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यीशु का पुनरुत्थान: मिथक या इतिहास?

पुराणों, रामायण, और महाभारत ने अंत के समय तक जीवित रहने वाले आठ प्रतिष्ठित चिरंजीवियों को अर्थात् अमर जीवों का विवरण दिया है। यदि ये मिथक ऐतिहासिक हैं, तो ये चिरंजीवी आज भी पृथ्वी पर रह रहे हैं, जोकि हजारों और वर्षों से चल रहा है।

ये चिरंजीवी निम्न हैं:

वेद व्यास, जिन्होंने महाभारत की रचना की थी, जिन्होंने त्रेता युग के अंत में जन्म लिया था।

हनुमान, ब्रह्मचारियों में से एक हनुमान ने रामायण में वर्णित राम की सेवा की थी।

परशुराम, पुरोहित-योद्धा और विष्णु का छठा अवतार, युद्ध करने में सभी तरह से कुशल।

विभीषण, रावण का भाई, जिसने राम के सामने आत्मसमर्पण किया। रावण को मारने के बाद राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। महा युग के अंत तक उसे जीवित रहने का दीर्घायु सम्बन्धी वरदान प्राप्त है।

अश्वत्थामा, और कृपा ही कुरुक्षेत्र के युद्ध से जीवित बचे लोग हैं। अश्वत्थामा ने गैरकानूनी तरीके से कुछ लोगों को मार डाला था इसलिए कृष्ण ने उसे असाध्य घावों से ढकी हुई पृथ्वी में भटकते रहने का शाप दिया था।

महाबली, (राजा बलि चक्रवर्ती) केरल के आसपास के किसी स्थान का एक राक्षस-राजा था। वह इतना शक्तिशाली था कि देवताओं को उससे खतरा महसूस होता था। इसलिए वामन, विष्णु के बौने अवतार ने उसे धोखा दिया और उसे पाताल में भेज दिया।

कृपा, महाभारत में मिलने वाले राजकुमारों के गुरु, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद बचे तीन कौरव में से एक थे। एक अद्भुत गुरु होने के कारण, कृष्ण ने उन्हें अमरता प्रदान की और वे आज भी जीवित हैं।

मार्कंडेय एक प्राचीन ऋषि हैं, जिसका उल्लेख महाभारत में मिलता है, जिन्हें शिव ने उनकी भक्ति के कारण अमरता प्रदान की थी।

क्या चिरंजीवी ऐतिहासिक हैं?

यद्यपि प्रेरणा देने वाले के रूप में श्रद्धेय, इतिहास में चिरंजीवियों की स्वीकृति असमर्थित है। किसी भी इतिहासकार ने उनके साथ हुए आँखों-देखी मुठभेड़ को लिपिबद्ध नहीं किया है। पौराणिक कथाओं में निर्दिष्ट कई स्थान भौगोलिक रूप से स्थित नहीं हो सकते हैं। लिखित स्रोत, जैसे महाभारत, रामायण और पुराण, को ऐतिहासिक रूप से सत्यापित करना कठिन है। उदाहरण के लिए, विद्वानों का आकलन है कि 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में रामायण लिखी गई थी। परन्तु इसका परिदृश्य 870000 वर्षों पहले, अर्थात् त्रेता युग में पाया जाता है, जिससे इसकी घटनाओं के लिए शायद ही कोई आँखों-देखा गवाह मिले। ठीक इसी तरह महाभारत की रचना 3री ईसा पूर्व और 3री ईस्वी सन् शताब्दी के बीच किसी समय में हुई थी, जबकि संभवतः इसमें 8-9वीं शताब्दी ईसा पूर्व की घटनाओं का वर्णन मिलता है। लेखक उन घटनाओं के गवाह नहीं बने, जो उन्होंने सुनाई थीं, क्योंकि वे सैकड़ों वर्षों पहले घटित हो चुकी थीं।

यीशु के पुनरुत्थान की ऐतिहासिक रूप से जाँच की गई है।

यीशु के पुनरुत्थान और नए जीवन में आने के बाइबल के दावे के बारे में क्या कहा जाए? क्या चिरंजीवियों की तरह यीशु का पुनरुत्थान पौराणिक है, या यह ऐतिहासिक है?

