के उत्पन्न होने की थी जिसके द्वारा यह प्रतिज्ञा पूरी होगी। इसलिए हम इस वृतान्त के अध्ययन को अब्राहम की शिकायत के साथ आरम्भ करते हैं:

इन बातों के पश्चात् यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुँचा :

“हे अब्राम, मत डर।

तेरी ढाल और

तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल मैं हूँ।”

अब्राम ने कहा, “हे प्रभु यहोवा, मैं तो निर्वंश हूँ, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्कवासी एलीएजेर होगा, अत: तू मुझे क्या देगा?” और अब्राम ने कहा, “मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूँ कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा।” (उत्पत्ति 15:1-3)

परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा

अब्राहम उस भूमि में तम्बुओं में इस प्रतिज्ञा के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था कि वह एक ‘बड़ी जाति’ को आरम्भ करे जिसकी उसे प्रतिज्ञा दी गई थी। परन्तु अभी तक कुछ भी नहीं हुआ था और इस समय वह लगभग 85 वर्षों का हो गया था। उसने शिकायत की कि परमेश्‍वर उसको दी हुई प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर रहा था। उसका वार्तालाप इस तरह से आगे बढ़ता है:

तब यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन उसके पास पहुँचा: “यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा।” और उसने उसको बाहर ले जा कर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन – क्या तू उनको गिन सकता है?” फिर उसने उससे कहा, “तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (उत्पत्ति 15:4-6)

अपने वार्तालाप में परमेश्‍वर ने अपनी प्रतिज्ञा को यह घोषणा करते हुए नवीकृत किया कि अब्राहम का स्वयं एक पुत्र होगा जो इतने लोगों में परिवर्तित हो जाएगा कि उनकी गिनती आकाश के तारों के जैसे होगी – निश्चित ही बहुत अधिक, परन्तु उनकी गिनती करना कठिन है।

अब्राहम का प्रतिउत्तर : पूजा की तरह स्थाई प्रभाव

अब फिर से गेंद अब्राहम के पाले में थी। वह कैसे इस नवीकृत की हुई प्रतिज्ञा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?जो कुछ इसके पश्चात् आता है वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण वाक्यों में से एक है (क्योंकि इस वाक्य को बाद में बहुत बार उद्धृत किया गया है)। यह एक अटल सत्य को समझने की नींव को रखता है। यह कहता है:

उसने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

कदाचित् इस वाक्य को समझना और भी अधिक आसान है यदि हम इसके सर्वनामों को नामों में परिवर्तित करने दें, तो इस तरह से यह ऐसे पढ़ा जाएगा:

अब्राम ने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को अब्राम के लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

यह एक छोटा सा और अप्रत्यक्ष वाक्य है। यह बिना किसी समाचार के धूमधाम के साथ आते हुए शीर्षक के साथ आता है और चला जाता है और इसलिए हमारे लिए इसे खो देना युक्तिसंगत होगा। परन्तु यह वास्तव में महत्वपूर्ण है – और इसमें सनातनकाल के बीज निहित हैं। क्यों? क्योंकि इस छोटे से वाक्य में अब्राहम धार्मिकता को प्राप्त कर लेता है। यह पूजा के पुण्यों को प्राप्त करने जैसा है जो कभी भी कम न होंगे न ही कभी खोए जाएंगे। धार्मिकता ही केवल एक – और केवल एक ऐसा – गुण है जिसकी आवश्यकता हमें परमेश्‍वर के सामने खराई से खड़े होने के लिए है।

हमारी समस्या : भ्रष्टता की समीक्षा

परमेश्‍वर के दृष्टिकोण से, यद्यपि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में निर्मित हुए थे परन्तु कुछ ऐसा घटित हो गया जिसने इस स्वरूप को भ्रष्ट कर दिया। अब न्याय यह दिया गया है

परमेश्‍वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है कि देखे कि कोई बुद्धमान, कोई परमेश्‍वर का खोजी है या नहीं। वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं। (भजन संहिता 14:2-3)

