एक दृढ़ बरगद की तरह वट सावित्री में : शाखा का चिन्ह

वट-वृक्ष, बरगद या बड़ का वृक्ष दक्षिण एशियाई आध्यात्मिकता में केन्द्रीय स्थान रखता है और यह भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है। यह यम के साथ जुड़ा है, जो कि मृत्यु का देवता है, इसलिए, इसे अक्सर शमशान भूमि के निकट लगाया जाता है। इसकी पुन: अँकुरित हो जाने की क्षमता के कारण इसके पास लम्बी आयु होती है और यह अमरता का प्रतीक है। एक घटना बरगद के वृक्ष के नीचे ही घटी थी, जिसमें सावित्री ने अपने मृत पति और राजा सत्यवान को जीवन दान दिए जाने के लिए यम से मोल भाव किया था, ताकि उसे एक पुत्र की प्राप्ति हो सके – वट पूर्णिमा और वट सावित्री के वार्षिक उत्सवों को इसी के लिए स्मरण किया जाता है।

कुछ इसी के जैसा एक वृतान्त बाइबल के पुराने नियम में भी मिलता है। वहाँ पर एक मृत वृक्ष…पुन: जीवन में वापस लौट आते हुए…राजाओं की मृत वंश रेखा से एक नए पुत्र का प्रतिनिधित्व करता है। इस वृतान्त में सबसे बड़ा अन्तर यह है, इसमें एक भविष्य-की-ओर देखते हुए भविष्यद्वाणी दी गई है और इसे सैकड़ों वर्षों से विभिन्न भविष्यद्वक्ताओं (ऋषियों) के द्वारा विकसित किया गया था। यह मिश्रित कहानी किसी  के आगमन की भविष्यद्वाणी कर रही थी। जिस व्यक्ति ने पहली बार इस कहानी को बताया, वह यशायाह (750 ईसा पूर्व) था, जिसके ऊपर और अधिक विस्तार उसके पश्चात् आने वाले ऋषियों-भविष्यद्वक्ताओं ने – मृत वृक्ष से निकलने वाली शाखा  के रूप में किया।

यशायाह और शाखा

यशायाह ऐतिहासिक रूप से पुष्टि किए जाने वाले समय में रहा था, जिसे नीचे दी हुई  समयरेखा में देखा जा सकता है। यह समयरेखा यहूदियों के इतिहास से ली गई है

यशायाह को ऐतिहासिक समयरेखा में दिखाया गया। वह इस्राएल के दाऊदवंशीय राजाओं के समयकाल में रहा था।
यशायाह को ऐतिहासिक समयरेखा में दिखाया गया। वह इस्राएल के दाऊदवंशीय राजाओं के समयकाल में रहा था।

आप देख सकते हैं कि यशायाह की पुस्तक दाऊद के राजकीय वंशकाल (1000-600 ईसा पूर्व) के समय में यरूशलेम के शासन में लिखी गई थी। यशायाह के समय (750 ईसा पूर्व) में यह वंश और यहूदी साम्राज्य भ्रष्ट हो चुके थे। यशायाह ने राजाओं को परमेश्‍वर और मूसा की दस आज्ञाओं की भलाई और भावनाओं की ओर लौट आने का अनुरोध किया। परन्तु यशायाह जानता था कि इस्राएल पश्चाताप नहीं करेगा, और इसलिए उसने पहले से ही देख लिया कि यह राज्य नष्ट कर दिया जाएगा और इसके राजाओं का शासन करना समाप्त हो जाएगा।

उसने इस राजवंश के लिए एक प्रतीक का उपयोग किया, यह एक बड़ बरगद के वृक्ष की तरह चित्रित किया था। यह वृक्ष राजा दाऊद के पिता यिशै के जड़ पर आधारित था। यिशै पर आधारित हो राजाओं का राजवंश दाऊद के साथ आरम्भ हुआ था, और उसके उत्तराधिकारी, राजा सुलैमान के साथ आगे बढ़ा, और यह इसी तरह से एक के पश्चात् दूसरे राजा के आने के द्वारा आगे वृद्धि करता रहा। जैसा कि नीचे दिए हुए चित्र में चित्रित किया गया है, वृक्ष निरन्तर वृद्धि करता गया, जब राजवंश का अगला पुत्र राज्य करने लगा।

यशायाह के द्वारा राजवंश के लिए उपयोग किया हुआ चित्र एक बड़े बरगद के वृक्ष की तरह है, जो अपनी जड़ - यिशै से वृक्ष के तने का विस्तार करती है।
यशायाह के द्वारा राजवंश के लिए उपयोग किया हुआ चित्र एक बड़े बरगद के वृक्ष की तरह है, जो अपनी जड़ – यिशै से वृक्ष के तने का विस्तार करती है।

पहले एक वृक्ष…इसके पश्चात् एक ठूँठ….तत्पश्चात् एक शाखा

यशायाह ने चेतावनी दी थी कि इस वृक्ष को शीघ्र ही काटते हुए, इसे एक मृत ठूँठ के रूप में छोड़ दिया जाएगा। यहाँ पर दिया गया है कि उसने कैसे इस वृक्ष को चित्रित किया जो परिवर्तित होते हुए एक ठूँठ और शाखा की पहेली बन गया :

“तब यिशै के ठूँठ में से एक डाली फूट निकलेगी और उसकी जड़ में से एक शाखा निकलकर फलवन्त होगी। यहोवा आत्मा, बुद्धि और समझ का आत्मा, युक्ति और पराक्रम का आत्मा, और ज्ञान और यहोवा के भय का आत्मा — उस पर ठहरा रहेगा।” (यशायाह 11:1-2)

यशायाह ने चेतावनी दी कि राजवंश एक दिन मृत ठूँठ की जैसे हो जाएगा
यशायाह ने चेतावनी दी कि राजवंश एक दिन मृत ठूँठ की जैसे हो जाएगा

इस ‘वृक्ष’ का काट दिया जाना लगभग 600 ईसा पूर्व, यशायाह के 150 वर्षों पश्चात् घटित हुआ, जब बेबीलोन ने यरूशलेम पर विजय प्राप्त करते हुए, इसके लोगों और राजा को बेबीलोन खींचते हुए बन्धुवाई में ले गए (ऊपर दी हुई समयरेखा में लाल रंग वाला समयकाल)। इससे यहूदियों की बन्धुवाई आरम्भ हुई – जिसमें से कुछ भारत में निर्वासित हो गए थे। यिशै राजा दाऊद का पिता था, और इस कारण वह दाऊद वंशीय राजवंश का मूल या ठूँठ था। “यिशै की ठूँठ” इस कारण बिखर गए दाऊद के राजवंश का एक रूपक था। सावित्री और सत्यवान् की कहानी में, एक राजा का मृत पुत्र – सत्यवान् मिलता है। भविष्यद्वाणी में राजाओं के राजवंश की राजकीय रेखा का अन्त एक ठूँठ में जाकर मृत्यु जाएगा और राजवंश स्वयं में ही मर जाएगा।

शाखा: आने वाले “उस” के रूप में एक दाऊद की बुद्धिमानी से है

यिशै के मृत ठूँठ में डाली का फूट निकलना
यिशै के मृत ठूँठ में डाली का फूट निकलना

परन्तु भविष्यद्वाणी ने भविष्य में एक बरगद के वृक्ष के साथ जुड़े हुए चित्र को राजाओं के रूप में काट डाले जाने की तुलना में कहीं दूर आगे  तक देखा। जब बरगद का बीज जीवन आरम्भ करते हैं, तो वे अक्सर अन्य वृक्षों के ठूँठों के ऊपर करते हैं। ठूँठ अँकुरित होने वाले बरगद के वृक्ष का पोषण करता है। परन्तु एक बार जब बरगद के बीजगणन की स्थापना हो जाती है, तब यह पोषित करने वाली ठूँठ कहीं अधिक वृद्धि कर जाता है और कहीं अधिक लम्बी आयु के जीवन को व्यतीत करता है। इस ठूँठ को यशायाह ने पहले से ही एक नए ठूँठ के रूप में इसकी जड़ से अकुँरित होते हुए – एक शाखा से एक बरगद के वृक्ष में परिवर्तित होते हुए देख लिया था। यशायाह ने इस चित्र का उपयोग किया और इसकी भविष्यद्वाणी की थी कि एक दिन भविष्य में एक ठूँठ, जिसे एक शाखा  के रूप में जाना जाएगा, एक मृत ठूँठ में प्रगट हो जाएगी, ठीक वैसे ही जैसे बरगट की शाखाएँ वृक्ष की शाखाओं में ही फूट निकलती हैं। इस शाखा को “उस” कह कर उद्धृत किया गया है, इस तरह यशायाह एक विशेष व्यक्ति के लिए बात कर रहा है, जो राजवंश के नष्ट कर दिए जाने के पश्चात् दाऊद की राजकीय रेखा में निकल कर आता है। इस व्यक्ति के पास ज्ञान, सामर्थ्य और ऐसी बुद्धि की ऐसी क्षमता होगी कि मानो यह परमेश्‍वर का आत्मा ही इसके ऊपर वास कर रहा होगा।

एक पोषित करने वाली शाखा से बरगद का वृक्ष वृद्धि करता हुआ। शीघ्र ही इसकी और अधिक शाखाएँ और जड़ें फूट निकलेंगी।
एक पोषित करने वाली शाखा से बरगद का वृक्ष वृद्धि करता हुआ। शीघ्र ही इसकी और अधिक शाखाएँ और जड़ें फूट निकलेंगी।

पौराणिक कथाओं में बरगद का वृक्ष कई शताब्दियों तक अमरता का प्रतीक माना जाता रहा है। इसकी कल्पित जड़ें अतिरिक्त शाखाएँ बनाने वाली मिट्टी में वृद्धि करती हैं। यह दीर्घायु का प्रतीक है और इस प्रकार ईश्‍वरीय सृष्टिकर्ता का प्रतिनिधित्व करता है। यशायाह के द्वारा 750 ईसा पूर्व में इस शाखा को देख लिया गया था, जिसमें इसी तरह के ईश्‍वरीय गुण होंगे और यह राजवंशीय “ठूँठ” के लुप्त होने के पश्चात् लम्बी आयु तक जीवित रहेगा।

 

 

 

 

यिर्मयाह और शाखा

ऋषि-भविष्यद्वक्ता यशायाह ने एक मार्ग-सूचक स्तम्भ खड़ा किया था, ताकि लोग भविष्य की प्रगट होती हुई घटनाओं को समझ सकें। परन्तु यह कई चिन्हों में उसके द्वारा दिया हुआ एक चिन्ह था। यिर्मयाह, यशायाह से 150 वर्षों पूर्व, लगभग 600 ईसा पूर्व में, तब रहा जब दाऊद के राजवंश को उसकी आंखों के सामने नष्ट कर दिया गया था, उसने ऐसा लिखा है:

यहोवा की यह भी वाणी है : देख ऐसे दिन आते हैं जब मैं दाऊद के कुल में एक धर्मी अंकुर उगाऊँगा, और वह राजा बनकर बुद्धि से राज्य करेगा, और अपने देश में न्याय और धर्म से प्रभुता करेगा। उसके दिनों में यहूदी बचे रहेंगे, और इस्राएली लोग निडर बसे रहेंगे। और यहोवा उसका नाम: यहोवा हमारी धार्मिकता रखेगा।” (यिर्मयाह 23:5-6)

यिर्मयाह ने यशायाह द्वारा प्रदत्त दाऊद वंशीय राजवंश के शाखा  के चित्र को और अधिक विस्तारित किया है। यह शाखा एक राजा भी होगी। परन्तु यह दाऊद वंशीय पहले जैसे राजाओं की तरह नहीं होगी, जिन्हें ठूँठ तक काटा डाला गया था।

शाखा : यहोवा हमारी धार्मिकता

इस शाखा में भिन्नता इसके नाम में देखी जा सकती है। उसके पास परमेश्‍वर का ही नाम (‘यहोवा’ – परमेश्‍वर के लिए यहूदियों द्वारा उपयोग होने वाला नाम) होगा, इस कारण एक बरगद के वृक्ष की तरह इस शाखा को एक अलौकिक चित्र दिया गया है। वह साथ ही ‘हमारी’ (हम मनुष्यों की) धार्मिकता  भी होगा।

जब सावित्री ने यम के साथ अपने पति, सत्यवान् की मृत शरीर के लिए विवाद किया, तब यह उसकी धार्मिकता थी, जिसने उसे मृत्यु (यम) का सामना करने के लिए सामर्थ्य प्रदान की। परन्तु, जैसा कि कुम्भ मेला नामक लेख में ध्यान दिया गया है, हमारी समस्या हमारी भ्रष्टता और पाप है, और इस कारण हमारे पास ‘धार्मिकता’ की कमी है। बाइबल हमें बताती है कि इसलिए हमारे पास मृत्यु का सामना करने के लिए कोई सामर्थ्य नहीं है। सच्चाई तो यह है कि हम इसके विरूद्ध असहाय हैं… जिसके पास मृत्यु की सामर्थ्य है – अर्थात्, शैतान – और उन सभी को जो अपनी मृत्यु के डर से अपने सारे जीवन भर इसकी दासता में जीवन व्यतीत करते हैं, वह स्वतन्त्र कर दे (इब्रानियों 2:14ब-15)

बाइबल में यम को शैतान के रूप में दर्शाया गया है, जिसके पास हमारे ऊपर मृत्यु की सामर्थ्य प्रदान की गई है। सच्चाई तो यह है, कि ठीक वैसे ही जैसे यम सत्यवान् के शरीर के लिए विवाद कर रहा था, बाइबल एक स्थान पर शैतान के द्वारा एक शरीर के ऊपर विवाद करने के वृतान्त को प्रदान उल्लेखित करती है, जब

… प्रधान स्वर्गदूत मीकाईल ने, जब शैतान से मूसा के शव के विषय में वाद विवाद किया, तो उसको बुरा भला कहके दोष लगाने का साहस न किया पर यह कहा, “प्रभु तुझे डाँटे!” (यूहदा 1:9)

इसलिए, जबकि शैतान के पास सावित्री और सत्यवान् की कहानी में यम की तरह मूसा जैसे एक सज्जन भविष्यद्वक्ता के शरीर के ऊपर विवाद करने का अधिकार है, तब तो उसके पास निश्चित रूप से हमारे पाप और भ्रष्टता के कारण हम पर आने वाली मौत – के ऊपर अधिकार है। यहाँ तक कि प्रधान स्वर्गदूत ने यह भी यह स्वीकार किया केवल प्रभु – सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर – के पास ही मृत्यु के विषय में शैतान को डाँटने का अधिकार है। और यहाँ ‘शाखा’ में एक प्रतिज्ञा दी गई है कि भविष्य में प्रभु परमेश्‍वर हम में उसकी ‘धार्मिकता’ को रोपित करेगा, ताकि हम मृत्यु के ऊपर जय को प्राप्त कर सकें। परन्तु कैसे? जकर्याह इसी विषय के ऊपर और अधिक विस्तार करते हुए आगे के वृतान्त को आने वाली शाखा के नाम  की भविष्यद्वाणी को करते हुए पूरा करता है, जो कि सावित्री और सत्यवान् की मृत्यु (यम) के ऊपर जय प्राप्त करती हुई कहानी के समानान्तर है – जिसे हम अगले लेख में देखेंगे।

कुरुक्षेत्र के युद्ध के जैसे ही: एक ‘अभिषिक्त’ शासक के आने वाली भविष्यद्ववाणी

महाभारत में भगवद् गीता बुद्धि साहित्य केन्द्रिय बिन्दु है। यद्यपि यह गीता (गीत) के रूप में लिखी हुई है, तथापि इसे अक्सर पढ़ा ही जाता है। गीता भगवान् कृष्ण और राजकीय योद्धा अर्जुन के मध्य कुरुक्षेत्र के बड़े युद्ध – राजकीय परिवार के दो पक्षों के मध्य का युद्ध के ठीक पहले – की एक वार्तालाप है। इस आसन्न युद्ध में एक दूसरे का विरोध करने वाले, प्राचीन राजकीय राजवंश के संस्थापक, राजा कुरु के वंश की दो शाखाओं के योद्धा और शासक थे। पाण्डव और कौरव चचेरे भाई आपस में इस विषय में युद्ध करने जा रहे थे, कि किस के पास राजवंश के शासन का अधिकार था – पाण्डव राजा युधिष्ठिर या कौरव राजा दुर्योधन। दुर्योधन ने युधिष्ठिर से राजगद्दी छीन ली थी इसलिए युधिष्ठिर और उसके पाण्डव सहयोगी इसे वापस पाने के लिए युद्ध करने जा रहे थे। पाण्डव योद्धा अर्जुन और भगवान् कृष्ण के बीच भगवद् गीता का वार्तालाप आध्यात्मिक स्वतंत्रता और आशीर्वाद देने वाली कठिन परिस्थितियों में सच्चे ज्ञान पर केन्द्रित है।

इब्रानी वेद पुस्तक बाइबल में दी हुई भजन संहिता बुद्धि साहित्य का केन्द्रिय बिन्दु है। यद्यपि यह गीतों (गीता) के रूप में लिखी हुई है, तथापि इसे अक्सर पढ़ा ही जाता है। भजन संहिता दो विरोधी शक्तियों के मध्य एक बड़े युद्ध से ठीक पहले यहोवा परमेश्वर और उसके अभिषिक्त (= शासक) के बीच एक वार्तालाप का वर्णन करता है। इस आसन्न युद्ध के दो पक्षों में बड़े योद्धा और शासक पाए जाते हैं। एक ओर एक राजा है, जो एक प्राचीन राजकीय राजवंश का संस्थापक है, जिसका वंशज प्राचीन राजा दाऊद से है। दोनों पक्ष युद्ध करने जा रहे थे कि किसा के पास शासन करने का अधिकार था। भजन संहिता 2 में यहोवा परमेश्वर और उसके शासक के मध्य का वार्तालाप स्वतंत्रता, बुद्धि और आशीर्वाद को स्पर्श करता है।

क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

जैसा कि भगवद् गीता संस्कृत वेदों के बुद्धि साहित्य को समझने का प्रवेश द्वार है, भजन संहिता इब्रानी वेदों (बाइबल) के बुद्धि साहित्य को समझने का प्रेवश द्वार है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए हमें भजन संहिता और उसके मुख्य संगीतकार, राजा दाऊद की पृष्ठभूमि की थोड़ी जानकारी की आवश्यकता है।

राजा दाऊद कौन था और भजन संहिता क्या हैं?  ऐतिहासिक समयरेखा में राजा दाऊद, भजन संहिता और अन्य इब्रानी ऋषि और लेखन कार्य

राजा दाऊद कौन था और भजन संहिता क्या हैं?  ऐतिहासिक समयरेखा में राजा दाऊद, भजन संहिता और अन्य इब्रानी ऋषि और लेखन कार्य

आप इस्राएलियों के इतिहास में से ली गई समयरेखा से देख सकते हैं कि दाऊद लगभग 1000 ईसा पूर्व, श्री अब्राहम के एक हजार वर्षों बाद और श्री मूसा के 500 वर्षों बाद रहे थे। दाऊद ने अपने परिवार की भेड़ों को चराने वाले एक चरवाहे के रूप में आरम्भ किया था। एक बड़े शत्रु और विशाल दैत्यकार व्यक्ति, जिसका नाम गोलियत था, ने इस्राएलियों को जीतने के लिए एक सेना का नेतृत्व किया, और इस कारण इस्राएली हतोत्साहित और पराजित हो गए थे। दाऊद ने गोलियत को चुनौती दी और उसे युद्ध में मार दिया। एक बड़े योद्धा के ऊपर एक लड़के जैसे युवा चरवाहे की इस उल्लेखनीय विजय ने दाऊद को प्रसिद्ध कर दिया।

तथापि, वह लंबे और कठिन अनुभवों के बाद ही राजा बने, क्योंकि उनके कई दुश्मन थे, दोनों विदेश में और इस्राएलियों के बीच, जिन्होंने उनका विरोध किया था। दाऊद ने अंततः अपने सभी दुश्मनों के ऊपर विजय प्राप्त की क्योंकि वह परमेश्वर में भरोसा करते थे और परमेश्वर ने उसकी सहायता की। इब्रानी वेदों अर्थात् बाइबल में ऐसी बहुत सी पुस्तक हैं, जो दाऊद के इन संघर्षों और विजयों को स्मरण करती हैं।

दाऊद एक संगीतकार के रूप में भी प्रसिद्ध थे, उन्होंने परमेश्वर के लिए सुन्दर गीत और कविताओं को रचा। ये गीत और कविताएं परमेश्वर की ओर से प्रेरित थीं और वेद पुस्‍तक बाइबल में भजन संहिता  की पुस्तक के रूप में पाई जाती है।

भजन संहिता में मसीहके विषय में भविष्यवाणियाँ

यद्यपि एक महान् राजा और योद्धा, तथापि दाऊद ने अपनी राजकीय वंश में से आने वाले ‘मसीह’ के विषय में भजन संहिता में लिखा, जो सत्ता और अधिकार को ग्रहण करेगा। यहां पर इस तरह से यीशु मसीह को इब्रानी वेद (बाइबल) के भजन संहिता 2 में परिचित किया गया है, जो भगवद् गीता के जैसा ही एक राजकीय युद्ध वाला दृश्य प्रस्तुत करता है।

भजन 2

1जाति जाति के लोग क्यों हुल्‍लड़ मचाते हैं,

और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं?

