मेरे बारे में : एक गन्दे-अमीर रसिए…और एक तपस्वी पवित्र व्यक्ति से जिस ज्ञान को मैंने पाया

Ragसर्वप्रथम मेरे बारे में कुछ मूल जानकारियाँ…मेरा नाम रागनॉर है। यह स्वीडिश नाम है परन्तु मैं कनाडा में रहता हूँ। मैं विवाहित हूँ और हमारे पास एक लड़का है। मैंने टोरान्टों महाविद्यालय, न्यू ब्राऊनश्विक महाविद्यालय और अकाडिया महाविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है।

मेरा पालन पोषण एक मध्यम-वर्गीय व्यवसायी परिवार में हुआ। हम मूल रूप से स्वीडन से कनाडा में तब आकर बसे थे जब मैं जवान था, और इसलिए मेरा पालन पोषण विदेशों के कई देशों में रहते हुए हुआ जैसे – अल्जीरीया, जर्मनी और कैमरून और अन्त में महाविद्यालय के अध्ययन के लिए वापस कनाडा में आने के द्वारा। मेरी माँ का जन्म भारत में हुआ था और वह वहीं पली बढ़ी थी। वह धाराप्रवाह हिन्दी बोलती है। जब मैं बड़ा हो रहा था, तब वह मुझे चित्रों को दिखाते हुए भिन्न देवी देवताओं के बारे में बताती थी जिन्हें उसने एक पुस्तक के रूप में एकत्र की हुई थी। इस तरह से जब मेरा पालन पोषण पश्चिम के देशों में हो रहा था और तब बाद में एक मुस्लिम देश में भी, मुझे मेरे परिवार के द्वारा हिन्दू धर्म की जानकारी दी गई। इतना कुछ होने पर भी, प्रत्येक व्यक्ति की तरह मैं भी (और अब भी) पूर्णता के जीवन का अनुभव करना चाहता था – ऐसा जीवन जिसकी विशेषता अन्य लोगों के प्रति संयुक्तता के साथ – सन्तोष, शान्ति का भाव हो और जिसमें अर्थ और उद्देश्य हो।

विविधता से भरे हुए इन समाजों में रहते हुए – जहाँ विभिन्न धर्म के साथ साथ धर्मनिरपेक्षता– और एक उत्सुक पाठक होने के कारण, मैं ऐसे विभिन्न दृष्टिकोणों के साथ अवगत हुआ कि अन्तिम ‘सत्य’ क्या है और पूर्णता के जीवन को प्राप्त करने के लिए क्या किया जाता है। जो कुछ मैंने अवलोकन किया वह यह था कि यद्यपि मेरे पास (और अधिकांश पश्चिम में रहने वाले लोगों के पास) अभूतपूर्व धन सम्पत्ति, प्रौद्योगिकी और इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अवसर थे, परन्तु विरोधाभास यह था कि ‘पूर्णता से भरा हुआ जीवन’ इसकी तुलना में दूर की बात थी। मैंने देखा कि पिछली पीढ़ियों की तुलना में सम्बन्ध अस्थाई और उपयोग के पश्चात् फेंक देने वाले थे। ‘तीव्र प्रतियोगिता’ जैसे शब्दों से वर्णित किया जाता है हम कैसे जीवन को यापन करते हैं। मैंने सुना है कि यदि हमें ‘थोड़ा सा और ज्यादा मिल जाए’ तो हम लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। परन्तु कितना अधिक प्राप्त किया जाए? और कितना अधिक क्या प्राप्ति किया जाए? धन? वैज्ञानिक ज्ञान? प्रौद्योगिकी? सुख?