इस भ्रष्टता को हम सहजबोध ही महसूस करते हैं। इसलिए ही हम ऐसे त्योहारों, जैसे कि कुम्भ मेले का त्योहार, जिस में इतनी अच्छी तरह से भाग लेते हैं क्योंकि हमें हमारे पापों और इनकी सफाई किए जाने का बोध होता है। प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र भी इसी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है जो हमारे स्वयं के बारे में है:

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

हमारी भ्रष्टता का अन्तिम परिणाम यह है कि हम स्वयं को एक धर्मी परमेश्‍वर से अलग किया हुआ पाते हैं क्योंकि हमारे स्वयं में किसी तरह की कोई भी धार्मिकता नहीं है। हमारी भ्रष्टता हमारे नकारात्मक कर्मों के वृद्धि करने में दिखाई देती है – जिसकी सचेतता व्यर्थता और मृत्यु के फल की कटाई में है। यदि आपको सन्देह है तो समाचार के मुख्य अंशों को देख लें और देखें पिछले 24 घण्टे में लोगों के साथ क्या कुछ हुआ है। हम जीवन के निर्माता से पृथक हो चुके हैं और इसलिए वेद पुस्तक (बाइबल) में ऋषि यशायाह के दिए हुए शब्द सत्य प्रमाणित हुए हैं

हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है। (यशायाह 64:8, 750 ईसा पूर्व लिखा गया)

अब्राहम और धार्मिकता

परन्तु यहाँ पर अब्राहम और परमेश्‍वर के वार्तालाप में हम पाते हैं, कि यह घोषणा कि अब्राहम ने उस तरह की धार्मिकताको प्राप्त किया है – जैसी परमेश्‍वर अपेक्षा करता था, को बड़े ही शान्त तरीके से छोड़ दिया गया है, जिसे हम लगभग पकड़ ही नहीं पाते हैं। इस कारण अब अब्राहम ने इस धार्मिकता को प्राप्त करने के लिए क्या किया? एक बार फिर, हम इतने अधिक पृथक हैं कि हम मुख्य बात को खो देने के खतरे में हैं, यह अब्राहम के लिए साधारण रुप से यह इस बात को कहता है कि उसने विश्‍वास किया। बस केवल इतना ही?! हम भ्रष्ट होने के कारण बहुत अधिक दुर्गम समस्या में पड़ गए हैं और इसलिए युगों से हमारा प्राकृतिक झुकाव जटिल और कठिन धर्मों, प्रयासों, पूजाओं, नैतिकताओं, तपस्वी कर्म काण्डों, शिक्षाओं आदि की ओर – धार्मिकता को पाने के लिए देखने लगा है। परन्तु इस व्यक्ति अब्राहम ने मात्र ‘विश्‍वास’ करने के द्वारा धार्मिकता के पुरस्कार को प्राप्त कर लिया था। यह इतना आसान है कि हम इसे लगभग गवाँ देते हैं।

अब्राहम ने धार्मिकता को ‘कमाया’ नहीं था; यह उसके लेखे में ‘गिनी’ गई थी। इसमें क्या भिन्नता है? ठीक है, यदि आपने कुछ कार्य किया है – तो आपने इसे मेहनत से ‘कमाया’ है – आप इसे पाने के योग्य हैं। यह ऐसा है कि आपके द्वारा किए हुए कार्य की मजदूरी को प्राप्त करना है। परन्तु जब कोई बात आपके लेखे में गिनी जाती है, तो यह आपको दे दी जाती है। जैसे कि कोई  मुफ्त में दिया जाने वाला उपहार कमाया नहीं जाता, न ही आप इसके योग्य होते हैं, परन्तु आप तो इसे बस यों ही पा लेते हैं।

अब्राहम का यह वृतान्त पाए जाने वाली प्रचलित समझ को जो हमारी धार्मिकता के बारे में है को उलट देता है चाहे वह इस सोच के साथ हो जो परमेश्‍वर के अस्तित्व में होने की मान्यता के साथ आती है, या फिर उस धार्मिकता के साथ जिसे हम पर्याप्त मात्रा में की जाने वाली भली या धार्मिक गतिविधियों के द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। उसने तो बस उस प्रतिज्ञा में ही विश्‍वास किया जो उस तक विस्तारित की गई थी और वह उसके लेखे में गिनी गई, या उसे इसके लिए धार्मिकता दे दी गई।