2यहोवा और उसके ‘अभिषिक्‍त’ के विरुद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर,

और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं,

3“आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें,

और उनकी रस्सियों को अपने ऊपर से उतार फेकें।”

4वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हँसेगा;

प्रभु उनको ठट्ठों में उड़ाएगा।

5तब वह उनसे क्रोध में बातें करेगा,

और क्रोध में कहकर उन्हें घबरा देगा,

6“मैं तो अपने ठहराए हुए ‘राजा’ को अपने

पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा चुका हूँ।”

7मैं उस वचन का प्रचार करूँगा :

जो यहोवा ने मुझ से कहा, “तू मेरा पुत्र है, आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ।

8मुझ से माँग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये,

और दूर दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूँगा।

9तू उन्हें लोहे के डण्डे से टुकड़े टुकड़े करेगा,

तू कुम्हार के बर्तन के समान उन्हें चकनाचूर कर डालेगा।”

10इसलिये अब, हे राजाओ, बुद्धिमान बनो;

हे पृथ्वी के न्यायियो, यह उपदेश ग्रहण करो।

11डरते हुए यहोवा की उपासना करो,

और काँपते हुए मगन हो।

12पुत्र को चूमो, ऐसा न हो कि वह क्रोध करे,

और तुम मार्ग ही में नष्‍ट हो जाओ,

क्योंकि क्षण भर में उसका क्रोध भड़कने को है।

धन्य हैं वे जिनका भरोसा उस पर है।

यहाँ पर इसी परिच्छेद को बताया गया है, परन्तु यूनानी में जैसा कि पहले व्याख्या की गई थी।

अग्रेजी और हिन्दी के साथ मूल भाषा इब्रानी, सेप्तुआजिन्त अर्थात् यूनानी बाइबल में     

भजन संहिता 2:1-2
Hebrew Greek English Vernacular
א  לָמָּה, רָגְשׁוּ גוֹיִם;    וּלְאֻמִּים, יֶהְגּוּ-רִיק.   ב  יִתְיַצְּבוּ, מַלְכֵי-אֶרֶץ–    וְרוֹזְנִים נוֹסְדוּ-יָחַד: עַל-יְהוָה,    וְעַל-מְשִׁיחוֹ. 1Ἵνα τί ἐφρύαξαν ἔθνη, καὶ λαοὶ ἐμελέτησαν κενά; 2 παρέστησαν οἱ βασιλεῖς τῆς γῆς καὶ οἱ ἄρχοντες συνήχθησαν ἐπὶ τὸ αὐτὸ κατὰ τοῦ κυρίου καὶ κατὰ τοῦ χριστοῦ αὐτοῦ. διάψαλμα.   1 Why do the nations conspire and the peoples plot in vain? 2 The kings of the earth rise up and the rulers band together against the Lord and against his Christ. 1जाति जाति के लोग क्यों हुल्‍लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं? 2यहोवा और उसके ‘मसीह’ के विरुद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं।  

कुरुक्षेत्र के युद्ध के परिणाम

जैसा कि आप देख सकते हैं, भजन संहिता 2 में ‘मसीह’/’अभिषिक्त’ का प्रसंग भगवद् गीता में कुरुक्षेत्र युद्ध के जैसा ही है। परन्तु कुछ भिन्नताएँ तब सामने आती हैं, जब हम कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद के बारे में सोचते हैं, जिसे बहुत पहले लड़ा गया था। अर्जुन और पाण्डवों ने युद्ध को जीत लिया था और इसलिए तख्ता पलटने वाले कौरवों की ओर से पाण्डवों को राज्य सौंपने और शासन का स्थानांतरण हो गया, जिसके कारण युधिष्ठिर न्यायसंगत रूप में राजा बना। सभी पांचों पाण्डव भाईयों और कृष्ण 18 दिन के युद्ध में बच गए थे, परन्तु अन्य लोगों कुछ ही बच पाए थे – शेष सभी लोग मारे गए थे। परन्तु युद्ध के बाद केवल 36 वर्षों तक शासन करने के बाद, युधिष्ठिर ने अर्जुन के पौत्र परीक्षित को राजा का पद देते हुए सिंहासन का त्याग कर दिया। वह तब द्रौपदी और अपने भाइयों के साथ हिमालय में चला गया। द्रौपदी और चार पाण्डव — भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव की यात्रा के मध्य में मृत्यु हो गई। युधिष्ठिर को स्वयं स्वर्ग का प्रवेश दिया गया। कौरवों की माता गंधारी, कृष्ण के प्रति युद्ध को न रोकने के लिए क्रोधित थीं, इसलिए उसने उन्हें श्राप दे दिया और वह युद्ध के 36 वर्षों बाद कुटुम्ब में हुई एक लड़ाई के कारण गलती से लगे हुए एक तीर से मर गए। कुरुक्षेत्र का युद्ध और उसके बाद कृष्ण की हत्या ने संसार को कलियुग में परिवर्तित कर दिया।

इस तरह कुरुक्षेत्र के युद्ध से हमें क्या लाभ हुआ है?

कुरुक्षेत्र के युद्ध से हमें मिलने वाले प्रतिफल

हमारे लिए, जो हजारों वर्षों से जीवन को यापन कर रहे हैं, हम स्वयं खुद को और भी अधिक आवश्यकता में पाते हैं। हम ऐसे संसार में रहते हैं, जहाँ निरन्तर पीड़ा, बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु की छाया बनी रहती हैं। हम ऐसी सरकारों के अधीन रहते हैं, जो अक्सर भ्रष्ट होती हैं और शासकों के समृद्ध और व्यक्तिगत मित्रों की सहायता करती हैं। हम कलियुग के प्रभावों को कई तरीकों से महसूस करते हैं।

हम ऐसी सरकार के लिए लालसा रखते हैं, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं देगी, ऐसे समाज की लालसा करते हैं, जो कलियुग के अधीन नहीं हो, और संसार में कभी न समाप्त होने वाले पाप और मृत्यु से व्यक्तिगत् उद्धार की लालसा रखते हैं।

हमारे लिए भजन संहिता 2 में दिए हुए आने वाले मसीहसे मिलने वाले प्रतिफल

इब्रानी ऋषियों ने यह व्याख्या की है कि भजन संहिता 2 में ‘मसीह’ को कैसे परिचित किया गया है, जो हमारी इन आवश्यकतों को पूरा करेगा। इन आवश्यकतों को पूरा करने के लिए युद्ध की आवश्यकता होगी, परन्तु यह कुरुक्षेत्र के युद्ध और भजन संहिता 2 में चित्रित युद्ध से बिल्कुल भिन्न तरह का होगा। यह एक ऐसा युद्ध है, जिसे केवल ‘मसीह’ ही आरम्भ कर सकता है। ये भविष्यवक्ता दिखाते हैं कि शक्ति और पराक्रम से आरम्भ करने के स्थान पर, मसीह पाप और मृत्यु से मुक्ति की हमारी आवश्यकता की पूर्ति के द्वारा हमारी सेवा करना आरम्भ करता है। वे दिखाते हैं कि कैसे भजन संहिता 2 में दिए हुए मार्ग, जिस तक एक दिन पहुँचा जाएगा, पहले एक और तख्त पलटने वाले यौद्धा को पराजित करने के लिए एक लंबे युद्ध की आवश्यकता को बताता है, जो सैन्य शक्ति द्वारा नहीं होगा, अपितु उन लोगों के लिए प्रेम और बलिदान के द्वारा होगा, जो संसार में बंदी हैं। हम दाऊद के राजकीय वृक्ष की मृत शाखा के ठूंठ के साथ इस यात्रा का आरम्भ करते हैं।

राज्यपाल की तरह : यीशु मसीह के नाम में ‘मसीह’ का क्या अर्थ है?

मैं कई बार लोगों से पूछता हूँ, कि यीशु का अन्तिम नाम क्या था। अक्सर वे उत्तर देते हैं,

“मैं सोचता हूँ, कि उसका अन्तिम नाम ‘मसीह’ था, परन्तु मैं इसके प्रति निश्चित नहीं हूँ।”

तब मैं पूछता हूँ,

“यदि यह सत्य है तो जब यीशु एक लड़का ही था तब क्या यूसुफ मसीह और मरियम मसीह छोटे यीशु मसीह को अपने साथ बाजार ले जाते थे?”

इसे इस तरह  से कहें, उन्होंने जान लिया था, कि यीशु का अन्तिम नाम ‘मसीह’ नहीं था। इस तरह से, अब ‘मसीह’ क्या है? यह कहाँ से आया है? इसका क्या अर्थ है? कइयों के लिए आश्चर्य की बात है, कि ‘मसीह’ एक ऐसी पदवी है, जिसका अर्थ ‘शासक’ या ‘शासन’ से है। यह पदवी उस राज की तरह नहीं है, जैसी कि ब्रिटिश राज में पाई जाती है, जिसने दक्षिण एशिया में कई दशकों तक राज किया था।

भाषान्तरण बनाम लिप्यन्तरण

इसे देखने के लिए, हमें सबसे पहले अनुवाद अर्थात् भाषान्तरण के कुछ सिद्धान्तों को देखना होगा। अनुवादक कभी कभी विशेष रूप से नाम और शीर्षक के लिए, अर्थ की अपेक्षा उसी तरह की ध्वनि  वाले शब्दों को भाषान्तरण के  लिए चुन लेते हैं। इसे लिप्यन्तरण  के नाम से जाना जाता है। उदाहरण के लिए, कुम्भ मेला हिन्दी के कुम्भ मेला का अंग्रेजी लिप्यन्तरण है। यद्यपि शब्द मेला का अर्थ ‘प्रदर्शनी’ या ‘त्योहार’ से है, परन्तु इसे अक्सर अंग्रेजी में समान ध्वनि वाले शब्द अर्थात् कुम्भ प्रदर्शनी की अपेक्षा कुम्भ मेला के रूप में ही उपयोग कर लिया जाता है। क्योंकि बाइबल के लिए, अनुवादकों को यह निर्णय लेना पड़ता है,  नाम और पदवियाँ सर्वोत्तम रूप से अनुवादित भाषा में भाषान्तरण (अर्थ के द्वारा) या लिप्यन्तरण (ध्वनि के द्वारा) किस के माध्यम उचित अर्थ देंगे। इसके लिए कोई विशेष नियम नहीं है।

सेप्तुआजिन्त

बाइबल सबसे पहले 250 ईसा पूर्व में तब अनुवादित हुई थी, जब इब्रानी पुराने नियम को यूनानी भाषा – उस समय की अन्तरराष्ट्रीय भाषा में भाषान्तरण किया गया था। इस भाषान्तरण को सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद (या LXX) के नाम से जाना जाता है, और यह बहुत ही अधिक प्रभावशाली है। क्योंकि नया नियम यूनानी भाषा में ही लिखा गया था, इसलिए इसमें दिए हुए पुराने नियम के कई उद्धरणों को सेप्तुआजिन्त से ही लिया गया है।

सेप्तुआजिन्त में भाषान्तरण एवं लिप्यन्तरण

नीचे दिया हुआ चित्र इसी प्रक्रिया को दिखाता है और यह कैसे आधुनिक-दिन की बाइबल को प्रभावित करता है

मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह
मूल भाषाओं से आधुनिक-दिन की बाइबल का भाषान्तर का प्रवाह

मूल इब्रानी पुराना नियम (1500 से लेकर – 400 ई.पू. तक लिखा गया) को चित्र-खण्ड के # 1 में दिखाया गया है। क्योंकि सेप्तुआजिन्त 250 ईसा पूर्व में लिखा गया था इसलिए इब्रानी –> यूनानी भाषान्तर को चित्र-खण्ड #1 से #2 की ओर जाते हुए तीर से दिखाया गया है। नया नियम यूनानी में लिखा गया था ( (50–90 ईस्वी सन्), इसलिए इसका अर्थ यह हुआ कि #2 में दोनों ही अर्थात् पुराना और नया नियम समाहित है। चित्र का निचला आधा हिस्सा (#3) बाइबल का एक आधुनिक भाषा में किया हुआ भाषान्तरण है। यहाँ तक पहुँचने के लिए पुराने नियम को मूल इब्रानी भाषा (1 -> 3) और नए नियम को यूनानी (2 -> 3) में से भाषान्तरित किया गया है। जैसा कि पहले बताया गया, अनुवादकों को नामों और पदवियों को निर्धारित करना होता है। इसे नीला तीरों के प्रतीक चिन्हों के साथ लिप्यन्तरण और भाषान्तरण के शब्दों के साथ यह दर्शाते हुए दिखाया गया है, कि अनुवादक किसी भी दृष्टिकोण को ले सकता है।

‘मसीह’ की उत्पत्ति

अब हम ऊपर दी हुई प्रक्रिया का अनुसरण करेंगे, परन्तु इस समय हम हमारे ध्यान को ‘मसीह’ शब्द के ऊपर केन्द्रित करेंगे।

बाइबल में शब्द 'मसीह' कहाँ से आया है?
बाइबल में शब्द ‘मसीह’ कहाँ से आया है?

हम देख सकते हैं, कि मूल इब्रानी पुराने नियम में पदवी ‘מָשִׁיחַ’ (मसीहीयाख़) दी हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘अभिषिक्त या प्रतिष्ठित’ व्यक्ति से है जैसे कि एक राजा या शासक इत्यादि। पुराने नियम के समयावधि में इब्रानी राजाओं को राजा बनने से पहले (अनुष्ठानिक रीति से तेल मल कर) अभिषिक्त किया जाता था, इस प्रकार वे अभिषिक्त  या मसीहीयाख़  हो जाते थे। तब वे शासक बन जाते थे, परन्तु उनका शासन परमेश्‍वर के स्वर्गीय शासन की अधीनता में, उसकी व्यवस्था के अनुसार होता था। इस भावार्थ में, पुराने नियम का एक इब्रानी राजा दक्षिण एशिया के भूतपूर्व राज्यपाल के जैसे होता था। राज्यपाल दक्षिण एशिया के ब्रिटिश क्षेत्रों के ऊपर शासन करता था, परन्तु वह ऐसा ब्रिटेन की सरकार की अधीनता में, इसकी व्यवस्था का पालन करते हुए करता है।

पुराने नियम ने एक निश्चित रूप से विशेष मसीहायाख़  के आने की भविष्यद्वाणी (‘निश्चित’ शब्द के साथ) को किया था, जो एक विशेष राजा होगा। जब सेप्तुआजिन्त अर्थात् सप्तति अनुवाद को 250 ईस्वी सन् में भाषान्तरित किया गया, तब अनुवादको ने यूनानी भाषा में समानार्थ शब्द को क्रिओ  पर आधारित हो, Χριστός (क्रिस्टोस  जैसी ध्वनि वाले) का चुनाव किया, जिसका अर्थ अनुष्ठानिक रूप से तेल मलना होता है। इस तरह से इब्रानी भाषा का शब्द ‘मसीहीयाख़’ का भाषान्तरण अर्थ के द्वारा (न कि ध्वनि के द्वारा लिप्यन्तरण करते हुए) Χριστός (क्रिस्टोस  के उच्चारण) के रूप में यूनानी सेप्तुआजिन्त में किया गया था। नए नियम के लेखक निरन्तर शब्द क्रिस्टोस का उपयोग यीशु की पहचान के लिए करते रहे, जिसकी भविष्यद्वाणी ‘मसीहीयाख़’ के रूप में की गई थी।

परन्तु जब हम यूरोप की भाषाओं की बात करते हैं, तब हम पाते हैं, कि यूनानी शब्द ‘क्रिस्टोस’  के सामानार्थ कोई भी स्पष्ट शब्द नहीं पाया गया इसलिए इसका भाषान्तरण ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह में कर दिया गया। शब्द ‘मसीह’ पुराने नियम पर आधारित इब्रानी से यूनानी में भाषान्तरित  होते हुए और तब यूनानी से आधुनिक भाषाओं में लिप्यन्तरित  होते हुए एक बहुत ही विशेष शब्द है। इब्रानी पुराने नियम का भाषान्तरण सीधे ही कई आधुनिक भाषाओं में किया गया है और अनुवादकों ने मूल इब्रानी शब्द ‘मसीहीयाख़’ के सम्बन्ध में विभिन्न निर्णयों को लिया है। कुछ बाइबल शब्द ‘मसीहीयाख़’ का लिप्यन्तरण ‘मसीह’ शब्द के द्वारा रूपान्तरित करते हुए करती हैं, अन्य इसका अनुवाद ‘अभिषिक्त’ के अर्थ के द्वारा करती हैं, और अन्य उसका लिप्यन्तरण ‘क्राईस्ट’ शब्द के द्वरा रूपान्तरित करते हुए करती हैं। क्राईस्ट या ख्रीस्त (मसीह) के लिए हिन्दी शब्द को अरबी से लिप्यन्तरित किया गया है, जो बदले में मूल इब्रानी भाषा से लिप्यन्तरित हुआ था। इसलिए ‘मसीह’ का उच्चारण मूल इब्रानी भाषा के साथ बहुत निकटता से है, जबकि अन्य शब्द क्राईस्ट का लिप्यन्तरण अंग्रेजी ‘क्राईस्ट’ से हुआ है और इसकी ध्वनि ‘क्राइस्त’ जैसी है। क्राईस्ट (ख्रीष्टको) के लिए नेपाली शब्द का लिप्यन्तरण यूनानी क्रिस्टोस  से हुआ है और इसलिए इसे ख्रीष्टको  शब्द से उच्चारित किया जाता है।

क्योंकि हम पुराने नियम में शब्द ‘मसीह’ को सामान्य रूप से नहीं देखते हैं, इसलिए इसका सम्बन्ध पुराने नियम से सदैव प्रगट नहीं होता है। परन्तु इस अध्ययन से हम जानते हैं, कि बाइबल आधारित ‘क्राईस्ट’ = ‘मसीह’ = ‘अभिषिक्त’ सभी एक ही हैं और यह एक विशेष पदवी थी।

1ली सदी में प्रत्याशित मसीह

इस बोध के साथ, आइए सुसमाचारों से कुछ विचारों को प्राप्त करें। नीचे राजा हेरोदेस की तब की प्रतिक्रिया दी गई है, जब ज्योतिषी यहूदियों के राजा से मुलाकात करने के लिए उसके पास आए, जो कि क्रिसमिस की कहानी का एक बहुत अच्छी तरह से जाना-पहचाना हुआ हिस्सा है। ध्यान दें, मसीह के लिए ‘निश्चित’ वाक्य का उपयोग किया गया है, यद्यपि यह विशेष रूप से यीशु के बारे में उद्धृत नहीं कर रहा है।

यह सुनकर राजा और उसके साथ सारा यरूशलेम घबरा गया। तब उसने लोगों के सब प्रधान याजकों और शास्त्रियों को इकट्ठा करके उनसे पूछा मसीह का जन्म कहाँ होना चाहिए। (मत्ती 2:3-4)

आप इस निश्चित वाक्य में ‘मसीह’ के विचार को देख सकते हैं, जिसे हेरोदेस और उसके प्रधानों के मध्य में अच्छी तरह से समझ लिया गया था – यहाँ तक कि इससे पहले कि यीशु का जन्म होता – और यह यहाँ पर विशेष रूप से यीशु के लिए उद्धृत हुए बिना उपयोग हुआ है। यह दिखाता है, कि ‘क्राईस्ट’ अर्थात् मसीह पुराने नियम में से आएगा, जो की 1ली सदी में लोगों के द्वारा (जैसे कि हेरोदेस और उसके प्रधानों के द्वारा) यूनानी के सेप्तुआजिन्त में पाया जाने वाला एक सामान्य पठन् था। ‘क्राईस्ट’  एक नाम नहीं, अपितु पदवी थी (और आज भी है), जो एक शासक या राजा का संकेत देती है। इसलिए ही हेरोदेस ‘परेशान था’ क्योंकि उसने एक और राजा होने की सम्भावना को स्वयं के लिए खतरा महसूस किया। हम इस हास्यास्पद विचार का इन्कार कर सकते हैं, कि ‘मसीह’ मसीही विश्‍वासियों के द्वारा आविष्कृत किया गया था या यह किसी बड़े व्यक्ति जैसे 300 ईस्वी सन् में सम्राट कॉन्सटेनटाईन के द्वारा आविष्कृत किया गया था। यह पदवी हजारों वर्षों पहले से किसी भी मसीही विश्‍वासी के आगमन या कॉन्सटेनटाईन के द्वारा शासन करने से बहुत पहले से ही प्रचलन में थी।

मसीह के अधिकार का विरोधाभास

यीशु के आरम्भिक अनुयायियों को यह विश्वास हो गया था कि यही यीशु इब्रानी वेदों अर्थात् बाइबल में भविष्यवाणी किया गया आने वाला मसीह था, जबकि अन्य लोगों ने इस मान्यता का विरोध किया था।

क्यों?