एक जवान व्यक्ति के रूप में मैंने एक गुस्से को महसूस किया है जो अस्पष्ट बेचैनी के रूप में वर्णित की जा सकती है। क्योंकि मेरे पिता जी अफ्रीका में एक प्रवासी परामर्शदाता थे, इसलिए मैं कई धनी, शिक्षित और सम्पन्न पश्चिमी युवाओं के साथ घुमता रहता था। परन्तु हमें मनोरंजन देने वाली थोड़ी सी बातों के साथ जीवन वहाँ बहुत ही सरल था। इस लिए मेरे मित्र और मैं उस दिन का स्वप्न लेते थे जब हम हमारे अपने देशों में वापस लौटेंगे और टी.वी., अच्छे भोजन, अवसरों और पश्चिमी जीवन की सुगमता के तरीके का आनन्द लेंगे – और तब हम ‘सन्तुष्ट’ हो जाएगे। परन्तु जब कभी भी मैं कनाडा या यूरोप की यात्रा करता था, तब थोड़ी सी प्रसन्नता के पश्चात् बेचैनी वापस लौट आती थी। परन्तु इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात, मैंने यह भी ध्यान दिया जो लोग वहाँ रहते थे यह उनमें सदैव के लिए बनी हुई थी। उनके पास चाहे कुछ भी क्यों न था (और उनके पास किसी भी मापदण्ड में बहुत अधिक था), उनमें और अधिक पाने की चाहत सदैव बनी रहती थी। मैंने सोचा कि मैं ‘इसे’ तब प्राप्त कर लूँगा जब मेरे पास एक प्रसिद्ध प्रेमिका होगी। और कुछ समय के लिए ऐसा जान पड़ा कि इसने मेरे भीतर कुछ भर दिया था, परन्तु कुछ महीने के पश्चात् बैचेनी फिर वापस लौट आती थी। मैंने सोचा जब मैं हाई स्कूल से पास हो जाऊँगा तब मैं इसे ‘प्राप्त’ कर लूँगा…क्योंकि तब मुझे कार चलाने का लाईसेंस मिल जाएगा और मैं घुमने फिरने लगूँगा…तब मेरी खोज पूरी हो जाएगी। अब क्योंकि मैं प्रौढ़ हो चुका हूँ, मैं लोगों को सेवानिवृत्ति की बात सन्तुष्टि की टिकट के रूप में करते हुए सुनता हूँ। क्या ऐसा है? क्या हम हमारे सारे जीवन को एक के पश्चात् दूसरी बात की प्राप्ति के पीछे दौड़ते हुए, यह सोचते हुए खो देते हैं, कि किनारे के पास पड़ी हुई अगली वस्तु की प्राप्ति हमें इसे दे देगी, और तब…हमारे जीवन ही समाप्त हो जाते हैं? क्या यह सब कुछ व्यर्थ नहीं जान पड़ता है!

सुलैमान का ज्ञान

इन वर्षों के मध्य में, इस बैचेनी के कारण जो मैंने मुझ में और मेरे चारों ओर देखी, सुलैमान के लेखों ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला। सुलैमान, अपने बुद्धि के लिए प्राचीन इस्राएल में प्रसिद्ध राजा हुआ है, जिसने बाइबल (वेद पुस्तक) के पुराने नियम में कई पुस्तकों को, ईसा पूर्व 950 के आस पास लिखा है। अपनी पुस्तक सभोपदेशक में, वह इस न बचने वाली बैचेनी का विवरण देता है, जिसका वह अनुभव कर रहा था। उसने लिखा।

“मैंने अपने मन से कहा, ‘चल, मैं तुझ को आनन्द से जाँचूंगा; इसलिये आनन्दित और मगन हो।’…मैं अपने प्राण को दाखमधु पीने से किस प्रकार बहलाऊँ और कैसे मूर्खता को थामे रहूँ, जब तक मालूम न करूँ कि वह अच्छा काम कौन सा है जिसे मनुष्य अपने जीवन भर करता रहे।

मैंने बड़े बड़े काम किए: मैंने अपने लिये घर बनवा लिए और अपने लिये दाख की बारियाँ लगवाई; मैंने अपने लिये बारियां और बाग लगवा लिए, और उनमें भाँति भाँति के फलदाई वृक्ष लगाए। मैंने अपने लिये कुण्ड खुदवा लिए कि उनसे वह वन सींचा जाए जिसमें पौधे लगाए जाते थे। मैंने दास और दासियाँ मोल लीं, औ मेरे घर में दास भी उत्पन्न हुए; और जितने मुझ से पहिले… थे उसने कहीं अधिक गाय- बैल और भेड़- बकरियों का मैं स्वामी था। मैंने चान्दी और सोना और राजाओं और प्रान्तों के बहुमूल्य पदार्थों का भी संग्रह किया; मैंने अपने लिये गवैयों और गानेवालियों को रखा, और बहुत सी कामिनियाँ भी – जिनसे मनुष्य सुख पाते हैं, अपनी कर लीं। इस प्रकार मैं अपने से पहले के सब… से अधिक महान् और धनाढ्य हो गया; तौभी मेरी बुद्धि ठिकाने रही। और जितनी वस्तुओं के देखने की मैंने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रूका; मैंने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला” (सभोपदेशक 2:1-10)।

धन, प्रसिद्धि, ज्ञान, परियोजनाएँ, स्त्रियाँ, आनन्द, राज्य, नौकरी, शराब…सुलैमान के पास सब कुछ -हमारे और उसके अपने दिनों में किसी से भी बढ़कर था। आइंस्टीन की बुद्धि, बिल गेट्स का धन, पश्चिमी फिल्मी जगत के हीरो का सामाजिक/यौन सम्बन्धी जीवन, साथ ही शाही वंशावली जैसे ब्रिटेन के राजकीय घराने के प्रिन्स विलियम का है – सब कुछ उसके पास में थे। इसकी तुलना में कौन इस संयोजन को हरा सकता था? आप सोचते होंगे इस तरह के सभी लोग सन्तुष्ट रहे होंगे। परन्तु वह ऐसे निष्कर्ष निकालता है:

“व्यर्थ ही व्यर्थ! व्यर्थ ही व्यर्थ! उपदेशक का यह वचन है। ‘सब कुछ व्यर्थ है!’… मैंने अपना मन लगाया कि जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है, उसका भेद बुद्धि से सोच सोचकर मालूम करूँ; यह बड़े दु:ख का काम है जो परमेश्‍वर ने मनुष्यों के लिये ठहराया है कि वे उस में लगें! मैंने सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचे किए जाते हैं; देखो, वे व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।” (सभोपदेशक 1:1-14)

“… तब मैं ने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं…तब मैं अपने मन में उस सारे परिश्रम के विषय जो मैं ने धरती पर किया था निराश हुआ

, यह भी व्यर्थ और बहुत ही बुरा है। मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगाकर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है? …यह भी व्यर्थ ही है।” (सभोपदेशक 2:11-23)

आशावाद जैसी कोई बात ही नहीं! श्रेष्ठ गीत में, कविताओं में से एक में, वह अपने कामुकता से भरे हुए, गर्म-जोश प्रेम सम्बन्ध का विवरण देता है – ऐसी बात जो कि जीवन-पर्यन्त सन्तुष्टि देने की सम्भावना सबसे अधिक आभास देती है। परन्तु अन्त में, इस प्रेम सम्बन्ध ने भी उसके कोई बनी रहने वाली सन्तुष्टि प्रदान नहीं की जैसा कि हम सभोपदेशक की पुस्तक से जानते हैं। आनन्द, धन, कार्य, तरक्की, गर्मजोशी से भरा हुए प्रेम जो उसे अन्तत: सन्तुष्टि प्रदान करता, को उसके द्वारा एक माया या छल ही दिखाया गया है।

अब जब कभी भी मैं अपने चारों ओर देखता हूँ, चाहे अपने मित्रों में या समाज में, सुलैमान की तरह ऐसा जान पड़ता है कि पूर्णता के जीवन की खोज ही वह है जिसे दिए जाने का प्रस्ताव और प्रयास चारों ओर दिया जा रहा है। परन्तु उसने मुझे पहले से ही बता दिया है कि वह इन मार्गों से इसे प्राप्त नहीं कर सका है। इसलिए मैंने यह अनुभूति की है कि मैं इसे यहाँ प्राप्त नहीं कर पाऊँगा और मुझे मार्ग रहित यात्रा की ओर देखने की आवश्यकता है।

इन विषयों के साथ ही मैं जीवन के एक अन्य पहलू के लिए भी चिन्तित था। इसने सुलैमान को भी परेशान रखा।

“क्योंकि जैसी मनुष्यों की वैसी ही पशुओं की भी दशा होती है; दोनों की वही दशा होती है, जैसे एक मरता वैसे ही दूसरा भी मरता है। सभों की स्वांस एक सी है, और मनुष्य पशु से कुछ बढ़कर नहीं; सब कुछ व्यर्थ ही है। सब एक स्थान में जाते हैं; सब मिट्टी से बने हैं, और सब मिट्टी में फिर मिल जाते हैं। क्या मनुष्य का प्राण ऊपर की ओर चढ़ता है और पशुओं का प्राण नीचे की ओर जाकर मिट्टी में मिल जाता है? यह कौन जानता है?” (सभोपदेशक 3:19-21)

सब बातें सभों को एक समान होती हैं –धर्मी हो या दुष्ट, भले, शुद्ध या अशुद्ध, यज्ञ करने और न करने वाले, सभों की दशा एक ही सी होती है।जैसी भले मनुष्य की दशा, वैसी ही पापी की दशा; जैसी शपथ खाने वाले की दशा, वैसी ही उसकी जो शपथ खाने से डरता है। जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है उसमें यह एक दोष है कि सब लोगों की एक सी दशा होती है…उसके बाद वे मरे हुओं में जा मिलते हैं।उसको परन्तु जो सब जीवतों में है, उसे आशा है, क्योंकि जीवत कुत्ता मरे हुए सिंह से बढ़कर है! क्योंकि जीवते तो इतना जानते हैं –कि वे मरेंगे, परन्तु मरे हुए कुछ भी नहीं जानते, और न उनको कुछ और बदला मिल सकता है, क्योंकि उनका स्मरण मिट गया है।” (सभोपदेशक 9:2-5)