बाकी की बाइबल इस मुठभेड़ को हमारे लिए एक चिन्ह के रूप में उपयोग करती है। परमेश्‍वर की ओर से दी गई प्रतिज्ञा में अब्राहम का विश्‍वास, और धार्मिकता का उसके लेखे में गिना जाना, हमें एक पद्धति  दी गई है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। सम्पूर्ण सुसमाचार प्रतिज्ञाओं के ऊपर आधारित है जिसे परमेश्‍वर हम में से सभों को और प्रत्येक को देता है परन्तु अब कौन धार्मिकता के लिए अदा करता या इसे कमाता है? हम इस विषय को हमारे अगले लेख में देखेंगे।

 

अब्राहम की आशीष के द्वारा : ज्ञानोदय के लिए उद्धार की योजना

हमने हमारे पिछले लेखमें यह देखा कि मनुष्य ने सृष्टिकर्ता प्रजापति की आराधना को तारों और ग्रहों की आराधना करते हुए दूषित कर दिया था। इस कारण प्रजापति ने मनु/नूह के तीन पुत्रों (जो जल प्रलय से बच गए थे) के वंशजों को उनकी भाषाओं के द्वारा अलग करते हुए पूरी पृथ्वी में बिखरा दिया था। इसलिये ही आज बहुत सी जातियाँ भाषा के कारण एक दूसरे से भिन्न हैं। मनुष्य के बीते हुए इतिहास की गूँज को 7-दिनों के पंचागों में देखा जा सकता है जिसे आज पूरे संसार में और उस बड़े जल-प्रलय की स्मृति को भिन्न रूपों में स्मरण रखने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रजापति ने इतिहास के आरम्भ में ही प्रतिज्ञा कर दी थी कि एक सिद्ध व्यक्ति के बलिदान के द्वारा ‘विद्वान लोग अमरत्व को प्राप्त करेंगे’। यह बलिदान एक पूर्णता के रूप में कार्य करेगा जो हमें मात्र हमारे बाहरी तौर से शुद्ध करने की अपेक्षा आन्तरिक रूप से शुद्ध करेगा। तथापि, सृष्टिकर्ता की दूषित हो गई आराधना के साथ, बिखरी हुई ये नई स्थापित जातियाँ इस आरम्भिक प्रतिज्ञा को भूल गईं। इसे केवल आज के समय कुछ ही स्रोतों के माध्यम से स्मरण किया जाता है जिसमें प्राचीन ऋग्वेद और वेद पुस्तक – बाइबल सम्मिलित है।

इस तरह से प्रजापति ने एक योजना को बनाया। यह योजना कुछ ऐसी नहीं थी जिसकी मैं और आप यह अपेक्षा करते क्योंकि यह (हमें) बहुत ही छोटी और वस्तुओं को परिवर्तित करने के लिए अमहत्वपूर्ण जान पड़ सकती है। परन्तु यही वह योजना थी जिसका उसने चुनाव किया। इस योजना में लगभग 2000 ईसा पूर्व (अर्थात् 4000 वर्षों पहले) एक व्यक्ति की बुलाहट और उसका परिवार और उसको और उसके वंशजों को आशीष देने की प्रतिज्ञा यदि वह उस आशीष को प्राप्त करना चुनता है, सम्मिलित है। यहाँ नीचे बताया गया है कि कैसे बाइबल इस वृतान्त का वर्णन करती है।

अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा

यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।

मैं तुझसे एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम बड़ा करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।”

4 यहोवा परमेश्‍वर के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था। 5 इस प्रकार अब्राम अपनी पत्नी सारै, और अपने भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया था, और जो प्राणी उन्होंने

हारान में प्राप्त किए थे, सबको लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ गए…7 तब यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, “यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा।”और उसने वहाँ यहोवा परमेश्‍वर के लिये जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई।