इसका उत्तर प्रेम या शक्ति के आधार पर शासन के बारे में विरोधाभास के रूप में पाया जाता है। राज का अर्थ ब्रिटिश शासक को भारत पर शासन करने का अधिकार था। परन्तु ब्रिटेन ने भारत पर शासन करने का अधिकार इसलिए प्राप्त किया क्योंकि राज या शासन सबसे पहले सैन्य शक्ति के रूप में आया था और इसने शासन को अपने शाक्ति के माध्यम से बाहरी रूप से लागू किया था। जनता राज या शासन से प्रेम नहीं करती थी और गांधी जैसे नेताओं के माध्यम से, अंततः ब्रिटिश राज या शासन को समाप्त कर दिया गया।

यीशु के रूप में मसीह अधीनता की मांग करने के लिए नहीं आया था, यद्यपि उसके पास इसका अधिकार था। वह प्रेम या भक्ति पर आधारित एक शाश्वतकालीन राज्य की स्थापना करने के लिए आया था, और इसके लिए आवश्यक था कि एक ओर सत्ता और अधिकार और दूसरी ओर प्रेम का विरोधाभास आपस में एक दूसरे से मिल जाए। इब्रानी ऋषियों ने इस विरोधाभास की खोज की ताकि हमें ‘मसीह’ के आने को समझने में सहायता मिल सके। हम इब्रानी वेदों में ‘मसीह’ के पहले प्रगटीकरण से उनकी अंतर्दृष्टियों का अनुसरण करते हैं, जो इब्रानी राजा दाऊद से लगभग 1000 ईसा पूर्व में आई थीं।

संसार के चारों ओर और भारत में : यहूदियों का इतिहास

भारतीय समुदाय में मूसा सम्बन्धी तानेबाने के भीतर एक छोटे से समाज को निर्मित करने के द्वारा, हजारों वर्षों से यहाँ रहते हुए, यहूदियों का भारत में एक लम्बा इतिहास है। अन्य अल्पसँख्यक समूहों से भिन्न (जैसे कि जैन, सिक्ख और बौद्ध धर्मावलम्बियों), यहूदी मूल रूप से अपनी जन्मभूमि को छोड़ते हुए भारत में बाहर से आए थे। 2017 की गर्मियों में भारतीय प्रधान मंत्री मोदी की इस्राएल में की गई ऐतिहासिक यात्रा से ठीक पहले इस्राएल के प्रधानमन्त्री उन्होंने नेतन्याहू के साथ एक संयुक्त सह-लेखन को लिखा। जब उन्होंने निम्न कथन को लिखा तब उन्होंने भारत से यहूदियों के होने वाले देशान्तर गमन को स्वीकार किया है:

भारत में यहूदी समुदाय का सदैव गर्मजोशी और सम्मान के साथ स्वागत किया गया और इसने कभी भी किसी भी तरह के उत्पीड़न का सामना नहीं किया है।

वास्तव में, यहूदियों के द्वारा भारत के इतिहास ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा है, जो भारतीय इतिहास में एक हठी रहस्य को समाधान प्रदान करता है – भारत में लेखन कला कैसे विकसित हुई जैसे कि इसे आज लिखा जाता है? इस प्रश्न का उत्तर भारतीय संस्कृति के सभी शास्त्रीय लेखन कार्यों को प्रभावित करता है।

भारत में यहूदी इतिहास

यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था
यद्यपि भिन्न, यहूदियों ने पारम्परिक भारतीय परिधान को अपनाने के द्वारा स्वयं को इसमें मिश्रित कर लिया था

यहूदी समुदाय भारत में कितने समय से रह रहा है? द टाइम्स ऑफ इस्राएल समाचार पत्र ने अभी हाल ही में एक लेख को प्रकाशित किया है, जिसमें कहा गया है कि ’27 सदियों ‘के पश्चात् मनश्शे (बेन मनश्शे ) के गोत्र के लोग मिजोरम के भारतीय राज्य से इस्राएल वापस लौट रहे हैं। यह उन्हें उनके पूर्वजों को यहाँ पर मूल रूप से 700 ईसा पूर्व में पहुँचने की पुष्टि करता है। आंध्रा प्रदेश में रहने वाले एप्रैम के यहूदी गोत्र के तेलुगू-भाषी उनके भाई-बहन (बेन एप्रैम) की भी 1000 वर्षों से अधिक समय तक भारत में होने की सामूहिक स्मृति पाई जाती है, जो फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और इसके पश्चात् चीन में से भटकते हुए यहाँ पहुँचे थे। केरल के राज्य में, कोचीन के यहूदी यहाँ पर लगभग 2600 वर्षों से रह रहे हैं। सदियों के बीतने के पश्चात् उन्होंने स्वयं को छोटे परन्तु पूरे भारत में विशेष समुदायों में निर्मित कर लिया था। परन्तु अब वे इस्राएल वापस लौटने के लिए भारत को छोड़ रहे हैं।

कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।
कोचीन में पाया गया यहूदी आराधनालय का एक शिलालेख। यह यहाँ पर सैकड़ों वर्ष से पड़ा हुआ है।

यहूदी कैसे भारत में रहने के लिए आ गए? वे इतने लम्बे समय के पश्चात् इस्राएल वापस क्यों लौट रहे हैं? हमारे पास उनके इतिहास के बारे में किसी भी अन्य जाति से कहीं अधिक तथ्य पाए जाते हैं। हम इन जानकारियों का उपयोग समय रेखा में उनके इतिहास को सारांशित करते हुए करेंगे।

अब्राहम : यहूदी परिवार के वंश का आरम्भ होना

समय रेखा अब्राहम से आरम्भ होती है। उसे उसके वंश में से जातियों की एक प्रतिज्ञा दी गई थी और उसकी मुठभेड़ परमेश्‍वर को उसके पुत्र इसहाक के प्रतीकात्मक बलिदान के साथ अन्त होती है। यह बलिदान यीशु (यीशु सत्संग) की ओर संकेत करता हुआ एक चिन्ह भविष्य के उस स्थान को चिन्हित करते हुए था जहाँ पर उसका बलिदान होगा। इसहाक के पुत्र का नाम परमेश्‍वर के द्वारा इस्राएल  रखा गया। यह समय रेखा हरे रंग में आगे बढ़ती है जब इस्राएल की सन्तान को मिस्र में दासत्व के बन्धन में आई थी। यह अवधि उस समय आरम्भ होती है, जब इस्राएल का पुत्र यूसुफ (वंशावली यह थी : अब्राहम -> इसहाक -> इस्राएल (जिसे याकूब भी जाना गया था) -> यूसुफ), इस्राएलियों को मिस्र में ले गया, जब वे लोग बाद में दास बन गए।

फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए
फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए

मूसा : परमेश्‍वर की अधीनता में इस्राएल एक राष्ट्र बन गया

मूसा ने इस्राएलियों को फसह की विपत्ति के साथ मिस्र से बाहर निकलने में मार्गदर्शन दिया, जिसने मिस्र को नष्ट कर दिया था और इस्राएलियों को मिस्र में मिस्रियों के हाथों बाहर निकल जाने में सहायता प्रदान की थी। मूसा की मृत्यु से पहले, मूसा ने इस्राएलियों के ऊपर आशीषों और श्रापों की घोषणा की (जब समय रेखा हरे रंग से पीले रंग की ओर जाती है)। उन्हें तब आशीष मिलेगी जब वे परमेश्‍वर के प्रति आज्ञाकारी रहते हैं, परन्तु यदि वे आज्ञाकारी नहीं रहते तो श्राप का अनुभव करेंगे। ये आशीषें और श्राप इस्राएल के बाद के इतिहास के साथ भी बँधी हुई थीं।

हजारों वर्षों तक इस्राएली अपनी जन्म भूमि के ऊपर रहे परन्तु उनके पास अपना कोई भी राजा नहीं था, न ही यरूशलेम जैसी कोई राजधानी उनके पास थी – यह उस समय अन्य लोगों के पास थी। तथापि, इसमें 1000 ईसा पूर्व राजा दाऊद के आने के पश्चात् परिवर्तन हो गया।

यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना
यरूशलेम से शासन करने वाले राजा दाऊद के साथ रहना

दाऊद यरूशलेम में एक शाही राजवंश की स्थापना करता है

दाऊद ने यरूशलेम को जीत लिया और इसे अपनी राजधानी बना लिया। उसने ‘मसीह’ के आगमन की प्रतिज्ञा को प्राप्त किया और उस समय से यहूदी लोग मसीह के आगमन के लिए प्रतीक्षारत् हैं। उसके पुत्र सुलैमान, बिना किसी सन्तुष्टि के परन्तु धनी और प्रसिद्ध, उसका उत्तराधिकारी हुआ और सुलैमान ने यहूदियों के पहले मन्दिर को यरूशलेम में मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर निर्मित किया। राजा दाऊद के वंशज् निरन्तर लगभग 400 वर्षों तक राज्य करते रहे और इस अवधि को हल्के-नीले रंग (1000 – 600 ईसा पूर्व) से दर्शाया गया है। यह अवधि इस्राएल की उन्नति का समय था – उनके पास प्रतिज्ञा की हुई आशीषें थीं। वे एक शक्तिशाली जाति थे; उनके समाज, संस्कृति और उनका मन्दिर उन्नत था। परन्तु पुराना नियम साथ ही उनमें बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार और इस समय होने वाली मूर्ति पूजा का भी विवरण देता है। इस अवधि में बहुत से भविष्यद्वक्ताओं ने इस्राएलियों को चेतावनी दी कि यदि वे मन परिवर्तन नहीं करते, तो उनके ऊपर मूसा के श्राप आप पड़ेंगे। इन चेतावनियों को अनदेखा कर दिया गया। इस समय के मध्य में इस्राएली दो पृथक राज्यों : इस्राएल और एप्रैम का उत्तरी राज्य और यहूदा के दक्षिण राज्य में विभाजित हो गए (जैसे कि आज के समय कोरिया है, एक ही लोग दो देशों में विभाजित हो गए हैं – उत्तरी ओर दक्षिण कोरिया)।

यहूदियों की पहली बन्धुवाई : अश्शूर और बेबीलोन

अन्त में, दो चरणों में श्राप उनके ऊपर आ पड़ा। अश्शूर ने एप्रैम के उत्तरी राज्य को 722 ईसा पूर्व में नष्ट कर दिया और इसमें रहने वाले इस्राएलियों को बड़े पैमाने पर अपने विस्तृत साम्राज्य में भेज दिया गया। मिजोरम के बेन मनश्शे और आन्ध्रा प्रदेश के बेन एप्रैम इन्हीं निर्वासित किए हुए इस्राएलियों के वंशज् हैं। तब 586 ईसा पूर्व में नबूकदनेस्सर, बेबीलोन का एक शक्तिशाली राजा आया – ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने 900 वर्षों पहले भविष्यद्वाणी की थी, जब उसने अपने इन श्रापों को लिखा था:

यहोवा तेरे विरूद्ध दूर से, वरन् पृथ्वी के छोर से वेग से उड़नेवाले उकाब सी एक जाति को चढ़ा लाएगा जिसकी भाषा तू नहीं समझेगा; उस जाति के लोगों का व्यवहार क्रूर होगा, वे न तो बूढ़ों का मुँह देखकर आदर करेंगे, और न बालकों पर दया करेंगे; और वे तेरे पशुओं के बच्चे और भूमि की उपज यहाँ तक खा जाएँगे कि तू नष्ट हो जाएगा; और वे तेरे लिये न अन्न, और न नया दाखमधु, और न टटका तेल, और न बछड़े, न मेम्ने छोड़ेंगे, यहाँ तक कि तू नष्ट हो जाएगा। और वे तेरे परमेश्वर यहोवा के दिये हुए सारे देश के सब फाटकों के भीतर तुझे घेर रखेंगे; वे तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे उस समय तक घेरेंगे, जब तक तेरे सारे देश में तेरी ऊँची ऊँची और दृढ़ शहरपनाहें जिन पर तू भरोसा करेगा गिर न जाएँ।  (व्यवस्थाविवरण 28:49-52)

नबूकदनेस्सर ने यरूशलेम को जीत लिया, इसे जला दिया और इसके उस मन्दिर को नष्ट कर दिया जिसे सुलैमान ने निर्मित किया। उसने तब इस्राएलियों को बेबीलोन में बन्धुवा बना लिया। इसने मूसा के इस भविष्यद्वाणी को पूरा कर दिया कि

और जैसे अब यहोवा को तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता है, वैसे ही तब उसको तुम्हारा नाश वरन् सत्यानाश करने से हर्ष होगा; और जिस भूमि के अधिकारी होने को तुम जा रहे हो उस पर से तुम उखाड़े जाओगे। और यहोवा तुझ को पृथ्वी के इस छोर से लेकर उस छोर तक के सब देशों के लोगों में तित्तर बित्तर करेगा; और वहाँ रहकर तू अपने और अपने पुरखाओं के अनजान काठ और पत्थर के दूसरे देवताओं की उपासना करेगा।  (व्यवस्थाविवरण 28:63-64)

जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया
जीत लिया गया और बेबीलोन में निर्वासित कर दिया गया

केरल के कोचीन के यहूदी बन्धुवाई में रहने वाले इन्हीं इस्राएलियों के वंशज् हैं। क्योंकि 70 वर्षों से, इस अवधि को लाल रंग से दिखाया गया है, ये इस्राएलियों (या यहूदी जैसा कि अब इन्हें पुकारा जाता है) निर्वासन में अब्राहम और उसके वंशज् को प्रतिज्ञा की हुई भूमि से दूर रह रहे थे।

भारतीय समाज को यहूदी का योगदान

हम लेखन कार्य के प्रश्न पर ध्यान देते हैं, जो भारत में प्रगट हुआ। भारत की आधुनिक भाषाओं में हिन्दी, बंगाली, मराठी, गुजराती, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और तमिल के साथ-साथ प्राचीन संस्कृत जिस में ऋग्वेद और अन्य शास्त्रीय साहित्य को ब्राह्मी लिपि में वर्गीकृत किया गया था क्योंकि ये सभी एक पैतृक लिपि से आती हैं। जिसे ब्राह्मी लिपि के रूप में जाना जाता है। ब्राह्मी लिपि आज केवल सम्राट अशोक के काल के कुछ प्राचीन स्मारकों में देखने को मिलती है।

अशोक स्तंभ पर ब्राह्मी लिपि (250 ईसा पूर्व)

  यद्यपि यह समझा जाता है कि ब्राह्मी लिपि इन आधुनिक लिपियों में कैसे परिवर्तित हुई, तथापि यह स्पष्ट नहीं है कि भारत ने ब्राह्मी लिपि को कैसे अपनाया। विद्वानों ने ध्यान दिया है कि ब्राह्मी लिपि इब्रानी-फ़ोनीशियाई वर्णमाला आधारित लिपि से संबंधित है, यह ऐसी लिपि थी जिसका उपयोग इस्राएल के यहूदियों द्वारा उनके निर्वासन और भारत में उनके प्रवास काल के समय में किया जाता था। इतिहासकार डॉ. अविगदोर शचान(1) यह प्रस्तावित करते है कि निर्वासित इस्राएली जो भारत में आकर बस गए थे, वे इब्रानी-फ़ोनीशियाई वर्णमाला को अपने साथ लेकर आए थे – जो बाद में ब्राह्मी लिपि बन गई। इससे ब्राह्मी लिपि का नाम कैसे पड़ा, इसका रहस्य भी सुलझ जाता है। क्या यह मात्र संयोग है कि ब्राह्मी लिपि उत्तर भारत में उसी समय दिखाई देती है जब यहूदी अपनी पैतृक भूमि, अब्राहम  की भूमि से निर्वासित होकर यहां आकर बस गए थे? अब्राहम के वंशजों की लिपि को अपनाने वाले मूल निवासियों ने इसे (अ) ब्राह्मण लिपि कहा है। अब्राहम का धर्म एक ईश्वर में विश्वास करना था जिसकी भूमिका सीमित नहीं है। वह प्रथम, अन्तिम और अनन्त है। शायद यही वह स्थान है, जहाँ ब्राह्मण में विश्वास से ब्राह्मण लोगों के धर्म (अ) का आरम्भ हुआ। यहूदियों द्वारा, अपनी लिपि और धर्म को भारत में लाने से, उन आक्रमणकारियों की तुलना में जिन्होंने उन्हें जीतना और उन पर शासन करना चाहा था, अपने विचार और इतिहास को और अधिक मौलिक रूप से आकार प्रदान किया। और इब्रानी वेद, मूल रूप से इब्रानी-फ़ोनीशियाई/ब्राह्मी लिपि में, एक आने वाले पुरूष के विषय में बात करते हैं, जो कि संस्कृत ऋग्वेद में सामान्य रूप से आने वाले पुरूष के विषय में मिलता है। परन्तु हम उनकी पैतृक भूमि से उनके निर्वासन के बाद मध्य पूर्व में यहूदियों के इतिहास पर लौटते हैं।

फारसियों की अधीनता में बन्धुवाई से वापस लौटना

इसके पश्चात्, फारसी सम्राट कुस्रू ने बेबीलोन को जीत लिया और कुस्रू संसार का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति बन गया। उसने यहूदियों को उनकी भूमि के ऊपर वापस लौटने की अनुमति प्रदान की।

उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो फारसी साम्राज्य का भाग है

तथापि वे अब और अधिक आगे को एक स्वतंत्र देश नहीं थे, वे अब फारसी साम्राज्य के एक प्रान्त के रूप में थे। ऐसी स्थिति लगभग 200 वर्षों तक बनी रही और इसे समय रेखा में गुलाबी रंग से दिखाया गया है। इस समय में यहूदियों का मन्दिर (जिसे 2रे मन्दिर के रूप में जाना जाता है) और यरूशलेम के मन्दिर को पुनः निर्मित किया गया। यद्यपि यहूदियों को इस्राएल में वापस लौटने की अनुमति प्रदान कर दी गई, तथापि, उन में से बहुत से बन्धुवाई में ही रह गए।

यूनानियों का समयकाल

सिकन्दर महान् ने फारसी साम्राज्य को जीत लिया और इस्राएल को आगे के लगभग 200 वर्षों के लिए यूनानी साम्राज्य का एक प्रान्त बना दिया। इसे गहरे नीले रंग से दिखाया गया है।

उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो यूनानी साम्राज्य का भाग है

रोमियों का समयकाल

इसके पश्चात् रोमियों ने यूनानी साम्राज्य को पराजित कर दिया और वे प्रमुख विश्‍व शक्ति बन गए। इस साम्राज्य में यहूदी एक बार फिर से एक प्रान्त बन गए और इसे हल्के पीले रंग से दिखाया गया है। यह वह समय था जब यीशु इस पृथ्वी पर रहा। यह विवरण देता है, कि क्यों सुसमाचारों में रोमी सैनिक पाए जाते हैं  – क्योंकि रोमियों के द्वारा इस्राएलियों की भूमि पर रहने वाले यहूदियों के ऊपर यीशु के समय में शासन किया जाता था।

उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है
उस भूमि पर रहना जो रोमी साम्राज्य का भाग है

रोमियों की अधीनता में यहूदियों का दूसरी बार निर्वासित होना

बेबीलोनियों के समय लेकर (586 ईसा पूर्व) यहूदी कभी उस तरह से स्वतंत्र नहीं रहे जिस तरह से वे राजा दाऊद की अधीनता में थे। वे एक के बाद दूसरे साम्राज्य के अधीन शासित हुए, ठीक वैसे ही जैसा कि भारत के ऊपर बिट्रेन का शासन रहा है। यहूदियों को इसके प्रति बुरा लगा और उन्होंने रोमी शासन के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। रोमी आए और उन्होंने यरूशेलम को (70 ईस्वी सन्) में नष्ट कर दिया, इसके 2रे मन्दिर को जला दिया गया और यहूदियों को रोमी साम्राज्य में दासों के रूप में निर्वासित कर दिया गया। यह यहूदियों का दूसरी  बार बन्धुवाई में जाना हुआ था। क्योंकि रोम बहुत बड़ा था, परिणामस्वरूप यहूदी अन्त में पूरे संसार में ही बिखर गए।

यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।
यरूशलेम और मन्दिर को रोमियों द्वारा 70 ईस्वी सन् में नष्ट कर दिया गया। यहूदियों को पूरे संसार में निर्वासित कर दिया गया।

और इस तरह से यहूदी लोग अतीत के लगभग 2000 वर्षों रहे हैं: विदेशी भूमि पर बिखरे हुए और उन्हें कभी भी इस भूमि पर स्वीकार नहीं किया गया। इन विभिन्न देशों में उन्होंने निरन्तर बड़े सतावों से दु:ख उठाया है। यहूदियों के ऊपर आया हुआ सताव यूरोप के संदर्भ में विशेष रूप से सच्चा है। पश्चिमी यूरोप में, स्पेन से लेकर रूस तक यहूदियों को इन देशों में अक्सर खतरनाक परिस्थितियों में रहना पड़ा है। इन सतावों से बचने के लिए यहूदी निरन्तर कोचीन में पहुँचते रहे। 17वीं व 18वीं सदी में भारत के अन्य भागों में मध्य पूर्वी देशों से यहूदियों का आगमन हुआ और उन्हें बगदादी यहूदी के रूप में पहचाना गया, जो मुख्य रूप से मुम्बई, दिल्ली और कोलकाता में बस गए थे। 1500 ईसा पूर्व मूसा के द्वारा दिए हुए श्राप उनके विवरणों के अनुरूप है, कि कैसे उन्होंने जीवन को यापन किया था।

 डेविड सासोन और उसके पुत्र - भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी
डेविड सासोन और उसके पुत्र – भारत में रहने वाले धनी बगदादी यहूदी

और उन जातियों में तू कभी चैन न पाएगा, और न तेरे पाँव को ठिकाना मिलेगा; क्योंकि वहाँ यहोवा ऐसा करेगा कि तेरा हृदय काँपता रहेगा, और तेरी आँखे धुँधली पड़ जाएँगी, और तेरा मन व्याकुल रहेगा (व्यवस्थाविवरण 28:65)

इस्राएलियों के विरूद्ध दिए हुए श्राप लोगों को यह पूछने के लिए दिए गए थे :

और सब जातियों के लोग पूछेंगे: “यहोवा ने इस देश से ऐसा क्यों किया? और इस बड़े कोप के भड़कने का क्या कारण है? (व्यवस्थाविवरण 29:24)

और इसका उत्तर यह था :

तब लोग यह उत्तर देंगे, “उनके पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने जो वाचा उनके साथ मिस्र देश से निकालने के समय बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ा है। और पराए देवताओं की उपासना की है जिन्हें वे पहिले नहीं जानते थे, और यहोवा ने उनको नहीं दिया था; इसलिये यहोवा का कोप इस देश पर भड़क उठा है, कि पुस्तक मे लिखे हुए सब शाप इस पर आ पडें; और यहोवा ने कोप, और जलजलाहट, और बड़ा ही क्रोध करके उन्हें उनके देश में से उखाड़कर दूसरे देश में फेंक दिया, जैसा कि आज प्रगट है।” (व्यवस्थाविवरण 29:25-28)

नीचे दी हुई समय रेखा इस 1900 वर्षों की अवधि को दर्शाती है। इस अवधि को लाल रंग की मोटी रेखा से दर्शाया गया है।

आप देख सकते हैं, कि उनके इतिहास में यहूदी लोग बन्धुवाई की दो अवधियों में से होकर निकले परन्तु दूसरी बन्धुवाई पहली बन्धुवाई से अधिक लम्बी समय की थी।

बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई - यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा
बन्धुवाई की दो अवधियों को चित्रित करती हुई – यहूदियों की ऐतिहासिक समय रेखा

20वीं सदी का नरसंहार

यहूदियों के विरूद्ध सताव अपने चरम पर तब पहुँचा जब हिटलर ने, नाजी जर्मनी के द्वारा, यूरोप में रहने वाले सभी यहूदियों को पूर्ण रीति से नष्ट करने का प्रयास किया। वह लगभग सफल भी हो गया था परन्तु उसकी पराजय हो गई और यहूदियों में से थोड़े से बचे रह गए।

आधुनिक इस्राएल की पुन: – स्थापना

मात्र इस तथ्य ने, कि ऐसे लोग, जो स्वयं को ‘यहूदियों’ के रूप में पहचानते हुए हजारों वर्षों के पश्चात् भी बिना किसी भी जन्म भूमि के अस्तित्व में हैं, अपने आप में ही उल्लेखनीय था। परन्तु इसने 3500 वर्षों पहले मूसा के द्वारा लिखे हुए वचनों को सत्य प्रमाणित कर दिया। 1948 में यहूदियों नें, संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इस्राएल के आधुनिक देश के रूप में पुन: स्थापित होते हुए देखना अपने आप में ही उल्लेखनीय था, ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने सदियों पहले लिखा था:

तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा। चाहे धरती के छोर तक तेरा बरबस पहुँचाया जाना हो, तौभी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को वहाँ से ले आकर इकट्ठा करेगा। और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उसी देश में पहुँचाएगा जिसके तेरे पुरखा अधिकारी हुए थे, और तू फिर उसका अधिकारी होगा; और वह तेरी भलाई करेगा, और तुझ को तेरे पुरखाओं से भी गिनती में अधिक बढ़ाएगा। (व्यवस्थाविवरण 30:3-5)