यह जाँच का विषय है, क्योंकि यह सीधे हमारे जीवनों को प्रभावित करता है। हम सभी मरेंगे, चाहे हम कितना भी धन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य लक्ष्यों को क्यों न प्राप्त कर लें। यदि यीशु ने मृत्यु को पराजित किया है तो यह हमारी स्वयं की निकट आती मृत्यु के लिए आशा देता है। यहाँ हम उसके पुनरुत्थान को समर्थन करने वाले कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को देखते हैं।

यीशु के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यीशु का अस्तित्व था और उसकी मृत्यु सार्वजनिक रीति से हुई थी, यह तथ्य इतिहास के समय चक्र को ही परिवर्तित कर देता है। संसारिक इतिहास यीशु और उसके दिनों में संसार पर उसके प्रभाव के कई संदर्भों को लिपिबद्ध करता है। हम दो पर अपना ध्यान लगाते हैं

टैकिटुस

रोमी गवर्नर-इतिहासकार टैकिटुस ने इतिहास को लिपिबद्ध करते समय यीशु के लिए एक आकर्षक सन्दर्भ लिखा कि कैसे रोमी सम्राट नीरो ने पहली शताब्दी के मसीह विश्वासियों (65 ईस्वी सन् में) को मार डाला था। टैकिटुस ने कुछ ऐसा लिखा है।

‘नीरो…ने जिन लोगों को सबसे कठोर यातनाओं के साथ दंडित किया, उन लोगों को आमतौर पर मसीही कहा जाता था, जिनके साथ अत्याचार घृणा के कारण किया जाता था। मसीही विश्वास के संस्थापक का नाम ख्रिस्त अर्थात् मसीह था, जिसे तिबिरियुस कैसर के शासनकाल में यहूदिया के हाकिम पुन्तियुस पिलातुस के द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था; परन्तु दबाया गया हानि से भरा हुआ अंधविश्वास, एक बार फिर से फूट पड़ा, न केवल यहूदिया से, जहाँ इस शरारत ने जन्म लिया था, अपितु रोम के शहर में भी’टैकिटुस.

वर्षक्रमिक इतिहास 15. 44. 112 ईस्वी सन्

टैकिटुस पुष्टि करता है कि यीशु:

1. एक ऐतिहासिक व्यक्ति था;

2. जिसे पुन्तियुस पिलातुस ने;

3. यहूदिया/यरुशलेम में मरवा दिया

4. 65 ईस्वी सन् तक, यीशु में विश्वास भूमध्य सागर से लेकर रोम तक इतनी अधिक सामर्थ्य के साथ फैल गया था कि रोम के सम्राट को लगा कि उसे इससे निपटना चाहिए।

ध्यान दें कि टैकिटुस इन बातों को एक शत्रुतापूर्ण गवाह के रूप में कह रहा है क्योंकि वह मानता है कि जिस आंदोलन को यीशु ने आरम्भ किया था, वह एक ‘दुष्टतापूर्ण अंधविश्वास’ था। वह इसका विरोध करता है, परन्तु वह इसकी ऐतिहासिकता से इनकार नहीं करता है।

जोसीफुस

पहली सदी का लेखक और यहूदी सैन्य अगुवा/इतिहासकार, जोसीफुस ने आरम्भ से लेकर उसके समय तक के यहूदी इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत किया। ऐसा करते हुए उसने इन शब्दों के साथ यीशु के समय और उसके जीवन को इस तरह प्रस्तुत किया है:

‘इस समय में एक बुद्धिमान व्यक्ति… यीशु… भला, और … गुणों से भरपूर था। और यहूदियों और दूसरे देशों के कई लोग उसके चेले बन गए। पीलातुस ने उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने और मार दिए जाने का दण्ड दिया। और जो उसके चेले बन गए थे, उन्होंने अपने चेलेपन को नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि वह अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने के तीन दिन बाद उन्हें दिखाई दिया था और वह जीवित था’जोसीफुस.

