योम किप्पुर – वास्तविकता में दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा (या दुर्गोस्तव) दक्षिण एशिया के अधिकांश हिस्सों में आश्विन (अश्विनी) महीने में 6-10 दिनों तक मनाया जाता है। यह असुर महिषासुर के विरुद्ध एक प्राचीन लड़ाई में देवी दुर्गा के विजयी होने के स्मरण में मनाया जाता है। बहुत से भक्तों को यह एहसास नहीं है कि यह उससे भी अधिक प्राचीन त्योहार योम किप्पुर (या प्रायश्चित का दिन) के साथ मेल खाता है, जो 3500 वर्ष पहले आरम्भ हुआ था और इब्रानी वर्ष के चन्द्रमा आधारित पंचांग के सातवें महीने के 10 वें दिन मनाया जाता है। ये दोनों त्यौहार प्राचीन हैं, दोनों एक ही दिन (अपने सम्बन्धित पंचांग के अनुसार आते हैं। हिन्दू और इब्रानी पंचांग में विभिन्न वर्षों में अतिरिक्त लीप-के-महीने होते हैं, इसलिए वे सदैव पश्चिमी पंचांग से मेल नहीं खाते हैं, परन्तु वे दोनों सदैव सितंबर-अक्टूबर में आते हैं), में बलिदान को सम्मिलित करते हैं, और दोनों ही बड़ी विजय को स्मरण करते हुए उत्सव को मनाते हैं। दुर्गा पूजा और योम किप्पुर के बीच समानताएं आश्चर्यचकित करने वाली हैं। कुछ अन्तर समान रूप से उल्लेखनीय हैं।

प्रायश्चित के दिन का परिचय

फिरौन के बन्धन में दास के रूप में मिस्र में रहते हुए
मूसा और उसके भाई हारून ने इस्राएलियों (इब्रानी या यहूदी) का नेतृत्व किया और यीशु के आने से लगभग 1500 वर्षों पहले व्यवस्था को प्राप्त किया।

हमने देखा कि श्री मूसा ने इस्राएलियों (इब्रानियों या यहूदियों) को गुलामी से बाहर निकाला और कलियुग में इस्राएलियों का मार्गदर्शन देने के लिए दस आज्ञाओं को प्राप्त किया। ये दस आज्ञाएँ बहुत अधिक कठोर थी, जिनका पालन करना पाप द्वारा प्रलोभित एक व्यक्ति के लिए असंभव था। इन आज्ञाओं को एक विशेष सन्दूक में रखा गया था, जिसे वाचा का सन्दूक कहा जाता था। वाचा का सन्दूक  एक विशेष मंदिर में था जिसे महा पवित्र स्थान  कहा जाता था। 

मूसा के भाई हारून और उसके वंशज याजक अर्थात् पुरोहित थे, जो इस मंदिर में लोगों के पापों का प्रायश्चित करने या उन्हें ढकने के लिए बलिदान दिया करते थे। योम किप्पुर – प्रायश्चित के दिन  विशेष बलिदानों को चढ़ाया जाता था। आज ये हमें गहरी शिक्षा देते हैं, और हम दुर्गा पूजा के समारोहों के साथ प्रायश्चित के दिन (योम किप्पुर) की तुलना करके बहुत कुछ सीख सकते हैं। 

प्रायश्चित का दिन और बलि का बकरा

इब्रानी वेद, अर्थात् आज की बाइबल ने मूसा के समय से प्रायश्चित के दिन  के बलिदानों और अनुष्ठानों के बारे में सटीक निर्देश दिए हैं। हम देखते हैं कि ये निर्देश कैसे शुरू होते हैं:

हारून के दो पुत्र यहोवा को सुगन्ध भेंट चढ़ाते समय मर गए थे। फिर यहोवा ने मूसा से कहा, “अपने भाई हारून से बात करो कि वह जब चाहे तब पर्दे के पीछे महापवित्र स्थान में नहीं जा सकता है। उस पर्दे के पीछे जो कमरा है उसमें पवित्र सन्दूक रखा है। उस पवित्र सन्दूक के ऊपर उसका विशेष ढक्कन लगा है। उस विशेष ढक्कन के ऊपर एक बादल में मैं प्रकट होता हूँ। यदि हारून उस कमरे में जाता है तो वह मर जायेगा!

लैव्यव्यवस्था 16:1-2

प्रधान पुरोहित अर्थात् महायाजक हारून के दो पुत्रों की मृत्यु इसलिए हुई क्योंकि उन्होंने अनादर के साथ मंदिर के महा पवित्र स्थान  में प्रवेश किया था जहाँ यहोवा परमेश्वर की उपस्थिति थी। उस पवित्र उपस्थिति में दस आज्ञाओं को पूरी तरह से निभाने में उनकी विफलता के परिणामस्वरूप उनकी मृत्यु हुई।

इसलिए पूरे वर्ष में एकमात्र  उसी विशेष दिन के लिए सावधानीपूर्वक निर्देश दिए गए, जब महायाजक महा पवित्र स्थान – में प्रायश्चित के दिन  प्रवेश कर सकता था। यदि वह किसी अन्य दिन में प्रवेश करता, तो वह मर जाता। परन्तु इस दिन भी, इससे पहले कि महायाजक वाचा के सन्दूक  की उपस्थिति में प्रवेश करे, उसे यह करना पड़ता था:

“पाप से निस्तार के दिन पवित्र स्थान में जाने के पहले हारून को पापबलि के रूप में एक बछड़ा और होमबलि के लिए एक मेढ़ा भेंट करना चाहिए। हारून अपने पूरे शरीर को पानी डालकर धोएगा। तब हारून इन वस्त्रों को पहनेगा: हारून पवित्र सन के वस्त्र पहनेगा। सन के निचले वस्त्र शरीर से सटे होगें। उसकी पेटी सन का पटुका होगी। हारून सन की पगड़ी बाँधेगा। ये पवित्र वस्त्र हैं।

लैव्यव्यवस्था 16:3-4

सप्तमी के दिन दुर्गा पूजा के समय, दुर्गा को प्राण प्रतिष्ठा  करके मूर्तियों में आने के लिए आह्वान किया जाता है और मूर्ति को स्नान कराया जाता है और उसे कपड़े पहनाए जाते हैं। योम किप्पुर में भी स्नान किया जाना सम्मिलित था परन्तु यह महायाजक था जो स्नान करता था और महा पवित्र स्थान में प्रवेश करने के लिए तैयार होता था न कि देवता। यहोवा परमेश्वर को आने के लिए आह्वान करना अनावश्यक था – क्योंकि उसकी उपस्थिति पूरे वर्ष में महा पवित्र स्थान में बनी रहती थी। इसकी अपेक्षा आवश्यकता इस उपस्थिति से मिलने के लिए तैयार रहने की थी। स्नान करने और कपड़े पहनने के बाद महायजाक को बलिदान के लिए जानवरों को लाना पड़ता था।

“हारून को इस्राएल के लोगों से दो बकरे पापबलि के रूप में और एक मेढ़ा होमबलि के लिए लेना चाहिए। तब हारून बैल की पापबलि चढ़ाएगा। यह पापबलि उसके अपने लिए और उसेक परिवार के लिए है। तब हारून वह उपासना करेगा जिसमें वह और उसका परिवार शुद्ध होंगे।

लैव्यव्यवस्था 16:5-6

हारून के अपने पापों को ढकने या प्रायश्चित करने के लिए एक मेढ़े या बैल का बलिदान करना पड़ता था। दुर्गा पूजा के समय में भी कभी-कभी बैल या बकरे की बलि दी जाती है। योम किप्पुर के लिए महायाजक को अपने पाप को ढकने के लिए बैल का बलिदान दिया जाना एक विकल्प नहीं था। यदि महायाजक अपने पाप को बैल के बलिदान के साथ नहीं ढकता है तो वह मर जाएगा।

फिर तुरन्त बाद, याजक अर्थात् पुरोहित दो बकरियों के बलिदान दिए जाने का उल्लेखनीय अनुष्ठान करता है।

“इसके बाद हारून दो बकरे लेगा और मिलापवाले तमबू के द्वार पर यहोवा के सामने लाएगा। हारून दोनों बकरों के लिए चिट्ठी डालेगा। एक चिट्ठी यहोवा के लिए होगी। दूसरी चिट्ठी अजाजेल के लिए होगी। “तब हारून चिट्ठी डालकर यहोवा के लिए चुने गए बकरे की भेंट चढ़ाएगा। हारून को इस बकरे को पापबलि के लिये चढ़ाना चाहिए।

लैव्यव्यवस्था 16:7-9

एक बार जब बैल को अपने पापों के लिए बलिदान कर दिया जाता था, तब पुरोहित दो बकरियों को ले जाता था और उनके नाम से चिट्ठी डालता था। एक बकरी को बलि का बकरे  के रूप में मनोनीत किया जाता था। दूसरे बकरे को पापबलि के रूप में चढ़ाया जाता था। ऐसा क्यों था?

15 “तब हारून को लोगों के लिए पापबलि स्वरूप बकरे को मारना चाहिए। हारून को बकरे का खून पर्दे के पीछे कमरे में लाना चाहिए। हारून को बकरे के खून से वैसा ही करना चाहिए जैसा बैल के खून से उसने किया। हारून को उस ढक्कन पर और ढक्कन के साने बकरे का खून छिड़कना चाहिए। 16 ऐसा अनेक बार हुआ जब इस्राएल के लोग अशुद्ध हुए। इसलिए हारून इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप से महापवित्र स्थान को शुद्ध करने के लिए उपासना करेगा। हारून को ये काम क्यों करना चाहिए क्योंकि मिलापवाला तम्बू अशुद्ध लोगों के बीच में स्थित है।

लैव्यव्यवस्था 16:15-16

बलि के बकरे का क्या होता था?

20 “हारून महापवित्र स्थान, मिलापवाले तम्बू तथा वेदी को पवित्र बनाएगा। इन कामों के बाद हारून यहोवा के पास बकरे को जीवित लाएगा। 21 हारून अपने दोनों हाथों को जीवित बकरे के सिर पर रखेगा। तब हारून बकरे के ऊपर इस्राएल के लोगों के अपराध और पाप को कबूल करेगा। इस प्रकार हारून लोगों के पापों को बकरे के सिर पर डालेगा। तब वह बकरे को दूर मरुभूमि में भेजेगा. एक व्यक्ति बगल में बकरे को ले जाने के लिए खड़ा रहेगा। 22 इस प्रकार बकरा सभी लोगों के पाप अपने ऊपर सूनी मरुभूमि में ले जाएगा। जो व्यक्ति बकरे को ले जाएगा वह मरुभूमि में उसे खुला छोड़ देगा।

लैव्यव्यवस्था 16:20-22

बैल का बलिदान हारून के अपने पाप के लिए था। पहले बकरे की बलि इस्राएल के लोगों के पाप के लिए थी। हारून तब अपने हाथों को जीवित बलि के बकरे के ऊपर रखता था और – प्रतीकात्मक रूप से – बलि के बकरे के ऊपर लोगों के पापों को स्थानांतरित कर देता था। फिर इस बकरे को जंगल में एक संकेत के रूप में छोड़ दिया जाता था कि लोगों के पाप अब लोगों से दूर हो गए थे। इन बलिदानों से उनके पापों का प्रायश्चित हो जाता था। यह प्रत्येक वर्ष प्रायश्चित के दिन और केवल उसी दिन किया जाता था। 

प्रायश्चित का दिन और दुर्गा पूजा 

परमेश्वर ने इस त्योहार को प्रत्येक वर्ष इसी दिन में मनाने की आज्ञा क्यों दी? इसका क्या अर्थ था? दुर्गा पूजा उस समय की ओर मुड़कर देखती है जब दुर्गा ने भैंस दानव महिषासुर को पराजित किया था। यह अतीत में हुई एक घटना का स्मरण कराता है। प्रायश्चित के दिन ने भी विजय के स्मरण को मनाया था, परन्तु इस में भविष्यवाणी की गई थी कि यह आने वाले भविष्य  में बुराई के ऊपर होने वाली विजय  की ओर देखना था। यद्यपि वास्तविक पशुओं की बलि दी जाती थी, तौभी वे प्रतीकात्मक ही थे। वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है कि 

क्योंकि साँड़ों और बकरों का लहू पापों को दूर कर दे, यह सम्भव नहीं है।

इब्रानियों 10:4

चूंकि प्रायश्चित के दिन बलिदान वास्तव में पुजारी अर्थात् याजक और भक्तों के पापों को दूर नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्हें प्रत्येक वर्ष चढ़ाए जाता था? वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है कि

 व्यवस्था का विधान तो आने वाली उत्तम बातों की छाया मात्र प्रदान करता है। अपने आप में वे बातें यथार्थ नहीं हैं। इसलिए उन्हीं बलियों के द्वारा जिन्हें निरन्तर प्रति वर्ष अनन्त रूप से दिया जाता रहता है, उपासना के लिए निकट आने वालों को सदा-सदा के लिए सम्पूर्ण सिद्ध नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा हो पाता तो क्या उनका चढ़ाया जाना बंद नहीं हो जाता? क्योंकि फिर तो उपासना करने वाले एक ही बार में सदा सर्वदा के लिए पवित्र हो जाते। और अपने पापों के लिए फिर कभी स्वयं को अपराधी नहीं समझते।किन्तु वे बलियाँ तो बस पापों की एक वार्षिक स्मृति मात्र हैं।

इब्रानियों 10:1-3

यदि बलिदान पापों को दूर कर सकते, तो उन्हें दोहराने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। परन्तु उन्हें प्रत्येक वर्ष यह दिखाते हुए दोहराया गया कि वे प्रभावी नहीं थे।

परन्तु जब यीशु मसीह (येसु सत्संग) ने स्वयं को बलिदान के रूप में प्रस्तुत किया तो सब कुछ बदल गया।

इसलिए जब यीशु इस जगत में आया था तो उसने कहा था: “तूने बलिदान और कोई भेंट नहीं चाहा,
    किन्तु मेरे लिए एक देह तैयार की है।
तू किसी होमबलि से न ही
    पापबलि से प्रसन्न नहीं हुआ
तब फिर मैंने कहा था,
    ‘और पुस्तक में मेरे लिए यह भी लिखा है, मैं यहाँ हूँ।
    हे परमेश्वर, तेरी इच्छा पूरी करने को आया हूँ।’”

इब्रानियों 10:5-7

वह स्वयं को बलिदान के रूप में प्रस्तुत करने आया था। और जब उसने किया तो

… हम यीशु मसीह की देह के एक ही बार बलिदान चढ़ाए जाने के द्वारा पवित्र किए गए हैं।

इब्रानियों 10:10

दो बकरियों का बलिदान में दिया जाना प्रतीकात्मक रूप से यीशु के द्वारा भविष्य में दिए जाने वाले बलिदान और विजय की ओर संकेत कर रहे थे। क्योंकि उसका बलिदान हुआ इसलिए वह बलिदान का बकरा था। वह साथ ही बलि का बकरा भी था, क्योंकि उसने पूरे संसार के समुदाय के सारे पापों को अपने ऊपर ले लिया और उन्हें हमसे दूर कर दिया, ताकि हम शुद्ध हो सकें।

क्या प्रायश्चित का दिन दुर्गा पूजा का कारण है?

इस्राएल के इतिहास में हमने ध्यान दिया था कि कैसे इस्राएल से निर्वासित लोग भारत में 700 ईसा पूर्व में पहुंचने लगे थे, जिससे भारत की शिक्षा और धर्म में कई योगदान मिले। इन इस्राएलियों ने सातवें महीने के 10 वें दिन प्रत्येक दिन प्रायश्चित के दिन का त्यौहार मनाया होगा। शायद, जिस तरह से उन्होंने भारत की बहुत सारी भाषाओं में योगदान दिया, उसी तरह हो सकता है कि उन्होंने अपने प्रायश्चित के दिन का भी योगदान दिया हो, जोकि कालांतर में दुर्गा पूजा बन गया, जो बुराई पर एक बड़ी विजय का स्मरण था। यह दुर्गा पूजा के प्रति हमारी ऐतिहासिक समझ के साथ मेल खाता है, जिसे लगभग 600 ईसा पूर्व मनाया जाने लगा।

प्रायश्चित के दिन का मनाया जाना कब बन्द हुआ

हमारी ओर से दिया गया यीशु (येसु सत्संग) का बलिदान प्रभावी और पर्याप्त था। क्रूस पर यीशु के बलिदान (33 ईस्वी सन्) के तुरंत बाद, रोमियों ने 70 ईस्वी सन् में महा पवित्र स्थान के साथ मंदिर को नष्ट कर दिया। तब से यहूदियों ने प्रायश्चित के दिन फिर कभी  कोई बलिदान नहीं दिया। आज, यहूदी इस दिन इस त्योहार को उपवास के साथ मनाते हैं। जैसा कि वेद पुस्तक (बाइबल) बताती है, एक बार जब प्रभावी बलिदान को चढ़ा दिया जाता है, तो फिर आगे के लिए वार्षिक बलिदान की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती है। इसलिए परमेश्वर ने इसे रोक दिया। 

दुर्गा पूजा और प्रायश्चित के दिन में स्वरूप

दुर्गा पूजा में दुर्गा के स्वरूप को आने के लिए आह्वान किया जाता है ताकि देवी मूर्ति में निवास करें। प्रायश्चित का दिन आने वाले बलिदान का एक पूर्वकथन था और जिस में किसी भी स्वरूप को आने के लिए आह्वान नहीं किया गया था। महा पवित्र स्थान में परमेश्वर अदृश्य था और इस प्रकार उसका कोई स्वरूप नहीं था।

परन्तु प्रभावी होने वाले बलिदान में, आने वाले सैकड़ों वर्षों में कई प्रायश्चितों के दिनों  की ओर संकेत किया गया था, एक स्वरूप का आह्वान किया गया था। जैसा कि वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है

15 वह अदृश्य परमेश्वर का
    दृश्य रूप है।
    वह सारी सृष्टि का सिरमौर है।

कुलुस्सियों 1:15

प्रभावी होने वाले बलिदान में, अदृश्य परमेश्वर के स्वरूप को आमंत्रित किया गया था और उसे यीशु के रूप में दिखाया गया था।

पुर्नमूल्यांकन करना

हम वेद पुस्तक (बाइबल) का अध्ययन कर रहे हैं। हमने देखा है कि कैसे परमेश्वर ने अपनी योजना को प्रकट करने के लिए कई संकेत दिए थे। आरम्भ में उसने आने वाले ‘पुरूष’ की भविष्यद्वाणी की। इसके बाद श्री अब्राहम का बलिदान, फसह का बलिदान और प्रायश्चित का दिन की भी भविष्यद्वाणी की। इस्राएलियों के ऊपर मूसा के आशीर्वाद और शाप बने हुए हैं। जो इस्राएलियों के इतिहास की गति देने के लिए उन्हें पूरे संसार, यहां तक ​​कि भारत में बिखराते हुए स्थापित करेंगे, जैसा कि यहां बताया गया है

दस आज्ञाएँ: कलियुग में कोरोना वायरस की जाँच की तरह

यह आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि हम कलियुग या काली के युग में रह रहे हैं। यह सतयुग, त्रेता युग और द्वापर युग से शुरू होने वाले चार युगों में अन्तिम युग है। इन चार युगों में जो बात सामान्य है वह पहले युग अर्थात् सत्य के युग (सतयुग) से लेकर हमारे अब तक के समकालीन कलियुग के युग तक होने वाला नियमित नैतिक और सामाजिक विघटन है।

महाभारत में मार्कंडेय ने कलियुग में मानव आचरण का वर्णन इस प्रकार किया है:

गुस्सा, क्रोध और अज्ञानता बढ़ेगी   प्रत्येक बीतते दिन के साथ धर्म, सत्यता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, शारीरिक शक्ति और स्मृति कम होती चली जाएगी।

लोगों के पास बिना किसी औचित्य के हत्या के विचार होंगे और वे इसमें कुछ भी गलत नहीं पाएगें।  वासना को सामाजिक रूप से स्वीकार होने के रूप में देखा जाएगा और संभोग को जीवन की केन्द्रीयआवश्यकता के रूप में देखा जाएगा।

  पाप तेजी से बढ़ेगा, जबकि पुण्य फीका पड़ जाएगा और फलने-फूलना बन्द कर देगा।

   लोग नशे और नशीले पदार्थों के आदी हो जाएंगे।

  गुरुओं को अब और अधिक सम्मान नहीं दिया जाएगा और उनके विद्यार्थी ही उन्हें चोट पहुँचाने का प्रयास करेंगे। उनकी शिक्षाओं का अपमान किया जाएगा, और काम वासना के अनुयायी सभी मनुष्यों के मनों को अपने  नियंत्रण में रखेंगे।

 सभी मनुष्य स्वयं को देवता या देवताओं के कृपापात्र घोषित कर देंगे और शिक्षाओं के स्थान पर इसे व्यवसाय बना लेंगे। लोग अब विवाह नहीं करेंगे और केवल यौन सुख प्राप्ति के लिए ही एक दूसरे के साथ रहेंगे।

मूसा और दस आज्ञाएँ

इब्रानी वेदों ने हमारे वर्तमान युग का ठीक उसी तरह वर्णन किया है। पाप करने की हमारी प्रवृत्ति के कारण, परमेश्वर ने मूसा को फसह के तुरन्त बाद मिस्र को छोड़ देने के तुरन्त बाद दस आज्ञाएँ दीं थीं। मूसा का लक्ष्य न केवल इस्राएल को मिस्र से बाहर ले जाने का था, बल्कि उन्हें जीवन जीने के लिए नए तरीके से मार्गदर्शन करने का भी था। इसलिए फसह के पचास दिनों के बाद, जिसने इस्राएलियों को छुटकारा दिया था, मूसा उन्हें सीनै के पर्वत (होरेब की पहाड़ी पर भी) पर ले गया जहाँ उन्होंने परमेश्वर की व्यवस्था को प्राप्त किया। यह व्यवस्था कलियुग में कलियुग की समस्याओं को उजागर करने के लिए प्राप्त हुई थी।

