‘सात’ के चक्र में ∶ मसीह का आना

पवित्र शब्द सात

सात एक मंगलकारी सँख्या है, जो नियमित रूप से पवित्र के साथ जुड़ी हुई है। ध्यान दीजिए कि गोदावरी, यमुना, सिन्धु, सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और गंगा: सात पवित्र नदियाँ हैं

सात पवित्र स्थानों से संबंधित सात पवित्र नगर (सप्त पुरी) हैं। सात तीर्थ स्थल निम्न हैं:

1. अयोध्या (अयोध्या पुरी),

2. मथुरा (मधुरा पुरी),

3. हरिद्वार (माया पुरी),

4. वाराणसी (काशी पुरी),

5. कांचीपुरम (कांची पुरी),

6. उज्जैन (अवंतिका पुरी),

7. द्वारका (द्वारका पुरी)

ब्रह्माण्ड विज्ञान में ब्रह्मांड में सात ऊपरी और सात निचले लोक शामिल हैं। विकिपीडिया के अनुसार

14 तरह के लोक हैं, सात ऊपर हैं (व्याहृतियाँ) अर्थात् भूः, भुवः, स्वः, महः जनः, तपः एवं सत्यम् और सात नीचे हैं (पाताल) अर्थात् अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल…

चक्र के विद्यार्थी नियमित रूप से हमारे शरीर में सात चक्र क्षेत्रों का हवाला देते हैं

  1. मूलाधार चक्र, 2. स्वाधिष्ठान चक्र 3. मणिपुर  चक्र 4. अनाहत चक्र 5. विशुद्धि चक्र 6. आज्ञा चक्र 6. सहस्रार चक्र

इब्रानी वेदों में पवित्र ‘सात’

चूँकि नदियों, तीर्थों, व्याहृतियों, पाताल और चक्रों को ‘सात’ के द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सात  का उपयोग इब्रानी वेदों में मसीह के आगमन की भविष्यद्वाणी करने के लिए भी किया गया था। सच्चाई तो यह है कि, प्राचीन ऋषियों ने उसके आने को इंगित करने के लिए सात  सप्ताहों के सात चक्रों का उपयोग किया है। हम ‘सात सप्ताहों’ के चक्र को खोलेंगे, परन्तु इससे पहले आइए हम प्राचीन इब्रानी भविष्यद्वक्ताओं की थोड़ी सी समीक्षा करते हैं।

यद्यपि सैकड़ों वर्षों में एक दूसरे से भिन्न, मानव समन्वय को लगभग असंभव बनाते हुए, उनकी भविष्यद्वाणियाँ आने वाले मसीह पर केन्द्रित थीं। यशायाह ने इस विषय को आरम्भ करने के लिए डाली के चिन्ह का उपयोग किया। जकर्याह ने भविष्यद्वाणी की कि इस डाली का नाम यहोशुआ, (हिन्दी में यीशु) होगा। जी हाँ, मसीह के इस पृथ्वी पर रहने से 500 वर्षों पहले मसीह के नाम की भविष्यद्वाणी की गई थी।

अंक सात में – भविष्द्वक्ता दानिय्येल

अब दानिय्येल के विषय में। वह बेबीलोन की बन्धुवाई में रहता था, बेबीलोन और फारसी सरकारों में एक शक्तिशाली अधिकारी था – और एक इब्रानी भविष्द्वक्ता था।

दानिय्येल को इब्रानी वेदों में अन्य भविष्द्वक्ताओं के साथ ऐतिहासिक समयरेखा में दिखाया गया है

अपनी पुस्तक में, दानिय्येल ने निम्नलिखित संदेश प्राप्त किया:

21 तब वह पुरुष जिब्राएल जिसे मैं ने उस समय देखा जब मुझे पहले दर्शन हुआ था, उस ने वेग से उड़ने की आज्ञा पाकर, साँझ के अन्नबलि के समय मुझ को छू लिया; और मुझे समझाकर मेरे साथ बातें करने लगा।

22 उसने मुझ से कहा, “हे दानिय्येल, मैं तुझे बुद्धि और प्रवीणता देने को अभी निकल आया हूँ।

23 जब तू गिड़गिड़ाकर विनती करने लगा, तब ही इसकी आज्ञा निकली, इसलिये मैं तुझे बताने आया हूँ, क्योंकि तू अति प्रिय ठहरा है; इसलिये उस विषय को समझ ले और दर्शन की बात का अर्थ जान ले।

24 “तेरे लोगों और तेरे पवित्र नगर के लिये सत्तर सप्‍ताह ठहराए गए हैं कि उनके अन्त तक अपराध का होना बन्द हो, और पापों का अन्त और अधर्म का प्रायश्‍चित किया जाए, और युगयुग की धार्मिकता प्रगट हो; और दर्शन की बात पर और भविष्यद्वाणी पर छाप दी जाए, और परमपवित्र का अभिषेक किया जाए।

25 इसलिये यह जान और समझ ले, कि ‘यरूशलेम को फिर बसाने’ की आज्ञा के निकलने से लेकर अभिषिक्‍त प्रधान के समय तक ‘सात सप्‍ताह’ बीतेंगे। फिर बासठ ‘सप्‍ताहों’ के बीतने पर चौक और खाई समेत वह नगर कष्‍ट के समय में फिर बसाया जाएगा।

26 उन बासठ सप्‍ताहों के बीतने पर ‘अभिषिक्‍त पुरुष काटा जाएगा : और उसके हाथ कुछ न लगेगा।

दानिय्येल 9: 21-26अ

जब मसीह आएगा तो यह ‘अभिषिक्‍त पुरुष’ (= मसीह = मसीहा) की भविष्यद्वाणी है। यह यरूशलेम को ‘पुनर्स्थापित और पुनर्निर्माण करने’ के लिए दी गई आज्ञा के साथ आरम्भ होती है। यद्यपि दानिय्येल को यह संदेश दिया गया था (ईसा पूर्व 537 सन् में) तथापि वह इसकी उलटी गिनती को देखने के लिए जीवित नहीं रहा।

यरूशलेम को पुनर्स्थापित करने की आज्ञा

परन्तु नहेम्याह, जो दानिय्येल के लगभग सौ वर्षों बाद आया था, ने इसकी उलटी गिनती को आरम्भ होते हुए देखा। वह अपनी पुस्तक में लिखता है कि

1अर्तक्षत्र राजा के बीसवें वर्ष के नीसान नामक महीने में, जब उसके सामने दाखमधु था, तब मैं ने दाखमधु उठाकर राजा को दिया। इस से पहले मैं उसके सामने कभी उदास न हुआ था।

2तब राजा ने मुझ से पूछा, “तू तो रोगी नहीं है, फिर तेरा मुँह क्यों उतरा है? यह तो मन ही की उदासी होगी।” तब मैं अत्यन्त डर गया।

3मैं ने राजा से कहा, “राजा सदा जीवित रहे! जब वह नगर जिसमें मेरे पुरखाओं की कबरें हैं, उजाड़ पड़ा है और उसके फाटक जले हुए हैं, तो मेरा मुँह क्यों न उतरे?”

4राजा ने मुझ से पूछा, “फिर तू क्या माँगता है?” तब मैं ने स्वर्ग के परमेश्‍वर से प्रार्थना करके राजा से कहा,

5“यदि राजा को भाए, और तू अपने दास से प्रसन्न हो, तो मुझे यहूदा और मेरे पुरखाओं की कबरों के नगर को भेज, ताकि मैं उसे बनाऊँ।”

6तब राजा ने जिसके पास रानी भी बैठी थी, मुझ से पूछा, “तू कितने दिन तक यात्रा में रहेगा? और कब लौटेगा?” अत: राजा मुझे भेजने को प्रसन्न हुआ; और मैं ने उसके लिये एक समय नियुक्‍त किया।

नहेम्याह 2:1-6

जब मैं यरूशलेम पहुँच गया, तब वहाँ तीन दिन रहा।

नहेम्याह 2:11

“यरूशलेम को पुनर्स्थापित और पुनर्निर्माण करने के लिए” का यह आदेश लिपिबद्ध करता है कि दानिय्येल ने भविष्यद्वाणी की थी कि उलटी गिनती आरम्भ हो जाएगी। यह इतिहास में फ़ारसी सम्राट अर्तक्षत्र के 20 वें वर्ष में आरम्भ हुई, जो कि ईसा पूर्व 465 सन् में अपने शासन के लिए प्रसिद्ध था। इस प्रकार उसका 20वाँ वर्ष इस आज्ञा को ईसा पूर्व 444 सन् में दिए जाना बताएगा। दानिय्येल के लगभग सौ वर्षों बाद, फ़ारसी सम्राट ने अपना आदेश देते हुए, इस उलटी गिनती को आरम्भ किया जिसे मसीह लाएगा।

रहस्यपूर्ण अंक सात

दानिय्येल की भविष्यद्वाणी ने संकेत दिया कि “सात ‘सप्ताहों’ और बासठ ‘सप्ताहों’” के बाद मसीह को प्रकाशित किया जाएगा।

अंक ‘सात’ क्या है?

मूसा की व्यवस्था में सात वर्षों-का-एक चक्र पाया जाता है। प्रत्येक 7 वें वर्ष में भूमि को कृषि न करने के द्वारा विश्राम दिया जाना चाहिए था ताकि मिट्टी फिर से भरपूरी प्राप्त कर सके। इस तरह ‘सात’ एक 7-वर्षों का चक्र है। इसे ध्यान में रखते हुए, हम देखते हैं कि उलटी गिनती दो भागों में पाई जाती है। पहला भाग ‘सात सप्ताहों’ या सात 7-वर्षों की अवधि वाला था। इस 7*7=49 वर्षों वाली अवधि में यरुशलेम का पुनर्निर्माण हुआ। इसके बाद बासठ वर्ष आते हैं, इसलिए कुल उलटी गिनती 7*7+62*7 = 483 वर्षों की थी। आज्ञा दिए जाने के समय से मसीह के प्रकट होने तक 483 वर्ष बनेंगे।

360-दिन का वर्ष

हमें पंचांग अर्थात् कैलेंडर में एक छोटा सा समायोजन करना होगा। जैसा कि कई पूर्वज किया करते थे, भविष्यद्वक्ताओं ने 360 दिनों के लंबे वर्षों का उपयोग किया। कैलेंडर में एक ‘वर्ष’ की लंबाई को निर्दिष्ट करने के विभिन्न तरीके पाए जाते हैं। पश्चिमी कैलेंडर (सौर क्रांति पर आधारित) में एक दिन की लम्बाई 365.24 दिनों की है, मुस्लिम कैलेंडर में एक दिन लम्बाई 354 दिनों (चंद्रमा के चक्र पर आधारित) की है। दानिय्येल ने जिस कैलेंडर को प्रयोग किया है, वह 360 दिनों से आधा था। इस तरह ‘360-दिन’ वाले वर्ष के अनुसार 483 सौर वर्ष वास्तव में  483*360/365.24 = 476 सौर वर्ष हैं।

निश्चित वर्ष में मसीह के आगमन का पूर्वकथन  

अब हम गणना कर सकते हैं कि मसीह के आने की भविष्यद्वाणी कब की गई थी। हम ‘ईसा पूर्व’ से ‘ईस्वी सन्’ के युग में 1 ईसा पूर्व  – से 1 ईस्वी सन् में (यहाँ ‘शून्य’ जैसा कोई वर्ष नहीं है) सीधे जाते हुए 1ले वर्ष पर पहुँचते हैं। यहाँ गणना दी गई है।

आरम्भ वर्ष444 ईसा पूर्व (अर्तक्षत्र का 20वां वर्ष)
समय की लंबाई476 सौर वर्ष
आधुनिक कैलेंडर में अपेक्षित आगमन(-444 + 476 + 1) (‘+1’ क्योंकि 0 ईस्वी सन् नहीं है) = 33
अपेक्षित वर्ष33 ईस्वी सन्

मसीह के आने के लिए आधुनिक कैलेंडर गणना

खजूरी ईतवार  के प्रसिद्ध त्योहार के दिन नासरत का यीशु गधे पर सवार होकर यरूशलेम आया था। यही वह दिन था, जिसमें उसने स्वयं के लिए घोषणा की और यरूशलेम में उनके मसीह के रूप में सवार हुआ था। यह वर्ष 33 ईस्वी सन् था – जैसा कि भविष्यद्वाणी की गई थी।

भविष्यद्वक्ता दानिय्येल और नहेम्याह, एक-दूसरे को जानने में असमर्थ थे क्योंकि वे एक-दूसरे से 100 वर्षों की दूरी में रहे थे, परन्तु उन्हें परमेश्वर के द्वारा समन्वित किया गया था ताकि भविष्यद्वाणियाँ की उलटी गिनती को आरम्भ कर सकें, जिन्होंने मसीह को प्रगट किया। दानिय्येल द्वारा ‘सत्तर’ सप्ताहों के अपने दर्शन की प्राप्ति के 537 वर्षों बाद, यीशु ने मसीह के रूप में यरूशलेम में प्रवेश किया। जकर्याह द्वारा मसीह के नाम की भविष्यद्वाणी के साथ ही, इन भविष्यद्वक्ताओं ने अद्भुत भविष्यद्वाणियाँ लिखीं, ताकि सभी परमेश्वर की योजना को खुलते हुए देख सकें।

 इस ‘दिन’ का आगमन पूर्वकथित था

यरूशलेम में प्रवेश के वर्ष की भविष्यद्वाणी ऐसे की गई है कि, मानो यह सैकड़ों वर्षों पहले घटित हो चुका है, जो कि आश्चर्यजनक है। परन्तु उन्होंने इस दिन में घटित होने के लिए भी भविष्यद्वाणी की थी।

दानिय्येल ने यीशु मसीह के प्रकट होने के लिए 360-दिन के एक पचांग का उपयोग करते हुए 483 वर्षों की भविष्यद्वाणी की थी। तदनुसार, दिनों की सँख्या ऐसे मिलती है:

483 वर्ष * 360 दिन/वर्ष = 173880 दिन

365.2422 दिनों/वर्ष के साथ आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर के संदर्भ में यह 25 अतिरिक्त दिनों के साथ 476 वर्षों का समय है। (173880/365.24219879 = 476 शेष 25)

यरुशलेम की पुर्नस्थापना के बारे में राजा अर्तक्षत्र ने आज्ञा दी थी:

बीसवें वर्ष में नीसान नामक महीने में…

नहेम्याह 2:1

नीसान 1 का आश्वासन दिया गया है, क्योंकि इससे यहूदियों और फारसियों का नया वर्ष आरम्भ होता है, जो नहेम्याह से उत्सव के लिए बात करने के विषय में राजा का कारण बनता है। नीसान 1 भी एक नए चंद्रमा को चिह्नित करेगा क्योंकि वे चंद्रमा आधारित महीनों का उपयोग किया करते था। आधुनिक खगोल विज्ञान के कारण हम जानते हैं कि जब अमावस्या का चंद्रमा नीसान 1, ईसा पूर्व 444 को चिन्हित करते हुए प्रगट हुआ था। खगोलीय गणना आधुनिक कैलेंडर में फारसी सम्राट अर्तक्षत्र के 20वें वर्ष के नीसान 1 के अर्द्ध चन्द्रमा को 4 मार्च, 444 ईसा पूर्व की रात 10 बजे रखती है।[1]

खजूरी इतवार के दिन की ओर

इस तिथि के साथ दानिय्येल द्वारा भविष्यद्वाणी किए हुए 476 वर्षों को जोड़ने से हम 4 मार्च, 33 ईस्वी सन् तक पहुँच जाते हैं, जैसा कि ऊपर व्याख्या किया गया है। दानिय्येल की भविष्यद्वाणी के शेष बचे 25 दिनों को 4 मार्च, 33 ईस्वी सन् के साथ जोड़कर हमें 29 मार्च, 33 ईस्वी सन् को पाते हैं। 29 मार्च, 33 ईस्वी सन्, रविवार था – अर्थात् खूजरी ईतवार – वही दिन, जिस दिन यीशु ने गधे पर सवार होकर यरुशलेम में यह दावा करते हुए प्रवेश किया था कि वह मसीह है।[2]

आरम्भ – आज्ञा निकाली गईमार्च 4, 444 ईसा पूर्व
सौर वर्षों को जोड़ें (-444+ 476 +1)मार्च 4, 33 ईस्वी सन्
शेष सात सप्ताहों के 25 दिनों को जोड़ेंमार्च 4 + 25 = मार्च 29, 33 ईस्वी सन्
मार्च 29, 33 ईस्वी सन्यरूशलेम में खजूरी ईतवार के दिन यीशु का प्रवेश

29 मार्च 33 को यरूशलेम में एक गधे पर सवार होकर प्रवेश करके यीशु ने – इस दिन के लिए जकर्याह और दानिय्येल दोनों की भविष्यद्वाणी को पूरा किया।

खजूरी ईतवार के दिन के साथ ही दानिय्येल के ‘सात’ सप्ताहों का चक्र पूरा हुआ

मसीह के प्रकट होने से 173880 दिन पहले दानिय्येल ने भविष्यद्वाणी की थी; नहेम्याह ने इस समय को आरम्भ किया था। यह मार्च 29, 33 ईस्वी सन् के आने से समाप्त हुआ जब यीशु ने खजूरी ईतवार के दिन यरुशलेम में प्रवेश किया, इस तरह सारे ‘सात’ सप्ताह पूरे हो गए।

बाद में उसी दिन यीशु ने एक अन्य  सात, सृष्टि के सप्ताह, के नमूने पर अपनी गतिविधियों को आरम्भ किया। इस तरह उसने उसके शत्रु मृत्यु  के साथ अपनी लड़ाई की ओर ले जाने वाली घटनाओं को गति प्रदान की।

……………….

[1] डॉ. हेरोल्ड डब्ल्यू. हॉर्नर, मसीह के जीवन के ऐतिहासिक पहलू. 1977. पृ. 176.

2 आने वाला शुक्रवार फसह का था, और फसह सदैव नीसान 14 के दिन आता था। 33 ईस्वी सन् में नीसान 14 का दिन अप्रैल 3 था। 3 अप्रैल से 5 दिन पहले होने के कारण, खजूरी ईतवार 29 मार्च के दिन था।

यीशु कार सेवक के रूप में कार्य करता है – अयोध्या की तुलना में अधिक समय

अयोध्या में लम्बे समय तक चलने वाला और कड़वा झगड़ा एक नए मील के पत्थर तक पहुँच गया है, जब इसने न्यूयॉर्क शहर में दूर तक AsAmNews की रिपोर्ट के द्वारा कोलाहल को उत्पन्न किया। अयोध्या विवाद एक सैकड़ों वर्ष पुराना राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक झगड़ा है, जो एक स्थान के नियन्त्रण पर केन्द्रित है, जिसे पारंपरिक रूप से राम (राम जन्मभूमि) के जन्मस्थान के रूप में माना जाता है, जहाँ पर पहले से ही बाबरी मस्जिद बनी हुई है।

बाबरी मस्जिद के शिलालेखों के अनुसार, प्रथम मुगल सम्राट, बाबर ने इसे 1528–29 में बनवाया था। परन्तु बाबरी मस्जिद सदियों से विवादों के घेरे में रही है क्योंकि कई लोगों का मानना ​​था कि बाबर ने इसे राम के जन्म स्थान पर बने हुए मन्दिर के खंडहर पर बनाया था। सदियों से चला आ रहा झगड़ा, अक्सर हिंसक दंगों और गोलीबारी में परिवर्तित हो जाता था।

अयोध्या में कार सेवक

विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और भारतीय जनता पार्टी (बी जे पी) द्वारा आयोजित 1992 रैली में 150 000 कार सेवक, या धार्मिक स्वयंसेवक एकत्र हुए। इन कारसेवकों ने प्रदर्शन के दौरान बाबरी मस्जिद को नष्ट कर दिया। मस्जिद के नाश के साथ ही पूरे भारत में दंगे भड़के। बंबई में अनुमानित 2000 लोग मारे गए थे।

तब से 2019 तक संबंधित झगड़ा अदालतों के माध्यम से देश की राजनीति को अपने भँवर में लपेटे हुए, और सड़कों पर दंगे के द्वारा आगे बढ़ता रहा। राम मंदिर का निर्माण आरम्भ करने के लिए कार सेवकों की मौजूदगी ने विहिप को गति प्रदान की।

अंत में 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम अपील के मामले में अपना निर्णय को सुनाया। इसने फैसला सुनाया कि भूमि टैक्स रिकॉर्ड के आधार पर सरकार की है। इसने आगे आदेश दिया कि एक ट्रस्ट को हिंदू मंदिर बनाने के लिए भूमि प्राप्त होगी। सरकार को मस्जिद के लिए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड को भूमि का एक और स्थान आवंटित करना होगा।

5 फरवरी 2020 को, भारत सरकार ने घोषणा की कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करेगा। 5 अगस्त, 2020 के भूमि-पूजन समारोह का उद्घाटन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था। मंदिर निर्माण के आरम्भ के तनाव को न्यूयॉर्क शहर में महसूस किया गया था।

कार सेवक  मूल रूप से एक ऐसे व्यक्ति के लिए सिख धर्म का शब्द है जो धार्मिक कारणों के लिए अपनी सेवाओं को स्वतंत्र रूप से प्रदान करे। यह शब्द संस्कृत के कार (हाथ) और सेवक (नौकर) शब्दों से लिया गया है। अयोध्या झगड़े में, विहिप द्वारा कार सेवकों को संगठित किया गया था, जिन्होंने इस धारणा को सिख परंपरा से पाया था।

एक (भिन्न) कार सेवक के रूप में यीशु

परन्तु अयोध्या के इस झगड़े से बहुत पहले, यीशु ने कार सेवक की भूमिका, एक विरोधी के साथ एक झगड़े की घोषणा करते हुए भी निभाई थी, जिसने मानव जीवन के कई क्षेत्रों में फिर से प्रवेश करते हुए, लोगों के बीच दरार को उत्पन्न किया था जो आज भी बनी हुई है। यह झगड़ा भी एक मंगलकारी मंदिर पर केन्द्रित था। परन्तु यह पास के एक गाँव में आरम्भ हुआ जब यीशु, एक कार सेवक बनकर, स्वेच्छा से मित्रों की सहायता करने के लिए तैयार हो गया था। इस तरह के कार्य ने कई घटनाओं को जन्म दिया, इतिहास को बदल दिया और अयोध्या के झगड़े की तुलना में हमारे जीवन को अधिक प्रभावित किया। यीशु की कार सेवक संबंधी गतिविधियों से उसके केन्द्रीय मिशन का पता चलता है।

यीशु का मिशन क्या था?