90 ईस्वी सन्. पुरावशेष 18:33

जोसीफुस ने पुष्टि की कि:

1. यीशु जीवित रहा था,

2. वह एक धार्मिक शिक्षक था,

3. उसके शिष्यों ने सार्वजनिक रूप से मृतकों में से यीशु के पुनरुत्थान की घोषणा की थी।

इन ऐतिहासिक झलकियों से पता चलता है कि मसीह की मृत्यु एक प्रसिद्ध घटना थी और उसके शिष्यों ने यूनानी-रोमी संसार पर उसके पुनरुत्थान के विषय पर जोर दिया था।

जोसीफुस और टैकिटुस ने पुष्टि की कि यीशु का आंदोलन यहूदिया में आरम्भ हुआ था परन्तु शीघ्र ही रोम में पहुँच गया था

बाइबल से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकार लूका, आगे बताते हैं कि कैसे यह विश्वास प्राचीन संसार में विकसित हुआ। यहाँ बाइबल की पुस्तक प्रेरितों के काम में से उनके कुछ अंश दिए गए है:

ब वे लोगों से यह कह रहे थे, तो याजक और मन्दिर के सरदार और सदूकी उन पर चढ़ आए।
2 क्योंकि वे बहुत क्रोधित हुए कि वे लोगों को सिखाते थे और यीशु का उदाहरण दे देकर मरे हुओं के जी उठने का प्रचार करते थे।
3 और उन्होंने उन्हें पकड़कर दूसरे दिन तक हवालात में रखा क्योंकि सन्धया हो गई थी।
4 परन्तु वचन के सुनने वालों में से बहुतों ने विश्वास किया, और उन की गिनती पांच हजार पुरूषों के लगभग हो गई॥
5 दूसरे दिन ऐसा हुआ कि उन के सरदार और पुरिनये और शास्त्री।
6 और महायाजक हन्ना और कैफा और यूहन्ना और सिकन्दर और जितने महायाजक के घराने के थे, सब यरूशलेम में इकट्ठे हुए।
7 और उन्हें बीच में खड़ा करके पूछने लगे, कि तुम ने यह काम किस सामर्थ से और किस नाम से किया है?
8 तब पतरस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर उन से कहा।
9 हे लोगों के सरदारों और पुरनियों, इस दुर्बल मनुष्य के साथ जो भलाई की गई है, यदि आज हम से उसके विषय में पूछ पाछ की जाती है, कि वह क्योंकर अच्छा हुआ।
10 तो तुम सब और सारे इस्त्राएली लोग जान लें कि यीशु मसीह नासरी के नाम से जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, और परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, यह मनुष्य तुम्हारे साम्हने भला चंगा खड़ा है।
11 यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना और वह कोने के सिरे का पत्थर हो गया।
12 और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें॥
13 जब उन्होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं।
14 और उस मनुष्य को जो अच्छा हुआ था, उन के साथ खड़े देखकर, वे विरोध में कुछ न कह सके।
15 परन्तु उन्हें सभा के बाहर जाने की आज्ञा देकर, वे आपस में विचार करने लगे,
16 कि हम इन मनुष्यों के साथ क्या करें? क्योंकि यरूशलेम के सब रहने वालों पर प्रगट है, कि इन के द्वारा एक प्रसिद्ध चिन्ह दिखाया गया है; और हम उसका इन्कार नहीं कर सकते।
17 परन्तु इसलिये कि यह बात लोगों में और अधिक फैल न जाए, हम उन्हें धमकाएं, कि वे इस नाम से फिर किसी मनुष्य से बातें न

