मोक्ष प्राप्ति के लिए अब्राहम का साधारण तरीका

जब मैं इस लेख को आज लिख रहा हूँ तब इस समय संसार का ध्यान फीफा विश्‍व कप की ओर केन्द्रित है।जबकि इसके कई प्रशंसक इसमें खोए हुए हैं परन्तु फिर भी बाकी बचे हुए संसार का ध्यान थाईलैंड और यूक्रेन की अशान्ति और दंगों के ऊपर केन्द्रित है। इसके साथ सीरिया में चल रहा गृह युद्ध भी है जो कि उग्र होता जा रहा है। और साथ ही यह यह भी कि…नेल्सन मंडेला का निधन हो गया है।

परन्तु कदाचित् जिस समय आप इस लेख को पढ़ रहे होंगे ये घटनाएँ लगभग भूला दी गई होंगी। जिस बात के ऊपर आज संसार बहुत अधिक ध्यान देता है उन्हें शीघ्र ही भूला दिया जाता है क्योंकि हम अन्य तरह के मनोरंजन, खेल की प्रतियोगताएँ या राजनीतिक संकटों की ओर आगे बढ जाते हैं। आगे की ओर का ध्यान एक दिन शीघ्र ही बीती हुई बातों का इतिहास बन जाता है।

हमने हमारे पिछले लेख में देखा की यही कुछ अब्राहम के समय प्राचीन समय में सत्य था। 4000 वर्षों पहले रहने वाले लोगों के लिए जो बातें महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व प्रतियोगताएँ, उपलब्धियाँ और गप्पबाजियाँ की थी वह आज पूर्णतया भूला दी गई हैं, परन्तु एक गंभीर प्रतिज्ञा बड़ी शान्ति के साथ एक व्यक्ति के साथ बान्धी गई थी, यद्यपि इसे उस समय के सारे संसार के द्वारा अनदेखा कर दिया गया था, यह आज हमारी आँखों के सामने वृद्धि कर रही और खुलती जा रही है। मैंने स्पष्ट, परन्तु अक्सर अनदेखे तथ्य की ओर संकेत किया है, कि 4000 वर्षों पहले अब्राहम को दी गई प्रतिज्ञा यथार्थ,ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है। यह हमें इसे स्वीकार करने के लिए कारण बननी चाहिए कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा इस ओर संकेत करती है कि बाइबल (वेद पुस्तक)में प्रकाशित परमेश्‍वर धर्मी है और वह अपनी प्रतिज्ञा के पूरे होने की ओर कार्य कर रहा है। यह कोई केवल एक कथा या कोई संक्षेप रूपक मात्र नहीं है।

अब्राहम का वृतान्त इस प्रतिज्ञा करने वाले-परमेश्‍वर के साथ दो और मुख्य बातों का सामना या मुठभेड़ करते हुए आगे बढ़ता है। अब्राहम (और जैसा कि हम उसकी यात्रा का अनुसरण करते हैं) और अधिक शिक्षा को पाता है – यहाँ तक कि इस बात की पराकाष्ठा को देखने के लिए यह प्रतिज्ञा इतिहास के झरोखे से मोक्ष की प्राप्ति की ओर, परन्तु जैसे हम अपेक्षा करते हैं वैसे नहीं अपितु एक बहुत ही भिन्न तरीके – एक साधारण से तरीके – से आगे बढ़ें। अब्राहम की कहानी आज के खेलों की घटनाओं के जैसे शीघ्र से भूला दी जानी वाली नहीं है; यह एक न ध्यान दिए जाने वाले व्यक्ति के द्वारा सनातनकाल की प्राप्ति की समझ को पाने के लिए नींव को रखना है, इसलिए हमें इसके ऊपर ध्यान देने के लिए बुद्धिमान होना चाहिए।

अब्राहम की शिकायत

अब्राहम के जीवन में उत्पत्ति 12 में वर्णित प्रतिज्ञा को बोले हुए बहुत अधिक वर्ष बीत चुके थे। अब्राहम कनान (प्रतिज्ञात् भूमि) की ओर इस प्रतिज्ञा की आज्ञाकारिता के प्रति बढ़ चुका था जो आज के समय का इस्राएल है। अन्य कई घटनाएँ उसकी जीवन में घटित हुईं उसे छोड़कर जिसे वह बहुत अधिक चाहता था – जो उसके द्वारा एक पुत्र के उत्पन्न होने की थी जिसके द्वारा यह प्रतिज्ञा पूरी होगी। इसलिए हम इस वृतान्त के अध्ययन को अब्राहम की शिकायत के साथ आरम्भ करते हैं:

इन बातों के पश्चात् यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुँचा :

“हे अब्राम, मत डर।

तेरी ढाल और

तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल मैं हूँ।”

अब्राम ने कहा, “हे प्रभु यहोवा, मैं तो निर्वंश हूँ, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्कवासी एलीएजेर होगा, अत: तू मुझे क्या देगा?” और अब्राम ने कहा, “मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूँ कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा।” (उत्पत्ति 15:1-3)

परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा

अब्राहम उस भूमि में तम्बुओं में इस प्रतिज्ञा के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था कि वह एक ‘बड़ी जाति’ को आरम्भ करे जिसकी उसे प्रतिज्ञा दी गई थी। परन्तु अभी तक कुछ भी नहीं हुआ था और इस समय वह लगभग 85 वर्षों का हो गया था। उसने शिकायत की कि परमेश्‍वर उसको दी हुई प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर रहा था। उसका वार्तालाप इस तरह से आगे बढ़ता है:

तब यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन उसके पास पहुँचा: “यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा।” और उसने उसको बाहर ले जा कर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन – क्या तू उनको गिन सकता है?” फिर उसने उससे कहा, “तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (उत्पत्ति 15:4-6)

अपने वार्तालाप में परमेश्‍वर ने अपनी प्रतिज्ञा को यह घोषणा करते हुए नवीकृत किया कि अब्राहम का स्वयं एक पुत्र होगा जो इतने लोगों में परिवर्तित हो जाएगा कि उनकी गिनती आकाश के तारों के जैसे होगी – निश्चित ही बहुत अधिक, परन्तु उनकी गिनती करना कठिन है।

अब्राहम का प्रतिउत्तर : पूजा की तरह स्थाई प्रभाव

अब फिर से गेंद अब्राहम के पाले में थी। वह कैसे इस नवीकृत की हुई प्रतिज्ञा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?जो कुछ इसके पश्चात् आता है वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण वाक्यों में से एक है (क्योंकि इस वाक्य को बाद में बहुत बार उद्धृत किया गया है)। यह एक अटल सत्य को समझने की नींव को रखता है। यह कहता है:

उसने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

कदाचित् इस वाक्य को समझना और भी अधिक आसान है यदि हम इसके सर्वनामों को नामों में परिवर्तित करने दें, तो इस तरह से यह ऐसे पढ़ा जाएगा:

अब्राम ने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को अब्राम के लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

यह एक छोटा सा और अप्रत्यक्ष वाक्य है। यह बिना किसी समाचार के धूमधाम के साथ आते हुए शीर्षक के साथ आता है और चला जाता है और इसलिए हमारे लिए इसे खो देना युक्तिसंगत होगा। परन्तु यह वास्तव में महत्वपूर्ण है – और इसमें सनातनकाल के बीज निहित हैं। क्यों? क्योंकि इस छोटे से वाक्य में अब्राहम धार्मिकता को प्राप्त कर लेता है। यह पूजा के पुण्यों को प्राप्त करने जैसा है जो कभी भी कम न होंगे न ही कभी खोए जाएंगे। धार्मिकता ही केवल एक – और केवल एक ऐसा – गुण है जिसकी आवश्यकता हमें परमेश्‍वर के सामने खराई से खड़े होने के लिए है।

हमारी समस्या : भ्रष्टता की समीक्षा

परमेश्‍वर के दृष्टिकोण से, यद्यपि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में निर्मित हुए थे परन्तु कुछ ऐसा घटित हो गया जिसने इस स्वरूप को भ्रष्ट कर दिया। अब न्याय यह दिया गया है

परमेश्‍वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है कि देखे कि कोई बुद्धमान, कोई परमेश्‍वर का खोजी है या नहीं। वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं। (भजन संहिता 14:2-3)

इस भ्रष्टता को हम सहजबोध ही महसूस करते हैं। इसलिए ही हम ऐसे त्योहारों, जैसे कि कुम्भ मेले का त्योहार, जिस में इतनी अच्छी तरह से भाग लेते हैं क्योंकि हमें हमारे पापों और इनकी सफाई किए जाने का बोध होता है। प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र भी इसी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है जो हमारे स्वयं के बारे में है:

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

हमारी भ्रष्टता का अन्तिम परिणाम यह है कि हम स्वयं को एक धर्मी परमेश्‍वर से अलग किया हुआ पाते हैं क्योंकि हमारे स्वयं में किसी तरह की कोई भी धार्मिकता नहीं है। हमारी भ्रष्टता हमारे नकारात्मक कर्मों के वृद्धि करने में दिखाई देती है – जिसकी सचेतता व्यर्थता और मृत्यु के फल की कटाई में है। यदि आपको सन्देह है तो समाचार के मुख्य अंशों को देख लें और देखें पिछले 24 घण्टे में लोगों के साथ क्या कुछ हुआ है। हम जीवन के निर्माता से पृथक हो चुके हैं और इसलिए वेद पुस्तक (बाइबल) में ऋषि यशायाह के दिए हुए शब्द सत्य प्रमाणित हुए हैं

हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है। (यशायाह 64:8, 750 ईसा पूर्व लिखा गया)

अब्राहम और धार्मिकता

परन्तु यहाँ पर अब्राहम और परमेश्‍वर के वार्तालाप में हम पाते हैं, कि यह घोषणा कि अब्राहम ने उस तरह की धार्मिकताको प्राप्त किया है – जैसी परमेश्‍वर अपेक्षा करता था, को बड़े ही शान्त तरीके से छोड़ दिया गया है, जिसे हम लगभग पकड़ ही नहीं पाते हैं। इस कारण अब अब्राहम ने इस धार्मिकता को प्राप्त करने के लिए क्या किया? एक बार फिर, हम इतने अधिक पृथक हैं कि हम मुख्य बात को खो देने के खतरे में हैं, यह अब्राहम के लिए साधारण रुप से यह इस बात को कहता है कि उसने विश्‍वास किया। बस केवल इतना ही?! हम भ्रष्ट होने के कारण बहुत अधिक दुर्गम समस्या में पड़ गए हैं और इसलिए युगों से हमारा प्राकृतिक झुकाव जटिल और कठिन धर्मों, प्रयासों, पूजाओं, नैतिकताओं, तपस्वी कर्म काण्डों, शिक्षाओं आदि की ओर – धार्मिकता को पाने के लिए देखने लगा है। परन्तु इस व्यक्ति अब्राहम ने मात्र ‘विश्‍वास’ करने के द्वारा धार्मिकता के पुरस्कार को प्राप्त कर लिया था। यह इतना आसान है कि हम इसे लगभग गवाँ देते हैं।

अब्राहम ने धार्मिकता को ‘कमाया’ नहीं था; यह उसके लेखे में ‘गिनी’ गई थी। इसमें क्या भिन्नता है? ठीक है, यदि आपने कुछ कार्य किया है – तो आपने इसे मेहनत से ‘कमाया’ है – आप इसे पाने के योग्य हैं। यह ऐसा है कि आपके द्वारा किए हुए कार्य की मजदूरी को प्राप्त करना है। परन्तु जब कोई बात आपके लेखे में गिनी जाती है, तो यह आपको दे दी जाती है। जैसे कि कोई  मुफ्त में दिया जाने वाला उपहार कमाया नहीं जाता, न ही आप इसके योग्य होते हैं, परन्तु आप तो इसे बस यों ही पा लेते हैं।

अब्राहम का यह वृतान्त पाए जाने वाली प्रचलित समझ को जो हमारी धार्मिकता के बारे में है को उलट देता है चाहे वह इस सोच के साथ हो जो परमेश्‍वर के अस्तित्व में होने की मान्यता के साथ आती है, या फिर उस धार्मिकता के साथ जिसे हम पर्याप्त मात्रा में की जाने वाली भली या धार्मिक गतिविधियों के द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। उसने तो बस उस प्रतिज्ञा में ही विश्‍वास किया जो उस तक विस्तारित की गई थी और वह उसके लेखे में गिनी गई, या उसे इसके लिए धार्मिकता दे दी गई।

बाकी की बाइबल इस मुठभेड़ को हमारे लिए एक चिन्ह के रूप में उपयोग करती है। परमेश्‍वर की ओर से दी गई प्रतिज्ञा में अब्राहम का विश्‍वास, और धार्मिकता का उसके लेखे में गिना जाना, हमें एक पद्धति  दी गई है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। सम्पूर्ण सुसमाचार प्रतिज्ञाओं के ऊपर आधारित है जिसे परमेश्‍वर हम में से सभों को और प्रत्येक को देता है परन्तु अब कौन धार्मिकता के लिए अदा करता या इसे कमाता है? हम इस विषय को हमारे अगले लेख में देखेंगे।