रामायण से उत्तम एक प्रेम महाकाव्य – आप इस में भागी हो सकते हैं

जब कोई सभी महान महाकाव्यों के ऊपर ध्यान लगाता है और प्रेम कहानियों की रचना की जाती है, तो रामायण निश्चित रूप से सूची में सबसे ऊपर आती है। इस महाकाव्य के कई उत्कृष्ट पहलू मिलते हैं:

• राम और सीता के बीच प्रेम,

• सिंहासन के लिए लड़ने के स्थान पर वनवास चुनने में राम की विनम्रता,

• रावण की बुराई के विरुद्ध राम की भलाई,

• रावण की कैद में रहते हुए सीता की पवित्रता

• उसे बचाने में राम की बहादुरी।

रामायण के कई नाट्य रूपांतरणों को प्रदर्शित किया गया है

बुराई पर अच्छाई की विजय की लम्बी यात्रा के परिणामस्वरूप, जो स्वयं में अपने नायकों के चरित्र को सामने लाती है, रामायण को एक कालातीत महाकाव्य बना दिया है। इस कारण से समुदाय प्रतिवर्ष रामलीलाओं का प्रदर्शन करते हैं, जो कि विशेष रूप से विजयादशमी (दशहरा, दशैहरा  या दशैन) उत्सव के दौरान, अक्सर रामायण से प्राप्त साहित्य पर आधारित होती हैं, जैसे रामचरितमानस

हम रामायण में भागी नहीं हो सकते

रामायण की प्रमुख कमी यह है कि हम केवल इसके नाटक को पढ़, सुन या देख सकते हैं। कुछ लोग रामलीलाओं में भाग ले सकते हैं, परन्तु रामलीलाएँ वास्तविक कहानी नहीं होती हैं। यह कितना अच्छा होता कि हम वास्तव में अयोध्या के राजा दशरथ के रामायण वाले संसार में प्रवेश कर सकते और राम के साथ उनके रोमांचों के साथ चल सकते।

वह महाकाव्य जिस में हमें भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया है

यद्यपि यह हमारे लिए उपलब्ध नहीं है, परन्तु एक और महाकाव्य रामायण की बराबरी पर हमें मिलता है, जिसमें हमें प्रवेश करने के लिए आमंत्रित किया गया है। इस महाकाव्य में रामायण के साथ इतनी अधिक समानताएँ मिलती हैं कि हम रामायण को वास्तविक-जीवन के महाकाव्य को समझने के लिए एक आदर्श के रूप में उपयोग कर सकते हैं। यह महाकाव्य प्राचीन इब्रानी वेदों की रचना करता है, जिसे अक्सर बाइबल के रूप में जाना जाता है। परन्तु इस महाकाव्य को इस संसार में रचा जाता है, जिसे हम जीवन जीते हैं, जिससे हमें इसके नाटक में प्रवेश करने की अनुमति मिलती है। चूँकि यह हमारे लिए नया हो सकता है, हम इसकी कहानी, और इसमें जो भूमिका निभाते हैं, उसे रामायण की दृष्टि से देखकर समझ सकते हैं।

इब्रानी वेद: रामायण की तरह एक प्रेम महाकाव्य

रामायण का केन्द्र बिन्दु राम और सीता की प्रेम कथा है

यद्यपि कई छोटी-छोटी कहानियों के साथ मिलकर बना हुआ यह महाकाव्य, रामायण के मूल नायक राम और नायिका सीता के बीच एक प्रेम कहानी की रचना करता है। उसी तरह, यद्यपि इब्रानी वेद कई छोटी-छोटी कहानियों के साथ मिलकर एक बड़े महाकाव्य की रचना करता है, तथापि बाइबल का केन्द्रीय विचार यीशु (नायक) और इस संसार के लोगों के बीच एक प्रेम कहानी है, जो उसकी दुल्हिन बन गया, ठीक वैसे ही जैसे सीता राम की दुल्हिन बन गई थी। जैसे रामायण में सीता की भूमिका महत्वपूर्ण है, ठीक वैसे ही बाइबल की कहानी में भी हमारा हिस्सा महत्वपूर्ण है।

आरम्भ: प्रेम खो दिया गया

परन्तु आइए शुरुआत से आरम्भ करते हैं। बाइबल बताती है कि परमेश्वर ने मनुष्य को धरती की मिट्टी से ही रचा है, कुछ इस तरह से जैसे रामायण के अधिकांश मूलपाठों में मिलता है कि सीता धरती से निकल कर आई थी। परमेश्वर ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह मनुष्य से प्रेम करता था, उसके साथ एक सम्बन्ध को चाहता था। ध्यान दें कि कैसे परमेश्वर प्राचीन इब्रानी वेदों में लोगों के लिए अपनी इच्छा का वर्णन करता है

मैं उसकी धरती पर बहुतेरे बीजों को बोऊँगा।
    मैं लोरूहामा पर दया दिखाऊँगा:
मैं लोअम्मी से कहूँगा ‘तू मेरी प्रजा है’
    और वे मुझसे कहेंगे, ‘तु हमारा परमेश्वर है।’”

होशे 2:23

खलनायक द्वारा नायिका को कैद किया जाना

रावण सीता का अपहारण करते हुए उसे राम से अलग कर देता है

यद्यपि, परमेश्वर ने इस सम्बन्ध के लिए मानव जाति की रचना की थी, परन्तु एक खलनायक ने इस सम्बन्ध को नष्ट कर दिया। जैसा कि रावण ने सीता का अपहरण किया और उसे अपने राज्य लंका में कैद कर लिया, वैसे ही परमेश्वर के विरोधी, शैतान ने, जिसे अक्सर एक असुर-जैसे सर्प के रूप में चित्रित किया गया है, मानव जाति को अपनी कैद में ले गया। बाइबल उसके नियंत्रण में हमारी अवस्था को इन शब्दों में वर्णन करती है।

एक समय था जब तुम लोग उन अपराधों और पापों के कारण आध्यात्मिक रूप से मरे हुए थे जिनमें तुम पहले, संसार के बुरे रास्तों पर चलते हुए और उस आत्मा का अनुसरण करते हुए जीते थे जो इस धरती के ऊपर की आत्मिक शक्तियों का स्वामी है। वही आत्मा अब उन व्यक्तियों में काम कर रही है जो परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते। एक समय हम भी उन्हीं के बीच जीते थे और अपनी पापपूर्ण प्रकृति की भौतिक इच्छाओं को तृप्त करते हुए अपने हृदयों और पापपूर्ण प्रकृति की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए संसार के दूसरे लोगों के समान परमेश्वर के क्रोध के पात्र थे।

इफिसियों 2:1-3

आने वाले संघर्ष का निर्माण होना

जब रावण ने सीता को अपने राज्य में कैद कर लिया था, तो राम ने उसे चेतावनी दी कि वह उसे बचा लेगा और उसे नष्ट कर देगा। उसी तरह, जब शैतान पाप और मृत्यु के द्वारा हम पर पतन को ले आया, तब परमेश्वर ने मानव इतिहास की शुरुआत में ही, कि वह कैसे शैतान को स्त्री के वंश के द्वारा नष्ट कर देगा – शैतान को चेतावनी दी थी, और यही वह पहेली है, जो इन विरोधियों के साथ संघर्ष का केन्द्र बिन्दु बन गई।

परमेश्वर ने प्राचीन काल में ही इस वंश के आने की पुष्टि की:

• एक असंभव गर्भधारण का होना,

एक पुत्र को दिया जाना,

उत्पीड़न से उद्धार,

और एक शाही राजवंश की स्थापना।

इसी तरह से रामायण में रावण और राम के बीच की तनातनी दिखाई देती है:

एक असंभव गर्भधारण (दशरथ की पत्नियाँ दिव्य हस्तक्षेप के बिना गर्भ धारण नहीं कर सकती थीं),

एक पुत्र को दे दिया जाना (दशरथ को राम को वनवास में निर्वासन के लिए छोड़ देना पड़ा),

लोगों को बचाया जाना (राक्षस सुबाहु ने जंगल के मुनियों विशेषकर विश्वामित्र पर अत्याचार किया था, जब तक कि राम ने उसे नष्ट नहीं कर दिया)

एक शाही राजवंश की स्थापना (राम अंततः राजा के रूप में शासन करने में सक्षम हुए थे)।

हीरो अपने प्रेम को बचाने के लिए आता है

सुसमाचार यीशु को उस वंश के रूप में प्रकट करते हैं, जिसके लिए प्रतिज्ञा की थी कि वह कुँवारी स्त्री से जन्म लेगा। जैसे राम रावण द्वारा कैद की गई सीता को बचाने के लिए आए थे, ठीक वैसे ही मृत्यु और पाप में फंसे लोगों को बचाने के लिए यीशु धरती पर आए। यद्यपि, राम की तरह, वह आलौकिक रूप से शाही था, तथापि उसने स्वेच्छा से अपने विशेषाधिकार और शक्ति से त्याग दिया। बाइबल इसका वर्णन कुछ इस तरह से करती है

अपना चिंतन ठीक वैसा ही रखो जैसा मसीह यीशु का था।

जो अपने स्वरूप में यद्यपि साक्षात् परमेश्वर था,
    किन्तु उसने परमेश्वर के साथ अपनी इस समानता को कभी
    ऐसे महाकोष के समान नहीं समझा जिससे वह चिपका ही रहे।
बल्कि उसने तो अपना सब कुछ त्याग कर
    एक सेवक का रूप ग्रहण कर लिया और मनुष्य के समान बन गया।
और जब वह अपने बाहरी रूप में मनुष्य जैसा बन गया
    तो उसने अपने आप को नवा लिया। और इतना आज्ञाकारी बन गया कि
    अपने प्राण तक निछावर कर दिये और वह भी क्रूस पर।

फिलिप्पियों 2:5 ब-8

हार के द्वारा विजय

राम ने शारीरिक युद्ध के माध्यम से रावण को हरा दिया था

यहीं पर रामायण और बाइबल के महाकाव्य के बीच एक बड़ा अन्तर मिलता है। रामायण में, राम पराक्रम के बल पर रावण को हराते हैं। वह उसे एक वीरता भरे युद्ध में मार देते हैं।

यीशु की जीत एक दिखाई देती हुई हार के कारण हुई

यीशु के लिए जीत का रास्ता भिन्न था; यह हार के मार्ग पर से होते हुए चला। एक शारीरिक युद्ध जीतने के स्थान पर, यीशु ने शारीरिक मृत्यु को पाया, जैसा कि पहले से भविष्यद्वाणी की गई थी। उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि हमारी कैद के लिए मृत्यु को मरना आवश्यक था, इसलिए उसे मृत्यु को पराजित करना आवश्यक था। उसने ऐसा मृतकों में से जीवित होकर किया, जिसे हम ऐतिहासिक रूप से जाँच सकते हैं। हमारे लिए मर कर, उसने सचमुच में स्वयं को हमारी ओर से दे दिया। जैसा कि बाइबल यीशु के बारे में बताती है

14 उसने हमारे लिये अपने आपको दे डाला। ताकि वह सभी प्रकार की दुष्टताओं से हमें बचा सके और अपने चुने हुए लोगों के रूप में अपने लिये हमें शुद्ध कर ले—हमें, जो उत्तम कर्म करने को लालायित है।

तीतुस 2:14

प्रेमी का निमंत्रण …

रामायण में, राम और सीता रावण को हराने के बाद फिर से एक हो जाते हैं। बाइबल के महाकाव्य में, अब जबकि यीशु ने मृत्यु को हरा दिया है, वैसे ही यीशु भक्ति में प्रतिक्रिया देने के लिए आपको और मुझे उसका बनने के लिए निमंत्रण देते हैं। जो लोग इसे चुनते हैं, वह उनकी दुल्हिन हैं

25 हे पतियों, अपनी पत्नियों से प्रेम करो। वैसे ही जैसे मसीह ने कलीसिया से प्रेम किया और अपने आपको उसके लिये बलि दे दिया। 26 ताकि वह उसे प्रभु की सेवा में जल में स्नान करा के पवित्र कर हमारी घोषणा के साथ परमेश्वर को अर्पित कर दे। 27 इस प्रकार वह कलीसिया को एक ऐसी चमचमाती दुल्हन के रूप में स्वयं के लिए प्रस्तुत कर सकता है जो निष्कलंक हो, झुरियों से रहित हो या जिसमें ऐसी और कोई कमी न हो। बल्कि वह पवित्र हो और सर्वथा निर्दोष हो।

इफिसियों 5: 25-27

32 यह रहस्यपूर्ण सत्य बहुत महत्वपूर्ण है और मैं तुम्हें बताता हूँ कि यह मसीह और कलीसिया पर भी लागू होता

है।इफिसियों 5:32

सुंदर और पवित्र बनने के लिए

राम सीता से प्रेम करते हैं क्योंकि वह सुंदर है

रामायण में, राम सीता से प्यार करते है, क्योंकि वह सुंदर थी। इसके साथ ही उसके पास एक शुद्ध चरित्र था। बाइबल का महाकाव्य इस संसार में हमारे साथ खुलता है, जो कि शुद्ध नहीं हैं। परन्तु यीशु अभी भी उन लोगों से प्रेम करते हैं, जो उसकी बुलाहट का उत्तर देते हैं, इसलिए नहीं कि वे सुंदर और शुद्ध हैं,  अपितु इसलिए कि उन्हें निम्नलिखित चरित्र के साथ सुन्दर और शुद्ध बनाने के लिए,

22 जबकि पवित्र आत्मा, प्रेम, प्रसन्नता, शांति, धीरज, दयालुता, नेकी, विश्वास, 23 नम्रता और आत्म-संयम उपजाता है। ऐसी बातों के विरोध में कोई व्यवस्था का विधान नहीं है।

गलातियों 5:22-23

अग्नि परीक्षा के बाद

यीशु ने अपनी दुल्हिन को – जाँचों के माध्यम से भीतर से सुंदर बनाने के लिए प्रेम किया

यद्यपि रावण की पराजय के बाद सीता और राम फिर से एक हो गए थे, परन्तु सीता के चरित्र के ऊपर प्रश्न उठने लगे थे। कुछ लोगों ने रावण के अधीन रहते हुए उसके अशुद्ध होने का आरोप लगाया। इस कारण सीता को अपनी निर्दोषता प्रमाणित करने के लिए अग्नि परीक्षा  में से होकर जाना पड़ा। बाइबल के महाकाव्य में, पाप और मृत्यु पर अपनी जय को प्राप्त करने के बाद, यीशु अपने प्रेम की तैयारी के लिए स्वर्ग में चढ़ गया, जिसके लिए वह वापस आएगा। उससे अलग होने के दौरान, हमें परीक्षाओं या जाँचों में से भी होकर जाना पड़ता है, जिसकी तुलना बाइबल आग लग जाने से करती है; हमारी निर्दोषता को प्रमाणित करने के लिए नहीं, अपितु उससे स्वयं को शुद्ध करने के लिए जो उसके शुद्ध प्रेम को दूषित करता है। बाइबल इस कल्पना का उपयोग कुछ इस तरह से करती है

हमारे प्रभु यीशु मसीह का परम पिता परमेश्वर धन्य हो। मरे हुओं में से यीशु मसीह के पुनरुत्थान के द्वारा उसकी अपार करुणा में एक सजीव आशा पा लेने कि लिए उसने हमें नया जन्म दिया है। ताकि तुम तुम्हारे लिए स्वर्ग में सुरक्षित रूप से रखे हुए अजर-अमर दोष रहित अविनाशी उत्तराधिकार को पा लो।

