गुरु के रूप में यीशु: यहां तक कि महात्मा गांधी को भी आत्मजागृति करने वालेअहिंसा के उपदेश के साथ

संस्कृत में, गुरु  गु‘ (अंधकार) और रु‘ (प्रकाश) के रूप में मिलता है। एक गुरु शिक्षा देता है, ताकि अज्ञानता के अंधेरे को सच्चे ज्ञान या ज्ञान के प्रकाश से दूर किया जाए। यीशु को इस तरह के चतुर शिक्षण के लिए जाना जाता है जो अंधेरे में रहने वाले लोगों को आत्मजागृति करता है ऐसा कि मानो उसे गुरु या आचार्य के रूप में माना जाना चाहिए। ऋषि यशायाह ने एक आने वाले व्यक्ति के के बारे में भविष्यद्वाणी की थी। 700 ईसा पूर्व में उन्होंने इब्रानी वेदों में कहा था कि:

भी संकट-भरा अन्धकार जाता रहेगा। पहिले तो उसने जबूलून और नप्ताली के देशों का अपमान किया, परन्तु अन्तिम दिनों में ताल की ओर यरदन के पार की अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा।
2 जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे उन्होंने बड़ा उजियाला देखा; और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे, उन पर ज्योति चमकी।

यशायाह 9:12

ऐतिहासिक समय-रेखा में ऋषि यशायाह, दाऊद और अन्य इब्रानी ऋषि (भविष्यद्वक्ता)

यह प्रकाश’ क्या था जो गलील में लोगों के पास अंधेरे में आने वाला था? यशायाह आगे बताते हैं:

6 क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करने वाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।

यशायाह 9:6

यशायाह ने पहले ही कह दिया था कि आने वाला यह व्यक्ति एक कुंवारी से जन्म लेगा। यहाँ वह उसे और भी अधिक विशेष यह कहते हुए बना देता है कि उसे पराक्रमी परमेश्वर’ कहा जाएगा, और वह शांति लाने के लिए एक परामर्शदाता होगा। इस शांति लाने वाले गुरु के द्वारा गलील के तट से दी जाने वाली शिक्षा को दूर भारत में महात्मा गांधी पर भी उसके प्रभाव को महसूस कराएंगी।

गांधी और यीशु का पहाड़ी उपदेश

कानून के एक विद्यार्थी के रूप में गांधी

इंग्लैंड में, यीशु के जन्म के 1900  वर्षों बाद, भारत से कानून की पढ़ाई करने के लिए एक युवा विद्यार्थी, जिसे अब महात्मा गांधी (या मोहनदास करमचंद गांधी) के नाम से जाना जाता है, को बाइबल दी गई। जब उन्होंने यीशु की शिक्षाओं को पढ़ा जिसे पहाड़ी उपदेश  के रूप में जाना जाता है, तो वह स्मरण करते हुए कहते हैं कि

पहाड़ी उपदेश सीधे मेरे मन के भीतर चला गया।’’

एम. के. गांधी, एक आत्मकथा या सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की

कहानी. 1927 पृ. 63

यीशु की ‘दूसरा गाल भी फेर दे’ वाली शिक्षा के अध्ययन ने गांधी को अहिंसा की प्राचीन अवधारणा (ठेस-न-पहुचंना और हत्या-न-करना) पर अंतर्दृष्टि प्रदान की। यह सोच सुप्रसिद्ध वाक्यांश अहिंसा परमो धर्म’ (अहिंसा सर्वोच्च नैतिक गुण है) में प्रतिबिम्बित होती है। गांधी ने बाद में इस शिक्षा को राजनीतिक बल में सत्याग्रह  में परिष्कृत करते हुए उपयोग किया। यह ब्रिटिश शासकों के साथ अहिंसक असहयोग के प्रति उनका उपयोग था। कई दशकों तक किए गए सत्याग्रह के परिणामस्वरूप भारत को ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्त हुई। गांधी के सत्याग्रह ने भारत को ब्रिटेन से बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण तरीके से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त किया। यीशु की शिक्षा ने इन सब बातों को प्रभावित किया।

यीशु का पहाड़ी उपदेश

इस तरह यीशु का पहाड़ी पर दिया हुआ उपदेश क्या था जिसने गांधी को इतना अधिक प्रभावित किया? यह सुसमाचारों में यीशु का सबसे लंबा लिपिबद्ध किया हुआ संदेश है। यहाँ पर पूरा पहाड़ी उपदेश दिया गया है जबकि नीचे हम इसके कुछ मुख्य अंशों पर बात करेंगे।

21 तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि हत्या न करना, और जो कोई हत्या करेगा वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा।
22 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई अपने भाई पर क्रोध करेगा, वह कचहरी में दण्ड के योग्य होगा: और जो कोई अपने भाई को निकम्मा कहेगा वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा; और जो कोई कहे “अरे मूर्ख” वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।
23 इसलिये यदि तू अपनी भेंट वेदी पर लाए, और वहां तू स्मरण करे, कि मेरे भाई के मन में मेरी ओर से कुछ विरोध है, तो अपनी भेंट वहीं वेदी के साम्हने छोड़ दे।
24 और जाकर पहिले अपने भाई से मेल मिलाप कर; तब आकर अपनी भेंट चढ़ा।
25 जब तक तू अपने मुद्दई के साथ मार्ग ही में हैं, उस से झटपट मेल मिलाप कर ले कहीं ऐसा न हो कि मुद्दई तुझे हाकिम को सौंपे, और हाकिम तुझे सिपाही को सौंप दे और तू बन्दीगृह में डाल दिया जाए।
26 मैं तुम से सच कहता हूं कि जब तक तू कौड़ी कौड़ी भर न दे तब तक वहां से छूटने न पाएगा॥
27 तुम सुन चुके हो कि कहा गया था, कि व्यभिचार न करना।
28 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि जो कोई किसी स्त्री पर कुदृष्टि डाले वह अपने मन में उस से व्यभिचार कर चुका।
29 यदि तेरी दाहिनी आंख तुझे ठोकर खिलाए, तो उसे निकालकर अपने पास से फेंक दे; क्योंकि तेरे लिये यही भला है कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए।
30 और यदि तेरा दाहिना हाथ तुझे ठोकर खिलाए, तो उस को काटकर अपने पास से फेंक दे, क्योंकि तेरे लिये यही भला है, कि तेरे अंगों में से एक नाश हो जाए और तेरा सारा शरीर नरक में न डाला जाए॥
31 यह भी कहा गया था, कि जो कोई अपनी पत्नी को त्याग दे तो उसे त्यागपत्र दे।
32 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं कि जो कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार के सिवा किसी और कारण से छोड़ दे, तो वह उस से व्यभिचार करवाता है; और जो कोई उस त्यागी हुई से ब्याह करे, वह व्यभिचार करता है॥
33 फिर तुम सुन चुके हो, कि पूर्वकाल के लोगों से कहा गया था कि झूठी शपथ न खाना, परन्तु प्रभु के लिये अपनी शपथ को पूरी करना।
34 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि कभी शपथ न खाना; न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह परमेश्वर का सिंहासन है।
35 न धरती की, क्योंकि वह उसके पांवों की चौकी है; न यरूशलेम की, क्योंकि वह महाराजा का नगर है।
36 अपने सिर की भी शपथ न खाना क्योंकि तू एक बाल को भी न उजला, न काला कर सकता है।
37 परन्तु तुम्हारी बात हां की हां, या नहीं की नहीं हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है॥
38 तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था, कि आंख के बदले आंख, और दांत के बदले दांत।
39 परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि बुरे का सामना न करना; परन्तु जो कोई तेरे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, उस की ओर दूसरा भी फेर दे।
40 और यदि कोई तुझ पर नालिश करके तेरा कुरता लेना चाहे, तो उसे दोहर भी ले लेने दे।
41 और जो कोई तुझे कोस भर बेगार में ले जाए तो उसके साथ दो कोस चला जा।
42 जो कोई तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तुझ से उधार लेना चाहे, उस से मुंह न मोड़॥
43 तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर।
44 .परन्तु मैं तुम से यह कहता हूं, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो और अपने सताने वालों के लिये प्रार्थना करो।
45 जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनो पर अपना सूर्य उदय करता है, और धमिर्यों और अधमिर्यों दोनों पर मेंह बरसाता है।
46 क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या महसूल लेने वाले भी ऐसा ही नहीं करते?
47 और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या अन्यजाति भी ऐसा नहीं करते?
48 इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥

मत्ती 5:21-48

यीशु ने रूपक का उपयोग करके शिक्षा दी:

‘‘तुम सुन चुके हो, कि ऐसा कहा गया था. . . परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ. . . ।’’

इस तरह के ढांचे का निर्माण करते हुए वह पहले मूसा की व्यवस्था से उद्धृत करते हैं, और तब आदेश की सीमा को उद्देश्यों, विचारों और शब्दों तक विस्तार कर देते हैं। यीशु ने मूसा के द्वारा दी गई कठोर आज्ञाओं से शिक्षा दी और उन्हेंतब और भी अधिक कठिन बना दिया!

पहाड़ी उपदेश में पाया जाने वाला विनम्र अधिकार

उल्लेखनीय बात यह है कि उसने व्यस्था की आज्ञाओं को विस्तार दिया। उसने ऐसा अपने अधिकार के आधार पर किया। बिना किसी बहस और धमकी को दिए उसने तो केवल यह कहा कि, ‘परन्तु मैं तुम से कहता हूँ …’ और इसके साथ ही उसने आज्ञा की सीमा को बढ़ा दिया। उसने ऐसा विनम्रतापूर्वक तथापि अधिकार के साथ किया। यही तो उसकी शिक्षा के बारे में अद्वितीय बात था। जैसा कि सुसमाचार बताता है जब उसने इस को उपदेश पूरा किया।

28 जब यीशु ये बातें कह चुका, तो ऐसा हुआ कि भीड़ उसके उपदेश से चकित हुई।
29 क्योंकि वह उन के शास्त्रियों के समान नहीं परन्तु अधिकारी की नाईं उन्हें उपदेश देता था॥

मत्ती 7:28-29

यीशु ने बड़े अधिकार के साथ एक गुरु के रूप में शिक्षा दी। अधिकांश भविष्यद्वक्ता संदेशवाहक थे जिन्होंने परमेश्वर के एक संदेश को दूसरों तक दिया था, परन्तु यहाँ कुछ भिन्न था। यीशु ऐसा क्यों कर सकता था? ख्रिस्त  या मसीह  के रूप में उसके पास सबसे बड़ा अधिकार था। इब्रानी वेदों में भजन संहिता 2, जहाँ पर मसीह की पदवी को पहली बार घोषित किया गया था ऐसे वर्णित करती है कि परमेश्वर इस तरह से मसीह से बात कर रहा है:

8 मुझ से मांग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये, और दूर दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूंगा।भजन

सहिंता 2∶8

मसीह को ‘जातियों के ऊपर’ अधिकार दिया गया था, यहाँ तक कि पृथ्वी के छोर तक का। इसलिए मसीह के रूप में, यीशु के पास अपनी शिक्षा देने के लिए वैसा अधिकार था जिसमें उसने शिक्षा दी और उसने ऐसा इसलिए किया ताकि उसकी शिक्षा प्रत्येक तक पहुँचे।

वास्तव में, मूसा ने भी अपनी शिक्षा में एक आने वाले अद्वितीय भविष्यद्वक्ता (1500 ईसा पूर्व) के विषय में लिखा था। मूसा से बात करते हुए, परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी

18 सो मैं उनके लिये उनके भाइयों के बीच में से तेरे समान एक नबी को उत्पन्न करूंगा; और अपना वचन उसके मुंह में डालूंगा; और जिस जिस बात की मैं उसे आज्ञा दूंगा वही वह उन को कह सुनाएगा।
19 और जो मनुष्य मेरे वह वचन जो वह मेरे नाम से कहेगा ग्रहण न करेगा, तो मैं उसका हिसाब उस से लूंगा।

व्यवस्थाविवरण 18:18-19

मूसा ने इस्राएलियों का नेतृत्व किया और यीशु से लगभग 1500 वर्षों पहले व्यवस्था को प्राप्त किया

अपने शिक्षण में, यीशु, मसीह के रूप में अपने अधिकार का प्रयोग कर रहा था और मूसा के द्वारा आने वाले भविष्यद्वक्ता अर्थात् पैगंबर होने की भविष्यद्वाणी को पूरा कर रहा था जो अपने मुँह से परमेश्वर के वचनों की शिक्षा देगा। शांति और अहिंसा के बारे में शिक्षा देने में उसने यशायाह की भविष्यद्वाणी को पूरा किया, जिसे प्रकाश के साथ अंधेरे को दूर करने के विषय में ऊपर दिखाया गया है। उसने शिक्षा दी कि उसके पास न केवल गांधी का गुरु बनने का, अपितु आपका और मेरा भी गुरु बनने का अधिकार था।

आप और मैं और पहाड़ी उपदेश

यदि आप इस पहाड़ी उपदेश  को पढ़ें तो देखेंगे कि आपको इसका पालन कैसे करना चाहिए तो आप भ्रमित हो सकते हैं। इस प्रकार के आदेशों के आधार पर कोई भी कैसे जीवन जी सकता है, जो हमारे मनों और हमारे उद्देश्यों को उजागर कर देते हैं?  इस उपदेश के द्वारा यीशु की मंशा क्या थी? हम उसके समापन वाक्य से इसे देख सकते हैं।

48 इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है॥

मत्ती 5:48

यह एक आदेश है, सुझाव नहीं। उसकी शर्त यह है कि हम सिद्ध बनें !