सुलैमान के प्राचीन लेखों ने मुझे भीतर से हिला दिया और मुझे उत्तरों की खोज करने के लिए मज़बूर कर दिया। जीवन, मृत्यु, अमरत्व, और अर्थ के बारे में प्रश्न मेरे भीतर भर गए। हाई स्कूल के अन्तिम वर्ष में हमें साहित्य (कविता, गीत, लघु कथाएँ आदि) के एक सौ लेखों को गद्यावली के रूप में संकलित करने के लिए गृहकार्य दिया गया। मेरी गद्यावली के अधिकांश भाग ने इन्हीं विषयों का अध्ययन किया और इसने मुझे कई अन्य लोगों को ‘मिलने’ और ‘सुनने’ का अवसर प्रदान किया जो इसी तरह के प्रश्नों के साथ परेशान थे। और उनसे मिलने के लिए – मैंने सभी तरह के युगों, शैक्षणिक पृष्ठभूमियों, भिन्न दार्शनिक जीवन शैलियों, धर्मों और शैलियों से चुनाव किया। रोलिंग स्टोन्स द्वारा रचित सन्तुष्टि, पिंक फ्लोइड द्वारा रचित समय, और शैली द्वारा रचित औजाइमेन्डाइस, शमूएल कोलोरिज़, डब्ल्यू एच आऊडेन, शेक्सपियर और इसी तरह के अन्य लोग इसमें सम्मिलित थे।

गुरू साईं बाबा का ज्ञान

जब मैं इंजीनियरिंग का विद्यार्थी था, तो मेरे प्रोफेसरों में एक बंगलोर में रहने वाले गुरू श्री साईं बाबा के भक्त थे और उसने मुझे उनकी कई पुस्तकें पढ़ने के लिए दी, जिन्हें मैंने बड़ी उत्सुकता के साथ पढ़ा। और जब मैंने उनके उपदेशों को पढ़ा तो मैंने पाया कि मेरा नैतिक विवेक केवल उनकी नैतिक शिक्षाओं के साथ ही सहमत था। यहाँ पर उसकी पुस्तकों का कुछ अंश है जिसे मैंने मेरे लिए लिख लिया था।

“और धर्म क्या है? जो कुछ आप उपदेश देते हैं उसे अभ्यास में लाना, जो कुछ आप कहते हैं उसे वैसे ही करना जैसे कहा जा रहा है, उपदेश को मानते हुए और इसे अभ्यास में लाते हुए । भले कर्मों को कमाना,

धर्म की लालसा करना;परमेश्‍वर के भय में जीवन यापन करना, परमेश्‍वर तक पहुँचने के लिए जीवन यापन करना: यही धर्म है”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 339.

“वास्तव में आपका कर्तव्य क्या है?….

* सबसे पहले अपने माता पिता की प्रेम और आदर और कृतज्ञता के साथ सेवा करनी ।

* दूसरा, सत्य बोलना और भले कर्मों में व्यवहार करना ।

* तीसरा, जब कभी आपके पास कुछ समय बचे, तब प्रभु के नम को वह जिस भी रूप में आपके मन में है, दुहराते रहना ।

* चौथा, दूसरे के बारे में बुरा बोलने में लिप्त न होना या दूसरों की कमजोरियों की खोज करने का प्रयास नहीं करना।

* और अन्त में, किसी भी रूप में अन्यों को दु:ख नहीं पहुँचाना”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 348-349.

“जो कोई अपने अंहकार को अपने अधीन कर लेता है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं पर जय प्राप्त कर लेता है, अपनी वहशी भावनाओं और आवेगों को नष्ट कर देता है, और अपने शरीर को प्रेम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का दमन करता है, वह निश्चित ही धर्म के पथ पर अग्रसर है” धर्म वाहिनी, पृ. 4

जब मैंने साईं बाबा के उपदेशों का अध्ययन किया तो मैं इसे दो तरीकों से किया। प्रथम, मैंने यह देखने के लिए किया कि इस पवित्र हिन्दू व्यक्ति ने जो शिक्षा दी थी वह वास्तव में अच्छी थी। क्या मैं उसके साथ जो कुछ उसने कहा था कि यह ‘अच्छा और सत्य’ है, के साथ सहमत था कि वह सच में अच्छा और सत्य था? मैंने पहचान लिया कि जो कुछ उसने इन उपदेशों में कहा था वह अच्छा, वास्तव में अच्छा था। ये वे शिक्षाएँ थीं जिसके अनुसार मुझे जीवन यापन करना चाहिए था। मैं आपको भी निमंत्रण देता हूँ आप इन शिक्षाओं का अध्ययन यह करने के लिए करें कि आपको इन उपदेशों के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए या नहीं।