जो विश्वास से सुरक्षित है, उन्हें वह उद्धार जो समय के अंतिम छोर पर प्रकट होने को है, प्राप्त हो। इस पर तुम बहुत प्रसन्न हो। यद्यपि अब तुमको थोड़े समय के लिए तरह तरह की परीक्षाओं में पड़कर दुखी होना बहुत आवश्यक है। ताकि तुम्हारा परखा हुआ विश्वास जो आग में परखे हुए सोने से भी अधिक मूल्यवान है, उसे जब यीशु मसीह प्रकट होगा तब परमेश्वर से प्रशंसा, महिमा और आदर प्राप्त हो।

यद्यपि तुमने उसे देखा नहीं है, फिर भी तुम उसे प्रेम करते हो। यद्यपि तुम अभी उसे देख नहीं पा रहे हो, किन्तु फिर भी उसमें विश्वास रखते हो और एक ऐसे आनन्द से भरे हुए हो जो अकथनीय एवं महिमामय है। और तुम अपने विश्वास के परिणामस्वरूप अपनी आत्मा का उद्धार कर रहे हो।

1 पतरस 1:3-9

एक बड़े विवाह के लिए

बाइबल का महाकाव्य एक विवाह के साथ समाप्त होता है

बाइबल घोषणा करती है कि यीशु अपने प्रेम को पाने के लिए फिर से लौट आएगा और ऐसा करने के द्वारा वह उसे अपनी दुल्हिन बना लेगा। इसलिए, जैसा कि अन्य सभी महान् महाकाव्यों में पाया जाता है, बाइबल एक विवाह के साथ समाप्त होती है। जिस कीमत को यीशु ने चुकाया है, उससे इस विवाह का मार्ग प्रशस्त हुआ है। यह विवाह आलंकारिक नहीं अपितु वास्तविक है, और उसके विवाह के निमंत्रण को स्वीकार करने वालों को वह ‘मसीह की दुल्हिन’ कहता है। जैसा कि कहा गया है:

सो आओ, खुश हो-हो कर आनन्द मनाएँ आओ, उसको महिमा देवें!
क्योंकि अब मेमने के ब्याह का समय आ गया उसकी दुल्हन सजी-धजी तैयार हो गयी।

प्रकाशितवाक्य 19:7

जो लोग यीशु के छुटकारे का प्रस्ताव को ग्रहण करते हैं, वे उसकी ‘दुल्हन’ बन जाते हैं। वह इस स्वर्गीय विवाह के लिए हम सभी को निमंत्रण देता है। बाइबल आपको और मुझे उसके विवाह में आने के निमंत्रण के साथ समाप्त होती है

17 आत्मा और दुल्हिन कहती है, “आ!” और जो इसे सुनता है, वह भी कहे, “आ!” और जो प्यासा हो वह भी आये और जो चाहे वह भी इस जीवन दायी जल के उपहार को मुक्त भाव से ग्रहण करें।

प्रकाशितवाक्य 22:17

महाकाव्य में: प्रतिउत्तर देकर प्रवेश करें

यीशु में हमारे साथ सम्बन्धों को बनाए जाने के प्रस्ताव को समझने के लिए रामायण में सीता और राम के सम्बन्धों को एक दर्पण के रूप में उपयोग किया गया है। यह परमेश्वर का स्वर्गीय रोमांस है, जो हमसे प्रेम करता है। वह अपने विवाह के प्रस्ताव को स्वीकार करने वाले सभी को दुल्हिन के रूप में स्वीकार करेगा। जैसा कि किसी भी विवाह के प्रस्ताव में होता है, यहाँ भी आपके लिए एक सक्रिय भूमिका पाई जाती है, कि इस प्रस्ताव को स्वीकार करें या न करें। इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के द्वारा आप कालातीत महाकाव्य में प्रवेश करते हैं, जो कि रामायण जैसे महाकाव्य की भव्यता का स्थान ले लेता है।

यीशु का पुनरुत्थान: मिथक या इतिहास?

पुराणों, रामायण, और महाभारत ने अंत के समय तक जीवित रहने वाले आठ प्रतिष्ठित चिरंजीवियों को अर्थात् अमर जीवों का विवरण दिया है। यदि ये मिथक ऐतिहासिक हैं, तो ये चिरंजीवी आज भी पृथ्वी पर रह रहे हैं, जोकि हजारों और वर्षों से चल रहा है।

ये चिरंजीवी निम्न हैं:

वेद व्यास, जिन्होंने महाभारत की रचना की थी, जिन्होंने त्रेता युग के अंत में जन्म लिया था।

हनुमान, ब्रह्मचारियों में से एक हनुमान ने रामायण में वर्णित राम की सेवा की थी।

परशुराम, पुरोहित-योद्धा और विष्णु का छठा अवतार, युद्ध करने में सभी तरह से कुशल।

विभीषण, रावण का भाई, जिसने राम के सामने आत्मसमर्पण किया। रावण को मारने के बाद राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया। महा युग के अंत तक उसे जीवित रहने का दीर्घायु सम्बन्धी वरदान प्राप्त है।

अश्वत्थामा, और कृपा ही कुरुक्षेत्र के युद्ध से जीवित बचे लोग हैं। अश्वत्थामा ने गैरकानूनी तरीके से कुछ लोगों को मार डाला था इसलिए कृष्ण ने उसे असाध्य घावों से ढकी हुई पृथ्वी में भटकते रहने का शाप दिया था।

महाबली, (राजा बलि चक्रवर्ती) केरल के आसपास के किसी स्थान का एक राक्षस-राजा था। वह इतना शक्तिशाली था कि देवताओं को उससे खतरा महसूस होता था। इसलिए वामन, विष्णु के बौने अवतार ने उसे धोखा दिया और उसे पाताल में भेज दिया।

कृपा, महाभारत में मिलने वाले राजकुमारों के गुरु, कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद बचे तीन कौरव में से एक थे। एक अद्भुत गुरु होने के कारण, कृष्ण ने उन्हें अमरता प्रदान की और वे आज भी जीवित हैं।

मार्कंडेय एक प्राचीन ऋषि हैं, जिसका उल्लेख महाभारत में मिलता है, जिन्हें शिव ने उनकी भक्ति के कारण अमरता प्रदान की थी।

क्या चिरंजीवी ऐतिहासिक हैं?

यद्यपि प्रेरणा देने वाले के रूप में श्रद्धेय, इतिहास में चिरंजीवियों की स्वीकृति असमर्थित है। किसी भी इतिहासकार ने उनके साथ हुए आँखों-देखी मुठभेड़ को लिपिबद्ध नहीं किया है। पौराणिक कथाओं में निर्दिष्ट कई स्थान भौगोलिक रूप से स्थित नहीं हो सकते हैं। लिखित स्रोत, जैसे महाभारत, रामायण और पुराण, को ऐतिहासिक रूप से सत्यापित करना कठिन है। उदाहरण के लिए, विद्वानों का आकलन है कि 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व में रामायण लिखी गई थी। परन्तु इसका परिदृश्य 870000 वर्षों पहले, अर्थात् त्रेता युग में पाया जाता है, जिससे इसकी घटनाओं के लिए शायद ही कोई आँखों-देखा गवाह मिले। ठीक इसी तरह महाभारत की रचना 3री ईसा पूर्व और 3री ईस्वी सन् शताब्दी के बीच किसी समय में हुई थी, जबकि संभवतः इसमें 8-9वीं शताब्दी ईसा पूर्व की घटनाओं का वर्णन मिलता है। लेखक उन घटनाओं के गवाह नहीं बने, जो उन्होंने सुनाई थीं, क्योंकि वे सैकड़ों वर्षों पहले घटित हो चुकी थीं।

यीशु के पुनरुत्थान की ऐतिहासिक रूप से जाँच की गई है।

यीशु के पुनरुत्थान और नए जीवन में आने के बाइबल के दावे के बारे में क्या कहा जाए? क्या चिरंजीवियों की तरह यीशु का पुनरुत्थान पौराणिक है, या यह ऐतिहासिक है?

यह जाँच का विषय है, क्योंकि यह सीधे हमारे जीवनों को प्रभावित करता है। हम सभी मरेंगे, चाहे हम कितना भी धन, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य लक्ष्यों को क्यों न प्राप्त कर लें। यदि यीशु ने मृत्यु को पराजित किया है तो यह हमारी स्वयं की निकट आती मृत्यु के लिए आशा देता है। यहाँ हम उसके पुनरुत्थान को समर्थन करने वाले कुछ ऐतिहासिक तथ्यों को देखते हैं।

यीशु के लिए ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

यीशु का अस्तित्व था और उसकी मृत्यु सार्वजनिक रीति से हुई थी, यह तथ्य इतिहास के समय चक्र को ही परिवर्तित कर देता है। संसारिक इतिहास यीशु और उसके दिनों में संसार पर उसके प्रभाव के कई संदर्भों को लिपिबद्ध करता है। हम दो पर अपना ध्यान लगाते हैं

टैकिटुस

रोमी गवर्नर-इतिहासकार टैकिटुस ने इतिहास को लिपिबद्ध करते समय यीशु के लिए एक आकर्षक सन्दर्भ लिखा कि कैसे रोमी सम्राट नीरो ने पहली शताब्दी के मसीह विश्वासियों (65 ईस्वी सन् में) को मार डाला था। टैकिटुस ने कुछ ऐसा लिखा है।

‘नीरो…ने जिन लोगों को सबसे कठोर यातनाओं के साथ दंडित किया, उन लोगों को आमतौर पर मसीही कहा जाता था, जिनके साथ अत्याचार घृणा के कारण किया जाता था। मसीही विश्वास के संस्थापक का नाम ख्रिस्त अर्थात् मसीह था, जिसे तिबिरियुस कैसर के शासनकाल में यहूदिया के हाकिम पुन्तियुस पिलातुस के द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था; परन्तु दबाया गया हानि से भरा हुआ अंधविश्वास, एक बार फिर से फूट पड़ा, न केवल यहूदिया से, जहाँ इस शरारत ने जन्म लिया था, अपितु रोम के शहर में भी’टैकिटुस.

वर्षक्रमिक इतिहास 15. 44. 112 ईस्वी सन्

टैकिटुस पुष्टि करता है कि यीशु:

1. एक ऐतिहासिक व्यक्ति था;

2. जिसे पुन्तियुस पिलातुस ने;

3. यहूदिया/यरुशलेम में मरवा दिया

4. 65 ईस्वी सन् तक, यीशु में विश्वास भूमध्य सागर से लेकर रोम तक इतनी अधिक सामर्थ्य के साथ फैल गया था कि रोम के सम्राट को लगा कि उसे इससे निपटना चाहिए।

ध्यान दें कि टैकिटुस इन बातों को एक शत्रुतापूर्ण गवाह के रूप में कह रहा है क्योंकि वह मानता है कि जिस आंदोलन को यीशु ने आरम्भ किया था, वह एक ‘दुष्टतापूर्ण अंधविश्वास’ था। वह इसका विरोध करता है, परन्तु वह इसकी ऐतिहासिकता से इनकार नहीं करता है।

जोसीफुस

पहली सदी का लेखक और यहूदी सैन्य अगुवा/इतिहासकार, जोसीफुस ने आरम्भ से लेकर उसके समय तक के यहूदी इतिहास को संक्षेप में प्रस्तुत किया। ऐसा करते हुए उसने इन शब्दों के साथ यीशु के समय और उसके जीवन को इस तरह प्रस्तुत किया है:

‘इस समय में एक बुद्धिमान व्यक्ति… यीशु… भला, और … गुणों से भरपूर था। और यहूदियों और दूसरे देशों के कई लोग उसके चेले बन गए। पीलातुस ने उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने और मार दिए जाने का दण्ड दिया। और जो उसके चेले बन गए थे, उन्होंने अपने चेलेपन को नहीं छोड़ा। उन्होंने बताया कि वह अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने के तीन दिन बाद उन्हें दिखाई दिया था और वह जीवित था’जोसीफुस.

90 ईस्वी सन्. पुरावशेष 18:33

जोसीफुस ने पुष्टि की कि:

1. यीशु जीवित रहा था,

2. वह एक धार्मिक शिक्षक था,

3. उसके शिष्यों ने सार्वजनिक रूप से मृतकों में से यीशु के पुनरुत्थान की घोषणा की थी।

इन ऐतिहासिक झलकियों से पता चलता है कि मसीह की मृत्यु एक प्रसिद्ध घटना थी और उसके शिष्यों ने यूनानी-रोमी संसार पर उसके पुनरुत्थान के विषय पर जोर दिया था।

जोसीफुस और टैकिटुस ने पुष्टि की कि यीशु का आंदोलन यहूदिया में आरम्भ हुआ था परन्तु शीघ्र ही रोम में पहुँच गया था

बाइबल से ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इतिहासकार लूका, आगे बताते हैं कि कैसे यह विश्वास प्राचीन संसार में विकसित हुआ। यहाँ बाइबल की पुस्तक प्रेरितों के काम में से उनके कुछ अंश दिए गए है:

ब वे लोगों से यह कह रहे थे, तो याजक और मन्दिर के सरदार और सदूकी उन पर चढ़ आए।
2 क्योंकि वे बहुत क्रोधित हुए कि वे लोगों को सिखाते थे और यीशु का उदाहरण दे देकर मरे हुओं के जी उठने का प्रचार करते थे।
3 और उन्होंने उन्हें पकड़कर दूसरे दिन तक हवालात में रखा क्योंकि सन्धया हो गई थी।
4 परन्तु वचन के सुनने वालों में से बहुतों ने विश्वास किया, और उन की गिनती पांच हजार पुरूषों के लगभग हो गई॥
5 दूसरे दिन ऐसा हुआ कि उन के सरदार और पुरिनये और शास्त्री।
6 और महायाजक हन्ना और कैफा और यूहन्ना और सिकन्दर और जितने महायाजक के घराने के थे, सब यरूशलेम में इकट्ठे हुए।
7 और उन्हें बीच में खड़ा करके पूछने लगे, कि तुम ने यह काम किस सामर्थ से और किस नाम से किया है?
8 तब पतरस ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर उन से कहा।
9 हे लोगों के सरदारों और पुरनियों, इस दुर्बल मनुष्य के साथ जो भलाई की गई है, यदि आज हम से उसके विषय में पूछ पाछ की जाती है, कि वह क्योंकर अच्छा हुआ।
10 तो तुम सब और सारे इस्त्राएली लोग जान लें कि यीशु मसीह नासरी के नाम से जिसे तुम ने क्रूस पर चढ़ाया, और परमेश्वर ने मरे हुओं में से जिलाया, यह मनुष्य तुम्हारे साम्हने भला चंगा खड़ा है।
11 यह वही पत्थर है जिसे तुम राजमिस्त्रियों ने तुच्छ जाना और वह कोने के सिरे का पत्थर हो गया।
12 और किसी दूसरे के द्वारा उद्धार नहीं; क्योंकि स्वर्ग के नीचे मनुष्यों में और कोई दूसरा नाम नहीं दिया गया, जिस के द्वारा हम उद्धार पा सकें॥
13 जब उन्होंने पतरस और यूहन्ना का हियाव देखा, ओर यह जाना कि ये अनपढ़ और साधारण मनुष्य हैं, तो अचम्भा किया; फिर उन को पहचाना, कि ये यीशु के साथ रहे हैं।
14 और उस मनुष्य को जो अच्छा हुआ था, उन के साथ खड़े देखकर, वे विरोध में कुछ न कह सके।
15 परन्तु उन्हें सभा के बाहर जाने की आज्ञा देकर, वे आपस में विचार करने लगे,
16 कि हम इन मनुष्यों के साथ क्या करें? क्योंकि यरूशलेम के सब रहने वालों पर प्रगट है, कि इन के द्वारा एक प्रसिद्ध चिन्ह दिखाया गया है; और हम उसका इन्कार नहीं कर सकते।
17 परन्तु इसलिये कि यह बात लोगों में और अधिक फैल न जाए, हम उन्हें धमकाएं, कि वे इस नाम से फिर किसी मनुष्य से बातें न