करें।प्रेरितों के काम 4:1-17 63 ईस्वी सन्

अधिकारियों की ओर से विरोध

17 तब महायाजक और उसके सब साथी जो सदूकियों के पंथ के थे, डाह से भर कर उठे।
18 और प्रेरितों को पकड़कर बन्दीगृह में बन्द कर दिया।
19 परन्तु रात को प्रभु के एक स्वर्गदूत ने बन्दीगृह के द्वार खोलकर उन्हें बाहर लाकर कहा।
20 कि जाओ, मन्दिर में खड़े होकर, इस जीवन की सब बातें लोगों को सुनाओ।
21 वे यह सुनकर भोर होते ही मन्दिर में जाकर उपदेश देने लगे: परन्तु महायाजक और उसके साथियों ने आकर महासभा को और इस्त्राएलियों के सब पुरनियों को इकट्ठे किया, और बन्दीगृह में कहला भेजा कि उन्हें लाएं।
22 परन्तु प्यादों ने वहां पहुंचकर उन्हें बन्दीगृह में न पाया, और लौटकर संदेश दिया।
23 कि हम ने बन्दीगृह को बड़ी चौकसी से बन्द किया हुआ, और पहरे वालों को बाहर द्वारों पर खड़े हुए पाया; परन्तु जब खोला, तो भीतर कोई न मिला।
24 जब मन्दिर के सरदार और महायाजकों ने ये बातें सुनीं, तो उन के विषय में भारी चिन्ता में पड़ गए कि यह क्या हुआ चाहता है?
25 इतने में किसी ने आकर उन्हें बताया, कि देखो, जिन्हें तुम ने बन्दीगृह में बन्द रखा था, वे मनुष्य मन्दिर में खड़े हुए लोगों को उपदेश दे रहे हैं।
26 तब सरदार, प्यादों के साथ जाकर, उन्हें ले आया, परन्तु बरबस नहीं, क्योंकि वे लोगों से डरते थे, कि हमें पत्थरवाह न करें।
27 उन्होंने उन्हें फिर लाकर महासभा के साम्हने खड़ा कर दिया और महायाजक ने उन से पूछा।
28 क्या हम ने तुम्हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? तौभी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लोहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो।
29 तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है।
30 हमारे बाप दादों के परमेश्वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुम ने क्रूस पर लटका कर मार डाला था।
31 उसी को परमेश्वर ने प्रभु और उद्धारक ठहराकर, अपने दाहिने हाथ से सर्वोच्च कर दिया, कि वह इस्त्राएलियों को मन फिराव की शक्ति और पापों की क्षमा प्रदान करे।
32 और हम इन बातों के गवाह हैं, और पवित्र आत्मा भी, जिसे परमेश्वर ने उन्हें दिया है, जो उस की आज्ञा मानते हैं॥
33 यह सुनकर वे जल गए, और उन्हें मार डालना चाहा।
34 परन्तु गमलीएल नाम एक फरीसी ने जो व्यवस्थापक और सब लोगों में माननीय था, न्यायालय में खड़े होकर प्रेरितों को थोड़ी देर के लिये बाहर कर देने की आज्ञा दी।
35 तब उस ने कहा, हे इस्त्राएलियों, जो कुछ इन मनुष्यों से किया चाहते हो, सोच समझ के करना।
36 क्योंकि इन दिनों से पहले यियूदास यह कहता हुआ उठा, कि मैं भी कुछ हूं; और कोई चार सौ मनुष्य उसके साथ हो लिये, परन्तु वह मारा गया; और जितने लोग उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हुए और मिट गए।
37 उसके बाद नाम लिखाई के दिनों में यहूदा गलीली उठा, और कुछ लोग अपनी ओर कर लिये: वह भी नाश हो गया, और जितने लागे उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हो गए।
38 इसलिये अब मैं तुम से कहता हूं, इन मनुष्यों से दूर ही रहो और उन से कुछ काम न रखो; क्योंकि यदि यह धर्म या काम मनुष्यों की ओर से हो तब तो मिट जाएगा।
39 परन्तु यदि परमेश्वर की ओर से है, तो तुम उन्हें कदापि मिटा न सकोगे; कहीं ऐसा न हो, कि तुम परमेश्वर से भी लड़ने वाले ठहरो।
40 तब उन्होंने उस की बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना।
41 वे इस बात से आनन्दित होकर महासभा के साम्हने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य