यीशु ने कई आश्चर्यकर्मों को प्रगट किया, चंगाई के कामों को किया और शिक्षा दी। परन्तु यह प्रश्न अभी भी उसके शिष्यों, अनुयायियों और यहाँ तक ​​कि उसके शत्रुओं के मन में बना हुआ था: कि वह क्यों आया था? पिछले कई ऋषियों, जिनमें मूसा ने भी शक्तिशाली आश्चर्यकर्मों को किया था। चूँकि मूसा ने पहले से ही धर्म संबंधी व्यवस्था को दिया था, और यीशु “व्यवस्था को खत्म करने नहीं आया था”, इसलिए उसका मिशन क्या था?

यीशु का एक मित्र बहुत अधिक बीमार हो गया। उनके शिष्यों को अपेक्षा थी कि यीशु अपने मित्र को चँगा करेगा, क्योंकि उसने कई अन्य लोगों को चँगा किया था। सुसमाचार लिपिबद्ध करता है कि कैसे उसने अपने मित्र की सहायता मात्र उसे चँगा करने के स्थान पर स्वेच्छा से अधिक गहरे तरीके से की। यह प्रकाशित करता है कि कार सेवक के रूप में स्वेच्छा से उसका मिशन क्या करने के लिए था। यहाँ विवरण दिया गया है।

यीशु ने मृत्यु का सामना किया

रियम और उस की बहिन मारथा के गांव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।
2 यह वही मरियम थी जिस ने प्रभु पर इत्र डालकर उसके पांवों को अपने बालों से पोंछा था, इसी का भाई लाजर बीमार था।
3 सो उस की बहिनों ने उसे कहला भेजा, कि हे प्रभु, देख, जिस से तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।
4 यह सुनकर यीशु ने कहा, यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।
5 और यीशु मारथा और उस की बहन और लाजर से प्रेम रखता था।
6 सो जब उस ने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहां दो दिन और ठहर गया।
7 फिर इस के बाद उस ने चेलों से कहा, कि आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।
8 चेलों ने उस से कहा, हे रब्बी, अभी तो यहूदी तुझे पत्थरवाह करना चाहते थे, और क्या तू फिर भी वहीं जाता है?
9 यीशु ने उत्तर दिया, क्या दिन के बारह घंटे नहीं होते यदि कोई दिन को चले, तो ठोकर नहीं खाता है, क्योंकि इस जगत का उजाला देखता है।
10 परन्तु यदि कोई रात को चले, तो ठोकर खाता है, क्योंकि उस में प्रकाश नहीं।
11 उस ने ये बातें कहीं, और इस के बाद उन से कहने लगा, कि हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूं।
12 तब चेलों ने उस से कहा, हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।
13 यीशु ने तो उस की मृत्यु के विषय में कहा था: परन्तु वे समझे कि उस ने नींद से सो जाने के विषय में कहा।
14 तब यीशु ने उन से साफ कह दिया, कि लाजर मर गया है।
15 और मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूं कि मैं वहां न था जिस से तुम विश्वास करो, परन्तु अब आओ, हम उसके पास चलें।
16 तब थोमा ने जो दिदुमुस कहलाता है, अपने साथ के चेलों से कहा, आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।
17 सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।
18 बैतनिय्याह यरूशलेम के समीप कोई दो मील की दूरी पर था।
19 और बहुत से यहूदी मारथा और मरियम के पास उन के भाई के विषय में शान्ति देने के लिये आए थे।
20 सो मारथा यीशु के आने का समचार सुनकर उस से भेंट करने को गई, परन्तु मरियम घर में बैठी रही।
21 मारथा ने यीशु से कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।
22 और अब भी मैं जानती हूं, कि जो कुछ तू परमेश्वर से मांगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।
23 यीशु ने उस से कहा, तेरा भाई जी उठेगा।
24 मारथा ने उस से कहा, मैं जानती हूं, कि अन्तिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह जी उठेगा।
25 यीशु ने उस से कहा, पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूं, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।
26 और जो कोई जीवता है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा, क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?
27 उस ने उस से कहा, हां हे प्रभु, मैं विश्वास कर चुकी हूं, कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है।
28 यह कहकर वह चली गई, और अपनी बहिन मरियम को चुपके से बुलाकर कहा, गुरू यहीं है, और तुझे बुलाता है।
29 वह सुनते ही तुरन्त उठकर उसके पास आई।
30 (यीशु अभी गांव में नहीं पहुंचा था, परन्तु उसी स्थान में था जहां मारथा ने उस से भेंट की थी।)
31 तब जो यहूदी उसके साथ घर में थे, और उसे शान्ति दे रहे थे, यह देखकर कि मरियम तुरन्त उठके बाहर गई है और यह समझकर कि वह कब्र पर रोने को जाती है, उसके पीछे हो लिये।
32 जब मरियम वहां पहुंची जहां यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पांवों पर गिर के कहा, हे प्रभु, यदि तू यहां होता तो मेरा भाई न मरता।
33 जब यीशु न उस को और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास हुआ, और घबरा कर कहा, तुम ने उसे कहां रखा है?
34 उन्होंने उस से कहा, हे प्रभु, चलकर देख ले।
35 यीशु के आंसू बहने लगे।
36 तब यहूदी कहने लगे, देखो, वह उस से कैसी प्रीति रखता था।
37 परन्तु उन में से कितनों ने कहा, क्या यह जिस ने अन्धे की आंखें खोली, यह भी न कर सका कि यह मनुष्य न मरता
38 यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।
39 यीशु ने कहा; पत्थर को उठाओ: उस मरे हुए की बहिन मारथा उस से कहने लगी, हे प्रभु, उस में से अब तो र्दुगंध आती है क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।
40 यीशु ने उस से कहा, क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।
41 तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आंखें उठाकर कहा, हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं कि तू ने मेरी सुन ली है।
42 और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उन के कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।
43 यह कहकर उस ने बड़े शब्द से पुकारा, कि हे लाजर, निकल आ।
44 जो मर गया था, वह कफन से हाथ पांव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुंह अंगोछे से लिपटा हुआ तें यीशु ने उन से कहा, उसे खोलकर जाने दो॥

यूहन्ना 11:1-44

यीशु ने सेवा करने के लिए स्वयं को दिया

बहनों को अपेक्षा थी कि यीशु उनके भाई को चँगा करने के लिए शीघ्र आएगा। यीशु ने जानबूझकर अपने आगमन में देरी की, जिससे लाजर को मरने में सहायता मिली और यह बात किसी को भी समझ नहीं आई कि उसने ऐसा क्यों किया। वृतान्त दो बार बताता है कि यीशु ‘बहुत अधिक व्याकुल’ हो गया था और यह कि वह रोया।

उसे किस बात ने व्याकुल किया?

यीशु स्वयं मृत्यु से क्रोधित था, विशेष रूप से जब उसने उसके मित्र को अपने बन्धन में रखा हुआ था।

उसने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आने में देरी की थी – ताकि वह स्वयं मृत्यु का सामना करे न कि केवल कुछ बीमारी का। यीशु ने चार दिन प्रतिक्षा की ताकि हर कोई – जिसमें हम भी शामिल हैं – यह निश्चित जान लें कि लाजर मर चुका था, न कि वह मात्र गंभीर रूप से बीमार था।

हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता

बीमार लोगों को चँगा करना, स्वयं में अच्छा है, परन्तु यह मात्र उनकी मृत्यु को कुछ समय के लिए स्थगित करता है। चँगा हुए या नहीं हुए, मृत्यु अंततः सभी लोगों को ले जाती है, चाहे वे अच्छे हों या बुरे हों, पुरूष या स्त्री, बूढ़े या जवान, धार्मिक या अधर्मी ही क्यों न हो। यह आदम के समय से ही सत्य है, जो अपनी अवज्ञा के कारण नश्वर हो गया था। उनके सारे वंशज में, आपको और मुझे भी शामिल किया गया, एक शत्रु द्वारा बंधक बनाकर रखा गया – जो कि मृत्यु है। हमें प्रतीत होता है कि मृत्यु के विरूद्ध हमारे पास कोई उत्तर नहीं है, कोई आशा नहीं है। जब केवल बीमारी होती है तो आशा बनी रहती है, यही कारण है कि लाजर की बहनों को चँगा होने की आशा थी। परन्तु मृत्यु के साथ ही उन्हें कोई आशा नहीं रही गई। यह सत्य हमारे साथ भी है। अस्पताल में कुछ आशा होती है परन्तु अंतिम संस्कार के समय कोई आशा नहीं होती है। मृत्यु हमारा अन्तिम शत्रु है। यही वह शत्रु है, जिसे पराजित करने के लिए यीशु ने स्वयं को हमारे लिए स्वेच्छा से दिया और इसी कारण उसने बहनों को घोषित किया कि:

“पुनरुत्थान और जीवन मैं हूँ।”

यूहन्ना 11:25

यीशु मृत्यु की सामर्थ्य को तोड़ने और उन सभी को जीवन देने के लिए आए थे जो इसे चाहते थे। उसने इस मिशन की प्राप्ति के लिए अपने अधिकार को सार्वजनिक रूप से मृत्यु के ऊपर लाजर को जीवित करके दिखाया। वह अन्य सभी के लिए वही कुछ करने की पेशकश करता है जो मृत्यु के बदले जीवन को चाहते हैं।

इसका प्रतिउत्तर एक झगड़े को आरम्भ करता है

यद्यपि मृत्यु सभी लोगों का अन्तिम शत्रु है, हम में से बहुत से लोग छोटे ‘शत्रुओं’ के साथ पकड़े जाते हैं, जो संघर्षों के (राजनीतिक, धार्मिक, जातीय आदि) परिणामस्वरूप होते हैं, जो हर समय हमारे चारों ओर बने रहते हैं। हम इसे अयोध्या के संघर्ष में देखते हैं। यद्यपि, इस और अन्य झगड़े में सभी लोग, चाहे उनका ‘पक्ष’ सही हो या न हो, मृत्यु के विरूद्ध शक्तिहीन हैं। इसे हमने सती और शिव के साथ देखा था।

यह यीशु के समय में भी सत्य था। इस आश्चर्यकर्म की प्रतिक्रियाओं से हम यह देख सकते हैं कि तब वहाँ रहने वाले विभिन्न लोगों की मुख्य चिन्ताएँ क्या थीं। सुसमाचार ने अलग-अलग प्रतिक्रियाओं को लिपिबद्ध किया है।

45 तब जो यहूदी मरियम के पास आए थे, और उसका यह काम देखा था, उन में से बहुतों ने उस पर विश्वास किया।
46 परन्तु उन में से कितनों ने फरीसियों के पास जाकर यीशु के कामों का समाचार दिया॥
47 इस पर महायाजकों और फरीसियों ने मुख्य सभा के लोगों को इकट्ठा करके कहा, हम करते क्या हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिन्ह दिखाता है।
48 यदि हम उसे यों ही छोड़ दे, तो सब उस पर विश्वास ले आएंगे और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे।
49 तब उन में से काइफा नाम एक व्यक्ति ने जो उस वर्ष का महायाजक था, उन से कहा, तुम कुछ नहीं जानते।
50 और न यह सोचते हो, कि तुम्हारे लिये यह भला है, कि हमारे लोगों के लिये एक मनुष्य मरे, और न यह, कि सारी जाति नाश हो।
51 यह बात उस ने अपनी ओर से न कही, परन्तु उस वर्ष का महायाजक होकर भविष्यद्वणी की, कि यीशु उस जाति के लिये मरेगा।
52 और न केवल उस जाति के लिये, वरन इसलिये भी, कि परमेश्वर की तित्तर बित्तर सन्तानों को एक कर दे।
53 सो उसी दिन से वे उसके मार डालने की सम्मति करने लगे॥
54 इसलिये यीशु उस समय से यहूदियों में प्रगट होकर न फिरा; परन्तु वहां से जंगल के निकट के देश में इफ्राईम नाम, एक नगर को चला गया; और अपने चेलों के साथ वहीं रहने लगा।
55 और यहूदियों का फसह निकट था, और बहुतेरे लोग फसह से पहिले देहात से यरूशलेम को गए कि अपने आप को शुद्ध करें।
56 सो वे यीशु को ढूंढ़ने और मन्दिर में खड़े होकर आपस में कहने लगे, तुम क्या समझते हो
57 क्या वह पर्व में नहीं आएगा? और महायाजकों और फरीसियों ने भी आज्ञा दे रखी थी, कि यदि कोई यह जाने कि यीशु कहां है तो बताए, कि उसे पकड़ लें॥

यूहन्ना 11: 45-57

यहूदी मन्दिर की स्थिति के बारे में अगुवे अधिक चिंतित थे। एक समृद्ध मंदिर ने समाज में अपनी प्रमुखता को सुनिश्चित किया था। वे इसके स्थान पर मृत्यु के दृष्टिकोण से अधिक चिन्तित थे।

इसलिए तनाव बढ़ गया। यीशु ने घोषणा की कि वह ‘जीवन’ और ‘पुनरुत्थान’ था और वह स्वयं मृत्यु को पराजित करेगा। उसकी मृत्यु की साजिश रचकर अगुवों ने प्रतिउत्तर दिया। बहुत से लोग उस पर विश्वास करते थे, परन्तु कई अन्य नहीं जानते थे कि क्या विश्वास करना है।

अपने आप से यह पूछें …

यदि आप लाजर के जी उठने के गवाह हैं तो आप क्या चुनेंगे? क्या आप फरीसियों की तरह चुनेंगे, क्या आप कुछ संघर्ष पर ध्यान केन्द्रित करेंगे जिन्हें इतिहास शीघ्र ही भूल जाएगा, और मृत्यु से जीवन की प्राप्ति के प्रस्ताव को खो देंगे? या क्या आप पुनरुत्थान के उसके प्रस्ताव के ऊपर भरोसा करते हुए, उस पर ‘विश्वास’ करेंगे, भले ही आप यह सब अभी न समझे? विभिन्न प्रतिक्रियाँ जिन्हें सुसमाचार लिपिबद्ध करता हैं, वे उसी तरह की प्रतिक्रियाएँ हैं, जिन्हें हम आज व्यक्त करते हैं। यह हमारे लिए वैसा ही मूल विवाद है जैसा यह तब था।

फसह – 1500 वर्षों पहले मृत्यु को दूर करने के लिए फसह के त्योहार के रूप में चिन्ह स्वरूप आरम्भ हुए त्योहार के निकट आने पर ऐसे विवाद बढ़ते चले जा रहे थे। सुसमाचार से पता चलता है कि कैसे यीशु ने कार सेवक के अपने मिशन को मृत्यु के विरूद्धमृतकों के पवित्र शहर वाराणसी में, एक दिन जिसे अब खजूरी इतवार के नाम से जाना जाता है, प्रवेश किया था।

दक्ष यज्ञ, यीशु और ‘खोए हुए’

विभिन्न लेख दक्ष यज्ञ की कहानी को स्मरण करते हैं परन्तु इसका सार यह है कि शिव ने शक्ति के भक्तों द्वारा शुद्ध प्राण ऊर्जा मानी जाने वाली आदि पराशक्ति के अवतार दाक्षायण/सती से विवाह किया था। (आदि पराशक्ति को परम शक्ति, आदि शक्ति, महाशक्ति, महादेवी, महागौरी, महाकाली या सत्यम शक्ति के रूप में भी जाना जाता है)।

शिव की अत्यधिक तपस्या के कारण, दाक्षायण के पिता, दक्ष ने शिव से उसके विवाह को अस्वीकार कर दिया था। इसलिए जब दक्ष ने यज्ञ का अनुष्ठान किया तो उसने अपनी पुत्री सती और शिव को छोड़कर पूरे परिवार को आमंत्रित किया। परन्तु यज्ञ समारोह की बात सुनकर सती इसमें बिना निमत्रंण के चली गई। जिससे उसके पिता क्रोधित हो गए कि उसने यज्ञ में क्यों भाग लिया था और वह उस पर वहाँ से चले जाने के लिए निरन्तर चिल्लाता रहे। इसके कारण सती को क्रोध आ गया और वह अपने आदि पराशक्ति रूप में वापसी लौट आई और उसने अपने सती स्वरूप नश्वर शरीर को यज्ञ की अग्नि में दाह कर दिया, जिससे वह आग की लपटों में झुलस गई।

दक्ष यज्ञनुकसानकी खोज करना

सती द्वारा स्वयं को अग्नि में दाह किए जाने से शिव दुःखी हुए। उसने अपनी प्यारी सती को खो दिया था। परिणामस्वरूप शिव ने एक भयानक “तांडव”, या विनाश के नृत्य को प्रस्तुत किया, और जितना अधिक शिव ने नृत्य किया, उतना ही अधिक विनाश हुआ। आने वाले दिनों में उनका तांडव व्यापक विनाश और मृत्यु का कारण बना। दुःख और क्रोध में, शिव ने सती के शरीर को अपने ऊपर उठा लिया और उसे लिए हुए पूरे ब्रह्मांड में घूमते रहे। विष्णु ने सती के शरीर को 51 अंगों में काट दिया था जो पृथ्वी पर गिर गए जिसके परिणामस्वरूप शक्ति पीठों के रूप में पवित्र स्थानों का उदय हुआ। ये 51 पवित्र स्थान आज हमें विभिन्न शक्ति मंदिरों के रूप में स्मरण कराते हैं, जिसे सती को खोने से हुए नुकसान में शिव ने अनुभव किया था।

दक्ष यज्ञ में हम उस ही नुकसान को देखते हैं और उस बात की सराहना करते हैं जिसे देवता और देवियाँ भी अनुभव करते हैं जब वे एक-दूसरे को मौत के घाट उतार देते हैं। परन्तु हम सभी अपने प्रियों को मृत्यु के हाथों खोते हुए नुकसान को उठाते हैं। जब आप अपने किसी मूल्यवान व्यक्ति को खो देते हैं तब आप क्या करते हैं? क्या आप निराशा में जाते हुए हार मान लेते हैं? या गुस्से में भर जाते हैं? या उन्हें वापस पाने के लिए प्रयास करते हैं?

परमेश्वर के बारे में क्या कहा जाए? क्या परमेश्वर इस बात पर ध्यान देता है जब हम में से कोई उसके राज्य में प्रवेश करने के प्रति खो जाता है?