करें।प्रेरितों के काम 4:1-17 63 ईस्वी सन्

अधिकारियों की ओर से विरोध

17 तब महायाजक और उसके सब साथी जो सदूकियों के पंथ के थे, डाह से भर कर उठे।
18 और प्रेरितों को पकड़कर बन्दीगृह में बन्द कर दिया।
19 परन्तु रात को प्रभु के एक स्वर्गदूत ने बन्दीगृह के द्वार खोलकर उन्हें बाहर लाकर कहा।
20 कि जाओ, मन्दिर में खड़े होकर, इस जीवन की सब बातें लोगों को सुनाओ।
21 वे यह सुनकर भोर होते ही मन्दिर में जाकर उपदेश देने लगे: परन्तु महायाजक और उसके साथियों ने आकर महासभा को और इस्त्राएलियों के सब पुरनियों को इकट्ठे किया, और बन्दीगृह में कहला भेजा कि उन्हें लाएं।
22 परन्तु प्यादों ने वहां पहुंचकर उन्हें बन्दीगृह में न पाया, और लौटकर संदेश दिया।
23 कि हम ने बन्दीगृह को बड़ी चौकसी से बन्द किया हुआ, और पहरे वालों को बाहर द्वारों पर खड़े हुए पाया; परन्तु जब खोला, तो भीतर कोई न मिला।
24 जब मन्दिर के सरदार और महायाजकों ने ये बातें सुनीं, तो उन के विषय में भारी चिन्ता में पड़ गए कि यह क्या हुआ चाहता है?
25 इतने में किसी ने आकर उन्हें बताया, कि देखो, जिन्हें तुम ने बन्दीगृह में बन्द रखा था, वे मनुष्य मन्दिर में खड़े हुए लोगों को उपदेश दे रहे हैं।
26 तब सरदार, प्यादों के साथ जाकर, उन्हें ले आया, परन्तु बरबस नहीं, क्योंकि वे लोगों से डरते थे, कि हमें पत्थरवाह न करें।
27 उन्होंने उन्हें फिर लाकर महासभा के साम्हने खड़ा कर दिया और महायाजक ने उन से पूछा।
28 क्या हम ने तुम्हें चिताकर आज्ञा न दी थी, कि तुम इस नाम से उपदेश न करना? तौभी देखो, तुम ने सारे यरूशलेम को अपने उपदेश से भर दिया है और उस व्यक्ति का लोहू हमारी गर्दन पर लाना चाहते हो।
29 तब पतरस और, और प्रेरितों ने उत्तर दिया, कि मनुष्यों की आज्ञा से बढ़कर परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना ही कर्तव्य कर्म है।
30 हमारे बाप दादों के परमेश्वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुम ने क्रूस पर लटका कर मार डाला था।
31 उसी को परमेश्वर ने प्रभु और उद्धारक ठहराकर, अपने दाहिने हाथ से सर्वोच्च कर दिया, कि वह इस्त्राएलियों को मन फिराव की शक्ति और पापों की क्षमा प्रदान करे।
32 और हम इन बातों के गवाह हैं, और पवित्र आत्मा भी, जिसे परमेश्वर ने उन्हें दिया है, जो उस की आज्ञा मानते हैं॥
33 यह सुनकर वे जल गए, और उन्हें मार डालना चाहा।
34 परन्तु गमलीएल नाम एक फरीसी ने जो व्यवस्थापक और सब लोगों में माननीय था, न्यायालय में खड़े होकर प्रेरितों को थोड़ी देर के लिये बाहर कर देने की आज्ञा दी।
35 तब उस ने कहा, हे इस्त्राएलियों, जो कुछ इन मनुष्यों से किया चाहते हो, सोच समझ के करना।
36 क्योंकि इन दिनों से पहले यियूदास यह कहता हुआ उठा, कि मैं भी कुछ हूं; और कोई चार सौ मनुष्य उसके साथ हो लिये, परन्तु वह मारा गया; और जितने लोग उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हुए और मिट गए।
37 उसके बाद नाम लिखाई के दिनों में यहूदा गलीली उठा, और कुछ लोग अपनी ओर कर लिये: वह भी नाश हो गया, और जितने लागे उसे मानते थे, सब तित्तर बित्तर हो गए।
38 इसलिये अब मैं तुम से कहता हूं, इन मनुष्यों से दूर ही रहो और उन से कुछ काम न रखो; क्योंकि यदि यह धर्म या काम मनुष्यों की ओर से हो तब तो मिट जाएगा।
39 परन्तु यदि परमेश्वर की ओर से है, तो तुम उन्हें कदापि मिटा न सकोगे; कहीं ऐसा न हो, कि तुम परमेश्वर से भी लड़ने वाले ठहरो।
40 तब उन्होंने उस की बात मान ली; और प्रेरितों को बुलाकर पिटवाया; और यह आज्ञा देकर छोड़ दिया, कि यीशु के नाम से फिर बातें न करना।
41 वे इस बात से आनन्दित होकर महासभा के साम्हने से चले गए, कि हम उसके नाम के लिये निरादर होने के योग्य

तो ठहरे।प्रेरितों के काम 5:17-41

ये अंश इस नए विश्वास को रोकने के लिए यहूदी अगुवों द्वारा एक लम्बी सीमा तक जाने के ऊपर ध्यान देते हैं। ये आरम्भिक विवाद यरुशलेम में हुए, यह वही शहर था जहाँ कुछ सप्ताह पहले ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से यीशु को मृत्यु दण्ड दिया था।

इस ऐतिहासिक तथ्यों से हम पुनरुत्थान की जाँच इस बात को ध्यान में रखकर विकल्पों की तुलना करते हुए कर सकते हैं कि इसका क्या अर्थ है।

यीशु का शरीर और कब्र

मरे हुए मसीह की कब्र के विषय में केवल दो ही विकल्प विद्यमान हैं। या तो कब्र उस ईस्टर रविवार की सुबह खाली थी या उसमें उसका शरीर अभी भी पड़ा हुआ था। यहाँ कोई और दूसरा विकल्प नहीं मिलता है

पुनरुत्थान के संदेश का विरोध करने वाले यहूदी अगुवों ने मृत शरीर के साथ इस बात का खंडन नहीं किया है

जिस कब्र में यीशु का लाश पड़ी हुई थी, वह उस मंदिर से ज्यादा दूर नहीं था जहाँ उसके शिष्य भीड़ से चिल्ला कर कह रहे थे कि वह मृत अवस्था में से जी उठा था। यहूदी अगुवों के लिए यह आसान होना चाहिए था कि वे पुनरुत्थान के उनके संदेश को कब्र में रखे हुए मृत शरीर को दिखा कर उन्हें बदनाम कर सकते थे। इतिहास से पता चलता है कि पुनरुत्थान का संदेश (जो कि कब्र में पड़े हुए मृत शरीर के साथ अप्रमाणित हो जाता) कब्र के पास ही आरम्भ हुआ, जहाँ प्रमाण सभी के लिए आसानी से उपलब्ध था। चूँकि यहूदी अगुवों ने मृत शरीर को दिखा कर उनके संदेश का खंडन नहीं किया था, इसलिए दिखाने के लिए कब्र में कोई मृत शरीर ही नहीं था।

यरूशलेम में पुनरुत्थान के संदेश पर हजारों लोगों ने विश्वास किया

इस समय यरूशलेम में यीशु के शरीरिक पुनरुत्थान पर विश्वास करने के लिए हजारों लोग परिवर्तित हुए। यदि आप पतरस को सुनने वालों की भीड़ में से एक होते, तो यह सोचते हुए आश्चर्य करते कि क्या उसका संदेश सच था, क्या आपने कम से कम कब्र पर जाने के लिए दोपहर के भोजनावकाश के समय न निकाला होता और यह न देखा होता कि क्या वहाँ अभी भी कोई मृत शरीर पड़ा हुआ था या नहीं? यदि यीशु का मृत शरीर अभी भी कब्र में होता तो कोई भी प्रेरितों के संदेश पर विश्वास नहीं करता। परन्तु इतिहास लिपिबद्ध करता है कि उन्होंने यरूशलेम से आरम्भ करते हुए हजारों अनुयायियों को प्राप्त किया। यदि यरुशलेम में अभी भी एक लाश पड़ी हुई होती तो ऐसा होना असंभव था। कब्र में यीशु की लाश का होने मूर्खता की ओर ले जाता। इसका कोई अर्थ ही नहीं निकलता।

गूगल मैप्स द्वारा यरूशलेम का नक्शा। यीशु की कब्र के लिए दो संभावित स्थान (दोनों ही बिना शरीर के) यरूशलेम मंदिर से ज्यादा दूर नहीं हैं, जहाँ अधिकारियों ने प्रेरितों के संदेश को रोकने का प्रयास किया

क्या शिष्यों ने शरीर को चुराया था?

तो फिर शरीर का क्या हुआ? सबसे अधिक चिंतन की गई व्याख्या यह है कि शिष्यों ने कब्र में से लाश को चुरा लिया था, और उसे कहीं छिपा दिया था और इस तरह वे दूसरों को गुमराह करने में सक्षम हो गए थे।

मान लें कि चेले ऐसा करने में सफल हो गए थे और फिर उन्होंने उनके अपने धोखे के आधार पर एक धार्मिक विश्वास को आरम्भ किया था। परन्तु प्रेरितों के काम और जोसीफुस दोनों के वृतान्तों को वापस देखने पर हम पाते है विवाद यह था कि “प्रेरित लोगों को शिक्षा दे रहे थे और यीशु के मृतकों में से पुनरुत्थान की घोषणा कर रहे थे।” यह विषय उनके लेखनकार्य में हर स्थान पर उपलब्ध है। ध्यान दें कि कैसे पौलुस, एक और प्रेरित ने, मसीह के पुनरुत्थान के महत्व को बताया है:

3 इसी कारण मैं ने सब से पहिले तुम्हें वही बात पहुंचा दी, जो मुझे पहुंची थी, कि पवित्र शास्त्र के वचन के अनुसार यीशु मसीह हमारे पापों के लिये मर गया।
4 ओर गाड़ा गया; और पवित्र शास्त्र के अनुसार तीसरे दिन जी भी उठा।
5 और कैफा को तब बारहों को दिखाई दिया।
6 फिर पांच सौ से अधिक भाइयों को एक साथ दिखाई दिया, जिन में से बहुतेरे अब तक वर्तमान हैं पर कितने सो गए।
7 फिर याकूब को दिखाई दिया तब सब प्रेरितों को दिखाई दिया।
8 और सब के बाद मुझ को भी दिखाई दिया, जो मानो अधूरे दिनों का जन्मा हूं।
9 क्योंकि मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूं, वरन प्रेरित कहलाने के योग्य भी नहीं, क्योंकि मैं ने परमेश्वर की कलीसिया को सताया था।
10 परन्तु मैं जो कुछ भी हूं, परमेश्वर के अनुग्रह से हूं: और उसका अनुग्रह जो मुझ पर हुआ, वह व्यर्थ नहीं हुआ परन्तु मैं ने उन सब से बढ़कर परिश्रम भी किया: तौभी यह मेरी ओर से नहीं हुआ परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह से जो मुझ पर था।
11 सो चाहे मैं हूं, चाहे वे हों, हम यही प्रचार करते हैं, और इसी पर तुम ने विश्वास भी किया॥
12 सो जब कि मसीह का यह प्रचार किया जाता है, कि वह मरे हुओं में से जी उठा, तो तुम में से कितने क्योंकर कहते हैं, कि मरे हुओं का पुनरुत्थान है ही नहीं?
13 यदि मरे हुओं का पुनरुत्थान ही नहीं, तो मसीह भी नहीं जी उठा।
14 और यदि मसीह भी नहीं जी उठा, तो हमारा प्रचार करना भी व्यर्थ है; और तुम्हारा विश्वास भी व्यर्थ है।
15 वरन हम परमेश्वर के झूठे गवाह ठहरे; क्योंकि हम ने परमेश्वर के विषय में यह गवाही दी कि उस ने मसीह को जिला दिया यद्यपि नहीं जिलाया, यदि मरे हुए नहीं जी उठते।
16 और यदि मुर्दे नहीं जी उठते, तो मसीह भी नहीं जी उठा।
17 और यदि मसीह नहीं जी उठा, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ है; और तुम अब तक अपने पापों में फंसे हो।
18 वरन जो मसीह मे सो गए हैं, वे भी नाश हुए।
19 यदि हम केवल इसी जीवन में मसीह से आशा रखते हैं तो हम सब मनुष्यों से अधिक अभागे हैं॥

1 कुरिन्थियों 15:3-19 57 ईस्वी सन्

30 और हम भी क्यों हर घड़ी जाखिम में पड़े रहते हैं?
31 हे भाइयो, मुझे उस घमण्ड की सोंह जो हमारे मसीह यीशु में मैं तुम्हारे विषय में करता हूं, कि मैं प्रति दिन मरता हूं।
32 यदि मैं मनुष्य की रीति पर इफिसुस में वन-पशुओं से लड़ा, तो मुझे क्या लाभ हुआ? यदि मुर्दे जिलाए नहीं जाएंगे, तो आओ, खाए-पीए, क्योंकि कल तो मर ही जाएंगे।

1 कुरिन्थियों 15:30-32

आप उसके लिए क्यों मरना चाहेगें जिसे आप जानते है कि यह एक झूठ है?

स्पष्ट रूप से, शिष्यों ने अपने संदेश के केंद्र में मसीह के पुनरुत्थान को रखा। एक मिनट के लिए यह मान लें कि यह वास्तव में गलत था – कि इन शिष्यों ने वास्तव में शरीर को चुरा लिया था, इसलिए उनके संदेश के विरुद्ध-प्रमाण उन्हें उजागर नहीं कर सकते हैं। तब तो उन्होंने संसार को सफलतापूर्वक मूर्ख बनाया होगा, परन्तु वे स्वयं जानते होंगे कि वे जिस उपदेश को दे रहे थे, जिसे लिख रहे थे और जिस बड़ी उथल-पुथल को उत्पन्न कर रहे थे, वह गलत था। फिर भी उन्होंने इस मिशन के लिए अपना जीवन (सचमुच) दे दिया। वे ऐसा क्यों करेंगे – यदि उन्हें पता होता कि यह गलत था?