मूसा को क्या आज्ञाएँ मिली? यद्यपि पूरी व्यवस्था बहुत अधिक लम्बी थी, मूसा को सबसे पहले पत्थर की तख्तियों के ऊपर परमेश्वर के द्वारा लिखे गए विशिष्ट नैतिक आदेशों का एक सूची मिली थी, जिसे दस आज्ञाओं  (या दस हुक्म) के रूप में जाना जाता था। इन दस आज्ञाओं ने मिलकर व्यवस्था के सारांश का गठन किया – छोटे विवरणों से पहले नैतिक धर्म – और वे अब परमेश्वर की सक्रिय सामर्थ्य हैं जो हमें कलियुग में सामान्य बुराइयों के लिए पश्चाताप करने के लिए राजी करती हैं।

दस आज्ञाएँ

यहाँ पत्थर पर परमेश्वर के द्वारा लिखित दस आज्ञाओं की पूरी सूची दी गई है, जो मूसा द्वारा इब्रानी वेदों में वर्णित की गई है।

 तब परमेश्वर ने ये बातें कहीं,

“मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मैं तुम्हें मिस्र देश से बाहर लाया। मैंने तुम्हें दासता से मुक्त किया। इसलिए तुम्हें निश्चय ही इन आदेशों का पालन करना चाहिए।

“तुम्हे मेरे अतिरिक्त किसी अन्य देवता को, नहीं मानना चाहिए।

“तुम्हें कोई भी मूर्ति नहीं बनानी चाहिए। किसी भी उस चीज़ की आकृति मत बनाओ जो ऊपर आकाश में या नीचे धरती पर अथवा धरती के नीचे पानी में हो। किसी भी प्रकार की मूर्ति की पूजा मत करो, उसके आगे मत झुको। क्यों? क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ। मेरे लोग जो दूसरे देवताओं की पूजा करते हैं मैं उनसे घृणा करता हूँ। यदि कोई व्यक्ति मेरे विरुद्ध पाप करता है तो मैं उसका शत्रु हो जाता हूँ। मैं उस व्यक्ति की सन्तानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी तक को दण्ड दूँगा। किन्तु मैं उन व्यक्तियों पर बहुत कृपालू रहूँगा जो मुझसे प्रेम करेंगे और मेरे आदेशों को मानेंगे। मैं उनके परिवारों के प्रति सहस्रों पीढ़ी तक कृपालु रहूँगा।

“तुम्हारे परमेश्वर यहोवा के नाम का उपयोग तुम्हें गलत ढंग से नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यहोवा के नाम का उपयोग गलत ढंग से करता है तो वह अपराधी है और यहोवा उसे निरपराध नहीं मानेगा।

“सब्त को एक विशेष दिन के रूप में मानने का ध्यान रखना। सप्ताह में तुम छः दिन अपना कार्य कर सकते हो। 10 किन्तु सातवाँ दिन तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की प्रतिष्ठा में आराम का दिन है। इसलिए उस दिन कोई व्यक्ति चाहे तुम, या तुम्हारे पुत्र और पुत्रियाँ, तुम्हारे दास और दासियाँ, पशु तथा तुम्हारे नगर में रहने वाले सभी विदेशी काम नहीं करेंगे।” 11 क्यों? क्योंकि यहोवा ने छ: दिन काम किया और आकाश, धरती, सागर और उनकी हर चीज़ें बनाईं। और सातवें दिन परमेश्वर ने आराम किया। इस प्रकार यहोवा ने शनिवार को वरदान दिया कि उसे आराम के पवित्र दिन के रूप में मनाया जाएगा। यहोवा ने उसे बहुत ही विशेष दिन के रूप में स्थापित किया।

12 “अपने माता और अपने पिता का आदर करो। यह इसलिए करो कि तुम्हारे परमेश्वर यहोवा जिस धरती को तुम्हें दे रहा है, उसमें तुम दीर्घ जीवन बिता सको”

13 “तुम्हें किसी व्यक्ति की हत्या नहीं करनी चाहिए”

14 “तुम्हें व्यभिचार नहीं करना चाहिए”

15 “तुम्हें चोरी नहीं करनी चाहिए”

16 “तुम्हें अपने पड़ोसियों के विरुद्ध झूठी गवाही नहीं देनी चाहिए।”

17 “दूसरे लोगों की चीज़ों को लेने की इच्छा तुम्हें नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने पड़ोसी का घर, उसकी पत्नी, उसके सेवक और सेविकाओं, उसकी गायों, उसके गधों को लेने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें किसी की भी चीज़ को लेने की इच्छा नहीं करनी

चाहिए।”निर्गमन 20:1-18

दस आज्ञाओं का मानक

आज हम कभी-कभी यह भूल जाते हैं कि ये आज्ञाएँ  हैं। वे सुझाव नहीं हैं। और न ही उनकी सिफारिशें हैं। परन्तु इन आज्ञाओं का पालन करने के लिए हम किस सीमा तक जाना है? दस आज्ञाओं को देने से ठीक पहले  निम्नलिखित बातें आती हैं

तब मूसा पर्वत के ऊपर परमेश्वर के पास गया। जब मूसा पर्वत पर था तभी पर्वत से परमेश्वर ने उससे कहा, “ये बातें इस्राएल के लोगों अर्थात् याकूब के बड़े परिवार से कहो, ‘तुम लोगों ने देखा कि मैं अपने शत्रुओं के साथ क्या कर सकता हूँ। तुम लोगों ने देखा कि मैंने मिस्र के लोगों के साथ क्या किया। तुम ने देखा कि मैंने तुम को मिस्र से बाहर एक उकाब की तरह पंखों पर बैठाकर निकाला। और यहाँ अपने समीप लाया। इसलिए अब मैं कहता हूँ तुम लोग मेरा आदेश मानो। मेरे साक्षीपत्र का पालन करो। यदि तुम मेरे आदेश मानोगे तो तुम मेरे विशेष लोग बनोगे। समस्त संसार मेरा है।

निर्गमन 19:3,5

इन्हें ठीक दस आज्ञाओं को दिए जाने के बाद  दिया गया था  

मूसा ने चर्म पत्र पर लिखे विशेष साक्षीपत्र को पढ़ा। मूसा ने साक्षीपत्र को इसलिए पढ़ा कि सभी लोग उसे सुन सकें और लोगों ने कहा, “हम लोगों ने उन नियमों को जिन्हें यहोवा ने हमें दिया, सुन लिया है और हम सब लोग उनके पालन करने का वचन देते हैं।”

निर्गमन 24:7)

कभी-कभी विद्यालय की परीक्षाओं में, शिक्षक बहुभागीय प्रश्नों को देता है (उदाहरण के लिए 20) परन्तु फिर केवल कुछ ही प्रश्नों  के उत्तर देने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए, हम उत्तर देने के लिए 20 में से किन्हीं 15 प्रश्नों को चुन सकते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी उत्तर देने के लिए अपने लिए सबसे आसान 15 प्रश्नों को चुन सकता/सकती है। इस तरह शिक्षक परीक्षा को आसान बना देता है।

कई लोग दस आज्ञाओं को उसी तरह से सोचते हैं। वे सोचते हैं कि दस आज्ञाओं को देने के बाद परमेश्वर ने चाहा कि, “हम इन दस में से अपनी पसन्द के किसी भी छः को पालन करने का प्रयास कर सकते हैं”। हम इस तरह सोचते हैं क्योंकि हम यह कल्पना करते हैं कि परमेश्वर हमारे ‘भले कामों’ को हमारे ‘बुरे कामों’ के विरुद्ध सन्तुलित करता है। यदि हमारे अच्छे गुण हमारे बुरे प्रभावों को पीछे छोड़ देते हैं या उन्हें निरस्त कर देते हैं तो हम आशा करते हैं कि यह परमेश्वर के अनुग्रह को पाने के लिए पर्याप्त है।

यद्यपि, दस आज्ञाओं के एक ईमानदारी से भरे पठ्न से पता चलता है कि ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। लोगों को सभी आज्ञाओं का पालन करना और सभी आज्ञाओं पर – सभी  समयों में बने रहना हैं । इन्हें पालन करने की भारी कठिनाई के कारण कई लोगों दस आज्ञाओं को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया है। परन्तु वे कलियुग में उस स्थिति के लिए दिए गए थे जिसे कलियुग लाता है।

दस आज्ञाएँ और कोरोना वायरस जाँच

हम कदाचित् कलियुग के 2020 में पूरे संसार में व्याप्त कोरोना वायरस महामारी के साथ तुलना करने के लिए कठोर दस आज्ञाओं के उद्देश्य को और अधिक उत्तम रीति से समझ सकते हैं। कोविड -19 बुखार, खांसी और सांस की परेशानी के लक्षणों के साथ आने वाली एक बीमारी है जो कोरोना वायरस के कारण आती है – जो इतना छोटा है कि हम इसे नहीं देख सकते हैं।

मान लीजिए कि किसी को बुखार आ रहा है और उसे खांसी है। यह व्यक्ति आश्चर्य करता है कि समस्या क्या है। क्या उसे एक आम बुखार है या क्या वे कोरोना वायरस से संक्रमित हैं? यदि ऐसा है तो यह एक गंभीर समस्या है – यहाँ तक कि जीवन के लिए खतरा भी है। चूंकि कोरोनोवायरस बहुत तेजी से फैलता है और हर कोई इसके प्रति अतिसंवेदनशील है, इसलिए यह एक वास्तविक संभावना बना जाता है। इसका पता लगाने के लिए कि वे एक विशेष परीक्षण करते हैं जो यह निर्धारित करता है कि कोरोनोवायरस उनके शरीर में उपस्थित है या नहीं। कोरोनवायरस जाँच उनकी बीमारी का उपचार नहीं करता है, यह तो बस उन्हें निश्चित रूप से यह बताता है कि क्या उनके शरीर में कोरोनवायरस है जो कोविड-19 में परिणाम देगा, या क्या उन्हें कोई एक सामान्य बुखार है।

दस आज्ञाओं के साथ भी ऐसा ही है। कलियुग में नैतिक पतन वैसे ही प्रचिलत है जैसा कि 2020 में कोरोना वायरस प्रचलित है। सामान्य नैतिक अधर्म के इस युग में हम यह जानना चाहते हैं कि क्या हम स्वयं धर्मी हैं या कहीं हम भी पाप के कारण दागी तो नहीं हैं। दस आज्ञाएँ इसलिए दी गई थीं कि हम उनकी तुलना में अपने जीवन की जाँच करें, हम स्वयं के लिए जान सकते हैं कि क्या हम पाप से और इसके साथ आने वाले कर्म के परिणाम से मुक्त हैं या नहीं, या कहीं पाप की हमारे ऊपर पकड़ तो नहीं है। दस आज्ञाएँ कोरोनोवायरस जाँच की तरह ही काम करती हैं – इस तरह से आप जानते हैं कि क्या आपको यह बीमारी (पाप) है या नहीं या क्या आप इससे मुक्त हैं।

पाप का शाब्दिक अर्थ ‘खोने’ से है अर्थात् उस लक्ष्य को खो देने से जिसकी परमेश्वर हमसे अपेक्षा करता है जिसमें हम दूसरों, स्वयं और परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। परन्तु अपनी समस्या को पहचानने के स्थान पर हम या तो स्वयं की तुलना दूसरों से करते हैं (अपने आप को गलत मानक की तुलना में मापते हैं), या फिर धार्मिक गुणों को प्राप्त करने के लिए कठिन प्रयास करते हैं, या हार मान लेते हैं और बस सुख प्राप्ति के लिए जीवन जीते हैं। इसलिए ही परमेश्वर ने दस आज्ञाएँ दीं ताकि:

   20 व्यवस्था के कामों से कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के सामने धर्मी सिद्ध नहीं हो सकता। क्योंकि व्यवस्था से जो कुछ मिलता है, वह है पाप की पहचान करना।

रोमियों 3:20

यदि हम अपने जीवन की जाँच दस आज्ञाओं के मानक की तुलना में करते हैं तो यह कोरोनोवायरस जाँच को लेने जैसा है जो आंतरिक समस्या को दर्शाता है। दस आज्ञाएँ हमारी समस्या को ‘ठीक’ नहीं करती हैं, परन्तु समस्या को स्पष्ट रूप से प्रकट करती हैं, इसलिए हम उस उपाय को स्वीकार करेंगे जिसे परमेश्वर ने प्रदान किया है। स्वयं को-धोखे में बनाए रखने के स्थान पर, व्यवस्था हमें स्वयं को सटीक रूप से देखने की अनुमति देती है।

पश्चाताप में दिया गया परमेश्वर का उपहार

परमेश्वर ने जो उपाय दिया है, वह यीशु मसीह – येसु सत्संग की मृत्यु और पुनरुत्थान के माध्यम से पापों की क्षमा का उपहार है। जीवन का यह उपहार बस हमें इसलिए दिया जाता है यदि हम यीशु के काम में भरोसा करते और विश्वास रखते हैं।

16 यहोवा परमेश्वर ने मनुष्य को आज्ञा दी, “तुम बग़ीचे के किसी भी पेड़ से फल खा सकते हो।

गलातियों 2:16

जैसा कि श्री अब्राहम परमेश्वर के सामने धर्मी ठहरे थे, हमें भी धार्मिकता दी जा सकती है। परन्तु इसके लिए जरूरी है कि हम पश्चाताप  करें। पश्चाताप को अक्सर गलत समझा जाता है, परन्तु पश्चाताप का अर्थ केवल यह है कि अपने ‘विचारों को बदलते हुए’ पाप से मुड़ना और परमेश्वर की ओर  और उस उपहार की ओर मुड़ना जिसे वह हमें प्रदान करता है। जैसा कि वेद पुस्‍तक (बाइबल) बताती है:

 19 इसलिये तुम अपना मन फिराओ और परमेश्वर की ओर लौट आओ ताकि तुम्हारे पाप धुल जायें।

प्रेरितों के काम 3:19

आपके और मेरे लिए प्रतिज्ञा यह है कि यदि हम पश्चाताप करते हैं, परमेश्वर की ओर मुड़ते हैं, तो हमारे पापों को हमारे लेखे में नहीं गिना जाएगा और हम जीवन प्राप्त करेंगे। परमेश्वर ने अपनी महान दया में, हमें कलियुग में पाप के लिए एक जाँच और एक टीका दोनों को दिया है।

काली, मौत और फसह का चिन्ह

काली अर्थात् महिषासुर मर्दिनी हिन्दू देवी दुर्गा को आमतौर पर मृत्यु की देवी के रूप में जाना जाता है, लेकिन अधिक सटीक रूप से संस्कृत शब्द काल का अर्थ शब्द समय  से निकल कर आता है। काली के प्रतीक भय उत्पन्न करने वाले हैं क्योंकि उसे आमतौर पर अपने पति शिव के अधोमुखी शरीर पर एक पैर के साथ सिरों की माला के साथ, हाथ में रक्त-टपकने वाले ताजे कटे हुए सिर को पकड़े हुए, और कटे हुए हाथों के लहंगे को पहने हुए दिखाया जाता है। काली हमें इब्रानी वेद – बाइबल में मौत की एक और कहानी को समझने में मदद करती है।

काली शिव के अधोमुखी शरीर पर सिरों के साथ और भिन्न अंगों से सुशोभित है
काली शिव के अधोमुखी शरीर पर सिरों के साथ और भिन्न अंगों से सुशोभित है

काली से सम्बन्धित पौराणिक कथाओं के वृतान्त बताते हैं कि असुर-राजा महिषासुर ने देवताओं के विरूद्ध युद्ध की धमकी दी थी। इसलिए उन्होंने काली को अपने तेज से उत्पन्न किया था। काली ने एक बड़े नरसंहार में असुर-सेना को बर्बरतापूर्वक तरीके से उसके मार्ग में आने वाले सभी को नष्ट कर दिया था। युद्ध का चरमोत्कर्ष असुर-राजा महिषासुर के साथ उसकी लड़ाई में आया जिसे उसने एक हिंसक टकराव में नष्ट कर दिया। काली ने अपने विरोधियों के शरीर को खून बहते हुए अंगों में बदल दिया, लेकिन वह उन सभी के खून से मतवाली हो गई, इसलिए वह अपने आप को मृत्यु और विनाश से नहीं रोक पाई। देवताओं को तब तक यह निश्चित नहीं था कि वे उसे कैसे रोकें जब तक कि शिव ने युद्ध के मैदान में अपने आप को गतिहीन रूप से पड़े हुए होने के लिए स्वेच्छा से उसे रोकने के लिए नहीं दे दिया। इस तरह से जब काली अपने मृत विरोधियों के सिर और हाथों से सुशोभित थी, तब उसने अपने एक पैर को शिव के अधोमुखी शरीर पर रख दिया और इसे देखते ही वह अपनी चेतना में वापस आ गई और इस तरह से विनाश समाप्त हो गया।

इब्रानी वेद में फसह का वृतान्त काली और शिव की कहानी को दर्शाता है। फसह की कहानी काली की तरह, एक दूत को लिपिबद्ध करती है, जो एक दुष्ट राजा के विरोध में व्यापक स्तर पर मृत्यु को लाता है। मृत्यु का यह दूत, जैसे कि काली को रोकने के लिए शिव ने एक कमजोर स्थिति को अपने ऊपर ले लिया, वैसे ही किसी भी घर में जाने से रोक दिया जाता है, जहां एक असहाय मेम्ने की बलि दी गई होती है। ऋषि हमें बताते हैं कि काली की इस कहानी का अर्थ अहंकार पर विजय से सम्बन्धित है। फसह की कहानी का निहितार्थ भी नासरत के यीशु – येशु सत्संग – के आने और विनम्रता में अपने अहंकार को त्यागने और हमारी ओर से अपने आप को बलिदान में देने की ओर संकेत करना भी है। फसह की कहानी को जानना अर्थपूर्ण है।

फसह का पर्व

हमने देख लिया है कि कैसे ऋषि अब्राहम के द्वारा उसके पुत्र इसहाक का बलिदान यीशु के बलिदान की ओर संकेत कर रहा था। अब्राहम की मृत्यु के पश्चात्, उसके पुत्र इसहाक के वंशज, जिन्हें अब इस्राएली कह कर पुकारा जाता है, एक बड़ी सँख्या के लोग बन गए थे परन्तु साथ ही वे मिस्र में दास अर्थात् गुलाम बन गए थे।

अब हम एक बड़े ही नाटकीय संघर्ष में आ जाते हैं जो एक व्यक्ति जिसे मूसा कहा जाता है, के द्वारा केन्द्रित है और जिसका उल्लेख इब्रानी वेद बाइबल की निर्गमन नामक पुस्तक में मिलता है। इसका नाम ऐसा इसलिए है क्योंकि इसमें यह वृतान्त मिलता है कि कैसे मूसा अब्राहम के 500 वर्षों के पश्चात्, लगभग 1500 ईसा पूर्व में इस्राएलियों के मिस्र के दासत्व से बाहर निकाल कर लाया। मूसा को सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर (प्रजापति) के द्वारा आज्ञा दी गई थी कि वह मिस्र के फिरौन (शासक) का सामना करे और इसका परिणाम मूसा और फिरौन की इच्छाओं में प्रतिस्पर्धा के रूप में निकला। इस प्रतिस्पर्धा ने मिस्र के विरोध में दस विपत्तियों या अपदाओं को भी उत्पन्न किया। परन्तु फिरौन मिस्रियों को छोड़ देने के लिए सहमत नही हुआ इसलिए परमेश्‍वर 10वीं और अन्तिम विपत्ति उनके ऊपर लाने पर था। आप 10वीं विपत्ति के पूरे वृतान्त को इस लिंक पर यहाँ निर्गमन में पढ़ सकते हैं क्योंकि यह नीचे दिए गए विवरण में आपकी सहायता करेगा।

परमेश्‍वर के द्वारा 10वीं विपत्ति की आज्ञा यह थी कि मृत्यु का दूत (आत्मा) मिस्र के प्रत्येक घर के आगे से निकलेगा। उस देश की पूरी भूमि पर एक विशेष रात्रि में प्रत्येक पहिलौठा उन लोगों के घरों को छोड़कर मर जाएगा जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया है और इसके लहू को उस घर के द्वार की चौखटों पर लगाया हुआ है। फिरौन का विनाश उसके पुत्र और उसके सिंहासन के उत्तराधिकारी के मरने से होता है, यदि वह आज्ञा का पालन नहीं करता और मेम्ने के लहू को द्वार पर नहीं लगाता है। और मिस्र का प्रत्येक घर पहिलौठे पुत्र को खो देगा यदि वे मेम्ने का बलिदान नहीं करते और उसके लहू को चौखटों के ऊपर नहीं लगाते हैं। इस तरह से मिस्र राष्ट्रीय संकट का सामना करता है।

परन्तु वे घर जहाँ पर एक मेम्ने का बलिदान किया गया था और उसके लहू को चौखटों के ऊपर लगाया गया था के लिए यह प्रतिज्ञा दी गई थी ऐसा प्रत्येक घर सुरक्षित रहेगा। मृत्यु के दूत ने उस घर को छोड़ दिया। इस तरह से इस दिन को फसह कह कर पुकारा गया (क्योंकि मृत्यु ने उन सभी घरों को छोड़ दिया  था जहाँ पर द्वारों पर लहू को लगाया गया था)।

फसह का चिन्ह

अब जिन्होंने इस कहानी को सुना, उन्होंने यह मान लिया कि द्वारों पर लगा हुआ लहू का निशान मृत्यु के दूत के लिए निशान था। परन्तु 3500 वर्षों पहले लिखे हुए वृतान्त में से जिज्ञासा भरे हुए विवरण के ऊपर ध्यान दें।