यीशु नुकसानकी दृष्टि से शिक्षा देते हैं  

यीशु ने कई दृष्टान्तों को हमें यह दिखाने के लिए बताया कि परमेश्वर कैसा महसूस करता है और जब हम में से एक भी खो जाता है तो वह क्या करता है।

उसकी शिक्षाओं के महत्व को महसूस करने के लिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि पवित्र लोग अक्सर उन लोगों से अलग रहेंगे जो पवित्र नहीं हैं कि कहीं वे अशुद्ध न हो जाएँ। यह यीशु के समय में धार्मिक कानून के शिक्षकों के साथ सत्य बात थी। परन्तु यीशु ने शिक्षा दी है कि हमारी पवित्रता और शुद्धता हमारे मनों की बात है, और सक्रिय रूप से चाहा है कि वह उन लोगों के साथ रहें जो कर्मकांडों अनुसार शुद्ध नहीं थे। यहाँ नीचे बताया गया है कि कैसे सुसमाचार उन अशुद्ध लोगों के साथ उसके जुड़े हुए होने को और धार्मिक शिक्षकों की उसके प्रति दी जाने वाली प्रतिक्रिया को लिपिबद्ध करता है।

ब चुंगी लेने वाले और पापी उसके पास आया करते थे ताकि उस की सुनें।
2 और फरीसी और शास्त्री कुड़कुड़ा कर कहने लगे, कि यह तो पापियों से मिलता है और उन के साथ खाता भी है॥

लूका 15:1-2

यीशु पापियों का स्वागत क्यों करेगा और उनके साथ भोजन क्यों करेगा? क्या उसने पाप का आनन्द लिया? यीशु ने तीन दृष्टान्तों को बताकर अपने आलोचकों को इसका उत्तर दिया।

खोई हुई भेड़ का दृष्टांत

3 तब उस ने उन से यह दृष्टान्त कहा।
4 तुम में से कौन है जिस की सौ भेड़ें हों, और उन में से एक खो जाए तो निन्नानवे को जंगल में छोड़कर, उस खोई हुई को जब तक मिल न जाए खोजता न रहे?
5 और जब मिल जाती है, तब वह बड़े आनन्द से उसे कांधे पर उठा लेता है।
6 और घर में आकर मित्रों और पड़ोसियों को इकट्ठे करके कहता है, मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरी खोई हुई भेड़ मिल गई है।
7 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिरानेवाले पापी के विषय में भी स्वर्ग में इतना ही आनन्द होगा, जितना कि निन्नानवे ऐसे धमिर्यों के विषय नहीं होता, जिन्हें मन फिराने की आवश्यकता नहीं॥

लूका 15: 3-7

इस कहानी में यीशु ने हमें चरवाहे के रूप में अपनी भेड़ के साथ रहने के लिए बताया है। अपनी खोई हुई भेड़ों को खोजने वाले किसी भी चरवाहे की तरह वह स्वयं भी खोए हुए लोगों को खोजने निकल पड़ता है। शायद कुछ पाप – यहाँ तक ​​कि किसी गुप्त पाप – ने आपको कैद कर लिया होगा, जिससे आप स्वयं को खोया हुआ महसूस करते हैं। या शायद सभी समस्याओं के साथ आपका जीवन इतना अधिक उलझन में पड़ा हुआ है कि आप स्वयं को खोया हुआ महसूस करते हैं। यह कहानी आशा प्रदान करती है क्योंकि आप जान सकते हैं कि यीशु आपको ढूंढने के लिए खोज रहा है। वह नाश होने से पहले आपको बचाना चाहता है। वह ऐसा इसलिए करता है क्योंकि जब आप खो जाते हैं तो वह नुकसान को महसूस करता है।

फिर उसने एक दूसरी कहानी सुनाई।

खोए हुए सिक्के का दृष्टान्त

8 या कौन ऐसी स्त्री होगी, जिस के पास दस सिक्के हों, और उन में से एक खो जाए; तो वह दीया बारकर और घर झाड़ बुहार कर जब तक मिल न जाए, जी लगाकर खोजती न रहे?
9 और जब मिल जाता है, तो वह अपने सखियों और पड़ोसिनियों को इकट्ठी करके कहती है, कि मेरे साथ आनन्द करो, क्योंकि मेरा खोया हुआ सिक्का मिल गया है।
10 मैं तुम से कहता हूं; कि इसी रीति से एक मन फिराने वाले पापी के विषय में परमेश्वर के स्वर्गदूतों के साम्हने आनन्द होता है॥

लूका 15:8-10

इस कहानी में हम मूल्यवान परन्तु एक खोए हुए सिक्के के जैसे हैं और वह इसकी खोज कर रहा है। यद्यपि सिक्का खो गया है परन्तु वह यह नहीं जानता कि वह खोया हुआ है। वह अपने नुकसान को महसूस नहीं करता है। यह वह स्त्री है जो नुकसान को समझती है और इसलिए वह घर को बहुत अधिक सावधानी से साफ करती और हर चीज के नीचे और आगे पीछे देखती है, जब तक वह मूल्यवान सिक्का उसे नहीं मिल जाता तब तक वह संतुष्ट नहीं होती है। शायद आपको नुकसान ‘महसूस’ न हो। परन्तु सच्चाई तो यह है कि हम सभी सभी खोए हुए हैं, चाहे हम इसे महसूस करें या न करें। यीशु की दृष्टि में आप मूल्यवान हैं परन्तु आप एक खोए हुए सिक्के हैं और वह नुकसान को महसूस करता है इसलिए वह आपको खोजता है और आपको खोजने के लिए काम करता है।

उसकी तीसरी कहानी सबसे अधिक प्रसिद्ध है।

खोए हुए पुत्र का दृष्टान्त

11 फिर उस ने कहा, किसी मनुष्य के दो पुत्र थे।
12 उन में से छुटके ने पिता से कहा कि हे पिता संपत्ति में से जो भाग मेरा हो, वह मुझे दे दीजिए। उस ने उन को अपनी संपत्ति बांट दी।
13 और बहुत दिन न बीते थे कि छुटका पुत्र सब कुछ इकट्ठा करके एक दूर देश को चला गया और वहां कुकर्म में अपनी संपत्ति उड़ा दी।
14 जब वह सब कुछ खर्च कर चुका, तो उस देश में बड़ा अकाल पड़ा, और वह कंगाल हो गया।
15 और वह उस देश के निवासियों में से एक के यहां जा पड़ा : उस ने उसे अपने खेतों में सूअर चराने के लिये भेजा।
16 और वह चाहता था, कि उन फलियों से जिन्हें सूअर खाते थे अपना पेट भरे; और उसे कोई कुछ नहीं देता था।
17 जब वह अपने आपे में आया, तब कहने लगा, कि मेरे पिता के कितने ही मजदूरों को भोजन से अधिक रोटी मिलती है, और मैं यहां भूखा मर रहा हूं।
18 मैं अब उठकर अपने पिता के पास जाऊंगा और उस से कहूंगा कि पिता जी मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है।
19 अब इस योग्य नहीं रहा कि तेरा पुत्र कहलाऊं, मुझे अपने एक मजदूर की नाईं रख ले।
20 तब वह उठकर, अपने पिता के पास चला: वह अभी दूर ही था, कि उसके पिता ने उसे देखकर तरस खाया, और दौड़कर उसे गले लगाया, और बहुत चूमा।
21 पुत्र ने उस से कहा; पिता जी, मैं ने स्वर्ग के विरोध में और तेरी दृष्टि में पाप किया है; और अब इस योग्य नहीं रहा, कि तेरा पुत्र कहलाऊं।
22 परन्तु पिता ने अपने दासों से कहा; फट अच्छे से अच्छा वस्त्र निकालकर उसे पहिनाओ, और उसके हाथ में अंगूठी, और पांवों में जूतियां पहिनाओ।
23 और पला हुआ बछड़ा लाकर मारो ताकि हम खांए और आनन्द मनावें।
24 क्योंकि मेरा यह पुत्र मर गया था, फिर जी गया है : खो गया था, अब मिल गया है: और वे आनन्द करने लगे।
25 परन्तु उसका जेठा पुत्र खेत में था : और जब वह आते हुए घर के निकट पहुंचा, तो उस ने गाने बजाने और नाचने का शब्द सुना।
26 और उस ने एक दास को बुलाकर पूछा; यह क्या हो रहा है?
27 उस ने उस से कहा, तेरा भाई आया है; और तेरे पिता ने पला हुआ बछड़ा कटवाया है, इसलिये कि उसे भला चंगा पाया है।
28 यह सुनकर वह क्रोध से भर गया, और भीतर जाना न चाहा : परन्तु उसका पिता बाहर आकर उसे मनाने लगा।
29 उस ने पिता को उत्तर दिया, कि देख; मैं इतने वर्ष से तरी सेवा कर रहा हूं, और कभी भी तेरी आज्ञा नहीं टाली, तौभी तू ने मुझे कभी एक बकरी का बच्चा भी न दिया, कि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द करता।
30 परन्तु जब तेरा यह पुत्र, जिस ने तेरी संपत्ति वेश्याओं में उड़ा दी है, आया, तो उसके लिये तू ने पला हुआ बछड़ा कटवाया।
31 उस ने उस से कहा; पुत्र, तू सर्वदा मेरे साथ है; और जो कुछ मेरा है वह सब तेरा ही है।
32 परन्तु अब आनन्द करना और मगन होना चाहिए क्योंकि यह तेरा भाई मर गया था फिर जी गया है; खो गया था, अब मिल गया है॥

लूका 15:11-32

इस कहानी में हम या तो बड़ा, धार्मिक पुत्र, या छोटे पुत्र हैं जो बहुत दूर चला जाता है। यद्यपि बड़े बेटे ने सभी धार्मिक कर्मकांडों का पालन किया, परन्तु उसने कभी भी अपने पिता के प्रेम को नहीं समझा। छोटे पुत्र ने सोचा कि वह घर छोड़कर आजादी को प्राप्त कर रहा है, परन्तु स्वयं को भुखमरी और अपमानजनक अवस्था में पाया। तब वह ‘अपने आपे में’, यह महसूस करते हुए आया कि वह अपने घर वापस जा सकता था। वापस जाने से पता चलता है कि उसके द्वारा घर छोड़ना ही गलत था, और इस बात को स्वीकार करने के लिए उसे नम्र होने की आवश्यकता थी। इससे पता चलता है कि पश्चाताप क्या होता है, जिसकी शिक्षा स्वामी यूहन्ना ने दी थी।

जब उसने अपना घमण्ड छोड़ दिया और अपने पिता के पास लौटा तो उसने उसके प्रेम और स्वीकृति को इतना अधिक पाया जितना कि उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। जुत्ते, वस्त्र, अंगूठी, भोज, आशीर्वाद, स्वीकृति – ये सभी स्वागत से भरे हुए प्रेम की बात करते हैं। इससे हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि परमेश्‍वर हमसे बहुत अधिक प्रेम करता है, वह चाहता है कि हम उसके पास लौटें। इसके लिए आवश्यक है कि हम पश्चाताप’ करें परन्तु जब हम ऐसा करेंगे तो हम उसे हमें स्वीकार करने के लिए तैयार पाएंगे।

मृत्यु – आवश्यक हानि

दक्ष यज्ञ में हम देखते हैं कि शिव और आदि पराशक्ति की शक्ति भी मृत्यु के वियोग के ऊपर जय नहीं पा सकी। सीता की 51 शक्ति के रूप में बिखरे हुए शरीर के अंग इस तथ्य की गवाही यहाँ तक कि आज हमारे दिनों में देते हैं। यह अंतिम रूप से खो’ जाने को दिखाता है। यह एक तरह का ऐसा ‘खो’ जाना है जिससे यीशु हमारा बचाव करने के लिए आया था। हम इसे देखते हैं जब वह उस परम शत्रु – स्वयं मृत्यु का सामना करता है।

जीवित जल : गंगा में तीर्थ की दृष्टि से देखना

यदि एक व्यक्ति परमेश्वर से मुठभेड़ की आशा करता है तो एक प्रभावी तीर्थ किए जाना आवश्यक है। तीर्थ (संस्कृत तीर्थ) का अर्थ “स्थान को पार करना, घाट” इत्यादि है, और यह किसी भी स्थान, ग्रंथ या व्यक्ति को संदर्भित करता है जो पवित्र है। तीर्थ विभिन्न लोकों के बीच एक पवित्र चौराहा होता है जो आपस में स्पर्श करते हैं और तौभी एक दूसरे से अलग रहते हैं। वैदिक ग्रंथों में, तीर्थ (या क्षेत्र, गोपीता  और महालय) एक पवित्र व्यक्ति, या पवित्र ग्रंथ को संदर्भित करता है, जो एक अस्तित्व से दूसरे अस्तित्व में परिवर्तन को जन्म दे सकता है।

तीर्थ-यात्रा  तीर्थ से जुड़ी यात्रा है।

हम अपने आंतरिक स्वयं को फिर से जीवन्त और शुद्ध करने के लिए तीर्थ-यात्रा में जाते हैं, और इसलिए क्योंकि यात्रा में आध्यात्मिक गुण पाए जाते है, वैदिक ग्रंथों में इस विषय की पुष्टि होती है। वे कहते हैं कि तीर्थ-यात्रा पापों का निवारण कर सकती है। तीर्थ-यात्रा आंतरिक ध्यान यात्राओं से लेकर शारीरिक रूप से प्रसिद्ध मन्दिरों के दर्शन के लिए यात्रा करना या गंगा जैसी नदियों में स्नान करने के लिए हो सकती है, गंगा शायद सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। भारतीय परंपरा में विशेष रूप से गंगा का जल सबसे पवित्र प्रतीक है। गंगा नदी की देवी गंगा माता के रूप में प्रतिष्ठित है।

तीर्थ के रूप में गंगा जल

गंगा अपनी पूरी लंबाई में पवित्र है। देवी गंगा और उसके जीवित जल की शक्ति दैनिक अनुष्ठान, मिथकों, पूजा पद्धतियों, और मान्यता आज भी भक्ति के लिए केन्द्रीय स्थान रखते हैं। मृत्यु संबंधी कई अनुष्ठानों में गंगा जल की आवश्यकता होती है। इस प्रकार गंगा जीवित और मृत लोगों के बीच तीर्थ है। गंगा के लिए कहा जाता है कि यह तीन लोकों: स्वर्ग, पृथ्वी, और पाताल में बहती है, इसलिए इसे त्रिलोक-पथ-गामिनी  के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार गंगा का संगम स्थल त्रिशाली (“तीन स्थान या संगम”) ही वह स्थान है जहाँ आमतौर पर श्राद्ध और विसर्जन किया जाता है। कई लोग चाहते हैं कि उनकी राख गंगा नदी में बहाई जाए।

पहाड़ों में गंगा नदी

गंगा संबंधी पौराणिक कथा

शिव, गंगाधारा या “गंगा के वाहक”, को गंगा का साथी कहा जाता है। वैदिक ग्रंथ गंगा के आगमन के विषय में शिव की भूमिका के बारे में बताते हैं। जब गंगा पृथ्वी पर उतरी, तो शिव ने उसे अपने सिर पर पकड़ने का वादा किया, ताकि उसके गिरने से पृथ्वी चकनाचूर न हो जाए। जब गंगा शिव के सिर पर गिरी, तो शिव के बालों ने उसे टुकड़ों में बाँट दिया और गंगा को सात धाराओं में तोड़ दिया, जिनमें से प्रत्येक भारत के एक भिन्न हिस्से में बहती है। इसलिए, यदि कोई गंगा नदी के लिए तीर्थ यात्रा  नहीं कर सकता है, तो वह इन अन्य पवित्र धाराओं के लिए किसी एक के लिए यात्रा  कर सकता है जिनके लिए माना जाता है कि वे गंगा के जैसी ही पवित्रता के अधिकार को रखती हैं: ये यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, और कावेरी नदीयाँ हैं।

गंगा के उतरने को निरंतर माना जाता है; गंगा की प्रत्येक धारा पृथ्वी को छूने से पहले शिव के सिर को छूती है। गंगा शिव की शक्ति, या ऊर्जा का तरल रूप है। तरल शक्ति होने के नाते, गंगा परमेश्वर का अवतार है, परमेश्वर का दिव्य अंश है, जो कि सभी के लिए स्वतंत्र रूप से बह रही है। पृथ्वी पर उतरने के बाद, गंगा शिव के लिए वाहन बन गई, जिसे अपने हाथों में कुंभ (बहुत सारे फूलदान) धारण करते हुए उसके वाहन (सवारी) मगरमच्छ (मकर) के ऊपर दर्शाया गया था।

गंगा दशहरा

प्रत्येक वर्ष एक त्योहार, गंगा दशहरा, गंगा संबंधी इन पौराणिक कथाओं के उत्सव को मनाने के लिए समर्पित है। यह त्योहार मई और जून में दस दिनों तक चलता रहता है, जो ज्येष्ठ माह के दसवें दिन आता है। इस दिन, स्वर्ग से पृथ्वी तक गंगा के उतरने (अवतार) के उत्सव को मनाया जाता है। गंगा या अन्य पवित्र नदियों के जल में इस दिन शीघ्रता के साथ डुबकी लगाई जाती है ताकि दस पापों (दशहरा) या दस जन्मों के पापों से छुटकारा मिल सके।

यीशु: तीर्थ आपको जीवित जल भेंट करते हैं

यीशु ने स्वयं का वर्णन करने के लिए इन्हीं अवधारणाओं का उपयोग किया है। उसने घोषणा की कि वह ‘अनन्त जीवन’ देने वाला ‘जीवन जल’ है। ऐसा उसने पाप और इच्छाओं में फंसी एक स्त्री को कहा परिणामस्वरूप हम सब को कहा जो वैसे ही अवस्था में हैं। वास्तव में, वह कह रहा था कि वह एक तीर्थ था और सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ-यात्रा जो हम कर सकते हैं, वह उसके पास आना है। इस स्त्री ने पाया कि उसके सभी पाप, सिर्फ दस नहीं, सभी के सभी सदैव के लिए एक बार में शुद्ध कर दिए गए थे। यदि आप शुद्ध करने की शक्ति के लिए गंगा जल को प्राप्त करने के लिए दूर की यात्रा करते हैं, तो यीशु द्वारा प्रस्तावित किए गए ‘जीवित जल’ को समझ जाएंगे। इस जल की प्राप्ति के लिए आपको शारीरिक यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है, परन्तु जैसे इस स्त्री को पता चल गया था, आपको अपनी आन्तरिक शुद्धता के लिए आत्म-अनुभूति की यात्रा में से होकर जाना होगा इससे पहले कि यह आपको शुद्ध करे।

सुसमाचार इस मुठभेड़ को लिपिबद्ध करता है:

यीशु एक सामरी स्त्री के साथ बात करता है

र जब प्रभु को मालूम हुआ, कि फरीसियों ने सुना है, कि यीशु यूहन्ना से अधिक चेले बनाता, और उन्हें बपतिस्मा देता है।
2 (यद्यपि यीशु आप नहीं वरन उसके चेले बपतिस्मा देते थे)।
3 तब यहूदिया को छोड़कर फिर गलील को चला गया।
4 और उस को सामरिया से होकर जाना अवश्य था।
5 सो वह सूखार नाम सामरिया के एक नगर तक आया, जो उस भूमि के पास है, जिसे याकूब ने अपने पुत्र यूसुफ को दिया था।
6 और याकूब का कूआं भी वहीं था; सो यीशु मार्ग का थका हुआ उस कूएं पर यों ही बैठ गया, और यह बात छठे घण्टे के लगभग हुई।
7 इतने में एक सामरी स्त्री जल भरने को आई: यीशु ने उस से कहा, मुझे पानी पिला।
8 क्योंकि उसके चेले तो नगर में भोजन मोल लेने को गए थे।
9 उस सामरी स्त्री ने उस से कहा, तू यहूदी होकर मुझ सामरी स्त्री से पानी क्यों मांगता है? (क्योंकि यहूदी सामरियों के साथ किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखते)।
10 यीशु ने उत्तर दिया, यदि तू परमेश्वर के वरदान को जानती, और यह भी जानती कि वह कौन है जो तुझ से कहता है; मुझे पानी पिला तो तू उस से मांगती, और वह तुझे जीवन का जल देता।
11 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, तेरे पास जल भरने को तो कुछ है भी नहीं, और कूआं गहिरा है: तो फिर वह जीवन का जल तेरे पास कहां से आया?
12 क्या तू हमारे पिता याकूब से बड़ा है, जिस ने हमें यह कूआं दिया; और आप ही अपने सन्तान, और अपने ढोरों समेत उस में से पीया?
13 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि जो कोई यह जल पीएगा वह फिर प्यासा होगा।
14 परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूंगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा: वरन जो जल मैं उसे दूंगा, वह उस में एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।
15 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, वह जल मुझे दे ताकि मैं प्यासी न होऊं और न जल भरने को इतनी दूर आऊं।
16 यीशु ने उस से कहा, जा, अपने पति को यहां बुला ला।
17 स्त्री ने उत्तर दिया, कि मैं बिना पति की हूं: यीशु ने उस से कहा, तू ठीक कहती है कि मैं बिना पति की हूं।
18 क्योंकि तू पांच पति कर चुकी है, और जिस के पास तू अब है वह भी तेरा पति नहीं; यह तू ने सच कहा है।
19 स्त्री ने उस से कहा, हे प्रभु, मुझे ज्ञात होता है कि तू भविष्यद्वक्ता है।
20 हमारे बाप दादों ने इसी पहाड़ पर भजन किया: और तुम कहते हो कि वह जगह जहां भजन करना चाहिए यरूशलेम में है।
21 यीशु ने उस से कहा, हे नारी, मेरी बात की प्रतीति कर कि वह समय आता है कि तुम न तो इस पहाड़ पर पिता का भजन करोगे न यरूशलेम में।
22 तुम जिसे नहीं जानते, उसका भजन करते हो; और हम जिसे जानते हैं उसका भजन करते हैं; क्योंकि उद्धार यहूदियों में से है।
23 परन्तु वह समय आता है, वरन अब भी है जिस में सच्चे भक्त पिता का भजन आत्मा और सच्चाई से करेंगे, क्योंकि पिता अपने लिये ऐसे ही भजन करने वालों को ढूंढ़ता है।
24 परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।
25 स्त्री ने उस से कहा, मैं जानती हूं कि मसीह जो ख्रीस्तुस कहलाता है, आनेवाला है; जब वह आएगा, तो हमें सब बातें बता देगा।
26 यीशु ने उस से कहा, मैं जो तुझ से बोल रहा हूं, वही हूं॥
27 इतने में उसके चेले आ गए, और अचम्भा करने लगे, कि वह स्त्री से बातें कर रहा है; तौभी किसी ने न कहा, कि तू क्या चाहता है? या किस लिये उस से बातें करता है।
28 तब स्त्री अपना घड़ा छोड़कर नगर में चली गई, और लोगों से कहने लगी।
29 आओ, एक मनुष्य को देखो, जिस ने सब कुछ जो मैं ने किया मुझे बता दिया: कहीं यह तो मसीह नहीं है?
30 सो वे नगर से निकलकर उसके पास आने लगे।
31 इतने में उसके चेले यीशु से यह बिनती करने लगे, कि हे रब्बी, कुछ खा ले।
32 परन्तु उस ने उन से कहा, मेरे पास खाने के लिये ऐसा भोजन है जिसे तुम नहीं जानते।
33 तब चेलों ने आपस में कहा, क्या कोई उसके लिये कुछ खाने को लाया है?
34 यीशु ने उन से कहा, मेरा भोजन यह है, कि अपने भेजने वाले की इच्छा के अनुसार चलूं और उसका काम पूरा करूं।
35 क्या तुम नहीं कहते, कि कटनी होने में अब भी चार महीने पड़े हैं? देखो, मैं तुम से कहता हूं, अपनी आंखे उठाकर खेतों पर दृष्टि डालो, कि वे कटनी के लिये पक चुके हैं।
36 और काटने वाला मजदूरी पाता, और अनन्त जीवन के लिये फल बटोरता है; ताकि बोने वाला और काटने वाला दोनों मिलकर आनन्द करें।
37 क्योंकि इस पर यह कहावत ठीक बैठती है कि बोने वाला और है और काटने वाला और।
38 मैं ने तुम्हें वह खेत काटने के लिये भेजा, जिस में तुम ने परिश्रम नहीं किया: औरों ने परिश्रम किया और तुम उन के परिश्रम के फल में भागी हुए॥
39 और उस नगर के बहुत सामरियों ने उस स्त्री के कहने से, जिस ने यह गवाही दी थी, कि उस ने सब कुछ जो मैं ने किया है, मुझे बता दिया, विश्वास किया।
40 तब जब ये सामरी उसके पास आए, तो उस से बिनती करने लगे, कि हमारे यहां रह: सो वह वहां दो दिन तक रहा।
41 और उसके वचन के कारण और भी बहुतेरों ने विश्वास किया।
42 और उस स्त्री से कहा, अब हम तेरे कहने ही से विश्वास नहीं करते; क्योंकि हम ने आप ही सुन लिया, और जानते हैं कि यही सचमुच में जगत का उद्धारकर्ता है॥

यूहन्ना 4:1-42

यीशु द्वारा पीने के लिए पानी मांगने के दो कारण थे। पहला, वह प्यासा था। परन्तु वह (एक ऋषि होने के नाते) जानता था कि स्त्री में पूरी तरह से एक भिन्न  प्यास थी। वह अपने जीवन में संतुष्टि के लिए प्यासी थी। उसने सोचा कि वह भिन्न पुरुषों के साथ अवैध संबंध बनाकर इस प्यास को संतुष्ट कर सकती है। इसलिए उसके कई पति थे और यहाँ तक कि जब वह यीशु से बात कर रही थी तो वह एक ऐसे व्यक्ति के साथ रहती थी जो उसका अपना पति नहीं था। उसके पड़ोसी उसे अनैतिक मानते थे। शायद यही एक कारण रहा होगा कि वह दोपहर के समय पानी लेने के लिए अकेली गई थी क्योंकि सुबह की ताजगी में कुएं पर जाने के लिए गांव की अन्य स्त्रियाँ उसके साथ को नहीं चाहती थीं। इस स्त्री के कई पुरुष थे, और इसने उसे गाँव की अन्य स्त्रियों से अलग कर दिया था।

यीशु ने प्यास के विषय का उपयोग किया ताकि वह महसूस कर सके कि उसके पाप की जड़ उसके जीवन में एक गहरी प्यास थी – एक ऐसी प्यास जिसे बुझाया जाना था। वह उसे (और हमें) यह भी घोषित कर रहा था कि केवल वही हमारी आंतरिक प्यास को बुझा सकता है जो बड़ी आसानी से हमें पाप में ले जाती है।

विश्वास करने के लिए – सत्य का अंगीकार करना

परन्तु ‘जीवित जल’ के इस प्रस्ताव ने स्त्री को संकट में डाल दिया। जब यीशु ने उस से उसके पति को लाने के लिए कहा तो वह उद्देश्यपूर्वक उसे उसके पाप को पहचानने और – इसे स्वीकार करने के लिए प्रेरित कर रहा था। हम हर कीमत पर इससे बचते हैं! हम अपने पापों को छिपाना पसंद करते हैं, यह आशा करते हुए कि इसे कोई भी नहीं देखेगा। या हम तर्क प्रस्तुत करते हुए अपने पापों के लिए बहाने बनाते हैं। परन्तु यदि हम ‘शाश्वत जीवन’ की ओर ले जाने वाले परमेश्वर की वास्तविकता का अनुभव करना चाहते हैं, तब तो हमें ईमानदार होना चाहिए और अपने पाप को स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि सुसमाचार प्रतिज्ञा करता है कि:

अगर हम बिना पाप के होने का दावा करते हैं, तो हम खुद को धोखा देते हैं और सच्चाई हममें नहीं है। 9 अगर हम अपने पापों को कबूल करते हैं, तो वह वफादार और न्यायी है और हमें हमारे पापों को माफ करेगा और हमें सभी पापों से मुक्त करेगा।

1 यूहन्ना 1:8-9

इस कारण से, जब यीशु ने सामरी स्त्री को बताया कि

24 परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।

यूहन्ना 4:24

‘सत्य’ से उसका तात्पर्य अपने बारे में सत्य के विषय में है, अपनी गलती को छिपाने या उसके लिए बहाना बनाने के लिए प्रयास नहीं करना है। अद्भुत समाचार यह है कि परमेश्वर ‘खोज’ करता है और ऐसे आराधको से मुँह नहीं मोड़ेगा जो इस तरह की ईमानदारी के साथ आते हैं – चाहे वे कितने भी अशुद्ध क्यों न हो गए हों।

परन्तु उसके लिए अपने पाप को स्वीकार करना अत्याधिक कठिन था। बचने के लिए एक सुविधाजनक तरीका यह है कि हम अपने पाप के विषय को धार्मिक विवाद में बदल दें। संसार में सदैव से ही कई धार्मिक विवाद होते रहे हैं। उस दिन सामरियों और यहूदियों के बीच आराधना के उचित स्थान को लेकर एक धार्मिक विवाद था। यहूदियों ने कहा कि आराधना यरुशलेम में की जानी चाहिए और सामरियों ने कहा कि यह दूसरे पहाड़ पर होनी चाहिए। वार्तालाप को धार्मिक विवाद की और मोड़ देने से वह विषय को अपने पाप से दूर ले जाने की आशा कर रही थी। वह अब अपने धर्म के पीछे अपने पाप को छिपा सकती थी।

हम कितनी आसानी से और स्वाभाविक रूप से एक ही काम करते हैं – विशेषकर यदि हम धार्मिक हैं। तब हम दोष लगा सकते हैं कि दूसरे कैसे गलत हैं या हम कैसे सही हैं – जबकि पाप को अंगीकार करने की आवश्यकता को अनदेखा करते हुए।

यीशु उसके साथ इस विवाद में सम्मिलित नहीं हुआ। उसने जोर देकर कहा कि आराधना का स्थान  अधिक महत्व नहीं रखता है, परन्तु जो बात महत्व रखती है वह आराधना में स्वयं के विषय में ईमानदार होना है। वह कहीं भी परमेश्वर के सामने आ सकता है (क्योंकि वह आत्मा है), परन्तु उसे ‘जीवित जल’ को प्राप्त करने से पहले ईमानदारी से आत्म-अनुभूति की आवश्यकता थी।

निर्णय जिसे हम सभी को अवश्य लेना चाहिए

इसलिए उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना था। वह एक धार्मिक विवाद के पीछे निरन्तर छिपी रह सकती है या शायद उसे छोड़ सकती है। परन्तु उसने अन्त में अपने पाप को अंगीकार करना चुन लिया – उसे स्वीकार करना चुन लिया – यहाँ तक कि वह दूसरों को बताने के लिए वापस गाँव चली गई कि यह ऋषि कैसे उसके विषय में जानता था और उसने क्या किया था। वह अब आगे के लिए और अधिक नहीं छिपी रही। ऐसा करने से वह एक ‘विश्वासी’ बन गई। उसने इससे पहले आराधना और धार्मिक अनुष्ठान किए थे, परन्तु अब वह – और उसके गाँव के लोग – ‘विश्वासी’ बन गए थे।

विश्वासी बनने के लिए केवल मानसिक रूप से सही शिक्षा के साथ सहमति होना ही नहीं होता है – यद्यपि यह महत्वपूर्ण है। अपितु यह इस विश्वास के बारे में है कि उसकी दया की प्रतिज्ञा पर भरोसा किया जा सकता है, और इसलिए अब आपको और आगे के लिए पाप को छिपाने की आवश्यकता नहीं है। यही कुछ अब्राहम ने हमारे लिए बहुत पहले आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया था – उसने एक प्रतिज्ञा पर भरोसा किया।

क्या आप बहाना बनाते हैं या अपने पाप को छिपाते हैं? क्या आप इसे भक्तिपूर्ण धार्मिक अभ्यास या धार्मिक विवाद के साथ छिपाते हैं? या क्या आप अपने पाप को अंगीकार करते हैं? क्यों न हम हमारे सृष्टिकर्ता के सामने आएँ और ईमानदारी से अपने पाप को अंगीकार करें जो दोष और शर्म को उत्पन्न कर रहा है? तब आनन्दित हो जाए कि वह आपकी आराधना को चाहता है और आपको सारे अधर्म से भी ‘शुद्ध’ करेगा।

अपनी आवश्यकता के प्रति स्त्री की ईमानदारी से भरी हुई स्वीकृति ने मसीह को ‘मसीहा’ के रूप में समझने के लिए प्रेरित किया और यीशु के द्वारा दो दिन और अधिक वहाँ रहने के बाद उन्होंने उसे ‘संसार का उद्धारकर्ता’ जान लिया। शायद हम अभी तक इसे पूरी तरह से नहीं समझते हैं। परन्तु जैसा कि स्वामी यूहन्ना ने लोगों को उनके पाप को अंगीकार करने और उससे छुटकारे की आवश्यकता के लिए तैयार किया था, यह हमें इस बात को पहचानने के लिए तैयार करेगा कि हम कैसे खोए हुए हैं और कैसे उससे जीवित जल को पीते हैं।

नबी हज़रत अय्यूब कौन थे ? आज वह क्यूँ अहमियत रखते हैं ?

सूरा अल – बययानह (सूरा 98 – साफ़ सबूत) एक अच्छे आदमी के लिए ज़रूरतों का बयान करता है । वह कहता है :    

(तब) और उन्हें तो बस ये हुक्म दिया गया था कि निरा ख़ुरा उसी का एतक़ाद रख के बातिल से कतरा के ख़ुदा की इबादत करे और पाबन्दी से नमाज़ पढ़े और ज़कात अदा करता रहे और यही सच्चा दीन है।

सूरए अल बय्यानह 98: 5

इसी तरह सूरह अल – अस्र (103 – ढलने वाला दिन) बयान करता है कि हमको अल्लाह के सामने किन  नुख़सान दिह आदतों से बाज़ रहना पड़ेगा ।   

 बेशक इन्सान घाटे में है। मगर जो लोग ईमान लाए, और अच्छे काम करते रहे और आपस में हक़ का हुक्म और सब्र की वसीयत करते रहे।

सूरए अल अस्र 103:2-3

नबी हज़रत अय्यूब एक ऐसे शख्स थे जिस तरह सूरा अल – बय्यानह और सूरा अल- असर में बयान किया गया है । नबी हज़रत अय्यूब ज़ियादा मशहूर नहीं हैं । उन का नाम क़ुरान शरीफ़ में सिर्फ़ चार मर्तबा आया हुआ है ।

 (ऐ रसूल) हमने तुम्हारे पास (भी) तो इसी तरह ‘वही’ भेजी जिस तरह नूह और उसके बाद वाले पैग़म्बरों पर भेजी थी और जिस तरह इबराहीम और इस्माइल और इसहाक़ और याक़ूब और औलादे याक़ूब व ईसा व अय्यूब व युनुस व हारून व सुलेमान के पास ‘वही’ भेजी थी और हमने दाऊद को ज़ुबूर अता की ।

सूरए निसा4:163

और ये हमारी (समझाई बुझाई) दलीलें हैं जो हमने इबराहीम को अपनी क़ौम पर (ग़ालिब आने के लिए) अता की थी हम जिसके मरतबे चाहते हैं बुलन्द करते हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार हिक़मत वाला बाख़बर है।

 सूरए अनआम 6:84

 (कि भाग न जाएँ) और (ऐ रसूल) अय्यूब (का कि़स्सा याद करो) जब उन्होंने अपने परवरदिगार से दुआ की कि (ख़ुदा वन्द) बीमारी तो मेरे पीछे लग गई है और तू तो सब रहम करने वालो से (बढ़ कर है मुझ पर तरस खा) ।

सूरए अल अम्बिया 21:83

और (ऐ रसूल) हमारे (ख़ास) बन्दे अय्यूब को याद करो जब उन्होंने अपने परवरगिार से फरियाद की कि मुझको शैतान ने बहुत अज़ीयत और तकलीफ पहुँचा रखी है ।

साद 38:41

नबी हज़रत अय्यूब का नाम दीगर नबियों जैसे हज़रत इबराहीम, हज़रत ईसा अल मसीह और नबी हज़रत दाऊद की फ़ेहरिस्त में ज़ाहिर होता है जिन्हों ने ज़बूर शरीफ़ को लिखा । वह नबी हज़रत नूह और हज़रत इबराहीम के ज़माने में रहते थे । बाइबिल उन के बारे में इस तरह बयान करती है कि :  

अय्यूब 1:1-5

नबी हज़रत अय्यूब में वह सारी अच्छी खूबियाँ मौजूद थीं जो सूरा अल – बय्यनाह और सूरा अल अस्र दावा करता है । मगर शैतान खुदावंद के सामने हाज़िर हुआ । अयूब की किताब खुदावंद और शैतान के बीच जो गुफ़्तगू हुई उसको बयान करती है ।

अय्यूब 1:6-12

तो फिर शैतान ने इस तरह से नबी हज़रत अय्यूब पर एक आफ़त पर दूसरी आफ़त ले कर आया ।

अय्यूब 1:13-32

शैतान अभी भी इस जुस्तजू में था कि वह खुदावंद को आमादा करे कि अय्यूब को लानत भेजे । सो हज़रत अय्यूब के लिए एक दूसरा इम्तिहान था ।   

अय्यूब 2:1-10

इस लिए सूरा अल – अंबिया  हज़रत अय्यूब को मुसीबत में पुकारते हुए बयान करता है और सूरा साद समझाता है कि शरीर (शैतान) ने उनको ईज़ा पहुँचाया । 

उनके दुःख तकलीफ़ में साथ देने के लिए उनके तीन दोस्त थे जिन्हों ने उनकी मुलाक़ात की कि उन्हें ऐसे वक़्त में तसल्ली दे सके ।   

अय्यूब 2:11-13

अय्यूब की किताब उनके बीच हुई बात चीत का बयान करती है कि इस तरह की बद – नसीबी का वाक़िया हज़रत अय्यूब के साथ क्यूँ गुज़रा । इन की बातचीत कई एक अबवाब में जाकर एक सरसरी तस्वीर पेश करती है । मुख़तसर तोर से , उनके दोस्त लोग उनसे कहते हैं कि इसतरह की बद – क़िस्मत मुसीबतें बुरे लोगों पर ही आते हैं । इसका मतलब यह हुआ कि शायद हज़रत अय्यूब ने पोशीदा तोर से गुनाह किये हों । अगर वह इन गुनाहों का इक़रार करले तो शायद उनको गुनाहों की मुआफ़ी हासिल हो सकती है । मगर हज़रत अय्यूब लगातार उन्हें जवाब देते हैं कि वह किसी भी तरह की ख़ताकारी करने से बे – जुर्म हैं । वह इस बात को समझ नहीं सकते थे कि क्यूँ बद-क़िस्मती ने उनको चारों तरफ़ घेर लिया था ।     

हम उनकी लम्बी बातचीत के हर एक हिस्से की तह तक नहीं पहुँच सकते , मगर उनके सवालात के बीच हज़रत अय्यूब वही बयान करते हैं जिनको वह यक़ीनी तोर से जानते हैं ।   

अय्यूब 19:25-27

हालांकि हज़रत अय्यूब नहीं समझ सकते थे कि क्यूँ इस तरह का अलमिया (शदीद वाक़िया) उन पर आ गुज़रा मगर वह इतना ज़रूर जानते थे कि एक ‘छुड़ाने वाला’ था जो ज़मींन पर आ रहा था । वह छुड़ाने वाला ऐसा शख्स होगा जो उनके गुनाहों के लिए पूरी कीमत चुकाएगा । छुड़ाने वाले को हज़रत अय्यूब ‘मेरा छुड़ाने वाला कहते हैं । सो वह जानते थे की उनका छुड़ाने वाला उनके लिए आ रहे थे । उन्हें यह यक़ीन था कि इसतरह से ‘उनके खाल के बर्बाद होजाने पर’ भी (मरने के बाद) वह ख़ुदा को इसी खाल के साथ देखेंगे ।

मतलब यह कि हज़रत अयूब क़यामत के दिन की राह देख रहे थे । बल्कि उन्हें यही भी यक़ीन था कि क़ियामत के दिन पोशीदा तोर से वह खुदा का मुंह देखेंगे क्यूंकि उनका छुड़ाने वाला आज भी ज़िन्दा है और उसने उनको छुड़ाया है ।

सूरा अल – मआरिज (सूरा 70 – आने वाली सीढ़ियों का रास्ता) यह सूरा भी कियामत के दिन एक छुड़ाने वाले की बात करता है । मगर सूरा अल – मआरिज एक बेवकूफ़ आदमी का ज़िकर करता है जो मुज़तरिबाना तोर से उस दिन किसी भी छुटकारा देने वाले की राह देखता है ।           

(सूरए अल मआरिज 70:11-14)

कोई किसी दोस्त को न पूछेगा गुनेहगार तो आरज़ू करेगा कि काश उस दिन के अज़ाब के बदले उसके बेटों और उसकी बीवी और उसके भाई और उसके कुनबे को जिसमें वह रहता था और जितने आदमी ज़मीन पर हैं सब को ले ले और उसको छुटकारा दे दें ।

सूरा अल – मआरिज में यह बे – वकूफ़ आदमी बग़ैर कामयाबी से किसी की भी राह देखता है कि उसको छुड़ा ए । वह एक छुड़ाने वाले की राह देख रहा है जो उसको ‘उस दिन के ख़मयाज़े से’ उसको छुड़ाए — (इन्साफ़ के दिन के खम्याज़े से) । उसके बच्चे , बीवी , भाई बहिन और ज़मींन पर जो भी उसके ख़ानदान के हैं उन में से कोई भी उसको छुड़ा नहीं सकते क्यूंकि उन सबको अपने किये की सज़ा भुगतनी पड़ेगी , उनके लिए अपने खुद का खम्याज़ा भरना पड़ेगा ।          