लोग अपने जीवन को कारणों के लिए देते हैं, क्योंकि वे उस कारण पर विश्वास करते हैं, जिसके लिए वे लड़ते हैं या क्योंकि वे उस कारण से कुछ लाभ की प्राप्त की आशा करते हैं। यदि शिष्यों ने शरीर को चुरा लिया था और इसे छिपा दिया था, तो सभी लोगों को पता होगा कि पुनरुत्थान सच नहीं था। उनके अपने शब्दों पर विचार करें कि उनके संदेश को फैलाने के लिए शिष्यों ने किस मूल्य को अदा किया। अपने आप से पूछें कि क्या आप किसी ऐसी चीज के लिए निजी रूप से इतनी अधिक कीमत चुकाएंगे, जिसे आप जानते हैं कि वह झूठी है:

8 हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरूपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते।
9 सताए तो जाते हैं; पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते।

2 कुरिन्थियों 4:8-9

4 परन्तु हर बात से परमेश्वर के सेवकों की नाईं अपने सद्गुणों को प्रगट करते हैं, बड़े धैर्य से, क्लेशों से, दिरद्रता से, संकटो से।
5 कोड़े खाने से, कैद होने से, हुल्लड़ों से, परिश्रम से, जागते रहने से, उपवास करने से।

2 कुरिन्थियों 6:4-5

24 पांच बार मैं ने यहूदियों के हाथ से उन्तालीस उन्तालीस कोड़े खाए।
25 तीन बार मैं ने बेंतें खाई; एक बार पत्थरवाह किया गया; तीन बार जहाज जिन पर मैं चढ़ा था, टूट गए; एक रात दिन मैं ने समुद्र में काटा।
26 मैं बार बार यात्राओं में; नदियों के जोखिमों में; डाकुओं के जोखिमों में; अपने जाति वालों से जोखिमों में; अन्यजातियों से जोखिमों में; नगरों में के जाखिमों में; जंगल के जोखिमों में; समुद्र के जाखिमों में; झूठे भाइयों के बीच जोखिमों में;
27 परिश्रम और कष्ट में; बार बार जागते रहने में; भूख-पियास में; बार बार उपवास करने में; जाड़े में; उघाड़े रहने में।

2 कुरिन्थियों 11:24-27

प्रेरितों का दृढ़ साहस

यदि आप उनके जीवन के दौरान मिलने वाले अडिग पराक्रम पर विचार करते हैं, तो यह अधिक अविश्वसनीय लगता है कि वे ईमानदारी से अपने संदेश पर विश्वास नहीं करते थे। परन्तु यदि वे विश्वास करते थे, तो वे निश्चित रूप से मसीह के शरीर को चुरा नहीं सकते थे और उसका निपटारा नहीं कर सकते थे। गरीबी, मार, कारावास, शक्तिशाली विरोध और अंत में मृत्यु दण्ड (यूहन्ना को छोड़कर सभी प्रेरितों को अंततः उनके संदेश के लिए मृत्यु दण्ड दिया किया गया) ने उन्हें अपने उद्देश्यों की समीक्षा करने के लिए दैनिक अवसर प्रदान किए होंगे। फिर भी ऐसा कोई भी प्रेरित नहीं मिलता है, जिसने यह दावा किया हो उसने यीशु को देखा था, और फिर वो उससे मुकर गया हो। वे सभी विरोधों को अदम्य साहस के साथ पूरा करते थे।

यह उनके शत्रुओं – यहूदी और रोमियों की चुप्पी के विपरीत है। इन शत्रुतापूर्ण गवाहों ने कभी भी ‘वास्तविक’ कहानी को बताने का प्रयास नहीं किया, या यह नहीं दिखाया कि शिष्य कैसे गलत थे। प्रेरितों ने सार्वजनिक मंचों और आराधनालय में अपनी गवाही को विरोधियों, शत्रुतापूर्ण जाँच-परीक्षकों के सामने प्रस्तुत किया, जिन्होंने उनकी सच्चाई को अस्वीकार कर दिया था, जबकि तथ्य अन्यथा थे।

वाटिका में खाली कब्र
वाटिका की कब्र के बाहर का स्थान

वाटिका वाली कब्र: लगभग 130 वर्ष पहले मलबे को हटाकर यीशु की कब्र को देखना संभव हुआ है

शिष्यों की अटूट निर्भीकता और शत्रुतापूर्ण अधिकारियों की चुप्पी एक शक्तिशाली सच्चाई का निर्माण करती है, कि यीशु वास्तविक इतिहास में जी उठा था। हम उसके पुनरुत्थान में अपना भरोसा रख सकते हैं।

भक्ति का अभ्यास कैसे करें?

शब्द भक्ति  (Bhakti) का अर्थ संस्कृत में “लगाव, भागीदारी, किसी के लिए स्नेह होना, श्रद्धा, प्रेम, उपासना, पूजा” इत्यादि है। यह एक उपासक द्वारा परमेश्वर के लिए एक अटूट उपासना और प्रेम को संदर्भित करता है। इस प्रकार, भक्ति को उपासक और इष्ट देव के बीच एक संबंध की आवश्यकता होती है। भक्ति  का अभ्यास करने वाले को भक्त कहा जाता है। भक्त अक्सर अपनी भक्ति को विष्णु (वैष्णववाद), शिव (शैववाद), या देवी (शक्तिवाद) को निर्देशित करते हैं। यद्यपि कुछ भक्त भक्ति के लिए अन्य देवताओं का चयन करते हैं (उदाहरण के लिए कृष्ण)।

भक्ति का अभ्यास करने के लिए प्रेम और उपासना की आवश्यकता होती है, जो भावना और बुद्धि दोनों को आपस में जोड़ती है। भक्ति परमेश्वर के लिए एक अनुष्ठान मात्र भक्ति नहीं होती है, अपितु एक ऐसे मार्ग में भागीदारी है, जिसमें व्यवहार, नैतिकता और आध्यात्मिकता शामिल है। इसमें अन्य बातों के अतिरिक्त, मन की अवस्था को शुद्ध करना, ईश्वर को जानना, ईश्वर में भाग लेना और ईश्वर को आंतरिक बनाना शामिल है। भक्त  जिस आध्यात्मिक मार्ग को अपनाते हैं, उसे भक्ति मार्ग  कहते हैं। बहुत सा काव्य साहित्य और कई भजन परमेश्वर की भक्ति को व्यक्त करते हुए वर्षों से लिखे जाते रहें और गाए गए हैं।

ईश्वर की ओर से भक्ति?

यद्यपि भक्तों  ने विभिन्न इष्ट देवों की उपासना के  लिए कई भक्ति गीत और कविताएँ लिखी हैं, तथापि लुप्त प्राय: हो चुके कुछ देवों ने ही भक्ति गीत और कविताएँ मनुष्यों को लिखी हैं। भक्ति के जिन नमूनों को पौराणिक कथाएँ प्रस्तुत करती हैं, वे नाशवान मनुष्य के लिए ईश्वर की ओर आने वाली भक्ति से आरम्भ नहीं होती हैं। प्रभु राम के प्रति हनुमान की भावना एक नौकर (दास्य भाव) की तरह है; कृष्ण के प्रति अर्जुन और वृंदावन के चरवाहों का भाव मित्र (सखा भाव) वाला है; कृष्ण के प्रति राधा का प्रेम (माधुर्य भाव) है; और यशोदा, बचपन में कृष्ण की देखरेख करने वाली माता का भाव स्नेह (वात्सल्य भाव) भरा है।

राम के प्रति हनुमान की उपासना अक्सर भक्ति के उदाहरण के रूप में दी जाती है

तौभी इन उदाहरणों में से कोई भी मनुष्य के लिए ईश्वर की ओर से दी गई भक्ति के साथ शुरू नहीं होता है। मनुष्य के लिए ईश्वर की ओर से दी गई भक्ति इतनी अधिक दुर्लभ है कि हम कभी भी इसके विषय में नहीं सोचते कि ऐसा क्यों है। यदि हम एक ऐसे परमेश्वर की भक्ति करते हैं जो हमारी भक्ति का प्रतिउत्तर दे सकता है, तब तो इस ईश्वर को हमारी ओर से भक्ति आरम्भ करने की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर स्वयं ही उसे आरम्भ कर सकता है।

यह भक्ति के विषय को इस तरह से देखना हुआ, मनुष्य से परमेश्वर के स्थान पर परमेश्वर से मनुष्य तक, जिसे हम समझ सकते हैं कि हमें स्वयं कैसे भक्ति का अभ्यास करना चाहिए ।

इब्रानी गीता और ईश्वरीय भक्ति

इब्रानी वेदों में मनुष्य से लेकर ईश्वर तक की तुलना में ईश्वर से लेकर मनुष्य तक की कविताएँ और भजन पाए जाते हैं। इस संग्रह को भजन संहिता  कहा जाता है, जो कि इब्रानी गीता है। यद्यपि इसे लोगों द्वारा लिखा गया, तथापि इसके लेखकों ने दावा किया कि परमेश्वर ने उनकी रचनाओं को प्रेरित किया था, और इस प्रकार यह परमेश्वर की है। परन्तु यदि यह सच है, तो हम इसे कैसे जान सकते हैं? हम यह जान सकते हैं, क्योंकि उन्होंने वास्तविक मानवीय इतिहास को पहले से ही देख लिया और इसके लिए भविष्यद्वाणी की और हम भविष्यद्वाणियों की जाँच कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए भजन 22 को लें। इब्रानी राजा दाऊद ने इसे 1000 ई.पू. लिखा था (उसने साथ ही आने वाले ‘मसीह’ को पूर्व में ही देख लिया था)। यह किसी ऐसे व्यक्ति की स्तुति का गान है, जिसके हाथों और पैरों को यातना देते हुए ‘छेदा’ गया है, फिर उसे ‘मारकर मिट्टी में मिला’ दिया गया है, परन्तु बाद में ‘पृथ्वी के सब दूर-दूर देशों के लोगों’ के लिए भव्य विजय को प्राप्त किया। ​​ प्रश्न यह है कि यह कौन है?

और क्यों?

इसका उत्तर हमें भक्ति को सर्वोत्तम रीति से समझने में मदद करता है।

परमेश्वर की भक्ति भरी उपासना के पूर्वविचार का प्रमाण भजन 22 द्वारा प्रमाणित किया गया है

आप पूरे भजन 22 को यहाँ पढ़ सकते हैं। नीचे दी गई तालिका में, समानताओं का खुलासा करने के लिए रंगों-से-मिलान करते हुए, सुसमाचार में लिपिबिद्ध यीशु के क्रूसीकरण के वर्णन को भजन 22 में समान्तर दिखाया गया है।

इसके अतिरिक्त, यूहन्ना का सुसमाचार यह बताता है कि लहू और पानी तब बहते हैं, जब वे यीशु की पसली में एक भाला छेदते हैं, जो हृदय के चारों ओर तरल के इक्ट्ठे हो जाने संकेत देता है। इस तरह यीशु की मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई, जो कि भजन संहिता 22 के वर्णन मैं जल के समान बह गया  से मेल खाता है। इब्रानी शब्द ‘छेदने’ का शाब्दिक अर्थ शेर की तरह  से है। दूसरे शब्दों में, सैनिकों ने उसके हाथों और पैरों को ठीक वैसे ही काटा था, जैसे एक शेर अपने शिकार के साथ करता है, जब उन्होंने उसे छेदा था।

भजन संहिता 22 और यीशु की भक्ति

इसके साथ ही, भजन संहिता 22 उपरोक्त तालिका में दिए हुए वचन 18 पर ही समाप्त नहीं होता है। यह चलती रहती है। अन्त में दिए हुए – एक व्यक्ति के मर चुकने के पश्चात् के विजयी पड़ाव पर ध्यान दें!

26 नम्र लोग भोजन करके तृप्त होंगे; जो यहोवा के खोजी हैं, वे उसकी स्तुति करेंगे – तुम्हारे प्राण सर्वदा जीवित रहें!

27 पृथ्वी के सब दूर-दूर देशों के लोग उसको स्मरण करेंगे और उसकी ओर फिरेंगे; और जाति जाति के सब कुल तेरे सामने दण्डवत करेंगे।

28 क्योंकि राज्य यहोवा ही का है, और सब जातियों पर वही प्रभुता करता है।

29 पृथ्वी के सब हृष्टपुष्ट लोग भोजन करके दण्डवत करेंगे; वे सब जितने मिट्टी में मिल जाते हैं और अपना अपना प्राण नहीं बचा सकते – वे सब उसी के सामने घुटने टेकेंगे।

30 एक वंश उसकी सेवा करेगा; दूसरी पीढ़ी से प्रभु का वर्णन किया जाएगा।

31 वे आएँगे और उसके धर्म के कामों की एक वंश पर जो उत्पन्न होगा – यह कहकर प्रगट करेंगे कि उसने ऐसे ऐसे अद्भुत काम किए

भजन संहिता 22:26-31

यह इस व्यक्ति की मृत्यु की घटनाओं के विवरण के बारे में बात नहीं कर रहा है। उन विवरणों को भजन संहिता के आरम्भ में अध्ययन कर लिया गया है। भजनकार अब उस व्यक्ति की मृत्यु की विरासत में आने वाली  सन्तानऔर भविष्य की पीढ़ियों‘ (वचन 30) को सम्बोधित कर रहा है।

वर्तमान में रहने वाले आप और मेरे लिए पूर्व-विचार

यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने के 2000 वर्षों पश्चात् हम जीवित हैं। भजनकार हमें बताता है कि वंश या ‘सन्तान‘ जो इस ‘छिदे हुए‘ व्यक्ति का अनुसरण करती है, जिसने इस तरह की एक भयानक मृत्यु को प्राप्त किया, उसकी ‘सेवा‘ करेगी और ‘उसके बारे में बताएगी‘। वचन 27 इस प्रभाव की भौगोलिक सीमा की भविष्यद्वाणी करता है – ‘पृथ्वी के सब दूर-दूर के देश‘ और ‘जाति-जाति के सब कुल‘ उन्हें ‘यहोवा की ओर मुड़ने‘ के लिए प्रेरित करते हैं। वचन 29 भविष्यद्वाणी करता है कि ‘जो अपना प्राण नहीं बचा सकते हैं‘ (क्योंकि हम मरणशील प्राणी हैं, जिसका अर्थ हम सभी से है) एक दिन उसके सामने घुटने टेकेंगे। इस व्यक्ति की धार्मिकता उन लोगों के लिए घोषित की जाएगी जो उनकी मृत्यु के समय जीवित नहीं थे (‘जिनका अभी जन्म नहीं हुआ है‘)।

भजन संहिता 22 के निष्कर्ष के साथ इसका कोई लेना-देना नहीं है कि सुसमाचार के वृतान्त ने इससे उधार लिया गया है या क्रूस पर चढ़ाए जाने की घटनाओं को निर्मित किया गया है, क्योंकि यह अब बहुत बाद में आने वाले युग के साथ कार्य कर रहा है – अर्थात् हमारे समय के साथ। पहली शताब्दी में रहने वाले सुसमाचार लेखक यीशु की मृत्यु के समय को हमारे समय तक के लिए प्रभावित नहीं ‘कर सकते’ हैं। उन्हें नहीं पता था कि इसका क्या प्रभाव क्या होगा।

एक व्यक्ति भजन संहिता 22 की तुलना में यीशु की विरासत की इससे अच्छी भविष्यद्वाणी नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि वार्षिक विश्वव्यापी गुड फ्राइडे समारोहों को ध्यान में रखते हुए भी उनकी मृत्यु के दो हजार वर्षों के पश्चात् भी उसके वैश्विक प्रभाव का स्मरण आता है। यह भजन संहिता 22 के निष्कर्ष को पूरा करते हैं, ठीक उतना ही सटीकता के साथ जितना कि उसकी मृत्यु के विवरण के लिए आरम्भिक भविष्यद्वाणी में कहा गया था।

विश्व के इतिहास में और कौन ऐसा दावा कर सकता है कि उसकी मृत्यु के विवरण के साथ-साथ दूर के भविष्य में उसके जीवन की विरासत की 1000 वर्षों पहले भविष्यद्वाणी कर दी जाएगी?