परमेश्‍वर ने मूसा से कहा….“…मैं यहोवा हूँ। जिन घरों में तुम रहते हो उन पर [फसह के मेम्ने का] वह लहू

तुम्हारे लिए चिन्ह ठहरेगा; अर्थात् मैं उस लहू को देखकर तुम को छोड़ जाऊँगा। (निर्गमन 12:13)

यद्यपि परमेश्‍वर द्वार के ऊपर लहू को देख रहा था, और जब वह उसे देखता है तो मृत्यु उसके घर को छोड़ देगी, लहू परमेश्‍वर के लिए चिन्ह नहीं था। यह बड़ी ही स्पष्टता से कहता है, कि लहू ‘आपके लिए एक चिन्ह’– अर्थात् लोगों के लिए चिन्ह था। यह साथ ही हम सभों के लिए भी चिन्ह है जो इस वृतान्त को पढ़ते हैं। परन्तु कैसे यह एक चिन्ह है? एक महत्वपूर्ण सुराग यह है कि इस घटना के घटित हो जाने के पश्चात् परमेश्‍वर ने उन्हें यह आज्ञा दी:

इस कारण वह दिन तुम्हारी पीढ़ियों में सदा की विधि जानकर माना जाए। जब तुम उस देश में प्रवेश करो…तब यह काम किया करना…यह परमेश्‍वर के लिए फसह का बलिदान होगा (निर्गमन 12:17)

Jewish man with lamb at Passover
फसह के पर्व पर मेम्ने के साथ एक यहूदी व्यक्ति

यहूदी इस्राएलियों को प्रत्येक वर्ष के उसी दिन फसह का पर्व मानने की आज्ञा दी गई थी। यहूदी पंचाँग, चन्द्रमा आधारित पंचाँग होने के कारण, पश्चिमी पंचाँग से थोड़ा सा भिन्न है,यदि आप इसका आंकलन पश्चिमी पंचाँग के अनुसार करें तो आप पाएंगे कि वर्ष में दिनों की गिनती प्रत्येक वर्ष परिवर्तित होती ही जाती है। परन्तु आज के दिन भी, लगभग 3500 वर्षों के पश्चात्, यहूदी लोग निरन्तर फसह के पर्व अर्थात् त्योहार को प्रत्येक वर्ष उसी दिन दी हुई आज्ञा का पालन करते हुए इस घटना की स्मृति में मनाते हैं।

फसह का चिन्ह प्रभु यीशु की ओर संकेत कर रहा है

और इतिहास में इस पर्व की खोज करते हुए हम कुछ असाधारण बातों को नोट कर सकते हैं। आप इसे सुसमाचारों में भी ध्यान से नोट कर सकते हैं जहाँ पर यह यीशु के पकड़े और जाँचे जाने (प्रथम फसह की विपत्ति के 1500 वर्षों को पश्चात्) के विवरणों को उल्लेख करता है:

“तब वे यीशु को…रोमी राज्यपाल [पीलातुस] के किले ले गए…परन्तु वे आप किले के भीतर नहीं गए ताकि अशुद्ध न हों परन्तु फसह खा सकें”… [पीलातुस]ने [यहूदी अगुवों से] कहा “…पर तुम्हारी यह रीति है कि मैं फसह के समय में तुम्हारे लिये एक व्यक्ति को छोड़ दूँ। अत: क्या तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये ‘यहूदियों के राजा’ को छोड़ दूँ?” तब उन्होंने फिर चिल्ला कर कहा, “इसे नहीं…”(यूहन्ना 18:28, 39-40)

दूसरे शब्दों में, यीशु को पकड़ लिया गया था और कूस्रीकरण के लिए यहूदी पंचाँग के अनुसार ठीक फसह के दिन  ही भेजा गया था। यीशु को दी हुई पदवियों में से एक यह थी

दूसरे दिन यूहन्ना ने यीशु को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत का पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था’” (यूहन्ना 1:29-30)

यहाँ पर हम देखते हैं कि कैसे फसह का नाटक हमारे लिए एक चिन्ह है। यीशु, परमेश्‍वर के मेम्ने को वर्ष के ठीक उसी दिन  क्रूसित (अर्थात् बलिदान) किया गया था जब सभी यहूदी प्रथम फसह के स्मरण में मेम्ने का बलिदान कर रहे थे जो 1500 वर्षों पहले घटित हुई था। यह दो छुट्टियों के वार्षिक समय की व्याख्या करते हैं जो प्रत्येक वर्ष – समानान्तर रूप में घटित होती है जिस पर हममें से थोड़े ही ध्यान देते हैं और यहाँ तक कि बहुत ही थोड़े पूछते हैं कि ‘क्यों’ ऐसा घटित होता है? यहूदियों का फसह का पर्व प्रत्येक वर्ष लगभग उसी समय घटित होता है जब मसीहियों का ईस्टर का पर्व आता है – अपने पंचाँग को जाँचें। (प्रत्येक 19वें वर्ष के एक महीने में विचलन यहूदियों के पंचाँग के चन्द्र-आधारित लीप वर्ष के चक्र के कारण होता है)। इसलिए ही ईस्टर आगे की ओर बढ़ जाता है क्योंकि यह फसह के ऊपर आधारित है और फसह का समय यहूदी पंचाँग के द्वारा निर्धारित होता है जो वर्ष की गणना पश्चिमी पंचाँग से भिन्न रूप में करता है।

अब एक मिनट के लिए यह विचार करें चिन्ह  क्या करते हैं। आप कुछ चिन्हों को नीचे यहाँ पर देख सकते हैं।

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भारत का एक चिन्ह

व्यावसायिक चिन्ह हमें मैक्डोनाल्डस् और नाईक को सोचने के लिए मजबूर करते हैं

झण्डा या ध्वज भारत का चिन्ह या प्रतीक है। हम केवल एक नांरगी और एक हरी पट्टी को ही आयताकार रूप में नहीं ‘देखते’ हैं। नहीं, जब भी हम झण्डे को देखते हैं, हम भारत को सोचते हैं। ‘सुनहरी मेहराबें’ हमें मैक्डोनाल्डस् को सोचने के बारे में मजबूर करती हैं। टेनीस खिलाड़ी नाडॉल के सिर पर बँधी हुई पट्टी पर दिया हुआ चिन्ह ‘√’ नाईक के लिए सोचने पर मजबूर करता है। नाईक चाहता है कि हम उनके बारे में सोचें जब भी हम नाडॉल के सिर पर बँधी पट्टी पर दिए हुए चिन्ह को देखते हैं। दूसरे शब्दों में, चिन्ह हमारे मनों के लिए ऐसे संकेत हैं जो हमारी सोच को इच्छित की हुई वस्तु की ओर निर्देशित करते हैं।

Signsइब्रानी वेद के निर्गमन में दिए हुए फसह का वृतान्त स्पष्ट रूप से यह कहता है कि चिन्ह लोगों के लिए दिया गया था,  न कि सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर के लिए (यद्यपि वह अभी भी लहू की ओर देखगा और यदि वह इसे उन घरों पर देखता है तो उन्हें छोड़ देगा)। किसी भी दिए हुए चिन्ह की तरह, जब हम फसह की ओर देखते हैं तो वह हमारे मनों की सोच से क्या इच्छा रखता है? मेम्ने के बलिदान का उल्लेखनीय समय वही दिन था जिस दिन यीशु का बलिदान हुआ था, इसलिए यह यीशु के बलिदान की ओर एक संकेत करने वाला  होना चाहिए।

यह हमारे मनों में उसी तरह से कार्य करता है जैसा मैंने नीचे दिए आरेख में दिखाया है। चिन्ह वहाँ पर यीशु के बलिदान की ओर संकेत करने के लिए दिया गया था।

फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था
फसह के प्रति यीशु के बलिदान का उसी समय में घटित होना एक चिन्ह था

प्रथम फसह के समय मेम्नों का बलिदान हुआ था और लहू को लगाया गया था ताकि लोग बचाए जा सकें। और इसी प्रकार, यह चिन्ह यीशु की ओर हमें यह बताने के लिए संकेत कर रहा है कि, ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ मृत्यु के लिए बलिदान होने के लिए दिया गया था और उसका लहू बहाया गया ताकि हम जीवन को प्राप्त कर सकें।

हमने अब्राहम के चिन्ह लेख में देखा था जिस स्थान पर अब्राहम की परीक्षा उसके पुत्र को मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर बलिदान देने के द्वारा की गई थी। वहीं पर एक मेम्ने को मरना था ताकि अब्राहम का पुत्र जीवित रह सके। मोरिय्याह पहाड़

अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था
अब्राहम का चिन्ह उस स्थान की ओर संकेत कर रहा था

ठीक वही स्थान था जहाँ पर यीशु का बलिदान हुआ था। यह चिन्ह हमें उस स्थान की ओर संकेत करते हुए उसकी मृत्यु के अर्थ को ‘देखने’ के लिए दिया गया था। फसह में हम एक ओर सूचक कोवर्ष के ठीक उसी दिन  को यीशु के बलिदान की ओर संकेत करता हुआ पाते हैं। एक बार फिर से मेम्ने के बलिदान का उपयोग – यह दिखाने के लिए किया गया है कि यह यीशु के बलिदान की ओर संकेत करती हुई – घटना का एक संयोग मात्र नहीं है। दो भिन्न तरीकों से (स्थान के द्वारा और समय के द्वारा) पवित्र इब्रानी वेदों में दिए हुए दो अति महत्वपूर्ण त्योहार यीशु के बलिदान की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं। मैं इतिहास में किसी भी अन्य व्यक्ति के बारे में नहीं सोच सकता हूँ जिसकी मृत्यु की प्रतिछाया इस तरह से नाटकीय तरीके में इस तरह की समानताओं के साथ दी गई हो। क्या आप सोच सकते हैं?

यह चिन्ह इसलिए दिए गए हैं कि हम उस पर आश्वस्त हो सकें कि यीशु का बलिदान वास्वत में परमेश्‍वर की ओर से योजनाबद्ध और ठहराया हुआ था। यह उदाहरण के रूप में दिया हुआ है ताकि हम यह कल्पना कर सकें कि कैसे यीशु का बलिदान हमें मृत्यु से बचाता है और पाप से शुद्ध करता है –परमेश्‍वर की ओर से उन सभों को दिया हुआ उपहार है जिसे सभी प्राप्त कर सकते हैं।

पर्वत को पवित्र बनाने वाला बलिदान

कैलाश पर्वत (या कैलासा) चीन के तिब्बती क्षेत्र में भारतीय सीमा के पार एक पर्वत है। हिंदू, बौद्ध और जैन कैलाश पर्वत को एक पवित्र पर्वत मानते हैं। हिंदुओं द्वारा, पर्वत कैलाश को भगवान शिव (या महादेव), साथ ही उनकी पत्नी, देवी पार्वती (जिसे उमा, गौरी भी कहा जाता है), और उनकी सन्तान गणेश (गणपति या विनायक) का निवास स्थान माना जाता है। हजारों हिंदू और जैन पर्वत कैलाश में पवित्र अनुष्ठान में इसके चारों ओर घूमने के लिए तीर्थयात्रा करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

कैलाश वह स्थान है, जहाँ भगवान शिव ने गणेश को तब मारा था जब गणेश ने उन्हें पार्वती को स्नान करते हुए देखने से रोका था। इस प्रकार यह प्रसिद्ध कहानी आगे बढ़ती है कि कैसे गणेश शिव के पास मृत्य में से तब वापस आया जब उसने उसके धड़ पर हाथी का सिर रख दिया था। हाथी की मृत्यु बलिदानात्मक रूप से गणेश को सिर देने के लिए हुई थी, ताकि भगवान शिव अपने पुत्र को मृत्यु में से वापस पा सकें। यह बलिदान कैलाश पर हुआ, जिससे यह पर्वत पवित्र बन गया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि कैलाश मेरु पर्वत का भौतिक रूप है – जो ब्रह्मांड का आध्यात्मिक और लौकिक केन्द्र है। कैलाश पर्वत के माध्यम से मेरु पर्वत की ओर केन्द्रित होते हुए इस आध्यात्मिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले संकेत के रूप में कई मन्दिरों को प्रतीकात्मक रूप से निर्मित किया गया है।

पर्वत पर बलिदान के माध्यम से एक पुत्र को मृत्यु से वापस लाने के लिए भगवान की यह अभिव्यक्ति भी श्री अब्राहम द्वारा एक अन्य पर्वत – मोरिय्याह पर्वत – पर अपने पुत्र के साथ हुए अनुभव के लिए नमूने का कार्य करता है। यह बलिदान येशु सत्संग – यीशु के आने वाले अवतार अर्थात् देहधारण में एक गहरी आध्यात्मिक वास्तविकता की ओर एक संकेत था। इब्रानी वेदों ने 4000 वर्षों पहले ही श्री अब्राहम के अनुभवों के बारे में बता दिया था। यह घोषणा करता हैं कि इस संकेत को समझने से – ‘सभी राष्ट्रों’ को आशीर्वाद मिलेगा – न कि केवल इब्रानियों को। इसलिए इस कहानी को सीखना और उसके महत्व को समझना सार्थक है।

श्री अब्राहम के बलिदान का पर्वतीय चिन्ह

हमने देखा कि कैसे अब्राहम को, बहुत पहले, जातियों की प्रतिज्ञा दी गई। यहूदी और अरब के लोग आज अब्राहम से ही निकल कर आए हैं, इस कारण हम जानते हैं कि प्रतिज्ञा सच्ची ठहरी और यह कि वह इतिहास में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति है।क्योंकि अब्राहम ने इस प्रतिज्ञा के ऊपर भरोसा किया इसलिए उसे धार्मिकता दी गई –उसने मोक्ष को प्राप्त कर लिया परन्तु किसी कठोर परिश्रम के द्वारा अपितु उसने बस केवल इसे किसी एक मुफ्त उपहार की तरह पा लिया था।

कुछ समय के पश्चात्, अब्राहम ने लम्बे समय से प्रतिक्षा किए जा रहे पुत्र इसहाक (जिसमें से यहूदी अपने पूर्वजों को निकल कर आया हुआ पाते हैं) को प्राप्त कर लिया। इसहाक एक नौजवान पुरूष बन गया। परन्तु तब परमेश्‍वर ने अब्राहम की नाटकीय तरीके से जाँच की। आप इसके पूरे वृतान्त को यहाँ पर पढ़ सकते हैं और तब इस रहस्यमयी जाँच के अर्थों के मुख्य तथ्यों को खोलने के लिए आगे बढ़ सकते हैं – जो हमारी इस बात में सहायता करता है कि कैसे हमारे लिए धार्मिकता को देने के लिए अदा किया जाएगा।

अब्राहम की जाँच

इस जाँच का आरम्भ परमेश्‍वर के द्वारा एक नाटकीय आदेश को दिए जाने के द्वारा होता है:

परमेश्‍वर   ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र – इसहाक को – जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा और वहाँ उसको एक पहाड़ के ऊपर जो मैं तुझे बताऊँगा होमबलि करके चढ़ा।” (उत्पत्ति 22:2)

अब्राहम, आदेश के आज्ञापालन में ‘अगले सबेरे तड़के’ उठा और ‘तीन दिन की यात्रा’ के पश्चात् वे उस पहाड़ पर पहुँच गए। तब

9जब वे उस स्थान को जिसे परमेश्‍वर ने उसको बताया था पहुँचे; तब अब्राहम ने वहाँ वेदी बनाकर लकड़ी को चुन चुनकर रखा, और अपने पुत्र इसहाक को बाँध कर वेदी पर की लकड़ी के ऊपर रख दिया। 10फिर अब्राहम ने हाथ बढ़ाकर छुरी को ले लिया कि अपने पुत्र को बलि करे। (उत्पत्ति 22:9-10)

अब्राहम आदेश की आज्ञापालन किए जाने के लिए तत्पर था। परन्तु तब कुछ उल्लेखनीय घटना घट गई:

11तब यहोवा परमेश्‍वर के दूत ने स्वर्ग से उसको पुकार के कहा, “हे अब्राहम ! हे अब्राहम!”

उसने कहा, “देख, मैं यहाँ पर हूँ।”

12उसने कहा, “उस लड़के पर हाथ मत बढ़ा, और न उससे कुछ कर; क्योंकि तू ने जो मुझ से अपने पुत्र, वरन् अपने एकलौते को भी नहीं रख छोड़ा; इससे मैं अब जान गया कि तू परमेश्‍वर का भय मानता है।”

13 तब अब्राहम ने आँखें उठाईं, और क्या देखा कि उसके पीछे एक मेढ़ा अपने सींगों से एक झाड़ी में फँसा हुआ है; अत: अब्राहम ने जा के उस मेढ़े को लिया, और अपने पुत्र के स्थान पर उसे होमबलि करके चढ़ाया। (उत्पत्ति 22:11-13)

अन्तिम क्षणों में इसहाक मृत्यु से बच गया और अब्राहम ने एक नर मेढ़े को देखा और उसकी अपेक्षा उसे बलिदान किया। परमेश्‍वर ने एक मेम्ने का प्रबन्ध किया था और मेम्ने ने इसहाक का स्थान ले लिया।

भविष्य की ओर देखते हुए : बलिदान

अब्राहम तब उस स्थान का नाम रखता है। ध्यान दें कि वह क्या नाम रखता है।

अब्राहम ने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा इसके अनुसार आज तक भी कहा जाता है कि “यहोवा के पहाड़ पर उपाय किया जाएगा। (उत्पत्ति 22:14)

अब्राहम ने उसका नाम यहोवा परमेश्‍वर प्रबन्ध करेगा कह कर रखा। यहाँ पर एक प्रश्न है। यह नाम भूत काल, वर्तमान काल या भविष्य काल किस में लिखा हुआ है? क्या यह स्पष्ट रूप से भविष्य काल में है। और आगे आने वाली टिप्पणी और भी अधिक स्पष्ट रूप से दुहराती है “…इसका उपाय किया जाएगा” यह भी भविष्य काल में लिखा हुआ है – इस तरह से यह भी भविष्य की ओर देख रहा है। परन्तु नाम रखने का यह कार्य इसहाक के स्थान पर मेम्ने (एक नर भेड़) के बलिदान के पश्चात्  हुआ है। अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि जब अब्राहम, उस स्थान का नाम रख रहा था, तब वह उस झाड़ी में फँसे हुए और अपने पुत्र के स्थान पर बलिदान किए जाने वाले मेढ़े की ओर संकेत कर रहा था। परन्तु अब तक तो वह पहले ही बलिदान कर दिया गया और जला दिया जा चुका था। यदि अब्राहम मेढ़े के बारे में सोच रहा था – जो पहले से बलिदान कर दिया, मर चुका और जला दिया गया था –तब तो उसने उस स्थान का नाम यहोवा परमेश्‍वर ने प्रबन्ध किया है, करके रखा होता, अर्थात् भूत काल वाक्य में। और टिप्पणी ऐसी लिखी गई होती ‘और आज तक भी यह कहा जाता है कि “यहोवा परमेश्‍वर के पहाड़ पर उपाय किया गया था।’” परन्तु अब्राहम ने स्पष्ट रूप से इसे भविष्य काल में लिखा है और इसलिए वह यह नहीं सोच रहा था कि वह पहले से मर चुका है और उसने मेढ़े का बलिदान कर दिया है। वह कुछ भिन्न तरह की बात से आत्म जागृत हुआ था। उसके पास भविष्य के बारे में कुछ आत्मबोध थे।  परन्तु वे क्या थे?