क्यों?

यीशु ने इसके उत्तर को उस तरह से प्रकट किया कि जिस तरह से वह पहाड़ी उपदेश का आरम्भ करता है। वह अपनी शिक्षा के अन्तिम लक्ष्य को संदर्भित करके आरम्भ करता है।

3 धन्य हैं वे, जो मन के दीन हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।

मत्ती 5:3

पहाड़ी उपदेश स्वर्ग के राज्य’  पर अंतर्दृष्टि देने के लिए है। स्वर्ग का राज्य इब्रानी वेदों में एक महत्वपूर्ण विषय है, जैसा कि संस्कृत के वेदों में है। हम स्वर्ग के राज्य या वैकुण्ठ लोक के स्वभाव की जांच तब करेंगे, जब हम यह देखेंगे कि कैसे यीशु अपने चंगाई के आश्चर्यकर्मों के द्वारा उस राज्य के स्वभाव को प्रदर्शित करता है।

प्राचीन असुर सर्प – शैतान द्वारा यीशु को प्रलोभित करना

हिंदू पौराणिक कथाएं बार-बार स्मरण दिलाती हैं जब कृष्ण ने शत्रु असुरों से लड़ाई की थी और उन्हें हरा दिया था, विशेष रूप से असुर राक्षस जो सांपों के रूप में कृष्ण को धमकी दे रहे थे। भागवत पुराण (श्रीमद्भागवतम्) इस कहानी को कुछ इस तरह स्मरण दिलाता है, जब कंस के सहयोगी अघासुर  ने कृष्ण को जन्म से ही मारने का प्रयास किया था, उसने इतने बड़े सर्प अर्थात् नाग का रूप धारण कर लिया कि जब उसने अपना मुंह खोला तो वह गुफा जैसा बड़ा था। अघासुर पूतना का भाई था (जिसे कृष्ण ने तब मारा था जब उसने एक शिशु के रूप में उससे स्तनपान करते हुए विष को चूसा था) और बकासुर (जिसे भी कृष्ण ने उसकी चोंच को तोड़कर मार डाला था) और इस तरह उन्होंने बदला लेना चाहा था। अघासुर ने अपना मुँह खोला और गोपियों के चरवाहे बच्चे इस में जंगल में बनी हुई एक गुफा सोचते हुए चले गए। कृष्ण भी अंदर गए, परन्तु यह जानकर कि यह अघासुर है उन्होंने अपने शरीर का विस्तार तब तक किया जब तक कि अघासुर ने दम नहीं तोड़ दिया और मर नहीं गया। एक अन्य अवसर पर, लोकप्रिय नाटक श्री कृष्ण  पर दिखाया गया है कि कृष्ण ने शक्तिशाली असुर सर्प कालिया नाग  को नदी में युद्ध करते हुए उसके सिर पर नृत्य करते हुए उसे पराजित कर दिया था।

पौराणिक कथाओं में असुर अगुवा और शक्तिशाली साँप/अजगर वृत्र  का वर्णन भी मिलता है। ऋग वेद बताता है कि देवता इंद्र ने एक बड़े युद्ध में राक्षस वृत्र का सामना किया था और उसे अपने वज्र (वज्रायुध) के साथ मार दिया था, जिसने वृत्र का जबड़ा तोड़ दिया था। भागवत पुराण के संस्करण में बताया गया है कि वृत इतना बड़ा साँप/अजगर था कि उसने सब कुछ अपने में समा लिया था, यहाँ तक ​​कि उसने ग्रहों और तारों को भी खतरे में डाल दिया था, जिससे हर कोई उससे डरता था। देवताओं के साथ लड़ाई में वृत को प्रमुख विजय मिली थी। इंद्र उसे शक्ति से नहीं हरा सकते थे, परन्तु उसे ऋषि दधीची  की हड्डियों की प्राप्त करने के लिए परामर्श दिया गया था। दधीची ने वज्र को बनाने के लिए अपनी हड्डियों को दे दिया, जिसकी सहायता से इंद्र ने बड़े सर्प वृत्र को पराजित किया और मार दिया।

इब्रानी वेदों का शैतान: सुंदर आत्मा प्राणघातक सर्प बन गया

इब्रानी वेदों में यह भी लिपिबद्ध किया गया है कि एक शक्तिशाली आत्मा है जिसने स्वयं को परम प्रधान परमेश्वर के एक विरोधी (शैतान का अर्थ विरोधी) के रूप में स्थापित किया है। इब्रानी वेदों ने उसका वर्णन सृष्टि के आरम्भ में एक देवता के रूप में सृजे हुए सुंदर और बुद्धिमान प्राणी की तरह किया है। उसका विवरण ऐसे दिया गया है:

12 हे मनुष्य के सन्तान, सोर के राजा के विषय में विलाप का गीत बनाकर उस से कह, परमेश्वर यहोवा यों कहता है, तू तो उत्तम से भी उत्तम है; तू बुद्धि से भरपूर और सर्वांग सुन्दर है।
13 तू परमेश्वर की एदेन नाम बारी में था; तेरे पास आभूषण, माणिक, पद्मराग, हीरा, फीरोज़ा, सुलैमानी मणि, यशब, नीलमणि, मरकद, और लाल सब भांति के मणि और सोने के पहिरावे थे; तेरे डफ और बांसुलियां तुझी में बनाई गईं थीं; जिस दिन तू सिरजा गया था; उस दिन वे भी तैयार की गई थीं।
14 तू छानेवाला अभिषिक्त करूब था, मैं ने तुझे ऐसा ठहराया कि तू परमेश्वर के पवित्र पर्वत पर रहता था; तू आग सरीखे चमकने वाले मणियों के बीच चलता फिरता था।
15 जिस दिन से तू सिरजा गया, और जिस दिन तक तुझ में कुटिलता न पाई गई, उस समय तक तू अपनी सारी चालचलन में निर्दोष रहा।

यहेजकेल 28:12-15

इस शक्तिशाली देवता में दुष्टता क्यों पाई गई? इब्रानी वेद इस तरह से बताते हैं कि:

17 सुन्दरता के कारण तेरा मन फूल उठा था; और वैभव के कारण तेरी बुद्धि बिगड़ गई थी। मैं ने तुझे भूमि पर पटक दिया; और राजाओं के साम्हने तुझे रखा कि वे तुझ को देखें।

यहेजकेल 28:17

इस देवता का पतन आगे वर्णित किया गया है:

12 हे भोर के चमकने वाले तारे तू क्योंकर आकाश से गिर पड़ा है? तू जो जाति जाति को हरा देता था, तू अब कैसे काट कर भूमि पर गिराया गया है?
13 तू मन में कहता तो था कि मैं स्वर्ग पर चढूंगा; मैं अपने सिंहासन को ईश्वर के तारागण से अधिक ऊंचा करूंगा; और उत्तर दिशा की छोर पर सभा के पर्वत पर बिराजूंगा;
14 मैं मेघों से भी ऊंचे ऊंचे स्थानों के ऊपर चढूंगा, मैं परमप्रधान के तुल्य हो जाऊंगा।

यशायाह 14:12-14

शैतान अब

इस शक्तिशाली आत्मा को अब शैतान  (‘दोष लगाने वाला’) या इब्लीस कहा जाता है, परन्तु मूल रूप से उसे लूसीफर – ‘भोर का पुत्र’ कहा जाता था। इब्रानी वेदों का कहना है कि वह एक आत्मा है, एक दुष्ट असुर है, परन्तु अघासुर और वृत्र की तरह उसे एक साँप या अजगर का रूप धारण करते हुए वर्णित किया गया है। पृथ्वी पर उसके गिरा दिए जाने की घटना इस तरह से वर्णित की गई है:

7 फिर स्वर्ग पर लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले, और अजगर ओर उसके दूत उस से लड़े।
8 परन्तु प्रबल न हुए, और स्वर्ग में उन के लिये फिर जगह न रही।
9 और वह बड़ा अजगर अर्थात वही पुराना सांप, जो इब्लीस और शैतान कहलाता है, और सारे संसार का भरमाने वाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया; और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए।

प्रकाशितवाक्य 12:7-9

शैतान अब मुख्य असुर है जो ‘पूरे संसार को भटकाता है।‘ वास्तव में, एक सर्प के रूप में यह वही था, जो पहले मनुष्यों को पाप तक ले गया। इससे सतयुग का अंत हो गया, जो स्वर्गलोक में सत्य का युग था।

शैतान ने अपनी मूल बुद्धि और सुंदरता को नहीं खोया है, जो उसे और अधिक खतरनाक बना देती है क्योंकि वह अपने दिखावे के पीछे अपने धोखे को उत्तम तरीके से छिपा सकता है। इब्रानी वेद बाइबल बताती है कि वह कैसे काम करता है:

14 और यह कुछ अचम्भे की बात नहीं क्योंकि शैतान आप भी ज्योतिमर्य स्वर्गदूत का रूप धारण करता है।

2 कुरिन्थियों 11:14

यीशु ने शैतान से लड़ाई की

यह वह विरोधी था जिसका सामना यीशु को करना था। यूहन्ना से बपतिस्मा लेने के ठीक बाद यीशु वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते हुए जंगल में चले गए। परन्तु उसने ऐसा सेवानिवृत्ति आरम्भ करने के लिए नहीं किया, अपितु ऐसा युद्ध में अपने विरोधी का सामना करने के लिए किया। यह लड़ाई शारीरिक लड़ाई नहीं थी, जैसे कि कृष्ण और अघासुर के बीच या इंद्र और वृत्र के बीच मिलती है, अपितु यह प्रलोभन की लड़ाई थी। सुसमाचार इसे इस तरह से लिपिबद्ध करता है:

र यीशु पवित्रआत्मा से भरा हुआ, यरदन से लैटा; और चालीस दिन तक आत्मा के सिखाने से जंगल में फिरता रहा; और शैतान उस की परीक्षा करता रहा।
2 उन दिनों में उस ने कुछ न खाया और जब वे दिन पूरे हो गए, तो उसे भूख लगी।
3 और शैतान ने उस से कहा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो इस पत्थर से कह, कि रोटी बन जाए।
4 यीशु ने उसे उत्तर दिया; कि लिखा है, मनुष्य केवल रोटी से जीवित न रहेगा।
5 तब शैतान उसे ले गया और उस को पल भर में जगत के सारे राज्य दिखाए।
6 और उस से कहा; मैं यह सब अधिकार, और इन का विभव तुझे दूंगा, क्योंकि वह मुझे सौंपा गया है: और जिसे चाहता हूं, उसी को दे देता हूं।
7 इसलिये, यदि तू मुझे प्रणाम करे, तो यह सब तेरा हो जाएगा।
8 यीशु ने उसे उत्तर दिया; लिखा है; कि तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर; और केवल उसी की उपासना कर।
9 तब उस ने उसे यरूशलेम में ले जाकर मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उस से कहा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को यहां से नीचे गिरा दे।
10 क्योंकि लिखा है, कि वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, कि वे तेरी रक्षा करें।
11 और वे तुझे हाथों हाथ उठा लेंगे ऐसा न हो कि तेरे पांव में पत्थर से ठेस लगे।
12 यीशु ने उस को उत्तर दिया; यह भी कहा गया है, कि तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न करना।
13 जब शैतान सब परीक्षा कर चुका, तब कुछ समय के लिये उसके पास से चला गया॥