आपके लिए पृथ्वी के सब दूर-दूर देशों के लोगों में परमेश्वर की ओर से दी गई भक्ति

जैसा कि कहा गया है, भक्ति, न केवल भावना को समाहित करती है, अपितु भक्ति में इष्ट के प्रति एक व्यक्ति अर्थात् भक्त  की उपासना के लिए पूर्ण भागीदारी होती है। यदि परमेश्वर ने अत्याधिक सावधानी से अपने पुत्र यीशु के बलिदान की योजना बनाई है कि उसने 1000 वर्षों पहले से ही भजनों में इसके विवरणों को प्रेरित किया, तो उसने भावनात्मक प्रतिक्रिया में नहीं, अपितु गहन पूर्व-सोच, योजना और मंशा के साथ काम किया है। परमेश्वर ने इस कार्य में पूरी तरह से भाग लिया, और उसने इसे आपके और मेरे लिए किया है।

क्यों?

ईश्वरीय भक्ति में, हमारे लिए उसकी उपासना के कारण, परमेश्वर ने यीशु को भेजा, जिसकी योजना उसने इतिहास के आरम्भ में ही हमें अनन्त जीवन देने के लिए पूरे विस्तार के साथ बनाई। वह यह जीवन हमें उपहार के रूप में देता है।

इस पर विचार करते हुए ऋषि पौलुस ने ऐसे लिखा है

क्रूस पर यीशु का बलिदान हमारे लिए परमेश्वर की भक्ति थी

6क्योंकि जब हम निर्बल ही थे, तो मसीह ठीक समय पर भक्‍तिहीनों के लिये मरा। 7किसी धर्मी जन के लिये कोई मरे, यह तो दुर्लभ है; परन्तु हो सकता है किसी भले मनुष्य के लिये कोई मरने का भी साहस करे। 8परन्तु परमेश्‍वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा।

रोमियों 5:6-8

ऋषि यूहन्ना ने इसमें ऐसे जोड़ा है:

16 क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

यूहन्ना 3:16

हमारी प्रतिक्रिया – भक्ति

इसलिए परमेश्वर कैसे चाहता है कि हम उसके प्रेम, उसकी भक्ति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया दें? बाइबल कहती है

हम इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि पहले उसने हम से प्रेम किया।

1 यूहन्ना 4:19

तथा

कि वे परमेश्वर को ढूँढ़े, और शायद वे उसके पास पहुँच सके, और वास्तव में, वह हम में से किसी से दूर नहीं हैं।

प्रेरितों 17:27

परमेश्वर चाहता है कि हम उसके पास वापस चले जाएँ, उसके उपहार को प्राप्त करें और उसे प्रेम में भरते हुए उत्तर दें। भक्ति से भरे एक सम्बन्ध की शुरुआत करते हुए, उससे प्रेम करना सीखें। चूँकि उसने भक्ति स्थापित करने के लिए पहला कदम रखा, ऐसा कदम जिसमें उसने एक बड़ी कीमत को चुकाया, जिसमें बहुत अधिक पूर्व-सोच शामिल थी, क्या यह आपके और मेरे लिए उसके भक्त  के रूप में प्रतिक्रिया देने के लिए पर्याप्त नहीं है?

येशूच्या नृत्य, कृष्ण आणि कालिया, कृष्ण नृत्य, तांडव नृत्य कसे होते हे येशूच्या भविष्यवाणीची पूर्णता

नृत्य क्या है? नाट्य नृत्य में लयबद्ध शारीरिक हलचलों का समावेश होता है, जो दर्शकों को दिखाए जाने और एक कहानी को बताने के लिए होती हैं। नर्तक अपने स्वयं के शरीर के विभिन्न अंगों का उपयोग करते हुए, अन्य नर्तकियों के साथ अपनी शारीरिक हलचलों का समन्वय करते हैं, ताकि उनकी शरीरिक हलचलें समय के अंतराल में दोहराते हुए दृश्य सौंदर्य और उच्चारण ताल को उत्पन्न करें, जिसे मीटर  या नृत्य को नापने का पैमाना कहा जाता है।

नृत्य विद्या पर लिखा हुआ शास्त्रीय लेखनकार्य, नाट्य शास्त्र सिखाता है कि मनोरंजन नृत्य से होने वाला एक प्रभाव-मात्र ही होना चाहिए न कि इसका प्राथमिक लक्ष्य। संगीत और नृत्य का लक्ष्य रास  अर्थात् परम आनन्द की प्राप्ति है, जो दर्शकों को गहरी वास्तविकता में पहुँचा देता है, जहाँ आश्चर्य में भरकर वे आध्यात्मिक और नैतिक प्रश्नों पर विचार करते हैं।

शिव के तांडव का नटराज

दैत्य को कुचलते हुए शिव का दाहिने पैर

इस तरह से दिव्य नृत्य कैसा दिखाई देता है? तांडव (तांडवम, तांडव नाट्यम्  या नादंत) देवताओं के नृत्य से जुड़ा हुआ है। आनंद तांडव आनन्द से भरे हुए नृत्य को प्रगट करता है, जबकि रुद्र तांडव क्रोध से भरे हुए नृत्य को प्रगट करता है। नटराज दिव्य नृत्य का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें शिव अपनी परिचित मुद्रा (हाथों और पैरों को नृत्य अवस्था में दिखाते हुए) में नृत्य के स्वामी के रूप में प्रदर्शित होते हैं। उनका दाहिना पैर दैत्य अपस्मार या मुयालका को रौंद रहा है। यद्यपि, उंगलियां बाएँ  पैर की ओर संकेत करती हैं, जो भूमि से ऊँची उठा हुआ है।

शिव के शास्त्रीय नृत्य का नटराज चित्र

वह इसकी ओर संकेत क्यों करता है?

क्योंकि वह उठा हुआ पैर, गुरुत्वाकर्षण की उपेक्षा करते हुए मुक्ति, मोक्ष  का प्रतीक है। जैसा कि तमिल लेख उन्माई उलखाम  व्याख्या करता है:

“सृष्टि गोलक से उत्पन्न होता है; आशा के हाथ से सुरक्षा आती है; आग से विनाश आता है; मुयालका दैत्य पर रखे हुए पैर से बुराई का नाश होता है; ऊँचा उठा हुआ पैर मुक्ती को प्रदान करता है….।”

कृष्ण दैत्य-नाग कालिया के सिर पर नाचते हैं

कालिया नाग पर नृत्य करते हुए कृष्ण

एक और दिव्य शास्त्रीय नृत्य कृष्ण का कालिया नृत्य है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, कालिया यमुना नदी में रहता था, वहाँ की लोगों को डराता था और पूरे देश में अपना जहर फैलाता था।

जब कृष्णा नदी में कूदे तो कालिया ने उन्हें पकड़ लिया। तब कालिया ने कृष्ण को अपने कुंडली में जकड़े हुए डंक मार दिया, जिससे दर्शकों को चिंता हुई। कृष्ण ने ऐसा होने दिया था, परन्तु लोगों की चिंता को देखते हुए उन्हें आश्वस्त करने का निर्णय किया। इस प्रकार, कृष्ण ने नाग के फनों के ऊपर छलांग लगाते हुए, अपने प्रसिद्ध नृत्य को आरम्भ किया, जो भगवान् की लीला (दिव्य नाटक) का प्रतीक था, जिसे “आराभती” नृत्य कहा जाता था। लयबद्ध होते हुए, कृष्ण ने कालिया के उठ हुए फनों में से प्रत्येक के ऊपर नृत्य करते हुए उसे पराजित कर दिया।

क्रूस – सर्प अर्थात् नाग के सिर पर एक लयबद्ध नृत्य

सुसमाचार घोषणा करते हैं कि यीशु के क्रूसीकरण और पुनरुत्थान ने इसी तरह से नाग को हरा दिया था। यह आनन्द वाला तांडव और रुद्र वाला तांडव दोनों ही था, इस नृत्य ने परमेश्वर में आनन्द और क्रोध दोनों को उत्पन्न कर दिया था। हम मानवीय इतिहास के आरम्भ में ही देखते हैं, कि जब पहले मनु, आदम ने नाग के आगे घुटने टेक दिए थे। परमेश्वर (विवरण यहाँ है) ने नाग से कहा था

15 और मैं तेरे और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करुंगा, वह तेरे सिर को कुचल डालेगा, और तू उसकी एड़ी को डसेगा।

उत्पत्ति 3:15
स्त्री का वंश नाग के सिर को कुचल देगा

इसलिए इस नाटक में नाग और बीज या स्त्री के वंश के बीच में होने वाले संघर्ष को बताया गया है। यह बीज या वंश यीशु था और उनका संघर्ष का चरमोत्कर्ष क्रूस के ऊपर मिलता है। जैसा कि कृष्ण ने कालिया को डंक मारने की अनुमति दी थी, वैसे ही यीशु ने नाग अर्थात् सर्प को उसे मारने की अनुमति दी, क्योंकि उसे अन्त में अपनी जीत का भरोसा था। जैसे कि मोक्ष की ओर संकेत करते हुए शिव ने अपस्मार पर आक्रमण किया, ठीक वैसे ही यीशु ने नाग को अपने पैर से कुचल डाला और जीवन के मार्ग को प्रशस्त किया।बाइबल उसकी विजय और हमारे लिए जीवन के मार्ग की कुछ इस तरह से व्याख्या करती है:

13 हम तुम्हें और कुछ नहीं लिखते, केवल वह जो तुम पढ़ते या मानते भी हो, और मुझे आशा है, कि अन्त तक भी मानते रहोगे।

14 जैसा तुम में से कितनों ने मान लिया है, कि हम तुम्हारे घमण्ड का कारण है; वैसे तुम भी प्रभु यीशु के दिन हमारे लिये घमण्ड का कारण ठहरोगे॥

15 और इस भरोसे से मैं चाहता था कि पहिले तुम्हारे पास आऊं; कि तुम्हें एक और दान मिले।

कुलुस्सियों 2:13-15

उनका संघर्ष ‘सात’और ‘तीन’ के लयबद्ध नृत्य में सामने आया, जिसे सृष्टि रचना के माध्यम से यीशु के अंतिम सप्ताह में देखा जाता है।

इब्रानी वेदों के आरम्भ में ही परमेश्वर का पूर्वज्ञान प्रकाशित हो जाता है

सभी पवित्र पुस्तकें (संस्कृत और इब्रानी वेद, सुसमाचार) में केवल दो सप्ताह ही ऐसे पाए जाते हैं, जिसमें सप्ताह के प्रत्येक दिन की घटनाओं को बताया जाता है। इस तरह का पहला सप्ताह, इब्रानी वेदों के आरम्भ में लिपिबद्ध किया गया था जिसमें बताया गया है कि कैसे परमेश्वर ने सभी वस्तुओं की रचना की।

लिपिबद्ध की गई दैनिक घटनाओं के साथ अन्य सप्ताह यीशु का अंतिम सप्ताह है। किसी भी अन्य ऋषि, मुनि या पैगंबर के विषय में दैनिक गतिविधियों से संबंधित हमें एक पूरा सप्ताह नहीं मिलता है। इब्रानी वेदों में दिए हुए सृष्टि रचना संबंधित विवरण को यहाँ दिया गया है। हम पिछले सप्ताह यीशु की दैनिक घटनाओं से गुजरे थे और यहाँ नीचे तालिका में इन दो सप्ताहों में से प्रत्येक दिन की घटनाओं को एक-दूसरे के साथ चलता हुआ दिखाया गया है। शुभ अंक ‘सात’, जो एक सप्ताह को निर्माण करता है, इस प्रकार आधार मीटर या समय है, जिसे सृष्टिकर्ता ने अपनी लय पर आधारित किया है।

सप्ताह के दिनसृष्टि का सप्ताहयीशु का अन्तिम सप्ताह
दिन 1अंधेरे से घिरे हुआ परमेश्वर कहता है, उजियाला हो और अंधेरे में प्रकाश हो गयायीशु कहता है कि, “मैं जगत में ज्योति होकर आया हूँ…” अंधेरे में प्रकाश है
दिन 2परमेश्वर पृथ्वी को आकाश से अलग करता हैयीशु प्रार्थना के स्थान के रूप में मन्दिर को शुद्ध करके पृथ्वी को स्वर्ग से अलग कर देता है
दिन 3परमेश्वर बोलता है जिस कारण भूमि समुद्र से निकला आती है।यीशु ऐसे विश्वास की बात करता है जिससे पहाड़ समुद्र में उखड़ कर चला जाता है।
 परमेश्वर फिर से बोलता है कि, पृथ्वी से पौधे उगें और भूमि पर हरियाली अंकुरित होने लगती है।यीशु एक शाप का उच्चारण करता है और पेड़ मुरझा जाता है।
दिन 4परमेश्वर बोलता है कि, अकाश में ज्योतियाँ हों  और सूर्य, चन्द्रमा और तारे आकाश को प्रकाशमान करते हुए दिखाई देते हैं।यीशु अपनी वापसी के संकेत की बात करता है – सूर्य, चन्द्रमा और तारे अन्धियारा हो जाएंगे।
दिन 5परमेश्वर उड़ने वाले जानवरों को बनाता है, जिसमें उड़ने वाले डायनासोर सरीसृप या अजगर भी शामिल हैंशैतान, बड़ा अजगर, मसीह पर आक्रमण करने के लिए आगे बढ़ता है
दिन 6परमेश्वर बोलता है और भूमि पर चलने वाले जानवरों की सृष्टि हो जाती है।फसह के मेम्ने को मन्दिर में मार दिया जाता है।
 यहोवा परमेश्‍वर ने आदम… की नथनों में जीवन का श्‍वास फूँक दिया  आदम जीवित प्राणी बन गया“तब यीशु ने बड़े शब्द से चिल्‍लाकर प्राण छोड़ दिये।”  (मरकुस 15:37)
 परमेश्वर आदम को वाटिका में रखता हैयीशु स्वतंत्र रूप से एक वाटिका में प्रवेश करता है
 आदम को भले और बुरे के ज्ञान के पेड़ से एक शाप के साथ दूर की रहने चेतावनी दी गई है।यीशु को एक पेड़ पर बांध दिया गया और शापित बना दिया गया। (गलातियों 3:13) मसीह ने जो हमारे लिये शापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के शाप से छुड़ाया, क्योंकि लिखा है, “जो कोई काठ पर लटकाया जाता है वह शापित है।”
 आदम के लिए कोई भी जानवर उपयुक्त नहीं पाया गया। एक और व्यक्ति आवश्यक थाफसह की पशु बलियाँ पर्याप्त नहीं थीं। एक व्यक्ति की आवश्यकता थी। (इब्रानियों 10:4-5) क्योंकि यह अनहोना है कि बैलों और बकरों का लहू पापों को दूर करे। इसी कारण वह जगत में आते समय कहता है, बलिदान और भेंट तू ने न चाही, पर मेरे लिये एक देह तैयार की।
 परमेश्वर आदम को गहरी नींद में डाल देता हैयीशु मृत्यु की नींद में प्रवेश करता है
 परमेश्वर आदम की पसली में ज़ख्म करता है जिससे वह आदम की दुल्हन को रचा हैयीशु की पसली में एक ज़ख्म बना दिया है। अपने बलिदान से यीशु ने अपनी दुल्हन को जीत लिया, जो उसकी हैं। (प्रकाशितवाक्य 21:9) फिर जिन सात स्वर्गदूतों के पास सात अन्तिम विपत्तियों से भरे हुए सात कटोरे थे, उनमें से एक मेरे पास आया, और मेरे साथ बातें करके कहा, “इधर आ, मैं तुझे दुल्हिन अर्थात् मेम्ने की पत्नी दिखाऊँगा।”
दिन 7परमेश्वर काम से विश्राम करता है।यीशु मृत्यु में विश्राम करता है
सृष्टि रचना के सप्ताह के साथ लयबद्ध होते हुए यीशु का अंतिम सप्ताह