हज़रत अय्यूब एक रास्त्बाज़ शख्स थे इसके बावजूद भी वह जानते थे कि उस दिन के लिए उन्हें एक छुड़ाने वाले की ज़रुरत है । उनके तमाम दुःख मुसीबत होने के बावजूद भी उन्हें यक़ीन था उन के पास यह छुड़ाने वाला था । जबकि तौरात शरीफ़ ने एलान कर दिया था कि किसी भी गुनाह का खम्याज़ा (मज़दूरी) मौत है । छुड़ाने वाले को उसकी अपनी जिंदगी का खम्याज़ा देना पड़ेगा । हज़रत अय्यूब जानते थे कि उनका छुड़ाने वाला उनके लिए ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़ा होगा’ । हज़रत अय्यूब का ‘छुड़ाने वाला’ कौन था ? वह एक ही शख्स हो सकता है जो कभी मरा था मगर मौत से जिंदा हुआ ताकि ज़माने के आख़िर में फिर से खड़ा हो सके । वह हैं हज़रत ईसा अल मसीह । वही एक हैं जो मुमकिन तोर से खम्याज़े की क़ीमत (मौत) को अदा कर सकते थे । मगर वह ‘ज़माने के आख़िर में ज़मीन पर खड़े होंगे’ ।          

अगर हज़रत अय्यूब जैसे रास्त्बाज़ शख्स के खुद के लिए एक छुड़ाने वाले की सख्त ज़रुरत थी तो आप के और मेरे लिए एक छुड़ाने वाले की कैसी सख्त ज़रुरत होनी चाहिए ताकि हमारे गुनाहों का खाम्याज़ा अदा कर सके ? वह शख्स जो अच्छी खूबियाँ रखने वाला हो , जिसे सूरह अल – बय्यानह और अल – असर नबियों की फ़ेहरिस्त में शामिल करे ऐसे शख्स के लिए एक छुड़ाने वाले की ज़रूरत थी तो हमारी क्या औक़ात कि हमें ज़रुरत न पड़े ? सूरा अल – मआरिज़ में ज़िकर किये हुए बेवकूफ़ शख़स की तरह न हों जो आखरी दिन तक इंतज़ार करता है कि मुज़तरिबाना तोर से ऐसे शख्स को पाए जो उसके गुनाहों का खमयाज़ा अदा कर सके । आज और अभी समझलें कि किस तरह से नबी हज़रत ईसा अल मसीह आप को छुड़ा सकते हैं जिस तरह नबी हज़रत अय्यूब ने पहले से ही देख लिया था ।      

किताब के आख़िर में , नबी हज़रत अय्यूब का आमना सामना (यहाँ) खुदावंद के साथ होता है और उसकी खुश नसीबी (यहाँ) बहाल होती है ।

परमेश्वर का राज्य? गुण कमल, शंख एवं मछली की जोड़ी में चित्रित

पुष्प कमल दक्षिण एशिया का प्रतिष्ठित फूल है। कमल का फूल प्राचीन इतिहास में एक प्रमुख प्रतीक था, यह आज भी बना हुआ है। कमल के पौधों की पत्तियों में एक अनूठी संरचना होती है जो आत्म-शुद्धता के लिए क्षमता प्रदान करती है, जिससे फूल कीचड़ में से बाहर बिना किसी दाग के आ जाता है। इस प्राकृतिक विशेषता ने फूल के लिए प्रतीकात्मक संदर्भों को सृजित किया है जब यह गन्दगी को छूए बिना ही मिट्टी से बाहर निकालता है। ऋग्वेद  में सबसे पहले एक रूपक (ऋग्वेद 5.LXVIII.7-9) के रूप में कमल का उल्लेख किया गया है, जहाँ पर यह एक बच्चे के सुरक्षित जन्म की इच्छा का वर्णन करता है।

जब विष्णु बौने वामन अर्थात् ब्राह्मण थे, तो उनकी सहचरी लक्ष्मी समुद्र मंथन में एक कमल से पद्म के रूप में प्रकट हुई थी, दोनों का अर्थ “कमल” है। लक्ष्मी कमल के साथ एक घनिष्ठ सम्बन्ध रखती है, वह स्वयं फूलों के भीतर रहती है।

एक शंख अनुष्ठान और धार्मिक महत्व वाली एक सीप है। शंख एक बड़े समुद्री घोंघे का खोल होता है, परन्तु पौराणिक कथाओं में शंख विष्णु का प्रतीक है और अक्सर इसका उपयोग एक तुरही के रूप में किया जाता है।

कमल और शंख शिक्षा देने वाले आठ में से दो अष्टमंगल (मंगलकारी चिन्ह) साधन हैं। वे कालातीत योग्यताओं या गुणों के लिए चित्र या प्रतीकों के रूप में कार्य करते हैं। कई ग्रंथ गुणों  की अवधारणा पर चर्चा करते हैं, जो ऐसी निहित प्राकृतिक शाक्तियाँ जो इक्ट्ठे मिलकर संसार को रूपान्तरित और परिवर्तित करती रहती हैं। सांख्य दर्शन में तीन तरह के गुण पाए जाते हैं: सत्व (भलाई, निर्माणात्मक, सामंजस्यपूर्ण), रजस (जुनून, सक्रिय, भ्रमित) और तमस् (अंधकार, विनाशकारी, अराजक)। न्याय और वैशेषिक दर्शन के विचार अधिक गुणों के लिए अनुमति देते हैं। एक गुण के रूप में परमेश्वर का राज्य के बारे में क्या कहा जाए?

पुष्प कमल, सत्व, रजस, तमस् गुण को सांख्य दर्शन में चित्रित करता हुआ

यीशु ने परमेश्वर के राज्य को एक क्रियात्मक गुण के रूप में देखा, एक ऐसे गुण के रूप में जो इस संसार को संघटित रूप से परिवर्तित कर रहा है और उस पर जय पा रहा है। उसने शिक्षा दी कि हमें परमेश्वर के राज्य में आमंत्रित किया गया है, परन्तु ऐसा करने के लिए द्विज अर्थात् दूसरी बार जन्म लिया हुआ होने की भी आवश्यकता है। फिर उसने पौधों, शंख और मछलियों के जोड़ों (अष्टमंगल चिन्ह) का उपयोग करते हुए परमेश्वर के राज्य के स्वभाव या गुण पर कहानियों की एक श्रृंखला (कहा जाता है) को दिया जो हमारे लिए परमेश्वर के राज्य के गुण को समझने में सहायता करने के लिए उसकी शिक्षा के साधन हैं। यहाँ उसके राज्य के दृष्टांन्त दिए गए हैं।

सी दिन यीशु घर से निकलकर झील के किनारे जा बैठा।
2 और उसके पास ऐसी बड़ी भीड़ इकट्ठी हुई कि वह नाव पर चढ़ गया, और सारी भीड़ किनारे पर खड़ी रही।
3 और उस ने उन से दृष्टान्तों में बहुत सी बातें कही, कि देखो, एक बोने वाला बीज बोने निकला।
4 बोते समय कुछ बीज मार्ग के किनारे गिरे और पक्षियों ने आकर उन्हें चुग लिया।
5 कुछ पत्थरीली भूमि पर गिरे, जहां उन्हें बहुत मिट्टी न मिली और गहरी मिट्टी न मिलने के कारण वे जल्द उग आए।
6 पर सूरज निकलने पर वे जल गए, और जड़ न पकड़ने से सूख गए।
7 कुछ झाड़ियों में गिरे, और झाड़ियों ने बढ़कर उन्हें दबा डाला।
8 पर कुछ अच्छी भूमि पर गिरे, और फल लाए, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।
9 जिस के कान हों वह सुन ले॥

मत्ती 13:1-9
कमल के बीजों में जीवन-शक्ति होती है जिससे वे अंकुरित होते हैं

इस दृष्टांत का क्या अर्थ था? हमें इसका अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसने लोगों को अर्थ इसका दिया जो उससे इसके अर्थ को पूछ रहे थे:

18 सो तुम बोने वाले का दृष्टान्त सुनो।
19 जो कोई राज्य का वचन सुनकर नहीं समझता, उसके मन में जो कुछ बोया गया था, उसे वह दुष्ट आकर छीन ले जाता है; यह वही है, जो मार्ग के किनारे बोया गया था।

मत्ती 13:18-19
परन्तु ये बीज पैदल चलने वाले मार्ग पर अंकुरित नहीं हो सकते हैं

20 और जो पत्थरीली भूमि पर बोया गया, यह वह है, जो वचन सुनकर तुरन्त आनन्द के साथ मान लेता है।
21 पर अपने में जड़ न रखने के कारण वह थोड़े ही दिन का है, और जब वचन के कारण क्लेश या उपद्रव होता है, तो तुरन्त ठोकर खाता है।

मत्ती 13:20-21
सूरज की गर्मी बीज के जीवन को नष्ट कर सकती है

22 जो झाड़ियों में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनता है, पर इस संसार की चिन्ता और धन का धोखा वचन को दबाता है, और वह फल नहीं लाता।

मत्ती 13:22
अन्य पौधे कमल के फूल की वृद्धि में बाधा डाल सकते हैं

23 जो अच्छी भूमि में बोया गया, यह वह है, जो वचन को सुनकर समझता है, और फल लाता है कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, कोई तीस गुना।

मत्ती 13:23
सही मिट्टी में कमल का पौधा बढ़ेगा और सुंदरता में कई गुणा हो जाएगा

परमेश्वर के राज्य के संदेश की चार प्रतिक्रियाएँ मिलती हैं। पहले के पास कोई समझ’ नहीं है और इसलिए बुराई संदेश को उनके मनों से दूर ले जाती है। शेष तीन प्रतिक्रियाएँ आरम्भ में तो बहुत ही अधिक सकारात्मक लगती हैं और वे बड़े आनन्द के साथ संदेश को ग्रहण करते हैं। परन्तु इस संदेश को हमारे मनों में कठिन समय के द्वारा विकसित होना चाहिए। इसके लिए हमारे जीवन को प्रभावित किए बिना मानसिक स्वीकार्यता अपर्याप्त है। इसलिए इन प्रतिक्रियाओं में से दो, यद्यपि उन्होंने आरम्भ में संदेश तो प्राप्त किया, परन्तु इसे अपने मन में नहीं बढ़ने दिया। केवल चौथा मन, ‘जो वचन को सुनता है और उसे समझता है’ ने वास्तव में उसे उसी तरह से प्राप्त किया जिस तरह से परमेश्वर चाह रहा था।

यीशु ने इस दृष्टांत से शिक्षा इसलिए दी ताकि हम स्वयं से पूछें: ‘कि मैं इनमें से कौन सी मिट्टी हूँ?’

जंगली बीज का दृष्टांन्त

इस दृष्टांत की व्याख्या करने के बाद यीशु ने जंगली बीज के दृष्टांन्त से शिक्षा प्रदान की।

24 उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया कि स्वर्ग का राज्य उस मनुष्य के समान है जिस ने अपने खेत में अच्छा बीज बोया।
25 पर जब लोग सो रहे थे तो उसका बैरी आकर गेहूं के बीच जंगली बीज बोकर चला गया।
26 जब अंकुर निकले और बालें लगीं, तो जंगली दाने भी दिखाई दिए।
27 इस पर गृहस्थ के दासों ने आकर उस से कहा, हे स्वामी, क्या तू ने अपने खेत में अच्छा बीज न बोया था फिर जंगली दाने के पौधे उस में कहां से आए?
28 उस ने उन से कहा, यह किसी बैरी का काम है। दासों ने उस से कहा क्या तेरी इच्छा है, कि हम जाकर उन को बटोर लें?
29 उस ने कहा, ऐसा नहीं, न हो कि जंगली दाने के पौधे बटोरते हुए उन के साथ गेहूं भी उखाड़ लो।
30 कटनी तक दोनों को एक साथ बढ़ने दो, और कटनी के समय मैं काटने वालों से कहूंगा; पहिले जंगली दाने के पौधे बटोरकर जलाने के लिये उन के गट्ठे बान्ध लो, और गेहूं को मेरे खत्ते में इकट्ठा करो॥

मत्ती 13:24-30
गेहूँ और जंगली दाने ∶ गेहूँ और जंगली दाने के पौधे पकने तक पहले एक ही जैसा दिखाई देते हैं

यहाँ वह इस दृष्टांत की व्याख्या करता है।

36 तब वह भीड़ को छोड़ कर घर में आया, और उसके चेलों ने उसके पास आकर कहा, खेत के जंगली दाने का दृष्टान्त हमें समझा दे।
37 उस ने उन को उत्तर दिया, कि अच्छे बीज का बोने वाला मनुष्य का पुत्र है।
38 खेत संसार है, अच्छा बीज राज्य के सन्तान, और जंगली बीज दुष्ट के सन्तान हैं।
39 जिस बैरी ने उन को बोया वह शैतान है; कटनी जगत का अन्त है: और काटने वाले स्वर्गदूत हैं।
40 सो जैसे जंगली दाने बटोरे जाते और जलाए जाते हैं वैसा ही जगत के अन्त में होगा।
41 मनुष्य का पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा, और वे उसके राज्य में से सब ठोकर के कारणों को और कुकर्म करने वालों को इकट्ठा करेंगे।
42 और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे, वहां रोना और दांत पीसना होगा।
43 उस समय धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की नाईं चमकेंगे; जिस के कान हों वह सुन ले॥

मत्ती 13:36-43

सरसों के बीज और खमीर के दृष्टांन्त

यीशु ने अन्य सामान्य पौधों के उदाहरणों से कुछ संक्षिप्त दृष्टांतों की भी शिक्षा दी।

31 उस ने उन्हें एक और दृष्टान्त दिया; कि स्वर्ग का राज्य राई के एक दाने के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने लेकर अपने खेत में बो दिया।
32 वह सब बीजों से छोटा तो है पर जब बढ़ जाता है तब सब साग पात से बड़ा होता है; और ऐसा पेड़ हो जाता है, कि आकाश के पक्षी आकर उस की डालियों पर बसेरा करते हैं॥
33 उस ने एक और दृष्टान्त उन्हें सुनाया; कि स्वर्ग का राज्य खमीर के समान है जिस को किसी स्त्री ने लेकर तीन पसेरी आटे में मिला दिया और होते होते वह सब खमीर हो गया॥

मत्ती 13:31-33
सरसों का बीज छोटा होता है।
सरसों के पौधे हरे-भरे और बड़े होते हैं

परमेश्वर का राज्य इस संसार में छोटे और महत्वहीन रूप में आरम्भ होगा, परन्तु पूरे संसार में विकसित होगा ठीक वैसे ही जैसे खमीरा आटा पूरे गूंथे हुए आटे को खमीरा कर देता है और जैसे एक छोटा बीज एक बड़े पौधे के रूप में वृद्धि करता है। यह बल से नहीं या अचानक से नहीं होता, इसकी वृद्धि अदृश्य है परन्तु यह प्रत्येक स्थान के लिए है और न रुकने वाली है।

छिपे हुए खज़ाने और बड़े मूल्य वाले मोती का दृष्टांत

44 स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए धन के समान है, जिसे किसी मनुष्य ने पाकर छिपा दिया, और मारे आनन्द के जाकर और अपना सब कुछ बेचकर उस खेत को मोल लिया॥
45 फिर स्वर्ग का राज्य एक व्यापारी के समान है जो अच्छे मोतियों की खोज में था।
46 जब उसे एक बहुमूल्य मोती मिला तो उस ने जाकर अपना सब कुछ बेच डाला और उसे मोल ले लिया॥

मत्ती 13:44-46
सिप्पी में बड़ा खजाना हो सकता है परन्तु मूल्य बाहरी रूप से दिखाई नहीं देता है
कुछ शंखों की सिप्पियों के भीतर बड़े मूल्य वाले गुलाबी मोती पाए जाते हैं – जो छिपे हुए होते हैं
गुलाबी मोती अत्याधिक मूल्यवान होते हैं

ये दृष्टांन्त परमेश्वर के राज्य के मूल्य पर ध्यान केंद्रित करते हैं। एक खेत में गड़े हुए खजाने के बारे में सोचें। गड़े हुए होने के कारण, खेत से से गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यही प्रतीत होता है कि इस खेत का मूल्य बहुत ही कम है और इस प्रकार उसमें किसी की भी कोई रुचि नहीं होती है। परन्तु किसी एक को पता चलता है कि वहाँ एक खजाना है, जिससे खेत अत्याधिक मूल्यवान हो जाता है – इतना मूल्यवान कि इसे खरीदने और खजाना प्राप्त करने के लिए सब कुछ को बेच दिया जाए। ठीक वैसा ही परमेश्वर के राज्य के साथ है – ऐसा मूल्य जिस पर अधिकांश के द्वारा ध्यान नहीं दिया गया, परन्तु कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इसके बड़े मूल्य को प्राप्त करते हैं।

जाल का दृष्टांन्त

47 फिर स्वर्ग का राज्य उस बड़े जाल के समान है, जो समुद्र में डाला गया, और हर प्रकार की मछिलयों को समेट लाया।
48 और जब भर गया, तो उस को किनारे पर खींच लाए, और बैठकर अच्छी अच्छी तो बरतनों में इकट्ठा किया और निकम्मी, निकम्मीं फेंक दी।
49 जगत के अन्त में ऐसा ही होगा: स्वर्गदूत आकर दुष्टों को धमिर्यों से अलग करेंगे, और उन्हें आग के कुंड में डालेंगे।
50 वहां रोना और दांत पीसना होगा।

मत्ती 13:47-50
परमेश्वर का राज्य लोगों को अलग करेगा जैसे गोवा में ये मछुआरें करते हैं

यीशु ने अष्टमंगल के एक और गुण – मछली के जोड़े को परमेश्वर के राज्य के बारे में शिक्षा देने के लिए उपयोग किया है। परमेश्वर का राज्य लोगों को मछुआरों की तरह दो अलग समूहों में विभाजित करेगा। यह न्याय के दिन होगा।

परमेश्वर का राज्य आटे में खमीर की तरह; बड़े मूल्य के साथ अधिकांश लोगों की दृष्टि से दूर रहस्यमय तरीके से आगे बढ़ता है; और लोगों के बीच विविध प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करता है। यह लोगों को दो समूहों में पृथक कर देता जो इसे समझते हैं और जो इसे नहीं समझेंगे। इन दृष्टांतों से शिक्षा देने के पश्चात् यीशु ने अपने श्रोताओं से यह प्रश्न पूछा।

51 क्या तुम ने ये सब बातें समझीं?

मत्ती 13:51

आपके बारे में क्या कहा जाए? यदि परमेश्वर के राज्य को एक ऐसे गुण के रूप में समझा जाए जो इस संसार में कार्य कर रहा है, तौभी आपको इससे कोई लाभ नहीं है जब तक कि यह आपके माध्यम से भी आगे नहीं बढ़ता। पर कैसे?

एक गंगा तीर्थ की तरह यीशु जीवित जल के ऊपर अपने दृष्टांत से व्याख्या करते हैं।

यीशु शिक्षा देते हैं कि प्राण हमें द्विज के पास लाता है

यीशु शिक्षा देते हैं कि प्राण हमें द्विज के पास लाता है

द्विज (जायते) का अर्थ दो बार जन्मया फिर से जन्म लेना होता है। यह इस विचार पर आधारित है कि एक व्यक्ति का पहले शारीरिक रूप से जन्म होता है और फिर बाद में वह दूसरी बार आध्यात्मिक रूप से जन्म लेता है। यह आध्यात्मिक जन्म परंपरागत रूप से उपनयन संस्कार के दौरान होने का प्रतीक है, जब पवित्र धागे (यज्ञोपवीत, उपावित  या जनेऊ) को कांधे पर रखा जाता है। हालाँकि, यद्यपि प्राचीन वैदिक (1500 – 600 ईसा पूर्व) ग्रंथ जैसे बौधायन गृह्यसूत्र में उपनयन की चर्चा की गई है, किसी भी अन्य प्राचीन ग्रंथ में द्विज का उल्लेख नहीं मिलता है। विकिपीडिया कुछ इस तरह से वर्णन करता है

इसके बढ़ते हुए उल्लेख 1ली-सहस्राब्दी के मध्य से लेकर उत्तरोत्तर तक के धर्मशास्त्रों के मूलपाठों में दिखाई देते हैं। शब्द द्विज  की उपस्थिति इस बात का एक चिन्ह है कि मूलपाठ संभवतः भारत के मध्ययुगीन काल का मूलपाठ है

हालाँकि, आज द्विज एक ज्ञात् अवधारणा है, तथापि यह अपेक्षाकृत नई है। द्विज कहाँ से आया?