जहाँ पर बलिदान की घटना घटित हुई

उस पहाड़ को स्मरण रखें जहाँ पर अब्राहम को इस बलिदान को चढ़ाने के लिए भेजा गया था:

तब परमेश्‍वर ने कहा, “अपने पुत्र को अर्थात् अपने एकलौते पुत्र इसहाक को जिस से तू प्रेम रखता है, संग लेकर मोरिय्याह देश में चला जा…” (वचन 2)

इस तरह से यह ‘मोरिय्याह’ में घटित हुआ। यह कहाँ पर है? यद्यपि यह अब्राहम के दिनों में (2000 ईसा पूर्व) जंगली क्षेत्र था, परन्तु एक हजार वर्षों (1000 ईसा पूर्व) के पश्चात् राजा दाऊद ने यहाँ पर यरूशलेम नगर की स्थापना की थी और उसके पुत्र सुलैमान ने यहाँ पर पहले मन्दिर का निर्माण किया था। हम इसे बाद में पुराने नियम की ऐतिहासिक पुस्तकों में पढ़ते हैं:

तब सुलैमान ने यरूशलेम में मोरिय्याह नामक पहाड़ पर उसी स्थान में यहोवा परमेश्‍वर का भवन बनाना आरम्भ किया, जिसे उसके पिता दाऊद ने दर्शन पाकर तैयार किया था (2 इतिहास 3:1)

दूसरे शब्दों में, अब्राहम के दिनों में (4000 ईसा पूर्व) ‘मोरिय्याह का पहाड़’ जंगल में एक सुनसान पहाड़ी था परन्तु 1000 वर्षों के पश्चात् दाऊद और सुलैमान के द्वारा यह इस्राएलियों के लिए एक केन्द्रीय नगर बन गया  जहाँ पर उन्होंने सृष्टिकर्ता का मन्दिर का निर्माण किया। और आज के दिन तक भी इसे यहूदी लोगों का एक पवित्र स्थान और इस्राएल की राजधानी माना जाता है।

यीशु – येसू सत्संग – और अब्राहम का बलिदान

अब यीशु की पदवियों के बारे में सोचें। यीशु से सम्बन्धित बहुत सी पदवियाँ हैं। कदाचित् सबसे अधिक जानी-पहचानी पदवी ‘मसीह’ की है।परन्तु उसे एक अन्य पदवी भी दी गई है जो कि अति महत्वपूर्ण है। हम इसे यूहन्ना के सुसमाचार में देखते हैं जहाँ पर यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला उसके विषय में ऐसा कहता है:

दूसरे दिन उसने (अर्थात् यूहन्ना बपतिस्मा देने वाला) यीशु (अर्थात् येसू सत्संगी) को अपनी ओर आते देखकर कहा, “देखो, यह परमेश्‍वर का मेम्ना है जो जगत के पाप उठा ले जाता है। यह वही है जिसके विषय में मैंने कहा था, ‘एक पुरूष मेरे पीछे आता है जो मुझ से श्रेष्ठ है, क्योंकि वह मुझ से पहले था।’” (यूहन्ना 1:29-30)

दूसरे शब्दों में, यीशु को परमेश्‍वर का मेम्ना  के रूप में जाना जाता था। अब यीशु के जीवन के अन्त के ऊपर ध्यान दें। उसे कहाँ पर पकड़ा और क्रूसित किया गया? यह यरूशलेम में हुआ था (जिसे हमने =‘मोरिय्याह पहाड़’ के रूप में ऐसे देखा है)। इसे बिल्कुल ही स्पष्ट शब्दों में उसके पकड़े जाने के समय पर कहा गया है:

और [पिलातुस] यह जानकर कि वह हेरोदेस की रियासत का है, उसे हेरोदेस के पास भेज दिया, क्योंकि उन दिनों में वह भी यरूशलेम में था। (लूका 23:7)

यीशु का पकड़ा जाना, उसकी जाँच और क्रूसीकरण यरूशलेम (=मोरिय्याह पहाड़) में घटित हुए। नीचे दी गई समयरेखा उन घटनाओं को दर्शाती है जो मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई।

मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ
मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर घटित हुई मुख्य घटनाएँ

आइए अब पुन: अब्राहम के बारे में सोचें। क्यों उसने उस स्थान का नाम भविष्य काल के वाक्य ‘यहोवा परमेश्‍वर उपाय करेगा’ से रखा? कैसे वह यह जान सकता है कि भविष्य में किसी ऐसी बात का ‘प्रबन्ध’ किया जाएगा जो अत्यधिक निकटता से वैसे ही घटित होगी जैसा कि उसने मोरिय्याह पहाड़ पर किया था? इसके बारे में सोचें– उसकी परीक्षा में इसहाक (उसका पुत्र) अन्तिम क्षणों में मृत्यु से बचा लिया गया था क्योंकि एक मेम्ना उसके स्थान पर बलिदान हो गया था। दो हजार वर्षों पश्चात्, यीशु को ‘परमेश्‍वर का मेम्ना’ कह कर पुकारा गया है और उसे उसी स्थान  के ऊपर बलिदान किया गया! कैसे अब्राहम यह जान पाया कि यही ‘वह स्थान’ होगा? वह केवल इसे इस तरह से ही जान सकता था और कुछ घटित होने वाला था, की भविष्यद्वाणी कर सकता था जो कि उल्लेखनीय हो जब उसे स्वयं सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर, प्रजापति की ओर से आत्मजागृति प्राप्त न हुई हो।

ईश्‍वरीय  मन प्रकाशित हुआ है

यह ऐसा है मानो कि वहाँ पर ऐसा मन था जिसने इन दोनों घटनाओं को अपने स्थान के कारण आपस में सम्बद्ध कर दिया है यद्यपि यह दोनों इतिहास के 2000 वर्षों में एक दूसरे से पृथक हैं।

अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।
अब्राहम का बलिदान एक चिन्ह था – जो आगे 2000 वर्षों की ओर – हमें यीशु के बलिदान के बारे में सोचने के लिए संकेत दे रहा था।

उपरोक्त चित्र यह दर्शाता है कि कैसे पहले की घटना (अब्राहम का बलिदान) बाद की घटना (यीशु के बलिदान) की ओर संकेत करती है और इसकी रचना हमें इस बाद वाली घटना को स्मरण दिलाने के लिए की गई थी। यह प्रमाणित करता है कि यह मन (सृष्टिकर्ता परमेश्‍वर  ) हम पर स्वयं को हजारों वर्षों में घटित हुई पृथक घटनाओं को संयोजित करते हुए प्रकाशित कर रहा है। यह एक चिन्ह है जिसे परमेश्‍वर ने अब्राहम के द्वारा बोला।

आपके और मेरे लिए शुभ सन्देश

यह वृतान्त हमारे लिए और अधिक व्यक्तिगत् कारणों से बहुत महत्वपूर्ण है। सार में यह कहना, कि परमेश्‍वर   ने अब्राहम के लिए यह घोषणा की:

“…और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगी : क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है” (उत्पत्ति 22:18)

क्या आप इस ‘पृथ्वी की सभी जातियों’ में एक से सम्बन्धित नहीं हैं – यह बात कोई अर्थ नहीं रखती कि आप चाहे किसी भी भाषा, धर्म, शिक्षा, उम्र, लिंग या सम्पन्नता से क्यों न सम्बद्ध हों? अब यह एक ऐसी प्रतिज्ञा है जिसे विशेष रूप से आपको दिया गया है! और ध्यान दें यह प्रतिज्ञा क्या है – यह स्वयं परमेश्‍वर की ओर से एक ‘आशीष’ है! यह केवल यहुदियों के लिए नहीं है, अपितु इस संसार के सभी लोगों के लिए है।

यह ‘आशीष’ कैसे दी गई है? शब्द ‘वंश’ यहाँ पर एकवचन  है। यह कई सन्तानों या लोगों में ‘वंशों’ के रूप में नहीं दिया गया है, परन्तु यह एकवचन में दिया गया है जैसे यह ‘वह’ में होता है। यह कई लोगों या लोगों के समूह के द्वारा नहीं है जैसा कि ‘वे’ में होता है। यह इतिहास के आरम्भ में दी हुई प्रतिज्ञा के अक्षरश:समान्तर है, जब ‘वह’ इब्रानी वेदों में वर्णित सर्प की ‘ऐड़ी को डसेगा’ और साथ ही पुरूषासूक्ता में दिए हुए (‘वह’ अर्थात्) पुरूषा के बलिदान की प्रतिज्ञा के सामान्तर भी है। इस चिन्ह के साथ वही स्थान– अर्थात् मोरिय्याह पहाड़ (=यरूशलेम) – की भविषद्वाणी इन प्राचीन प्रतिज्ञाओं का और अधिक विस्तार देते हुए की गई है। अब्राहम के बलिदान के नाटक का वर्णन हमें यह समझने में सहायता करता है कि कैसे इस आशीष को दिया गया है, और कैसे धार्मिकता की कीमत को अदा किया जाएगा।

परमेश्‍वर की आशीष को कैसे प्राप्त किया जाता है?

ठीक वैसे ही जैसे एक मेढ़े ने इसहाक को मृत्यु से उसके स्थान पर बलिदान होते हुए बचा लिया, ठीक वैसे ही परमेश्‍वर का मेम्ना, अपनी बलिदानात्मक मृत्यु के द्वारा, हमें मृत्यु की सामर्थ्य और इसके जुर्माने से बचाता है। बाइबल यह घोषणा करती है

…पाप की मजदूरी तो मृत्यु है (रोमियों 6:23)

यह एक और तरीका है जिसके द्वारा यह कहा जाता है कि जिन पापों को हम करते हैं वह ऐसे कर्मों को उत्पन्न करते हैं जिनका परिणाम मृत्यु है। परन्तु मृत्यु को मेम्ने ने इसहाक के स्थान पर बलिदान होते हुए अदा कर दिया। अब्राहम और इसहाक को तो बस स्वीकार करना था। वह इसके योग्य नहीं था और न ही हो सकता था। परन्तु वह इसे एक उपहार के रूप में स्वीकार कर सकता था। यही वास्तव में वह बात है कि उसने कैसे मोक्ष को प्राप्तकिया।

यह हमें उस पद्धति को दिखाती है जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। यीशु ‘परमेश्‍वर का मेम्ना था जो जगत के पापों को उठा ले जाता है’। इसमें आपके स्वयं के पाप भी सम्मिलित हैं। इस तरह से यीशु, जो मेम्ना है, आपके पापों को उठा ले जाने का प्रस्ताव देता है क्योंकि उसने कीमत को अदा कर दिया है। आप इसके योग्य नहीं हैं परन्तु आप इसे उपहार के रूप में पा सकते हैं। यीशु से प्रार्थना कीजिए,जो पुरूषा है, और उससे कहें कि वह आपके पापों को अपने ऊपर ले ले। उसका बलिदान उसके इस सामर्थ्य को प्रदान करता है। हम इसे इसलिए जानते हैं क्योंकि यह संयोग से मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर अब्राहम के द्वारा बलिदान किए हुए उल्लेखनीय वृतान्त की प्रतिछाया था, ठीक उसी स्थान की जहाँ 2000 वर्षों पश्चात् इसका ‘प्रबन्ध यीशु के द्वारा’ किया गया था।

मोक्ष प्राप्ति के लिए अब्राहम का साधारण तरीका

ग्रंथ महाभारत निःसंतान राजा पांडु द्वारा सामना किए गए संघर्षों को स्मरण करता है, जो कि एक उत्तराधिकारी के बिना था। ऋषि किंदामा और उनकी पत्नी ने गुप्त तरीके से यौन सम्बन्ध बनाने के लिए हिरण का रूप धारण किया था। दुर्भाग्यवश, राजा पांडु तब शिकार कर रहे थे और उनका बाण दुर्घटनावश गलती से उन्हें जा लगा। क्रोधित होकर ऋषि किंदामा ने राजा पांडु को उनकी पत्नियों के साथ अगली बार यौन संबंध बनाते समय मरने का श्राप दे दिया। इस प्रकार राजा पांडु को किसी भी सन्तान के होने से और उनके सिंहासन के लिए उत्तराधिकारी बनने से रोक दिया गया। उनकी राजगद्धी के बने रहने के लिए इस खतरे को कैसे दूर किया जाए?

पिछली पीढ़ी में उत्पन्न हुई इसी समस्या को हल करने के लिए राजा पांडु का जन्म स्वयं में ही एक निराशा भरा कार्य था। भूतपूर्व राजा, विचित्रवीर्य नि:संतान मरा था, इसलिए एक उत्तराधिकारी की आवश्यकता थी। विचित्रवीर्य की माँ सत्यवती का एक पुत्र व्यास, राजा शांतनु विचित्रवीर्य के पिता से विवाह से पहले जन्मा था । इस पुत्र, व्यास को, विचित्रवीर्य की विधवाओं अंबिका और अंबालिका के लिए गर्भधारण करने के लिए आमंत्रित किया गया था। व्यास और अंबालिका के शारीरिक मिलन से पांडु का जन्म हुआ था। इस प्रकार राजा पांडु व्यास के जैविक पुत्र तो थे, परन्तु वह नियोग  प्रथा के माध्यम से भूतपूर्व राजा विचित्रवीर्य के उत्तराधिकारी थे, जहाँ एक सरोगेट पुरुष अर्थात् कोई दूसरा पुरूष एक बच्चे का पिता बना सकता था, जब किसी स्त्री के पति की मृत्यु हो जाती थी। हताशा भरी आश्यकता में ही इस कार्यवाही को लिए किसी दूसरे पुरूष को बुलाया जाता था।

अब राजा पांडु को भी इसी तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा था, जो कि किंदामा द्वारा उस पर लगाए गए श्राप का फल था। क्या किया जाए? एक बार फिर, से हताश भरी कार्यवाही की आवश्यकता थी। पांडु की पत्नियों में से एक, रानी कुन्ती (या प्रथा), एक गुप्त मंत्र (जिसे ब्राह्मण दुर्वासा द्वारा उनके बचपन में प्रकट किया गया) को किसी भी एक देवता को आमंत्रित करने के लिए जानती थी। इस तरह रानी कुन्ती ने तीन बड़े पाण्डव भाईयों: युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को गर्भ धारण करने के लिए इस गुप्त मंत्र का उपयोग किया। रानी कुन्ती के साथ सह-पत्नी रानी माद्री ने कुन्ती से इस मंत्र को प्राप्त किया, और उसने इसी तरह छोटे पाण्डव भाइयों नकुल और सहदेव को जन्म दिया।

सन्तानहीन रहने से दाम्पत्य जीवन में बहुत अधिक उदासी आ सकती है। जब राष्ट्र के लिए एक उत्तराधिकारी होने की बात ही दांव पर लगी हो, तो यह और भी अधिक कठिन हो जाता है। चाहे सेरोगेट साथी को कार्यवाही के लिए ढूंढना हो या गुप्त मंत्रों का उपयोग करना हो, ऐसी स्थिति में निष्क्रिय बने रहना शायद ही कोई विकल्प हो।

4000 वर्षों पहले ऋषि अब्राहम ने ऐसी ही स्थिति का सामना किया था। जिस तरह से उन्होंने समस्या को हल किया वह इब्रानी वेद पुस्तक (बाइबल) द्वारा एक नमूने के रूप में उपयोग किया जाता है, इस कारण हम इससे शिक्षा पाने में बुद्धिमान हो सकते हैं।

अब्राहम की शिकायत

अब्राहम के जीवन में उत्पत्ति 12 में वर्णित प्रतिज्ञा को बोले हुए बहुत अधिक वर्ष बीत चुके थे। अब्राहम कनान (प्रतिज्ञात् भूमि) की ओर इस प्रतिज्ञा की आज्ञाकारिता के प्रति बढ़ चुका था जो आज के समय का इस्राएल है। अन्य कई घटनाएँ उसकी जीवन में घटित हुईं उसे छोड़कर जिसे वह बहुत अधिक चाहता था – जो उसके द्वारा एक पुत्र के उत्पन्न होने की थी जिसके द्वारा यह प्रतिज्ञा पूरी होगी। इसलिए हम इस वृतान्त के अध्ययन को अब्राहम की शिकायत के साथ आरम्भ करते हैं:

इन बातों के पश्चात् यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन दर्शन में अब्राम के पास पहुँचा :

“हे अब्राम, मत डर।

तेरी ढाल और

तेरा अत्यन्त बड़ा प्रतिफल मैं हूँ।”

अब्राम ने कहा, “हे प्रभु यहोवा, मैं तो निर्वंश हूँ, और मेरे घर का वारिस यह दमिश्कवासी एलीएजेर होगा, अत: तू मुझे क्या देगा?” और अब्राम ने कहा, “मुझे तो तू ने वंश नहीं दिया, और क्या देखता हूँ कि मेरे घर में उत्पन्न हुआ एक जन मेरा वारिस होगा।” (उत्पत्ति 15:1-3)

परमेश्‍वर की प्रतिज्ञा

अब्राहम उस भूमि में तम्बुओं में इस प्रतिज्ञा के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था कि वह एक ‘बड़ी जाति’ को आरम्भ करे जिसकी उसे प्रतिज्ञा दी गई थी। परन्तु अभी तक कुछ भी नहीं हुआ था और इस समय वह लगभग 85 वर्षों का हो गया था। उसने शिकायत की कि परमेश्‍वर उसको दी हुई प्रतिज्ञा को पूरा नहीं कर रहा था। उसका वार्तालाप इस तरह से आगे बढ़ता है:

तब यहोवा परमेश्‍वर का यह वचन उसके पास पहुँचा: “यह तेरा वारिस न होगा, तेरा जो निज पुत्र होगा, वही तेरा वारिस होगा।” और उसने उसको बाहर ले जा कर कहा, “आकाश की ओर दृष्टि करके तारागण को गिन – क्या तू उनको गिन सकता है?” फिर उसने उससे कहा, “तेरा वंश ऐसा ही होगा।” (उत्पत्ति 15:4-6)

अपने वार्तालाप में परमेश्‍वर ने अपनी प्रतिज्ञा को यह घोषणा करते हुए नवीकृत किया कि अब्राहम का स्वयं एक पुत्र होगा जो इतने लोगों में परिवर्तित हो जाएगा कि उनकी गिनती आकाश के तारों के जैसे होगी – निश्चित ही बहुत अधिक, परन्तु उनकी गिनती करना कठिन है।

अब्राहम का प्रतिउत्तर : पूजा की तरह स्थाई प्रभाव

अब फिर से गेंद अब्राहम के पाले में थी। वह कैसे इस नवीकृत की हुई प्रतिज्ञा के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?जो कुछ इसके पश्चात् आता है वह सबसे अधिक महत्वपूर्ण वाक्यों में से एक है (क्योंकि इस वाक्य को बाद में बहुत बार उद्धृत किया गया है)। यह एक अटल सत्य को समझने की नींव को रखता है। यह कहता है:

उसने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को उसके लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

कदाचित् इस वाक्य को समझना और भी अधिक आसान है यदि हम इसके सर्वनामों को नामों में परिवर्तित करने दें, तो इस तरह से यह ऐसे पढ़ा जाएगा:

अब्राम ने यहोवा परमेश्‍वर पर विश्‍वास किया; और यहोवा परमेश्‍वर ने इस बात को अब्राम के लेखे में धर्म गिना। (उत्पत्ति 15:6)

यह एक छोटा सा और अप्रत्यक्ष वाक्य है। यह बिना किसी समाचार के धूमधाम के साथ आते हुए शीर्षक के साथ आता है और चला जाता है और इसलिए हमारे लिए इसे खो देना युक्तिसंगत होगा। परन्तु यह वास्तव में महत्वपूर्ण है – और इसमें सनातनकाल के बीज निहित हैं। क्यों? क्योंकि इस छोटे से वाक्य में अब्राहम धार्मिकता को प्राप्त कर लेता है। यह पूजा के पुण्यों को प्राप्त करने जैसा है जो कभी भी कम न होंगे न ही कभी खोए जाएंगे। धार्मिकता ही केवल एक – और केवल एक ऐसा – गुण है जिसकी आवश्यकता हमें परमेश्‍वर के सामने खराई से खड़े होने के लिए है।

हमारी समस्या : भ्रष्टता की समीक्षा

परमेश्‍वर के दृष्टिकोण से, यद्यपि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में निर्मित हुए थे परन्तु कुछ ऐसा घटित हो गया जिसने इस स्वरूप को भ्रष्ट कर दिया। अब न्याय यह दिया गया है

परमेश्‍वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की है कि देखे कि कोई बुद्धमान, कोई परमेश्‍वर का खोजी है या नहीं। वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं। (भजन संहिता 14:2-3)

इस भ्रष्टता को हम सहजबोध ही महसूस करते हैं। इसलिए ही हम ऐसे त्योहारों, जैसे कि कुम्भ मेले का त्योहार, जिस में इतनी अच्छी तरह से भाग लेते हैं क्योंकि हमें हमारे पापों और इनकी सफाई किए जाने का बोध होता है। प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र भी इसी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है जो हमारे स्वयं के बारे में है:

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

हमारी भ्रष्टता का अन्तिम परिणाम यह है कि हम स्वयं को एक धर्मी परमेश्‍वर से अलग किया हुआ पाते हैं क्योंकि हमारे स्वयं में किसी तरह की कोई भी धार्मिकता नहीं है। हमारी भ्रष्टता हमारे नकारात्मक कर्मों के वृद्धि करने में दिखाई देती है – जिसकी सचेतता व्यर्थता और मृत्यु के फल की कटाई में है। यदि आपको सन्देह है तो समाचार के मुख्य अंशों को देख लें और देखें पिछले 24 घण्टे में लोगों के साथ क्या कुछ हुआ है। हम जीवन के निर्माता से पृथक हो चुके हैं और इसलिए वेद पुस्तक (बाइबल) में ऋषि यशायाह के दिए हुए शब्द सत्य प्रमाणित हुए हैं

हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के से हैं, और हमारे धर्म के काम सब के सब पत्ते के समान मुर्झा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है। (यशायाह 64:8, 750 ईसा पूर्व लिखा गया)

अब्राहम और धार्मिकता

परन्तु यहाँ पर अब्राहम और परमेश्‍वर के वार्तालाप में हम पाते हैं, कि यह घोषणा कि अब्राहम ने उस तरह की धार्मिकताको प्राप्त किया है – जैसी परमेश्‍वर अपेक्षा करता था, को बड़े ही शान्त तरीके से छोड़ दिया गया है, जिसे हम लगभग पकड़ ही नहीं पाते हैं। इस कारण अब अब्राहम ने इस धार्मिकता को प्राप्त करने के लिए क्या किया? एक बार फिर, हम इतने अधिक पृथक हैं कि हम मुख्य बात को खो देने के खतरे में हैं, यह अब्राहम के लिए साधारण रुप से यह इस बात को कहता है कि उसने विश्‍वास किया। बस केवल इतना ही?! हम भ्रष्ट होने के कारण बहुत अधिक दुर्गम समस्या में पड़ गए हैं और इसलिए युगों से हमारा प्राकृतिक झुकाव जटिल और कठिन धर्मों, प्रयासों, पूजाओं, नैतिकताओं, तपस्वी कर्म काण्डों, शिक्षाओं आदि की ओर – धार्मिकता को पाने के लिए देखने लगा है। परन्तु इस व्यक्ति अब्राहम ने मात्र ‘विश्‍वास’ करने के द्वारा धार्मिकता के पुरस्कार को प्राप्त कर लिया था। यह इतना आसान है कि हम इसे लगभग गवाँ देते हैं।

अब्राहम ने धार्मिकता को ‘कमाया’ नहीं था; यह उसके लेखे में ‘गिनी’ गई थी। इसमें क्या भिन्नता है? ठीक है, यदि आपने कुछ कार्य किया है – तो आपने इसे मेहनत से ‘कमाया’ है – आप इसे पाने के योग्य हैं। यह ऐसा है कि आपके द्वारा किए हुए कार्य की मजदूरी को प्राप्त करना है। परन्तु जब कोई बात आपके लेखे में गिनी जाती है, तो यह आपको दे दी जाती है। जैसे कि कोई  मुफ्त में दिया जाने वाला उपहार कमाया नहीं जाता, न ही आप इसके योग्य होते हैं, परन्तु आप तो इसे बस यों ही पा लेते हैं।