लूका 4:1-13

उनका संघर्ष मानवीय इतिहास के आरम्भ में ही शुरू हो गया था। परन्तु यह यीशु के जन्म के समय शिशु यीशु को मारने के प्रयासों के द्वारा नवीनीकृत हुआ। युद्ध के इस दौर में, यीशु विजयी साबित हुआ, इसलिए नहीं कि उसने शारीरिक रूप से शैतान को पराजित किया था, अपितु इसलिए क्योंकि उसने शैतान द्वारा उसके सामने रखे हुए सभी शक्तिशाली प्रलोभनों का विरोध किया था। इन दोनों के बीच लड़ाई आगे आने वाले कई महीनों तक चलती रहेगी, जिसका समापन साँप द्वारा ‘उसकी एड़ी को डसने’ और यीशु द्वारा ‘उसके सिर को कुचलने’ में होगा। परन्तु इससे पहले, यीशु को अंधेरे को दूर करने के लिए, शिक्षा देने के लिए गुरु की भूमिका को पूरा करना था।

यीशु – वह व्यक्ति जो हमें समझता है

प्रलोभन और परीक्षा के प्रति यीशु की अवधि हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। बाइबल यीशु के बारे में बताती है कि:

18 क्योंकि जब उस ने परीक्षा की दशा में दुख उठाया, तो वह उन की भी सहायता कर सकता है, जिन की परीक्षा होती है॥

इब्रानियों 2:18

तथा

15 क्योंकि हमारा ऐसा महायाजक नहीं, जो हमारी निर्बलताओं में हमारे साथ दुखी न हो सके; वरन वह सब बातों में हमारी नाईं परखा तो गया, तौभी निष्पाप निकला।
16 इसलिये आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएं, जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे॥

इब्रानियों 4:15-16

योम किप्पुर, इब्रानी दुर्गा पूजा,  के समय महायाजक बलिदान चढ़ाता है, ताकि इस्राएलियों को क्षमा की प्राप्ति हो सके। अब यीशु एक ऐसा याजक बन गया है जो हमें सहानुभूति दे सकता है और हमें समझ सकता है – यहाँ तक कि हम पर आने वाले प्रलोभनों में हमारी सहायता भी करता है, निश्चित रूप से क्योंकि वह स्वयं भी प्रलोभनों में से होकर गया था – तथापि बिना पाप के। हम परमेश्‍वर के सामने अश्वस्त हो सकते हैं क्योंकि यीशु ने हम पर आने वाले सबसे कठिन प्रलोभनों को झेला है। वह एक ऐसा व्यक्ति है जो हमें समझता है और हम पर आने वाले प्रलोभनों और पापों के प्रति हमारी मदद कर सकता है। प्रश्न यह है कि∶ क्या हम उसे अपनाएँगे?

स्वामी यूहन्ना: प्रयाश्चित और आत्म-अभिषेक की शिक्षा देते हैं

हमने कृष्ण के जन्म के माध्यम से यीशु (येसु सत्संग) के जन्म की जांच की। पौराणिक कथाओं में वर्णित है कि कृष्ण का बड़ा भाई बालाराम (बलराम) था। नंदा कृष्ण के पालक पिता थे जिन्होंने बलराम को भी कृष्ण के बड़े भाई के रूप में पाला था। महाकाव्यों ने युद्ध में विभिन्न असुरों को पराजित करते हुए भाइयों कृष्ण और बलराम के बचपन की कई कहानियों को एक साथ वर्णित किया है। कृष्ण और बलराम ने अपने सामान्य लक्ष्य को पूरा करने के लिए एक दूसरे का सहयोगी बनते हुए – बुराई को पराजित किया था।

कृष्ण और बलराम की तरह, यीशु एंव यूहन्ना

कृष्ण की तरह ही, यीशु का भी एक निकट सम्बन्धी यूहन्ना था, जिसके साथ मिलकर उन्होंने अपनी सेवा को साझा किया था। यीशु और यूहन्ना अपनी माताओं के माध्यम से आपस में रिश्तेदार थे और यूहन्ना ने यीशु से ठीक 3 माह पहले जन्म लिया था। सुसमाचार सबसे पहले यूहन्ना पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए यीशु की शिक्षा और चंगाई की सेवा को लिपिबद्ध करते हैं। यदि हम सबसे पहले यूहन्ना की शिक्षा को नहीं समझते हैं तो हम यीशु के आने के उद्देश्य को नहीं समझ सकते हैं। यूहन्ना ने पश्चाताप (पछतावा) और शुद्धता (स्वयं को अभिषिक्त करना) को शुभ समाचार की आरम्भिक बातों के रूप में शिक्षा देने का प्रयास किया।

बपतिस्मा देने वाला यूहन्ना:  हमें तैयार करने के लिए आने वाला स्वामी

अक्सर सुसमाचारों में यूहन्ना को बपतिस्मा देने वाला यूहन्नाकहा जाता है, क्योंकि उसने पश्चाताप (पछतावे) के संकेत के रूप में शुद्धता पर महत्व दिया था, यूहन्ना के आगमन की भविष्यद्वाणी सैकड़ों वर्षों पहले ही प्राचीन इब्रानी वेदों में कर दी गई थी।

3 किसी की पुकार सुनाई देती है, जंगल में यहोवा का मार्ग सुधारो, हमारे परमेश्वर के लिये अराबा में एक राजमार्ग चौरस करो।
4 हर एक तराई भर दी जाए और हर एक पहाड़ और पहाड़ी गिरा दी जाए; जो टेढ़ा है वह सीधा और जो ऊंचा नीचा है वह चौरस किया जाए।
5 तब यहोवा का तेज प्रगट होगा और सब प्राणी उसको एक संग देखेंगे; क्योंकि यहोवा ने आप ही ऐसा कहा है॥

यशायाह 40:3-5

यशायाह ने भविष्यद्वाणी की थी कि एक व्यक्ति ‘जंगल मेंप्रभु परमेश्वर के लिए ‘मार्ग तैयार’ करने के लिए आएगा। वह बाधाओं को सुलझा देगा ताकि ‘प्रभु की महिमा प्रकाशित हो सके

ऐतिहासिक समय-रेखा में यशायाह और अन्य इब्रानी संतजन (भविष्यद्वक्ता)। यीशु के आने से पहले मलाकी इन में अन्तिम था

यशायाह द्वारा इब्रानी वेदों (पुराने नियम) की अन्तिम पुस्तक को लिखने के 300 वर्षों बाद भविष्यद्वक्ता मलाकी आया। मलाकी ने इसके बारे में विस्तार से बताया कि यशायाह ने इस आने वाले तैयारीकर्ता के बारे में क्या कुछ कहा था। उसने भविष्यद्वाणी की थी कि:

खो, मैं अपने दूत को भेजता हूं, और वह मार्ग को मेरे आगे सुधारेगा, और प्रभु, जिसे तुम ढूंढ़ते हो, वह अचानक अपने मन्दिर में आ जाएगा; हां वाचा का वह दूत, जिसे तुम चाहते हो, सुनो, वह आता है, सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।

मलाकी 3:1

मीका ने भविष्यद्वाणी की कि सन्देशवाहक’ के आने के ठीक बाद, परमेश्वर स्वयं उसके मन्दिर में प्रकट होगा। यह यूहन्ना के आने के ठीक बाद यीशु, देहधारी परमेश्वर, का उल्लेख करता है।

स्वामी यूहन्ना

यूहन्ना के बारे में सुसमाचार ऐसे लिपिबद्ध करते हैं:

रहा।लूका 1:8080 और वह बालक बढ़ता और आत्मा में बलवन्त होता गया, और इस्राएल पर प्रगट होने के दिन तक जंगलों में

रहा।लूका 1:80

जब वह जंगल में रहता था:

4 यह यूहन्ना ऊंट के रोम का वस्त्र पहिने था, और अपनी कमर में चमड़े का पटुका बान्धे हुए था, और उसका भोजन टिड्डियां और बनमधु

था।मत्ती 3:4

जैसे बलराम में बहुत अधिक शारीरिक बल था वैसे ही यूहन्ना में भी था परन्तु उसका बड़ा मानसिक और आत्मिक बल उसे वानप्रस्थ (वन-वासी) आश्रम की ओर बचपन में ही ले गया। उनकी दृढ़ आत्मा ने उसे एक वानप्रस्थी के रूप में वस्त्र पहनने और भोजन खाने के लिए प्रेरित किया, यद्यपि सेवानिवृत्ति के लिए नहीं अपितु ऐसा उन्हें अपनी सेवा को पूरा करने के लिए तैयार होने में किया। उनके जंगल के जीवन ने उन्हें स्वयं के विषय में जानने के लिए ढाल दिया, उन्हें यह समझ प्रदान की कि प्रलोभन का विरोध कैसे करना है। उन्होंने स्पष्ट रूप से जोर देकर कहा है कि वह एक देहधारी अर्थात् अवतारी नहीं थे, न ही वह मन्दिर के याजक अर्थात् पुजारी थे। उनकी आत्म-समझ ने उन्हें एक महान शिक्षक के रूप में स्वीकार किया। चूँकि शब्द स्वामी संस्कृत भाषा से निकल कर आता है, जिसका अर्थ है कि ‘एक व्यक्ति जो जानता है या एक व्यक्ति जो स्वयं का शिक्षक है’, इसलिए यूहन्ना को स्वामी मानना ​​उचित है।

स्वामी यूहन्ना – को इतिहास में दृढ़ता से से रखा गया है

सुसमाचार का वृतान्त:

बिरियुस कैसर के राज्य के पंद्रहवें वर्ष में जब पुन्तियुस पीलातुस यहूदिया का हाकिम था, और गलील में हेरोदेस नाम चौथाई का इतूरैया, और त्रखोनीतिस में, उसका भाई फिलेप्पुस, और अबिलेने में लिसानियास चौथाई के राजा थे।
2 और जब हन्ना और कैफा महायाजक थे, उस समय परमेश्वर का वचन जंगल में जकरयाह के पुत्र यूहन्ना के पास पहुंचा।

लूका 3:1-2

यह यूहन्ना की सेवा को आरम्भ करता है और यह उन्हें कई प्रसिद्ध ऐतिहासिक लोगों के साथ रख देता है। यह हमारे ध्यान को उस समय के शासकों के व्यापक संदर्भ की ओर आकर्षित करता है। यह हमें ऐतिहासिक रूप से सुसमाचारों के वृतान्तों की सटीकता की जाँच करने की अनुमति देता है। ऐसा करने से हम पाते हैं कि तिबुरियुस कैसर, पिन्तुस पिलातुस, हेरोदेस, फिलिप्पुस, लिसानियास, हन्ना और कैफा ऐसे लोग थे जिन्हें धर्मनिरपेक्ष रोमियों और यहूदी इतिहासकारों द्वारा पहचाना गया है। विभिन्न शासकों को दी जाने वाले विभिन्न पदवियों (जैसे कि पिन्तुस पिलातुस को राज्यपाल’, हेरोदेस को ‘ट्रेटाख’ इत्यादि) को ऐतिहासिक रूप से सही और सटीकता के साथ सत्यापित किया गया है। इस प्रकार हम यह आंकलन कर सकते हैं कि इन वृतान्तों को विश्वसनीयता के साथ लिपिबद्ध किया गया था।