आदम का 6वाँ दिन यीशु के साथ नृत्य करता हुआ

इन दोनों सप्ताहों के प्रत्येक दिन की घटनाएँ एक दूसरे से मेल खाती हैं, जिससे लयबद्ध तालमेल बनता है। दोनों के इन 7 दिवसीय चक्रों के अंत में, नए जीवन का प्रथम फल अंकुरित होने के लिए और एक नई सृष्टि आगे बढ़ने के लिए तैयार है। इस तरह आदम और यीशु एक साथ नृत्य कर रहे हैं, और एक समग्र नाटक की रचना कर रहे हैं।

बाइबल आदम के बारे में ऐसा कहती है कि

आदम, जो उस आनेवाले का चिह्न है

रोमियों 5:14

और

21 क्योंकि जब मनुष्य के द्वारा मृत्यु आई; तो मनुष्य ही के द्वारा मरे हुओं का पुनरुत्थान भी आया।
22 और जैसे आदम में सब मरते हैं, वैसा ही मसीह में सब जिलाए जाएंगे।

1 कुरिन्थियों 15:21-22

इन दो सप्ताहों की आपस में तुलना करने पर हम देखते हैं कि आदम ने यीशु के द्वारा की जाने वाली रास  लीला के नमूने पर एक नाटक का मंचन किया है। क्या परमेश्वर को संसार रचने के लिए छह दिन चाहिए थे? क्या वह एक ही आज्ञा से सब कुछ नहीं बना सकता था? फिर उसने उस क्रम में सृष्टि की रचना क्यों की जिसमें उसने इसे अभी बनाया है? जब वह थक ही नहीं सकता तो परमेश्वर ने सातवें दिन विश्राम क्यों किया? उसने समय और क्रम में वह सब किया जो उसने रचा ताकि यीशु का अंतिम सप्ताह सृष्टि रचना वाले सप्ताह में पहले से ही अपने पूर्वाभास को दिखा सके।

यह विशेष रूप से दिन 6 के लिए सच है। हम सीधे ही उपयोग किए गए शब्दों की समरूपता में देखते हैं। उदाहरण के लिए, केवल यह कहने के स्थान पर कि ’यीशु मर गया’ सुसमाचार कहते हैं कि उसे ‘अन्तिम सांस ली’, जो कि आदम के नमूने से एकदम उल्टा है, जिसने ‘जीवन की सांस’ ली थी। समय के आरम्भ में ही इस तरह के नमूने की प्रस्तुति, समय की अवधि और संसार के पूर्वज्ञान के विषय में बताता है। संक्षेप में, यह ईश्वरीय नृत्य है।

‘तीन’ के मीटर में नृत्य का होना

सँख्या तीन को शुभ माना जाता है, क्योंकि त्राहि से रत्म प्रकट होता है, लयबद्ध क्रम और नियमितता जो स्वयं सृष्टि को संभाले रखती है। रत्म संपूर्ण रचना में व्याप्त अंतर्निहित कंपन है। इसलिए, यह स्वयं को समय और घटनाओं की क्रमबद्ध प्रगति के रूप में कई अर्थों में प्रकट करती है।

इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं है कि यह वही समय है, जो सृष्टि की रचना के पहले 3 दिन और यीशु के मृत्यु के तीन दिनों के बीच में पाया जाता है। नीचे दी हुई तालिका इस नमूने पर प्रकाश डालती है।

 सृष्टि का सप्ताहयीशु की मृत्यु के दिन
दिन 1 और गुड फ्राइडेदिन अंधेरे में आरम्भ होता है। परमेश्वर कहता है, उजियारा हो  और वहाँ अंधेरे में प्रकाश हो जाता हैदिन का आरम्भ प्रकाश (यीशु) से होता है जो अंधेरे से घिरा हुआ होता है। उसकी मृत्यु पर प्रकाश बुझ जाता है और संसार एक ग्रहण लगे हुए अंधकार में चला जाता है।
दिन 2 और विश्राम दिवसपरमेश्वर पृथ्वी को आकाश से अलग करने के लिए पृथ्वी को आकाश से दूर करता हैजबकि उसका शरीर विश्राम करता है, यीशु का आत्मा स्वर्ग पर ऊपर जाने के लिए पाताल में बन्दी मृतकों को स्वतंत्र करता है
दिन 3 और पुनरुत्थान पहले फलपरमेश्वर बोलता है कि, पृथ्वी से पौधे उगें और भूमि पर हरियाली अंकुरित होने लगती है।जो बीज मर गया था वह नए जीवन में अंकुरित हो जता है, जो सभी को प्राप्त होगा।

इस प्रकार परमेश्वर एक बड़े मीटर (सात दिनों के द्वारा) और एक छोटे मीटर (तीन दिनों के द्वारा) में नृत्य करता है, ठीक वैसे ही जैसे कि नर्तक समय के विभिन्न चक्रों में अपने शरीर को हिलाते हैं।

इसके बाद की मुद्राएँ

इब्रानी वेदों ने यीशु के आने की विशिष्ट घटनाओं और त्योहारों को लिपिबद्ध किया है। परमेश्वर ने इन्हें इसलिए दिया ताकि हम जान सकें कि यह परमेश्वर का नाटक था, मनुष्य का नहीं। नीचे दी गई तालिका कुछ को सारांशित करती है, इन महान संकेतों के सम्पर्कों को यीशु के आगमन से सैकड़ों वर्षों पहले लिपिबद्ध किया गया था।

इब्रानी वेदयह यीशु के आगमन को कैसे दर्शाते हैं
आदम का संकेतपरमेश्वर ने नाग का सामना किया और नाग के सिर को कुचलने के लिए बीज के आगमन की घोषणा की।
नूह बड़े जल प्रलय से बच जाता हैबलिदानों को चढ़ाया जाता है, जो यीशु के आने वाले बलिदान की ओर संकेत करता है।
अब्राहम के बलिदान का संकेतअब्राहम द्वारा दिए गए बलिदान का स्थान वही पर्वत था जहाँ हजारों वर्षों पश्चात् यीशु का बलिदान दिया जाएगा। अंतिम समय में मेम्ने को वैकल्पिक रूप में दिया गया ताकि पुत्र जीवित रहे, जो यह दर्शाता है कि यीशु ‘परमेश्वर का मेम्ना’ स्वयं को कैसे बलिदान करेगा ताकि हम जीवित रह सकें।
फसह का संकेतएक विशेष दिन – फसह के दिन मेम्ने को बलिदान किया जाना था। जिन्होंने इसे दिया वे मृत्यु से बच गए थे, परन्तु इसकी अवज्ञा करने वालों की मृत्यु हो गई। सैकड़ों वर्षों पश्चात् यीशु को इसी सटीक दिन – फसह के दिन बलिदान दिया गया।
योम किप्पुरबलि के बकरे का बलिदान – यीशु के बलिदान की ओर संकेत करते हुए वार्षिक उत्सव
‘राज’ की तरह: ‘मसीह’ का क्या अर्थ है?पदवी ‘मसीह’ का उद्घाटन उसके आगमन की प्रतिज्ञा के साथ हुआ था
...जैसा कि कुरूक्षेत्र के युद्ध में मिलता हैयुद्ध के लिए तैयार, ‘मसीह’ राजा दाऊद के वंश से आएगा
शाखा का चिन्ह‘मसीह’ एक मृत ठूंठ से एक शाखा की तरह अंकुरित होगा
आने वाली शाखा का नामइस अंकुरित ‘शाखा’ का नाम उसके आगमन से 500 वर्षों पहले रखा गया था।
सभी के लिए दुखी सेवकदैवीय वाणी वर्णन करती है कि यह व्यक्ति सारी मानव जाति की सेवा कैसे करेगा
पवित्र सप्ताहों में आ रहा हैदैवीय वाणी बताती है कि वह कब आएगा, इसे सात सप्ताहों के चक्र में दिया गया है।
पहले से बताया गया जन्मकुंवारी से उसका जन्म और जन्म का स्थान उसके जन्म से बहुत पहले बता दिया गया था
नृत्य में मुद्रा की तरह यीशु की ओर संकेत करते हुए त्यौहार और दैवीय वाणियाँ

नृत्य में, पैरों और धड़ में मुख्य रूप से हलचलें होतीं हैं, परन्तु हाथों और उंगलियों का उपयोग इन हलचलों को सारगर्भित रूप से दिखाने के लिए भी किया जाता है। हम हाथ और उंगलियों की इन हलचलों को विभिन्न मुद्राएँ  कहते हैं। ये दैवीय वाणियाँ और त्यौहार दिव्य नृत्य की मुद्राओं की तरह हैं। कलात्मक रूप से, ये यीशु के व्यक्ति और कार्य के विवरण को इंगित करते हैं। नृत्य के बारे में बताने वाले नाट्य शास्त्र  की तरह, परमेश्वर ने हमें मनोरंजन से परे रास या परम आनन्द में जाने के लिए आमंत्रित किया है।

हमारा निमंत्रण                  

परमेश्वर हमें उसके नृत्य में सम्मलित होने के लिए आमंत्रित करता है। हम भक्ति के संदर्भ में अपनी प्रतिक्रिया को समझ सकते हैं।

वह हमें उसके वैसे प्रेम में प्रवेश करने के लिए आमंत्रित करता है, जैसा कि राम और सीता के बीच में गहन रूप से पाया जाता है।

यहाँ यह जानें कि यीशु द्वारा दिए गए अनन्त जीवन का उपहार कैसे प्राप्त किया जाए।

पुनरुत्थान प्रथम फल: आपके लिए जीवन

हम हिंदू कैलेंडर अर्थात् पंचांग के अनुसार अंतिम पूर्णिमा के दिन होली के उत्सव को मनाते हैं। अपने चन्द्र-सौर मूल के पंचांग के साथ, होली पश्चिमी कैलेंडर के चारों ओर घूमती रहती है, जिसके कारण यह सामान्य रूप से मार्च में, वसंत के आगमन के समय एक आनन्द के त्योहार के रूप में आती है। यद्यपि कई लोग होली के उत्सव को मनाते हैं, तथापि कुछ ही को पता है कि यह प्रथम फल  के त्योहार, और इसके बाद में मनाए जाने वाले ईस्टर अर्थात् पुनरुत्थान के त्योहार के समानांतर पाया जाने वाला एक त्योहार है। ये उत्सव वसंत ऋतु के पूर्ण चंद्रमाओं पर आधारित होते हैं और इसलिए अक्सर आपस में मेल खाते हैं।

होली का उत्सव

लोग होली को वसंत ऋतु के उल्लासपूर्ण त्योहार, प्रेम का त्योहार या रंगों का त्योहार के रूप में मनाते हैं। इस उत्सव को मनाने का सबसे मुख्य उद्देश्य वसंत ऋतु के आरम्भ में होने वाली फसल की कटनी है। पारम्परिक साहित्य, होली की पहचान एक त्योहार के रूप में करता है, जो वसंत ऋतु में होने वाली फसल की बहुतायत वाली कटनी का उत्सव मनाता है।

होली भी बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव है। होलिका दहन की शाम के बाद, होली (या रंग वाली होली, धुलेटी, धुलंडी, या फगवा) अगले दिन तक चलती रहती है।

लोग एक दूसरे को रंग लगाकर होली मनाते हैं। वे पानी की बंदूकों और पानी से भरे गुब्बारों का उपयोग एक-दूसरे पर छोड़ने और उन्हें रंगने के लिए भी करते हैं। यह एक लड़ाई की तरह होता है, परन्तु रंगीन पानी के साथ। इसे बिना किसी पक्षपात के साथ, दोस्त या अनजान, धनी या निर्धन, पुरुष या स्त्री, बच्चे या बुजुर्ग के साथ खेला जाता है। रंग असाधारण रूप से खुली सड़कों, पार्कों, मंदिरों और भवनों के बाहर एक दूसरे पर डाला जाता है। भिन्न झुण्ड स्थान-स्थान पर ढोल-नगाड़े और वाद्य यंत्र लेकर चलते हैं, गाते हैं और नाचते हैं। दोस्त और दुश्मन एक दूसरे पर रंगीन पाऊडर फेंकने के लिए एक साथ इक्ट्ठे हो जाते हैं, हँसते हैं, गपशप मारते हैं, फिर होली के व्यंजनों, भोजन और पेय पदार्थों को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं। देर सुबह तक, हर कोई रंगों की चित्रकारी से भरा हुआ दिखाई देता है, इसलिए इसका नाम “त्योहारों का रंग” है।

कदाचित् होली का सबसे अनूठा विरोधाभास समाजिक भूमिका में उलट-फेर का होना है। शौचालय को साफ करने वाला एक व्यक्ति एक ब्राह्मण व्यक्ति पर रंग डाल सकता है और यही त्योहार की भूमिका में उलट होने का एक समाजिक हिस्सा है। माता-पिता और बच्चों, भाई-बहनों, पड़ोसियों और विभिन्न जातियों के बीच प्यार और सम्मान के पारंपरिक भाव सभी कुछ इसमें उलट मिलते हैं।

होली संबंधी पौराणिक कथा

होली को लेकर कई पौराणिक कथाएँ पाई जाती हैं। होलिका दहन से आगे बढ़ती हुई कहानी राजा हिरण्यकशिपु के भाग्य से संबंधित है, जिसने अपनी विशेष शक्तियों के साथ प्रह्लाद को मारने के लिए साजिश रची थी। वह उसे किसी भी रीति से नही मार सका: न तो मनुष्य द्वारा और न ही जानवर के द्वारा, न तो घर के अंदर और न ही सड़क पर, न तो दिन के समय में और न ही रात के समय में, न तो किसी फेंक जाने वाले हथियार के द्वारा और न ही हाथ में पकड़े जाने वाले हथियार के द्वारा, न तो जमीन पर, और न ही पानी या हवा पर। होलिका द्वारा प्रह्लाद को जलाने का प्रयास में नाकाम होने के बाद, विष्णु नरसिंह के रूप में, हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेशद्वार की चौखट पर (जो न घर का बाहर था न भीतर), गोधूलि बेला में (न दिन और न ही रात में), आधा मनुष्य, आधा शेर (जो न नर था न पशु), अपनी गोद (न तो भूमि पर, न ही हवा और पानी में) में रखते हुए अपने लंबे तेज़ नाखूनों से (जो न अस्त्र थे न शस्त्र था) मार डाला। इस तरह कहानी में होली बुराई पर अच्छाई के उत्सव को मनाती है।

इसी तरह से, प्रथम फल एक जीत के उत्सव को मनाता है, परन्तु एक दुष्ट राजा के ऊपर नहीं, अपितु स्वयं मृत्यु के ऊपर। सुसमाचार बताते हैं कि प्रथम फल, जिसे अब ईस्टर संडे  अर्थात् पुनुरुत्थान वाले ईतवार के रूप में जाना जाता है, इसे स्पष्ट करता है, कि यह आपको और मुझे नया जीवन प्रदान करता है।

प्राचीन इब्रानी वेद त्योहार

हमने पिछले सप्ताह यीशु की दैनिक घटनाओं का अनुसरण किया। सप्ताह के सातवें दिन, सब्त के दिन मृत्यु प्राप्त करते हुए, उसे एक पवित्र यहूदी त्योहार फसह के दिन क्रूसित किया गया था। परमेश्वर ने इन पवित्र दिनों को इब्रानी वेदों में बहुत पहले से स्थापित किया था। इन निर्देशों में हमें ऐसे मिलता है:

ರುವಾಯ ಕರ್ತನು ಮೋಶೆಯೊಂದಿಗೆ ಮಾತನಾಡಿ ಹೇಳಿದ್ದೇನಂದರೆ —
2 ಇಸ್ರಾಯೇಲ್‌ ಮಕ್ಕಳೊಂದಿಗೆ ನೀನು ಮಾತನಾಡಿ ಅವರಿಗೆ ಹೇಳಬೇಕಾದದ್ದೇನಂದರೆ–ನೀವು ಪರಿಶುದ್ಧ ಸಭೆಗಳಾಗಿ ಪ್ರಕಟಿಸಬೇಕಾದ ಕರ್ತನ ಹಬ್ಬಗಳು ಇವೇ,
3 ಆರು ದಿವಸ ಕೆಲಸಮಾಡಬೇಕು, ಆದರೆ ಏಳನೆಯ ದಿವಸವು ವಿಶ್ರಾಂತಿಯ ಸಬ್ಬತ್‌ ದಿವಸವಾಗಿ ಪರಿಶುದ್ಧ ಸಭಾಕೂಟವಾಗಿರುವದು; ನೀವು ಆ ದಿನ ದಲ್ಲಿ ಕೆಲಸಮಾಡಬಾರದು; ನಿಮ್ಮ ಎಲ್ಲಾ ನಿವಾಸಗಳಲ್ಲಿ ಅದು ಕರ್ತನ ಸಬ್ಬತ್ತಾಗಿರುವದು.
4 ನೀವು ಅವುಗಳ ಕಾಲಗಳಲ್ಲಿ ಪ್ರಕಟಿಸಬೇಕಾದ ಪವಿತ್ರ ಸಭಾಕೂಟ ಗಳೂ ಕರ್ತನ ಹಬ್ಬಗಳೂ ಇವೇ.
5 ಮೊದಲನೆಯ ತಿಂಗಳಿನ ಹದಿನಾಲ್ಕನೆಯ ದಿವ ಸದ ಸಾಯಂಕಾಲದಲ್ಲಿ ಕರ್ತನ ಪಸ್ಕವು

.लैव्यव्यवस्था 23:1-5

क्या यह उत्सुकता की बात नहीं है कि यीशु का क्रूस पर चढ़ना और मृत्यु प्राप्त करना दोनों ही इन दो पवित्र त्योहारों के दिन घटित हुआ जो कि 1500 वर्षों पहले से निर्धारित किए गए थे?