हम में बहुत से लोग आज उलझन में रहते हैं कि क्या कोई ऐसा व्यक्तिगत् परमेश्‍वर है जो हमारी इतनी चिन्ता करता है कि सीधे ही हमारे परेशान जीवनों में आशा देने के लिए हस्तक्षेप करता हो। इस वृतान्त के माध्यम से हम इस विचार की जाँच कर सकते हैं क्योंकि इसमें एक व्यक्तिगत् प्रतिज्ञा एक विशेष व्यक्ति के साथ बान्धी गई है, जिसके भागों को हम सत्यापित कर सकते हैं। यह वृतान्त वर्णित करता है कि यहोवा परमेश्‍वर ने सीधे ही अब्राहम के साथ प्रतिज्ञा की कि ‘मैं तेरे नाम को महान् करूँगा’। हम 21वीं सदी में – 4000 वर्षों के पश्चात् रहते हैं – और अब्राम/अब्राहम का नाम विश्वव्यापी रूप से इतिहास के नामों में सबसे अधिक पहचान रखता है। यह प्रतिज्ञा शाब्दिक, ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है।

बाइबल की सबसे प्राचीन विद्यमान प्रति मृतक सागर के कुण्डल पत्र हैं जो 200-100 ईसा पूर्व में लिखी गई थीं। जिसका अर्थ है कि इस प्रतिज्ञा को लिखित स्वरूप, लेखनकाल के सबसे आरम्भिक समय में ही दे दिया गया था। परन्तु यहाँ तक कि 200 ईसा पूर्व भी अब्राहम नामक व्यक्ति और उसका नाम केवल अल्पसंख्यक समूह यहूदी को छोड़कर बहुत अधिक-प्रसिद्ध नहीं था। इसलिए हम यह पुष्टि कर सकते हैं कि उसकी पूर्णता केवल तब आई जब इसे नवीनतम समयों में लिखा गया। एक प्रतिज्ञा की “पूर्णता” के घटित होने के पश्चात् इसे लिखा जाना इस घटना में नहीं हुआ है।

…उसकी महान् जाति के कारणों से

जो बात समान रूप से आश्चर्यचकित करती है वह यह है कि अब्राहम ने वास्तव में कोई उल्लेखनीय कार्य अपने जीवन में कभी नहीं किया था – ऐसा कोई कार्य जो सामान्यतया एक व्यक्ति को ‘महान्’ बनाता हो। उसने ऐसा कुछ असाधारण लेखनकार्य नहीं लिखा (जैसे व्यास ने महाभारत को लिख कर किया है), उसने कोई ध्यान देने वाले भवन का निर्माण भी नहीं किया (जैसे शाहजहाँ ने ताज महल को निर्मित करके किया है), उसने किसी ऐसी प्रभावशाली सैन्य कौशल से पूर्ण सेना का नेतृत्व भी नहीं किया (जैसा अर्जुन ने भगवद् गीता में किया है), न ही उसने राजनैतिक रूप से कोई नेतृत्व प्रदान किया है (जैसे महात्मा गाँधी ने किया है)। उसने तो यहाँ तक एक राजा के रूप में किसी राज्य का शासन भी नहीं किया है। उसने वास्तव में जंगल में तम्बू गाड़ने और प्रार्थना करने को छोड़कर और तब एक पुत्र को जन्म देने के सिवाय और कुछ नहीं किया है।