परन्तु यही वह स्थान था जहाँ मेरे सामने एक बड़ी समस्या उठ खड़ी हुई। और यह समस्या उपदेशों में नहीं थी, अपितु मुझ में थी। क्योंकि जब मैंने इन्हें लागू करने का प्रयास किया, चाहे मैं इन शिक्षाओं को कितना भी अधिक क्यों न प्रशंसा करता था और इनके अनुसार जीवन यापन करने की कितना भी क्यों न प्रयास करता था, मैंने पाया कि मैं निरन्तर इसके अनुसार जीवन यापन नहीं कर पा रहा हूँ। मैं निरन्तर इन अच्छे आदर्शों को पालन करने में असफल हो रहा था।

ऐसा जान पड़ता था कि मुझे दो मार्गों में से एक को चुनना है। वह मार्ग जिसे सुलैमान के द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जिसके पीछे सामान्यत: पूरा संसार चलता है, स्वयं के लिए जीते हुए, अपने लिए इसके अर्थों, आनन्द या आदर्शों को रचना करते हुए, ऐसा था जिसे मुझे चुनना था। परन्तु मैं जानता था कि सुलैमान के लिए अन्त अच्छा नहीं था – न ही अधिकांश के लिए होता है जिन्हें मैंने देखा था जो इस पथ पर चले थे। सन्तुष्टि अस्थाई और छल के समान थी। जिस पथ को साईं बाबा ने प्रस्तुत किया है वह असम्भव है, कदाचित् उस जैसे गुरू के लिए न हो, परन्तु मेरे जैसे एक ‘सामान्य’ व्यक्ति के लिए यह असम्भव थी। निरन्तर इन आदर्शों के पीछे चलते रहने से मैं स्वतंत्रता को प्राप्त नहीं कर सकता था – यह दासत्व था।

सुसमाचार – विचार करने के लिए तैयार है

मेरे अध्ययन और खोज में मैंने यीशु (यीशु सत्संग) की शिक्षाओं और उपदेशों को जैसे बाइबल आधारित सुसमाचारों (वेद पुस्तक) में वर्णित है, पढ़ा है। नीचे दिए हुए यीशु के कथन ने मुझे आकर्षित कर लिया

“…मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएँ और बहुतायत का जीवन पाएँ” (यूहन्ना 10:10)

“हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।” (मत्ती 11:28-30)

मुझमें यह बात आई, कि हो सकता है, यह सम्भव हो कि यहाँ पर उत्तर हो जो कदाचित् अन्य मार्गों के अन्त को सम्बोधित कर रहा हो। कुल मिलाकर, सुसमाचार (जो मेरे लिए कम-या-ज्यादा परन्तु अर्थहीन धार्मिक शब्द था) का शाब्दिक अर्थ वास्तव में शुभ सन्देश था? या क्या यह फिर कम-या-ज्यादा परन्तु कोई झूठी शिक्षा थी? इसका उत्तर पाने के लिए मुझे पता था कि मुझे दो मार्गों की यात्रा करने की आवश्यकता थी। प्रथम, मुझे सुसमाचार की समझ की जानकारी को प्राप्त करना आरम्भ करना था। दूसरा, मैं कई भिन्न धार्मिक संस्कृतियों में रहा, कई भिन्न लोगों से मिला और लेखकों को पढ़ा था जिनकी इसके प्रति कई आपत्तियाँ थीं और बाइबल आधारित सुसमाचार के विरोध में कई विरोधी विचार थे। ये अच्छी जानकारी रखने वाले और बुद्धिमान लोग थे। मुझे सुसमाचार के सम्बन्ध में – साथ ही साथ अन्य धर्म सिद्धान्तों के लिए भी – और इन मान्यताओं की जाँच के लिए विश्‍वासी के शुद्ध आधार को विकसित करने की आवश्यकता थी। मुझे सुसमाचार के बारे में आलोचनात्मक तरीके से, बुद्धिहीन आलोचना से परे होकर सोचने की आवश्यकता थी।

यह एक वास्तविक भाव है जब एक व्यक्ति इस तरह यात्रा का आरम्भ करता है जिसमें वह कभी भी पूर्ण रूप से गंतव्य तक नहीं पहुँच पाता है, परन्तु मैंने यह निश्चित ही पता लगा लिया कि सुसमाचार इन विषयों के उत्तर को प्रदान करते हैं। इसका पूर्ण उद्देश्य ही इन्हें – एक पूर्ण जीवन, मृत्यु, शाश्‍वतकाल, और व्यवहारिक सरोकारों को जैसे हमारे पारिवारिक सम्बन्ध में प्रेम, दोष, भय और क्षमा को सम्बोधित करना है। सुसमाचार दावा करते हैं कि यह एक ऐसी नींव है जिसके ऊपर हम हमारे जीवनों को निर्मित कर सकते हैं। हो सकता है कि एक व्यक्ति जरूरी न हो कि सुसमाचार द्वारा प्रदान किए हुए उत्तरों को पसन्द कर ले, हो सकता है कि एक व्यक्ति इसके साथ सहमत न हो या इसमें विश्‍वास न करे, परन्तु यह देखते हुए कि यह मनुष्य के सभी प्रश्नों को सम्बोधित करता हैं यह मूर्खता की बात होगी कि कोई इससे सूचित हुए बिना ही दूर रह जाए।