बड़े विरोध के पश्चात् भी इस देश की स्थापना स्वयं में ही उल्लेखनीय है। इसके चारों ओर के अधिकांश देशों ने इस्राएल के विरूद्ध 1948 विरूद्ध… इसके पश्चात् 1956 में … इसके पश्चात् 1967 में और एक बार फिर से 1973 में युद्ध छेड़ा था। इस्राएल एक बहुत ही छोटा सा देश है, जो कई बार एक ही समय में पाँच देशों के साथ युद्ध कर रहा होता था। इतने पर भी, इस्राएल न केवल बचा रहा, अपितु इसका क्षेत्रफल भी बढ़ता चला गया। 1967 के युद्ध में इस्राएल ने यरूशलेम को प्राप्त किया, जो उनकी दाऊद के द्वारा लगभग 3000 वर्षों पहले स्थापित की हुई ऐतिहासिक राजधानी थी। इस्राएल के देश की स्थापना, और उन युद्धों के परिणामों ने आज के हमारे संसार में सबसे कठिन राजनैतिक समस्याओं को जन्म दिया है।

जैसा कि मूसा के द्वारा भविष्यद्वाणी की गई थी और जिन्हें यहाँ पर विस्तार सहित देखा जा सकता, इस्राएल की पुन: स्थापना इस्राएल की ओर लौटने के लिए भारत में रहने वाले विभिन्न यहूदियों के लिए एक प्रोत्साहन को उत्पन्न करता है। इस समय इस्राएल में 80,000 ऐसे यहूदी रहते हैं, जिनका एक अभिभावक भारत से है और भारत में अब केवल 5000 यहूदी ही शेष रह गए हैं। जहाँ तक मूसा की आशीषों का संदर्भ है, उन्हें बहुत ही “दूर के देशों” से इकट्ठा” किया जा रहा है (जैसे कि मिजोरम) और उन्हें “वापस” लाया जा रहा है। इसके निहितार्थ यहूदियों और गैर-यहूदियों दोनों के लिए यहाँ पर प्रकाश डालते हुए एक दूसरे के तुल्य ही हैं।

लक्ष्मी से लेकर शिव तक: आज कैसे श्री मूसा के आशीर्वाद और शाप सुनाई देते हैं

जब हम आशीर्वाद और अच्छे सौभाग्य के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मन भाग्य, सफलता और धन की देवी लक्ष्मी की ओर चला जाते हैं। जब लालच नहीं किया जाता है तो वह कठोर मेहनत का आर्शीवाद देती है। क्षीर सागर के मन्थन की कहानी में, लक्ष्मी ने देवों को छोड़ दिया था और इन्द्र के द्वारा पवित्र फूलों को फेंके दिए जाने के द्वारा हुए अपमान के कारण झीर सागर में प्रवेश किया। यद्यपि, उसकी वापसी के लिए समुद्र मन्थन के एक हजार वर्ष बाद, उसने अपने पुर्न-जन्म के होने के साथ भक्तों को आशीर्वाद दिया।

जब हम विनाश, उजाड़ और सर्वनाश के बारे में सोचते हैं, तो हमारी सोच भैरव, अर्थात् शिव के हिंसक अवतार, या यहाँ तक कि शिव के तीसरे नेत्र की ओर चली जाती है। यह लगभग सदैव बंद रहता है, परन्तु वह इसे बुरा करने वालों को नाश करने के लिए खोलता है। लक्ष्मी और शिव दोनों ही भक्तों की ओर से बहुत अधिक ध्यान को प्राप्त करते हैं, क्योंकि लोग एक से आशीर्वाद की इच्छा रखते हैं और दूसरे से शाप या विनाश के कारण डरते हैं।

इस्राएलियों को दिए गए… आशीर्वाद और शाप… हमें निर्देश देने के लिए हैं…।

सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने इब्रानी वेदों में जो कुछ प्रकाशित किया है, वह लेखक के लिए विरोधियों को आशीर्वाद और शाप दोनों को देने के लिए संकेत था, ठीक वैसे ही भयानक जैसे कि लक्ष्मी की ओर से आर्शीवाद और शाप और विनाश के लिए भैरव या शिव के तीसरे नेत्र की ओर से आने वाले शाप आते हैं। यह उसके चुने हुए लोगों – इस्राएलियों – की ओर निर्देशित किए गए थे, जो उसके भक्त थे। यह परमेश्वर के द्वारा इस्राएलियों को मिस्र की गुलामी में से बाहर निकालने के बाद दिए गए थे और उसने उन्हें दस आज्ञाएं दीं थीं – जो यह जानने के लिए मानक थीं कि क्या कहीं पाप ने तो उन्हें नियन्त्रित किया हुआ या नहीं। इन आशीर्वाद और शापों को इस्राएलियों की ओर निर्देशित किया गया था, परन्तु बहुत पहले ही इसकी घोषणा कर दी गई थी ताकि अन्य सभी राष्ट्र इस की ओर ध्यान दें और महसूस करें कि वह हमें उसी शक्ति के साथ आशीर्वाद प्रदान करता है, जिस शक्ति से उसने इस्राएलियों को इन्हें दिया था। हम सभी जो समृद्धि और आशीर्वाद चाहते हैं और विनाश और अभिशाप से बचते हैं, इस्राएलियों के अनुभव से सीख सकते हैं।

मूसा लगभग 3500 वर्षों रहा और उसने बाइबल की पहली पाँच पुस्तकों के लिखा  – पंचग्रन्थ  या तोराह । पाँचवी पुस्तक, व्यवस्थाविवरण, में उसकी मृत्यु से ठीक पहले उसके द्वारा बोले गए अन्तिम वचन पाए जाते हैं। ये इस्राएल के लोगों – यहूदियों के लिए उसकी आशीषें हैं, परन्तु साथ ही इसमें श्राप भी मिलते हैं। मूसा ने लिखा कि ये आशीषें और श्राप संसार के इतिहास को आकार प्रदान करेंगे और इन पर न केवल यहूदियों के द्वारा ही, अपितु अन्य दूसरी जातियों के द्वारा भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इन आशीषों और श्रापों ने भारत के इतिहास को भी प्रभावित किया है। इसलिए इनका लिखा जाना हमारे आत्म – चिन्तन के लिए है। आशीषों और श्रापों की पूरी सूची यहाँ पर दी गई है। इसका सार नीचे दिया गया है।

मूसा की आशीषें

मूसा ने उन आशीषों को वर्णन करना आरम्भ किया जिन्हें इस्राएल के लोग तब प्राप्त करते जब वे व्यवस्था का पालन करते, जिसमें दस आज्ञाएँ भी सम्मिलित हैं। परमेश्‍वर की ओर से आने वाली आशीष इतनी बड़ी होगी कि अन्य जातियों भी इन आशीषों को पहचानेंगी। इन आशीषों के परिणाम निम्न लिखित होंगे:

 और पृथ्वी के देश देश के सब लोग यह देखकर, कि तू यहोवा का कहलाता है, तुझ से डर जाएँगे (व्यवस्थाविवरण 28:10)

… और श्राप

परन्तु, यदि इस्राएली आज्ञाओं को पालन करने में असफल हो जाते हैं, तब वे श्रापों को प्राप्त करेंगे जो आशीषों के स्थान पर होंगे और उन्हीं की तुलना के अनुरूप होंगे। इन आशीषों को भी चारों की ओर की जातियों के द्वारा देखा जाएगा ताकि :

और उन सब जातियों में जिनके मध्य में यहोवा तुझ को पहुँचाएगा, वहाँ के लोगों के लिये तू चकित होने का, और दृष्टान्त और शाप का कारण समझा जाएगा। (व्यवस्थाविवरण 28:37)

और ये श्राप आने वाले इतिहास तक विस्तारित हो जाएँगे।

 और वे तुझ पर और तेरे वंश पर सदा के लिये बने रहकर चिन्ह और चमत्कार ठहरेंगे। (व्यवस्थाविवरण 28:46)

परन्तु परमेश्‍वर ने चेतावनी दी कि श्रापों के सबसे बुरे अंश का आना अन्य जातियों की ओर से होगा।

यहोवा तेरे विरूद्ध दूर से, वरन् पृथ्वी के छोर से वेग से उड़नेवाले उकाब सी एक जाति को चढ़ा लाएगा जिसकी भाषा को तू नहीं समझेगा; उस जाति के लोगों का व्यवहार क्रूर होगा, वे न तो बूढ़ों का मुँह देखकर आदर करेंगे, और न बालकों पर दया करेंगे; और वे तेरे पशुओं के बच्चे और भूमि की उपज यहाँ तक खा जाएँगे कि तू नष्ट हो जाएगा; और वे तेरे लिये न अन्न, और न नया दाखमधु, और न टटका तेल, और न बछड़े, न मेम्ने छोड़ेंगे, यहाँ तक कि तू नष्ट हो जाएगा। और वे तेरे परमेश्वर यहोवा के दिए हुए सारे देश के सब फाटकों के भीतर तुझे घेर रखेंगे; वे तेरे सब फाटकों के भीतर तुझे उस समय तक घेरेंगे, जब तक तेरे सारे देश में तेरी ऊँची ऊँची और दृढ़ शहरपनाहें जिन पर तू भरोसा करेगा गिर न जाएँ।  (व्यवस्थाविवरण 28:49-52)

ये बुरे से अत्याधिक बुरे हो जाएँगे।

और जैसे अब यहोवा की तुम्हारी भलाई और बढ़ती करने से हर्ष होता है, वैसे ही तब उसको तुम्हें नाश वरन् सत्यानाश करने से हर्ष होगा; और जिस भूमि के अधिकारी होने को तुम जा रहे हो उस पर से तुम उखाड़े जाओगे। …और उन जातियों में तू कभी चैन न पाएगा, और न तेरे पाँव को ठिकाना मिलेगा; क्योंकि वहाँ यहोवा ऐसा करेगा कि तेरा हृदय काँपता रहेगा, और तेरी आँखे धुँधली पड़ जाएँगी, और तेरा मन कलपता रहेगा। (व्यवस्थाविवरण 28:63-65)

परमेश्‍वर और इस्राएलियों के मध्य में औपचारिक सहमति के द्वारा इन आशीषों और श्रापों को स्थापित किया गया था।

कि जो वाचा तेरा परमेश्वर यहोवा आज तुझ से बाँधता है… और उस शपथ के अनुसार जो उसने इब्राहीम, इसहाक, और याकूब, तेरे पूर्वजों से खाई थी, वह आज तुझ को अपनी प्रजा ठहराए, और आप तेरा परमेश्वर ठहरे … परन्तु उनको भी, जो आज हमारे संग यहाँ हमारे परमेश्वर यहोवा के सामने खड़े हैं।  (व्यवस्थाविवरण 29:12-15)

इस कारण यह वाचा सन्तान और भविष्य की पीढ़ियों के ऊपर निर्मित होगी। सच्चाई तो यह है, कि यह वाचा भविष्य की पीढ़ियों – दोनों अर्थात् इस्राएलियों और परदेशियों के ओर ही निर्देशित की गई है।

और आनेवाली पीढ़ियों में तुम्हारे वंश के लोग जो तुम्हारे बाद उत्पन्न होंगे, और परदेशी मनुष्य भी जो दूर देश से आएँगे, वे उस देश की विपत्तियों और उस में यहोवा के फैलाए हुए रोग देखकर… न कुछ बोया जाता, और न कुछ जम सकता, और न घास उगती है… और सब जातियों के लोग पूछेंगे, “यहोवा ने इस देश से ऐसा क्यों किया? और इस बड़े कोप के भड़कने का क्या कारण है?” (व्यवस्थाविवरण 29:22-24)

और इसका उत्तर यह होगा:

“तब लोग यह उत्तर देंगे, ‘उनके पूर्वजों के परमेश्वर यहोवा ने जो वाचा उनके साथ मिस्र देश से निकालने के समय बाँधी थी उसको उन्होंने तोड़ा है… इसलिये यहोवा का कोप इस देश पर भड़क उठा है, कि पुस्तक मे लिखे हुए सब शाप इस पर आ पडें;  और यहोवा ने कोप, और जलजलाहट, और बड़ा ही क्रोध करके उन्हें उनके देश में से उखाड़ कर दूसरे देश में फेंक दिया, जैसा कि आज प्रगट है। (व्यवस्थाविवरण 29:25-28)

क्या आशीषें और श्राप घटित होते हैं?

इनके बारे में कुछ भी तटस्थता नहीं है। आशीषें हर्षदायी थी और श्राप डरावने थे, परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न जिसे हम पूछ सकते हैं, वह यह है : ‘क्या ये घटित होते हैं?’ पुराने नियम का लिपिबद्ध वृतान्त का एक बड़ा भाग इस्राएलियों का इतिहास है, इस तरह हम उनके इतिहास को जानते हैं। साथ ही हमारे पास पुराने नियम से बाहर का ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्मारकों का लिपिबद्ध वृतान्त पाया जाता है। वे सभी के सभी इस्राएलियों या यहूदियों के इतिहास के एक स्थाई चित्र को प्रस्तुत करते हैं। इस यहाँ पर समय रेखा के द्वारा दिया गया है। आप स्वयं पढ़ें और आंकलन करें कि क्या मूसा के श्राप पूरे हुए हैं या नहीं। यह साथ ही इस बात का भी उत्तर देता है, कि क्यों यहूदी समूह 2700 वर्षों पहले से आरम्भ होते हुए भारत में स्थानान्तरित हुए थे (उदाहरण के लिए मिजोरम के बेन मनश्शे)। वे अश्शूरी और बेबीलोन क विजयी अभियानों के परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर पूरे भारत में बिखर गए – ठीक वैसे ही जैसा मूसा ने चेतावनी दी थी।

मूसा की आशीषों और श्रापों का निष्कर्ष

मूसा के अन्तिम वचन श्रापों के साथ अन्त नहीं होते हैं। यहाँ पर दिया गया है, कि कैसे मूसा ने अपनी अन्तिम घोषणाओं को दिया था।

फिर जब आशीष और शाप की ये सब बातें जो मैं ने तुझ को कह सुनाई हैं तुझ पर घटें, और तू उन सब जातियों के मध्य में रहकर, जहाँ तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बरबस पहुँचाएगा, इन बातों को स्मरण करे, और अपनी सन्तान सहित अपने सारे मन और सारे प्राण से अपने परमेश्वर यहोवा की ओर फिरकर उसके पास लौट आए, और इन सब आज्ञाओं के अनुसार जो मैं आज तुझे सुनाता हूँ उसकी बातें माने; तब तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को बन्धुआई से लौटा ले आएगा, और तुझ पर दया करके उन सब देशों के लोगों में से जिनके मध्य में वह तुझ को तित्तर बित्तर कर देगा फिर इकट्ठा करेगा। चाहे धरती के छोर तक तेरा बरबस पहुँचाया जाना हो, तौभी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझ को वहाँ से ले आकर इकट्ठा करेगा। और तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे उसी देश में पहुँचाएगा जिसके तेरे पुरखा अधिकारी हुए थे, और तू फिर उसका अधिकारी होगा; और वह तेरी भलाई करेगा, और तुझ को तेरे पुरखाओं से भी गिनती में अधिक बढ़ाएगा। (व्यवस्थाविवरण 30:1-5)

हजारों वर्षों तक निर्वासित रहने के पश्चात्, 1948 में – जिनमें से आज भी कई लोग जीवित हैं, उनके जीवनकाल में ही – इस्राएल का आधुनिक राष्ट्र को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के द्वारा पुन: स्थापित किया गया और यहूदियों ने संसार के चारों ओर से इसमें फिर से वापस लौटना आरम्भ कर दिया – ठीक वैसे ही जैसे मूसा ने भविष्यद्वाणी की थी। भारत में आज, कोचीन, आन्ध्रा प्रदेश और मिजोरम में रहने वाली हजारों वर्षों पुराना यहूदी समाज तेजी से घटते जा रहा है, क्योंकि यहूदी अपने पूर्वजों की भूमि में वापस लौट रहे हैं। भारत में केवल 5000 यहूदी ही बच गए हैं। हमारी आँखों के सामने ही मूसा की आशीषें पूरी हो रही हैं, निश्चित रूप से श्रापों ने उनके इतिहास को निर्मित किया था।

हमारे लिए इसके कई निहितार्थ पाए जाते हैं। प्रथम, आशीषों और श्रापों ने अपने अधिकार और सामर्थ्य को बाइबल के परमेश्‍वर से प्राप्त किया था। मूसा मात्र एक आत्म जागृत व्यक्ति – एक ऋषि था। सच्चाई तो यह है, कि ये आशीष और श्राप हजारों वर्षों तक आते हुए, पूरे संसार की जातियों में विस्तारित होती हैं, और इनके द्वारा करोड़ों लोगों को प्रभावित करना (यहूदियों के इस्राएल में वापस लौटने ने उथल पुथल को उत्पन्न कर दिया है – ये नियमित रूप से वैश्विक सुर्खियाँ बनाने वाली घटनाओं का कारण बन रही हैं) यह प्रमाण है, कि परमेश्‍वर के पास सामर्थ्य और अधिकार है, जिसकी पुष्टि बाइबल (वेद पुस्तक) करती है कि उसके पास है। उसी तोराह में उसने साथ ही यह प्रतिज्ञा भी की है कि पृथ्वी के सभी लोग आशीष पाएँगे। ‘पृथ्वी के सभी लोगों’ में आप और मैं भी सम्मिलित हैं। इसके पश्चात् अब्राहम के पुत्र के बलिदान में, परमेश्‍वर पुनः पुष्टि करता है कि ‘सभी जातियाँ आशीष पाएँगी’। इस बलिदान का अद्भुत स्थान और वर्णन हमें इस बात को जानने में सुराग देते हुए सहायता प्रदान करता है कि इस आशीष को कैसे प्राप्त किया जाए। आशीष को अब मिजोरम, आन्ध्रा प्रदेश और केरल से लौटने वाले यहूदियों के ऊपर उण्डेल दिया गया, जो एक ऐसा चिन्ह है, कि परमेश्‍वर जैसा कि उसने अपने वचन में प्रतिज्ञा की है, भारत के सभी राज्यों और इस संसार की अन्य सभी जातियों में समान रूप से आशीष को दे सकता और देना चाहता है। यहूदियों की तरह ही, हम भी हमारे श्राप के मध्य में आशीषों को दिए जाने की प्रस्ताव दिया गया है। क्यों नहीं आशीष के इस वरदान को प्राप्त किया जाए?

क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है?

परमेश्‍वर ने इतिहास में कैसे कार्य किया को वर्णित करते हुए बाइबल आत्मिक सत्यों को प्रदान करती है। यह वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ परमेश्‍वर ने मनुष्य की सृष्टि अपने स्वरूप में की और फिर प्रथम मनुष्य का सामना किया और एक बलिदान के लिए बोला जो आने वाला था और जिसका बलिदान होगा। इसके पश्चात् ऋषि अब्राहम के पुत्र के स्थान पर एक मेढ़े के बलिदान की विशेष घटना और ऐतिहासिक फसह की घटना घटित हुई। यह प्राचीन ऋग वेद के सामान्तर चलता है जहाँ पर हमारे पापों के लिए बलिदान की मांग की गई है और यह प्रतिज्ञा दी गई है कि यह पुरूषा के बलिदान के साथ प्रगट होगा। ये प्रतिज्ञाएँ प्रभु यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के जीवन, शिक्षाएँ, मृत्यु एवं पुनरूत्थान से पूरी हो गई। परन्तु प्रतिज्ञाएँ और पूर्णताएँ ऐतिहासिक हैं। इसलिए, यदि बाइबल को आत्मिक सत्यों को प्रदान करने के लिए सत्य होना हो तो इसे ऐतिहासिक रूप से विश्‍वसनीय भी होना चाहिए। यह हमें हमारे किए हुए प्रश्न की ओर ले जाता है : क्या बाइबल (वेद पुस्तक) साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है? और कैसे कोई यह जान सकता है यह है या नहीं?

हम यह कहते हुए आरम्भ करते हैं कि कहीं समय के बीतने के साथ बाइबल का मूलपाठ (के शब्द) कहीं परिवर्तित तो नहीं हो गए हैं। जिसे साहित्यिक विश्‍वसनीयता  से जाना जाता है, यह प्रश्न इसलिए उठता है क्योंकि बाइबल अत्यधिक प्राचीन है। बहुत सी पुस्तकें हैं जिनसे मिलकर बाइबल का निर्माण हुआ है, और सबसे अन्तिम पुस्तक लगभग दो हज़ार वर्षों पहले लिखी गई थी। अधिकांश मध्यवर्ती सदियों में छपाई, फोटोकॉपी मशीन या प्रकाशन कम्पनियों की कोई सुविधा नहीं थी। इसलिए इन पुस्तकों को हाथों के द्वारा लिखा जाता था, एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी के आने पर, भाषाएँ समाप्त होती गई और नई भाषाएँ आती गईं, साम्राज्य परिवर्तित होते गए और नई शक्तियाँ आती गईं। क्योंकि मूल पाण्डुलिपियाँ बहुत पहले ही लोप हो गई थीं, इसलिए हम कैसे यह जान सकते हैं कि आज हम बाइबल में जो कुछ पढ़ते हैं उसे वास्तव में मूल लेखकों ने ही बहुत पहले लिखा था?क्या यह जानने के लिए कोई ‘वैज्ञानिक’ तरीका है कि जिसे आज हम पढ़ते हैं वह बहुत पहले लिखे हुए मूल लेखों जैसा ही है या भिन्न है?