तो ठहरे।प्रेरितों के काम 5:17-41

ये अंश इस नए विश्वास को रोकने के लिए यहूदी अगुवों द्वारा एक लम्बी सीमा तक जाने के ऊपर ध्यान देते हैं। ये आरम्भिक विवाद यरुशलेम में हुए, यह वही शहर था जहाँ कुछ सप्ताह पहले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से यीशु को मृत्यु दण्ड दिया था।

इस ऐतिहासिक तथ्यों से हम पुनरुत्थान की जाँच इस बात को ध्यान में रखकर विकल्पों की तुलना करते हुए कर सकते हैं कि इसका क्या अर्थ है।

यीशु का शरीर और कब्र

मरे हुए मसीह की कब्र के विषय में केवल दो ही विकल्प विद्यमान हैं। या तो कब्र उस ईस्टर रविवार की सुबह खाली थी या उसमें उसका शरीर अभी भी पड़ा हुआ था। यहाँ कोई और दूसरा विकल्प नहीं मिलता है

पुनरुत्थान के संदेश का विरोध करने वाले यहूदी अगुवों ने मृत शरीर के साथ इस बात का खंडन नहीं किया है

जिस कब्र में यीशु का लाश पड़ी हुई थी, वह उस मंदिर से ज्यादा दूर नहीं था जहाँ उसके शिष्य भीड़ से चिल्ला कर कह रहे थे कि वह मृत अवस्था में से जी उठा था। यहूदी अगुवों के लिए यह आसान होना चाहिए था कि वे पुनरुत्थान के उनके संदेश को कब्र में रखे हुए मृत शरीर को दिखा कर उन्हें बदनाम कर सकते थे। इतिहास से पता चलता है कि पुनरुत्थान का संदेश (जो कि कब्र में पड़े हुए मृत शरीर के साथ अप्रमाणित हो जाता) कब्र के पास ही आरम्भ हुआ, जहाँ प्रमाण सभी के लिए आसानी से उपलब्ध था। चूँकि यहूदी अगुवों ने मृत शरीर को दिखा कर उनके संदेश का खंडन नहीं किया था, इसलिए दिखाने के लिए कब्र में कोई मृत शरीर ही नहीं था।

यरूशलेम में पुनरुत्थान के संदेश पर हजारों लोगों ने विश्वास किया

इस समय यरूशलेम में यीशु के शरीरिक पुनरुत्थान पर विश्वास करने के लिए हजारों लोग परिवर्तित हुए। यदि आप पतरस को सुनने वालों की भीड़ में से एक होते, तो यह सोचते हुए आश्चर्य करते कि क्या उसका संदेश सच था, क्या आपने कम से कम कब्र पर जाने के लिए दोपहर के भोजनावकाश के समय न निकाला होता और यह न देखा होता कि क्या वहाँ अभी भी कोई मृत शरीर पड़ा हुआ था या नहीं? यदि यीशु का मृत शरीर अभी भी कब्र में होता तो कोई भी प्रेरितों के संदेश पर विश्वास नहीं करता। परन्तु इतिहास लिपिबद्ध करता है कि उन्होंने यरूशलेम से आरम्भ करते हुए हजारों अनुयायियों को प्राप्त किया। यदि यरुशलेम में अभी भी एक लाश पड़ी हुई होती तो ऐसा होना असंभव था। कब्र में यीशु की लाश का होने मूर्खता की ओर ले जाता। इसका कोई अर्थ ही नहीं निकलता।

गूगल मैप्स द्वारा यरूशलेम का नक्शा। यीशु की कब्र के लिए दो संभावित स्थान (दोनों ही बिना शरीर के) यरूशलेम मंदिर से ज्यादा दूर नहीं हैं, जहाँ अधिकारियों ने प्रेरितों के संदेश को रोकने का प्रयास किया

क्या शिष्यों ने शरीर को चुराया था?