तिबुरियुस कैसर ने 14 ईस्वी सन् में रोम के सिंहासन को संभाला था। उसके शासनकाल के 15 वें वर्ष का अर्थ है कि यूहन्ना ने अपनी सेवा को 29 ईस्वी सन् में आरम्भ किया था।

स्वामी यूहन्ना का सन्देश – पश्चाताप और अंगीकार

यूहन्ना का संदेश क्या था? अपनी जीवन-शैली की तरह ही, उसका संदेश सरल परन्तु सामर्थी था। सुसमाचार कहता है कि:

न दिनों में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला आकर यहूदिया के जंगल में यह प्रचार करने लगा। कि
2 मन फिराओ; क्योंकि स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

मत्ती 3:1-2

उसका सन्देश सबसे पहले इस तथ्य की उद्घोषणा थी कि – स्वर्ग का राज्य निकट’ आ गया था। परन्तु लोग इस राज्य के लिए तब तक तैयार नहीं होंगे जब तक कि वे पश्चाताप नहीं करते’। वास्तव में, यदि वे पश्चाताप नहीं करते तो वे इस राज्य को खो देंगे। पश्चाताप  का अर्थ ‘‘अपने मन को बदलना; पुनर्विचार करना; अलग तरह से सोचना है।एक तरह से यह पछतावे (पश्चाताप) जैसा है। परन्तु उस समय लोग इसके बारे  में कुछ भिन्न तरह से सोचते थे? इसे हम यूहन्ना के सन्देश के प्रति दी गई प्रतिक्रियाओं में देख सकते हैं। लोगों ने उनके सन्देश का उत्तर इस तरह से दिया:

6 और अपने अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उस से बपतिस्मा लिया।

मत्ती 3:6

हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति यह होती है कि हम अपने पापों को छिपाएँ और दिखावा करें कि हमने गलत नहीं किया है। अपने पापों को अंगीकार करना और उनका पश्चाताप करना हमारे लिए लगभग असम्भव सा प्रतीत होता है, क्योंकि यह हमारे अपराध और शर्म के बोध को उजागर करता है। यूहन्ना ने प्रचार किया कि लोगों को स्वयं को परमेश्वर के राज्य के लिए तैयार करने के लिए पश्चाताप (पछतावा) करने की आवश्यकता थी।

इस पश्चाताप के संकेत के रूप में लोगों को यूहन्ना से नदी में बपतिस्मा  लेना था। बपतिस्मा एक अनुष्ठानिक स्नान या जल से शुद्ध किया जाना था। इसके बाद लोग धार्मिक रूप से शुद्ध रखने के लिए प्यालों और बर्तनों को भी बपतिस्मा (साफ) देने लगे। हम पुरोहितों द्वारा मूर्ति-प्रतिष्ठा और त्यौहारों की तैयारी के लिए मूर्तियों को जल से अभिषेक  (जल-स्नान) दिए जाने द्वारा शुद्धि की प्रथा से परिचित हैं। मनुष्य ‘परमेश्वर के स्वरूप’ में रचे गए थे’ और इसलिए यूहन्ना का नदी में दिए जाने वाला स्नान एक जलाभिषेक  था जो कि प्रतीकात्मक रूप से स्वर्ग के राज्य के लिए परमेश्वर के पश्चाताप-करते हुए स्वरूप को तैयार कर रहा था। आज बपतिस्मे को सामान्य रूप से एक मसीही रीति रिवाज माना जाता है, परन्तु यहाँ इसका उपयोग एक व्यापक स्वभाव वाला है जो परमेश्वर के राज्य की तैयारी में शुद्धता को दर्शाता है।

पश्चाताप का प्रतिफल

कई लोग बपतिस्मा लेने के लिए यूहन्ना के पास आए, परन्तु सभी ने ईमानदारी से स्वीकार नहीं किया और अपने पापों को अंगीकार नहीं किया। सुसमाचार कहता है:

7 जब उस ने बहुतेरे फरीसियों और सदूकियों को बपतिस्मा के लिये अपने पास आते देखा, तो उन से कहा, कि हे सांप के बच्चों तुम्हें किस ने जता दिया, कि आने वाले क्रोध से भागो?
8 सो मन फिराव के योग्य फल लाओ।
9 और अपने अपने मन में यह न सोचो, कि हमारा पिता इब्राहीम है; क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि परमेश्वर इन पत्थरों से इब्राहीम के लिये सन्तान उत्पन्न कर सकता है।
10 और अब कुल्हाड़ा पेड़ों की जड़ पर रखा हुआ है, इसलिये जो जो पेड़ अच्छा फल नहीं लाता, वह काटा और आग में झोंका जाता है।

मत्ती 3:7-10

फरीसी और सदूकी मूसा की व्यवस्था के शिक्षक थे, जो व्यवस्था के सभी धार्मिक नियमों का पालन किए जाने के लिए कड़ा परिश्रम किया करते थे। सभी ने यही सोचा कि ये अगुवे, अपनी धार्मिक शिक्षा और योग्यता के कारण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत थे। परन्तु यूहन्ना ने उन्हें साँप के बच्चोंकहा और उनके ऊपर आने वाले न्याय के बारे में उन्हें चेतावनी दी।

क्यों?

‘पश्चाताप को ध्यान में रखते हुए फल को न उत्पन्न करने से यह पता चलता है कि उन्होंने वास्तव में पश्चाताप नहीं किया था। उन्होंने अपने पाप को स्वीकार नहीं किया था, परन्तु इसके स्थान पर वे पापों को छिपाने के लिए अपने धार्मिक नियमों का उपयोग कर रहे थे। यद्यपि उनकी धार्मिक धरोहर, बहुत अच्छी थी, तथापि इसने उन्हें पश्चाताप करने के स्थान पर घमण्डी बना दिया था।

पश्चाताप का प्रतिफल

अंगीकार और पश्चाताप के आने से एक भिन्न तरह के जीवन को जीने की अपेक्षा की गई थी। लोगों ने यूहन्ना से पूछा कि उन्हें इस चर्चा में अपने पश्चाताप का प्रदर्शन कैसे करना चाहिए:

10 और लोगों ने उस से पूछा, तो हम क्या करें?
11 उस ने उन्हें उतर दिया, कि जिस के पास दो कुरते हों वह उसके साथ जिस के पास नहीं हैं बांट दे और जिस के पास भोजन हो, वह भी ऐसा ही करे।
12 और महसूल लेने वाले भी बपतिस्मा लेने आए, और उस से पूछा, कि हे गुरू, हम क्या करें?
13 उस ने उन से कहा, जो तुम्हारे लिये ठहराया गया है, उस से अधिक न लेना।
14 और सिपाहियों ने भी उस से यह पूछा, हम क्या करें? उस ने उन से कहा, किसी पर उपद्रव न करना, और न झूठा दोष लगाना, और अपनी मजदूरी पर सन्तोष करना॥

लूका 3:10-14

क्या यूहन्ना मसीह था?

उसके संदेश की सामर्थ्य के कारण, कई लोग आश्चर्यचकित होते थे कि कहीं यूहन्ना मसीह तो नहीं था, जिसकी प्रतिज्ञा प्राचीन काल में ही परमेश्वर के देहधारी के रूप में आने के लिए की गई थी। सुसमाचार इस चर्चा को लिपिबद्ध करते हैं:

15 जब लोग आस लगाए हुए थे, और सब अपने अपने मन में यूहन्ना के विषय में विचार कर रहे थे, कि क्या यही मसीह तो नहीं है।
16 तो यूहन्ना ने उन सब से उत्तर में कहा: कि मैं तो तुम्हें पानी से बपतिस्मा देता हूं, परन्तु वह आनेवाला है, जो मुझ से शक्तिमान है; मैं तो इस योग्य भी नहीं, कि उसके जूतों का बन्ध खोल सकूं, वह तुम्हें पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देगा।
17 उसका सूप, उसके हाथ में है; और वह अपना खलिहान अच्छी तरह से साफ करेगा; और गेहूं को अपने खत्ते में इकट्ठा करेगा, परन्तु भूसी को उस आग में जो बुझने की नहीं जला देगा॥
18 सो वह बहुत सी शिक्षा दे देकर लोगों को सुसमाचार सुनाता रहा।

लूका 3:15-18

यूहन्ना ने उन्हें बताया कि मसीह (ख्रिस्त) शीघ्र ही आने वाला था, जिसका अर्थ है कि यीशु।

स्वामी यूहन्ना की सेवा और हम

यूहन्ना ने यीशु के साथ मिलकर लोगों को परमेश्वर के राज्य के लिए तैयार किया, जैसे बलराम ने कृष्ण के साथ मिलकर बुराई के विरूद्ध उनके कार्य में सहयोग दिया था। यूहन्ना ने उन्हें और अधिक नियमों को प्राप्त करने के लिए तैयार नहीं किया, अपितु उन्हें उनके पापों से पश्चाताप (पछतावा) करने और पश्चाताप करने के लिए नदी में स्नान लेने (आत्म-जलाभिषेक) के द्वारा यह दिखाने के लिए कहा कि उनके आंतरिक पश्चाताप ने उन्हें अब तैयार कर दिया था।

यह कठिन तपस्वी नियमों को अपनाने की अपेक्षा लागू करने में अत्याधिक कठिन है, क्योंकि यह हमारी शर्म और दोष भावना को उजागर कर देता है। इस कारण धार्मिक अगुवे स्वयं में पश्चाताप नहीं ला सके। इसके स्थान पर उन्होंने अपने पापों को छिपाने के लिए धर्म का उपयोग किया। अपने इस तरह के चुनाव के कारण जब यीशु उनके बीच में आया तब वे परमेश्वर के राज्य को समझने के लिए तैयार नहीं थे। यूहन्ना की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। वह मांग करता है कि हम अपने पाप से पश्चाताप करें। क्या हम करेंगे?

हम निरन्तर यीशु नामक इस व्यक्ति की खोज करते रहेंगे जब शैतान द्वारा उसकी परीक्षा ली गई।

यीशु ने आश्रमों के दायित्व को कैसे अपने ऊपर लिया

एक धार्मिक जीवन चार अवस्थाओं (आश्रमों) में विभाजित होता है। एक व्यक्ति के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं के लिए आश्रमों/आश्रम लक्ष्यों की प्राप्ति, जीवन के लिए योगदान और गतिविधियाँ उपयुक्त हैं। जीवन को विभिन्न अवस्थाओं में विभाजित करने से, आश्रम धर्म, शरीर, मन और भावनाओं के अनुरूप चार प्रगतिशील चरणों में से होकर निकलता है। सहस्राब्दियों पहले इसे विकसित किया गया था और धर्म शास्त्रों  के नाम से जाने वाले धर्मग्रंथों में विस्तार से बताया गया है कि हमारे कर्तव्यों में भिन्नता पाई जाती है, क्योंकि हम युवावस्था से प्रौढ़वस्था, ज्येष्ठ आयु के और वृद्धावस्था तक आगे बढ़ते चले जाते हैं।

परम प्रधान के देहधारण, के रूप में यीशु ने अपने जन्म के कुछ समय बाद ही आश्रम धर्म का पालन करना आरम्भ कर दिया था। उसने ऐसा कैसे किया, क्योंकि वह आश्रमों के लिए उपयुक्त तरीके से जीवन जीने के लिए हमें एक आदर्श प्रस्तुत करता है। हम ब्रह्मचर्य से आरम्भ करते हैं, जहाँ हमें उपनयन और विद्यारम्भम् संस्कार जैसे मील के पत्थर मिलते हैं।

एक ब्रह्मचारी के रूप में यीशु

विद्यार्थी के रूप में मिलने वाला आश्रम, ब्रह्मचर्य  सबसे पहले आता है। इस अवधि में एक विद्यार्थी भविष्य में किए जाने वाले कामों के प्रति स्वयं के लिए शिक्षा प्राप्त करने और स्वयं की तैयारी के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम में रहता है, जिनकी बाद में आने वाले आश्रमों में आवश्यकता होती है। यीशु ने आज के उपनयन संस्कार अर्थात् जनेऊ धारण करने के समान ही एक इब्रानी दीक्षा समारोह के माध्यम से ब्रह्मचर्य में प्रवेश किया था, यद्यपि उसने ऐसा कुछ भिन्न तरह से किया। सुसमाचार में उसके उपनयन संस्कार को इस तरह से लिपिबद्ध किया गया है।