थोमा द्वारा यीशु और द्विज

द्विज पर किसी व्यक्ति के द्वारा  सबसे पहले वर्णित की गई शिक्षा यीशु की ओर से मिलती है। यूहन्ना के सुसमाचार (ईस्वी सन् 50-100 में लिखित) में यीशु द्वारा द्विज के बारे में चर्चा की गई है। यह बहुत अच्छी तरह से कहा जा सकता है कि ईस्वी सन् 52 में मालाबार के तट पर और फिर चेन्नई में भारत आने वाला यीशु का एक शिष्य थोमा सबसे पहले अपने साथ यीशु के जीवन और शिक्षाओं के चश्मदीद गवाह के रूप में द्विज की अवधारणा को लाया था और इसे भारतीय विचार और व्यवहार में प्रस्तुत किया था। थोमा का यीशु के उपदेशों के साथ भारत में आगमन भारतीय ग्रंथों में द्विज की उत्पत्ति से मेल खाता है।

प्राण के माध्यम से यीशु और द्विज

यीशु ने द्विज को, उपनयन के साथ नहीं, बल्कि प्राण(जीवन-शाक्ति), एक और प्राचीन अवधारणा के साथ जोड़ा है। प्राण श्वास, आत्मा, वायु या जीवन-शक्ति को व्यक्त करता है। प्राण के शुरुआती सन्दर्भों में से एक 3,000 वर्षों पुराने छान्दोग्योपनिषद्, में मिलता है, परन्तु कई अन्य उपनिषद भी इस अवधारणा का उपयोग करते हैं, जिसमें कथा, मुण्डक और प्रश्नोपनिषद् शामिल हैं। विभिन्न ग्रंथ वैकल्पिक बारीकियों को देते हैं, परन्तु प्राण हमारे सांस/श्वास के साथ प्राणायाम और आयुर्वेद के ऊपर प्रभुता करने वाली सभी योगिक तकनीकों को रेखांकित करता है। प्राण को कभी-कभी आर्यु (वायु) द्वारा प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।      

यहाँ पर द्विज का परिचय देती हुई यीशु की बातचीत मिलती है। (रेखांकित शब्द द्विज या दूसरे जन्म के सन्दर्भों को चिह्नित करते हैं, जबकि मोटे अक्षर प्राण, या हवा, आत्मा के शब्दों को)

1फरीसियों में नीकुदेमुस नाम का एक मनुष्य था, जो यहूदियों का सरदार था। 2उसने रात को यीशु के पास आकर उससे कहा, “हे रब्बी, हम जानते हैं कि तू परमेश्‍वर की ओर से गुरु होकर आया है, क्योंकि कोई इन चिह्नों को जो तू दिखाता है, यदि परमेश्‍वर उसके साथ न हो तो नहीं दिखा सकता।3यीशु ने उसको उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, यदि कोई नये सिरे से न जन्मे तो परमेश्‍वर का राज्य देख नहीं सकता।4नीकुदेमुस ने उस से कहा, “मनुष्य जब बूढ़ा हो गया, तो कैसे जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश करके जन्म ले सकता है?” 5यीशु ने उत्तर दिया, “मैं तुझ से सच सच कहता हूँ, जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्‍वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता। 6क्योंकि जो शरीर से जन्मा है, वह शरीर है; और जो आत्मा से जन्मा है, वह आत्मा है। 7अचम्भा न कर कि मैं ने तुझ से कहा, ‘तुझे नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है।8हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।9नीकुदेमुस ने उसको उत्तर दिया, “ये बातें कैसे हो सकती हैं?” 10यह सुनकर यीशु ने उससे कहा, “तू इस्राएलियों का गुरु होकर भी क्या इन बातों को नहीं समझता? 11मैं तुझ से सच सच कहता हूँ कि हम जो जानते हैं वह कहते हैं, और जिसे हम ने देखा है उसकी गवाही देते हैं, और तुम हमारी गवाही ग्रहण नहीं करते। 12जब मैं ने तुम से पृथ्वी की बातें कहीं और तुम विश्‍वास नहीं करते, तो यदि मैं तुम से स्वर्ग की बातें कहूँ तो फिर कैसे विश्‍वास करोगे? 13कोई स्वर्ग पर नहीं चढ़ा, केवल वही जो स्वर्ग से उतरा, अर्थात् मनुष्य का पुत्र जो स्वर्ग में है। 14और जिस रीति से मूसा ने जंगल में साँप को ऊँचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊँचे पर चढ़ाया जाए; 15ताकि जो कोई उस पर विश्‍वास करे वह अनन्त जीवन पाए। 16क्योंकि परमेश्‍वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्‍वास करे वह नष्‍ट न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए। 17परमेश्‍वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा कि जगत पर दण्ड की आज्ञा दे, परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए। 18जो उस पर विश्‍वास करता है, उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्‍वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उसने परमेश्‍वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्‍वास नहीं किया। 19और दण्ड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उनके काम बुरे थे। 20क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए। 21परन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों कि वह परमेश्‍वर की ओर से किए गए हैं।

यूहन्ना 3∶1-21

इस बातचीत में कई अवधारणाएँ सामने आईंहैं। सबसे पहले, यीशु ने इस दूसरे जन्म की आवश्यकता की पुष्टि की है (‘तुझे नये सिरे से जन्म लेना अवश्य है’)। परन्तु इस जन्म में कोई मानवीय मध्यस्थक नहीं हैं। पहला जन्म, अर्थात् ‘शरीर से जन्म लेना’ और ‘जल से जन्म लेना’ मानवीय मध्यस्थक से आता है और यह मानवीय नियन्त्रण में होता है। परन्तु दूसरा जन्म (द्विज) में तीन ईश्वरीय मध्यस्थक शामिल हैं: परमेश्वर, मनुष्य का पुत्र और आत्मा (प्राण)। आइए इनके विषय में और अधिक जानें

परमेश्वर

यीशु ने कहा किपरमेश्‍वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा जिसका अर्थ है कि परमेश्वर सभी लोगों से प्रेम करता है…प्रत्येक से जो इस संसार में रहता है… इसमें किसी को भी बाहर नहीं रखा गया है। हम इस प्रेम की सीमा पर चिन्तन करते हुए अपने समय को व्यतीत कर सकते हैं, परन्तु यीशु चाहता है कि हम सबसे पहले यह पहचान लें कि इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर आपसे प्रेम करता है। परमेश्वर आपसे बहुत अधिक प्रेम करता है, फिर चाहे आपकी स्थिति, वर्ण, धर्म, भाषा, आयु, लिंग, धन, शिक्षा इत्यादि कुछ भी क्यों न हो… जैसा कि कहीं और कहा गया है:

38 क्योंकि मैं निश्चय जानता हूं, कि न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएं, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ, न ऊंचाई,
39 न गहिराई और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी॥

रोमियों 8:38-39

आपके (और मेरे) लिए परमेश्वर का प्रेम दूसरे जन्म को लिए जाने की आवश्यकता को दूर नहीं करता है (“कोई भी परमेश्वर के राज्य को तब तक नहीं देख सकता है जब तक कि उसका फिर से जन्म न हो”)। अपितु, आपके लिए प्रेम ने परमेश्वर को कार्य करने के लिए प्रेरित किया

‘‘क्योंकि परमेश्‍वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया…’’

यह हमें दूसरे ईश्वरीय मध्यस्थक तक ले आता है…

मनुष्य का पुत्र

मनुष्य का पुत्र’ स्वयं के लिए यीशु का संदर्भ है। इस शब्द के अर्थ को हम बाद में देखेंगे। यहाँ वह कह रहा है कि पुत्र को परमेश्वर द्वारा भेजा गया था। फिर वह ऊँचे पर उठाए जाने के विषय में विशेष कथन को देता है।

14 और जिस रीति से मूसा ने जंगल में सांप को ऊंचे पर चढ़ाया, उसी रीति से अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र भी ऊंचे पर चढ़ाया जाए।

यूहन्ना 3:14

यह मूसा के समय में दिए गए लगभग 1500 वर्षों पहले के इब्रानी वेदों के वृतान्त को संदर्भित करता है:

पीतल का सर्प

4 वे एदोम जाने के लिए माउंट होर से लाल सागर के रास्ते से गए। लेकिन रास्ते में लोग अधीर हो गए; 5 उन्होंने परमेश्वर के खिलाफ और मूसा के खिलाफ बात की, और कहा, “तुम हमें मिस्र से बाहर जंगल में मरने के लिए क्यों लाए हो? रोटी नहीं है! पानी नहीं है! और हम इस दयनीय भोजन का पता लगाते हैं!

6 तब यहोवा ने उनके बीच विषैले सांप भेजे; उन्होंने लोगों को जगाया और कई इस्राएलियों की मृत्यु हो गई। 7 लोग मूसा के पास आए और कहा, “जब हमने प्रभु के खिलाफ और तुम्हारे खिलाफ बोला तो हमने पाप किया। प्रार्थना कीजिए कि प्रभु साँपों को हमसे दूर ले जाएँ। ” इसलिए मूसा ने लोगों के लिए प्रार्थना की।

8 यहोवा ने मूसा से कहा, “एक साँप बनाओ और इसे एक पोल पर रखो; जो कोई भी काटता है वह इसे देख सकता है और जी सकता है। ” 9 इसलिए मूसा ने एक कांस्य साँप बनाया और उसे एक पोल पर रख दिया। तब जब किसी को सांप ने काटा और कांसे के सांप को देखा तो वे जीवित हो गए।

गिनती 21:4-9

यीशु ने इस कहानी का उपयोग करके ईश्वरीय मध्यस्थक के रूप में अपनी भूमिका की व्याख्या करता है। सोचिए कि सांपों द्वारा काटे गए लोगों के साथ क्या हुआ होगा।

जब जहरीले सांपों द्वारा काटे जाने से जहर शरीर में प्रवेश करता है। सामान्य उपचार में जहर को चूसने के द्वारा बाहर निकालने का प्रयास; काटे हुए अंग को कसकर बाँध दिया जाना ताकि लहू प्रवाहित न हो और काटने से जहर और अधिक न फैले; और गतिविधि को कम करना शामिल होता ताकि धीमी हृदय गति शरीर में जहर को तेजी से न फैलाए।

जब सांपों ने इस्राएलियों को संक्रमित किया, तब उन्हें चँगा होने के लिए खंभे पर रखे हुए एक पीतल के सांप की ओर देखने के लिए कहा गया। आप इसकी कल्पना कर सकते हैं कि एक व्यक्ति अपने बिस्तर से लुढ़कता हुआ सबसे निकट उठाए हुए पीतल के सांप की ओर देख रहा है और फिर चँगा हो रहा है। परन्तु इस्राएल के शिविर में लगभग 30 लाख लोग थे (उनमें सैन्य सेवा की आयु योग्य वालों की गिनती 600 000 से अधिक पुरुषों की थी) – यह एक बड़े आधुनिक शहर का आकार जितनी थी। संभावना अधिक थी कि काटे गए लोग कई किलोमीटर दूरी तक फैले हुए थे और पीतल वाले सांप के खम्बे से दूर थे। इसलिए सांप द्वारा काटे जाने वालों को चुनाव करना था। वे घाव को कसकर बांधने और लहू प्रवाह को रोकने और जहर को फैलने से रोकने के लिए मानक सावधानी उपयोग में ला सकते थे। या उन्हें मूसा द्वारा घोषित उपाय पर भरोसा करना होगा और कई किलोमीटर दूर तक पैदल चलना होगा, जिससे कि उनमें लहू का प्रवाह बढ़ेगा और जहर का फैलाव होगा, ताकि वे खम्बे पर खड़े किए गए सांप को देख सकें। यह मूसा के शब्द में विश्वास या विश्वास की कमी होगी जो प्रत्येक व्यक्ति के जीवन की गतिविधि को निर्धारित करेगी।

यीशु व्याख्या कर रहा था कि उसे क्रूस पर ऊँचा उठाए जाने से उसे पाप और मृत्यु के बन्धन से मुक्त करने की सामर्थ्य मिलती है, ठीक उसी तरह जैसे पीतल के सांप ने इस्राएलियों को ज़हरीली मौत की सामर्थ्य से मुक्त किया था। हालाँकि, जैसे इस्राएलियों को खम्बे की ओर देखने और पीतल के सांप वाले उपाय पर भरोसा करने की आवश्यकता थी ठीक वैसे ही हमें विश्वास या विश्वास के साथ यीशु की ओर देखने की आवश्यकता है। इसके लिए तीसरे ईश्वरीय मध्यस्थक को काम करने की आवश्यकता है।

आत्मा – प्राण

आत्मा के बारे में यीशु के कथन पर विचार करें

हवा जिधर चाहती है उधर चलती है और तू उसका शब्द सुनता है, परन्तु नहीं जानता कि वह कहाँ से आती और किधर को जाती है? जो कोई आत्मा से जन्मा है वह ऐसा ही है।

यूहन्ना 3∶8

‘आत्मा के लिए जिस यूनानी शब्द (न्यूमा) का उपयोग किया है वही ‘हवा’ के लिए किया गया है। परमेश्वर का आत्मा हवा की तरह है। किसी भी मनुष्य ने कभी भी हवा को नहीं देखा है। आप इसे नहीं देख सकते हैं। परन्तु हमारे चारों ओर हवा ही हवा है। हवा अवलोकनीय है। आप चीजों पर इसके प्रभाव के माध्यम से इसका अवलोकन करते हैं। जैसे ही हवा गुजरती है यह पत्तियों को सरका देती है, बाल हिलने लगते हैं, झंडे लहराते हैं और चीजों हिचकोले खाने लगती हैं। आप हवा को नियंत्रित और निर्देशित नहीं कर सकते हैं। जहाँ हवा चाहती है वहाँ वह चलती है। परन्तु हम जहाज की पत्तवार को ऊपर उठा सकते हैं ताकि हवा की ऊर्जा से अपने जहाजों को दिशा दे सकें। उठी हुई और कठोर पत्तवार हमें ऊर्जा प्रदान करने के लिए हवा को अनुमति देती है। इसके बिना हवा की गति और ऊर्जा को नहीं बढ़ाया जा सकता, हालाँकि यह हमारे चारों ओर बह रही होती है, तथापि यह हमें लाभ नहीं पहुँचाती है।

आत्मा के साथ भी ऐसा ही है। हमारे नियंत्रण से परे आत्मा जिधर चाहता है उधर ले जाता है। परन्तु जैसे-जैसे आत्मा आपको प्रेरित करता आप उसे स्वयं को प्रभावित करने के लिए अनुमति दे सकते हैं,  ताकि वह अपनी जीवन शाक्ति को आपके पास ला सके, आपको प्रेरित कर सके। यह मनुष्य का पुत्र है, जिसे क्रूस पर उँचा उठाया गया है, जो कि पीतल का सर्प है या हवा में उठाई गई पत्तवार है। जब हम अपने विश्वास को मनुष्य के पुत्र के क्रूस के ऊपर रखते हैं तो यह आत्मा को हमें जीवन प्रदान करने की अनुमति देता है। हम तब फिर से जन्म लेते हैं – इस दूसरे समय आत्मा की ओर से। हम तब आत्मा – प्राण के जीवन को प्राप्त करते हैं। आत्मा का प्राण हमें अपने भीतर से द्विज बनने में सक्षम बनाता है, केवल बाहरी प्रतीक के रूप में नहीं अपितु वैसे जैसे उपनयन के समय होता है।

द्विज – ऊपर से

इसे एक साथ संक्षेप में यूहन्ना के सुसमाचार में इस तरह दिया गया है:

12 परन्तु जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर के सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात उन्हें जो उसके नाम पर विश्वास रखते हैं।
13 वे न तो लोहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।

यूहन्ना 1:12-13

बच्चे के जन्म के लिए जन्म की आवश्यकता होती है, ठीक वैसे ही परमेश्वर की सन्तान’ बनने के लिए दूसरे जन्म – द्विज का वर्णन किया गया है । द्विज को विभिन्न अनुष्ठानों जैसे उपनयन के माध्यम से चिन्हित किया जा सकता है, परन्तु सच्चे आन्तरिक जन्म को ‘मानवीय निर्णय’ द्वारा निर्धारित नहीं किया जाता है। एक अनुष्ठान, चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, जन्म का वर्णन कर सकता है, हमें इस जन्म की आवश्यकता को स्मरण दिला सकता है, परन्तु यह इसे नहीं ला सकता है। यह पूरी तरह परमेश्वर की ओर से ही एक आन्तरिक कार्य है, जब हम उसे प्राप्त करते हैं और ‘उसके नाम पर विश्वास करते हैं’।

प्रकाश और अन्धकार

नौकायन की भौतिकी को समझने से बहुत पहले, लोगों ने सदियों से पत्तवारों का उपयोग हवा की शक्ति का उपयोग करने के लिए किया है। इसी तरह, हम दूसरे जन्म के लिए आत्मा का उपयोग कर सकते हैं, भले ही हम इसे अपने मन में पूरी तरह से न समझें। यह समझ की कमी नहीं है जो हमारे सामने रुकावट उत्पन्न करेगी। यीशु ने शिक्षा दी है कि यह हममें अंधकार के प्रति प्रेम (हमारे बुरे कर्म) हो सकता है जो हमें सत्य के प्रकाश में आने से रोकता है।

19 और दंड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उन के काम बुरे थे।

यूहन्ना 3:19

यह हमारी बौद्धिक समझ के बजाय हमारी नैतिक प्रतिक्रिया है जो हममें दूसरे जन्म की समझ को पाने से रोकती है। इसकी बजाए हमें प्रकाश में आने के लिए चेताया गया है

21 परन्तु जो सच्चाई पर चलता है वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों, कि वह परमेश्वर की ओर से किए गए हैं।

यूहन्ना 3:21

हम आगे देखते हैं कि प्रकाश में आने के बारे में उसका दृष्टांत हमें कैसे शिक्षा देता है

यीशु आंतरिक शुद्धता पर शिक्षा देते हैं

धार्मिक अनुष्ठान सम्बन्धी शुद्धता कितनी आवश्यक है? शुद्धता को बनाए रखने के लिए और अशुद्धता से बचने के लिए क्या किया जाए? हम में से बहुत से लोग अशुद्धता के विभिन्न रूपों से बचने या इसे कम करने के लिए कड़ा परिश्रम करते हैं, जैसे छुआछूत,अर्थात् एक दूसरे की अशुद्धता से बचने के लिए लोगों के बीच में आपसी स्पर्श सम्बन्धी सहमति। कई लोग अशुद्ध भोजन  को भी खाने से बचते हैं, अर्थात् अपवित्रता के एक ऐसे रूप से जिसमें हमारे द्वारा खाए जाने वाले भोजन से अशुद्धता उत्पन्न होती है, क्योंकि इस भोजन को किसी अशुद्ध व्यक्ति द्वारा बनाया गया है।

शुद्धता को बनाए रखने वाले धार्मिक कार्य

जब आप इस पर चिन्तन करते हैं, तो हम पूर्वधारणाओं का ठीक से पालन करने के लिए बहुत अधिक प्रयास कर सकते हैं। एक बच्चे के जन्म के बाद, मां को सूतक  सम्बन्धी निर्धारित नियमों का पालन करना चाहिए, जिसमें लम्बी अवधि के लिए सामाजिक दूरी बनाए रखना शामिल है। जन्म के बाद लगभग एक महीने तक कुछ परम्पराओं में जच्चा (नई माँ) को अशुद्ध माना जाता है। स्नान और मालिश को शामिल करती हुई केवल एक शुद्धिकरण प्रक्रिया (छठी) के माध्यम से ही एक माँ को फिर से शुद्ध माना जाता है। बच्चे को जन्म देने के अतिरिक्त, एक स्त्री के मासिक धर्म की अवधि को सामान्य रूप से उसे अशुद्ध बनाने के रूप में देखा जाता है, इसलिए उसे अनुष्ठान शुद्धिकरण के माध्यम से भी शुद्धता प्राप्त करनी होती है। विवाह या अग्नि भेंट (होम या यज्ञ) से पहले, शुद्धता को बनाए रखने के लिए कई लोग पुण्यवचनम्  नाम से पुकारे जाने वाली अनुष्ठान सम्बन्धी शुद्धि को करते हैं, जिसमें मंत्रों का जाप किया जाता है और लोगों के ऊपर जल छिड़का जाता है।