यदि आप उसके दिनों में होते हुए यह भविष्यद्वाणी करते कि कौन हज़ारों वर्षों के पश्चात् सबसे अधिक स्मरण किया जाएगा, तो आप उस समय के राजाओं, सेनापतियों, योद्धाओं, या दरबार के कवियों के ऊपर शर्त लगा सकते थे कि यही इतिहास को महान् बनाएंगे। परन्तु उन सभी के नामों को भूला दिया गया है – परन्तु एक व्यक्ति जो बड़ी कठिनाई से जंगल में अपने परिवार का पालन पोषण करने की कोशिश करता रहा को पूरे संसार में स्मरण किया जाता है। उसका नाम इसलिए महान है क्योंकि वे जातियाँ जो उसमें से निकल कर आईं ने उसके वृतान्त को स्मरण रखा है – और तब लोग और जातियाँ जो उसमें से निकल आईं महान् बन गईं। यही अक्षरश: वैसे ही है जैसे बहुत पहले प्रतिज्ञा की गई थी (“मैं तुझ में एक बड़ी जाति बनाऊँगा…मैं तेरा नाम महान् करूँगा”)। मैं सोचता हूँ कि कोई भी अभी तक के इतिहास में इतना अधिक प्रसिद्ध नहीं हुआ है केवल इसलिए कि उसके वंशज् के लोग उसमें से निकल कर आए हैं इसकी अपेक्षा की उसने अपने जीवन में बड़े बड़े कार्यों को प्राप्त किया है।

…प्रतिज्ञा-करने वाले की इच्छा के माध्यम से

और आज जो लोग अब्राहम के वंश के हैं – यहूदी – कभी वास्तव में एक जाति के रूप में नहीं थे जिसे हम विशेष रूप से बड़ी महानता के साथ सम्बद्ध करते हैं। उन्होंने कभी भी मिस्र के पिरामिडों – और निश्चित रूप से ताज महल की तरह बड़ी बड़ी महान् वास्तुशिल्प निर्माणों को नहीं किया, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह दर्शन शास्त्रों को लिखा, या ब्रिटिश लोगों की तरह दूरस्थ क्षेत्रों के प्रशासन का भी प्रबन्ध नहीं किया। इन सभी जातियों ने यह सभी कार्य स्वयं को विश्व-शक्ति के साम्राज्यों के संदर्भ में स्थापित करते हुए किए जिसने उनकी सीमाओं को व्यापक असाधारण सैन्य-शक्ति के कारण बहुत दूर तक विस्तारित कर दिया था – ऐसा कभी भी यहूदियों ने नहीं किया। यहूदी लोगों की महानता अधिकत्तर व्यवस्था और धर्म पुस्तक (वेद पुस्तक या बाइबल)के कारण हैं, जिसे उन्होंने कुछ उल्लेखनीय लोगों के द्वारा जन्म दिया; जो उनकी जाति में से निकल कर आए थे; और यह कि वे इन हज़ारों वर्षों में एक भिन्न और कुछ सीमा तक विशेष लोगों के समूह के रूप में बने रहे। उनकी महानता इसलिए नहीं कि उन्होंने वास्तव में कुछ विशेष किया है, अपितु इसकी अपेक्षा जो कुछ उनके साथ किया गया और जो कुछ उनके माध्यम से किया गया था।

अब आइए उस कारण को देखें जो इस प्रतिज्ञा को आगे ले कर चलता है। वहाँ पर, पूर्णतः स्पष्ट रीति से, यह निरन्तर कहता है कि, “मैं करूँगा…।” वह विशेष तरीका जिसमें उनकी महानता इतिहास में कार्य करती है एक बार फिर से इस उदघोषणा का ऐसा उल्लेखनीय तरीका है कि यह सृष्टिकर्ता है जो इसे पूर्ण करेगा न कि इस ‘महान् जाति’ की कुछ अन्तर्निहित योग्यताएँ, विजय या सामर्थ्य। ध्यान योग्य बात यह है कि आज के संसार में संचार माध्यम अपने बहुत अधिक ध्यान को इस्राएल, आधुनिक यहूदी जाति की घटनाओं के ऊपर देता है। क्या आप निरन्तर हंगरी, नार्वे, पापुआ न्यू गिनी, बोलीविया या मध्य अफ्रीकी गणराज्य जैसे देशों के समाचारों को सुनते हैं –जो कि सभी संसार में एक ही आकार के देश हैं? परन्तु इस्राएल, एक 60 लाख लोगों को छोटा सा देश, निरन्तर और नियमित रूप से समाचार में बना रहता है।