यीशु का उपनयन संस्कार

22जब मूसा की व्यवस्था के अनुसार उनके शुद्ध होने के दिन पूरे हुए, तो वे उसे यरूशलेम में ले गए कि प्रभु के सामने लाएँ, 23 (जैसा कि प्रभु की व्यवस्था में लिखा है : हर एक पहिलौठा प्रभु के लिये पवित्र ठहरेगा।”)

24और प्रभु की व्यवस्था के वचन के अनुसार : पंडुकों का एक जोड़ा, या कबूतर के दो बच्‍चेलाकर बलिदान करें।

25यरूशलेम में शमौन नामक एक मनुष्य था, और वह मनुष्य धर्मी और भक्‍त था; और इस्राएल की शान्ति की बाट जोह रहा था, और पवित्र आत्मा उस पर था।

26और पवित्र आत्मा द्वारा उस पर प्रगट हुआ था कि जब तक वह प्रभु के मसीह को देख न लेगा, तब तक मृत्यु को न देखेगा।

27वह आत्मा के सिखाने से मन्दिर में आया; और जब माता-पिता उस बालक यीशु को भीतर लाए, कि उसके लिये व्यवस्था की रीति के अनुसार करें,

28तो उसने उसे अपनी गोद में लिया और परमेश्‍वर का धन्यवाद करके कहा :

29हे स्वामी, अब तू अपने दास को अपने वचन के अनुसार शान्ति से विदा करता है,

30क्योंकि मेरी आँखों ने ‘तेरे उद्धार’ को देख लिया है,

31जिसे तू ने सब देशों के लोगों के सामने तैयार किया है,

32कि वह अन्य ‘सभी जातियों’ को प्रकाश देने के लिये ‘ज्योति’, और तेरे निज लोग इस्राएल की महिमा हो।

33उसका पिता और उसकी माता इन बातों से जो उसके विषय में कही जाती थीं, आश्‍चर्य करते थे।

34तब शमौन ने उनको आशीष देकर, उसकी माता मरियम से कहा, “देख, वह तो इस्राएल में बहुतों के गिरने, और उठने के लिये, और एक ऐसा चिह्न होने के लिये ठहराया गया है, जिसके विरोध में बातें की जाएँगी –

35वरन् तेरा प्राण भी तलवार से वार पार छिद जाएगा – इससे बहुत हृदयों के विचार प्रगट होंगे।

36आशेर के गोत्र में से हन्नाह नामक फनूएल की बेटी एक भविष्यद्वक्‍तिन थी। वह बहुत बूढ़ी थी, और विवाह होने के बाद सात वर्ष अपने पति के साथ रह पाई थी।

37वह चौरासी वर्ष से विधवा थी : और मन्दिर को नहीं छोड़ती थी, पर उपवास और प्रार्थना कर करके रात-दिन उपासना किया करती थी।

38और वह उस घड़ी वहाँ आकर प्रभु का धन्यवाद करने लगी, और उन सभों से, जो यरूशलेम के छुटकारे की बाट जोहते थे, उस बालक के विषय में बातें करने लगी।

39जब वे प्रभु की व्यवस्था के अनुसार सब कुछ पूरा कर चुके तो गलील में अपने नगर नासरत को फिर चले गए।

40और बालक बढ़ता, और बलवन्त होता, और बुद्धि से परिपूर्ण होता गया; और परमेश्‍वर का अनुग्रह उस पर था।

लूका 2:22-40

आज कुछ उपनयन समारोहों में एक मंदिर में एक बकरे की बलि जढ़ाई जाती है। यह इब्रानी उपनयन समारोहों में भी एक सामान्य प्रथा थी, परन्तु मूसा की व्यवस्था ने निर्धन परिवारों को एक बकरे के स्थान पर कबूतरों को भेंट में दिए जाने की अनुमति प्रदान की। हम देखते हैं कि यीशु का पालन पोषण विनम्रतापूर्वक किया गया था क्योंकि उसके माता-पिता एक बकरे को बलि के लिए नहीं दे सकते थे, इसलिए उन्होंने कबूतरों की भेंट चढ़ाई।

एक पवित्र ऋषि, शमौन, ने भविष्यवाणी की कि यीशु सभी भाषा के समूहों अर्थात् ‘सभी जातियों’ के लिए ’एक ज्योति’ और ‘उद्धार’ होगा। इसलिए यीशु आपके और मेरे लिए ‘उद्धार’ लाने वाली एक ‘ज्योति’ है, क्योंकि हम संसार में पाए जाने वाले भाषा समूहों में से एक हैं। हम इसे बाद में देखेंगे कि यीशु यह कैसे करता है।

परन्तु इस भूमिका को पूरा करने के लिए यीशु को ज्ञान और समझ में पहल करने की आवश्यकता थी। यह ठीक से पता नहीं चलता है कि उसके जीवन में विद्यारम्भम्  दीक्षा संस्कार कब पूरा हुआ। परन्तु उसके परिवार ने ज्ञान, समझ और शिक्षा पर जोर दिया और इसे मूल्यवान माना है, जो स्पष्ट दिखाई देता है, क्योंकि 12 वर्ष की आयु में उसके ज्ञान के स्तर का एक छोटा सा चित्र प्रस्तुत किया गया है। यहाँ पर उसका वृतान्त दिया गया है:

41 उसके माता-पिता प्रति वर्ष फसह के पर्व में यरूशलेम को जाया करते थे।
42 जब वह बारह वर्ष का हुआ, तो वे पर्व की रीति के अनुसार यरूशलेम को गए।
43 और जब वे उन दिनों को पूरा करके लौटने लगे, तो वह लड़का यीशु यरूशलेम में रह गया; और यह उसके माता-पिता नहीं जानते थे।
44 वे यह समझकर, कि वह और यात्रियों के साथ होगा, एक दिन का पड़ाव निकल गए: और उसे अपने कुटुम्बियों और जान-पहचानों में ढूंढ़ने लगे।
45 पर जब नहीं मिला, तो ढूंढ़ते-ढूंढ़ते यरूशलेम को फिर लौट गए।
46 और तीन दिन के बाद उन्होंने उसे मन्दिर में उपदेशकों के बीच में बैठे, उन की सुनते और उन से प्रश्न करते हुए पाया।
47 और जितने उस की सुन रहे थे, वे सब उस की समझ और उसके उत्तरों से चकित थे।
48 तब वे उसे देखकर चकित हुए और उस की माता ने उस से कहा; हे पुत्र, तू ने हम से क्यों ऐसा व्यवहार किया? देख, तेरा पिता और मैं कुढ़ते हुए तुझे ढूंढ़ते थे।
49 उस ने उन से कहा; तुम मुझे क्यों ढूंढ़ते थे? क्या नहीं जानते थे, कि मुझे अपने पिता के भवन में होना अवश्य है?
50 परन्तु जो बात उस ने उन से कही, उन्होंने उसे नहीं समझा।
51 तब वह उन के साथ गया, और नासरत में आया, और उन के वश में रहा; और उस की माता ने ये सब बातें अपने मन में रखीं॥

लूका 2:41-51

इब्रानी वेदों की पूर्ति

यीशु का बचपन और उसका विकास, उसकी बाद की सेवा के लिए तैयारी के रूप में था, जिसे ऋषि यशायाह ने पहले से ही देखा लिया जिन्होंने ऐसा लिखा है:

ऐतिहासिक समय-रेखा में यशायाह और अन्य इब्रानी ऋषि (भविष्यद्ववक्ता)

भी संकट-भरा अन्धकार जाता रहेगा। पहिले तो उसने जबूलून और नप्ताली के देशों का अपमान किया, परन्तु अन्तिम दिनों में ताल की ओर यरदन के पार की अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा।
2 जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे उन्होंने बड़ा उजियाला देखा; और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे, उन पर ज्योति चमकी।
3 तू ने जाति को बढ़ाया, तू ने उसको बहुत आनन्द दिया; वे तेरे साम्हने कटनी के समय का सा आनन्द करते हैं, और ऐसे मगन हैं जैसे लोग लूट बांटने के समय मगन रहते हैं।
4 क्योंकि तू ने उसकी गर्दन पर के भारी जूए और उसके बहंगे के बांस, उस पर अंधेर करने वाले की लाठी, इन सभों को ऐसा तोड़ दिया है जेसे मिद्यानियों के दिन में किया था।
5 क्योंकि युद्ध में लड़ने वाले सिपाहियों के जूते और लोहू में लथड़े हुए कपड़े सब आग का कौर हो जाएंगे।
6 क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ, हमें एक पुत्र दिया गया है; और प्रभुता उसके कांधे पर होगी, और उसका नाम अद्भुत, युक्ति करने वाला, पराक्रमी परमेश्वर, अनन्तकाल का पिता, और शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा।

यशायाह 9:1, 6

यीशु द्वारा स्नान लेना

ब्रह्मचर्य पूर्ण होने को अक्सर स्नान या समावर्तन संस्कार द्वारा उत्सव के रुप में मनाया जाता है। यह सामान्य रुप से शिक्षकों और मेहमानों की उपस्थिति में एक अनुष्ठानिक स्नान द्वारा चिह्नित किया जाता है। यीशु ने यूहन्ना बपतिस्मा  देने वाले के माध्यम से सामवर्त संस्कार के उत्सव के मनाया, जो बपतिस्मा  नामक एक अनुष्ठान द्वारा लोगों को नदी में स्नान दिया करता था। मरकुस का सुसमाचार (बाइबल के चार सुसमाचारों में से एक) यीशु के वृतान्त को स्नान से ही आरम्भ करता है:

रमेश्वर के पुत्र यीशु मसीह के सुसमाचार का आरम्भ।
2 जैसे यशायाह भविष्यद्वक्ता की पुस्तक में लिखा है कि देख; मैं अपने दूत को तेरे आगे भेजता हूं, जो तेरे लिये मार्ग सुधारेगा।
3 जंगल में एक पुकारने वाले का शब्द सुनाई दे रहा है कि प्रभु का मार्ग तैयार करो, और उस की सड़कें सीधी करो।
4 यूहन्ना आया, जो जंगल में बपतिस्मा देता, और पापों की क्षमा के लिये मन फिराव के बपतिस्मा का प्रचार करता था।
5 और सारे यहूदिया देश के, और यरूशलेम के सब रहने वाले निकलकर उसके पास गए, और अपने पापों को मानकर यरदन नदी में उस से बपतिस्मा लिया।
6 यूहन्ना ऊंट के रोम का वस्त्र पहिने और अपनी कमर में चमड़े का पटुका बान्धे रहता था ओर टिड्डियाँ और वन मधु खाया करता था।
7 और यह प्रचार करता था, कि मेरे बाद वह आने वाला है, जो मुझ से शक्तिमान है; मैं इस योग्य नहीं कि झुक कर उसके जूतों का बन्ध खोलूं।
8 मैं ने तो तुम्हें पानी से बपतिस्मा दिया है पर वह तुम्हें पवित्र आत्मा से बपतिस्मा देगा॥
9 उन दिनों में यीशु ने गलील के नासरत से आकर, यरदन में यूहन्ना से बपतिस्मा लिया।
10 और जब वह पानी से निकलकर ऊपर आया, तो तुरन्त उस ने आकाश को खुलते और आत्मा को कबूतर की नाई अपने ऊपर उतरते देखा।

मरकुस 1:1-10

एक गृहस्थी के रूप में यीशु

सामान्य रूप से गृहस्थ, या गृहस्वामी, सम्बन्धी आश्रम ब्रह्मचर्य आश्रम के बाद में आता है, यद्यपि कुछ तपस्वी गृहस्थ आश्रम को छोड़ देते हैं और सीधे संन्यास आश्रम (त्याग) में चले जाते हैं। यीशु ने दोनों हो को नहीं लिया। उद्धार के अपने विशेष तरह के उद्देश्य को पूरा करने के लिए उसने गृहस्थ आश्रम को बाद में लेने के लिए स्थगित कर दिया। बाद में गृहस्थ आश्रम में वह अपने लिए एक दुल्हन और सन्तानों को लेगा, परन्तु एक भिन्न स्वभाव के। शारीरिक विवाह और सन्तान उसके रहस्यमयी विवाह और परिवार का प्रतीक हैं। जैसा कि बाइबल उसकी दुल्हन के बारे में बताती है:

आओ, हम आनन्दित और मगन हों, और उसकी स्तुति करें, क्योंकि ‘मेम्ने का विवाह आ पहुँचा है, और  ‘उसकी दुल्हिन ने अपने आप को तैयार कर लिया है।

प्रकाशितवाक्य 19:7

अब्राहम और मूसा के साथ यीशु को ‘मेम्ना कहा जाता था। यह मेम्ना एक दुल्हन से विवाह करेगा, परन्तु जब उसने ब्रह्मचर्य को पूरा किया तब तक वह तैयार नहीं हुई थी। वास्तव में, उसके जीवन का उद्देश्य उसे तैयार करना ही था। कुछ लोग अनुमान लगाते हैं कि क्योंकि यीशु ने गृहस्थ को स्थगित कर दिया था, इसलिए वह विवाह के विरूद्ध था। परन्तु संन्यासी के रूप में उसने जिस पहली गतिविधि में भाग लिया वह एक विवाह ही था।

एक वानप्रस्थी के रूप में यीशु

सन्तान को सामने लाने के लिए उसे सबसे पहले उसे यह करना था:

क्योंकि जिसके लिये सब कुछ है और जिसके द्वारा सब कुछ है, उसे यही अच्छा लगा कि जब वह बहुत से पुत्रों को महिमा में पहुँचाए, तो उनके उद्धार के कर्ता को ‘दु:ख उठाने के द्वारा’ सिद्ध करे।

इब्रानियों 2:10

‘उनके उद्धार के कर्ता’ वाक्यांश यीशु को संदर्भित करता है, और इसलिए सन्तान के आने से पहले उसे ‘पीड़ा’ में से होकर जाना होगा। इसलिए, अपने बपतिस्मा में स्नान लिए जाने के बाद वह सीधे वानप्रस्थ (वन-वासी) आश्रम में चले गए, जहाँ उसने जंगल में रहते हुए परीक्षा से पीड़ा उठाई, जिसका वृतान्त यहाँ दिया गया है।

एक सन्यासी के रूप में यीशु

जंगल में वानप्रस्थ के तुरन्त बाद, यीशु ने सभी तरह संसारिक सम्बन्धों को त्याग दिया था और एक भ्रमण करने वाले शिक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया। यीशु का संन्यास आश्रम सबसे अधिक प्रसिद्ध है। सुसमाचारों ने उसके संन्यास का वर्णन इस तरह से किया है:

23 और यीशु सारे गलील में फिरता हुआ उन की सभाओं में उपदेश करता और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता, और लोगों की हर प्रकार की बीमारी और दुर्बल्ता को दूर करता रहा।

मत्ती 4:23

इस समय के दौरान उसने अधिकांश एक गांव से दूसरे गांव तक की यात्रा की, यहाँ तक कि अपने इब्रानी/यहूदी लोगों से बाहर के गांवों की भी। उसने अपने संन्यासी जीवन का वर्णन इस प्रकार किया है:

18 यीशु ने अपनी चारों ओर एक बड़ी भीड़ देखकर उस पार जाने की आज्ञा दी।
19 और एक शास्त्री ने पास आकर उस से कहा, हे गुरू, जहां कहीं तू जाएगा, मैं तेरे पीछे पीछे हो लूंगा।
20 यीशु ने उस से कहा, लोमडिय़ों के भट और आकाश के पक्षियों के बसेरे होते हैं; परन्तु मनुष्य के पुत्र के लिये सिर धरने की भी जगह नहीं है।

मत्ती 8:18-20

वह, मनुष्य का पुत्र था, जिसके पास रहने के लिए कोई स्थान नहीं थी, और उसके पीछे चलने वालों को भी यही आशा करनी चाहिए। सुसमाचारों में यह भी बताया गया है कि कैसे उसका संन्यासी जीवन आर्थिक रूप से समर्थित था।

स के बाद वह नगर नगर और गांव गांव प्रचार करता हुआ, और परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाता हुआ, फिरने लगा।
2 और वे बारह उसके साथ थे: और कितनी स्त्रियां भी जो दुष्टात्माओं से और बीमारियों से छुड़ाई गई थीं, और वे यह हैं, मरियम जो मगदलीनी कहलाती थी, जिस में से सात दुष्टात्माएं निकली थीं।
3 और हेरोदेस के भण्डारी खोजा की पत्नी योअन्ना और सूसन्नाह और बहुत सी और स्त्रियां: ये तो अपनी सम्पत्ति से उस की सेवा करती थीं॥

लूका 8:1-3

संन्यासी को सामान्य रूप से एक लाठी के साथ भ्रमण करता हुआ चिह्नित किया जाता है। यीशु ने अपने शिष्यों को यही शिक्षा दी जब वह अपने पीछे चलने वालों को मार्गदर्शन दे रहा था। उसके निर्देश ये थे:

6 और उस ने उन के अविश्वास पर आश्चर्य किया और चारों ओर के गावों में उपदेश करता फिरा॥
7 और वह बारहों को अपने पास बुलाकर उन्हें दो दो करके भेजने लगा; और उन्हें अशुद्ध आत्माओं पर अधिकार दिया।
8 और उस ने उन्हें आज्ञा दी, कि मार्ग के लिये लाठी छोड़ और कुछ न लो; न तो रोटी, न झोली, न पटुके में पैसे।
9 परन्तु जूतियां पहिनो और दो दो कुरते न पहिनो।
10 और उस ने उन से कहा; जहां कहीं तुम किसी घर में उतरो तो जब तक वहां से विदा न हो, तब तक उसी में ठहरे रहो।

मरकुस 6:6-10

इतिहास में यीशु का संन्यास आश्रम परिवर्तन के लिए एक महत्वपूर्ण बिन्दु था। इस अवधि में वह एक ऐसा गुरु बन गया, जिसकी शिक्षाओं ने संसार के कई शक्तिशाली लोगों को प्रभावित किया (जैसे महात्मा गांधी), और उसने आपको, मुझे और सभी लोगों को स्पष्टता प्रदान करते हुए अंतर्दृष्टि प्रदान की है। हम जीवन के मार्गदर्शन, शिक्षण और उपहार की शिक्षा पाते हैं, जिसे उसने अपने संन्यास आश्रम के दौरान बाद में सभी को दी, परन्तु सबसे पहले हम यूहन्ना की शिक्षा को देखते हैं (जिसने स्नान संस्कार का संचालन किया था)।

यीशु मसीह का जन्म: देवों द्वारा घोषित और बुराई द्वारा खतरे में पड़ा

यीशु (येसु सत्संग) के जन्म के कारण संभवतः सबसे व्यापक रूप से मनाया जाने वाला वैश्विक अवकाश – क्रिसमस का त्योहार है। यद्यपि कई लोग क्रिसमस के बारे में जानते हैं, तथापि बहुत कम ही लोग यीशु के जन्म को सुसमाचारों में से जानते हैं। यहाँ दी गई जन्म की कहानी आधुनिक दिनों की सन्ता क्लॉज के साथ मनाई जाने वाली क्रिसमस और उपहारों से कहीं अधिक उत्तम है, और इसलिए यह जानने योग्य है।

बाइबल में यीशु के जन्म के बारे में जानने का एक उपयोगी तरीका यह है कि इसकी तुलना कृष्ण के जन्म के साथ की जाए क्योंकि इन दोनों कहानियों में कई समानताएँ पाई जाती हैं।

कृष्ण का जन्म

विभिन्न शास्त्र कृष्ण के जन्म का भिन्न तरह से विवरण देते हैं। हरिवंशपुराण में, ऐसे मिलता है कि विष्णु को पता चलता है कि राक्षस कालनेमि  ने दुष्ट राजा कंस के रूप में फिर जन्म लिया था। कंस को नष्ट करने का निर्णय लेते हुए, विष्णु ने कृष्ण के रूप में वासुदेव (एक पूर्व ऋषि जिसने ग्वाले के रूप में जन्म लिया था) और उनकी पत्नी देवकी के धर में जन्म लेने के लिए अवतार लिया।

पृथ्वी पर, कंस-कृष्ण की लड़ाई का आरम्भ भविष्यद्वाणी द्वारा हुआ था, जब आकाश से आई एक आवाज ने कंस को यह बताने के लिए घोषणा की कि देवकी का पुत्र कंस को मार देगा। इसलिए कंस देवकी की सन्तान से भयभीत था, और इसलिए उसने उसे और उसके परिवार को कैद करते हुए, उसके बच्चों की हत्या कर दी क्योंकि वह विष्णु के अवतार को किसी भी परिस्थिति में बचने नहीं देना चाहता था।

तथापि, कृष्ण का जन्म देवकी से ही हुआ और, वैष्णव भक्तों के अनुसार, उसके जन्म के तुरंत बाद समृद्धि और शांति का वातावरण था, क्योंकि ग्रह उसके जन्म के लिए स्वचालित रूप से आपस में समायोजित हो गए थे।

पुराण तब इसके पश्चात् नवजात शिशु को कंस द्वारा नष्ट होने से बचाने के लिए वासुदेव (कृष्ण के सांसारिक पिता) के भागने का वर्णन करते हैं। उस जेल को छोड़ कर जाते हुए जहाँ वह और देवकी दुष्ट राजा द्वारा कैद कर दिए गए थे, वासुदेव एक नदी को पार करते हुए बच्चे के साथ बच जाते हैं। बच्चे के साथ एक गाँव में सुरक्षित पहुँचने पर बालक कृष्ण को एक स्थानीय नवजात बालिका के साथ बदल दिया जाता है। कंस को बाद में यही बदली हुई बच्ची मिलती है और वह उसे मार डालता है। शिशुओं की अदला-बदली से अनजान, नंदा और यशोदा (बच्ची के माता-पिता) कृष्ण को अपने स्वयं का मानते हुए एक ग्वाले के रूप में पालन-पोषण करते हैं। कृष्ण के जन्म के दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

इब्रानी वेदों ने यीशु के जन्म की भविष्यद्वाणी की

जैसा कि कंस को भविष्यद्वाणी की गई थी कि देवकी का एक पुत्र उसे मार डालेगा, ठीक वैसे ही इब्रानी संतों को आने वाले मसीहा/मसीह के बारे में भविष्यद्वाणियाँ प्राप्त हुईं थीं। यद्यपि, ये भविष्यद्वाणियाँ यीशु के जन्म से सैकड़ों वर्षों पहले कई भविष्यद्वक्ताओं द्वारा प्राप्त हुईं और लिखी गई थीं। नीचे दी गई समय-रेखा इब्रानी वेदों के कई भविष्यद्वक्ताओं को यह इंगित करती हुई दिखाती है कि उनकी भविष्यद्वाणियों को उन पर प्रकाशित किया गया था और तत्पश्चात् उन्हें लिपिबद्ध किया गया था। उन्होंने एक मृत ठूँठ से उत्पन्न होने वाली एक शाखा के रूप में एक आने वाले व्यक्ति को पहले से ही देख लिया था और उन्होंने उसके नाम – यीशु की भविष्यद्वाणी की।

इतिहास में यशायाह और अन्य इब्रानी ऋषि (भविष्यद्वक्ता)। यशायाह के समय में ही मिलने वाले मीका पर भी ध्यान दें

यशायाह ने इस आने वाले व्यक्ति के जन्म की प्रकृति के विषय में एक और उल्लेखनीय भविष्यद्वाणी लिपिबद्ध की है। जैसा कि लिखा गया है:

14 इस कारण प्रभु आप ही तुम को एक चिन्ह देगा। सुनो, एक कुमारी गर्भवती होगी और पुत्र जनेगी, और उसका नाम इम्मानूएल रखेगी।