क्यों? इसका क्या अर्थ है?

यीशु का क्रूसीकरण (दिन 6) में घटित हुआ और उसका मृत्यु में विश्राम करना सब्त (दिन 7) में घटित हुआ था

प्राचीन इब्रानी वेद त्योहारों के साथ आगे बढ़ता रहता है। फसह और सब्त के बाद का अगला त्यौहार ‘प्रथम फल’ था। इब्रानी वेदों ने इसके लिए निम्न निर्देशों को दिया था।

इब्रानी प्रथम फल उत्सव

9फिर यहोवा ने मूसा से कहा, 10“इस्राएलियों से कह कि जब तुम उस देश में प्रवेश करो जिसे यहोवा तुम्हें देता है और उसमें के खेत काटो, तब अपने अपने पके खेत की पहली उपज का पूला याजक के पास ले आया करना; 11और वह उस पूले को यहोवा के सामने हिलाए, कि वह तुम्हारे निमित्त ग्रहण किया जाए; वह उसे विश्रामदिन के दूसरे दिन हिलाए।

लैव्यव्यवस्था 23:9-11

14 ಅದೇ ದಿನದಲ್ಲಿ ನೀವು ನಿಮ್ಮ ದೇವರಿಗೆ ಸಮರ್ಪಣೆಯನ್ನು ತರುವ ವರೆಗೆ ರೊಟ್ಟಿಯನ್ನಾಗಲಿ ಹುರಿದ ಕಾಳನ್ನಾಗಲಿ ಇಲ್ಲವೆ ಹಸಿರಾದ ತೆನೆಗಳನ್ನಾಗಲಿ ತಿನ್ನಬಾರದು. ಇದು ನಿಮಗೆ ನಿಮ್ಮ ಸಂತತಿಯ ಎಲ್ಲಾ ನಿವಾಸಗಳಲ್ಲಿ ಶಾಶ್ವತವಾದ ನಿಯಮವಾಗಿರಬೇಕು.

लैव्यव्यवस्था 23:14

फसह के ‘विश्रामदिन के दूसरे दिन’ के बाद का दिन एक तीसरा पवित्र त्योहार, प्रथम फल था। हर वर्ष इस दिन महायाजक पवित्र मंदिर में प्रवेश करता था और प्रभु परमेश्वर को पहले वसंत के अनाज की फसल को प्रस्तुत करता था। जैसा कि होली के साथ है, यह सर्दियों के बाद नए जीवन के आरम्भ का संकेत लोगों को बहुतायत से मिलने वाली फसल से मिलने वाले भोजन से होने वाली संतुष्टि की ओर देखते हुए देता है।

सब्त के ठीक एक दिन बाद जब यीशु ने मृत्यु में विश्राम किया, नए सप्ताह का रविवार, निसान 16 है। सुसमाचार लिपिबद्ध करते हैं कि उस दिन क्या घटित हुआ जब महायाजक नए जीवन के संकेत देने वाले ‘प्रथम फल’ को देने के लिए मंदिर में जाते थे।

यीशु मृतकों में से जी उठा था

​ವಾರದ ಮೊದಲನೆಯ ದಿನದ ಬೆಳಗಿನ ಜಾವದಲ್ಲಿ ಅವರು ಸಿದ್ಧಪಡಿಸಿದ್ದ ಪರಿಮಳ ದ್ರವ್ಯಗಳನ್ನು ತಕ್ಕೊಂಡು ಬಂದರು. ಬೇರೆ ಕೆಲವರು ಅವರೊಂದಿಗಿದ್ದರು.
2 ಆಗ ಸಮಾಧಿಯಿಂದ ಕಲ್ಲು ಉರುಳಿಸಲ್ಪಟ್ಟದ್ದನ್ನು ಅವರು ಕಂಡರು.
3 ಅವರು ಒಳಗೆ ಪ್ರವೇಶಿಸಿದಾಗ ಅಲ್ಲಿ ಕರ್ತನಾದ ಯೇಸುವಿನ ದೇಹ ವನ್ನು ಕಾಣಲಿಲ್ಲ.
4 ಅವರು ಇದಕ್ಕಾಗಿ ಬಹಳವಾಗಿ ಕಳವಳಗೊಂಡರು; ಆಗ ಇಗೋ, ಹೊಳೆಯುವ ವಸ್ತ್ರಗಳನ್ನು ಧರಿಸಿದ್ದ ಇಬ್ಬರು ಪುರುಷರು ಅವರ ಬಳಿಯಲ್ಲಿ ನಿಂತಿದ್ದರು.
5 ಆ ಸ್ತ್ರೀಯರು ಭಯದಿಂದ ತಮ್ಮ ಮುಖಗಳನ್ನು ನೆಲದ ಕಡೆಗೆ ಬೊಗ್ಗಿಸಿದಾಗ ಆ ಪುರುಷರು ಅವರಿಗೆ–ಜೀವಿಸುವಾತನನ್ನು ಸತ್ತವ ರೊಳಗೆ ನೀವು ಯಾಕೆ ಹುಡುಕುತ್ತೀರಿ?
6 ಆತನು ಇಲ್ಲಿಲ್ಲ, ಎದ್ದಿದ್ದಾನೆ; ಆತನು ಇನ್ನೂ ಗಲಿಲಾಯ ದಲ್ಲಿದ್ದಾಗಲೇ–
7 ಮನುಷ್ಯಕುಮಾರನು ಪಾಪಿಷ್ಠರ ಕೈಗಳಿಗೆ ಹೇಗೆ ಒಪ್ಪಿಸಲ್ಪಟ್ಟವನಾಗಿ ಶಿಲುಬೆಗೆ ಹಾಕಲ್ಪಟ್ಟು ಮೂರನೆಯ ದಿನದಲ್ಲಿ ತಿರಿಗಿ ಏಳುವನು ಎಂದು ನಿಮಗೆ ಹೇಳಿದ್ದನ್ನು ನೀವು ನೆನಪು ಮಾಡಿಕೊಳ್ಳಿರಿ ಅಂದರು.
8 ಆಗ ಅವರು ಆತನ ಮಾತುಗಳನ್ನು ನೆನಪು ಮಾಡಿಕೊಂಡು
9 ಸಮಾಧಿಯಿಂದ ಹಿಂತಿರುಗಿ ಹೋಗಿ ಆ ಹನ್ನೊಂದು ಮಂದಿಗೂ ಉಳಿದವರೆಲ್ಲ ರಿಗೂ ಈ ಎಲ್ಲಾ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ತಿಳಿಸಿದರು.
10 ಅಪೊ ಸ್ತಲರಿಗೆ ಈ ವಿಷಯಗಳನ್ನು ಹೇಳಿದವರು ಯಾರಂದರೆ ಮಗ್ದಲದುರಿಯಳು, ಯೋಹಾನಳು, ಯಾಕೋಬನ ತಾಯಿಯಾದ ಮರಿಯಳು ಮತ್ತು ಅವರೊಂದಿಗಿದ್ದ ಬೇರೆ ಸ್ತ್ರೀಯರು.
11 ಅವರ ಮಾತುಗಳು ಇವರಿಗೆ ಹರಟೆಯ ಕಥೆಗಳಂತೆ ಕಂಡವು, ಅವರು ಅವುಗಳನ್ನು ನಂಬಲಿಲ್ಲ.
12 ಆಗ ಪೇತ್ರನು ಎದ್ದು ಸಮಾಧಿಗೆ ಓಡಿಹೋಗಿ ಕೆಳಗೆ ಬೊಗ್ಗಿ ನಾರುಬಟ್ಟೆಗಳು ಮಾತ್ರ ಬಿದ್ದಿರುವದನ್ನು ನೋಡಿ ನಡೆದ ವಿಷಯಕ್ಕಾಗಿ ತನ್ನೊಳಗೆ ಆಶ್ಚರ್ಯಪಡುತ್ತಾ ಹೊರಟುಹೋದನು.
13 ಆಗ ಇಗೋ, ಅದೇ ದಿನ ಅವರಲ್ಲಿ ಇಬ್ಬರು ಯೆರೂಸಲೇಮಿನಿಂದ ಸುಮಾರು ಏಳುವರೆ ಮೈಲು ದೂರದಲ್ಲಿದ್ದ ಎಮ್ಮಾಹು ಎಂದು ಕರೆಯಲ್ಪಟ್ಟ ಹಳ್ಳಿಗೆ ಹೋಗುತ್ತಿದ್ದರು.
14 ಅವರು ನಡೆದ ಈ ಎಲ್ಲಾ ವಿಷಯಗಳ ಕುರಿತಾಗಿ ಒಬ್ಬರಿಗೊಬ್ಬರು ಮಾತನಾಡಿ ಕೊಳ್ಳುತ್ತಿದ್ದರು.
15 ಇದಾದ ಮೇಲೆ ಅವರು ಜೊತೆ ಯಾಗಿ ಮಾತನಾಡುತ್ತಾ ತರ್ಕಿಸುತ್ತಾ ಇರಲು ಯೇಸು ತಾನೇ ಅವರನ್ನು ಸವಿಾಪಿಸಿ ಅವರೊಂದಿಗೆ ಹೋದನು.
16 ಆದರೆ ಅವರ ಕಣ್ಣುಗಳು ಮುಚ್ಚಿದ್ದರಿಂದ ಅವರು ಆತನ ಗುರುತನ್ನು ತಿಳಿಯಲಿಲ್ಲ.
17 ಆಗ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ನೀವು ಮಾರ್ಗದಲ್ಲಿ ನಡೆಯುತ್ತಾ ವ್ಯಸನವುಳ್ಳವರಾಗಿ ಒಬ್ಬರಿಗೊಬ್ಬರು ಮಾತನಾಡಿ ಕೊಳ್ಳುತ್ತಿರುವ ಈ ವಿಷಯಗಳು ಯಾವ ತರದವುಗಳು ಎಂದು ಕೇಳಿದನು.
18 ಆಗ ಅವರಲ್ಲಿ ಕ್ಲಿಯೊಫಾಸ್‌ ಎಂಬ ಹೆಸರಿದ್ದವನು ಪ್ರತ್ಯುತ್ತರವಾಗಿ ಆತನಿಗೆ–ಈ ದಿವಸಗಳಲ್ಲಿ ಯೆರೂಸಲೇಮಿನೊಳಗೆ ನಡೆದಿರುವ ಸಂಗತಿಗಳನ್ನು ತಿಳಿಯದ ಪರಸ್ಥಳದವನು ನೀನೊಬ್ಬನು ಮಾತ್ರವೋ ಎಂದು ಕೇಳಿದನು.
19 ಅದಕ್ಕೆ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ಯಾವ ವಿಷಯಗಳು ಎಂದು ಕೇಳಲು ಅವರು ಆತನಿಗೆ–ದೇವರ ಸನ್ನಿಧಿಯಲ್ಲಿಯೂ ಎಲ್ಲಾ ಜನರ ಮುಂದೆಯೂ ಪ್ರವಾದಿಯಾಗಿದ್ದು ಕೃತ್ಯಗಳ ಲ್ಲಿಯೂ ಮಾತುಗಳಲ್ಲಿಯೂ ಸಮರ್ಥನಾಗಿದ್ದ ನಜ ರೇತಿನ ಯೇಸುವಿನ ವಿಷಯಗಳೇ;
20 ಪ್ರಧಾನ ಯಾಜಕರೂ ನಮ್ಮ ಅಧಿಕಾರಿಗಳೂ ಆತನನ್ನು ಮರಣ ದಂಡನೆಗೆ ಒಪ್ಪಿಸಿಕೊಟ್ಟು ಶಿಲುಬೆಗೆ ಹಾಕಿದರು.
21 ಆದರೆ ಇಸ್ರಾಯೇಲ್ಯರನ್ನು ವಿಮೋಚಿಸುವಾತನು ಆತನೇ ಎಂದು ನಾವು ನಂಬಿದ್ದೆವು; ಇದಲ್ಲದೆ ಈ ವಿಷಯಗಳು ನಡೆದು ಇದು ಮೂರನೆಯ ದಿನವಾಗಿದೆ;
22 ಹೌದು, ನಮ್ಮವರಲ್ಲಿ ಕೆಲವು ಸ್ತ್ರೀಯರು ಬೆಳಗಿನ ಜಾವದಲ್ಲಿ ಸಮಾಧಿಯ ಬಳಿಯಲ್ಲಿದ್ದು
23 ಆತನ ದೇಹವನ್ನು ಕಾಣದೆ ಬಂದು ಆತನು ಜೀವದಿಂದೆ ದ್ದಿದ್ದಾನೆ ಎಂದು ದೇವದೂತರು ಹೇಳಿದ್ದನ್ನೂ ಆ ದೂತರ ದೃಶ್ಯವನ್ನು ಕಂಡದ್ದನ್ನೂ ನಮಗೆ ಹೇಳಿ ಆಶ್ಚರ್ಯವನ್ನುಂಟು ಮಾಡಿದರು.
24 ಇದಲ್ಲದೆ ನಮ್ಮೊಂದಿಗಿದ್ದ ಕೆಲವರು ಸಮಾಧಿಗೆ ಹೋಗಿ ಆ ಸ್ತ್ರೀಯರು ಹೇಳಿದಂತೆಯೇ ಕಂಡರು; ಆದರೆ ಅವರು ಆತನನ್ನು ನೋಡಲಿಲ್ಲ ಅಂದರು.
25 ಆಗ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ಓ ಬುದ್ದಿಹೀನರೇ, ಪ್ರವಾದಿಗಳು ಹೇಳಿ ದ್ದೆಲ್ಲವನ್ನು ನಂಬುವದರಲ್ಲಿ ಮಂದ ಹೃದಯದವರೇ,
26 ಕ್ರಿಸ್ತನು ಇವೆಲ್ಲಾ ಶ್ರಮೆಗಳನ್ನು ಅನುಭವಿಸಿ ತನ ಮಹಿಮೆಯಲ್ಲಿ ಪ್ರವೇಶಿಸುವದು ಅಗತ್ಯವಾಗಿತ್ತಲ್ಲವೇ ಎಂದು ಹೇಳಿ
27 ಮೋಶೆಯ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಪ್ರವಾದಿ ಗಳಿಂದ ಆರಂಭಿಸಿ ಸಮಸ್ತ ಬರಹಗಳಲ್ಲಿ ತನ್ನ ವಿಷಯವಾದವುಗಳನ್ನು ಅವರಿಗೆ ವಿವರಿಸಿದನು.
28 ಅವರು ಹೋಗಬೇಕಾಗಿದ್ದ ಹಳ್ಳಿಯನ್ನು ಸವಿಾಪಿಸು ತ್ತಿರುವಾಗ ಆತನು ಮುಂದೆ ಹೋಗುವವನಂತೆ ತೋರಿಸಿಕೊಂಡನು.
29 ಆದರೆ ಅವರು ಆತನಿಗೆ–ನಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ಇರು; ಯಾಕಂದರೆ ಈಗ ಸಾಯಂಕಾಲ ವಾಗುತ್ತಾ ಇದೆ ಮತ್ತು ಹಗಲು ಬಹಳ ಮಟ್ಟಿಗೆ ಕಳೆಯಿತು ಎಂದು ಹೇಳಿ ಆತನನ್ನು ಬಲವಂತ ಮಾಡಿ ದರು. ಆಗ ಆತನು ಅವರೊಂದಿಗೆ ಇರುವದಕ್ಕಾಗಿ ಹೋದನು.
30 ಇದಾದ ಮೇಲೆ ಆತನು ಅವರೊಂದಿಗೆ ಊಟಕ್ಕೆ ಕೂತುಕೊಂಡಿರಲು ರೊಟ್ಟಿಯನ್ನು ತೆಗೆದು ಕೊಂಡು ಆಶೀರ್ವದಿಸಿ ಮುರಿದು ಅವರಿಗೆ ಕೊಟ್ಟನು.
31 ಆಗ ಅವರ ಕಣ್ಣುಗಳು ತೆರೆಯಲ್ಪಟ್ಟದ್ದರಿಂದ ಅವರು ಆತನ ಗುರುತು ಹಿಡಿದರು; ಆತನು ಅವರ ದೃಷ್ಟಿಗೆ ಅದೃಶ್ಯನಾದನು.
32 ಆಗ ಅವರು ಒಬ್ಬರಿಗೊಬ್ಬರು–ಆತನು ದಾರಿಯಲ್ಲಿ ನಮ್ಮ ಕೂಡ ಮಾತನಾಡುತ್ತಾ ಬರಹಗಳನ್ನು ನಮಗೆ ವಿವರಿಸಿದಾಗ ನಮ್ಮ ಹೃದಯವು ನಮ್ಮೊಳಗೆ ಕುದಿಯಿತಲ್ಲವೇ ಎಂದು ಅಂದುಕೊಂಡರು.
33 ಅವರು ಅದೇ ಗಳಿಗೆಯಲ್ಲಿ ಯೆರೂಸಲೇಮಿಗೆ ಹಿಂದಿರುಗಿಹೋದರು. ಅಲ್ಲಿ ಹನ್ನೊಂದು ಮಂದಿ ಶಿಷ್ಯರೂ ಅವರೊಂದಿಗಿದ್ದವರೂ ಒಟ್ಟಾಗಿ ಕೂಡಿ ಕೊಂಡಿರುವದನ್ನು ಅವರು ಕಂಡರು.
34 ಅವರು–ಕರ್ತನು ನಿಜವಾಗಿಯೂ ಎದ್ದಿದ್ದಾನೆ ಮತ್ತು ಆತನು ಸೀಮೋನನಿಗೆ ಕಾಣಿಸಿಕೊಂಡಿದ್ದಾನೆ ಎಂದು ಹೇಳಿ ದರು.
35 ಆಗ ಅವರು ದಾರಿಯಲ್ಲಿ ನಡೆದವುಗಳನ್ನೂ ರೊಟ್ಟಿ ಮುರಿಯುವದರಲ್ಲಿ ಅವರು ಹೇಗೆ ಆತನ ಗುರುತು ಹಿಡಿದರೆಂದೂ ಹೇಳಿದರು.
36 ಅವರು ಹೀಗೆ ಮಾತನಾಡುತ್ತಿರುವಾಗ ಯೇಸು ತಾನೇ ಅವರ ಮಧ್ಯದಲ್ಲಿ ನಿಂತು ಅವರಿಗೆ–ನಿಮಗೆ ಸಮಾಧಾನವಾಗಲಿ ಅಂದನು.
37 ಆದರೆ ಅವರು ದಿಗಿಲುಬಿದ್ದು ಭಯಹಿಡಿದವರಾಗಿ ತಾವು ಕಂಡದ್ದು ಭೂತವೆಂದು ಭಾವಿಸಿದರು.
38 ಆದರೆ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ಯಾಕೆ ನೀವು ಕಳವಳಗೊಳ್ಳುತ್ತೀರಿ? ನಿಮ್ಮ ಹೃದಯಗಳಲ್ಲಿ ಆಲೋಚನೆಗಳು ಹುಟ್ಟುವದು ಯಾಕೆ?
39 ನನ್ನ ಕೈಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ನನ್ನ ಕಾಲುಗಳನ್ನು ನೋಡಿರಿ; ನಾನೇ ಅಲ್ಲವೇ; ನನ್ನನ್ನು ಮುಟ್ಟಿ ನೋಡಿರಿ, ಯಾಕಂದರೆ ನೀವು ನೋಡುವಂತೆ ನನಗಿರುವ ಮಾಂಸ ಮತ್ತು ಎಲುಬುಗಳು ಭೂತಕ್ಕೆ ಇಲ್ಲ ಅಂದನು.
40 ಹೀಗೆ ಆತನು ಮಾತನಾಡಿದಾಗ ತನ್ನ ಕೈಗಳನ್ನು ಮತ್ತು ತನ್ನ ಕಾಲುಗಳನ್ನು ಅವರಿಗೆ ತೋರಿಸಿದನು.
41 ಆದರೆ ಅವರು ಸಂತೋಷದ ನಿಮಿತ್ತವಾಗಿ ಇನ್ನೂ ನಂಬದೆ ಆಶ್ಚರ್ಯಪಡುತ್ತಿರು ವಾಗ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ನಿಮ್ಮಲ್ಲಿ ಆಹಾರವೇನಾದರೂ ಇದೆಯೋ ಎಂದು ಕೇಳಿದನು.
42 ಅವರು ಆತನಿಗೆ ಒಂದು ತುಂಡು ಸುಟ್ಟವಿಾನನ್ನು ಮತ್ತು ಒಂದು ಜೇನು ಹುಟ್ಟನ್ನು ಕೊಟ್ಟರು.
43 ಆತನು ತಕ್ಕೊಂಡು ಅವರ ಮುಂದೆ ತಿಂದನು.
44 ಆಗ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ಮೋಶೆಯ ನ್ಯಾಯ ಪ್ರಮಾಣದಲ್ಲಿಯೂ ಪ್ರವಾದನೆಗಳಲ್ಲಿಯೂ ಕೀರ್ತನೆ ಗಳಲ್ಲಿಯೂ ನನ್ನನ್ನು ಕುರಿತಾಗಿ ಬರೆಯಲ್ಪಟ್ಟವು ಗಳೆಲ್ಲವು ನೆರವೇರುವದು ಅಗತ್ಯವಾಗಿದೆ ಎಂಬ ಈ ಮಾತುಗಳನ್ನು ನಾನು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ಇದ್ದಾಗಲೇ ಹೇಳಿದ್ದೆನು ಅಂದನು.
45 ತರುವಾಯ ಅವರು ಬರಹ ಗಳನ್ನು ಅರ್ಥ ಮಾಡಿಕೊಳ್ಳುವಂತೆ ಆತನು ಅವರ ಬುದ್ಧಿಯನ್ನು ತೆರೆದನು.
46 ಅವರಿಗೆ–ಕ್ರಿಸ್ತನು ಹೀಗೆ ಶ್ರಮೆಪಟ್ಟು ಸತ್ತವರೊಳಗಿಂದ ಮೂರನೆಯ ದಿನದಲ್ಲಿ ಎದ್ದು ಬರುವದು ಅಗತ್ಯವಾಗಿತ್ತೆಂತಲೂ
47 ಯೆರೂಸಲೇಮು ಮೊದಲುಗೊಂಡು ಎಲ್ಲಾ ಜನಾಂಗದವ ರೊಳಗೆ ಆತನ ಹೆಸರಿನಲ್ಲಿ ಮಾನಸಾಂತರ ಮತ್ತು ಪಾಪಗಳ ಕ್ಷಮಾಪಣೆ ಸಾರಲ್ಪಡಬೇಕೆಂತಲೂ ಬರೆಯ ಲ್ಪಟ್ಟಿದೆ.
48 ಇವುಗಳ ವಿಷಯವಾಗಿ ನೀವು ಸಾಕ್ಷಿಗಳಾ ಗಿದ್ದೀರಿ.