मैंने साथ ही यह सीखा कि सुसमाचार ने उसी समय मुझे बहुत अधिक परेशान भी कर दिया था। ऐसे समय में जब बहुत सी बातें आरामदायक जीवन यापन करने के लिए हमें प्रलोभित करती हैं, सुसमाचार के प्रति तर्करहित होकर सुन्न कर देती हैं, ने मेरे मन, हृदय, प्राण और सामर्थ्य को चुनौती दे दी कि यद्यपि यह जीवन का प्रस्ताव देती हैं, परन्तु यह एक आसान जीवन का प्रस्ताव नहीं देती है। यदि आप सुसमाचार पर ध्यान देने के लिए विचार करते हुए समय निकालते हैं तो आप भी ऐसा पा सकते हैं।

जबसे मैंने सुसमाचार का अनुसरण करने के लिए अपनी यात्रा का आरम्भ किया है, मुझे पूरे भारत में और यहाँ तक कि नेपाल में कार्य और यात्रा करने का अवसर मिला है। वन सम्बन्धी मेरी इंजीनियरिंग मुझे कई स्थानों पर, विभिन्न सह-कर्मियों के साथ ले गई है। इस संदर्भों में मैं बातचीत करने के लिए योग्य हो सका हूँ और और अधिक आत्मबोध को मैंने प्राप्त किया है कि सुसमाचार वैदिक संदर्भ में कितनी अधिक प्रासंगिक, सत्य और अर्थपूर्ण है। मैं आशा करता हूँ कि आप भी ऐसा ही पाएंगे जब आप सुसमाचार के ऊपर ध्यान

कुम्भ मेला महोत्सव: पाप का बुरा समाचार और हमारी शुद्धता की आवश्यकता को दिखा रहा है

मानवीय इतिहास में जनसमूह का एक सबसे बड़ा रूप में इकट्ठा होना इस वर्ष 2013 में घटित हुआ– कुम्भ मेले का त्योहार 12 वर्षों में केवल एक ही बार मनाया जाता है। चौंका देने वाली सँख्या में 10 करोड़ लोग 55 दिनों के त्योहार को मनाने के लिए गंगा नदी के किनारों पर इलाहाबाद शहर में पहुँच गए, जिसमें से 1 करोड़ ने तो गंगा में त्योहार के आरम्भ होने केपहले ही दिन स्नान कर लिया था।

लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु
लाखों की सँख्या में कुंभ के मेले में श्रद्धालु

एन. डी टी. वी. के अनुसार, आयोजकों ने फरवरी 15 को स्नान के अन्तिम दिन में 2 करोड़ लोगों के द्वारा स्नान किए जाने का अनुमान लगाया था । मैं इलाहाबाद आया हूँ और मैं यह कल्पना नहीं कर सकता हूँ कि कैसे इतने सारे लोग लाखों की सँख्या में एक दम से बिना किसी कार्यों को रोकते हुए वहाँ पर एकत्र हो सकते हैं। बी. बी. सी ने रिपोर्ट दी कि इन लोगों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चिकित्सकों और शौचालयों जैसी वस्तुओं को इकट्ठा करने के लिए भारी प्रयासों को किया गया था। कुम्भ मेले में लोगों की इतनी अधिक सँख्या ने सालाना मक्का के लिए हज को जाने वाले तीर्थ यात्रियों की सँख्या जैसे कि मुसलमानों की कुल सँख्या – 2012 में केवल 31 लाख थी, को ठिगना सा कर दिया।

इस कारण क्यों 10 करोड़ लोगों को 120 अरब रूपये गंगा नदी में स्नान करने के लिए खर्च करने पड़े? नेपाल से आने वाले एक श्रद्धालु ने बी. बी. सी को ऐसा बताया कि

“कि मैंने अपने पापों को धो लिया है।”

रायटर्स समाचार एजेंसी रिपोर्ट देती है कि,

77 वर्षीय घुमक्कड़ तपस्वी स्वामी शंकरानन्द सरस्वती, जो ठण्ड में खड़ा नंगा काँप रहा था, ने ऐसे कहा कि,”मैंने इस और पहले के जीवन के अपने सारे पापों को धो लिया है,”

एन. डी टी. वी. हमें बताता है कि

भक्तगण, जो यह विश्वास करते हैं कि पवित्र जल में डुबकी लगाने से उनके पाप शुद्ध हो जाते हैं,