तो फिर शरीर का क्या हुआ? सबसे अधिक चिंतन की गई व्याख्या यह है कि शिष्यों ने कब्र में से लाश को चुरा लिया था, और उसे कहीं छिपा दिया था और इस तरह वे दूसरों को गुमराह करने में सक्षम हो गए थे।

मान लें कि चेले ऐसा करने में सफल हो गए थे और फिर उन्होंने उनके अपने धोखे के आधार पर एक धार्मिक विश्वास को आरम्भ किया था। परन्तु प्रेरितों के काम और जोसीफुस दोनों के वृतान्तों को वापस देखने पर हम पाते है विवाद यह था कि “प्रेरित लोगों को शिक्षा दे रहे थे और यीशु के मृतकों में से पुनरुत्थान की घोषणा कर रहे थे।” यह विषय उनके लेखनकार्य में हर स्थान पर उपलब्ध है। ध्यान दें कि कैसे पौलुस, एक और प्रेरित ने, मसीह के पुनरुत्थान के महत्व को बताया है:

3 इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया।
4 ओर गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।
5 और कैफा को तब बारहों को दिखाई दिया।
6 फिर पांच सौ से अधिक भाइयों को एक साथ दिखाई दिया, जिन में से बहुतेरे अब तक वर्तमान हैं पर कितने सो गए।
7 फिर याकूब को दिखाई दिया तब सब प्रेरितों को दिखाई दिया।
8 और सब के बाद मुझ को भी दिखाई दिया, जो मानो अधूरे दिनों का जन्मा हूं।
9 क्योंकि मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूं, वरन प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं, क्योंकि मैं ने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था।
10 परन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।
11 सो चाहे मैं हूं, चाहे वे हों, हम यही प्रचार करते हैं, और इसी पर तुम ने विश्वास भी किया॥
12 सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?
13 यदि मरे हुओं का पुनरुत्थान ही नहीं, तो मसीह भी नहीं जी उठा।
14 और यदि मसीह भी नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है; और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।
15 वरन हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे; क्योंकि हम ने परमेश्वर के विषय में यह गवाही दी कि उस ने मसीह को जिला दिया यद्यपि नहीं जिलाया, यदि मरे हुए नहीं जी उठते।
16 और यदि मुर्दे नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा।
17 और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो।
18 वरन जो मसीह मे सो गए हैं, वे भी नाश हुए।
19 यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं॥

1 कुरिन्थियों 15:3-19 57 ईस्वी सन्

30 और हम भी क्यों हर घड़ी जाखिम में पड़े रहते हैं?
31 हे भाइयो, मुझे उस घमण्ड की सोंह जो हमारे मसीह यीशु में मैं तुम्हारे विषय में करता हूं, कि मैं प्रति दिन मरता हूं।
32 यदि मैं मनुष्य की रीति पर इफिसुस में वन-पशुओं से लड़ा, तो मुझे क्या लाभ हुआ? यदि मुर्दे जिलाए नहीं जाएंगे, तो आओ, खाए-पीए, क्योंकि कल तो मर ही जाएंगे।

1 कुरिन्थियों 15:30-32

आप उसके लिए क्यों मरना चाहेगें जिसे आप जानते है कि यह एक झूठ है?

स्पष्ट रूप से, शिष्यों ने अपने संदेश के केंद्र में मसीह के पुनरुत्थान को रखा। एक मिनट के लिए यह मान लें कि यह वास्तव में गलत था – कि इन शिष्यों ने वास्तव में शरीर को चुरा लिया था, इसलिए उनके संदेश के विरुद्ध-प्रमाण उन्हें उजागर नहीं कर सकते हैं। तब तो उन्होंने संसार को सफलतापूर्वक मूर्ख बनाया होगा, परन्तु वे स्वयं जानते होंगे कि वे जिस उपदेश को दे रहे थे, जिसे लिख रहे थे और जिस बड़ी उथल-पुथल को उत्पन्न कर रहे थे, वह गलत था। फिर भी उन्होंने इस मिशन के लिए अपना जीवन (सचमुच) दे दिया। वे ऐसा क्यों करेंगे – यदि उन्हें पता होता कि यह गलत था?