चाहे हमारे द्वारा खाया जाने वाला भोजन हो, या फिरजिन चीजों या लोगों को हम स्पर्श करते हैं, या हमारी शारीरिक गतिविधियाँ, ऐसे कई तरीके हैं, जिनसे हम अशुद्ध हो सकते हैं। इसलिए कई लोग शुद्धता के लिए कड़ा परिश्रम करते हैं। यही कारण है कि जीवन में सही तरीके से प्रगति करने के लिए संस्कार (या प्रथा) के रूप में जाना जाने वाले शुद्धता सम्बन्धी अनुष्ठान संस्कारों को दिया गया है।

गौतम धर्म सूत्र

गौतम धर्मसूत्र सबसे पुराने संस्कृत धर्मसूत्रों में से एक है। यह 40 बाहरी संस्कारों को सूचीबद्ध करता है (जैसे जन्म के बाद अनुष्ठान सम्बन्धी शुद्धता) परन्तु साथ ही आठ आंतरिक  संस्कार को भी शामिल करता है जिससे कि हम पवित्रता को बनाए रख सकें। ये निम्न हैं:

सभी प्राणियों के प्रति करुणा, धैर्य, ईर्ष्या की कमी, पवित्रता, शांति, एक सकारात्मक स्वभाव, उदारता, और सहनशीलता।

सभी प्राणियों के प्रति करुणा, धैर्य, ईर्ष्या की कमी, शुद्धता, शांति, एक सकारात्मक स्वभाव, उदारता, और पूर्णता की कमी।

गौतम धर्म-सूत्र 8:23

शुद्धता और अशुद्धता के विषय में यीशु

हमने देखा कि कैसे यीशु के शब्दों में अधिकार के साथ लोगों को चँगा करने और प्रकृति को आदेश देने की सामर्थ्य थी। यीशु ने हमें अपने भीतर  की शुद्धता के बारे में सोचने के लिए कहा, न कि केवल बाहरी के बारे में। यद्यपि हम केवल अन्य लोगों की बाहरी शुद्धता को देख सकते हैं, परन्तु परमेश्वर के लिए यह भिन्न बात होती है – वह भीतर को भी देखता है। जब इस्राएल के कई राजाओं में से एक ने बाहरी शुद्धता को ही बनाए रखा, परन्तु उसने अपने मन को शुद्ध नहीं रखा, तो उसके गुरु ने उसे यह सन्देश दिया है, जो बाइबल में लिपिबद्ध है:

9 देख, यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर इसलिये फिरती रहती है कि जिनका मन उसकी ओर निष्कपट रहता है, उनकी सहायता में वह अपना सामर्थ दिखाए। तूने यह काम मूर्खता से किया है, इसलिये अब से तू लड़ाइयों में फंसा रहेगा।

2 इतिहास 16:9

आन्तरिक शुद्धता का हमारे ‘मनों’ से लेना-देना है – जिसमें ‘आपा’ जो सोचता है, महसूस करता है, निर्णय लेता है, अधीन होता है या अवज्ञा करता है, और जीभ को नियंत्रित करता है। केवल आन्तरिक शुद्धता के साथ ही हमारे संस्कार प्रभावी होंगे। इसलिए यीशु ने अपनी शिक्षा में बाहरी शुद्धता की तुलना आन्तरिक के साथ करते हुए आन्तरिक शुद्धता पर जोर दिया। यहाँ पर आन्तरिक अर्थात् भीतरी शुद्धता के बारे में उसकी शिक्षाओं को सुसमाचार में लिपिबद्ध किया गया है:

37 जब वह बातें कर रहा था, तो किसी फरीसी ने उस से बिनती की, कि मेरे यहां भेजन कर; और वह भीतर जाकर भोजन करने बैठा।
38 फरीसी ने यह देखकर अचम्भा दिया कि उस ने भोजन करने से पहिले स्नान नहीं किया।
39 प्रभु ने उस से कहा, हे फरीसियों, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर तो मांजते हो, परन्तु तुम्हारे भीतर अन्धेर और दुष्टता भरी है।
40 हे निर्बुद्धियों, जिस ने बाहर का भाग बनाया, क्या उस ने भीतर का भाग नहीं बनाया?
41 परन्तु हां, भीतरवाली वस्तुओं को दान कर दो, तो देखो, सब कुछ तुम्हारे लिये शुद्ध हो जाएगा॥
42 पर हे फरीसियों, तुम पर हाय ! तुम पोदीने और सुदाब का, और सब भांति के साग-पात का दसवां अंश देते हो, परन्तु न्याय को और परमेश्वर के प्रेम को टाल देते हो: चाहिए तो था कि इन्हें भी करते रहते और उन्हें भी न छोड़ते।
43 हे फरीसियों, तुम पर हाय ! तुम आराधनालयों में मुख्य मुख्य आसन और बाजारों में नमस्कार चाहते हो।
44 हाय तुम पर ! क्योंकि तुम उन छिपी कब्रों के समान हो, जिन पर लोग चलते हैं, परन्तु नहीं जानते

॥लूका 11:37-44

52 हाय तुम व्यवस्थापकों पर ! कि तुम ने ज्ञान की कुंजी ले तो ली, परन्तु तुम ने आप ही प्रवेश नहीं किया, और प्रवेश करने वालों को भी रोक

दिया।लूका 11:52

(‘फरीसी’ यहूदी शिक्षक थे, जो स्वामियों या पंडितों के जैसे थे। यीशु ने परमेश्वर को ‘दसवाँ अंश’ देने का उल्लेख किया है। यह धार्मिक भिक्षा देने के जैसा था।

यहूदी व्यवस्था में एक शव को छूना अशुद्धता थी। जब यीशु ने कहा कि वे ‘छिपी हुई कब्रों’ के ऊपर चलते हैं, तो उसका अर्थ यह था कि वे उनके बिना जानते हुए भी अशुद्ध थे, क्योंकि वे आन्तरिक शुद्धता की उपेक्षा कर रहे थे। भीतरी अशुद्धता की उपेक्षा करना हमें एक शव को छूने जैसा अशुद्ध बना देती है।

मन  धार्मिक रूप से शुद्ध व्यक्ति को अशुद्ध करता है

निम्नलिखित शिक्षाओं में, यीशु 750 ईसा पूर्व में दिए हुए भविष्यद्वक्ता यशायाह के उद्धरण को उपोयग करते हैं।

ऐतिहासिक समयसीमा में ऋषि यशायाह और अन्य इब्रानी ऋषि (भविष्यद्वक्ता)

ब यरूशलेम से कितने फरीसी और शास्त्री यीशु के पास आकर कहने लगे।
2 तेरे चेले पुरनियों की रीतों को क्यों टालते हैं, कि बिना हाथ धोए रोटी खाते हैं?
3 उस ने उन को उत्तर दिया, कि तुम भी अपनी रीतों के कारण क्यों परमेश्वर की आज्ञा टालते हो?
4 क्योंकि परमेश्वर ने कहा था, कि अपने पिता और अपनी माता का आदर करना: और जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।
5 पर तुम कहते हो, कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, कि जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुंच सकता था, वह परमेश्वर को भेंट चढ़ाई जा चुकी।
6 तो वह अपने पिता का आदर न करे, सो तुम ने अपनी रीतों के कारण परमेश्वर का वचन टाल दिया।
7 हे कपटियों, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक की।
8 कि ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उन का मन मुझ से दूर रहता है।
9 और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं।
10 और उस ने लोगों को अपने पास बुलाकर उन से कहा, सुनो; और समझो।
11 जो मुंह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता, पर जो मुंह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
12 तब चेलों ने आकर उस से कहा, क्या तू जानता है कि फरीसियों ने यह वचन सुनकर ठोकर खाई?
13 उस ने उत्तर दिया, हर पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा।
14 उन को जाने दो; वे अन्धे मार्ग दिखाने वाले हैं: और अन्धा यदि अन्धे को मार्ग दिखाए, तो दोनों गड़हे में गिर पड़ेंगे।
15 यह सुनकर, पतरस ने उस से कहा, यह दृष्टान्त हमें समझा दे।
16 उस ने कहा, क्या तुम भी अब तक ना समझ हो?
17 क्या नहीं समझते, कि जो कुछ मुंह में जाता, वह पेट में पड़ता है, और सण्डास में निकल जाता है?
18 पर जो कुछ मुंह से निकलता है, वह मन से निकलता है, और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
19 क्योंकि कुचिन्ता, हत्या, पर स्त्रीगमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा मन ही से निकलतीं है।
20 यही हैं जो मनुष्य को अशुद्ध करती हैं, परन्तु हाथ बिना धोए भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता॥

मत्ती 15:1-20

जो हमारे मन से बाहर निकलता है वही हमें अशुद्ध बनाता है। यीशु द्वारा दी गई अशुद्ध विचारों की सूची गौतम धर्मसूत्र में सूचीबद्ध शुद्धता सम्बन्धी विचारों की सूची के लगभग ठीक विपरीत है। इस प्रकार वे एक जैसी ही शिक्षा देते हैं।

23 हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवां अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते।
24 हे अन्धे अगुवों, तुम मच्छर को तो छान डालते हो, परन्तु ऊंट को निगल जाते हो।
25 हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय, तुम कटोरे और थाली को ऊपर ऊपर से तो मांजते हो परन्तु वे भीतर अन्धेर असंयम से भरे हुए हैं।
26 हे अन्धे फरीसी, पहिले कटोरे और थाली को भीतर से मांज कि वे बाहर से भी स्वच्छ हों॥
27 हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम चूना फिरी हुई कब्रों के समान हो जो ऊपर से तो सुन्दर दिखाई देती हैं, परन्तु भीतर मुर्दों की हिड्डयों और सब प्रकार की मलिनता से भरी हैं।
28 इसी रीति से तुम भी ऊपर से मनुष्यों को धर्मी दिखाई देते हो, परन्तु भीतर कपट और अधर्म से भरे हुए हो॥

मत्ती 23:23-28

आप जिस भी प्याले में पीते हैं, आप उसे केवल बाहर से ही नहीं, अपितु भीतर से भी साफ करना चाहेंगे। हम इस दृष्टांत में प्याले हैं। परमेश्वर भी यही चाहता है कि हम केवल बाहर से ही नहीं, अपितु भीतर की भी सफाई करें।

यीशु वह कर रहा है जिसे हम सभी ने देखा है। बाहर की ओर सफाई करना धार्मिक विधियों में अत्याधिक सामान्य बात हो सकती है, परन्तु कई लोग अभी भी भीतर से लालच और भोग-विलास से भरे हुए होते हैं – यहाँ तक ​​कि वे लोग भी जो धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। आन्तरिक शुद्धता प्राप्त करना आवश्यक है – परन्तु यह बहुत कठिन है।

यीशु ने गौतम धर्म सूत्र के जैसा ही बहुत कुछ की शिक्षा दी है, जो आठ आन्तरिक संस्कारों को सूचीबद्ध करने के बाद ऐसे बताता है:

हो सकता है कि एक व्यक्ति ने सभी चालीस संस्कार  पूरे किए हैं, परन्तु उसमें इन आठ गुणों का अभाव है, उसका ब्रह्मन् के साथ एकाकार नहीं हो सकता है।

हो सकता है कि एक व्यक्ति ने केवल चालीस संस्कारों  में से कुछ को पूरा किया हो, परन्तु उसमें ये आठ गुणों हों, तब तो उसका ब्रह्मन् के साथ एकाकार होना सुनिश्चित है।

गौतम धर्म-सूत्र 8:24-25

इसलिए विचार-विमर्श के लिए विषय यह उठ खड़ा होता है। हम कैसे अपने मनों को शुद्ध करते हैं ताकि हम ब्रह्मन् के साथ स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकें? हम द्विज के बारे में जानने के लिए सुसमाचार के अध्ययन में आगे बढ़ते रहेंगे।

स्वर्ग लोक: कईयों को आमंत्रित किया गया है परन्तु

यीशु, येशु सत्संग ने, दिखाया कि स्वर्ग के नागरिकों को कैसे एक-दूसरे के साथ व्यवहार करना है। उसने साथ ही स्वर्ग के राज्य का पूर्वस्वाद देते हुए बीमारियों और दुष्ट आत्माओं से ग्रसित लोगों को चँगा किया जिसे उसने स्वर्ग का राज्यकह कर बुलाया। उसने अपने राज्य के स्वभाव को दिखाने के लिए प्रकृति को आदेश देते हुए बात की।  

हम इस राज्य की पहचान करने के लिए विभिन्न शब्दों का उपयोग करते हैं। संभवतः सबसे सामान्य शब्द स्वर्ग या स्वर्ग लोक है। इसके लिए अन्य शब्द बैकुण्ठ, देवलोक, ब्रह्मलोक, सत्यलोक, कैलाशा, ब्रह्मपुरा, सत्य का बगीचा, बैकुण्ठ लोक, विष्णु लोक, परम पद, नित्य विभूति, थिरुप्पारमपादम या बैकुण्ठ सागर है। विभिन्न परम्पराएँ विभिन्न शब्दों का उपयोग करते हुए, विभिन्न देवों के साथ संबंधों पर जोर देती हैं, परन्तु ये भिन्नताएँ मौलिक नहीं हैं। जो मौलिक है वह यह है कि स्वर्ग एक परम आनन्द देने वाला और शान्त स्थान है, जो जीवन में पाए जाने वाले दु∶ख और अज्ञान से मुक्त है, और जहाँ परमेश्वर के साथ एक गहरे संबंध का एहसास होता है। बाइबल स्वर्ग के मूल सिद्धान्तों को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करती है:

4 और वह उन की आंखोंसे सब आंसू पोंछ डालेगा; और इस के बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहिली बातें जाती

रहीं।प्रकाशितवाक्य 21:4

स्वयं यीशु ने स्वर्ग के लिए विभिन्न शब्दों का उपयोग किया है। उसने अक्सर स्वर्ग की भूमिका शब्द ‘राज्य’, (राज’ की तुलना में ‘लोक’ के अत्याधिक निकट) के साथ दी। उसने ‘स्वर्गलोक’ और ‘परमेश्वर के राज्य’ को ‘स्वर्ग के राज्य’ के पर्यायवाची के रूप में भी उपयोग किया। परन्तु इससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है कि उसने स्वर्ग के विषय में हमारी समझ को उत्तम बनाने के लिए सामान्य, प्रतिदिन की कहानियों का उपयोग किया। स्वर्ग के बारे में बताने के लिए एक विशेष दृष्टांत यह था कि यह एक बहुत बड़ा भोज या दावत है। अपनी कहानी में वह प्रसिद्ध वाक्य ‘परमेश्वर अतिथि है’ (आतिथि देवो भव) से लेकर ‘हम परमेश्वर के अतिथि है’ को दुहराता है।

स्वर्ग के बड़े भोज की कहानी

यीशु ने एक बड़े भोज (एक दावत) की शिक्षा यह वर्णन करने के लिए दी कि स्वर्ग में प्रवेश करने का निमंत्रण कितना व्यापक और किनके लिए है। परन्तु कहानी वैसी नहीं है जैसी कि हम अपेक्षा करते हैं। सुसमाचार वर्णन करता है कि:

15 उसके साथ भोजन करने वालों में से एक ने ये बातें सुनकर उस से कहा, धन्य है वह, जो परमेश्वर के राज्य में रोटी खाएगा।
16 उस ने उस से कहा; किसी मनुष्य ने बड़ी जेवनार की और बहुतों को बुलाया।
17 जब भोजन तैयार हो गया, तो उस ने अपने दास के हाथ नेवतहारियों को कहला भेजा, कि आओ; अब भोजन तैयार है।
18 पर वे सब के सब क्षमा मांगने लगे, पहिले ने उस से कहा, मैं ने खेत मोल लिया है; और अवश्य है कि उसे देखूं: मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।
19 दूसरे ने कहा, मैं ने पांच जोड़े बैल मोल लिए हैं: और उन्हें परखने जाता हूं : मैं तुझ से बिनती करता हूं, मुझे क्षमा करा दे।
20 एक और ने कहा; मै ने ब्याह किया है, इसलिये मैं नहीं आ सकता।
21 उस दास ने आकर अपने स्वामी को ये बातें कह सुनाईं, तब घर के स्वामी ने क्रोध में आकर अपने दास से कहा, नगर के बाजारों और गलियों में तुरन्त जाकर कंगालों, टुण्डों, लंगड़ों और अन्धों को यहां ले आओ।
22 दास ने फिर कहा; हे स्वामी, जैसे तू ने कहा था, वैसे ही किया गया है; फिर भी जगह है।
23 स्वामी ने दास से कहा, सड़कों पर और बाड़ों की ओर जाकर लोगों को बरबस ले ही आ ताकि मेरा घर भर जाए।
24 क्योंकि मैं तुम से कहता हूं, कि उन नेवते हुओं में से कोई मेरी जेवनार को न

चखेगा।लूका 14:15-24

इस कहानी के प्रति हमारी स्वीकृत समझ  – कई बार – उल्टा-पुल्ट जाती है। सबसे पहले, हम यह मान सकते हैं कि परमेश्वर सभी लोगों को स्वर्ग (दावत) में आमंत्रित नहीं करता है क्योंकि वह केवल योग्य लोगों को ही आमंत्रित करता है, परन्तु यह गलत है। दावत का निमंत्रण बहुत, बहुत से लोगों को दिया जाता है। स्वामी (परमेश्वर) चाहता है कि भोज लोगों से भरा हुआ हो।

परन्तु इसमें एक अप्रत्याशित परिवर्तन बिन्दु पाया जाता है। आमंत्रित अतिथियों में से बहुत कम ही वास्तव में आना चाहते हैं। वे आने के स्थान पर बहाने बनाते हैं ताकि उन्हें न आना पड़े! और देखिए उनके बहाने भी कितने अधिक तर्कहीन हैं। ऐसा कौन हो जो खरीदने के लिए बिना परखे ही बैलों को खरीद लेगा? देखे बिना कौन खेत को खरीदना चाहेगा? नहीं, उनके ये बहाने आमंत्रित अतिथियों के मनों की सच्ची मंशाओं को प्रगट करते हैं – वे स्वर्ग में रुचि नहीं रखते थे, इसके स्थान पर उनके मनों में और ही बातों की रुचियाँ थीं।

ठीक तब जब हम सोचते हैं कि शायद स्वामी बहुत कम अतिथियों की सँख्या से निराश होगा तभी भोज में एक ओर परिवर्तन बिन्दु मिलता है। अब ‘अविश्वसनीय’ लोग, जिन्हें हम अपने स्वयं के समारोहों में आमंत्रित नहीं करेंगे, जो ‘‘नगर और बाजारों’’ में और जो ‘‘गलियों और सड़कों’’ पर दूरस्थ स्थान में रहते हैं, जो कंगाल, टुण्डें, लंगड़ें और अंधें हैं’’, उन्हें भोज में आने का निमंत्रण मिलता है। इस तरह भोज के लिए निमंत्रण बहुत दूर तक चला जाता है, और मेरी और आपकी कल्पना से कहीं परे और अधिक लोगों को इसमें सम्मिलित करता है। स्वामी अपने भोज में लोगों को चाहता है और उन लोगों को आमंत्रित करता है जिन्हें हम स्वयं अपने घर में आमंत्रित नहीं करेंगे।

और ये लोग आते हैं! उनके पास अपने प्रेम को विचलित करने के लिए खेत या बैलों की तरह कोई अन्य प्रतिस्पर्धी लाभ की बातें नहीं है, इसलिए वे भोज में आते हैं। स्वर्ग भरा हुआ है और स्वामी की इच्छा पूरी होती है!