साहित्यिक आलोचना के सिद्धान्त

यह प्रश्न किसी भी प्राचीन लेख के लिए सत्य है। नीचे दिया हुआ आरेख उस प्रक्रिया को चित्रित करता है जिसमें अतीत के सभी प्राचीन लेखों को समय के व्यतीत होने के साथ सुरक्षित रखा जाता था ताकि हम उन्हें आज पढ़ सकें। नीचे दिया हुआ आरेख 500 ईसा पूर्व (इस तिथि को केवल एक उदाहरण को दर्शाने के लिए चुना गया है) के एक प्राचीन दस्तावेज के उदाहरण को प्रदर्शित करता है।

समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।
समयरेखा का उदाहरण यह प्रदर्शित करता है कि कैसे मूलपाठ समय में से होकर चलता है।

मौलिक रूप अनिश्चितकाल तक के लिए नहीं रहता है, इसलिए इससे पहले की यह नष्ट होने लगे, खो जाए, या नाश हो जाए, एक पाण्डुलिपि (पाण्डु लि) की प्रतिलिपि तैयार कर ली जाती है (1ली प्रतिलिपि)।अनुभवी व्यक्ति की एक श्रेणी जिन्हें शास्त्री कह कर पुकारा जाता है प्रतिलिपि को बनाने का कार्य करते हैं। जैसे जैसे समय व्यतीत होता है, प्रतिलिपियों से और प्रतिलिपि (2री प्रतिलिपि और 3री प्रतिलिपि) तैयार की जाती है। किसी समय पर एक प्रतिलिपि को संरक्षित कर लिया जाता है जो कि आज भी अस्तित्व में है (3री प्रतिलिपि)। हमारे उदाहरण दिए हुए आरेख में इस अस्तित्व में पड़ी हुई प्रतिलिपि को 500 ईसा पूर्व में बनाया हुआ दिखाया गया है। इसका अर्थ है कि जितना अधिक पहले के मूलपाठ के दस्तावेज की अवस्था को हम जानते हैं वह केवल 500 ईसा पूर्व या इसके बाद का है क्योंकि इसके पहले की सभी पाण्डुलिपियाँ लोप हो गई हैं। 500 ईसा पूर्व से 500 ईस्वी सन् के मध्य के 1000 वर्ष (जिन्हें आरेख में x के चिन्ह से दिखाया गया है) वह अवधि है जिसमें हम किसी भी प्रतिलिपि की जाँच नहीं कर सकते हैं क्योंकि सभी पाण्डुलिपियाँ इस अवधि में लोप हो गई हैं। उदाहरण के लिए, यदि प्रतिलिपि बनाते समय कोई त्रुटि (अन्जाने में या जानबूझकर) हुई है जिस समय 2री प्रतिलिपि को 1ली प्रतिलिपि से बनाया जा रहा था, तो हम उसका पता  लगाने के लिए सक्षम नहीं होंगे क्योंकि इनमें से कोई भी दस्तावेज अब एक दूसरे से तुलना करने के लिए उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध प्रतिलिपियों (x अवधि) की उत्पति होने से पहले की यह समयावधि इसलिए साहित्यिक अनिश्चितता का अन्तराल है। परिणामस्वरूप, एक सिद्धान्त जो साहित्यिक विश्‍वसनीयता के बारे में हमारे प्रश्न का उत्तर देता है वह यह है कि जितना अधिक छोटा यह अन्तराल x होगा उतना अधिक हम हमारे आधुनिक दिनों में दस्तावेज के सटीक रूप से संरक्षण में अपनी विश्‍वसनीयता को रख सकते हैं, क्योंकि अनिश्चयता की अवधि कम हो जाती है।

इसमें कोई सन्देह नहीं है, कि आज अक्सर एक पाण्डुलिपि की एक से ज्यादा दस्तावेज की प्रतिलिपि अस्तित्व में है। मान लीजिए हमारे पास इस तरह की दो पाण्डुलिपियों की प्रतिलिपियाँ हैं और हम उन दोनों के एक ही भाग में इस निम्नलिखित वाक्यांश को पाते हैं (मैं इसे अंग्रेजी में उदाहरण के कारण लिख रहा हूँ, परन्तु वास्तविक पाण्डुलिपि यूनानी, लैटिन या संस्कृत जैसी भाषाओं में होगी):

कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कुछ पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

मूल लेख में या तो सुरेश के बारे में लिखा है या फिर सुमेश के बारे लिखा है, और बाकी के इन अन्य पाण्डुलिपियों में प्रतिलिपि बनाते समय त्रुटि पाई जाती है। प्रश्न यह उठता है – कि इनमें से किस में त्रुटि पाई जाती है?उपलब्ध प्रमाण से इसे निर्धारित करना अत्यन्त कठिन है।

अब मान लीजिए हमने एक ही लेख की दो से अधिक पाण्डुलिपियों को प्राप्त किया है, जैसा कि नीचे दिखाया गया है:

कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता
कई पाण्डुलिपियों के साथ साहित्यिक भिन्नता

 

 

अब यह तार्किक परिणाम निकालना आसान है कि किस पाण्डुलिपि में त्रुटि है। अब यह सम्भावना ज्यादा है कि त्रुटि एक बार हुई हो, इसकी अपेक्षा की एक ही जैसी त्रुटि की तीन बार पुनरावृत्ति हुई हो, इसलिए यह सम्भावना अधिक है पाण्डुलिपि #2 की प्रतिलिपि में त्रुटि हो, और लेखक सुरेश  के बारे में लिख रहा हो, न कि सुमेश के बारे में।

यह सरल उदाहरण दर्शाता है कि एक दूसरा सिद्धान्त जिसे हम पाण्डुलिपि के साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय होने की जाँच के लिए उपयोग कर सकते हैं वह:जितनी ज्यादा प्रचलित पाण्डुलिपियाँ हैं जो उपलब्ध हैं, उतना ही अधिक मूल लेख के शब्दों की सही त्रुटियों को पता लगाना और सही करना और निर्धारित करना आसान होता है।

पश्चिम की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

हमारे पास बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता को निर्धारित करने के लिए दो संकेतक हैं:

  1. वास्तविक संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपियों के मध्य में समय को मापना, और
  2. प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि के सँख्या की गणना करना।

क्योंकि ये संकेतक किसी भी प्राचीन लेख के ऊपर लागू होते हैं इसलिए हम इनका उपयोग दोनों अर्थात् बाइबल और साथ ही साथ अन्य प्राचीन लेखों के ऊपर लागू कर सकते हैं, जैसा कि नीचे दी हुई तालिकाओं में दिया हुआ है।

लेखककब लिखा गयाप्रारम्भिक प्रतिलिपिसमय की अवधि#
 कैसर50 ई. पूर्व900 ई. सन्95010
प्लेटो अर्थात् अफलातून350 ई. पूर्व900 ई. सन्12507
अरस्तू*300 ई. पूर्व1100 ई. सन्14005
थियूसीडाईडस400 ई. पूर्व900 ई. सन्13008
हेरोडोटस400 ई. पूर्व900 ई. सन्13008
सैफोक्लेस400 ई. पूर्व1000 ई. सन्1400100
टाईटस100 ई. सन्1100 ई. सन्100020
पिल्नी100 ई. सन्850 ई. सन्7507

ये लेखक पश्चिमी इतिहास के प्रमुख शास्त्रीय लेखन – अर्थात् ऐसे लेख जिनका विकास पश्चिमी सभ्यता के विकास के साथ निर्मित हुआ को प्रस्तुत करते हैं। औसत दर पर, उन्हें हम तक 10-100 पाण्डुलिपियों के रूप में एक से दूसरी पीढ़ी के द्वारा पहुँचाया गया है जिन्हें मूल लेख के लिखे जाने के पश्चात् लगभग 1000 वर्षों के पश्चात् आरम्भ करते हुए संरक्षित किया गया था।

पूर्व की महान् पुस्तकों की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम प्राचीन संस्कृति के महाकाव्यों को देखें जो हमें दक्षिण एशिया के इतिहास और दर्शन के ऊपर बहुत अधिक समझ को प्रदान करते हैं। इन लेखों में सबसे प्रमुख महाभारत के लेख हैं, जिनमें अन्य लेखों के साथ ही, भगवद् गीता और कुरूक्षेत्र की लड़ाई का वृतान्त भी सम्मिलित है। विद्वान आंकलन करते हैं कि महाभारत का विकास इसके आज के लिखित स्वरूप में लगभग 900 ईसा पूर्व से हुआ, परन्तु सबसे से प्राचीन पाण्डुलिपि के आज भी अस्तित्व में पाए जाने वाले अंश लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास मूल संकलन और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि से लगभग 500 वर्षों के अन्तराल को देते हुए पाए जाते हैं (संदर्भ के लिए विकी का लिंक)। हैदराबाद की उस्मानिया विश्‍वविद्यालय गर्व से कहता है कि उसके पुस्तकालय में दो पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ पड़ी हुई हैं, परन्तु इन दोनों की तिथि केवल 1700 ईस्वी सन् और 1850 ईस्वी सन् है – जो कि मूल संकलन (संदर्भ लिंक) के हज़ारों वर्षों के पश्चात् की हैं। न केवल पाण्डुलिपि प्रतिलिपियाँ बाद की तिथि की हैं, अपितु यह जानकारी कि महाभारत  एक लोकप्रिय लेखन कार्य था यह इसकी भाषा और शैली में परिवर्तन की पुष्टि करता है, इसमें और प्रचलित पाण्डुलिपि की प्रतिलिपि में बहुत ही उच्च श्रेणी की साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है। विद्वान जो यह आंकलन लगाते हैं कि महाभारत में लिखी हुई साहित्यिक भिन्नता ऐसे व्यक्त करती है:

“भारत का राष्ट्रीय महाकाव्य, महाभारत, ने तो बहुत ही ज्यादा भ्रष्टता का सामना किया है। यह लगभग…250 000 पँक्तियों का है। इनमें से, कोई 26 000 पँक्तियों में साहित्यिक भ्रष्टता (10 प्रतिशत) पाई जाती है”– (गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1968. पृ 367)

अन्य महान् महाकाव्य, रामायण  है, जो लगभग 400 ईसा पूर्व के आसपास संकलित हुआ था परन्तु इसकी प्रारम्भिक प्रचलित प्रतिलिपि, नेपाल से आई है, जिसकी तिथि 11 ईस्वी सन् की सदी पाई जाती है (संदर्भ लिंक) –जो मूल संकलन से लगभग 1500 वर्षों के आसपास पाई जाने वाली प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि में अन्तराल को देती है। रामायण की अब कई हज़ारों प्रचलित प्रतिलिपियाँ पाई जाती हैं। इनमें आपस में ही व्यापक साहित्यिक भिन्नता पाई जाती है, विशेषकर उत्तर भारत और दक्षिण भारत/दक्षिण पूर्वी एशिया के मध्य में। विद्वानों ने इन साहित्यिक विभिन्नताओं के कारण इन पाण्डुलिपियों को 300 भिन्न समूहों में वर्गीकृत किया है।

नए नियम की साहित्यिक आलोचना

आइए अब हम बाइबल के लिए पाण्डुलिपि आधारित तथ्य की जाँच करें। नीचे दी हुई तालिका नए नियम की सबसे प्राचीनत्तम प्रतिलिपियों को सूचीबद्ध करती है। इनमें से प्रत्येक का एक नाम दिया गया है (अक्सर पाण्डुलिपि को खोजकर्ता के नाम के ऊपर)

पाण्डुलिपिकब लिखी गईपाण्डुलिपि की तिथिसमय की अवधि
 जॉन राएलॉन90 ई. सन्130 ई. सन्40 yrs
बोड़मेर पपाईरस90 ई. सन्150-200 ई. सन्110 yrs
चेस्टर बेट्टी60 ई. सन्200 ई. सन्20 yrs
कोड्डक्स वेटीकानुस60-90ई. सन्325 ई. सन्265 yrs
कोड्डक्स

सिनाटिक्स

60-90 ई. सन्350 ई. सन्290 yrs

नए नियम की पाण्डुलिपियाँ सँख्या में इतनी अधिक हैं कि उन सभी को एक ही तालिका में सूचीबद्ध करना अत्यन्त ही कठिन होगा। जैसा कि एक विद्वान जिसने इस विषय के ऊपर अध्ययन करने के लिए कई वर्षों के समय को व्यतीत किया ने व्यक्त किया है:

“हमारे पास आज नए नियम के अंशों की24000 पाण्डुलिपि से अधिक प्रतिलिपियों के अंश पाए जाते हैं… प्राचीन काल का कोई भी दस्तावेज इतनी अधिक सँख्या और प्रामाणिकता की पहुँच से आरम्भ नहीं होता है। इसकी तुलना में कवि होमर लिखित इलियड है जो 643 पाण्डुलिपियों के साथ दूसरे स्थान पर आज भी अस्तित्व में है।” मैक्डावेल, जे. प्रमाण जो न्याय की मांग करते हैं. 1979. पृ. 40)

ब्रिट्रिश संग्रहालय का एक अग्रणी विद्वान यह पुष्टि करता है कि:

“विद्वान एक बड़ी सीमा तक संतुष्ट हैं कि मुख्य यूनानी और रोमन लेखक अपने मूलपाठ में सच्चे थे…तौभी उनके लेखनकार्य के प्रति हमारा ज्ञान केवल कुछ थोड़ी सी ही पाण्डुलिपियों के ऊपर आधारित हैं जबकि नए नियम की पाण्डुलिपियों की गणना…हज़ारों के द्वारा हुई है” (केन्योन, एफ. जी. – ब्रिट्रिश संग्रहालय का पूर्व निदेशक – हमारी बाइबल और प्राचीन पाण्डुलिपि. 1941 पृ. 23)

और इन पाण्डुलिपियों की एक निश्चित सँख्या अत्यन्त ही प्राचीन है। मेरे पास प्रारम्भिक नए नियम के दस्तावेजों के बारे में एक पुस्तक है। इसका परिचय इस तरह से आरम्भ होता है:

“यह पुस्तक प्रारम्भिक नए नियम की 69 पाण्डुलिपियों का लिप्यंतरण…2री सदी से आरम्भ करती हुई 4थी सदी (100-300 ईस्वी सन्) के आरम्भ तक…नए नियम के मूलपाठ का लगभग 2/3 हिस्से को उपलब्ध कराती है” (पृ. सांत्वना, नए नियम की यूनानी पाण्डुलिपि के प्रारम्भिक मूलपाठ”. प्रस्तावना पृ. 17. 2001)

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि ये पाण्डुलिपियाँ आरम्भिक अवधि से निकल कर आई हैं जब सुसमाचार के अनुयायी सरकारी शक्ति में नहीं थे, अपितु इसकी अपेक्षा रोमी साम्राज्य के द्वारा तीव्र सताव के अधीन थे। यह वह अवधि थी जब सुसमाचार दक्षिण भारत, के केरल में आया, और यहाँ भी सुसमाचार के अनुयायियों के समाज के पास किसी भी तरह से सरकारी शक्ति नहीं थी जिससे की कोई राजा पाण्डुलिपियों के साथ किसी तरह की कोई चालाकी कर सकता। नीचे दिया हुआ आरेख पाण्डुलिपियों के उस अवधि को दर्शाता है जिस पर बाइबल का नया नियम आधारित है।

समयरेखा यह दिखा रही है कि नए नियम की 24000 प्रचलित पाण्डुलिपियों में से, सबसे प्रारम्भिक वाली को उपयोग आधुनिक अनुवादकों ने (उदाहरण, अंग्रेजी, नेपाली या हिन्दी) बाइबल के लिए किया है। यह कॉन्स्टेनटाईन (325 ईस्वी सन्) के समय से पहले से आई हैं जो रोम का पहला मसीही सम्राट था।

इन सभी हज़ारों पाण्डुलिपियों के मध्य में अनुमानित साहित्यिक भिन्नता केवल

“20000 में से 400 पँक्तियाँ हैं।”(गिज़लेर, एन एल और डब्ल्यू ई निक्स. बाइबल का एक सामान्य परिचय. मूडी प्रेस. 1988. पृ 366)

इस तरह से मूलपाठ इन सभी पाण्डुलिपियों से 99.5%  मेल खाता है।

पुराने नियम की साहित्यिक आलोचना

ऐसा ही कुछ पुराने नियम के साथ में है। पुराने नियम की 39 पुस्तकें 1500-400 ईसा पूर्व के मध्य में लिखी गई थीं। यह नीचे दिए हुए आरेख में दिखाई गई हैं जहाँ पर वह अवधि जिसमें मूल पुस्तकें लिखी गईं को समयरेखा के ऊपर एक दण्ड के रूप में दिखाया गया है। हमारे पास पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की दो श्रेणियाँ हैं। पाण्डुलिपियों की पारम्परिक श्रेणी मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ है जिन्हें लगभग 900 ईस्वी सन् में प्रतिलिपित किया गया था। तथापि 1948 में पुराने नियम की पाण्डुलिपियों की एक और श्रेणी जो इससे भी अधिक प्राचीन है – अर्थात् 200 ईसा पूर्व से है और जिसे मृतक सागर कुण्डल पत्र (मृ सा कुं पत्र) कह कर पुकारा जाता है की खोज हुई। यह दोनों पाण्डुलिपियों की श्रेणियाँ आरेख में दिखाई गई हैं। सबसे अधिक जो आश्चर्यजनक है वह यह है कि भले ही ये समय के एक लम्बे अन्तराल लगभग 1000 वर्षों का अन्तर रखती हैं, इनके मध्य में भिन्नता लगभग न के बराबर है। जैसा कि एक विद्वान ने इनके बारे में ऐसा कहा है:

‘ये[मृ सा कुं पत्र]मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ की सटीकता की पुष्टि करते हैं…केवल कुछ ही उदाहरणों को छोड़कर जहाँ पर मृतक सागर कुण्डल पत्रों और मासोरेट्टिकवादी मूलपाठ के मध्य में वर्तनी और व्याकरण की भिन्नता पाई जाती है, ये दोनों आश्चर्यजनक रूप से एक जैसे हैं’ (ऐम. और. नॉर्टन, बाइबल की उत्पत्ति में पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ)

उदाहरण के लिए, जब हम इसे रामायण की साहित्यिक भिन्नता के साथ तुलना करते हैं, तो पुराने नियम के मूलपाठ का स्थायित्व बड़ी सरलता से ही उल्लेखनीय रूप में पाया जाता है।

यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।
यह समयरेखा दिखा रही है कि बाइबल के पुराने नियम की पाण्डुलिपियाँ मासोरेट्टिकवादी से मृतक सागर कुण्डल पत्र में परिवर्तित नहीं हुई हैं यद्यपि यह एक दूसरे से लगभग 1000 वर्षों के अन्तराल पर हैं ।

सारांश: बाइबल साहित्यिक रूप से विश्‍वसनीय है

अब हम इस तथ्य से क्या सारांश निकाल सकते हैं? निश्चित रूप से कम से कम हम निष्पक्षता से यह गणना कर सकते हैं (पाण्डुलिपियों की सँख्या की मात्रा, मूल और प्रारम्भिक प्रचलित पाण्डुलिपि के मध्य में समय की अवधि, और पाण्डुलिपियों के मध्य में साहित्यिक भिन्नता का स्तर) कि बाइबल किसी भी अन्य प्राचीन लेखन कार्य की अपेक्षा बड़े उच्च स्तर में सत्यापित होती है। यह निर्णय जो हमें प्रमाणों सहित आगे की ओर बढ़ाता है अपने सर्वोत्तम रूप में निम्नलिखित अभिव्यक्ति के द्वारा प्रगट किया है:

नए नियम के अनुप्रमाणित मूलपाठ के प्रति सन्देहवादी होना शास्त्रीय प्राचीनता को अस्पष्टता में खो देना है, क्योंकि प्राचीन समयकाल के किसी भी दस्तावेज के संदर्भग्रन्थ की उतनी अच्छी पुष्टि नहीं हुई है जितनी अच्छी नया नियम की हुई है” (मोन्टागोमरी, मसीहियत का इतिहास. 1971, पृ. 29)

वह जो कुछ कह रहा है उसे तर्कयुक्त होना चाहिए, यदि हम बाइबल की साहित्यिक विश्‍वसनीयता के ऊपर सन्देह करें तब हम साथ ही उस सब का इन्कार कर देंगे जिसे हम इतिहास के बारे में सामान्य रूप से जानते हैं – और इसे किसी भी सूचित इतिहासकार ने कभी नहीं किया है। हम जानते हैं कि बाइबल का मूलपाठ कभी भी परिवर्तित नहीं हुआ है जबकि सदियाँ, भाषाएँ और साम्राज्य आए और गए जबकि प्रारम्भिक पाण्डुलिपियाँ इन सभी घटनाओं से पहले की तिथि की हैं। बाइबल एक विश्‍वसनीय पुस्तक है।

योम किप्पुर – वास्तविकता में दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा (या दुर्गोस्तव) दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में आश्विन (अश्विनी) महीने में 6-10 दिनों तक मनाया जाता है। यह असुर महिषासुर के विरुद्ध एक प्राचीन लड़ाई में देवी दुर्गा के विजयी होने के स्मरण में मनाया जाता है। बहुत से भक्तों को यह एहसास नहीं है कि यह उससे भी अधिक प्राचीन त्योहार योम किप्पुर (या प्रायश्चित का दिन) के साथ मेल खाता है, जो 3500 वर्ष पहले आरम्भ हुआ था और इब्रानी वर्ष के चन्द्रमा आधारित पंचांग के सातवें महीने के 10 वें दिन मनाया जाता है। ये दोनों त्यौहार प्राचीन हैं, दोनों एक ही दिन (अपने सम्बन्धित पंचांग के अनुसार आते हैं। हिन्दू और इब्रानी पंचांग में विभिन्न वर्षों में अतिरिक्त लीप-के-महीने होते हैं, इसलिए वे सदैव पश्चिमी पंचांग से मेल नहीं खाते हैं, परन्तु वे दोनों सदैव सितंबर-अक्टूबर में आते हैं), में बलिदान को सम्मिलित करते हैं, और दोनों ही बड़ी विजय को स्मरण करते हुए उत्सव को मनाते हैं। दुर्गा पूजा और योम किप्पुर के बीच समानताएं आश्चर्यचकित करने वाली हैं। कुछ अन्तर समान रूप से उल्लेखनीय हैं।

प्रायश्चित के दिन का परिचय

फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए
मूसा और उसके भाई हारून ने इस्राएलियों (इब्रानी या यहूदी) का नेतृत्व किया और यीशु के आने से लगभग 1500 वर्षों पहले व्यवस्था को प्राप्त किया।

हमने देखा कि श्री मूसा ने इस्राएलियों (इब्रानियों या यहूदियों) को गुलामी से बाहर निकाला और कलियुग में इस्राएलियों का मार्गदर्शन देने के लिए दस आज्ञाओं को प्राप्त किया। ये दस आज्ञाएँ बहुत अधिक कठोर थी, जिनका पालन करना पाप द्वारा प्रलोभित एक व्यक्ति के लिए असंभव था। इन आज्ञाओं को एक विशेष सन्दूक में रखा गया था, जिसे वाचा का सन्दूक कहा जाता था। वाचा का सन्दूक  एक विशेष मंदिर में था जिसे महा पवित्र स्थान  कहा जाता था। 

मूसा के भाई हारून और उसके वंशज याजक अर्थात् पुरोहित थे, जो इस मंदिर में लोगों के पापों का प्रायश्चित करने या उन्हें ढकने के लिए बलिदान दिया करते थे। योम किप्पुर – प्रायश्चित के दिन  विशेष बलिदानों को चढ़ाया जाता था। आज ये हमें गहरी शिक्षा देते हैं, और हम दुर्गा पूजा के समारोहों के साथ प्रायश्चित के दिन (योम किप्पुर) की तुलना करके बहुत कुछ सीख सकते हैं। 

प्रायश्चित का दिन और बलि का बकरा

इब्रानी वेद, अर्थात् आज की बाइबल ने मूसा के समय से प्रायश्चित के दिन  के बलिदानों और अनुष्ठानों के बारे में सटीक निर्देश दिए हैं। हम देखते हैं कि ये निर्देश कैसे शुरू होते हैं:

हारून के दो पुत्र यहोवा को सुगन्ध भेंट चढ़ाते समय मर गए थे। फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपने भाई हारून से बात करो कि वह जब चाहे तब पर्दे के पीछे महापवित्र स्थान में नहीं जा सकता है। उस पर्दे के पीछे जो कमरा है उसमें पवित्र सन्दूक रखा है। उस पवित्र सन्दूक के ऊपर उसका विशेष ढक्कन लगा है। उस विशेष ढक्कन के ऊपर एक बादल में मैं प्रकट होता हूँ। यदि हारून उस कमरे में जाता है तो वह मर जायेगा!