अब्राहम का यह वृतान्त पाए जाने वाली प्रचलित समझ को जो हमारी धार्मिकता के बारे में है को उलट देता है चाहे वह इस सोच के साथ हो जो परमेश्‍वर के अस्तित्व में होने की मान्यता के साथ आती है, या फिर उस धार्मिकता के साथ जिसे हम पर्याप्त मात्रा में की जाने वाली भली या धार्मिक गतिविधियों के द्वारा प्राप्त करना चाहते हैं। उसने तो बस उस प्रतिज्ञा में ही विश्‍वास किया जो उस तक विस्तारित की गई थी और वह उसके लेखे में गिनी गई, या उसे इसके लिए धार्मिकता दे दी गई।

बाकी की बाइबल इस मुठभेड़ को हमारे लिए एक चिन्ह के रूप में उपयोग करती है। परमेश्‍वर की ओर से दी गई प्रतिज्ञा में अब्राहम का विश्‍वास, और धार्मिकता का उसके लेखे में गिना जाना, हमें एक पद्धति  दी गई है, जिसका हमें अनुसरण करना चाहिए। सम्पूर्ण सुसमाचार प्रतिज्ञाओं के ऊपर आधारित है जिसे परमेश्‍वर हम में से सभों को और प्रत्येक को देता है परन्तु अब कौन धार्मिकता के लिए अदा करता या इसे कमाता है? हम इस विषय को हमारे अगले लेख में देखेंगे।

अब्राहम के द्वारा आरम्भ की गई: सभी समयों और सभी लोगों के लिए तीर्थयात्रा

कटारागामा महोत्सव के लिए की जाने वाली तीर्थ यात्रा (पदयात्रा) भारत से बाहर भी होती है। यह तीर्थयात्रा भगवान् मुरुगन (भगवान् कटारागामा, कार्तिकेय या स्कंद) की याद में की जाती है, जब वह अपने माता-पिता (शिव और पार्वती) के हिमालय वाले घर को छोड़ते हुए, श्रीलंका की स्थानीय लड़की वल्ली के प्यार के लिए यात्रा करते हैं। उनके प्रेम और विवाह को श्रीलंका के कटारागामा मन्दिर में कटारागामा पीराहेरा महोत्सव के रूप में याद किया जाता है।

कटारागामा की यात्रा को पूरा करने के लिए भक्तों को कभी-कभी त्योहार से 45 दिन पहले तीर्थयात्रा आरम्भ करनी पड़ती है। युद्ध के देवता भगवान् मुरुगन की याद में, कई लोग एक भाला साथ लेकर जाते हैं, जबकि वे इस तीर्थयात्रा के माध्यम से एक ज्ञात् सुरक्षित स्थान को छोड़ देते हैं और अज्ञात् स्थान में जाने का खतरा मोल लेते हैं।

नए चन्द्रमा वाले दिन तीर्थयात्री कटारागामा महोत्सव को आरम्भ करने के लिए कटारगामा पहाड़ी तक चढ़ते हुए अपनी तीर्थयात्रा को पूरा करते हैं। 14 दिन प्रत्येक रात्रि वल्ली के मन्दिर तक एक पीराहेरा अर्थात् जलूस के रूप में मुरुगन की मूर्ति पहुचांई जाती जाती है। पूर्णिमा से पहले की सुबह चरमोत्कर्ष एक जल-ग्रहण समारोह द्वारा अपनी ऊचाँई पर पहुँचता है, जिसमें मुरुगन की मूर्ति को मेणिक गंगा नदी में डुबोया जाता है और इसके पवित्र जल को श्रद्धालुओं पर उण्डेला जाता है।

इस त्यौहार का एक अन्य आकर्षण आग से से होकर निकलने वाला समारोह है, जहाँ श्रद्धालु धधकते हुए गर्म कोएले की आग से गुजरते हैं, जो अविश्वसनीय रूप से तत्वों के प्रति उनकी विजयी होने के विश्वास का प्रदर्शन करता है।

विभिन्न भाषाओं, धर्मों और जातियों के लोगों के द्वारा की जाने वाली इस वार्षिक तीर्थयात्रा में उन्हें उनके विश्वास के लिए मार्गदर्शन, आशीर्वाद, चंगाई, और जाँच के लिए यह तीर्थयात्रा एक कर देती है। इस सम्बन्ध में वे अब्राहम के द्वारा 4000 वर्षों पहले निर्धारित पद्धति का पालन करते हैं। वह एक ऐसी तीर्थयात्रा पर चल पड़ा था, जो न केवल कई महीनों तक चली, अपितु जीवन पर्यन्त चलती रही। उसकी तीर्थयात्रा का प्रभाव 4000 वर्षों पश्चात् भी आपके जीवन और मेरे जीवन पर पड़ता है। उसकी तीर्थयात्रा की शर्त में उसे अपने परमेश्वर में विश्वास को व्यक्त करना, और एक पवित्र पर्वत पर एक अविश्वसनीय बलिदान को चढ़ाए जाने के द्वारा प्रदर्शित करना था। इसने समुद्र को दो-फाड़ करते हुए और आग में से गुजरते हुए एक राष्ट्र को जन्म दिया – इसके बाद इसका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ा। उसकी तीर्थयात्रा कैसे आरम्भ हुई की समझ आज हमारे स्वयं के ज्ञान के लिए आशीष और मार्गदर्शन को प्रदान करती है। इससे पहले कि हम अब्राहम की तीर्थयात्रा की खोज करें, हमें वेद पुस्तक अर्थात् बाइबल से कुछ प्रसंग मिलते हैं, जो उसकी तीर्थयात्रा को लिपिबद्ध करता है।

मनुष्य की समस्या – परमेश्वर की योजना

हमने हमारे पिछले लेखमें यह देखा कि मनुष्य ने सृष्टिकर्ता प्रजापति की आराधना को तारों और ग्रहों की आराधना करते हुए दूषित कर दिया था। इस कारण प्रजापति ने मनु/नूह के तीन पुत्रों (जो जल प्रलय से बच गए थे) के वंशजों को उनकी भाषाओं के द्वारा अलग करते हुए पूरी पृथ्वी में बिखरा दिया था। इसलिये ही आज बहुत सी जातियाँ भाषा के कारण एक दूसरे से भिन्न हैं। मनुष्य के बीते हुए इतिहास की गूँज को 7-दिनों के पंचागों में देखा जा सकता है जिसे आज पूरे संसार में और उस बड़े जल-प्रलय की स्मृति को भिन्न रूपों में स्मरण रखने के लिए उपयोग किया जाता है।

प्रजापति ने इतिहास के आरम्भ में ही प्रतिज्ञा कर दी थी कि एक सिद्ध व्यक्ति के बलिदान के द्वारा ‘विद्वान लोग अमरत्व को प्राप्त करेंगे’। यह बलिदान एक पूर्णता के रूप में कार्य करेगा जो हमें मात्र हमारे बाहरी तौर से शुद्ध करने की अपेक्षा आन्तरिक रूप से शुद्ध करेगा। तथापि, सृष्टिकर्ता की दूषित हो गई आराधना के साथ, बिखरी हुई ये नई स्थापित जातियाँ इस आरम्भिक प्रतिज्ञा को भूल गईं। इसे केवल आज के समय कुछ ही स्रोतों के माध्यम से स्मरण किया जाता है जिसमें प्राचीन ऋग्वेद और वेद पुस्तक – बाइबल सम्मिलित है।

इस तरह से प्रजापति ने एक योजना को बनाया। यह योजना कुछ ऐसी नहीं थी जिसकी मैं और आप यह अपेक्षा करते क्योंकि यह (हमें) बहुत ही छोटी और वस्तुओं को परिवर्तित करने के लिए अमहत्वपूर्ण जान पड़ सकती है। परन्तु यही वह योजना थी जिसका उसने चुनाव किया। इस योजना में लगभग 2000 ईसा पूर्व (अर्थात् 4000 वर्षों पहले) एक व्यक्ति की बुलाहट और उसका परिवार और उसको और उसके वंशजों को आशीष देने की प्रतिज्ञा यदि वह उस आशीष को प्राप्त करना चुनता है, सम्मिलित है। यहाँ नीचे बताया गया है कि कैसे बाइबल इस वृतान्त का वर्णन करती है।

अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा

यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम से कहा, “अपने देश, और अपने कुटुम्बियों, और अपने पिता के घर को छोड़कर उस देश में चला जा जो मैं तुझे दिखाऊँगा।

मैं तुझसे एक बड़ी जाति बनाऊँगा, और तुझे आशीष दूँगा, और तेरा नाम बड़ा करूँगा, और तू आशीष का मूल होगा। और जो तुझे आशीर्वाद दें, उन्हें मैं आशीष दूँगा; और जो तुझे कोसे, उसे मैं शाप दूँगा; और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएँगे।”

4 यहोवा परमेश्‍वर के इस वचन के अनुसार अब्राम चला; और लूत भी उसके संग चला; और जब अब्राम हारान देश से निकला उस समय वह पचहत्तर वर्ष का था। 5 इस प्रकार अब्राम अपनी पत्नी सारै, और अपने भतीजे लूत को, और जो धन उन्होंने इकट्ठा किया था, और जो प्राणी उन्होंने

हारान में प्राप्त किए थे, सबको लेकर कनान देश में जाने को निकल चला; और वे कनान देश में आ गए…7 तब यहोवा परमेश्‍वर ने अब्राम को दर्शन देकर कहा, “यह देश मैं तेरे वंश को दूँगा।”और उसने वहाँ यहोवा परमेश्‍वर के लिये जिसने उसे दर्शन दिया था, एक वेदी बनाई।

हम में बहुत से लोग आज उलझन में रहते हैं कि क्या कोई ऐसा व्यक्तिगत् परमेश्‍वर है जो हमारी इतनी चिन्ता करता है कि सीधे ही हमारे परेशान जीवनों में आशा देने के लिए हस्तक्षेप करता हो। इस वृतान्त के माध्यम से हम इस विचार की जाँच कर सकते हैं क्योंकि इसमें एक व्यक्तिगत् प्रतिज्ञा एक विशेष व्यक्ति के साथ बान्धी गई है, जिसके भागों को हम सत्यापित कर सकते हैं। यह वृतान्त वर्णित करता है कि यहोवा परमेश्‍वर ने सीधे ही अब्राहम के साथ प्रतिज्ञा की कि ‘मैं तेरे नाम को महान् करूँगा’। हम 21वीं सदी में – 4000 वर्षों के पश्चात् रहते हैं – और अब्राम/अब्राहम का नाम विश्वव्यापी रूप से इतिहास के नामों में सबसे अधिक पहचान रखता है। यह प्रतिज्ञा शाब्दिक, ऐतिहासिक और सत्यापित रूप से सत्य प्रमाणित हुई है।

बाइबल की सबसे प्राचीन विद्यमान प्रति मृतक सागर के कुण्डल पत्र हैं जो 200-100 ईसा पूर्व में लिखी गई थीं। जिसका अर्थ है कि इस प्रतिज्ञा को लिखित स्वरूप, लेखनकाल के सबसे आरम्भिक समय में ही दे दिया गया था। परन्तु यहाँ तक कि 200 ईसा पूर्व भी अब्राहम नामक व्यक्ति और उसका नाम केवल अल्पसंख्यक समूह यहूदी को छोड़कर बहुत अधिक-प्रसिद्ध नहीं था। इसलिए हम यह पुष्टि कर सकते हैं कि उसकी पूर्णता केवल तब आई जब इसे नवीनतम समयों में लिखा गया। एक प्रतिज्ञा की “पूर्णता” के घटित होने के पश्चात् इसे लिखा जाना इस घटना में नहीं हुआ है।

…उसकी महान् जाति के कारणों से

जो बात समान रूप से आश्चर्यचकित करती है वह यह है कि अब्राहम ने वास्तव में कोई उल्लेखनीय कार्य अपने जीवन में कभी नहीं किया था – ऐसा कोई कार्य जो सामान्यतया एक व्यक्ति को ‘महान्’ बनाता हो। उसने ऐसा कुछ असाधारण लेखनकार्य नहीं लिखा (जैसे व्यास ने महाभारत को लिख कर किया है), उसने कोई ध्यान देने वाले भवन का निर्माण भी नहीं किया (जैसे शाहजहाँ ने ताज महल को निर्मित करके किया है), उसने किसी ऐसी प्रभावशाली सैन्य कौशल से पूर्ण सेना का नेतृत्व भी नहीं किया (जैसा अर्जुन ने भगवद् गीता में किया है), न ही उसने राजनैतिक रूप से कोई नेतृत्व प्रदान किया है (जैसे महात्मा गाँधी ने किया है)। उसने तो यहाँ तक एक राजा के रूप में किसी राज्य का शासन भी नहीं किया है। उसने वास्तव में जंगल में तम्बू गाड़ने और प्रार्थना करने को छोड़कर और तब एक पुत्र को जन्म देने के सिवाय और कुछ नहीं किया है।

यदि आप उसके दिनों में होते हुए यह भविष्यद्वाणी करते कि कौन हज़ारों वर्षों के पश्चात् सबसे अधिक स्मरण किया जाएगा, तो आप उस समय के राजाओं, सेनापतियों, योद्धाओं, या दरबार के कवियों के ऊपर शर्त लगा सकते थे कि यही इतिहास को महान् बनाएंगे। परन्तु उन सभी के नामों को भूला दिया गया है – परन्तु एक व्यक्ति जो बड़ी कठिनाई से जंगल में अपने परिवार का पालन पोषण करने की कोशिश करता रहा को पूरे संसार में स्मरण किया जाता है। उसका नाम इसलिए महान है क्योंकि वे जातियाँ जो उसमें से निकल कर आईं ने उसके वृतान्त को स्मरण रखा है – और तब लोग और जातियाँ जो उसमें से निकल आईं महान् बन गईं। यही अक्षरश: वैसे ही है जैसे बहुत पहले प्रतिज्ञा की गई थी (“मैं तुझ में एक बड़ी जाति बनाऊँगा…मैं तेरा नाम महान् करूँगा”)। मैं सोचता हूँ कि कोई भी अभी तक के इतिहास में इतना अधिक प्रसिद्ध नहीं हुआ है केवल इसलिए कि उसके वंशज् के लोग उसमें से निकल कर आए हैं इसकी अपेक्षा की उसने अपने जीवन में बड़े बड़े कार्यों को प्राप्त किया है।

…प्रतिज्ञा-करने वाले की इच्छा के माध्यम से

और आज जो लोग अब्राहम के वंश के हैं – यहूदी – कभी वास्तव में एक जाति के रूप में नहीं थे जिसे हम विशेष रूप से बड़ी महानता के साथ सम्बद्ध करते हैं। उन्होंने कभी भी मिस्र के पिरामिडों – और निश्चित रूप से ताज महल की तरह बड़ी बड़ी महान् वास्तुशिल्प निर्माणों को नहीं किया, न ही उन्होंने यूनानियों की तरह दर्शन शास्त्रों को लिखा, या ब्रिटिश लोगों की तरह दूरस्थ क्षेत्रों के प्रशासन का भी प्रबन्ध नहीं किया। इन सभी जातियों ने यह सभी कार्य स्वयं को विश्व-शक्ति के साम्राज्यों के संदर्भ में स्थापित करते हुए किए जिसने उनकी सीमाओं को व्यापक असाधारण सैन्य-शक्ति के कारण बहुत दूर तक विस्तारित कर दिया था – ऐसा कभी भी यहूदियों ने नहीं किया। यहूदी लोगों की महानता अधिकत्तर व्यवस्था और धर्म पुस्तक (वेद पुस्तक या बाइबल)के कारण हैं, जिसे उन्होंने कुछ उल्लेखनीय लोगों के द्वारा जन्म दिया; जो उनकी जाति में से निकल कर आए थे; और यह कि वे इन हज़ारों वर्षों में एक भिन्न और कुछ सीमा तक विशेष लोगों के समूह के रूप में बने रहे। उनकी महानता इसलिए नहीं कि उन्होंने वास्तव में कुछ विशेष किया है, अपितु इसकी अपेक्षा जो कुछ उनके साथ किया गया और जो कुछ उनके माध्यम से किया गया था।

अब आइए उस कारण को देखें जो इस प्रतिज्ञा को आगे ले कर चलता है। वहाँ पर, पूर्णतः स्पष्ट रीति से, यह निरन्तर कहता है कि, “मैं करूँगा…।” वह विशेष तरीका जिसमें उनकी महानता इतिहास में कार्य करती है एक बार फिर से इस उदघोषणा का ऐसा उल्लेखनीय तरीका है कि यह सृष्टिकर्ता है जो इसे पूर्ण करेगा न कि इस ‘महान् जाति’ की कुछ अन्तर्निहित योग्यताएँ, विजय या सामर्थ्य। ध्यान योग्य बात यह है कि आज के संसार में संचार माध्यम अपने बहुत अधिक ध्यान को इस्राएल, आधुनिक यहूदी जाति की घटनाओं के ऊपर देता है। क्या आप निरन्तर हंगरी, नार्वे, पापुआ न्यू गिनी, बोलीविया या मध्य अफ्रीकी गणराज्य जैसे देशों के समाचारों को सुनते हैं –जो कि सभी संसार में एक ही आकार के देश हैं? परन्तु इस्राएल, एक 60 लाख लोगों को छोटा सा देश, निरन्तर और नियमित रूप से समाचार में बना रहता है।

इतिहास में या मानवीय घटनाओं में ऐसा कुछ भी अन्तर्निहित नहीं है जो इस प्राचीन प्रतिज्ञा को ठीक वैसे ही खोल कर रखने का कारण बने जैसा कि इसे इस प्राचीन व्यक्ति के साथ घोषित किया गया था, क्योंकि उसने इस प्रतिज्ञा में विश्‍वास करते हुए विशेष पथ पर चलने को चुना था। उन सम्भावनाओं को सोचे जिसमें यह प्रतिज्ञा कुछ तरीकों से असफल हो सकती थी। परन्तु इसकी अपेक्षा यह खुलती चली गई और निरन्तर खुलती चली जा रही है, मानो कि इसे उन हज़ारों वर्षों पहले उदघोषित किया गया था। वास्तव में यह विषय बहुत ही मजबूत है क्योंकि यह पूर्ण रूप से प्रतिज्ञा-करने वाले की सामर्थ्य और अधिकार के ऊपर आधारित है कि जिससे यह पूर्ण हुआ है।

वह पथ जो अभी भी संसार को हिलाता है

This map shows the route of Abraham's Journey
यह नक्शा अब्राहम की यात्रा के मार्ग को दर्शाता है

बाइबल वर्णित करती है, “यहोवा के वचन के अनुसार अब्राम चला” (वचन 4)। उसने एक मार्ग को चुन लिया, जिसे नक्शे में दर्शाया गया है जो अभी भी इतिहास को बना रहा है।

हमारे लिए आशीष

परन्तु यह यहीं समाप्त नहीं हो जाता है क्योंकि इस प्रतिज्ञा के साथ और भी कुछ दिया हुआ है। आशीष केवल अब्राहम ही के लिए नहीं दी गई थी क्योंकि इसमें यह भी कहा गया है

“और भूमण्डल के सारे कुल तेरे द्वारा आशीष पाएंगे” (वचन 4)।

इस पर मुझे और आपको ध्यान देना चाहिए। चाहे हम आर्य, द्रविड़, तमिल, नेपाली या किसी भी जाति के क्यों न हों; चाहे हमारी जाति कोई भी क्यों न हो; चाहे हमारा धर्म कोई भी क्यों न हो, अर्थात् चाहे हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिख या ईसाई; चाहे हम अमीर या गरीब, बीमार या स्वस्थ, पढ़े लिखे या अनपढ़ ही क्यों न हों–‘भूमण्डल के सारे कुल’ इसमें आप को और साथ ही मुझे भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। इस प्रतिज्ञा का कार्यक्षेत्र तब से लेकर अब आज तक दिन तक प्रत्येक जीवित व्यक्ति को आशीष के लिए सम्मिलित किया जाना है – इसका अर्थ है आप भी इसमें सम्मिलित हैं? कब? किस तरह की आशिष? इसे यहाँ पर स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है परन्तु यह कुछ ऐसी बातों को जन्म देता है जो आपके साथ मुझे भी प्रभावित करता है।

हमने अभी अभी ऐतिहासिक और शाब्दिक रूप से यह पुष्टि की है कि अब्राहम को दी हुई प्रतिज्ञा का प्रथम भाग सत्य हो गया है। तब हमारे पास क्या एक अच्छा कारण नहीं है कि हम प्रतिज्ञा के उस भाग के ऊपर उसके सत्य होने के लिए भी विश्‍वास करें जो आपके और मेरे लिए दिया गया है? क्योंकि यह प्रतिज्ञा सत्य रूप से विश्वव्यापी और अपरिवर्तनशील है। परन्तु हमें इस प्रतिज्ञा के सत्य को समझने के लिए – इसे खोलने की आवश्यकता है। हमें ज्ञानोदय की आवश्यकता है ताकि हम यह समझ सकें कि कैसे यह प्रतिज्ञा हमें “छू” सकती है। और हम इस ज्ञान को अब्राहम की यात्रा का अनुसरण करते हुए पाते हैं। मोक्ष वह कुँजी है, जिसकी प्राप्ति के ऊपर बहुत से लोग बहुत अधिक कठिन मेहनत करते हुए कार्य कर रहे हैं, हम पर प्रकाशित किया गया है जब हम निरन्तर इस विलक्षण व्यक्ति के वृतान्त का अनुसरण करते हैं।

संस्कृत और इब्रानी वेदों का सम्मिलन: क्यों?