पिछले वर्ष 2001 के त्योहार में मैंने बी. बी. सी. के द्वारा तब के लिए हुए साक्षात्कार पर ध्यान दिया था कि तीर्थ यात्री मोहन शर्मा ने ऐसे बताया था कि “जिन पापों को हमने उत्पन्न किया है वह यहाँ पर धुल जाते हैं।”

पाप की विश्वव्यापी भावना

दूसरे शब्दों में, लाखों की सँख्या में लोग धन को खर्च करेंगे, भीड़ से भरी हुई ट्रेनों में यात्रा करेंगे, भीड़भाड़ से भरी हुई परिस्थितियों का सामना करेंगे और अपने पापों के ‘धुल जाने के लिए’ गंगा नदी में जाकर स्नान करेंगे । इससे पहले कि हम यह देखें कि यह श्रद्धालु क्या कर रहे हैं, आइए हम उस समस्या पर ध्यान दें जो कि उन्होंने स्वयं ही अपने जीवन में पहचान की है जो कि – पाप है।

श्री सत्य साईं बाबा और सही और गलत

आइए इसका अध्ययन हिन्दी गुरू श्री सत्य साईं बाबा के उपदेशों को देखते हुए, जिसकी सोच मैं सोचता हूँ कि सराहनीय हैं। मैं इन्हें नीचे लिख देता हूँ। जब आप इन्हें पढ़ते हैं तो स्वयं से पूछें, “कि क्या ऐसे नैतिक उपदेश हैं जिनके सहारे जीवन यापन किया जा सकता है? क्या मुझे इनके अनुसार जीवन यापन करना चाहिए?”

“और धर्म क्या है (हमारा नैतिक कर्तव्य)? जो कुछ आप उपदेश देते हैं उसे अभ्यास में लाना, जो कुछ आप कहते हैं उसे वैसे ही करना जैसे कहा जा रहा है, उपदेश को मानते हुए और इसे अभ्यास में लाते हुए । भले कर्मों को कमाना, धर्म की लालसा करना; परमेश्वर के भय में जीवन यापन करना, परमेश्वर तक पहुँचने के लिए जीवन यापन करना: यही धर्म है”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 339.

“वास्तव में आपका कर्तव्य क्या है?….

  • सबसे पहले अपने माता पिता की प्रेम और आदर और कृतज्ञता के साथ सेवा करनी ।
  • दूसरा, सत्य बोलना और भले कर्मों में व्यवहार करना ।
  • तीसरा, जब कभी आपके पास कुछ समय बचे, तब प्रभु के न को वह जिस भी रूप में आपके मन में है, दुहराते रहना ।
  • चौथा, दूसरे के बारे में बुरा बोलने में लिप्त न होना या दूसरों की कमजोरियों की खोज करने का प्रयास नहीं करना।
  • और अन्त में, किसी भी रूप में अन्यों को दु:ख नहीं पहुँचाना”सत्य साईं बाबा बोलते हैं 4, पृ. 348-349.

“जो कोई अपने अंहकार को अपने अधीन कर लेता है, अपनी स्वार्थी इच्छाओं पर जय प्राप्त कर लेता है, अपनी वहशी भावनाओं और आवेगों को नष्ट कर देता है, और अपने शरीर को प्रेम करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति का दमन करता है, वह निश्चित ही धर्म के पथ पर अग्रसर है” धर्म वाहिनी, पृ. 4

जब मैंने इसे पढ़ा तो पाया कि ये वे उपदेश हैं जिनके अनुसार मुझे जीवन यापन – केवल एक साधारण नैतिक कर्तव्य के रूप में करना चाहिए । परन्तु क्या आप वास्तव में इनके ऊपर जीवन यापन कर रहे हैं? क्या आपने (और मैंने) कभी इनके प्रति सोचा है? उस समय क्या होगा यदि इन उपदेशों को पालन करने में चूक जाएँ और इनके अनुसार जीवन यापन न कर पाएँ । सत्य साईं बाबा इस प्रश्न का उत्तर निम्न तरीके से उपदेश देते हुए जारी रखते हैं कि

“सामान्य रूप में, मैं मीठा बोलता हूँ, परन्तु अनुशासन के विषय में, मैं किसी भी तरह की कोई रियायत देना स्वीकार नहीं करूँगा…मैं कठोर अनुशासन के ऊपर जोर दूँगा। मैं किसी भी तरह से आपके स्तर के अनुरूप कठोरता को कम नहीं करूँगा,” सत्य साईं बोलते हैं 2, पृ. 186.