लैव्यव्यवस्था 16:1-2

प्रधान पुरोहित अर्थात् महायाजक हारून के दो पुत्रों की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने अनादर के साथ मंदिर के महा पवित्र स्थान  में प्रवेश किया था जहाँ यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति थी। उस पवित्र उपस्थिति में दस आज्ञाओं को पूरी तरह से निभाने में उनकी विफलता के परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हुई।

इसलिए पूरे वर्ष में एकमात्र  उसी विशेष दिन के लिए सावधानीपूर्वक निर्देश दिए गए, जब महायाजक महा पवित्र स्थान – में प्रायश्चित के दिन  प्रवेश कर सकता था। यदि वह किसी अन्य दिन में प्रवेश करता, तो वह मर जाता। परन्तु इस दिन भी, इससे पहले कि महायाजक वाचा के सन्दूक  की उपस्थिति में प्रवेश करे, उसे यह करना पड़ता था:

“पाप से निस्तार के दिन पवित्र स्थान में जाने के पहले हारून को पापबलि के रूप में एक बछड़ा और होमबलि के लिए एक मेढ़ा भेंट करना चाहिए। हारून अपने पूरे शरीर को पानी डालकर धोएगा। तब हारून इन वस्त्रों को पहनेगा: हारून पवित्र सन के वस्त्र पहनेगा। सन के निचले वस्त्र शरीर से सटे होगें। उसकी पेटी सन का पटुका होगी। हारून सन की पगड़ी बाँधेगा। ये पवित्र वस्त्र हैं।

लैव्यव्यवस्था 16:3-4

सप्तमी के दिन दुर्गा पूजा के समय, दुर्गा को प्राण प्रतिष्ठा  करके मूर्तियों में आने के लिए आह्वान किया जाता है और मूर्ति को स्नान कराया जाता है और उसे कपड़े पहनाए जाते हैं। योम किप्पुर में भी स्नान किया जाना सम्मिलित था परन्तु यह महायाजक था जो स्नान करता था और महा पवित्र स्थान में प्रवेश करने के लिए तैयार होता था न कि देवता। यहोवा परमेश्वर को आने के लिए आह्वान करना अनावश्यक था – क्योंकि उसकी उपस्थिति पूरे वर्ष में महा पवित्र स्थान में बनी रहती थी। इसकी अपेक्षा आवश्यकता इस उपस्थिति से मिलने के लिए तैयार रहने की थी। स्नान करने और कपड़े पहनने के बाद महायजाक को बलिदान के लिए जानवरों को लाना पड़ता था।

“हारून को इस्राएल के लोगों से दो बकरे पापबलि के रूप में और एक मेढ़ा होमबलि के लिए लेना चाहिए। तब हारून बैल की पापबलि चढ़ाएगा। यह पापबलि उसके अपने लिए और उसेक परिवार के लिए है। तब हारून वह उपासना करेगा जिसमें वह और उसका परिवार शुद्ध होंगे।

लैव्यव्यवस्था 16:5-6

हारून के अपने पापों को ढकने या प्रायश्चित करने के लिए एक मेढ़े या बैल का बलिदान करना पड़ता था। दुर्गा पूजा के समय में भी कभी-कभी बैल या बकरे की बलि दी जाती है। योम किप्पुर के लिए महायाजक को अपने पाप को ढकने के लिए बैल का बलिदान दिया जाना एक विकल्प नहीं था। यदि महायाजक अपने पाप को बैल के बलिदान के साथ नहीं ढकता है तो वह मर जाएगा।

फिर तुरन्त बाद, याजक अर्थात् पुरोहित दो बकरियों के बलिदान दिए जाने का उल्लेखनीय अनुष्ठान करता है।

“इसके बाद हारून दो बकरे लेगा और मिलापवाले तमबू के द्वार पर यहोवा के सामने लाएगा। हारून दोनों बकरों के लिए चिट्ठी डालेगा। एक चिट्ठी यहोवा के लिए होगी। दूसरी चिट्ठी अजाजेल के लिए होगी। “तब हारून चिट्ठी डालकर यहोवा के लिए चुने गए बकरे की भेंट चढ़ाएगा। हारून को इस बकरे को पापबलि के लिये चढ़ाना चाहिए।

लैव्यव्यवस्था 16:7-9

एक बार जब बैल को अपने पापों के लिए बलिदान कर दिया जाता था, तब पुरोहित दो बकरियों को ले जाता था और उनके नाम से चिट्ठी डालता था। एक बकरी को बलि का बकरे  के रूप में मनोनीत किया जाता था। दूसरे बकरे को पापबलि के रूप में चढ़ाया जाता था। ऐसा क्यों था?

15 “तब हारून को लोगों के लिए पापबलि स्वरूप बकरे को मारना चाहिए। हारून को बकरे का खून पर्दे के पीछे कमरे में लाना चाहिए। हारून को बकरे के खून से वैसा ही करना चाहिए जैसा बैल के खून से उसने किया। हारून को उस ढक्कन पर और ढक्कन के साने बकरे का खून छिड़कना चाहिए। 16 ऐसा अनेक बार हुआ जब इस्राएल के लोग अशुद्ध हुए। इसलिए हारून इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप से महापवित्र स्थान को शुद्ध करने के लिए उपासना करेगा। हारून को ये काम क्यों करना चाहिए क्योंकि मिलापवाला तम्बू अशुद्ध लोगों के बीच में स्थित है।

लैव्यव्यवस्था 16:15-16

बलि के बकरे का क्या होता था?

20 “हारून महापवित्र स्थान, मिलापवाले तम्बू तथा वेदी को पवित्र बनाएगा। इन कामों के बाद हारून यहोवा के पास बकरे को जीवित लाएगा। 21 हारून अपने दोनों हाथों को जीवित बकरे के सिर पर रखेगा। तब हारून बकरे के ऊपर इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप को कबूल करेगा। इस प्रकार हारून लोगों के पापों को बकरे के सिर पर डालेगा। तब वह बकरे को दूर मरुभूमि में भेजेगा. एक व्यक्ति बगल में बकरे को ले जाने के लिए खड़ा रहेगा। 22 इस प्रकार बकरा सभी लोगों के पाप अपने ऊपर सूनी मरुभूमि में ले जाएगा। जो व्यक्ति बकरे को ले जाएगा वह मरुभूमि में उसे खुला छोड़ देगा।

लैव्यव्यवस्था 16:20-22

बैल का बलिदान हारून के अपने पाप के लिए था। पहले बकरे की बलि इस्राएल के लोगों के पाप के लिए थी। हारून तब अपने हाथों को जीवित बलि के बकरे के ऊपर रखता था और – प्रतीकात्मक रूप से – बलि के बकरे के ऊपर लोगों के पापों को स्थानांतरित कर देता था। फिर इस बकरे को जंगल में एक संकेत के रूप में छोड़ दिया जाता था कि लोगों के पाप अब लोगों से दूर हो गए थे। इन बलिदानों से उनके पापों का प्रायश्चित हो जाता था। यह प्रत्येक वर्ष प्रायश्चित के दिन और केवल उसी दिन किया जाता था। 

प्रायश्चित का दिन और दुर्गा पूजा 

परमेश्वर ने इस त्योहार को प्रत्येक वर्ष इसी दिन में मनाने की आज्ञा क्यों दी? इसका क्या अर्थ था? दुर्गा पूजा उस समय की ओर मुड़कर देखती है जब दुर्गा ने भैंस दानव महिषासुर को पराजित किया था। यह अतीत में हुई एक घटना का स्मरण कराता है। प्रायश्चित के दिन ने भी विजय के स्मरण को मनाया था, परन्तु इस में भविष्यवाणी की गई थी कि यह आने वाले भविष्य  में बुराई के ऊपर होने वाली विजय  की ओर देखना था। यद्यपि वास्तविक पशुओं की बलि दी जाती थी, तौभी वे प्रतीकात्मक ही थे। वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है कि 

क्योंकि साँड़ों और बकरों का लहू पापों को दूर कर दे, यह सम्भव नहीं है।

इब्रानियों 10:4

चूंकि प्रायश्चित के दिन बलिदान वास्तव में पुजारी अर्थात् याजक और भक्तों के पापों को दूर नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें प्रत्येक वर्ष चढ़ाए जाता था? वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है कि

 व्यवस्था का विधान तो आने वाली उत्तम बातों की छाया मात्र प्रदान करता है। अपने आप में वे बातें यथार्थ नहीं हैं। इसलिए उन्हीं बलियों के द्वारा जिन्हें निरन्तर प्रति वर्ष अनन्त रूप से दिया जाता रहता है, उपासना के लिए निकट आने वालों को सदा-सदा के लिए सम्पूर्ण सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा हो पाता तो क्या उनका चढ़ाया जाना बंद नहीं हो जाता? क्योंकि फिर तो उपासना करने वाले एक ही बार में सदा सर्वदा के लिए पवित्र हो जाते। और अपने पापों के लिए फिर कभी स्वयं को अपराधी नहीं समझते।किन्तु वे बलियाँ तो बस पापों की एक वार्षिक स्मृति मात्र हैं।

इब्रानियों 10:1-3

यदि बलिदान पापों को दूर कर सकते, तो उन्हें दोहराने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। परन्तु उन्हें प्रत्येक वर्ष यह दिखाते हुए दोहराया गया कि वे प्रभावी नहीं थे।

परन्तु जब यीशु मसीह (येसु सत्संग) ने स्वयं को बलिदान के रूप में प्रस्तुत किया तो सब कुछ बदल गया।

इसलिए जब यीशु इस जगत में आया था तो उसने कहा था: “तूने बलिदान और कोई भेंट नहीं चाहा,
    किन्तु मेरे लिए एक देह तैयार की है।
तू किसी होमबलि से न ही
    पापबलि से प्रसन्न नहीं हुआ
तब फिर मैंने कहा था,
    ‘और पुस्तक में मेरे लिए यह भी लिखा है, मैं यहाँ हूँ।
    हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करने को आया हूँ।’”

इब्रानियों 10:5-7

वह स्वयं को बलिदान के रूप में प्रस्तुत करने आया था। और जब उसने किया तो

… हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।

इब्रानियों 10:10

दो बकरियों का बलिदान में दिया जाना प्रतीकात्मक रूप से यीशु के द्वारा भविष्य में दिए जाने वाले बलिदान और विजय की ओर संकेत कर रहे थे। क्योंकि उसका बलिदान हुआ इसलिए वह बलिदान का बकरा था। वह साथ ही बलि का बकरा भी था, क्योंकि उसने पूरे संसार के समुदाय के सारे पापों को अपने ऊपर ले लिया और उन्हें हमसे दूर कर दिया, ताकि हम शुद्ध हो सकें।

क्या प्रायश्चित का दिन दुर्गा पूजा का कारण है?

इस्राएल के इतिहास में हमने ध्यान दिया था कि कैसे इस्राएल से निर्वासित लोग भारत में 700 ईसा पूर्व में पहुंचने लगे थे, जिससे भारत की शिक्षा और धर्म में कई योगदान मिले। इन इस्राएलियों ने सातवें महीने के 10 वें दिन प्रत्येक दिन प्रायश्चित के दिन का त्यौहार मनाया होगा। शायद, जिस तरह से उन्होंने भारत की बहुत सारी भाषाओं में योगदान दिया, उसी तरह हो सकता है कि उन्होंने अपने प्रायश्चित के दिन का भी योगदान दिया हो, जोकि कालांतर में दुर्गा पूजा बन गया, जो बुराई पर एक बड़ी विजय का स्मरण था। यह दुर्गा पूजा के प्रति हमारी ऐतिहासिक समझ के साथ मेल खाता है, जिसे लगभग 600 ईसा पूर्व मनाया जाने लगा।

प्रायश्चित के दिन का मनाया जाना कब बन्द हुआ

हमारी ओर से दिया गया यीशु (येसु सत्संग) का बलिदान प्रभावी और पर्याप्त था। क्रूस पर यीशु के बलिदान (33 ईस्वी सन्) के तुरंत बाद, रोमियों ने 70 ईस्वी सन् में महा पवित्र स्थान के साथ मंदिर को नष्ट कर दिया। तब से यहूदियों ने प्रायश्चित के दिन फिर कभी  कोई बलिदान नहीं दिया। आज, यहूदी इस दिन इस त्योहार को उपवास के साथ मनाते हैं। जैसा कि वेद पुस्तक (बाइबल) बताती है, एक बार जब प्रभावी बलिदान को चढ़ा दिया जाता है, तो फिर आगे के लिए वार्षिक बलिदान की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है। इसलिए परमेश्वर ने इसे रोक दिया। 

दुर्गा पूजा और प्रायश्चित के दिन में स्वरूप

दुर्गा पूजा में दुर्गा के स्वरूप को आने के लिए आह्वान किया जाता है ताकि देवी मूर्ति में निवास करें। प्रायश्चित का दिन आने वाले बलिदान का एक पूर्वकथन था और जिस में किसी भी स्वरूप को आने के लिए आह्वान नहीं किया गया था। महा पवित्र स्थान में परमेश्वर अदृश्य था और इस प्रकार उसका कोई स्वरूप नहीं था।

परन्तु प्रभावी होने वाले बलिदान में, आने वाले सैकड़ों वर्षों में कई प्रायश्चितों के दिनों  की ओर संकेत किया गया था, एक स्वरूप का आह्वान किया गया था। जैसा कि वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है

15 वह अदृश्य परमेश्वर का
    दृश्य रूप है।
    वह सारी सृष्टि का सिरमौर है।

कुलुस्सियों 1:15

प्रभावी होने वाले बलिदान में, अदृश्य परमेश्वर के स्वरूप को आमंत्रित किया गया था और उसे यीशु के रूप में दिखाया गया था।

पुर्नमूल्यांकन करना

हम वेद पुस्तक (बाइबल) का अध्ययन कर रहे हैं। हमने देखा है कि कैसे परमेश्वर ने अपनी योजना को प्रकट करने के लिए कई संकेत दिए थे। आरम्भ में उसने आने वाले ‘पुरूष’ की भविष्यद्वाणी की। इसके बाद श्री अब्राहम का बलिदान, फसह का बलिदान और प्रायश्चित का दिन की भी भविष्यद्वाणी की। इस्राएलियों के ऊपर मूसा के आशीर्वाद और शाप बने हुए हैं। जो इस्राएलियों के इतिहास की गति देने के लिए उन्हें पूरे संसार, यहां तक ​​कि भारत में बिखराते हुए स्थापित करेंगे, जैसा कि यहां बताया गया है

दस आज्ञाएँ: कलियुग में कोरोना वायरस की जाँच की तरह

यह आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि हम कलियुग या काली के युग में रह रहे हैं। यह सतयुग, त्रेता युग और द्वापर युग से शुरू होने वाले चार युगों में अन्तिम युग है। इन चार युगों में जो बात सामान्य है वह पहले युग अर्थात् सत्य के युग (सतयुग) से लेकर हमारे अब तक के समकालीन कलियुग के युग तक होने वाला नियमित नैतिक और सामाजिक विघटन है।

महाभारत में मार्कंडेय ने कलियुग में मानव आचरण का वर्णन इस प्रकार किया है:

गुस्सा, क्रोध और अज्ञानता बढ़ेगी   प्रत्येक बीतते दिन के साथ धर्म, सत्यता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, शारीरिक शक्ति और स्मृति कम होती चली जाएगी।

लोगों के पास बिना किसी औचित्य के हत्या के विचार होंगे और वे इसमें कुछ भी गलत नहीं पाएगें।  वासना को सामाजिक रूप से स्वीकार होने के रूप में देखा जाएगा और संभोग को जीवन की केन्द्रीयआवश्यकता के रूप में देखा जाएगा।

  पाप तेजी से बढ़ेगा, जबकि पुण्य फीका पड़ जाएगा और फलने-फूलना बन्द कर देगा।

   लोग नशे और नशीले पदार्थों के आदी हो जाएंगे।

  गुरुओं को अब और अधिक सम्मान नहीं दिया जाएगा और उनके विद्यार्थी ही उन्हें चोट पहुँचाने का प्रयास करेंगे। उनकी शिक्षाओं का अपमान किया जाएगा, और काम वासना के अनुयायी सभी मनुष्यों के मनों को अपने  नियंत्रण में रखेंगे।

 सभी मनुष्य स्वयं को देवता या देवताओं के कृपापात्र घोषित कर देंगे और शिक्षाओं के स्थान पर इसे व्यवसाय बना लेंगे। लोग अब विवाह नहीं करेंगे और केवल यौन सुख प्राप्ति के लिए ही एक दूसरे के साथ रहेंगे।

मूसा और दस आज्ञाएँ

इब्रानी वेदों ने हमारे वर्तमान युग का ठीक उसी तरह वर्णन किया है। पाप करने की हमारी प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर ने मूसा को फसह के तुरन्त बाद मिस्र को छोड़ देने के तुरन्त बाद दस आज्ञाएँ दीं थीं। मूसा का लक्ष्य न केवल इस्राएल को मिस्र से बाहर ले जाने का था, बल्कि उन्हें जीवन जीने के लिए नए तरीके से मार्गदर्शन करने का भी था। इसलिए फसह के पचास दिनों के बाद, जिसने इस्राएलियों को छुटकारा दिया था, मूसा उन्हें सीनै के पर्वत (होरेब की पहाड़ी पर भी) पर ले गया जहाँ उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था को प्राप्त किया। यह व्यवस्था कलियुग में कलियुग की समस्याओं को उजागर करने के लिए प्राप्त हुई थी।

मूसा को क्या आज्ञाएँ मिली? यद्यपि पूरी व्यवस्था बहुत अधिक लम्बी थी, मूसा को सबसे पहले पत्थर की तख्तियों के ऊपर परमेश्वर के द्वारा लिखे गए विशिष्ट नैतिक आदेशों का एक सूची मिली थी, जिसे दस आज्ञाओं  (या दस हुक्म) के रूप में जाना जाता था। इन दस आज्ञाओं ने मिलकर व्यवस्था के सारांश का गठन किया – छोटे विवरणों से पहले नैतिक धर्म – और वे अब परमेश्वर की सक्रिय सामर्थ्य हैं जो हमें कलियुग में सामान्य बुराइयों के लिए पश्चाताप करने के लिए राजी करती हैं।

दस आज्ञाएँ

यहाँ पत्थर पर परमेश्वर के द्वारा लिखित दस आज्ञाओं की पूरी सूची दी गई है, जो मूसा द्वारा इब्रानी वेदों में वर्णित की गई है।

 तब परमेश्वर ने ये बातें कहीं,

“मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मैं तुम्हें मिस्र देश से बाहर लाया। मैंने तुम्हें दासता से मुक्त किया। इसलिए तुम्हें निश्चय ही इन आदेशों का पालन करना चाहिए।

“तुम्हे मेरे अतिरिक्त किसी अन्य देवता को, नहीं मानना चाहिए।

“तुम्हें कोई भी मूर्ति नहीं बनानी चाहिए। किसी भी उस चीज़ की आकृति मत बनाओ जो ऊपर आकाश में या नीचे धरती पर अथवा धरती के नीचे पानी में हो। किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा मत करो, उसके आगे मत झुको। क्यों? क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मेरे लोग जो दूसरे देवताओं की पूजा करते हैं मैं उनसे घृणा करता हूँ। यदि कोई व्यक्ति मेरे विरुद्ध पाप करता है तो मैं उसका शत्रु हो जाता हूँ। मैं उस व्यक्ति की सन्तानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी तक को दण्ड दूँगा। किन्तु मैं उन व्यक्तियों पर बहुत कृपालू रहूँगा जो मुझसे प्रेम करेंगे और मेरे आदेशों को मानेंगे। मैं उनके परिवारों के प्रति सहस्रों पीढ़ी तक कृपालु रहूँगा।

“तुम्हारे परमेश्वर यहोवा के नाम का उपयोग तुम्हें गलत ढंग से नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यहोवा के नाम का उपयोग गलत ढंग से करता है तो वह अपराधी है और यहोवा उसे निरपराध नहीं मानेगा।

“सब्त को एक विशेष दिन के रूप में मानने का ध्यान रखना। सप्ताह में तुम छः दिन अपना कार्य कर सकते हो। 10 किन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की प्रतिष्ठा में आराम का दिन है। इसलिए उस दिन कोई व्यक्ति चाहे तुम, या तुम्हारे पुत्र और पुत्रियाँ, तुम्हारे दास और दासियाँ, पशु तथा तुम्हारे नगर में रहने वाले सभी विदेशी काम नहीं करेंगे।” 11 क्यों? क्योंकि यहोवा ने छ: दिन काम किया और आकाश, धरती, सागर और उनकी हर चीज़ें बनाईं। और सातवें दिन परमेश्वर ने आराम किया। इस प्रकार यहोवा ने शनिवार को वरदान दिया कि उसे आराम के पवित्र दिन के रूप में मनाया जाएगा। यहोवा ने उसे बहुत ही विशेष दिन के रूप में स्थापित किया।

12 “अपने माता और अपने पिता का आदर करो। यह इसलिए करो कि तुम्हारे परमेश्वर यहोवा जिस धरती को तुम्हें दे रहा है, उसमें तुम दीर्घ जीवन बिता सको”

13 “तुम्हें किसी व्यक्ति की हत्या नहीं करनी चाहिए”

14 “तुम्हें व्यभिचार नहीं करना चाहिए”

15 “तुम्हें चोरी नहीं करनी चाहिए”

16 “तुम्हें अपने पड़ोसियों के विरुद्ध झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए।”