मेरी पिछली पोस्ट अर्थात् लेख में मैंने संस्कृत वेदों में मनु के वृतान्त और इब्रानी वेदों में नूह के वृतान्त के मध्य में कई समानताओं को देखा था। और यह सम्मिलन जल प्रलय के वृतान्त से बहुत आगे की ओर चला जाता है। जैसा कि हमने देखा था, उत्पत्ति नामक इब्रानी पुस्तक में दिए हुए प्रतिज्ञात् वंश और समय के उदय होने के साथ ही पुरूषा की प्रतिज्ञा  के मध्य में एक जैसा ही सम्मिलन पाया जाता है। इस तरह से हम कैसे इन सम्मिलनों को देखते हैं? क्या यह कोई संयोग के कारण है? क्या कोई वृतान्त किसी अन्य के वृतान्त का उपयोग कर रहा है या दूसरे की सामग्री को चोरी कर के लिख रहा है? यहाँ पर मैं एक सुझाव को प्रस्तुत करता हूँ।

बाबुल का गुम्मट – जल प्रलय के पश्चात् का वृतान्त

नूह के वृतान्त के पश्चात्, वेद पुस्तक (बाइबल) उसके तीनों पुत्रों के वंशजों का उल्लेख करता चला जाता है और यह कहता है कि, “जल प्रलय के पश्चात् पृथ्वी भर की जातियाँ इन्हीं में से होकर बँट गईं।” (उत्पत्ति 10:32)। संस्कृत के वेद साथ ही यह भी घोषणा करते हैं कि मनु के तीन पुत्र थे जिनसे सारी मानवजाति उत्पन्न हुई। परन्तु कैसे पृथ्वी पर “फैलने का” यह कार्य प्रगट हुआ?

प्राचीन इब्रानी वृतान्त नूह के इन तीन पुत्रों के वंशजों के नाम और सूची का विवरण देता है। आप इसे यहाँ पर सम्पूर्ण सूची को पढ़ सकते हैं। तब यह वृतान्त यह विवरण देते चला जाता है कि कैसे इन सन्तानों ने इलोहीम या प्रजापति – सृष्टिकर्ता के दिशा-निर्देशों की अवहेलना की, जिसने उन्हें इस ‘पृथ्वी को भर देने’ के लिए आदेश दिया था (उत्पत्ति 9:1)। परन्तु इसकी अपेक्षा ये लोग एक गुम्मट का निर्माण करने के लिए इकट्ठे साथ रहने लगे। आप इस वृतान्त को यहाँ  पर पढ़ सकते हैं। यह वृतान्त यह कहता है कि यह एक ऐसा गुम्मट था ‘जिसकी चोटी आकाश से बातें करती थी’ (उत्पत्ति 11:4)। इसका अर्थ यह हुआ कि नूह की इस पहली सन्तान के द्वारा गुम्मट के निर्माण का उद्देश्य सृष्टिकर्ता की उपासना करने की अपेक्षा तारों और सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों आदि की पूजा करने का था। यह एक जानी-पहचानी सच्चाई है कि तारों की पूजा का आरम्भ मेसोपोटामिया में हुआ था (जहाँ पर ये सन्तानें रह रही थीं) और इसके पश्चात् यह यहाँ से पूरे संसार में फैल गई। धर्म शब्दकोष संदर्भ तारों की आराधना के लिए ऐसे कहता है:

यह निश्चित रूप से मेसोपोटामिया में ईसा पूर्व दो शताब्दियों [10: i–iii ] पूर्व और केन्द्रीय अमेरिका के माया के मध्य में [9: v ] हुआ। तारों-की-आराधना कदाचित् प्रागैतिहासिक उत्तरी यूरोप के महा पाषण सम्बन्धी खगोलीय स्थलों में पाई जाती थी [9: ii–iii; उदा. के लिए., स्टोनहँन्ज अर्थात् एक महापाषाण शिलावर्त] और ऐसे ही स्थल उत्तरी अमेरिका में पाए जाते हैं [9: iv; उदा. के लिए., बिग हार्न मेडीसन व्हिल the Big Horn medicine wheel].मेसोपोटामिया से तारों की आराधना यूनानी-रोमन संस्कृति में आ गई…

इस तरह से सृष्टिकर्ता की आराधना करने की अपेक्षा, हमारे पूर्वजों ने तारों की आराधना की। फिर यह वृतान्त हताश करने के लिए ऐसे कहता है ताकि भ्रष्टाचार की आराधना अपरिवर्तनीय न बन जाए, सृष्टिकर्ता ने यह निर्णय लिया कि

वह उनकी भाषा में गड़बड़ी डाल देगा ताकि वह एक दूसरे को समझ न सकें। (उत्पत्ति 11:7)

जिसके परिणामस्वरूप, नूह की इस पहली सन्तान ने एक दूसरे को समझ न सकी और इस तरह से सृष्टिकर्ता ने

उन्हें वहाँ से सारी पृथ्वी के ऊपर फैला दिया (उत्पत्ति 11:8)

दूसरे शब्दों में, एक बार जब ये लोग और अधिक आपस में बात न कर सके, तो वे एक दूसरे, अपने नवगठित भाषाई समूहों में बिखर गए, और इस प्रकार वे ‘फैल’ गए। यह विवरण देता है कि कैसे विभिन्न लोगों के समूह आज संसार में एक दूसरे से बहुत ही भिन्न भाषा को बोलते हैं, जबकि यह सभी मेसोपोटामिया में अपने मूल केन्द्र में से निकल कर (कभी कभी कई पीढ़ियों के पश्चात्) ऐसे स्थानों में फैले थे जहाँ वह आज पाए जाते हैं। इस प्रकार उनसे सम्बन्धित इतिहास इस स्थान से आगे एक दूसरे से भिन्न हो जाता है। परन्तु प्रत्येक भाषाई समूह (जिन्होंने इन प्रथम जातियों गठन किया) का इस स्थान  तक एक सामान्य इतिहास रहा है। इस सामान्य इतिहास में पुरूषा के बलिदान के द्वारा मोक्ष की प्रतिज्ञा और मनु (नूह) के जल प्रलय का वृतान्त सम्मिलित है। संस्कृत के ऋषियों ने इन वृतान्तों को उनके वेदों के द्वारा स्मरण किया है और इब्रानियों ने इस जैसी ही घटनाओं को उनके वेदों (ऋषि मूसा की तोराह) के द्वारा स्मरण किया है।

समय के आरम्भ से – विभिन्न जल प्रलयों के वृतान्तों की गवाही

यह वृतान्त इन प्रारम्भिक वेदों के मध्य में पाई जाने वाली समानताओं और सम्मिलनों का वर्णन करता है। परन्तु क्या इस स्पष्टीकरण के समर्थन में और आगे प्रमाण पाए जाते हैं? दिलचस्प बात यह है, कि जल प्रलय के वृतान्त को केवल प्राचीन इब्रानी और संस्कृत वेदों में ही स्मरण नहीं किया गया है। विश्व भर में विभिन्न लोगों के समूहों ने उनसे सम्बन्धित इतिहासों में जल प्रलय के वृतान्त को स्मरण किया है। निम्न चार्ट इसे दर्शाता है।

Flood accounts from cultures around the world compared to the flood account in the Bible
संसार के चारों ओर की संस्कृतियों के जल प्रलय की बाइबल में पाए जाने वाले जल प्रलय के वृतान्त के साथ तुलना

चार्ट के शीर्ष पर यह विभिन्न भाषाओं के समूहों को दिखाता है जो संसार में चारों ओर – प्रत्येक महाद्वीप में रहते हैं। चार्ट में दिए हुए कक्ष यह सूचित करते हैं कि इब्रानी जल प्रलय का वृतान्त (चार्ट में बाएँ तरफ नीचे की ओर सूचीबद्ध किया हुआ है) उनके अपने जल प्रलय के वृतान्त को भी निहित करता है या नहीं। काले कक्ष सूचित करते हैं कि यह वर्णन उनके जल प्रलय के वृतान्त में नहीं  पाए जाते हैं, जबकि काले कक्ष यह सूचित करते हैं कि यह वर्णन उनके अपने स्थानीय वृतान्त में नहीं  पाया जाता है। आप देख सकते हैं कि लगभग इन सभी समूहों में कम से कम उनके ‘स्मरण’ में सामान्य एक बात यह है कि जल प्रलय सृष्टिकर्ता की ओर से एक न्याय के रूप में आया था परन्तु यह कि कुछ मनुष्यों को एक बड़ी किश्ती में बचा लिया गया था। दूसरे शब्दों में, इस जल प्रलय का स्मरण न केवल संसार की अन्य सांस्कृतिक इतिहासों और महाद्वीपों को छोड़कर अपितु संस्कृत अपितु इब्रानी वेदों में भी पाया जाता है। यह इस घटना की ओर संकेत करता है कि यह हमारे सुदूर अतीत में घटित हुआ है।

हिन्दी पंचाँग की गवाही

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हिन्दी पंचाँग –महीने के दिन ऊपर से नीचे की ओर आते हैं, परन्तु एक सप्ताह 7-दिनों का होता है

यह तब की बात है जब मैंने भारत की यात्रा की और इसमें कार्य किया तब मुझे एक अन्य समर्थन देने वाली गवाही के प्रति पता लग गया – परन्तु जब आप इसके बारे में जानेंगे तो यह आपके लिए और भी अधिक उल्लेखनीय बन जाएगी। यह एक स्पष्टीकरण को देने के लिए विशेष है। जब मैं भारत में कार्य कर रहा था तो मैंने कई हिन्दी पंचाँगों को देखा। मैंने ध्यान दिया कि वे पश्चिमी पंचाँगों से बहुत अधिक भिन्न थे। इस स्पष्ट सी दिखाई देने वाली भिन्नता यह थी इन पंचाँगों का निर्माण इस तरह से हुआ है ताकि दिनों के स्तम्भ (ऊपर से नीचे) पँक्तियों (बाएँ से दाएँ) में चलने की अपेक्षा नीचे की ओर जाएँ, जो कि पश्चिम में संकेत चिन्ह के लिए विश्वव्यापी तरीका है। कुछ पंचाँगों में पश्चात्य ‘1, 2, 3…’ की अपेक्षा भिन्न अंक पाए जाते हैं क्योंकि वे हिन्दी लिपि (१, २,  ३ …) का उपयोग करते हैं। मैं समझ सकता था, और मैंने इस तरह की भिन्नता की अपेक्षा भी की क्योंकि एक पंचाँग को सूचित करने के लिए कोई एक ‘सही’ तरीका है ही नहीं। परन्तु यह केन्द्रीय सम्मिलन की बात थी – इन सभी भिन्नताओं के मध्य में – इसने मेरे ध्यान को आकर्षित कर लिया। हिन्दी के पंचाँग ने 7-दिन के सप्ताह का उपयोग किया – ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य संसार में किया जाता है। क्यों ? मैं समझ सकता था कि क्यों पंचाँग वर्षों और महीनों में बाँटा हुआ था ठीक वैसे ही जैसे पाश्चात्य के पंचाँग में होता है क्योंकि यह सूर्य के चारों ओर पृथ्वी और पृथ्वी के चारों ओर चंद्रमा की परिक्रमाओं के ऊपर आधारित होते हैं – इस प्रकार सभी लोगों को विश्वव्यापी खगोलीय नींव को प्रदान करते हैं। परन्तु ‘सप्ताह’ के लिए कोई भी खगोलीय समय का आधार नहीं है। जब मैंने लोगों को पूछा तो उन्होंने कहा कि यह प्रथा और परम्परा आधारित थे जो उनके इतिहास की ओर ले चलती है (कितनी दूर तक इसका किसी को भी पता नहीं है)।

…और बौद्ध थाई पंचाँग     

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थाई पंचाँग बाएँ से दाईं ओर चलता है, परन्तु पश्चिम की अपेक्षा एक भिन्न वर्ष का होता है, तथापि 7-दिन के सप्ताह का ही होता है

मुझे साथ ही थाईलैंड में रहने और कार्य करने का अवसर मिला है। जब मैं वहाँ रहता था तो मैं उनके पंचाँगों को देखता था। एक बौद्ध देश होने के कारण, थाई अपने पंचाँग का आरम्भ बुद्ध के जीवन से आरम्भ करते हैं जिस कारण उनके वर्ष सदैव पश्चिम के देशों के पंचाँगों से 543 वर्ष ज्यादा होते हैं (उदा. के लिए., ईस्वी सन् 2013 का अर्थ थाई पंचाँग में – बुद्ध युग का – 2556 वर्ष हुआ)। परन्तु एक बार फिर से वे 7-दिन के सप्ताह का ही उपयोग करते थे। इसे उन्होंने कहाँ से प्राप्त किया? क्यों विभिन्न देशों में पंचाँग आपस में कई तरीकों से इतनी अधिक भिन्नता रखते हुए भी 7-दिन के सप्ताह के ऊपर ही आधारित है जबकि इस पंचाँग के समय की इकाई का वास्तव में कोई खगोलीय आधार नहीं है?

सप्ताह के ऊपर प्राचीन यूनानियों का गवाही

हिन्दी और थाई पंचाँगों की इन टिप्पणियों ने मुझे यह देखने के लिए मजबूर कर दिया कि क्या 7-दिन का सप्ताह अन्य प्राचीन संस्कृतियों में भी दिखाई देता है या नहीं। और यह दिखाई देता है।

प्राचीन यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स, जो लगभग 400 ईसा पूर्व रहते थे जिन्हें आधुनिक चिकित्सा का पिता माना जाता है और उन्होंने ऐसी पुस्तकों को लिखा है, जिसमें उनकी चिकित्सीय टिप्पणियों की रिकॉर्डिंग पाई जाती है को,आज के दिन तक संरक्षित रखा गया है। ऐसा करने के लिए उन्होंने समय की इकाई को ‘सप्ताह’ के रूप में ही उपयोग किया है। किसी एक निश्चित बीमारी के बढ़ते हुए लक्षणों के बारे में उन्होंने ऐसा लिखा है:

चौथा दिन साँतवें का संकेत करता है; आठवाँ दूसरे सप्ताह का आरम्भ है; और इस तरह से ग्यारहवाँ दूसरे सप्ताह का चौथा, भी संकेतात्मक है; और एक बार फिर से, सातवाँ चौदवें से चौथा, और ग्यारहवें से सातवाँ होने के कारण संकेतात्मक है (हिप्पोक्रेट्स, सूक्तियाँ. #24)

अरस्तू, 350 ईसा पूर्व में अपने लेखन कार्य में निरन्तर समय के बँटवारे के लिए ‘सप्ताह’ का उपयोग करता है। उदाहरण के रूप में वह लिखता है कि:

शिशुकाल में होने वाली मौतों का बहुमत बच्चे के एक सप्ताह की उम्र में ही प्रगट होते है इसलिए इस उम्र में ही बच्चे का नामकरण करने की परम्परा, इस मान्यता से पाई जाती है कि अब उसके बचने के अवसर अधिक उत्तम हैं। (अरस्तु, पशुओं का इतिहास. भाग 12, 350 ईसा पूर्व)

इस तरह से कहाँ से इन प्राचीन यूनानी लेखकों ने, जो भारत और थाईलैंड से दूर थे, ने इस तरह से एक ‘सप्ताह’ के विचार को पाया जिसका उन्होंने उपयोग यह अपेक्षा करते हुआ किया कि उनके यूनानी पाठक यह पहले से ही जानते हैं कि एक सप्ताह क्या होता है? कदाचित् अतीत में इन सभी संस्कृतियों में कोई एक ऐतिहासिक घटना घटित हुई थी (यद्यपि हो सकता है कि वे इसे भूल गए होंगे) जिसने 7-दिन के सप्ताह की स्थापना की थी?

इब्रानी वेद इस तरह की एक घटना – संसार की आरम्भिक सृष्टि का वर्णन करता है। इस विस्तृत और प्राचीन वृतान्त में सृष्टिकर्ता संसार की रचना करता और पहले लोगों को 7 दिनों (वास्तव में 6 दिनों और एक 7वें दिन आराम के साथ) में निर्मित करता है। इस कारण से, प्रथम मानवीय जोड़े ने तब 7-दिन के इतिहास को अपने पंचाँग में समय की इकाई के रूप में उपयोग किया। जब मानवजाति उत्तरोत्तर काल में भाषा की गड़बड़ी के कारण बिखर गई तब ये मुख्य घटनाएँ जो ‘बिखरने’ से पहले घटित हुई थीं तब इनमें से कुछ  विभिन्न भाषाई समूहों के द्वारा स्मरण रखा गया, जिसमें आने वाले बलिदान की प्रतिज्ञा, एक विनाशकारी जल प्रलय का वृतान्त और साथ ही 7-दिन का सप्ताह सम्मिलित हैं। ये स्मृतियाँ आरम्भिक मानवजाति की कलाकृतियाँ और इन वेदों में वर्णित इन घटनाओं के इतिहास के लिए एक विधान है। यह स्पष्टीकरण निश्चित रूप से इब्रानी और संस्कृत वेदों के सम्मिलन की व्याख्या के लिए सबसे अधिक स्पष्ट और साधारण तरीका है। बहुत से लोग आज इन प्राचीन रचनाओं को मात्र पौराणिक कथाएँ मानते हुए स्वीकार नहीं करते हैं परन्तु ये सम्मिलन हमें इस पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करना चाहिए।

इस तरह से आरम्भिक मानवजाति का एक सामान्य इतिहास था, और इस इतिहास में सृष्टिकर्ता की ओर से मोक्ष की प्रतिज्ञा सम्मिलित थी। परन्तु कैसे यह प्रतिज्ञा पूर्ण होगी? हम अपने अध्ययन को एक पवित्र पुरूष के वृतान्त से आगे बढ़ाएंगे जो भाषाओं में गड़बड़ी के कारण लोगों के बिखर जाने के तुरन्त पश्चात् रहा। हम हमारे अगले लेख में आगे जारी रखेंगे।

कैसे मानव जाति आगे बढ़ती रही – मनु (या नूह) के वृतान्त से सबक

हमारी पिछली पोस्ट अर्थात् लेख में हमने यह देखा था कि मोक्ष की प्रतिज्ञा मानवीय इतिहास के बिल्कुल ही आरम्भ में दे दी गई थी। हमने यह भी ध्यान दिया था कि हम में कुछ ऐसी बात है जिसका झुकाव भ्रष्टता की ओर है, जो हमारे कार्यों में इच्छित नैतिक व्यवहार के प्रति, और यहाँ तक कि हमारे प्राणों के स्वभाव की गहराई में निशाने को चूकने को दिखाता है। हमारा मूल स्वभाव जिसे परमेश्‍वर (प्रजापति) ने रचा था वह विकृत हो गया है। यद्यपि हम बहुत से धार्मिक कर्म काण्डों, पापों के शोधन और प्रार्थनाओं के द्वारा इसे साफ करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, परन्तु भ्रष्टता की वास्तविकता हमें सहज बोध के द्वारा शुद्ध होने की आवश्यकता का अहसास दिलाती है कि हम स्वयं इसे उचित रूप से प्राप्त नहीं कर सकते हैं। हम अक्सर सिद्ध सम्पूर्णता के साथ जीवन यापन करने के लिए ‘कठिन’ संघर्ष करते हुए निरन्तर इसे पाने का प्रयास करते हैं।

परन्तु यदि हम इस भ्रष्टता को बिना किसी नैतिक संयम की रोकथाम किए हुए बढ़ते रहने दें तो हम शीघ्र ही भ्रष्ट हो जाएंगे। यह मानवीय इतिहास के बिल्कुल आरम्भ में ही घटित हुआ। बाइबल (वेद पुस्तक) के आरम्भ के अध्याय हमें बताते हैं कि यह कैसे घटित हुआ। यही वृतान्त सत्पथ ब्राह्मण  के साथ सामान्तर में पाया जाता है, जो यह विवरण देता है कि कैसे आज मानवजाति का प्रजनक – जिसे मनु के रूप में जाना जाता है – एक बहुत बड़े जल प्रलय के न्याय में से बच गया जो मनुष्य की भ्रष्टता के कारण आया था, और उसने अपना बचाव एक बड़े जहाज में शरण लेने के द्वारा किया था। दोनों अर्थात् बाइबल (वेद पुस्तक) और संस्कृत में लिखे हुए वेद हमें बताते हैं कि सारी की सारी आज की जीवित मानवजाति उसी ही के वंश में से निकल कर आई है।

प्राचीनकालीन मनु – जिससे हम अंग्रेजी के शब्द मैन को प्राप्त करते हैं 

यदि हम अंग्रेजी के शब्द ‘मैन’ की व्युत्पत्ति को देखें, तो पाते हैं कि यह जर्मनिका-पूर्व से निकल कर आता है। एक रोमन इतिहासकार टेक्ट्टीक्स, जो यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के समय के आस पास रहा ने जर्मन के लोगों के इतिहास के बारे में एक पुस्तक को लिखा है जिसे जर्मनिका  कह कर पुकारा गया है। उसमें वह ऐसे कहता है कि

अपने पुराने गाथागीतों (जो उन सब में एक तरह से लिपिबद्ध और इतिहास हैं) में वे टियूस्टों, ऐसा ईश्‍वर जो पृथ्वी में से निकल कर आता है, और मानुष उसका पुत्र, जो जातियों का पिता और संस्थापक है, के लिए त्यौहार मनाते हैं। मानुष के लिए वह तीन पुत्रों को नियत करते हैं, जिनके नामों के पश्चात् बहुत से लोगों को पुकारा जाता है (टेक्ट्टीक्स. जर्मनिका अध्याय 2. 100 ईस्वी सन् में लिखी गई)