यशायाह 7:14

इसने प्राचीन इब्रानी लोगों को उलझन में डाल दिया। एक कुंवारी के पास पुत्र कैसे हो सकता है? यह असंभव था। यद्यपि भविष्यद्वाणी की गई थी कि यह पुत्र इम्मानुएल होगा, जिसका अर्थ है कि ईश्वर हमारे साथ। यदि परम प्रधान परमेश्वर, जो इस संसार का रचियता है, को जन्म लेना था, तब तो यह सोचने योग्य विषय था। इसलिए इब्रानी वेदों की नकल करने वाले ऋषियों और शास्त्रियों ने वेदों से भविष्यद्वाणी को हटाने का साहस ही नहीं किया, और यह लेखों में सदियों से लिखे हुईं, अपनी पूर्ति की प्रतीक्षा कर रही थीं।

लगभग उसी समय जब यशायाह ने कुंवारी जन्म की भविष्यद्वाणी की, एक अन्य भविष्यद्वक्ता मीका ने भी भविष्यद्वाणी की:

हे ’बैतलहम’ एप्राता, यदि तू ऐसा छोटा है कि यहूदा के हज़ारों में गिना नहीं जाता, तौभी तुझ में से मेरे लिये एक पुरुष निकलेगा, जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा; और उसका निकलना प्राचीनकाल से, वरन् अनादि काल से होता आया है।

 मीका 5:2

महान राजा दाऊद के पैतृक शहर बैतलहम से, वह शासक आएगा, जिसकी निकलना ’प्राचीन काल से’ – उसके शारीरिक जन्म से बहुत पहले से होता आया है।

मसीह का जन्म – देवों द्वारा घोषित किया गया था

सैकड़ों वर्षों पहले तक यहूदी/इब्रानियों ने इन भविष्यद्वाणियों के पूरा होने की प्रतिक्षा की। कईयों ने आशा छोड़ दी और अन्य उनके बारे में भूल गए थे, परन्तु भविष्यद्वाणियाँ आने वाले दिन की आशंका के गवाह के रूप में मूक बनी रहीं। अन्त में, लगभग ईसा पूर्व 5 में एक विशेष स्वर्गदूत एक जवान स्त्री के लिए एक चौंकाने वाले सन्देश को ले आया। जैसे कंस ने आकाश से एक आवाज सुनी थी,  ठीक वैसे ही इस स्त्री की मुलाकात स्वर्ग से आए एक स्वर्गदूत या देव, जिब्राईल  से हुई। सुसमाचार लिपिबद्ध करते हैं कि:

26 छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में एक कुंवारी के पास भेजा गया।
27 जिस की मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुंवारी का नाम मरियम था।
28 और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा; आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है, प्रभु तेरे साथ है।
29 वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और सोचने लगी, कि यह किस प्रकार का अभिवादन है?
30 स्वर्गदूत ने उस से कहा, हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।
31 और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।
32 वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उस को देगा।
33 और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।
34 मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, यह क्योंकर होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं।
35 स्वर्गदूत ने उस को उत्तर दिया; कि पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।
36 और देख, और तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा के भी बुढ़ापे में पुत्र होनेवाला है, यह उसका, जो बांझ कहलाती थी छठवां महीना है।
37 क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरिहत नहीं होता।
38 मरियम ने कहा, देख, मैं प्रभु की दासी हूं, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो: तब स्वर्गदूत उसके पास से चला

गया॥ लूका 1:26-38

जिब्राईल के सन्देश के नौ महीनों बाद, यीशु कुवाँरी मरियम से यशायाह की भविष्यद्वाणी को पूरा करता हुआ जन्म लेगा। परन्तु मीका ने भविष्यद्वाणी की थी कि यीशु का जन्म बैतलहम में होगा, जबकि मरियम तो नासरत में रहती थी। क्या मीका की भविष्यद्वाणी विफल हो जाएगी? सुसमाचार आगे बताता है कि:

न दिनों में औगूस्तुस कैसर की ओर से आज्ञा निकली, कि सारे जगत के लोगों के नाम लिखे जाएं।
2 यह पहिली नाम लिखाई उस समय हुई, जब क्विरिनियुस सूरिया का हाकिम था।
3 और सब लोग नाम लिखवाने के लिये अपने अपने नगर को गए।
4 सो यूसुफ भी इसलिये कि वह दाऊद के घराने और वंश का था, गलील के नासरत नगर से यहूदिया में दाऊद के नगर बैतलहम को गया।
5 कि अपनी मंगेतर मरियम के साथ जो गर्भवती थी नाम लिखवाए।
6 उन के वहां रहते हुए उसके जनने के दिन पूरे हुए।
7 और वह अपना पहिलौठा पुत्र जनी और उसे कपड़े में लपेटकर चरनी में रखा: क्योंकि उन के लिये सराय में जगह न थी।
8 और उस देश में कितने गड़ेरिये थे, जो रात को मैदान में रहकर अपने झुण्ड का पहरा देते थे।
9 और प्रभु का एक दूत उन के पास आ खड़ा हुआ; और प्रभु का तेज उन के चारों ओर चमका, और वे बहुत डर गए।
10 तब स्वर्गदूत ने उन से कहा, मत डरो; क्योंकि देखो मैं तुम्हें बड़े आनन्द का सुसमाचार सुनाता हूं जो सब लोगों के लिये होगा।
11 कि आज दाऊद के नगर में तुम्हारे लिये एक उद्धारकर्ता जन्मा है, और यही मसीह प्रभु है।
12 और इस का तुम्हारे लिये यह पता है, कि तुम एक बालक को कपड़े में लिपटा हुआ और चरनी में पड़ा पाओगे।
13 तब एकाएक उस स्वर्गदूत के साथ स्वर्गदूतों का दल परमेश्वर की स्तुति करते हुए और यह कहते दिखाई दिया।
14 कि आकाश में परमेश्वर की महिमा और पृथ्वी पर उन मनुष्यों में जिनसे वह प्रसन्न है शान्ति हो॥
15 जब स्वर्गदूत उन के पास से स्वर्ग को चले गए, तो गड़ेरियों ने आपस में कहा, आओ, हम बैतलहम जाकर यह बात जो हुई है, और जिसे प्रभु ने हमें बताया है, देखें।
16 और उन्होंने तुरन्त जाकर मरियम और यूसुफ को और चरनी में उस बालक को पड़ा देखा।
17 इन्हें देखकर उन्होंने वह बात जो इस बालक के विषय में उन से कही गई थी, प्रगट की।
18 और सब सुनने वालों ने उन बातों से जो गड़िरयों ने उन से कहीं आश्चर्य किया।
19 परन्तु मरियम ये सब बातें अपने मन में रखकर सोचती रही।
20 और गड़ेरिये जैसा उन से कहा गया था, वैसा ही सब सुनकर और देखकर परमेश्वर की महिमा और स्तुति करते हुए लौट गए॥

लूका 2:1-20

उस समय के संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, रोमन सम्राट ने स्वयं एक राजकीय आदेश दिया, जिसके कारण मरियम और यूसुफ नासरत से बैतलहम की ओर जाने के लिए यात्रा पर चल पड़े, जो यीशु के जन्म के ठीक पहले तक की थी। मीका की भविष्यद्वाणी भी पूरी हुई।

कृष्ण की तरह ही एक विनम्र चरवाहे के रूप में, यीशु का जन्म दीन अवस्था में – एक गौशाला में हुआ, जहाँ गायों को और अन्य जानवरों को रखा गया था, और उसे देखने के लिए दीन चरवाहे ही आए। तथापि स्वर्गदूतों या देवों ने उसके जन्म के विषय में गीत गाया था।

दुष्ट की ओर से खतरे में पड़ना

कृष्ण के जन्म के समय उसका जीवन राजा कंस की ओर से खतरे में था, जो स्वयं को उसके आगमन से खतरा में पड़ा हुआ महसूस करता था। ठीक इसी तरह, यीशु के जन्म के समय उसका जीवन स्थानीय राजा हेरोदेस की ओर से खतरे में पड़ गया था। हेरोदेस किसी अन्य राजा (यही तो ’मसीह का अर्थ’ है) की ओर से अपने शासन को खतरे में पड़ा हुआ नहीं देखना चाहता था। सुसमाचार व्याख्या करते हैं कि:

रोदेस राजा के दिनों में जब यहूदिया के बैतलहम में यीशु का जन्म हुआ, तो देखो, पूर्व से कई ज्योतिषी यरूशलेम में आकर पूछने लगे।
2 कि यहूदियों का राजा जिस का जन्म हुआ है, कहां है? क्योंकि हम ने पूर्व में उसका तारा देखा है और उस को प्रणाम करने आए हैं।
3 यह सुनकर हेरोदेस राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया।
4 और उस ने लोगों के सब महायाजकों और शास्त्रियों को इकट्ठे करके उन से पूछा, कि मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए?
5 उन्होंने उस से कहा, यहूदिया के बैतलहम में; क्योंकि भविष्यद्वक्ता के द्वारा यों लिखा है।
6 कि हे बैतलहम, जो यहूदा के देश में है, तू किसी रीति से यहूदा के अधिकारियों में सब से छोटा नहीं; क्योंकि तुझ में से एक अधिपति निकलेगा, जो मेरी प्रजा इस्राएल की रखवाली करेगा।
7 तब हेरोदेस ने ज्योतिषियों को चुपके से बुलाकर उन से पूछा, कि तारा ठीक किस समय दिखाई दिया था।
8 और उस ने यह कहकर उन्हें बैतलहम भेजा, कि जाकर उस बालक के विषय में ठीक ठीक मालूम करो और जब वह मिल जाए तो मुझे समाचार दो ताकि मैं भी आकर उस को प्रणाम करूं।
9 वे राजा की बात सुनकर चले गए, और देखो, जो तारा उन्होंने पूर्व में देखा था, वह उन के आगे आगे चला, और जंहा बालक था, उस जगह के ऊपर पंहुचकर ठहर गया॥
10 उस तारे को देखकर वे अति आनन्दित हुए।
11 और उस घर में पहुंचकर उस बालक को उस की माता मरियम के साथ देखा, और मुंह के बल गिरकर उसे प्रणाम किया; और अपना अपना यैला खोलकर उसे सोना, और लोहबान, और गन्धरस की भेंट चढ़ाई।
12 और स्वप्न में यह चितौनी पाकर कि हेरोदेस के पास फिर न जाना, वे दूसरे मार्ग से होकर अपने देश को चले गए॥
13 उन के चले जाने के बाद देखो, प्रभु के एक दूत ने स्वप्न में यूसुफ को दिखाई देकर कहा, उठ; उस बालक को और उस की माता को लेकर मिस्र देश को भाग जा; और जब तक मैं तुझ से न कहूं, तब तक वहीं रहना; क्योंकि हेरोदेस इस बालक को ढूंढ़ने पर है कि उसे मरवा डाले।
14 वह रात ही को उठकर बालक और उस की माता को लेकर मिस्र को चल दिया।
15 और हेरोदेस के मरने तक वहीं रहा; इसलिये कि वह वचन जो प्रभु ने भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा था कि मैं ने अपने पुत्र को मिस्र से बुलाया पूरा हो।
16 जब हेरोदेस ने यह देखा, कि ज्योतिषियों ने मेरे साथ ठट्ठा किया है, तब वह क्रोध से भर गया; और लोगों को भेजकर ज्योतिषियों से ठीक ठीक पूछे हुए समय के अनुसार बैतलहम और उसके आस पास के सब लड़कों को जो दो वर्ष के, वा उस से छोटे थे, मरवा डाला।
17 तब जो वचन यिर्मयाह भविष्यद्वक्ता के द्वारा कहा गया था, वह पूरा हुआ,
18 कि रामाह में एक करूण-नाद सुनाई दिया, रोना और बड़ा विलाप, राहेल अपने बालकों के लिये रो रही थी, और शान्त होना न चाहती थी, क्योंकि वे हैं नहीं॥