लोग अपने जीवन को कारणों के लिए देते हैं, क्योंकि वे उस कारण पर विश्वास करते हैं, जिसके लिए वे लड़ते हैं या क्योंकि वे उस कारण से कुछ लाभ की प्राप्त की आशा करते हैं। यदि शिष्यों ने शरीर को चुरा लिया था और इसे छिपा दिया था, तो सभी लोगों को पता होगा कि पुनरुत्थान सच नहीं था। उनके अपने शब्दों पर विचार करें कि उनके संदेश को फैलाने के लिए शिष्यों ने किस मूल्य को अदा किया। अपने आप से पूछें कि क्या आप किसी ऐसी चीज के लिए निजी रूप से इतनी अधिक कीमत चुकाएंगे, जिसे आप जानते हैं कि वह झूठी है:

8 हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरूपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते।
9 सताए तो जाते हैं; पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।

2 कुरिन्थियों 4:8-9

4 परन्तु हर बात से परमेश्वर के सेवकों की नाईं अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दिरद्रता से, संकटो से।
5 कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से।

2 कुरिन्थियों 6:4-5

24 पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए।
25 तीन बार मैं ने बेंतें खाई; एक बार पत्थरवाह किया गया; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा।
26 मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जाति वालों से जोखिमों में; अन्यजातियों से जोखिमों में; नगरों में के जाखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जाखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में;
27 परिश्रम और कष्ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-पियास में; बार बार उपवास करने में; जाड़े में; उघाड़े रहने में।

2 कुरिन्थियों 11:24-27

प्रेरितों का दृढ़ साहस

यदि आप उनके जीवन के दौरान मिलने वाले अडिग पराक्रम पर विचार करते हैं, तो यह अधिक अविश्वसनीय लगता है कि वे ईमानदारी से अपने संदेश पर विश्वास नहीं करते थे। परन्तु यदि वे विश्वास करते थे, तो वे निश्चित रूप से मसीह के शरीर को चुरा नहीं सकते थे और उसका निपटारा नहीं कर सकते थे। गरीबी, मार, कारावास, शक्तिशाली विरोध और अंत में मृत्यु दण्ड (यूहन्ना को छोड़कर सभी प्रेरितों को अंततः उनके संदेश के लिए मृत्यु दण्ड दिया किया गया) ने उन्हें अपने उद्देश्यों की समीक्षा करने के लिए दैनिक अवसर प्रदान किए होंगे। फिर भी ऐसा कोई भी प्रेरित नहीं मिलता है, जिसने यह दावा किया हो उसने यीशु को देखा था, और फिर वो उससे मुकर गया हो। वे सभी विरोधों को अदम्य साहस के साथ पूरा करते थे।

यह उनके शत्रुओं – यहूदी और रोमियों की चुप्पी के विपरीत है। इन शत्रुतापूर्ण गवाहों ने कभी भी ‘वास्तविक’ कहानी को बताने का प्रयास नहीं किया, या यह नहीं दिखाया कि शिष्य कैसे गलत थे। प्रेरितों ने सार्वजनिक मंचों और आराधनालय में अपनी गवाही को विरोधियों, शत्रुतापूर्ण जाँच-परीक्षकों के सामने प्रस्तुत किया, जिन्होंने उनकी सच्चाई को अस्वीकार कर दिया था, जबकि तथ्य अन्यथा थे।

वाटिका में खाली कब्र
वाटिका की कब्र के बाहर का स्थान

वाटिका वाली कब्र: लगभग 130 वर्ष पहले मलबे को हटाकर यीशु की कब्र को देखना संभव हुआ है

शिष्यों की अटूट निर्भीकता और शत्रुतापूर्ण अधिकारियों की चुप्पी एक शक्तिशाली सच्चाई का निर्माण करती है, कि यीशु वास्तविक इतिहास में जी उठा था। हम उसके पुनरुत्थान में अपना भरोसा रख सकते हैं।