शब्द-व्युत्पत्तिशास्री हमें बताते हैं कि प्राचीन जर्मनी का यह शब्द मानुष  इंडो-यूरोपियन-पूर्व “मानुह” (संस्कृति के मानुह, आवेस्ता मनु के साथ तुलना करें) की व्युत्पत्ति है। दूसरे शब्दों में, अंग्रेजी शब्द ‘मैन’मनु  से निकल कर आता है जिसके लिए दोनों अर्थात् बाइबल (वेद पुस्तक) और सत्पथ ब्राह्मण कहते हैं कि हम उसमें से निकल कर आए हैं! इस कारण  आइए इस व्यक्ति के ऊपर ध्यान दें और देखें कि हम इससे क्या सीख सकते हैं। हम सत्पथ ब्राह्मण  को सारांशित करते हुए आरम्भ करेंगे। कुछ व्याख्याओं में इस वृतान्त के आपस में एक दूसरे से थोड़े से भिन्न पक्ष दिए हुए हैं, इसलिए मैं मुख्य तथ्यों पर ही टिका रहूँगा।

संस्कृत वेदों में मनु का वृतान्त

वैदिक वृतान्तों में मनु एक धर्मी पुरूष था, जो सच्चाई के पीछे चलता था। क्योंकि मनु पूर्ण रीति से ईमानदार था, इसलिए उसे आरम्भ में सत्यवार्ता (“ऐसा व्यक्ति जिसने सच बोलने की शपथ ली हो”) के रूप में जाना गया।

सत्पथ ब्राह्मण  के अनुसार (सत्पथ ब्राह्मण के वृतान्त को पढ़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें), एक अवतार ने मनु को आने वाली जल प्रलय के प्रति चेतावनी दी थी। यह अवतार आरम्भ में शाफरी (एक छोटी मछली) के रूप में तब प्रगट हुआ जब उसने अपने हाथों को एक नदी में धोया था। इस छोटी मछली ने मनु से उसे बचाने के लिए कहा, और तरस से भर कर, उसने इसे पानी के एक जार में डाल दिया। यह बड़ी होती चली गई, तब मनु ने इसे एक बड़े घड़े में डाल दिया, और फिर इसे एक कुएँ में रख दिया। जब कुआँ भी इस बढ़ती-हुई मछली के लिए छोटा पड़ गया, तो मनु ने उसे एक कुण्ड (जलाशय) में डाल दिया, जो सतह और भूमि से दो योजन (16 मील) ऊँचा, और इतना ही लम्बा था, और एक योजन (8 मील) चौड़ाई में था। जब मछली और अधिक आगे बढ़ती चली गई तो मनु को इसे नदी में डालना पड़ा, और जब यहाँ तक नदी भी उसके लिए अपर्याप्त हो गई तो उसने इसे महासागर में डाल दिया, जिसके बाद इसने बड़े महासागर के लगभग सारे विशाल भाग को भर दिया।

यह तब की बात है जब अवतार ने मनु को उस एक ऐसी आने वाले जल प्रलय के बारे में सूचित किया जो बहुत जल्द सब कुछ-नाश करने के लिए आने वाला था। इसलिए मनु ने एक बड़ी किश्ती का निर्माण किया जिसमें उसके परिवार के लोग, 9 तरह के बीज, और पशु इस धरती को फिर से भर देने के लिए रहे, क्योंकि जल प्रलय के कम होने पर महासागरों और समुद्रों का पानी कम हो जाएगा और संसार को लोगों और पशुओं से पुन: भरने की आवश्यकता थी। जल प्रलय के समय, मनु ने किश्ती को मछली के सींग से बाँध दिया था जो एक अवतार थी। उसकी किश्ती जल प्रलय के पानी के कम होने के पश्चात् पहाड़ की चोटी पर जा टिकी। वह तब पहाड़ पर से नीचे उतरा और अपने छुटकारे के लिए उसने बलिदानों और बलियों को चढ़ाया। आज पृथ्वी के सभी लोग उसी से निकल कर आए हैं।

बाइबल (वेद पुस्तक) में नूह का वृतान्त

बाइबल (वेद पुस्तक) इसी तरह की एक घटना का वृतान्त देती है, परन्तु इस वृतान्त में मनु को ‘नूह’ कह कर पुकारा गया है। नूह के वृतान्त और विश्वव्यापी जल प्रलय के विवरण को बाइबल में से पढ़ने के लिए यहाँ पर क्लिक करें। बहुत से लोग नूह की कहानी और जल प्रलय को अविश्वसनीय पाते हैं। परन्तु संस्कृत वेदों और बाइबल के साथ, इस घटना की स्मृतियाँ विभिन्न संस्कृतियों, धर्मों और इतिहासों में संरक्षित हैं। संसार एक अवसादी चट्टान के साथ ढकी हुई है, जिसका निर्माण एक जल प्रलय के मध्य में हुआ इस तरह से हमारे पास इस जल प्रलय के भौतिक प्रमाण के साथ साथ मानवविज्ञानी प्रमाण भी पाए जाते हैं। परन्तु आज हमारे लिए इससे क्या सबक मिलता है कि हमें वृतान्त के ऊपर अपने ध्यान को देना चाहिए?

चूकना बनाम दया को प्राप्त करना

जब मैं लोगों से बात करता हूँ कि परमेश्‍वर भ्रष्टता (पाप) का न्याय करता है, और विशेष रूप से उनके पाप या मेरे पापों का न्याय होगा या नहीं, तो जिस उत्तर को मैं अक्सर उनसे पाता हूँ वह कुछ इस तरह से है, “मैं न्याय के लिए अधिक चिन्तित नहीं हूँ क्योंकि परमेश्‍वर इतना अधिक दयालु और कृपालु है कि मैं नहीं सोचता कि वह वास्तव में मेरा न्याय करेगा।”  इस तरह की सोच के लिए यह नूह (या मनु) का वृतान्त हैं जो हमें प्रश्न करने के लिए मजबूर करना है। सम्पूर्ण संसार (नूह और उसके परिवार को छोड़ कर) न्याय के अधीन नाश कर दिए गए थे। इस कारण उस समय उसकी दया कहाँ पर थी? यह जहाज में प्रदान की गई थी।

परमेश्‍वर ने अपनी दया में, एक जहाज का प्रबन्ध किया था जो किसी के लिए भी उपलब्ध थी। कोई भी इसमें प्रवेश कर सकता था और आने वाली जल प्रलय से सुरक्षा और दया को प्राप्त कर सकता था। समस्या यह थी कि लगभग सभी लोगों ने आने वाले जल प्रलय के प्रति अविश्‍वास से प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने नूह को ठट्ठों में उड़ाया और आने वाले न्याय के ऊपर जो वास्तव में घटित होने वाला था विश्‍वास नहीं किया। इस कारण वे जल प्रलय में ही नाश हो गए। और जो कुछ उन्हें करना था केवल यह था कि उन्हें जहाज में प्रवेश करना था और वे न्याय से बच सकते थे।

वे जो जीवित थे उन्होंने कदाचित् यह सोचा होगा कि वे ऊँचे पहाड़ पर चढ़ कर, या एक बड़ा बेड़ा बना कर जल प्रलय से बच सकते थे। परन्तु उन्होंने न्याय की सामर्थ्य और आकार का पूर्ण रीति से गलत अनुमान लगाया। उस न्याय के लिए ये ‘उत्तम विचार’ पर्याप्त नहीं थे; उन्हें किसी ऐसी वस्तु की आवश्यकता थी जो उन्हें अच्छी तरह से ढक सकती थी – यह एक जहाज था। जबकि वे सभी इस जहाज को बनते हुए देख रहे थे यह दोनों अर्थात् आने वाले न्याय और उपलब्ध दया का एक स्पष्ट चिन्ह था। और नूह (या मनु) के उदाहरण के ऊपर ध्यान देते हुए, यह हमसे कुछ इसी तरह से बात करते हुए, दिखाती है कि दया उस प्रबन्ध के द्वारा प्राप्त की जा सकती है जिसे परमेश्‍वर ने स्थापित किया है, न कि उस प्रबन्ध के द्वारा जिसके लिए हम सोचते हैं कि यह उत्तम है।

इस कारण अब क्यों नूह ने परमेश्‍वर की दया को प्राप्त किया? आप ध्यान देंगे कि बाइबल कई बार निम्न वाक्य को दुहराती है

यहोवा अर्थात् परमेश्‍वर की इस आज्ञा के अनुसार नूह ने सब कुछ किया

मैं देखता हुँ कि जो कुछ मैं समझता, या जो कुछ मुझे पसन्द होता है, या जो कुछ मैं करने के लिए सहमत होता हूँ, उसे करने का झुकाव मुझमें होता है। मुझे निश्चय है कि नूह के मन में आने वाले जल प्रलय की चेतावनी और भूमि पर एक बहुत बड़े जहाज के निर्माण के आदेश के प्रति कई तरह के प्रश्न रहे होंगे। मुझे निश्चय है कि उसने तर्क दिए होंगे कि क्योंकि वह एक अच्छा और सत्य-के-पीछे चलने वाला व्यक्ति था इसलिए उसे इस जहाज के निर्माण के लिए किसी के ऊपर पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं थी। परन्तु उसने वह सब  कुछ किया जिसका आदेश उसे दिया गया था – केवल उतना ही नहीं जिसे उसने समझ लिया था, न ही उतना जितना उसके आराम की बात थी, और न ही उतना जो बातें उसके लिए कोई अर्थ रखती थी। अनुसरण करने के लिए यह एक अच्छा उदाहरण है।

मुक्ति का द्वार

बाइबल साथ ही हमें यह बताती है कि नूह, उसके परिवार और पशुओं के द्वारा जहाज में प्रवेश कर लिए जाने के पश्चात्

यहोवा अर्थात् परमेश्‍वर ने जहाज के द्वार को बन्द कर दिया। (उत्पत्ति 7:16)

यह नूह नहीं – अपितु परमेश्‍वर था जो जहाज के एक ही द्वार को अपने नियंत्रण में लिए हुए था और इसका संचालन कर रहा था। जब न्याय आया और पानी बढ़ने लगा, तब लोगों के द्वारा बाहर से कितना भी अधिक मात्रा में इसके द्वार को पीटने पर भी नूह इसके दरवाजे को खोल नहीं सकता था। परमेश्‍वर इसके एक ही द्वार को अपने नियंत्रण में लिए हुए था। परन्तु साथ ही जो जहाज के अन्दर थे इस भरोसे में रह सकते थे कि क्योंकि परमेश्‍वर द्वार को अपने नियंत्रण में लिए हुए था इसलिए किसी भी तरह की हवा का दबाव या लहर की शक्ति इसे खोल नहीं सकती थी। वे परमेश्‍वर की दया और देखरेख में द्वार के भीतर सुरक्षित थे।

क्योंकि परमेश्‍वर ने इस सिद्धान्त को परिवर्तित नहीं किया है इसलिए यह आज भी हम पर लागू होता है। बाइबल एक और आने वाले न्याय के लिए चेतावनी देती है – और यह इस बार आग से आएगा –  परन्तु नूह के चिन्ह हमें आश्वासन देते हैं कि न्याय के साथ साथ वह दया का भी प्रस्ताव देगा। परन्तु हमें उस एक द्वार वाले जहाजको देखना चाहिए जो हमारी आवश्यकता को ढक लेगा और हमें दया प्रदान करेगा।

एक बार फिर से बलिदान

बाइबल हमें बताती है कि नूह:

ने यहोवा अर्थात् परमेश्‍वर के लिए एक वेदी बनाई; और सब शुद्ध पशुओं और सब शुद्ध पक्षियों में से कुछ कुछ लेकर वेदी पर होमबलि चढ़ाया। (उत्पत्ति 8:20)

यह बलिदान की उस पद्धति पर बिल्कुल सही बैठता है जिस पर हमने पुरूषासूक्ता में ध्यान दिया था। यह ऐसा है मानो नूह (या मनु) जानता था कि पुरूषा के बलिदान को दिया जाना चाहिए इस कारण उसने एक पशु के बलिदान को दिया जो कि उसके भरोसे को आने वाले बलिदान के एक चित्र में यह प्रदर्शित करते हुए है कि इसे परमेश्‍वर स्वयं देगा। सच्चाई तो यह है कि बाइबल यह कहती है कि इस बलिदान के दिए जाने के ठीक पश्चात् परमेश्‍वर ने ‘नूह और उसके पुत्रों को आशीष’ दी (उत्पत्ति 9:1)

और ‘नूह के साथ एक वाचा बाँधी’ (उत्पत्ति 9:8) कि वह कभी भी सभी लोगों का न्याय जल प्रलय के साथ नहीं करेगा। इसलिए ऐसा जान पड़ता है कि नूह के द्वारा दिया हुआ पशु का एक बलिदान उसकी आराधना में बहुत ही महत्वपूर्ण था।

पुनर्जन्म – व्यवस्था के द्वारा या…

वैदिक परम्पराओं में, मनु ही मनुस्मृति  का स्रोत है, जो एक व्यक्ति के जीवन में उसके वर्ण/जाति को निर्धारित करता या परामर्श देता है। यजुर्वेद  कहता है कि जन्म के समय, सभी मनुष्य शुद्र  या सेवकों के रूप में जन्म लेते हैं, परन्तु यह कि हमें इस बन्धन से बचने के लिए एक दूसरे या नए जन्म  की आवश्यकता होती है। स्मृति के बारे में मनुस्मृति  विवादास्पद है और इसमें भिन्न दृष्टिकोणों को व्यक्त किया गया है। इन सभी विवरणों का विश्लेषण करना हमारी परिधि से परे की बात है। परन्तु फिर भी, जो रूचिकर है, और जिसकी हम यहाँ पर खोज करेंगे, वह बाइबल में मिलता है, कि सामी लोग जो नूह के वंशज् में से आए थे ने भी उन दो मार्गों को प्राप्त किया जिसमें शुद्धता और पापों से शोधन को प्राप्त किया जाता है। एक मार्ग व्यवस्था था जिसमें पापों से शोधन, कर्म काण्डों के द्वारा पापों से शोधन और बलिदान सम्मिलित थे – यह बहुत अधिक मनुस्मृति  के सामान्तर था। अन्य मार्ग बहुत ही अधिक रहस्मयमयी था, और इसमें पुनर्जन्म को प्राप्त करने से पहले मृत्यु सम्मिलित थी। यीशु ने इसके बारे में शिक्षा दी है। उसने उसके दिनों के एक विद्वान शिक्षक को ऐसे कहा कि

यीशु ने उसको उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्में तो परमेश्‍वर का राज्य देख नहीं सकता।” (यूहन्ना 3:3)

हम इसके ऊपर आगे उत्तरोत्तर के लेखों में देखेंगे। परन्तु इसके आगे हम हमारे – अगले लेख में हम यह खोज करेंगे कि क्यों बाइबल और संस्कृत वेदों में इस तरह की समानताएँ पाई जाती हैं।

आरम्भ से ही – मोक्ष की प्रतिज्ञा

मेरे पिछले कुछ लेखों में मैंने यह देखा कि कैसे उसकी आरम्भिक रची हुई अवस्था से पाप में गिर कर मनुष्य पतित हो गया। परन्तु बाइबल (वेद पुस्तक) एक ऐसी योजना को आगे बढ़ाती है जो परमेश्‍वर के पास आरम्भ से ही था। यह योजना एक ऐसी प्रतिज्ञा के ऊपर आधारित है जिसे तब निर्गत किया गया था और यही वह योजना है जो पुरूषासूक्ता में भी गूँजती रहता है।

बाइबल – एक वास्तविक पुस्तकालय

इस प्रतिज्ञा की विशेषता की सराहना करने के लिए हमें बाइबल के बारे में कुछ मूल सच्चाइयों को जानना आवश्यक है। यद्यपि यह एक पुस्तक है, और हम इसे इसी रूप में सोचते हैं, यह एक चलित पुस्तकालय है ऐसा सोचना वास्तव में और अधिक सटीक होगा है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह पुस्तकों का एक संग्रह, जो कि विभिन्न परिस्थितियों से आने वाले लेखकों के द्वारा, लगभग 1500 वर्षों से अधिक लम्बी अवधि के मध्य में लिखी गई है। आज यह पुस्तकें एक ही पुस्तक – बाइबल में इकट्ठी कर दी गई हैं । यही एक तथ्य बाइबल को संसार की महान् पुस्तकों में ऋग्वेद की तरह विशेष बना देता है। विभिन्न तरह के लेखकों के होने के अतिरिक्त, बाइबल की विभिन्न पुस्तकें कथनों, उदघोषणाओं और भविष्यद्वाणियों की भी घोषणा करती है जिन्हें बाद के लेखक आधारित हुए हैं। यदि बाइबल केवल एक ही लेखक, या लेखकों के समूह के द्वारा जो एक दूसरे को जानते हों लिखी गई होती, तो यह कोई विशेष योग्यता नहीं रखती। परन्तु सैकड़ों और यहाँ तक कि हजारों वर्षों के अन्तराल पर, विभिन्न तरह की सभ्यताओं में, भाषाओं में, सामाजिक ताने बाने, और साहित्यिक शैलियों की पृथकता के कारण एक दूसरे से भिन्न थे – तथापि उनके सन्देशों और भविष्यद्वाणियों को मूल रूप से उनके पश्चात् आने वाले लेखकों के द्वारा या बाइबल से बाहर के प्रमाणित इतिहास के तथ्यों के द्वारा पूर्ण हुई हैं। यही वह कारण जो बाइबल को पूर्ण रूप से एक भिन्न स्तर के ऊपर विशेष बना देता है – और यह जानकारी हमें इसके सन्देश को प्रेरित करनी चाहिए। पुराने नियम (की वे पुस्तकें जो यीशु के आने से पहले लिखी गईं) की पुस्तकों की विद्यमान पाण्डुलिपियों का लेखनकार्य 200 ईसा पूर्व पहले था, इस कारण बाइबल के मूलपाठ की नींव, संसार की अन्य प्राचीन पुस्तकों से कहीं अधिक उत्तम है।

वाटिका में मोक्ष की प्रतिज्ञा

बाइबल में उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ में ही सृष्टि की रचना और पतन के वृतान्त में ही हमें इस पहलू की प्रतिछाया स्पष्टता से दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि हम इसे आरम्भ में ही देखते हैं, परन्तु यह अन्त को ध्यान में रखते हुए लिखा गया था। यहाँ पर हम एक प्रतिज्ञा को देखते हैं जब परमेश्‍वर अपने विरोधी शैतान का सामना करता है, जो कि बुराई का अवतार था, जो कि सर्प के रूप में था, और उससे एक पहेली में बात करते हुए ठीक इसके पश्चात् मनुष्य को पाप में पतित कर दिया

“…और मैं (परमेश्‍वर ) तेरे (शैतान) और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” (उत्पत्ति 3:15)

इसे ध्यान से पढ़ने के पश्चात् आप देखेंगे कि यहाँ पर पाँच विभिन्न पात्रों का उल्लेख किया गया है और यह कि यह अपने आप में भविष्यद्वाणी है कि यह आने-वाले-समय (जिसे भविष्यसूचक काल में उपयोग होने वाले शब्द ‘गा’ के दुहराव में देखा जा सकता है) की ओर देख रहा है। यह पात्र निम्न हैं:

  1. परमेश्‍वर
  2. शैतान/सर्प
  3. स्त्री
  4. स्त्री का वंश
  5. शैतान का वंश

और पहेली यह भविष्यद्वाणी करती है कि कैसे भविष्य में यह पात्र एक दूसरे के साथ सम्बन्धित होंगे। इसे नीचे दिखलाया गया है

Offspring
उत्पत्ति में प्रतिज्ञा किए हुए पात्रों के मध्य को सम्बन्ध को चित्रित किया गया है

 

परमेश्‍वर इसका प्रबन्ध करेगा कि दोनों अर्थात् शैतान और स्त्री के यहाँ ‘वंश’ होगा। वहाँ पर दोनों के वंशों अर्थात् स्त्री और शैतान के मध्य में ‘बैर’ या घृणा होगी। शैतान स्त्री के वंश की एड़ी को डसेगा जबकि स्त्री का वंश शैतान के ‘सिर को कुचल’ डालेगा।

वंश की कटौती– एक ‘नर’

अभी तक हमने सीधे ही मूलपाठ से अवलोकन किया है। अब तर्क के लिए कुछ कटौतियाँ की जाए। क्योंकि स्त्री के ‘वंश’ को ‘नर’ और ‘डालेगा’ कह कर सूचित किया गया इससे हम जानते हैं कि यह एक एकल नर – एक पुरूष होगा । इससे हम कुछ सम्भव व्याख्याओं को छोड़ सकते हैं। एक ‘नर’ के रूप में वंश का होना एक नारी नहीं है और इस कारण यह एक स्त्री नहीं हो सकती है। एक ‘नर’ के रूप में यह ‘वे’ नहीं हो सकते हैं, जो यह विश्‍वसनीय ढंग से, कदाचित् एक समूह के लोगों, या एक नस्ल, या एक समूह, या एक जाति के साथ हो सकता था। विभिन्न समयों पर और विभिन्न तरीकों से लोगों ने यह सोचा है कि ‘वे’ इसका उत्तर हो सकते हैं। परन्तु वंश लोगों का समूह न होकर एक नर है चाहे यह एक जाति, या एक निश्चित धर्म के लोग जैसे हिन्दू, बुद्धवादी, ईसाई या मुस्लिम आदि के लिए ही क्यों न सूचित किया गया है। ‘नर’ होने के रूप में यह वंश कोई ‘ठोस’ वस्तु (एक व्यक्ति का वंश है) भी नहीं है। यह इस संभावना को भी समाप्त कर देती है कि वंश एक विशेष दर्शन, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, राजनीतिक तंत्र प्रणाली या धर्म है। एक ‘ठोस’ वस्तु कदाचित् ही ऐसी होती, और कदाचित ही हमारे संसार की समस्याओं के उत्तर के लिए हमारे पंसदीदा विकल्प होते। हम सोचते हैं कि हमारी परिस्थितियों को किसी तरह की कोई ‘ठोस’ वस्तु ठीक कर देगी, इसलिए सबसे सर्वोत्तम मानवीय विचारक सदियों से विभिन्न राजनीतिक तंत्र प्रणालियों, शैक्षणिक तंत्र प्रणालियों, प्रौद्योगिक तंत्र प्रणालियों और धार्मिक तंत्र प्रणालियों आदि के प्रति तर्क देते आए हैं। परन्तु इस प्रतिज्ञा में दिशासूचक एक बिल्कुल ही भिन्न दिशा की ओर पूर्ण रूप से संकेत कर रहा है। परमेश्‍वर के मन में कुछ और ही – अर्थात् एक ‘नर’ था। और यह ‘नर’ सर्प के सिर को कुचल डलेगा।

जो कुछ नहीं कहा गया है उससे एक और दिलचस्प अवलोकन निकल कर सामने आता है। परमेश्‍वर यह प्रतिज्ञा पुरूष से नहीं करता जैसी वह स्त्री के साथ प्रतिज्ञा करता है। यह बहुत ही असाधारण बात है विशेष कर जब पूरी बाइबल और पूरे प्राचीन संसार में पिता के द्वारा वंश चलने के ऊपर जोर दिया गया है। सच्चाई तो यह है, कि बाइबल में दी हुई वंशावलियों के लिए दी गई आलोचनाओं में से एक आलोचना आधुनिक पश्चिमी विद्वानों की यह है कि वे खून के उस रिश्ते को अन्देखा कर देते हैं जो कि स्त्री की ओर ले चलता है। यह पाश्चात्य की दृष्टि में ‘लैंगिकवाद’ है क्योंकि यह केवल पुरूष के वंश के ऊपर ही ध्यान देता है। परन्तु इस घटना में ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई है कि एक सन्तान (एक ‘नर’) एक पुरूष से आएगी। यह केवल इतना ही कहता है कि एक सन्तान या वंश आएगा जो केवल स्त्री से ही, पुरूष का नाम का उल्लेख किए बिना आ रहा है।

मनुष्य के पतित हो जाने के पश्चात् जब से वह विद्यमान है, मैं सभी मनुष्य के प्रति ऐतिहासिक या मिथक रूप से यही सोच सकता हूँ, कि एक ही व्यक्ति ऐसा है जिसकी माता के होने का दावा तो है परन्तु ठीक उसी समय उसका कोई भी शारीरिक पिता नहीं था। यह यीशु (यीशु सत्संग) था जिसके बारे में नया नियम (इस प्रतिज्ञा के दिए जाने के हजारों वर्षों पश्चात् लिखा गया) दावा करता है कि वह एक कुँवारी से उत्पन्न हुआ – इस कारण एक माता तो थी परन्तु उसका शारीरिक पिता नहीं था। क्या यीशु इस पहेली में समय के आरम्भ में ही प्रतिछाया में दिखाई दे रहा है? यह इस उक्ति को पूरा करता है कि वंश एक ‘नर’ होगा न कि एक ‘नारी’, ‘वे’ या कोई ‘ठोस’ वस्तु । इस दृष्टिकोण से, यदि आप इस पहेली को पढ़ें तो बहुत सी बातें अपने सही आकार में आ जाएंगी।

‘उसकी एड़ी को डसेगा’??