कठोरता का स्तर ठीक है – यदि आप सदैव शर्तों को पूरा करते हैं । परन्तु यदि आप इसे पूरी नहीं करते हैं? तब यही वह स्थान है जहाँ पर तब “पाप” की अवधारणा आ जाती है। जब मैं नैतिक लक्ष्य को पूरा करने से चूक जाता हूँ, या जिसे मैं जानता हूँ कि इसे पूरा करना चाहिए, को पूरा करने में असफल हो जाता हूँ तब मैं पाप करता हूँ और मैं एक पापी हूँ । कभी भी यह सुनना पसन्द नहीं करेगा कि वह एक ‘पापी’ है – यह कुछ ऐसी बात है जो आपको असहज और दोषी ठहराती है, और सच्चाई तो यह है कि हम बहुत अधिक मानसिक और भावनात्मक उर्जा को इन विचारों को युक्तिसंगत तरीके से हटा देने के प्रयास में खर्च कर देते हैं। कदाचित् हम सत्य साईं बाबा के अलावा किसी अन्य शिक्षक की ओर देखने लगते हैं, परन्तु यदि वह एक ‘अच्छा’ शिक्षक है, तो उसके नैतिक उपदेश बहुत अधिक वैसे ही – पालन करने के लिए कठोरता से भरे हुए होंगे।

बाइबल (वेद पुस्तक) कहती है कि हम सभी पाप के इस भाव को महसूस करते हैं, चाहे हम किसी भी धर्म के क्यों न हो या हमारी शिक्षा का स्तर कैसे भी क्यों न हो क्योंकि पाप का यह भाव हमारे विवेक से आता है। वेद पुस्तक इसे इस तरह से व्यक्त करती है

फिर, जब अन्यजाति लोग (अर्थात् गैर-यहूदी), जिनके पास व्यवस्था नहीं (बाइबल में दी हुई दस आज्ञाएँ), स्वभाव से ही व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उनके पास न होने पर भी वे अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं । वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखाते हैं और उनके विवेक भी गवाही देते हैं, और उनके विचार परस्पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं (रोमियों 2:14-15)।

इस प्रकार लाखों की सँख्या में तीर्थ यात्री उनके अपने पाप को महसूस करते हैं । ठीक उसी प्रकार से जैसे कि वेद पुस्तक (बाइबल) कहती है

सब ने पाप किया है और परमेश्वर की महिमा से रहित हैं (रोमियों 3:23)

पाप प्रतासना मंत्र में व्यक्त किया गया है

इसकी धारणा प्रसिद्ध .प्ररथा स्नाना (या प्रतासना) मंत्र में व्यक्त की गई है जिसे मैंने नीचे लिखा है

मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ । मैं पाप में उत्पन्न हुआ । मेरा प्राण पाप के अधीन है । मैं सबसे बड़ा पापी हूँ । हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।

सुसमाचार हमारे पापों को धो डालता है

सुसमाचार ठीक उसी विषय को सम्बोधित करता है जिसका समाधान यह समर्पित तीर्थयात्री खोज रहे हैं – कि ‘उनके पाप धो दिए जाए।’ यह उन लोगों को एक ऐसी प्रतिज्ञा देता है जो अपने ‘वस्त्रों’ (अर्थात् उनके अपने नैतिक कार्यों) को धो लेते हैं । इसकी आशीष स्वर्ग (‘उस शहर’) की एक अमरता (जीवन का वृक्ष) से है।

“धन्य हैं वे, जो अपने वस्त्र धो लेते हैं, क्योंकि उन्हें जीवन के वृक्ष के पास आने का अधिकार मिलेगा, और वे फाटकों से होकर नगर में प्रवेश करेंगे।” (प्रकाशितवाक्य 22:14)।

कुम्भ के मेले का त्योहार हमें हमारे पाप की वास्तविकता के ‘बुरे समाचार’ को दिखाता है, और यह इस प्रकार हमें हमारी शुद्धता को पाने के लिए जागरूक करना चाहिए। भले ही इसमें केवल एक सदूर संभावना ही दिखाई देती हो कि सुसमाचार की यह प्रतिज्ञा एक सत्य है, क्योंकि यह बहुत ही महत्वपूर्ण है, यह निश्चित ही अधिक गहन रूप में जाँच किए जाने के लिए लाभप्रद है।

यदि आप अनन्त जीवन को पाने के लिए रूचि रखते हैं, यदि आप पाप से स्वतन्त्रता पाने की इच्छा रखते हैं तब इन बातों का अध्ययन करके देखना अधिक बुद्धिमानी होगा कि प्रजापति (या यहोवा) के बारे में क्या प्रगट किया गया है और कैसे और क्यों उसने हमारे लिए स्वयं के बलिदान को दे दिया ताकि हम स्वर्ग को प्राप्त करें। और वेद हमें असमंजस में ही छोड़ नहीं देते हैं। ऋग्वेद पुरूषासूक्ता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान दिए जाने का वर्णन करता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को जानने के लिए क्लिक (करें) जो जिस तरह से बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) और आपके लिए मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेने के लिए बलिदान का वर्णन करती है वैसे ही पुरूष का विवरण देता है।