मत्ती 2:1-18

यीशु और कृष्ण के जन्म में बहुत सी बातें सामान्य मिलती है। कृष्ण को विष्णु के अवतार के रूप में स्मरण किया जाता है। लॉगोस के रूप में, यीशु का जन्म परम प्रधान परमेश्वर का देहधारण था, जो कि संसार का रचियता है। दोनों ही जन्मों की भविष्यद्वाणियों पहले से की गई थी, दोनों ही जन्मों में स्वर्गदूतों का उपयोग किया जाता है, और दोनों ही उनके आने का विरोध करने वाले दुष्ट राजाओं द्वारा खतरे में पड़ गए थे।

परन्तु यीशु के विस्तृत जन्म के पीछे क्या उद्देश्य था? वह क्यों आया था? मानवीय इतिहास के आरम्भ से ही, परम प्रधान परमेश्वर ने घोषित कर दिया था कि वह हमारी सबसे गहरी आवश्यकताओं को पूरा करेगा। जैसे कृष्ण कालनेमि को नष्ट करने के लिए आए थे, वैसे ही यीशु अपने विरोधी को नष्ट करने के लिए आए, जो हमें बंदी बनाए हुआ था। जैसे-जैसे हम सुसमाचारों में यीशु के जीवन का पता लगाते चले जाएंगे, वैसे-वैसे हम इसके विषय में और अधिक सीखते चले जाएगें कि यह हम पर कैसे लागू होता है, और आज हमारे लिए इसका क्या अर्थ है।

ब्रह्म और आत्मा को समझने के लिए लॉगोस का देहधारण

भगवान ब्रह्मा ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता की पहचान के रूप में पाया जाने वाला सामान्य नाम है। प्राचीन ऋग्वेद (1500 ईसा पूर्व) में प्रजापति को आमतौर पर सृष्टिकर्ता के लिए उपयोग किया गया था, परन्तु पुराणों में इसे भगवान ब्रह्मा के साथ बदल दिया गया। आज के उपयोग में, भगवान ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता के रूप में, दिव्य त्रिमूर्ति (त्रि-तत्वी भगवान) के तीन पहलुओं, विष्णु (पालक) और शिव (विनाशक) में से एक के रूप में मिलता है। ईश्वर (देव) ब्रह्म का पर्यायवाची है, क्योंकि यह उस परम आत्मा को भी दर्शाता है, जो सृष्टि के होने का कारण बन गई।

यद्यपि ब्रह्म को समझना एक प्राथमिक लक्ष्य है, तथापि व्यवहार में यह मायावी है। भक्ति और पूजा के सन्दर्भ में, शिव और विष्णु, अपनी सहचरियों और अवतारों के साथ भगवान ब्रह्मा की तुलना में अधिक ध्यान को आकर्षित करते हैं। हम शीघ्र ही शिव और विष्णु से सम्बन्धित अवतारों और परम्पराओं का नाम ले सकते हैं, परन्तु ब्रह्मा के लिए हम लड़खड़ा जाते हैं।

क्यों?

ब्रह्मा, ब्रह्म या ईश्वर और देव, यद्यपि सृष्टिकर्ता है, तथापि हमसे दूर, पहुंच से परे प्रतीत होता है, क्योंकि हम पापों, अंधकार और अस्थायी के लगाव से जूझते हैं। यद्यपि ब्रह्म सभी का स्रोत है, और हमें इस स्रोत की ओर लौटने की आवश्यकता है, तथापि इस ईश्वरीय सिद्धान्त को समझने के लिए हमारी क्षमता अपर्याप्त है। इसलिए हम आमतौर पर देवताओं की भक्ति किए जाने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं, जो अधिक मानवीय लगते हैं, हमारे निकट होना प्रतीत होते हैं, और हमें प्रतिउत्तर दे सकते हैं। हम ब्रह्म के स्वभाव का दूर से ही अनुमान लगाते हैं। अपने व्यवहार में, ब्रह्मा एक अज्ञात् देवता है, जिसकी अपेक्षाकृत दुर्लभ मूर्तियाँ ही पाई जाती हैं।

उस अनुमान का एक भाग प्राण (आत्मा) का परमात्मा (ब्रह्म) के साथ सम्बन्ध के चारों ओर घूमता है। विभिन्न ऋषियों ने इस प्रश्न पर विचार के विभिन्न शिक्षा पद्धतियों को जन्म दिया है। इस अर्थ में, मनोविज्ञान का अध्ययन, हमारा आत्मा (आत्मन्), धर्मविज्ञान, अर्थात् परमेश्वर या ब्रह्म के अध्ययन से सम्बन्धित है। यद्यपि विविध विचार विद्यमान हैं, क्योंकि हम परमेश्वर की वैज्ञानिक तरीके से जांच नहीं कर सकते हैं, और क्योंकि परमेश्वर दूर है, तत्त्वविज्ञानों में सबसे अधिक बुद्धिमान भी अन्धेरे में एक तीर को चलाने जैसी है।

दूरस्थ रहने वाले दिव्य सृष्टिकर्ता के साथ जुड़ने की यह अक्षमता व्यापक रूप से प्राचीन संसार में जानी जाती थी। प्राचीन यूनानियों ने इस सिद्धान्त या कारक का वर्णन करने के लिए शब्द लॉगोस का उपयोग किया था, जिसके द्वारा संसार की रचना हुई थी, और उनके लेखनकार्यों ने लॉगोस की चर्चा की। शब्द तर्क की व्युत्पत्ति शब्द लॉगोस से हुई है, और इसलिए विज्ञान की सभी शाखाएँ (जैसे धर्मविज्ञान, मनोविज्ञान, जीव विज्ञान आदि) शब्द विज्ञान को लॉगोस से ही प्राप्त करती हुई प्रत्यय के रूप में जोड़ती हैं। लॉगोस ब्रह्म या ब्रह्मा के तुल्य है।

इब्रानी वेदों ने इब्रियों (या यहूदियों) के साथ सृष्टिकर्ता के व्यवहार को श्री अब्राहम के साथ आरम्भ करते हुए, जो उनके राष्ट्र का जनक था, श्री मूसा, तक जिन्होंने दस आज्ञाओं को प्राप्त किया, वर्णन किया है। उनके इतिहास में, हमारी ही तरह, इब्रियों ने महसूस किया कि सृष्टिकर्ता ने उन्हें अपनी दृष्टि से दूर कर दिया था, और इसलिए वे अन्य देवताओं की पूजा करने के लिए तैयार हो गए थे, जो उन्हें सबसे निकट और अधिक व्यक्तिगत् जान पड़ते थे। इसलिए इब्रानी वेदों ने अक्सर इन अन्य देवताओं से अलग करने के लिए सृष्टिकर्ता को परम प्रधान परमेश्वर कहा है। हमने इस बात की परिकल्पना की है कि प्रजापति  से लेकर ब्रह्मा तक की सोच में परिवर्तित होने की प्रक्रिया ईसा पूर्व 700 में हुए इस्राएलियों के निर्वासन के कारण पूरी हुई, क्योंकि इसी परमेश्वर को उनके मूलपुरुष, श्री अब्राहम द्वारा सूचित किया गया था, और अब्राहम के साथ जुड़ा हुआ परमेश्वर (अ)ब्रह्म बन गया।

चूँकि हम ब्रह्म को अपनी इंद्रियों से नहीं देख सकते हैं, और न ही अपनी आत्मा के स्वभाव की गणना कर सकते हैं, न ही ब्रह्म को अपने मन से समझ सकते हैं, इसलिए निश्चित् ज्ञान प्राप्ति का केवल एक ही मार्ग यह है कि इसे केवल ब्रह्म ही हम पर प्रगट करे।

सुसमाचार, यीशु (यीशु सत्संग) को सृष्टिकर्ता, या परम प्रधान परमेश्वर, ब्रह्म या लॉगोस के देहधारण के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वह समय की सीमाओं को पार करते हुए और संस्कृतियों के माध्यम से जिसे हम सभी लोगों द्वारा महसूस किया जाता है, इस संसार में आया। यूहन्ना का सुसमाचार यीशु का परिचय कुछ इस तरह से देता है। जहाँ हम शब्द  वचन  को पढ़ते हैं, जो कि मूल यूनानी मूलपाठ से अनुवादित किया हुआ शब्द लॉगोस ही है। वचन/लॉगोस का उपयोग इसलिए किया गया था ताकि हम यह समझ सकें कि यह किसी एक जाति के देवता पर चर्चा नहीं कर रहा है, परन्तु तत्व सिद्धान्त या कारक के ऊपर जिससे सभी की उत्पत्ति हुई हैं। आप शब्द ब्रह्म  को जहाँ कहीं भी शब्द वचन आया है, उसके स्थान पर उपयोग कर सकते हैं और इस मूलपाठ का सन्देश नहीं बदलेगा।

दि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था।
2 यही आदि में परमेश्वर के साथ था।
3 सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ और जो कुछ उत्पन्न हुआ है, उस में से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न न हुई।
4 उस में जीवन था; और वह जीवन मुनष्यों की ज्योति थी।
5 और ज्योति अन्धकार में चमकती है; और अन्धकार ने उसे ग्रहण न किया।
6 एक मनुष्य परमेश्वर की ओर से आ उपस्थित हुआ जिस का नाम यूहन्ना था।
7 यह गवाही देने आया, कि ज्योति की गवाही दे, ताकि सब उसके द्वारा विश्वास लाएं।
8 वह आप तो वह ज्योति न था, परन्तु उस ज्योति की गवाही देने के लिये आया था।
9 सच्ची ज्योति जो हर एक मनुष्य को प्रकाशित करती है, जगत में आनेवाली थी।
10 वह जगत में था, और जगत उसके द्वारा उत्पन्न हुआ, और जगत ने उसे नहीं पहिचाना।
11 वह अपने घर आया और उसके अपनों ने उसे ग्रहण नहीं किया।
12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।
14 और वचन देहधारी हुआ; और अनुग्रह और सच्चाई से परिपूर्ण होकर हमारे बीच में डेरा किया, और हम ने उस की ऐसी महिमा देखी, जैसी पिता के एकलौते की महिमा।
15 यूहन्ना ने उसके विषय में गवाही दी, और पुकारकर कहा, कि यह वही है, जिस का मैं ने वर्णन किया, कि जो मेरे बाद आ रहा है, वह मुझ से बढ़कर है क्योंकि वह मुझ से पहिले था।
16 क्योंकि उस की परिपूर्णता से हम सब ने प्राप्त किया अर्थात अनुग्रह पर अनुग्रह।
17 इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा के द्वारा दी गई; परन्तु अनुग्रह, और सच्चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुंची।
18 परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा, एकलौता पुत्र जो पिता की गोद में हैं, उसी ने उसे प्रगट

किया॥ यूहन्ना 1:1-18

सुसमाचार यीशु के एक पूरे वृतान्त को चित्रित करने के लिए आगे बढ़ते हैं, ताकि हम समझ सकें कि वह कौन है, उसके आने का उद्देश्य क्या है और हमारे लिए इसका क्या अर्थ है। (यूहन्नाको यहाँ समझाया गया है।) चूंकि सुसमाचार यीशु को परमेश्वर के लॉगोस के रूप में प्रस्तुत करता है, इसलिए हम जानते हैं कि यह केवल मसीहियों के लिए नहीं लिखा गया है, अपितु उन सभी के लिए एक सार्वभौमिक लेखनकार्य है जो परमेश्वर, या ब्रह्म को अधिक मूर्त रूप में समझना चाहते हैं और स्वयं को भी अधिक स्पष्टता के साथ समझना चाहते हैं। चूंकि शब्द लॉगोस  धर्मविज्ञान और मनोविज्ञान में अंतर्निहित है और चूंकि किसी ने कभी भी ईश्वर को नहीं देखा है’, इसलिए हमारे लिए आत्मा (आत्मन्) और परमेश्वर (ब्रह्म) को समझने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता है कि यीशु नाम के व्यक्ति के ऊपर विचार किया जाए? वह हमारे बीच में रहा, और चला-फिरा और उसने प्रमाणित होने वाले इतिहास में शिक्षा दी। हम उसके जन्म से आरम्भ करते हैं, इस घटना को सुसमाचारों मेंवचन देहधारी हुआ के द्वारा वर्णित किया गया है।