इसका क्या अर्थ है कि शैतान/सर्प उसकी ‘एड़ी को डसेगा’? मैं इसे तब तक समझ नहीं पाया जब तक मैं अफ्रीका के जंगलों में नहीं चला गया। हमें मोटे रबड़ से बने हुए जुते पहनने पड़ते थे यहाँ तक जब उमस से भरी हुई गर्मी ही क्यों न होती थी – क्योंकि वहाँ लम्बी घास में सर्प लेटे रहते थे और हमारे पैर को – अर्थात् हमारी एड़ी को डस सकते थे– और इससे हम मर सकते थे। अपने पहले ही दिन मैं लगभग एक सर्प के ऊपर पैर रखने वाला था और सम्भवतः मैं इससे मर सकता था। इस पहेली ने मुझे इसके अर्थ को समझा दिया था। वह ‘नर’ इस सर्प (‘तेरे सिर को कुचल डालेगा’) को मार देगा, परन्तु इसके लिए उसे कीमत अदा करनी पड़ेगी, हो सकता है कि वह मार (‘उसकी एड़ी को डसेगा’) दिया जाए। यह उस विजय की प्रतिछाया में दिखाई देता है जो यीशु के बलिदान के द्वारा प्राप्त की गई।

सर्प का वंश?

परन्तु उसका दूसरा शत्रु कौन है, यह शैतान का वंश है? यद्यपि हमारे पास इसके बारे में विस्तृत रूप से पता लगाने के लिए यहाँ पर स्थान नहीं है, परन्तु उत्तरोत्तर पुस्तकें एक आने वाले व्यक्ति के बारे में बात करती हैं। इस विवरण के ऊपर ध्यान दें:

हे भाइयो, अब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आने, और उसके पास अपने इकट्ठे होने के विषय में तुम से विनती करते हैं…कि किसी आत्मा, या वचन, या पत्री के द्वारा जो कि मानों हमारी ओर से हो, यह समझकर कि प्रभु का दिन आ पहुँचा है, तुम्हारा मन अचानक अस्थिर न हो जाए; और न तुम घबराओ। किसी रीति से किसी के धोखे में न आना क्योंकि वह दिन न आएगा, जब तक धर्म का त्याग न हो ले, और वह पाप का पुरूष अर्थात् विनाश का पुत्र प्रगट न हो। जो विरोध करता है, और हर एक से जो परमेश्‍वर, या पूज्य कहलाता है, अपने आप को बड़ा ठहराता है, यहाँ तक कि वह परमेश्‍वर के मन्दिर में बैठकर अपने आप को ईश्‍वर ठहराता है। (2 थिस्सलुनीकियों 2:1-4; पौलुस के द्वारा यूनान में 50 ईस्वी सन् में लिखा गया)

ये उत्तरोत्तर पुस्तकें स्पष्टता से उस टकराव के बारे में उल्टी गिनती की बात करती हैं जो स्त्री के वंश और पुरूष के वंश के मध्य में होने वाले हैं। परन्तु यह मानवीय इतिहास के बिल्कुल आरम्भ में ही उत्पत्ति में दी हुए इस प्रतिज्ञा के बारे में प्रथम बार भ्रूण-के-रूप में, इस व्याख्या के पूर्ण होने की प्रतीक्षा में उल्लिखित किया गया है। इस तरह से इतिहास का चरमोत्कर्ष, शैतान और परमेश्‍वर के मध्य में अन्तिम प्रतियोगता की उल्टी गिनती, वाटिका में ही बहुत पहले आरम्भ हो चुकी है, जिसे आरम्भ में ही – आरम्भिक पुस्तकों में देखा गया है।

मेरे पहले के लेखों में हमने पुरूषसूक्ता के भजनों के ऊपर ध्यान दिया था। हमने देखा कि इस भजन में भी आने वाले एक सिद्ध पुरूष – पुरूषा – की बात की गई है, जो कि साथ ही मनुष्य की सामर्थ्य से नहीं आएगा। यही मनुष्य वास्तव में बलिदान में दे दिया जाएगा। सच्चाई तो यह है कि हमने यह देखा है कि यह पहले से ही समय के आरम्भ में परमेश्‍वर के मन में निर्धारित और नियुक्त किया हुआ था। और ये दोनों पुस्तकें एक ही व्यक्ति के बारे में बात करती हैं? मैं विश्‍वास करता हूँ कि वे करती हैं। वह एक दिन एक पुरूष के रूप में देहधारण करेगा ताकि यही व्यक्ति बलिदान में दिया जा सके – जो कि सभी मनुष्यों के लिए चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो के लिए एक विश्‍वव्यापी आवश्यकता है। परन्तु यह प्रतिज्ञा न केवल ऋग्वेद और बाइबल के मध्य में सामान्तर पाई जाती है । अपितु क्योंकि यह आरम्भिक मानवीय इतिहास का उल्लेख करती हैं इसलिए वे साथ ही अन्य सामान्तरों का भी उल्लेख करती हैं जिसे हम हमारी अगली पोस्ट अर्थात् लेख में देखेंगे।

भ्रष्ट (भाग 2)… आपने निशाने से चूक जाना

मेरे पिछले लेख में मैंने यह देखा था कि कैसे वेद पुस्तक (बाइबल) हमें यह विवरण देती है कि हम परमेश्‍वर के वास्तविक स्वरूप जिसमें हमें निर्मित किया गया था, में भ्रष्ट हो गए। एक चित्र जिसने मुझे इसे अच्छी तरह से देखने में सहायता दी वह पृथ्वी के मध्य में रहने वाले – ओर्कस् की थी। इस तरह से बाइबल हमारे बारे में विवरण देती है। परन्तु यह कैसे घटित हुआ?

पाप का आरम्भ

बाइबल की उत्पत्ति नामक पुस्तक में इसका उल्लेख है। परमेश्‍वर के स्वरूप में रचे जाने के ठीक थोड़े समय के ही पश्चात् प्रथम मनुष्य की जाँच हुई। वहाँ पर लिखा हुआ वृतान्त एक ‘सर्प’ के साथ हुई बातचीत का उल्लेख करता है। सर्प को सदैव से ही विश्‍वव्यापी रूप में शैतान –परमेश्‍वर के विरोध में खड़े होने वाली आत्मा के रूप में समझा गया है। बाइबल के द्वारा – शैतान अक्सर किसी अन्य व्यक्ति के बोलने के द्वारा बुराई करने के लिए परीक्षा में डालता है। इस घटना में वह सर्प के द्वारा बोला। इसे इस तरह से उल्लेख किया गया है।

यहोवा परमेश्‍वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, “क्या सच है, कि परमेश्‍वर ने कहा‘तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?’”

स्त्री ने सर्प से कहा, “इस बाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं;पर जो वृक्ष बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।”

तब सर्प ने स्त्री से कहा, “तुम निश्चय न मरोगे,वरन परमेश्‍वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।

अत: जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उस ने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उस ने भी खाया। तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; सो उन्हों ने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। (उत्पत्ति 3:1-6)

उनके चुनाव का मूल कारण, और परीक्षा ऐसी थी, कि वह ‘परमेश्‍वर के तुल्य हो’ सकते थे। इसी समय तक उन्होंने हर बात के लिए परमेश्‍वर पर भरोसा किया था और सभी बातों के लिए केवल उसके वचन को साधारण से रूप में ही मान लिया था। परन्तु अब वह इस बात को पीछे छोड़ते हुए स्वय पर निर्भर होते हुए और प्रत्येक बात के लिए अपने शब्दों के ऊपर भरोसा करते हुए, ‘परमेश्‍वर के तुल्य’ हो जाना चाहते थे। वह स्वयं के लिए ‘ईश्‍वर’ अपने जहाज के लिए स्वयं कप्तान, अपने गंतव्य के लिए स्वयं के स्वामी, स्वायत्ती और केवल स्वयं के प्रति जवाबदेह होना चाहते थे।

परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह के कारण उनमें कुछ परिवर्तन आ गया था। जैसे का यह संदर्भ उल्लेख करता है, उन्होंने शर्म को महसूस किया, और स्वयं को ढकने की कोशिश की। सच्चाई तो यह है, कि इसके पश्चात्, जब परमेश्‍वर ने आदम का उसकी अनाज्ञाकारिता के लिए सामना किया, आदम ने हव्वा (और परमेश्‍वर जिसने उसे रचा था) पर दोष लगा दिया। उसने इसकी एवज में सर्प पर दोष लगा दिया। कोई भी अपनी जवाबदेही को स्वीकार नहीं करना चाहता था।

आदम के विद्रोह के परिणाम

और जो कुछ उस दिन आरम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर चल रहा है क्योंकि हम में उसी ही का निहित स्वभाव है जिसे हमने जन्मजात उत्तराधिकार में पाया है। इसी लिए हम आदम की तरह व्यवहार करते हैं – क्योंकि हमने उसी के स्वभाव को विरासत में पाया है। कुछ इससे गलतफ़हमी में पड़ जाते हैं कि बाइबल के कहने का अर्थ है कि हमें आदम के विद्रोह के लिए दोषी ठहराया गया है। सच्चाई तो यह है कि, केवल आदम ही है जिस पर दोष लगाया जाना चाहिए परन्तु हम उसके विद्रोह के परिणाम स्वरूप जीवन यापन कर रहे हैं। हम इसे अनुवांशिकीय रूप में सोच सकते हैं। बच्चे अपने अच्छे और बुरे – गुणों को अपने अभिभावकों से– उनके जीनों को उत्तराधिकार में प्राप्त करते हुए करते हैं। हमने आदम के इस विद्रोही स्वभाव को उत्तराधिकार में पाया है और इस प्रकार सहजता से, लगभग अनजाने ही, परन्तु जानबूझकर उस विद्रोह को निरन्तर बनाए हुए हैं जिसे उसने आरम्भ किया था। हो सकता है कि हम पूरे ब्रह्माण्ड का परमेश्‍वर नहीं बनना चाहते हों, परन्तु हम हमारे संदर्भों के ईश्‍वर बनते हुए, परमेश्‍वर से पृथक स्वायत्ती होना चाहते हैं।

पाप के प्रभाव स्पष्टता से आज दिखाई देते हैं

और यह मानवीय जीवन का इतना अधिक विवरण देता है कि हम इसके सही मूल्य को नहीं समझते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक स्थान पर लोगों को अपने घरों के दरवाजों को बन्द रखना पड़ता है, उन्हें पुलिस, वकीलों, बैंक व्यवस्था के लिए न भेदे जाने वाले पासवर्डों की आवश्यकता पड़ती है – क्योंकि हमारे अभी की परिस्थितियों में हम एक दूसरे से चोरी करते हैं। यही वह कारण है जिससे साम्राज्य और समाज अन्तत: पतन की ओर जाते और खत्म हो जाते हैं – क्योंकि इन सभी साम्राज्यों में नागरिक की प्रवृत्ति पतन होने की थी। सभी तरह की सरकारों और आर्थिक प्रणालियों को उपयोग कर लेने के पश्चात्, और यद्यपि कुछ अन्यों की अपेक्षा अधिक उत्तम तरीके से कार्य करती हैं, ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक राजनैतिक और आर्थिक प्रणाली अन्त में स्वयं ही खत्म हो जाएगी – क्योंकि जो लोग इन विचारधाराओं में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, की प्रवृत्ति ऐसी है कि वह अन्त में पूरे के पूरे तंत्र को ही नीचे की ओर खींचते हुए खत्म कर डालेंगे। इसलिए ही यद्यपि हमारी पीढ़ी अभी तक की सबसे अधिक शिक्षित क्यों न हो हम में अभी भी यह समस्याएँ बनी हुई हैं, क्योंकि शिक्षण का स्तर बहुत नीचे तक पहुँच चुका है। इसलिए ही हम स्वयं को प्रतासना मंत्र की प्रार्थना के साथ पहचान कर सकते हैं – क्योंकि यह हमें बहुत ही अच्छे तरह से वर्णित करता है।

पाप – निशाने को ‘चूकना’ है

यही वह कारण है कि क्यों कोई भी धर्म उनके समाज के लिए अपने दर्शन को पूरी तरह से लेकर नहीं आ पाया है – अपितु यहाँ तक कि अनिश्‍वरवादी भी (सोवियत संघ के स्टालिन, चीन के माओ, कम्बोडीया के पॉल पोट के बारे में सोचें) – क्योंकि कोई ऐसी बात है जो हमारे मार्ग में हमें हमारे दर्शन को पूरा करने में चूक जाने के लिए खड़ी रहती है। सच्चाई तो यह है, कि शब्द ‘चूकना’ हमारी परिस्थितियों का सार है। बाइबल का एक वचन इसका एक चित्र देता है जिसने मुझे इसे अच्छी तरह से समझने में सहायता दी है। यह कहता है

इन सब लोगों में से सात सौ बैंहत्थे चुने हुए पुरूष थे, जो सब के सब ऐसे थे कि गोफ़न से पत्थर मारने में बाल भर भी न चूकते थे। (न्यायियों 20:16)

यह वचन ऐसे सैनिकों का उल्लेख करता है जो गोफ़न मारने में कुशल थे और अपने निशाने को कभी नहीं चूकते थे। ‘चूकने’ के लिए मूल इब्रानी अनुवादित शब्द יַחֲטִֽאहै। इसी इब्रानी शब्द बाइबल के अधिकांश स्थानों में पाप शब्द के लिए अनुवाद किया गया है । उदाहरण के लिए, ‘पाप’ के लिए यही इब्रानी शब्द उपयोग हुआ है जब यूसुफ को मिस्र में दासत्व के लिए बेच दिया गया था, जो अपने स्वामी की पत्नी के साथ व्यभिचार नहीं करता, यहाँ तक कि वही स्त्री ऐसा करने के लिए उससे निवेदन करती रही । उसने उससे कहा कि

इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं, और उसने तुझे छोड़, जो उसकी पत्नी है, मुझ से कुछ नहीं रख छोड़ा, इसलिये भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्‍वर का पापी क्यों बनूँ? (उत्पत्ति 39:9)

और दसवीं आज्ञा का उल्लेख करने के ठीक पश्चात् वह कहता है:

मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत; क्योंकि परमेश्‍वर इसलिये आया है कि तुम्हारी परीक्षा करे, और उसका भय तुम्हारे मन में बना रहे कि तुम पाप न करो।” (निर्गमन 20:20)

इन दोनों ही स्थानों में इसी इब्रानी शब्दיַחֲטִֽא का उपयोग किया गया है जिसका अनुवाद ‘पाप’ के रूप में किया गया है। यही सैनिक के लिए ‘चूकने’ के लिए उपयोग किया गया ठीक वही शब्द है जो गोफ़न से अपने निशाने को कभी नहीं चूकते थे जैसा कि इन वचनों में वर्णन किया गया है जिसका अर्थ है ‘पाप’ जब बात लोगों के द्वारा एक दूसरे के साथ व्यवहार करने की आती है। इस बात को हमें समझ प्रदान करने के लिए कि ‘पाप’ क्या है एक चित्र का प्रबन्ध किया है। सैनिक एक पत्थर को लेता है और उसे गोफ़न में बाँध कर निशाने के ऊपर मारता है। यदि वह चूक जाता है तो वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल हो गया। ठीक इसी तरह से, हम स्वरूप में रचे हुए होने के कारण किस तरह से हम स्वयं को उससे सम्बन्धित और कैसे हम अन्यों से व्यवहार करते हैं, के निशाने से कहीं चूकते तो नहीं हैं। ‘पाप’ करने का अर्थ उस उद्देश्य से, या निशाने से चूक जाना है, जिसे हमारे लिए इच्छित किया गया था, और जिसे हम हमारी भिन्न तंत्र प्रणालियों, धर्मों और विचारधाराओं में भी स्वयं के लिए इच्छित करते हैं।

‘पाप’ का बुरा समाचार – प्राथमिकता का नहीं अपितु सत्य का विषय है

मनुष्य की इस भ्रष्ट और निशाना-चूकने का चित्र सुन्दर नहीं है, यह अच्छा-महसूस किए जाने वाला नहीं है, न ही यह आशावादी है। वर्षों के पश्चात्, इस विशेष शिक्षा के विरोध में दृढ़ता से मैंने लोगों को प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पाया है। मुझे यहाँ कनाडा में महाविद्यालय के इस विद्यार्थी का स्मरण है जो मुझे बहुत अधिक गुस्से से भरा हुआ देखते हुए ऐसा कहने लगा था, “मैं तुम में विश्‍वास नहीं करता क्योंकि मैं जो कुछ तुम कह रहे हो उसे मैं पसन्द नहीं करता है।” हो सकता कि हम अब इसे पसन्द न करें, परन्तु इसके ऊपर ध्यान केन्द्रित करना ही निशाने को चूकना है। किसी की ‘पसन्द’ का किसी बात के सत्य होने या न होने से क्या लेना देना है? मुझे टैक्स देना, युद्ध, एड्स और भूकम्प पसन्द नहीं है – किसी को भी नहीं होते हैं – परन्तु क्या वे इससे चले जाते हैं, और न ही हम इनमें से किसी को भी अनदेखा कर सकते हैं।

कानून, पुलिस, ताले, चाबीयाँ, सुरक्षा आदि की सभी तरह की तंत्र प्रणालियाँ, जिन्हें हमने हमारे स्वयं के समाजों में एक दूसरे की सुरक्षा के लिए निर्मित किया है, इस बात का सुझाव अवश्य देते हैं कि कहीं पर कुछ गलत है। सच्चाई तो यह है कि त्यौहार जैसे कुम्भ मेला लाखों लोगों को उनके ‘पापों को धोने’ के लिए अपनी ओर खींचता है, यह संकेत देता है कि हम स्वयं अपनी सहज बुद्धि से जानते हैं कि किसी न किसी तरीके से हम निशान से ‘चूक’ गए हैं। सच्चाई तो यह है कि स्वर्ग जाने के लिए बलिदान दिए जाने की शर्त की विचारधारा सभी धर्मों में एक सुराग के रूप में पाई जाती है कि हम स्वयं में ही कुछ है जो कि ठीक नहीं है। सबसे अन्त में, इस धर्मसिद्धान्त तो निष्पक्ष तरीके से देखे जाने की आवश्यकता है।

परन्तु पाप का यह धर्मसिद्धान्त लगभग सभी धर्मों, भाषाओं और जातियों में विद्यमान है – जिसके कारण हम सभी निशाने से ‘चूक’ जाते हैं, जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाता है। परमेश्‍वर इसके बारे में क्या करने वाला था? हम परमेश्‍वर की प्रतिक्रिया के बारे में हमारी अगली पोस्ट या लेख में देखेंगे –जहाँ हम आने वाले उद्धारक – पुरूषा की प्रथम प्रतिज्ञा को देखते हैं जिसे हमारे लिए भेजा जाएगा।