इतिहास में या मानवीय घटनाओं में ऐसा कुछ भी अन्तर्निहित नहीं है जो इस प्राचीन प्रतिज्ञा को ठीक वैसे ही खोल कर रखने का कारण बने जैसा कि इसे इस प्राचीन व्यक्ति के साथ घोषित किया गया था, क्योंकि उसने इस प्रतिज्ञा में विश्‍वास करते हुए विशेष पथ पर चलने को चुना था। उन सम्भावनाओं को सोचे जिसमें यह प्रतिज्ञा कुछ तरीकों से असफल हो सकती थी। परन्तु इसकी अपेक्षा यह खुलती चली गई और निरन्तर खुलती चली जा रही है, मानो कि इसे उन हज़ारों वर्षों पहले उदघोषित किया गया था। वास्तव में यह विषय बहुत ही मजबूत है क्योंकि यह पूर्ण रूप से प्रतिज्ञा-करने वाले की सामर्थ्य और अधिकार के ऊपर आधारित है कि जिससे यह पूर्ण हुआ है।

वह पथ जो अभी भी संसार को हिलाता है

This map shows the route of Abraham's Journey
यह नक्शा अब्राहम की यात्रा के मार्ग को दर्शाता है

बाइबल वर्णित करती है, “यहोवा के वचन के अनुसार अब्राम चला” (वचन 4)। उसने एक मार्ग को चुन लिया, जिसे नक्शे में दर्शाया गया है जो अभी भी इतिहास को बना रहा है।

हमारे लिए आशीष

परन्तु यह यहीं समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि इस प्रतिज्ञा के साथ और भी कुछ दिया हुआ है। आशीष केवल अब्राहम ही के लिए नहीं दी गई थी क्योंकि इसमें यह भी कहा गया है

“और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (वचन 4)।

इस पर मुझे और आपको ध्यान देना चाहिए। चाहे हम आर्य, द्रविड़, तमिल, नेपाली या किसी भी जाति के क्यों न हों; चाहे हमारी जाति कोई भी क्यों न हो; चाहे हमारा धर्म कोई भी क्यों न हो, अर्थात् चाहे हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिख या ईसाई; चाहे हम अमीर या गरीब, बीमार या स्वस्थ, पढ़े लिखे या अनपढ़ ही क्यों न हों–‘भूमण्डल के सारे कुल’ इसमें आप को और साथ ही मुझे भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस प्रतिज्ञा का कार्यक्षेत्र तब से लेकर अब आज तक दिन तक प्रत्येक जीवित व्यक्ति को आशीष के लिए सम्मिलित किया जाना है – इसका अर्थ है आप भी इसमें सम्मिलित हैं? कब? किस तरह की आशिष? इसे यहाँ पर स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है परन्तु यह कुछ ऐसी बातों को जन्म देता है जो आपके साथ मुझे भी प्रभावित करता है।

हमने अभी अभी ऐतिहासिक और शाब्दिक रूप से यह पुष्टि की है कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा का प्रथम भाग सत्य हो गया है। तब हमारे पास क्या एक अच्छा कारण नहीं है कि हम प्रतिज्ञा के उस भाग के ऊपर उसके सत्य होने के लिए भी विश्‍वास करें जो आपके और मेरे लिए दिया गया है? क्योंकि यह प्रतिज्ञा सत्य रूप से विश्वव्यापी और अपरिवर्तनशील है। परन्तु हमें इस प्रतिज्ञा के सत्य को समझने के लिए – इसे खोलने की आवश्यकता है। हमें ज्ञानोदय की आवश्यकता है ताकि हम यह समझ सकें कि कैसे यह प्रतिज्ञा हमें “छू” सकती है। और हम इस ज्ञान को अब्राहम की यात्रा का अनुसरण करते हुए पाते हैं। मोक्ष वह कुँजी है, जिसकी प्राप्ति के ऊपर बहुत से लोग बहुत अधिक कठिन मेहनत करते हुए कार्य कर रहे हैं, हम पर प्रकाशित किया गया है जब हम निरन्तर इस विलक्षण व्यक्ति के वृतान्त का अनुसरण करते हैं।