17 “दूसरे लोगों की चीज़ों को लेने की इच्छा तुम्हें नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने पड़ोसी का घर, उसकी पत्नी, उसके सेवक और सेविकाओं, उसकी गायों, उसके गधों को लेने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें किसी की भी चीज़ को लेने की इच्छा नहीं करनी

चाहिए।”निर्गमन 20:1-18

दस आज्ञाओं का मानक

आज हम कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि ये आज्ञाएँ  हैं। वे सुझाव नहीं हैं। और न ही उनकी सिफारिशें हैं। परन्तु इन आज्ञाओं का पालन करने के लिए हम किस सीमा तक जाना है? दस आज्ञाओं को देने से ठीक पहले  निम्नलिखित बातें आती हैं

तब मूसा पर्वत के ऊपर परमेश्वर के पास गया। जब मूसा पर्वत पर था तभी पर्वत से परमेश्वर ने उससे कहा, “ये बातें इस्राएल के लोगों अर्थात् याकूब के बड़े परिवार से कहो, ‘तुम लोगों ने देखा कि मैं अपने शत्रुओं के साथ क्या कर सकता हूँ। तुम लोगों ने देखा कि मैंने मिस्र के लोगों के साथ क्या किया। तुम ने देखा कि मैंने तुम को मिस्र से बाहर एक उकाब की तरह पंखों पर बैठाकर निकाला। और यहाँ अपने समीप लाया। इसलिए अब मैं कहता हूँ तुम लोग मेरा आदेश मानो। मेरे साक्षीपत्र का पालन करो। यदि तुम मेरे आदेश मानोगे तो तुम मेरे विशेष लोग बनोगे। समस्त संसार मेरा है।

निर्गमन 19:3,5

इन्हें ठीक दस आज्ञाओं को दिए जाने के बाद  दिया गया था  

मूसा ने चर्म पत्र पर लिखे विशेष साक्षीपत्र को पढ़ा। मूसा ने साक्षीपत्र को इसलिए पढ़ा कि सभी लोग उसे सुन सकें और लोगों ने कहा, “हम लोगों ने उन नियमों को जिन्हें यहोवा ने हमें दिया, सुन लिया है और हम सब लोग उनके पालन करने का वचन देते हैं।”

निर्गमन 24:7)

कभी-कभी विद्यालय की परीक्षाओं में, शिक्षक बहुभागीय प्रश्नों को देता है (उदाहरण के लिए 20) परन्तु फिर केवल कुछ ही प्रश्नों  के उत्तर देने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, हम उत्तर देने के लिए 20 में से किन्हीं 15 प्रश्नों को चुन सकते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी उत्तर देने के लिए अपने लिए सबसे आसान 15 प्रश्नों को चुन सकता/सकती है। इस तरह शिक्षक परीक्षा को आसान बना देता है।

कई लोग दस आज्ञाओं को उसी तरह से सोचते हैं। वे सोचते हैं कि दस आज्ञाओं को देने के बाद परमेश्वर ने चाहा कि, “हम इन दस में से अपनी पसन्द के किसी भी छः को पालन करने का प्रयास कर सकते हैं”। हम इस तरह सोचते हैं क्योंकि हम यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर हमारे ‘भले कामों’ को हमारे ‘बुरे कामों’ के विरुद्ध सन्तुलित करता है। यदि हमारे अच्छे गुण हमारे बुरे प्रभावों को पीछे छोड़ देते हैं या उन्हें निरस्त कर देते हैं तो हम आशा करते हैं कि यह परमेश्वर के अनुग्रह को पाने के लिए पर्याप्त है।

यद्यपि, दस आज्ञाओं के एक ईमानदारी से भरे पठ्न से पता चलता है कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। लोगों को सभी आज्ञाओं का पालन करना और सभी आज्ञाओं पर – सभी  समयों में बने रहना हैं । इन्हें पालन करने की भारी कठिनाई के कारण कई लोगों दस आज्ञाओं को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है। परन्तु वे कलियुग में उस स्थिति के लिए दिए गए थे जिसे कलियुग लाता है।

दस आज्ञाएँ और कोरोना वायरस जाँच

हम कदाचित् कलियुग के 2020 में पूरे संसार में व्याप्त कोरोना वायरस महामारी के साथ तुलना करने के लिए कठोर दस आज्ञाओं के उद्देश्य को और अधिक उत्तम रीति से समझ सकते हैं। कोविड -19 बुखार, खांसी और सांस की परेशानी के लक्षणों के साथ आने वाली एक बीमारी है जो कोरोना वायरस के कारण आती है – जो इतना छोटा है कि हम इसे नहीं देख सकते हैं।

मान लीजिए कि किसी को बुखार आ रहा है और उसे खांसी है। यह व्यक्ति आश्चर्य करता है कि समस्या क्या है। क्या उसे एक आम बुखार है या क्या वे कोरोना वायरस से संक्रमित हैं? यदि ऐसा है तो यह एक गंभीर समस्या है – यहाँ तक कि जीवन के लिए खतरा भी है। चूंकि कोरोनोवायरस बहुत तेजी से फैलता है और हर कोई इसके प्रति अतिसंवेदनशील है, इसलिए यह एक वास्तविक संभावना बना जाता है। इसका पता लगाने के लिए कि वे एक विशेष परीक्षण करते हैं जो यह निर्धारित करता है कि कोरोनोवायरस उनके शरीर में उपस्थित है या नहीं। कोरोनवायरस जाँच उनकी बीमारी का उपचार नहीं करता है, यह तो बस उन्हें निश्चित रूप से यह बताता है कि क्या उनके शरीर में कोरोनवायरस है जो कोविड-19 में परिणाम देगा, या क्या उन्हें कोई एक सामान्य बुखार है।

दस आज्ञाओं के साथ भी ऐसा ही है। कलियुग में नैतिक पतन वैसे ही प्रचिलत है जैसा कि 2020 में कोरोना वायरस प्रचलित है। सामान्य नैतिक अधर्म के इस युग में हम यह जानना चाहते हैं कि क्या हम स्वयं धर्मी हैं या कहीं हम भी पाप के कारण दागी तो नहीं हैं। दस आज्ञाएँ इसलिए दी गई थीं कि हम उनकी तुलना में अपने जीवन की जाँच करें, हम स्वयं के लिए जान सकते हैं कि क्या हम पाप से और इसके साथ आने वाले कर्म के परिणाम से मुक्त हैं या नहीं, या कहीं पाप की हमारे ऊपर पकड़ तो नहीं है। दस आज्ञाएँ कोरोनोवायरस जाँच की तरह ही काम करती हैं – इस तरह से आप जानते हैं कि क्या आपको यह बीमारी (पाप) है या नहीं या क्या आप इससे मुक्त हैं।

पाप का शाब्दिक अर्थ ‘खोने’ से है अर्थात् उस लक्ष्य को खो देने से जिसकी परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है जिसमें हम दूसरों, स्वयं और परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। परन्तु अपनी समस्या को पहचानने के स्थान पर हम या तो स्वयं की तुलना दूसरों से करते हैं (अपने आप को गलत मानक की तुलना में मापते हैं), या फिर धार्मिक गुणों को प्राप्त करने के लिए कठिन प्रयास करते हैं, या हार मान लेते हैं और बस सुख प्राप्ति के लिए जीवन जीते हैं। इसलिए ही परमेश्वर ने दस आज्ञाएँ दीं ताकि:

   20 व्यवस्था के कामों से कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के सामने धर्मी सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि व्यवस्था से जो कुछ मिलता है, वह है पाप की पहचान करना।

रोमियों 3:20

यदि हम अपने जीवन की जाँच दस आज्ञाओं के मानक की तुलना में करते हैं तो यह कोरोनोवायरस जाँच को लेने जैसा है जो आंतरिक समस्या को दर्शाता है। दस आज्ञाएँ हमारी समस्या को ‘ठीक’ नहीं करती हैं, परन्तु समस्या को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं, इसलिए हम उस उपाय को स्वीकार करेंगे जिसे परमेश्वर ने प्रदान किया है। स्वयं को-धोखे में बनाए रखने के स्थान पर, व्यवस्था हमें स्वयं को सटीक रूप से देखने की अनुमति देती है।

पश्चाताप में दिया गया परमेश्वर का उपहार

परमेश्वर ने जो उपाय दिया है, वह यीशु मसीह – येसु सत्संग की मृत्यु और पुनरुत्थान के माध्यम से पापों की क्षमा का उपहार है। जीवन का यह उपहार बस हमें इसलिए दिया जाता है यदि हम यीशु के काम में भरोसा करते और विश्वास रखते हैं।

16 यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य को आज्ञा दी, “तुम बग़ीचे के किसी भी पेड़ से फल खा सकते हो।

गलातियों 2:16

जैसा कि श्री अब्राहम परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरे थे, हमें भी धार्मिकता दी जा सकती है। परन्तु इसके लिए जरूरी है कि हम पश्चाताप  करें। पश्चाताप को अक्सर गलत समझा जाता है, परन्तु पश्चाताप का अर्थ केवल यह है कि अपने ‘विचारों को बदलते हुए’ पाप से मुड़ना और परमेश्वर की ओर  और उस उपहार की ओर मुड़ना जिसे वह हमें प्रदान करता है। जैसा कि वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है:

 19 इसलिये तुम अपना मन फिराओ और परमेश्वर की ओर लौट आओ ताकि तुम्हारे पाप धुल जायें।

प्रेरितों के काम 3:19

आपके और मेरे लिए प्रतिज्ञा यह है कि यदि हम पश्चाताप करते हैं, परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं, तो हमारे पापों को हमारे लेखे में नहीं गिना जाएगा और हम जीवन प्राप्त करेंगे। परमेश्वर ने अपनी महान दया में, हमें कलियुग में पाप के लिए एक जाँच और एक टीका दोनों को दिया है।

काली, मौत और फसह का चिन्ह

काली अर्थात् महिषासुर मर्दिनी हिन्दू देवी दुर्गा को आमतौर पर मृत्यु की देवी के रूप में जाना जाता है, लेकिन अधिक सटीक रूप से संस्कृत शब्द काल का अर्थ शब्द समय  से निकल कर आता है। काली के प्रतीक भय उत्पन्न करने वाले हैं क्योंकि उसे आमतौर पर अपने पति शिव के अधोमुखी शरीर पर एक पैर के साथ सिरों की माला के साथ, हाथ में रक्त-टपकने वाले ताजे कटे हुए सिर को पकड़े हुए, और कटे हुए हाथों के लहंगे को पहने हुए दिखाया जाता है। काली हमें इब्रानी वेद – बाइबल में मौत की एक और कहानी को समझने में मदद करती है।

काली शिव के अधोमुखी शरीर पर सिरों के साथ और भिन्न अंगों से सुशोभित है
काली शिव के अधोमुखी शरीर पर सिरों के साथ और भिन्न अंगों से सुशोभित है

काली से सम्बन्धित पौराणिक कथाओं के वृतान्त बताते हैं कि असुर-राजा महिषासुर ने देवताओं के विरूद्ध युद्ध की धमकी दी थी। इसलिए उन्होंने काली को अपने तेज से उत्पन्न किया था। काली ने एक बड़े नरसंहार में असुर-सेना को बर्बरतापूर्वक तरीके से उसके मार्ग में आने वाले सभी को नष्ट कर दिया था। युद्ध का चरमोत्कर्ष असुर-राजा महिषासुर के साथ उसकी लड़ाई में आया जिसे उसने एक हिंसक टकराव में नष्ट कर दिया। काली ने अपने विरोधियों के शरीर को खून बहते हुए अंगों में बदल दिया, लेकिन वह उन सभी के खून से मतवाली हो गई, इसलिए वह अपने आप को मृत्यु और विनाश से नहीं रोक पाई। देवताओं को तब तक यह निश्चित नहीं था कि वे उसे कैसे रोकें जब तक कि शिव ने युद्ध के मैदान में अपने आप को गतिहीन रूप से पड़े हुए होने के लिए स्वेच्छा से उसे रोकने के लिए नहीं दे दिया। इस तरह से जब काली अपने मृत विरोधियों के सिर और हाथों से सुशोभित थी, तब उसने अपने एक पैर को शिव के अधोमुखी शरीर पर रख दिया और इसे देखते ही वह अपनी चेतना में वापस आ गई और इस तरह से विनाश समाप्त हो गया।

इब्रानी वेद में फसह का वृतान्त काली और शिव की कहानी को दर्शाता है। फसह की कहानी काली की तरह, एक दूत को लिपिबद्ध करती है, जो एक दुष्ट राजा के विरोध में व्यापक स्तर पर मृत्यु को लाता है। मृत्यु का यह दूत, जैसे कि काली को रोकने के लिए शिव ने एक कमजोर स्थिति को अपने ऊपर ले लिया, वैसे ही किसी भी घर में जाने से रोक दिया जाता है, जहां एक असहाय मेम्ने की बलि दी गई होती है। ऋषि हमें बताते हैं कि काली की इस कहानी का अर्थ अहंकार पर विजय से सम्बन्धित है। फसह की कहानी का निहितार्थ भी नासरत के यीशु – येशु सत्संग – के आने और विनम्रता में अपने अहंकार को त्यागने और हमारी ओर से अपने आप को बलिदान में देने की ओर संकेत करना भी है। फसह की कहानी को जानना अर्थपूर्ण है।

फसह का पर्व

हमने देख लिया है कि कैसे ऋषि अब्राहम के द्वारा उसके पुत्र इसहाक का बलिदान यीशु के बलिदान की ओर संकेत कर रहा था। अब्राहम की मृत्यु के पश्चात्, उसके पुत्र इसहाक के वंशज, जिन्हें अब इस्राएली कह कर पुकारा जाता है, एक बड़ी सँख्या के लोग बन गए थे परन्तु साथ ही वे मिस्र में दास अर्थात् गुलाम बन गए थे।

अब हम एक बड़े ही नाटकीय संघर्ष में आ जाते हैं जो एक व्यक्ति जिसे मूसा कहा जाता है, के द्वारा केन्द्रित है और जिसका उल्लेख इब्रानी वेद बाइबल की निर्गमन नामक पुस्तक में मिलता है। इसका नाम ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें यह वृतान्त मिलता है कि कैसे मूसा अब्राहम के 500 वर्षों के पश्चात्, लगभग 1500 ईसा पूर्व में इस्राएलियों के मिस्र के दासत्व से बाहर निकाल कर लाया। मूसा को सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर (प्रजापति) के द्वारा आज्ञा दी गई थी कि वह मिस्र के फिरौन (शासक) का सामना करे और इसका परिणाम मूसा और फिरौन की इच्छाओं में प्रतिस्पर्धा के रूप में निकला। इस प्रतिस्पर्धा ने मिस्र के विरोध में दस विपत्तियों या अपदाओं को भी उत्पन्न किया। परन्तु फिरौन मिस्रियों को छोड़ देने के लिए सहमत नही हुआ इसलिए परमेश्‍वर 10वीं और अन्तिम विपत्ति उनके ऊपर लाने पर था। आप 10वीं विपत्ति के पूरे वृतान्त को इस लिंक पर यहाँ निर्गमन में पढ़ सकते हैं क्योंकि यह नीचे दिए गए विवरण में आपकी सहायता करेगा।

परमेश्‍वर के द्वारा 10वीं विपत्ति की आज्ञा यह थी कि मृत्यु का दूत (आत्मा) मिस्र के प्रत्येक घर के आगे से निकलेगा। उस देश की पूरी भूमि पर एक विशेष रात्रि में प्रत्येक पहिलौठा उन लोगों के घरों को छोड़कर मर जाएगा जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया है और इसके लहू को उस घर के द्वार की चौखटों पर लगाया हुआ है। फिरौन का विनाश उसके पुत्र और उसके सिंहासन के उत्तराधिकारी के मरने से होता है, यदि वह आज्ञा का पालन नहीं करता और मेम्ने के लहू को द्वार पर नहीं लगाता है। और मिस्र का प्रत्येक घर पहिलौठे पुत्र को खो देगा यदि वे मेम्ने का बलिदान नहीं करते और उसके लहू को चौखटों के ऊपर नहीं लगाते हैं। इस तरह से मिस्र राष्ट्रीय संकट का सामना करता है।

परन्तु वे घर जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया था और उसके लहू को चौखटों के ऊपर लगाया गया था के लिए यह प्रतिज्ञा दी गई थी ऐसा प्रत्येक घर सुरक्षित रहेगा। मृत्यु के दूत ने उस घर को छोड़ दिया। इस तरह से इस दिन को फसह कह कर पुकारा गया (क्योंकि मृत्यु ने उन सभी घरों को छोड़ दिया  था जहाँ पर द्वारों पर लहू को लगाया गया था)।

फसह का चिन्ह

अब जिन्होंने इस कहानी को सुना, उन्होंने यह मान लिया कि द्वारों पर लगा हुआ लहू का निशान मृत्यु के दूत के लिए निशान था। परन्तु 3500 वर्षों पहले लिखे हुए वृतान्त में से जिज्ञासा भरे हुए विवरण के ऊपर ध्यान दें।

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा….“…मैं यहोवा हूँ। जिन घरों में तुम रहते हो उन पर [फसह के मेम्ने का] वह लहू

तुम्हारे लिए चिन्ह ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊँगा। (निर्गमन 12:13)

यद्यपि परमेश्‍वर द्वार के ऊपर लहू को देख रहा था, और जब वह उसे देखता है तो मृत्यु उसके घर को छोड़ देगी, लहू परमेश्‍वर के लिए चिन्ह नहीं था। यह बड़ी ही स्पष्टता से कहता है, कि लहू ‘आपके लिए एक चिन्ह’– अर्थात् लोगों के लिए चिन्ह था। यह साथ ही हम सभों के लिए भी चिन्ह है जो इस वृतान्त को पढ़ते हैं। परन्तु कैसे यह एक चिन्ह है? एक महत्वपूर्ण सुराग यह है कि इस घटना के घटित हो जाने के पश्चात् परमेश्‍वर ने उन्हें यह आज्ञा दी:

इस कारण वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर माना जाए। जब तुम उस देश में प्रवेश करो…तब यह काम किया करना…यह परमेश्‍वर के लिए फसह का बलिदान होगा (निर्गमन 12:17)

Jewish man with lamb at Passover
फसह के पर्व पर मेम्ने के साथ एक यहूदी व्यक्ति

यहूदी इस्राएलियों को प्रत्येक वर्ष के उसी दिन फसह का पर्व मानने की आज्ञा दी गई थी। यहूदी पंचाँग, चन्द्रमा आधारित पंचाँग होने के कारण, पश्चिमी पंचाँग से थोड़ा सा भिन्न है,यदि आप इसका आंकलन पश्चिमी पंचाँग के अनुसार करें तो आप पाएंगे कि वर्ष में दिनों की गिनती प्रत्येक वर्ष परिवर्तित होती ही जाती है। परन्तु आज के दिन भी, लगभग 3500 वर्षों के पश्चात्, यहूदी लोग निरन्तर फसह के पर्व अर्थात् त्योहार को प्रत्येक वर्ष उसी दिन दी हुई आज्ञा का पालन करते हुए इस घटना की स्मृति में मनाते हैं।

फसह का चिन्ह प्रभु यीशु की ओर संकेत कर रहा है

और इतिहास में इस पर्व की खोज करते हुए हम कुछ असाधारण बातों को नोट कर सकते हैं। आप इसे सुसमाचारों में भी ध्यान से नोट कर सकते हैं जहाँ पर यह यीशु के पकड़े और जाँचे जाने (प्रथम फसह की विपत्ति के 1500 वर्षों को पश्चात्) के विवरणों को उल्लेख करता है:

“तब वे यीशु को…रोमी राज्यपाल [पीलातुस] के किले ले गए…परन्तु वे आप किले के भीतर नहीं गए ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें”… [पीलातुस]ने [यहूदी अगुवों से] कहा “…पर तुम्हारी यह रीति है कि मैं फसह के समय में तुम्हारे लिये एक व्यक्ति को छोड़ दूँ। अत: क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये ‘यहूदियों के राजा’ को छोड़ दूँ?” तब उन्होंने फिर चिल्ला कर कहा, “इसे नहीं…”(यूहन्ना 18:28, 39-40)

दूसरे शब्दों में, यीशु को पकड़ लिया गया था और कूस्रीकरण के लिए यहूदी पंचाँग के अनुसार ठीक फसह के दिन  ही भेजा गया था। यीशु को दी हुई पदवियों में से एक यह थी

दूसरे दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था’” (यूहन्ना 1:29-30)

यहाँ पर हम देखते हैं कि कैसे फसह का नाटक हमारे लिए एक चिन्ह है। यीशु, परमेश्‍वर के मेम्ने को वर्ष के ठीक उसी दिन  क्रूसित (अर्थात् बलिदान) किया गया था जब सभी यहूदी प्रथम फसह के स्मरण में मेम्ने का बलिदान कर रहे थे जो 1500 वर्षों पहले घटित हुई था। यह दो छुट्टियों के वार्षिक समय की व्याख्या करते हैं जो प्रत्येक वर्ष – समानान्तर रूप में घटित होती है जिस पर हममें से थोड़े ही ध्यान देते हैं और यहाँ तक कि बहुत ही थोड़े पूछते हैं कि ‘क्यों’ ऐसा घटित होता है? यहूदियों का फसह का पर्व प्रत्येक वर्ष लगभग उसी समय घटित होता है जब मसीहियों का ईस्टर का पर्व आता है – अपने पंचाँग को जाँचें। (प्रत्येक 19वें वर्ष के एक महीने में विचलन यहूदियों के पंचाँग के चन्द्र-आधारित लीप वर्ष के चक्र के कारण होता है)। इसलिए ही ईस्टर आगे की ओर बढ़ जाता है क्योंकि यह फसह के ऊपर आधारित है और फसह का समय यहूदी पंचाँग के द्वारा निर्धारित होता है जो वर्ष की गणना पश्चिमी पंचाँग से भिन्न रूप में करता है।

अब एक मिनट के लिए यह विचार करें चिन्ह  क्या करते हैं। आप कुछ चिन्हों को नीचे यहाँ पर देख सकते हैं।