यीशु ने एक प्रश्न पूछने के लिए हमें यह कहानी सुनाई है: “यदि मुझे स्वर्ग में जाने के लिए निमंत्रण मिलता है तो क्या मैं उसे स्वीकार करूँगा?’’ या एक प्रतिस्पर्धात्मक रुचि या प्रेम आपको एक बहाना बनाने और निमंत्रण को अस्वीकार करने का कारण होगा? सच्चाई तो यह है कि आप स्वर्ग के इस भोज में आमंत्रित हैं, परन्तु वास्तविकता यह है कि हम में से अधिकांश एक या किसी अन्य कारण से निमंत्रण को अस्वीकार कर देंगे। हम कभी भी सीधे ‘नहीं’ कहेंगे जिससे कि हम अपनी अस्वीकृति को छिपाने के लिए बहानों को प्रस्तुत करें। हमारे मन की गहिराई में अन्य तरह के ‘प्रेम’ पाए जाते हैं, जिनके कारण हम हमारी अस्वीकृति को छिपाने के लिए बहाने प्रस्तुत करते हैं। इस कहानी में अस्वीकृति का मूल अन्य चीजों के प्रति प्रेम था। जिन लोगों को सबसे पहले आमंत्रित किया गया था, वे इस संसार की अस्थायी चीजों (‘खेत’, ‘बैल, और ‘विवाह’ का प्रतिनिधित्व करते हैं) को स्वर्ग और परमेश्वर से अधिक प्रेम करते थे।

अन्यायी आचार्य की कहानी

हम में से कुछ लोग स्वर्ग से अधिक इस संसार की चीजों से प्रेम करते हैं और इसलिए हम इस निमंत्रण को स्वीकार करने से इन्कार करे देंगे। हममें से दूसरे लोग अपने धार्मिकता भरे गुणों से प्रेम करते हैं या उस पर भरोसा रखते हैं। यीशु ने इसके बारे में भी एक और कहानी में एक सम्मानित अगुवे का उपयोग करते हुए शिक्षा दी है:

9 और उस ने कितनो से जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और औरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा।
10 कि दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला।
11 फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, कि हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करने वाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेने वाले के समान हूं।
12 मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं।
13 परन्तु चुंगी लेने वाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आंखें उठाना भी न चाहा, वरन अपनी छाती पीट-पीटकर कहा; हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर।
14 मैं तुम से कहता हूं, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया

जाएगा॥लूका 18:9-14

यहाँ एक फरीसी (आचार्य जैसा एक धार्मिक अगुवा) अपने धार्मिक प्रयास और योग्यता में सिद्धता को प्राप्त करता हुआ प्रतीत होता है। उसका उपवास और पूजा करना सिद्धता से भरा हुआ और आवश्यकता से भी अधिक था। परन्तु इस आचार्य ने अपनी योग्यता पर ही भरोसा रखा। यह वैसा नहीं था जैसा श्री अब्राहम ने बहुत समय पहले जब उसने परमेश्वर की प्रतिज्ञा को विनम्र विश्वास के द्वारा धार्मिकता प्राप्त की तब दिखाया था। सच्चाई तो यह है कि चुंगी लेने वाले (उस संस्कृति में एक अनैतिक पेशा) ने विनम्रतापूर्वक दया के लिए याचना की, और भरोसा किया कि उसे वह दया दे दी गई है जिसके कारण वह अपने घर – परमेश्वर के साथ खरा अर्थात् – ‘धर्मी’ ठहराए जाते हुए गया – जबकि फरीसी (आचार्य), जिसके लिए हम मानते हैं कि उसने पर्याप्त गुणों को अर्जित कर लिया है यदि उसके पाप अभी भी उसके विरूद्ध उसके लेखे में पाए जाते हैं।

इसलिए यीशु आपसे और मुझसे पूछता है कि क्या हम वास्तव में स्वर्ग के राज्य की इच्छा रखते हैं, या क्या यह अन्य बहुत सी रूचियों में से एक है। वह हमसे यह भी पूछता है कि हम किस पर भरोसा कर रहे हैं – हमारी योग्यता पर या परमेश्वर की दया और प्रेम पर।

ईमानदारी से स्वयं से ये प्रश्न पूछना आवश्यक है क्योंकि अन्यथा हम उसकी अगली शिक्षा को नहीं समझेंगे – कि हमें आन्तरिक शुद्धता की आवश्यकता है।

शरीर में ओ३म् – शब्द की सामर्थ्य द्वारा दिखाया गया है

ध्वनि एक पूरी तरह से अलग माध्यम है जिसके द्वारा पवित्र चित्रों या स्थानों की अपेक्षा परम वास्तविकता (ब्रह्म) को समझ जाता है। ध्वनि अनिवार्य रूप से तरंगों द्वारा प्रेषित जानकारी है। ध्वनि द्वारा ले जाई जाने वाली जानकारी सुंदर संगीत, निर्देशों का एक सूची, या कोई सन्देश होता है जिसे एक व्यक्ति भेजना चाहता है।

ओ३म् का प्रतीक। प्रणव में तीन भागों और संख्या 3 पर ध्यान दें।

जब कोई ध्वनि के साथ सन्देश देता है, तो इसमें कुछ दिव्य होता है, या यह दिव्यता के कुछ हिस्सा को दर्शाता है। यह पवित्र ध्वनि और प्रतीक ओ३म्  (ॐ) में पाए जाते हैं, जिसे प्रणव कहा जाता है। ओ३म् (या ॐ) दोनों ही अर्थात् एक पवित्र मंत्र और त्रि-भागी प्रतीक है। ओ३म्  के अर्थ और संकेत विभिन्न परंपराओं की विभिन्न तरह की शिक्षाओं में भिन्न मिलते हैं। त्रि-भागी प्रणव का प्रतीक पूरे भारत में प्राचीन पांडुलिपियों, मन्दिरों, मठों और आध्यात्मिक जागृति केन्द्रों में प्रचलित है। प्रणव मंत्र को परम वास्तविकता (ब्रह्म) के सर्वोत्तम रूप में समझ गया है। ओ३म् अक्षरा या एकाक्षरा के बराबर है – एक अविनाशी वास्तविकता।

इस संबंध में यह महत्वपूर्ण है कि वेद पुस्तक (बाइबल) एक त्रि-भागी मध्यस्थक के शब्द के माध्यम से होने वाली सृष्टि की रचना को लिपिबद्ध करती है। परमेश्वर ने ‘कहा’ [संस्कृत में व्याहृति (vyahriti)] और सभी लोकों के माध्यम से तरंगों के रूप में प्रचार करने वाली सूचनाओं का प्रसारण हुआ, जो आज व्याहृति  के जटिल ब्रह्मांड में पिंड और ऊर्जा को व्यवस्थित करती हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि ‘परमेश्वर का आत्मा’ उसके ऊपर मण्डराता था या पदार्थ के ऊपर कम्पन पैदा करता था। कम्पन दोनों अर्थात् ऊर्जा का एक रूप है और यह ध्वनि का सार भी बनता है। इब्रानी वेदों में बताया गया है कि कैसे 3भागी: परमेश्वर, परमेश्वर के वचन, और परमेश्वर के आत्मा, ने अपने शब्द अर्थात् वाणी (व्याहृति) को बोला, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मांड की रचना हुई जिसे अब हम देखते हैं। इसे यहां पर लिपिबद्ध किया गया है।

इब्रानी वेद: त्रि-भागी सृष्टिकर्ता सृष्टि की रचना करता है

दि में परमेश्वर ने आकाश और पृथ्वी की सृष्टि की।
2 और पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी; और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था: तथा परमेश्वर का आत्मा जल के ऊपर मण्डलाता था।
3 तब परमेश्वर ने कहा, उजियाला हो: तो उजियाला हो गया।
4 और परमेश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया।
5 और परमेश्वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहिला दिन हो गया॥
6 फिर परमेश्वर ने कहा, जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।
7 तब परमेश्वर ने एक अन्तर करके उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।
8 और परमेश्वर ने उस अन्तर को आकाश कहा। तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार दूसरा दिन हो गया॥
9 फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे; और वैसा ही हो गया।
10 और परमेश्वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा; तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
11 फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से हरी घास, तथा बीज वाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्ही में एक एक की जाति के अनुसार होते हैं पृथ्वी पर उगें; और वैसा ही हो गया।
12 तो पृथ्वी से हरी घास, और छोटे छोटे पेड़ जिन में अपनी अपनी जाति के अनुसार बीज होता है, और फलदाई वृक्ष जिनके बीज एक एक की जाति के अनुसार उन्ही में होते हैं उगे; और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
13 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार तीसरा दिन हो गया॥
14 फिर परमेश्वर ने कहा, दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियां हों; और वे चिन्हों, और नियत समयों, और दिनों, और वर्षों के कारण हों।
15 और वे ज्योतियां आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देने वाली भी ठहरें; और वैसा ही हो गया।
16 तब परमेश्वर ने दो बड़ी ज्योतियां बनाईं; उन में से बड़ी ज्योति को दिन पर प्रभुता करने के लिये, और छोटी ज्योति को रात पर प्रभुता करने के लिये बनाया: और तारागण को भी बनाया।
17 परमेश्वर ने उन को आकाश के अन्तर में इसलिये रखा कि वे पृथ्वी पर प्रकाश दें,
18 तथा दिन और रात पर प्रभुता करें और उजियाले को अन्धियारे से अलग करें: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
19 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार चौथा दिन हो गया॥
20 फिर परमेश्वर ने कहा, जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।
21 इसलिये परमेश्वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया और एक एक जाति के उड़ने वाले पक्षियों की भी सृष्टि की: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा है।
22 और परमेश्वर ने यह कहके उनको आशीष दी, कि फूलो-फलो, और समुद्र के जल में भर जाओ, और पक्षी पृथ्वी पर बढ़ें।
23 तथा सांझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पांचवां दिन हो गया।
24 फिर परमेश्वर ने कहा, पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात घरेलू पशु, और रेंगने वाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों; और वैसा ही हो गया।
25 सो परमेश्वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगने वाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्वर ने देखा कि अच्छा

है।उत्पत्ति 1:1-25

इसके बाद इब्रानी वेदों पुन∶ वर्णन करते ​​हैं कि परमेश्वर ने मानव जाति को ‘अपने स्वरूप’ में रचा ताकि हम सृष्टिकर्ता को प्रतिबिंबित कर सकें। परन्तु हमारा प्रतिबिंब इस बात में सीमित है कि हम प्रकृति को केवल अपने बोलने मात्र से आदेश नहीं दे सकते हैं। परन्तु यीशु ने ऐसा किया। हम देखते हैं कि कैसे सुसमाचार इन घटनाओं को लिपिबद्ध करते हैं

यीशु प्रकृति से बात करता है

यीशु के पास अपने शब्द द्वारा शिक्षा देने और चंगा करने का अधिकार था। सुसमाचार लिपिबद्ध करता है कि उसने जिस तरह से सामर्थ्य का प्रदर्शन किया उससे उसके शिष्य ‘भय और विस्मय’ से भर गए थे।

22 फिर एक दिन वह और उसके चेले नाव पर चढ़े, और उस ने उन से कहा; कि आओ, झील के पार चलें: सो उन्होंने नाव खोल दी।
23 पर जब नाव चल रही थी, तो वह सो गया: और झील पर आन्धी आई, और नाव पानी से भरने लगी और वे जोखिम में थे।
24 तब उन्होंने पास आकर उसे जगाया, और कहा; हे स्वामी! स्वामी! हम नाश हुए जाते हैं: तब उस ने उठकर आन्धी को और पानी की लहरों को डांटा और वे थम गए, और चैन हो गया।
25 और उस ने उन से कहा; तुम्हारा विश्वास कहां था? पर वे डर गए, और अचम्भित होकर आपस में कहने लगे, यह कौन है जो आन्धी और पानी को भी आज्ञा देता है, और वे उस की मानते हैं॥

लूका 8:22-25

यीशु के शब्द ने हवा और लहरों को भी आज्ञा दी! इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि शिष्य भय से भरे हुए थे। एक अन्य अवसर पर उसने हजारों लोगों को उसे जैसी ही सामर्थ्य को दिखाया। इस बार उसने हवा और लहर को नहीं – अपितु भोजन को आज्ञा दी।

न बातों के बाद यीशु गलील की झील अर्थात तिबिरियास की झील के पास गया।
2 और एक बड़ी भीड़ उसके पीछे हो ली क्योंकि जो आश्चर्य कर्म वह बीमारों पर दिखाता था वे उन को देखते थे।
3 तब यीशु पहाड़ पर चढ़कर अपने चेलों के साथ वहां बैठा।
4 और यहूदियों के फसह के पर्व निकट था।
5 तब यीशु ने अपनी आंखे उठाकर एक बड़ी भीड़ को अपने पास आते देखा, और फिलेप्पुस से कहा, कि हम इन के भोजन के लिये कहां से रोटी मोल लाएं?
6 परन्तु उस ने यह बात उसे परखने के लिये कही; क्योंकि वह आप जानता था कि मैं क्या करूंगा।
7 फिलेप्पुस ने उस को उत्तर दिया, कि दो सौ दीनार की रोटी उन के लिये पूरी भी न होंगी कि उन में से हर एक को थोड़ी थोड़ी मिल जाए।
8 उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उस से कहा।
9 यहां एक लड़का है जिस के पास जव की पांच रोटी और दो मछिलयां हैं परन्तु इतने लोगों के लिये वे क्या हैं?
10 यीशु ने कहा, कि लोगों को बैठा दो। उस जगह बहुत घास थी: तब वे लोग जो गिनती में लगभग पांच हजार के थे, बैठ गए:
11 तब यीशु ने रोटियां लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बांट दी: और वैसे ही मछिलयों में से जितनी वे चाहते थे बांट दिया।
12 जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उस ने अपने चेलों से कहा, कि बचे हुए टुकड़े बटोर लो, कि कुछ फेंका न जाए।
13 सो उन्होंने बटोरा, और जव की पांच रोटियों के टुकड़े जो खाने वालों से बच रहे थे उन की बारह टोकिरयां भरीं।
14 तब जो आश्चर्य कर्म उस ने कर दिखाया उसे वे लोग देखकर कहने लगे; कि वह भविष्यद्वक्ता जो जगत में आनेवाला था निश्चय यही है।
15 यीशु यह जानकर कि वे मुझे राजा बनाने के लिये आकर पकड़ना चाहते हैं, फिर पहाड़ पर अकेला चला गया।

यूहन्ना 6:1-15

जब लोगों ने देखा कि यीशु केवल धन्यवाद देकर भोजन को कई गुना बढ़ा सकता है, तो वे जानते थे कि वह अद्वितीय था। वह वागीशा (संस्कृत में भाषण का प्रभु) थे। परन्तु इसका क्या अर्थ है? यीशु ने बाद में अपने शब्दों की सामर्थ्य या प्राण को स्पष्ट करते हुए समझाया

63 आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं: जो बातें मैं ने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।

यूहन्ना 6:63

तथा

57 जैसा जीवते पिता ने मुझे भेजा और मैं पिता के कारण जीवित हूं वैसा ही वह भी जो मुझे खाएगा मेरे कारण जीवित रहेगा।

यूहन्ना 6:57

यीशु दावा कर रहे थे कि वह शरीर में त्रि-भागी सृष्टिकर्ता (पिता, वचन, आत्मा) के रूप में देहधारी था जिसने ब्रह्मांड को अस्तित्व में आने के लिए अपना शब्द बोला था। वह मानव रूप में जीवित ओ३म् थे। वह जीवित शरीर में पवित्र त्रि-भागी प्रतीक थे। उसने पवन, तरंग और पदार्थ के ऊपर अपनी सामर्थ्य को बोलकर  प्राण या जीवन-शक्ति को प्रदर्शित किया था।

ऐसे कैसे हो सकता है? इसका क्या अर्थ है?

समझने वाले मन

यीशु के शिष्यों को इसे समझने में कठिन लगा। 5000 को भोजन खिलाए जाने के बाद सुसमाचार इस वृतान्त को ऐसे लिपिबद्ध करता है:

45 तब उस ने तुरन्त अपने चेलों को बरबस नाव पर चढाया, कि वे उस से पहिले उस पार बैतसैदा को चले जांए, जब तक कि वह लोगों को विदा करे।
46 और उन्हें विदा करके पहाड़ पर प्रार्थना करने को गया।
47 और जब सांझ हुई, तो नाव झील के बीच में थी, और वह अकेला भूमि पर था।
48 और जब उस ने देखा, कि वे खेते खेते घबरा गए हैं, क्योंकि हवा उनके विरूद्ध थी, तो रात के चौथे पहर के निकट वह झील पर चलते हुए उन के पास आया; और उन से आगे निकल जाना चाहता था।
49 परन्तु उन्होंने उसे झील पर चलते देखकर समझा, कि भूत है, और चिल्ला उठे, क्योंकि सब उसे देखकर घबरा गए थे।
50 पर उस ने तुरन्त उन से बातें कीं और कहा; ढाढ़स बान्धो: मैं हूं; डरो मत।
51 तब वह उन के पास नाव पर आया, और हवा थम गई: और वे बहुत ही आश्चर्य करने लगे।
52 क्योंकि वे उन रोटियों के विषय में ने समझे थे परन्तु उन के मन कठोर हो गए थे॥
53 और वे पार उतरकर गन्नेसरत में पहुंचे, और नाव घाट पर लगाई।
54 और जब वे नाव पर से उतरे, तो लोग तुरन्त उस को पहचान कर।
55 आसपास के सारे देश में दोड़े, और बीमारों को खाटों पर डालकर, जहां जहां समाचार पाया कि वह है, वहां वहां लिए फिरे।
56 और जहां कहीं वह गांवों, नगरों, या बस्तियों में जाता था, तो लोग बीमारों को बाजारों में रखकर उस से बिनती करते थे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आंचल ही को छू लेने दे: और जितने उसे छूते थे, सब चंगे हो जाते थे॥

मरकुस 6:45-56

यह कहता है कि शिष्यों ने इसे ‘नहीं समझा। न समझने का कारण यह नहीं था कि वे बुद्धिमान नहीं थे; ऐसा नहीं था क्योंकि उन्होंने यह नहीं देखा कि क्या घटित हुआ था; इसलिए नहीं कि वे बुरे शिष्य थे; न ही ऐसा था क्योंकि वे परमेश्वर में विश्वास नहीं करते थे। यह कहता है कि उनके मन कठोर हो गए थे।हमारे अपने कठोर मन भी हमें आत्मिक सच्चाई को समझने से रोकते हैं।

यही वह मूल कारण है कि उसके दिन के लोग यीशु के बारे में इतने अधिक विभाजित थे। वैदिक परम्परा में हम ऐसे कहेंगे कि वह प्रणव या ओ३म्, अर्थात् अक्षरा होने का दावा कर रहा था जिसने संसार को अस्तित्व में आने के लिए कहा, और इसके बाद वह स्वयं मनुष्य – क्षरा बन गया।इसे बौद्धिक रूप से समझने के स्थान पर इसके प्रति हमारे मनों में छाए हुए हठ को दूर करने की जरूरत है।

यही कारण है कि यूहन्ना की तैयारी का कार्य महत्वपूर्ण था। उसने लोगों से अपने पाप को छिपाने के बजाय उसे स्वीकार करने के लिए पश्चाताप करने के लिए बुलाया। यदि यीशु के शिष्यों के मन कठोर थे जिन्हें पश्चाताप करने और पाप स्वीकार करने की आवश्यकता थी, तो आप और मैं कितने अधिक हो सकते हैं!

तो अब क्या करें?

मन को कोमल बनाने और समझ को प्राप्त करने वाला मंत्र

मैंने इब्रानी वेदों में मंत्र के रूप में दिए गए इस अंगीकार को सहायता के लिए प्रार्थना के रूप में पाया है। शायद ध्यान लगाने या जप करने के साथ-साथ ओ३म् आपके मन में भी काम करेगा।

परमेश्वर, अपनी करूणा के अनुसार मुझ पर अनुग्रह कर; अपनी बड़ी दया के अनुसार मेरे अपराधों को मिटा दे।
2 मुझे भलीं भांति धोकर मेरा अधर्म दूर कर, और मेरा पाप छुड़ाकर मुझे शुद्ध कर!
3 मैं तो अपने अपराधों को जानता हूं, और मेरा पाप निरन्तर मेरी दृष्टि में रहता है।
4 मैं ने केवल तेरे ही विरुद्ध पाप किया, और जो तेरी दृष्टि में बुरा है, वही किया है, ताकि तू बोलने में धर्मी और न्याय करने में निष्कलंक ठहरे।
5 देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ अपनी माता के गर्भ में पड़ा॥
6 देख, तू हृदय की सच्चाई से प्रसन्न होता है; और मेरे मन ही में ज्ञान सिखाएगा।
7 जूफा से मुझे शुद्ध कर, तो मैं पवित्र हो जाऊंगा; मुझे धो, और मैं हिम से भी अधिक श्वेत बनूंगा।
8 मुझे हर्ष और आनन्द की बातें सुना, जिस से जो हडि्डयां तू ने तोड़ डाली हैं वह मगन हो जाएं।
9 अपना मुख मेरे पापों की ओर से फेर ले, और मेरे सारे अधर्म के कामों को मिटा डाल॥
10 हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।
11 मुझे अपने साम्हने से निकाल न दे, और अपने पवित्र आत्मा को मुझ से अलग न कर।
12 अपने किए हुए उद्धार का हर्ष मुझे फिर से दे, और उदार आत्मा देकर मुझे सम्भाल॥

भजन संहिता 51: 1-4, 10-12

हमें यह समझने के लिए इस पश्चाताप को करने की आवश्यकता है कि इसका क्या अर्थ होता है, कि यीशु जीवित वचन के रूप में परमेश्वर का ‘ओ३म्’ है।

वह क्यों आया था? हम इसे अगले लेख में देखते हैं।