Flag_of_India
भारत का एक चिन्ह

व्यावसायिक चिन्ह हमें मैक्डोनाल्डस् और नाईक को सोचने के लिए मजबूर करते हैं

झण्डा या ध्वज भारत का चिन्ह या प्रतीक है। हम केवल एक नांरगी और एक हरी पट्टी को ही आयताकार रूप में नहीं ‘देखते’ हैं। नहीं, जब भी हम झण्डे को देखते हैं, हम भारत को सोचते हैं। ‘सुनहरी मेहराबें’ हमें मैक्डोनाल्डस् को सोचने के बारे में मजबूर करती हैं। टेनीस खिलाड़ी नाडॉल के सिर पर बँधी हुई पट्टी पर दिया हुआ चिन्ह ‘√’ नाईक के लिए सोचने पर मजबूर करता है। नाईक चाहता है कि हम उनके बारे में सोचें जब भी हम नाडॉल के सिर पर बँधी पट्टी पर दिए हुए चिन्ह को देखते हैं। दूसरे शब्दों में, चिन्ह हमारे मनों के लिए ऐसे संकेत हैं जो हमारी सोच को इच्छित की हुई वस्तु की ओर निर्देशित करते हैं।

Signsइब्रानी वेद के निर्गमन में दिए हुए फसह का वृतान्त स्पष्ट रूप से यह कहता है कि चिन्ह लोगों के लिए दिया गया था,  न कि सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर के लिए (यद्यपि वह अभी भी लहू की ओर देखगा और यदि वह इसे उन घरों पर देखता है तो उन्हें छोड़ देगा)। किसी भी दिए हुए चिन्ह की तरह, जब हम फसह की ओर देखते हैं तो वह हमारे मनों की सोच से क्या इच्छा रखता है? मेम्ने के बलिदान का उल्लेखनीय समय वही दिन था जिस दिन यीशु का बलिदान हुआ था, इसलिए यह यीशु के बलिदान की ओर एक संकेत करने वाला  होना चाहिए।

यह हमारे मनों में उसी तरह से कार्य करता है जैसा मैंने नीचे दिए आरेख में दिखाया है। चिन्ह वहाँ पर यीशु के बलिदान की ओर संकेत करने के लिए दिया गया था।

फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था
फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था

प्रथम फसह के समय मेम्नों का बलिदान हुआ था और लहू को लगाया गया था ताकि लोग बचाए जा सकें। और इसी प्रकार, यह चिन्ह यीशु की ओर हमें यह बताने के लिए संकेत कर रहा है कि, ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ मृत्यु के लिए बलिदान होने के लिए दिया गया था और उसका लहू बहाया गया ताकि हम जीवन को प्राप्त कर सकें।

हमने अब्राहम के चिन्ह लेख में देखा था जिस स्थान पर अब्राहम की परीक्षा उसके पुत्र को मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर बलिदान देने के द्वारा की गई थी। वहीं पर एक मेम्ने को मरना था ताकि अब्राहम का पुत्र जीवित रह सके। मोरिय्याह पहाड़

अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था
अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था

ठीक वही स्थान था जहाँ पर यीशु का बलिदान हुआ था। यह चिन्ह हमें उस स्थान की ओर संकेत करते हुए उसकी मृत्यु के अर्थ को ‘देखने’ के लिए दिया गया था। फसह में हम एक ओर सूचक कोवर्ष के ठीक उसी दिन  को यीशु के बलिदान की ओर संकेत करता हुआ पाते हैं। एक बार फिर से मेम्ने के बलिदान का उपयोग – यह दिखाने के लिए किया गया है कि यह यीशु के बलिदान की ओर संकेत करती हुई – घटना का एक संयोग मात्र नहीं है। दो भिन्न तरीकों से (स्थान के द्वारा और समय के द्वारा) पवित्र इब्रानी वेदों में दिए हुए दो अति महत्वपूर्ण त्योहार यीशु के बलिदान की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। मैं इतिहास में किसी भी अन्य व्यक्ति के बारे में नहीं सोच सकता हूँ जिसकी मृत्यु की प्रतिछाया इस तरह से नाटकीय तरीके में इस तरह की समानताओं के साथ दी गई हो। क्या आप सोच सकते हैं?

यह चिन्ह इसलिए दिए गए हैं कि हम उस पर आश्वस्त हो सकें कि यीशु का बलिदान वास्वत में परमेश्‍वर की ओर से योजनाबद्ध और ठहराया हुआ था। यह उदाहरण के रूप में दिया हुआ है ताकि हम यह कल्पना कर सकें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें मृत्यु से बचाता है और पाप से शुद्ध करता है –परमेश्‍वर की ओर से उन सभों को दिया हुआ उपहार है जिसे सभी प्राप्त कर सकते हैं।

पर्वत को पवित्र बनाने वाला बलिदान

कैलाश पर्वत (या कैलासा) चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारतीय सीमा के पार एक पर्वत है। हिंदू, बौद्ध और जैन कैलाश पर्वत को एक पवित्र पर्वत मानते हैं। हिंदुओं द्वारा, पर्वत कैलाश को भगवान शिव (या महादेव), साथ ही उनकी पत्नी, देवी पार्वती (जिसे उमा, गौरी भी कहा जाता है), और उनकी सन्तान गणेश (गणपति या विनायक) का निवास स्थान माना जाता है। हजारों हिंदू और जैन पर्वत कैलाश में पवित्र अनुष्ठान में इसके चारों ओर घूमने के लिए तीर्थयात्रा करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

कैलाश वह स्थान है, जहाँ भगवान शिव ने गणेश को तब मारा था जब गणेश ने उन्हें पार्वती को स्नान करते हुए देखने से रोका था। इस प्रकार यह प्रसिद्ध कहानी आगे बढ़ती है कि कैसे गणेश शिव के पास मृत्य में से तब वापस आया जब उसने उसके धड़ पर हाथी का सिर रख दिया था। हाथी की मृत्यु बलिदानात्मक रूप से गणेश को सिर देने के लिए हुई थी, ताकि भगवान शिव अपने पुत्र को मृत्यु में से वापस पा सकें। यह बलिदान कैलाश पर हुआ, जिससे यह पर्वत पवित्र बन गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कैलाश मेरु पर्वत का भौतिक रूप है – जो ब्रह्मांड का आध्यात्मिक और लौकिक केन्द्र है। कैलाश पर्वत के माध्यम से मेरु पर्वत की ओर केन्द्रित होते हुए इस आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले संकेत के रूप में कई मन्दिरों को प्रतीकात्मक रूप से निर्मित किया गया है।

पर्वत पर बलिदान के माध्यम से एक पुत्र को मृत्यु से वापस लाने के लिए भगवान की यह अभिव्यक्ति भी श्री अब्राहम द्वारा एक अन्य पर्वत – मोरिय्याह पर्वत – पर अपने पुत्र के साथ हुए अनुभव के लिए नमूने का कार्य करता है। यह बलिदान येशु सत्संग – यीशु के आने वाले अवतार अर्थात् देहधारण में एक गहरी आध्यात्मिक वास्तविकता की ओर एक संकेत था। इब्रानी वेदों ने 4000 वर्षों पहले ही श्री अब्राहम के अनुभवों के बारे में बता दिया था। यह घोषणा करता हैं कि इस संकेत को समझने से – ‘सभी राष्ट्रों’ को आशीर्वाद मिलेगा – न कि केवल इब्रानियों को। इसलिए इस कहानी को सीखना और उसके महत्व को समझना सार्थक है।

श्री अब्राहम के बलिदान का पर्वतीय चिन्ह

हमने देखा कि कैसे अब्राहम को, बहुत पहले, जातियों की प्रतिज्ञा दी गई। यहूदी और अरब के लोग आज अब्राहम से ही निकल कर आए हैं, इस कारण हम जानते हैं कि प्रतिज्ञा सच्ची ठहरी और यह कि वह इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।क्योंकि अब्राहम ने इस प्रतिज्ञा के ऊपर भरोसा किया इसलिए उसे धार्मिकता दी गई –उसने मोक्ष को प्राप्त कर लिया परन्तु किसी कठोर परिश्रम के द्वारा अपितु उसने बस केवल इसे किसी एक मुफ्त उपहार की तरह पा लिया था।

कुछ समय के पश्चात्, अब्राहम ने लम्बे समय से प्रतिक्षा किए जा रहे पुत्र इसहाक (जिसमें से यहूदी अपने पूर्वजों को निकल कर आया हुआ पाते हैं) को प्राप्त कर लिया। इसहाक एक नौजवान पुरूष बन गया। परन्तु तब परमेश्‍वर ने अब्राहम की नाटकीय तरीके से जाँच की। आप इसके पूरे वृतान्त को यहाँ पर पढ़ सकते हैं और तब इस रहस्यमयी जाँच के अर्थों के मुख्य तथ्यों को खोलने के लिए आगे बढ़ सकते हैं – जो हमारी इस बात में सहायता करता है कि कैसे हमारे लिए धार्मिकता को देने के लिए अदा किया जाएगा।

अब्राहम की जाँच

इस जाँच का आरम्भ परमेश्‍वर के द्वारा एक नाटकीय आदेश को दिए जाने के द्वारा होता है:

परमेश्‍वर   ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र – इसहाक को – जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।” (उत्पत्ति 22:2)

अब्राहम, आदेश के आज्ञापालन में ‘अगले सबेरे तड़के’ उठा और ‘तीन दिन की यात्रा’ के पश्चात् वे उस पहाड़ पर पहुँच गए। तब

9जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। 10फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे। (उत्पत्ति 22:9-10)

अब्राहम आदेश की आज्ञापालन किए जाने के लिए तत्पर था। परन्तु तब कुछ उल्लेखनीय घटना घट गई:

11तब यहोवा परमेश्‍वर के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकार के कहा, “हे अब्राहम ! हे अब्राहम!”

उसने कहा, “देख, मैं यहाँ पर हूँ।”

12उसने कहा, “उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उससे कुछ कर; क्योंकि तू ने जो मुझ से अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते को भी नहीं रख छोड़ा; इससे मैं अब जान गया कि तू परमेश्‍वर का भय मानता है।”

13 तब अब्राहम ने आँखें उठाईं, और क्या देखा कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपने सींगों से एक झाड़ी में फँसा हुआ है; अत: अब्राहम ने जा के उस मेढ़े को लिया, और अपने पुत्र के स्थान पर उसे होमबलि करके चढ़ाया। (उत्पत्ति 22:11-13)

अन्तिम क्षणों में इसहाक मृत्यु से बच गया और अब्राहम ने एक नर मेढ़े को देखा और उसकी अपेक्षा उसे बलिदान किया। परमेश्‍वर ने एक मेम्ने का प्रबन्ध किया था और मेम्ने ने इसहाक का स्थान ले लिया।

भविष्य की ओर देखते हुए : बलिदान

अब्राहम तब उस स्थान का नाम रखता है। ध्यान दें कि वह क्या नाम रखता है।

अब्राहम ने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है कि “यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। (उत्पत्ति 22:14)

अब्राहम ने उसका नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा कह कर रखा। यहाँ पर एक प्रश्न है। यह नाम भूत काल, वर्तमान काल या भविष्य काल किस में लिखा हुआ है? क्या यह स्पष्ट रूप से भविष्य काल में है। और आगे आने वाली टिप्पणी और भी अधिक स्पष्ट रूप से दुहराती है “…इसका उपाय किया जाएगा” यह भी भविष्य काल में लिखा हुआ है – इस तरह से यह भी भविष्य की ओर देख रहा है। परन्तु नाम रखने का यह कार्य इसहाक के स्थान पर मेम्ने (एक नर भेड़) के बलिदान के पश्चात्  हुआ है। अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि जब अब्राहम, उस स्थान का नाम रख रहा था, तब वह उस झाड़ी में फँसे हुए और अपने पुत्र के स्थान पर बलिदान किए जाने वाले मेढ़े की ओर संकेत कर रहा था। परन्तु अब तक तो वह पहले ही बलिदान कर दिया गया और जला दिया जा चुका था। यदि अब्राहम मेढ़े के बारे में सोच रहा था – जो पहले से बलिदान कर दिया, मर चुका और जला दिया गया था –तब तो उसने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर ने प्रबन्ध किया है, करके रखा होता, अर्थात् भूत काल वाक्य में। और टिप्पणी ऐसी लिखी गई होती ‘और आज तक भी यह कहा जाता है कि “यहोवा परमेश्‍वर के पहाड़ पर उपाय किया गया था।’” परन्तु अब्राहम ने स्पष्ट रूप से इसे भविष्य काल में लिखा है और इसलिए वह यह नहीं सोच रहा था कि वह पहले से मर चुका है और उसने मेढ़े का बलिदान कर दिया है। वह कुछ भिन्न तरह की बात से आत्म जागृत हुआ था। उसके पास भविष्य के बारे में कुछ आत्मबोध थे।  परन्तु वे क्या थे?

जहाँ पर बलिदान की घटना घटित हुई

उस पहाड़ को स्मरण रखें जहाँ पर अब्राहम को इस बलिदान को चढ़ाने के लिए भेजा गया था:

तब परमेश्‍वर ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा…” (वचन 2)

इस तरह से यह ‘मोरिय्याह’ में घटित हुआ। यह कहाँ पर है? यद्यपि यह अब्राहम के दिनों में (2000 ईसा पूर्व) जंगली क्षेत्र था, परन्तु एक हजार वर्षों (1000 ईसा पूर्व) के पश्चात् राजा दाऊद ने यहाँ पर यरूशलेम नगर की स्थापना की थी और उसके पुत्र सुलैमान ने यहाँ पर पहले मन्दिर का निर्माण किया था। हम इसे बाद में पुराने नियम की ऐतिहासिक पुस्तकों में पढ़ते हैं:

तब सुलैमान ने यरूशलेम में मोरिय्याह नामक पहाड़ पर उसी स्थान में यहोवा परमेश्‍वर का भवन बनाना आरम्भ किया, जिसे उसके पिता दाऊद ने दर्शन पाकर तैयार किया था (2 इतिहास 3:1)

दूसरे शब्दों में, अब्राहम के दिनों में (4000 ईसा पूर्व) ‘मोरिय्याह का पहाड़’ जंगल में एक सुनसान पहाड़ी था परन्तु 1000 वर्षों के पश्चात् दाऊद और सुलैमान के द्वारा यह इस्राएलियों के लिए एक केन्द्रीय नगर बन गया  जहाँ पर उन्होंने सृष्टिकर्ता का मन्दिर का निर्माण किया। और आज के दिन तक भी इसे यहूदी लोगों का एक पवित्र स्थान और इस्राएल की राजधानी माना जाता है।

यीशु – येसू सत्संग – और अब्राहम का बलिदान

अब यीशु की पदवियों के बारे में सोचें। यीशु से सम्बन्धित बहुत सी पदवियाँ हैं। कदाचित् सबसे अधिक जानी-पहचानी पदवी ‘मसीह’ की है।परन्तु उसे एक अन्य पदवी भी दी गई है जो कि अति महत्वपूर्ण है। हम इसे यूहन्ना के सुसमाचार में देखते हैं जहाँ पर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला उसके विषय में ऐसा कहता है:

दूसरे दिन उसने (अर्थात् यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला) यीशु (अर्थात् येसू सत्संगी) को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत के पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था।’” (यूहन्ना 1:29-30)

दूसरे शब्दों में, यीशु को परमेश्‍वर का मेम्ना  के रूप में जाना जाता था। अब यीशु के जीवन के अन्त के ऊपर ध्यान दें। उसे कहाँ पर पकड़ा और क्रूसित किया गया? यह यरूशलेम में हुआ था (जिसे हमने =‘मोरिय्याह पहाड़’ के रूप में ऐसे देखा है)। इसे बिल्कुल ही स्पष्ट शब्दों में उसके पकड़े जाने के समय पर कहा गया है:

और [पिलातुस] यह जानकर कि वह हेरोदेस की रियासत का है, उसे हेरोदेस के पास भेज दिया, क्योंकि उन दिनों में वह भी यरूशलेम में था। (लूका 23:7)

यीशु का पकड़ा जाना, उसकी जाँच और क्रूसीकरण यरूशलेम (=मोरिय्याह पहाड़) में घटित हुए। नीचे दी गई समयरेखा उन घटनाओं को दर्शाती है जो मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई।

मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ
मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ

आइए अब पुन: अब्राहम के बारे में सोचें। क्यों उसने उस स्थान का नाम भविष्य काल के वाक्य ‘यहोवा परमेश्‍वर उपाय करेगा’ से रखा? कैसे वह यह जान सकता है कि भविष्य में किसी ऐसी बात का ‘प्रबन्ध’ किया जाएगा जो अत्यधिक निकटता से वैसे ही घटित होगी जैसा कि उसने मोरिय्याह पहाड़ पर किया था? इसके बारे में सोचें– उसकी परीक्षा में इसहाक (उसका पुत्र) अन्तिम क्षणों में मृत्यु से बचा लिया गया था क्योंकि एक मेम्ना उसके स्थान पर बलिदान हो गया था। दो हजार वर्षों पश्चात्, यीशु को ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ कह कर पुकारा गया है और उसे उसी स्थान  के ऊपर बलिदान किया गया! कैसे अब्राहम यह जान पाया कि यही ‘वह स्थान’ होगा? वह केवल इसे इस तरह से ही जान सकता था और कुछ घटित होने वाला था, की भविष्यद्वाणी कर सकता था जो कि उल्लेखनीय हो जब उसे स्वयं सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर, प्रजापति की ओर से आत्मजागृति प्राप्त न हुई हो।

ईश्‍वरीय  मन प्रकाशित हुआ है

यह ऐसा है मानो कि वहाँ पर ऐसा मन था जिसने इन दोनों घटनाओं को अपने स्थान के कारण आपस में सम्बद्ध कर दिया है यद्यपि यह दोनों इतिहास के 2000 वर्षों में एक दूसरे से पृथक हैं।

अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।
अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।

उपरोक्त चित्र यह दर्शाता है कि कैसे पहले की घटना (अब्राहम का बलिदान) बाद की घटना (यीशु के बलिदान) की ओर संकेत करती है और इसकी रचना हमें इस बाद वाली घटना को स्मरण दिलाने के लिए की गई थी। यह प्रमाणित करता है कि यह मन (सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर  ) हम पर स्वयं को हजारों वर्षों में घटित हुई पृथक घटनाओं को संयोजित करते हुए प्रकाशित कर रहा है। यह एक चिन्ह है जिसे परमेश्‍वर ने अब्राहम के द्वारा बोला।

आपके और मेरे लिए शुभ सन्देश

यह वृतान्त हमारे लिए और अधिक व्यक्तिगत् कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। सार में यह कहना, कि परमेश्‍वर   ने अब्राहम के लिए यह घोषणा की:

“…और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी : क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है” (उत्पत्ति 22:18)

क्या आप इस ‘पृथ्वी की सभी जातियों’ में एक से सम्बन्धित नहीं हैं – यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि आप चाहे किसी भी भाषा, धर्म, शिक्षा, उम्र, लिंग या सम्पन्नता से क्यों न सम्बद्ध हों? अब यह एक ऐसी प्रतिज्ञा है जिसे विशेष रूप से आपको दिया गया है! और ध्यान दें यह प्रतिज्ञा क्या है – यह स्वयं परमेश्‍वर की ओर से एक ‘आशीष’ है! यह केवल यहुदियों के लिए नहीं है, अपितु इस संसार के सभी लोगों के लिए है।

यह ‘आशीष’ कैसे दी गई है? शब्द ‘वंश’ यहाँ पर एकवचन  है। यह कई सन्तानों या लोगों में ‘वंशों’ के रूप में नहीं दिया गया है, परन्तु यह एकवचन में दिया गया है जैसे यह ‘वह’ में होता है। यह कई लोगों या लोगों के समूह के द्वारा नहीं है जैसा कि ‘वे’ में होता है। यह इतिहास के आरम्भ में दी हुई प्रतिज्ञा के अक्षरश:समान्तर है, जब ‘वह’ इब्रानी वेदों में वर्णित सर्प की ‘ऐड़ी को डसेगा’ और साथ ही पुरूषासूक्ता में दिए हुए (‘वह’ अर्थात्) पुरूषा के बलिदान की प्रतिज्ञा के सामान्तर भी है। इस चिन्ह के साथ वही स्थान– अर्थात् मोरिय्याह पहाड़ (=यरूशलेम) – की भविषद्वाणी इन प्राचीन प्रतिज्ञाओं का और अधिक विस्तार देते हुए की गई है। अब्राहम के बलिदान के नाटक का वर्णन हमें यह समझने में सहायता करता है कि कैसे इस आशीष को दिया गया है, और कैसे धार्मिकता की कीमत को अदा किया जाएगा।

परमेश्‍वर की आशीष को कैसे प्राप्त किया जाता है?

ठीक वैसे ही जैसे एक मेढ़े ने इसहाक को मृत्यु से उसके स्थान पर बलिदान होते हुए बचा लिया, ठीक वैसे ही परमेश्‍वर का मेम्ना, अपनी बलिदानात्मक मृत्यु के द्वारा, हमें मृत्यु की सामर्थ्य और इसके जुर्माने से बचाता है। बाइबल यह घोषणा करती है

…पाप की मजदूरी तो मृत्यु है (रोमियों 6:23)

यह एक और तरीका है जिसके द्वारा यह कहा जाता है कि जिन पापों को हम करते हैं वह ऐसे कर्मों को उत्पन्न करते हैं जिनका परिणाम मृत्यु है। परन्तु मृत्यु को मेम्ने ने इसहाक के स्थान पर बलिदान होते हुए अदा कर दिया। अब्राहम और इसहाक को तो बस स्वीकार करना था। वह इसके योग्य नहीं था और न ही हो सकता था। परन्तु वह इसे एक उपहार के रूप में स्वीकार कर सकता था। यही वास्तव में वह बात है कि उसने कैसे मोक्ष को प्राप्तकिया।

यह हमें उस पद्धति को दिखाती है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। यीशु ‘परमेश्‍वर का मेम्ना था जो जगत के पापों को उठा ले जाता है’। इसमें आपके स्वयं के पाप भी सम्मिलित हैं। इस तरह से यीशु, जो मेम्ना है, आपके पापों को उठा ले जाने का प्रस्ताव देता है क्योंकि उसने कीमत को अदा कर दिया है। आप इसके योग्य नहीं हैं परन्तु आप इसे उपहार के रूप में पा सकते हैं। यीशु से प्रार्थना कीजिए,जो पुरूषा है, और उससे कहें कि वह आपके पापों को अपने ऊपर ले ले। उसका बलिदान उसके इस सामर्थ्य को प्रदान करता है। हम इसे इसलिए जानते हैं क्योंकि यह संयोग से मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर अब्राहम के द्वारा बलिदान किए हुए उल्लेखनीय वृतान्त की प्रतिछाया था, ठीक उसी स्थान की जहाँ 2000 वर्षों पश्चात् इसका ‘प्रबन्ध यीशु के द्वारा’ किया गया था।