लूका 24:1-48

प्रथम फल संबंधी यीशु की विजय

यीशु ‘प्रथम फल’ के पवित्र दिन में मृत्यु पर जय को प्राप्त करता है, एक ऐसा कारनामा जिसे उसके शत्रुओं और उसके शिष्यों दोनों ने ही असंभव माना था। जैसा कि होली बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाती है, इस दिन यीशु की जीत अच्छाई पर जीत थी।

54 ಲಯವಾಗುವಂಥದ್ದು ನಿರ್ಲಯತ್ವವನ್ನು ಧರಿಸಿ ಕೊಳ್ಳುವದು, ಮರಣಾಧೀನವಾಗಿರುವಂಥದ್ದು ಅಮರ ತ್ವವನ್ನು ಧರಿಸಿಕೊಳ್ಳುವದು; ಆಗ ಬರೆದಿರುವ ಮಾತು ನೆರವೇರುವದು, ಆ ಮಾತು ಏನಂದರೆ–ಜಯವು ಮರಣವನ್ನು ನುಂಗಿತು ಎಂಬದೇ.
55 ಓ ಮರಣವೇ, ನಿನ್ನ ಕೊಂಡಿಯೆಲ್ಲಿ? ಓ ಸಮಾಧಿಯೇ ನಿನ್ನ ಜಯವೆಲ್ಲಿ?
56 ಮರಣದ ಕೊಂಡಿ ಪಾಪವೇ; ಪಾಪದ ಬಲವು ನ್ಯಾಯಪ್ರಮಾಣವೇ.

1कुरिन्थियों 15:54-56

जैसा कि हम उलट भूमिका के माध्यम से होली को मनाते हैं, ‘प्रथम फल’ भूमिका में सबसे बड़े उलट-फेर को ले आया। पहले मृत्यु का मानव जाति पर पूर्ण अधिकार था। अब यीशु ने मृत्यु की प्रभुता पर जय पा ली है। उसने उस शक्ति को उलट दिया था। जैसे कि नरसिंह ने हिरण्यकश्यपु की शक्तियों के विरुद्ध एक आरम्भ पाया था, यीशु ने पाप के बिना मरते हुए, एक अजेय मृत्यु को पराजित करने के आरम्भ को पाया।

आपके और मेरे लिए विजय

परन्तु यह यीशु के लिए ही केवल एक जीत नहीं थी। यह आपके और मेरे लिए भी प्रथम फल  के साथ घटित होने वाले इसके समय की गारंटी देते हुए जीत है। बाइबल बताती है कि:

20 ಆದರೆ ಈಗ ಕ್ರಿಸ್ತನು ಸತ್ತವರೊಳಗಿಂದ ಎದ್ದು ಬಂದು ನಿದ್ರೆಹೋದವರಲ್ಲಿ ಪ್ರಥಮಫಲವಾದನು.
21 ಮನುಷ್ಯನ ಮೂಲಕ ಮರಣವುಂಟಾದ ಕಾರಣ ಮನುಷ್ಯನ ಮೂಲಕವೇ ಸತ್ತವರಿಗೆ ಪುನರುತ್ಥಾನ ವುಂಟಾಗುವದು.
22 ಯಾವ ಪ್ರಕಾರ ಆದಾಮನಲ್ಲಿ ಎಲ್ಲರೂ ಸಾಯುವವರಾದರೋ ಅದೇ ಪ್ರಕಾರ ಕ್ರಿಸ್ತನಲ್ಲಿ ಎಲ್ಲರೂ ಜೀವಿತರಾಗುವರು.
23 ಆದರೆ ಪ್ರತಿಯೊಬ್ಬನು ತನ್ನ ತನ್ನ ತರಗತಿಯಲ್ಲಿ ಇರುವನು; ಕ್ರಿಸ್ತನು ಪ್ರಥಮ ಫಲ, ತರುವಾಯ ಕ್ರಿಸ್ತನ ಬರೋಣದಲ್ಲಿ ಆತನವರು.
24 ಆಮೇಲೆ ಆತನು ಬೇರೆ ಎಲ್ಲಾ ದೊರೆತನವನ್ನೂ ಎಲ್ಲಾ ಅಧಿಕಾರವನ್ನೂ ಬಲವನ್ನೂ ನಿವೃತ್ತಿಮಾಡಿ ತಂದೆಯಾಗಿರುವ ದೇವರಿಗೆ ರಾಜ್ಯವನ್ನು ಒಪ್ಪಿಸಿ ಕೊಡುವಾಗ ಸಮಾಪ್ತಿ ಯಾಗುವದು.
25 ಯಾಕಂದರೆ ತಾನು ಎಲ್ಲಾ ವಿರೋಧಿ ಗಳನ್ನು ತನ್ನ ಪಾದಗಳ ಕೆಳಗೆ ಹಾಕುವ ತನಕ ಆತನು ಆಳುವದು ಅವಶ್ಯ.
26 ನಾಶವಾಗಲಿರುವ ಕಡೇ ಶತ್ರುವು ಮರಣ

.1 कुरिन्थियों 15:20-26

यीशु ने प्रथम फल  पर जी उठा ताकि हम जान सकें कि वह हमें मृत्यु से अपने पुनरुत्थान में साझा करने के लिए आमंत्रित करता है। जैसे प्रथम फल के बाद में एक भरपूरी वाली फसल की अपेक्षा नए वसंत में की जाती है, वैसे ही यीशु का ‘प्रथम फल’ के दिन जी उठना बाद में होने वाले पुनरुत्थान की अपेक्षा को थामे हुए है, जो उनके लिए होगा जो उससे संबंधित है।

वसंत का बीज

या इसे इस तरह से सोचें। दिन 1 में यीशु स्वयं को ‘बीज’ कहता है। जैसा होली वसंत में बीज से नए जीवन के अंकुरित होने के उत्सव को मनाती है, वैसे ही होली यीशु के नए जीवन की ओर भी इंगित करती है, जो ‘बीज’ है जो वसंत में फिर से जी उठा था।

अगला विचार मनु है

बाइबल मनु की अवधारणा का उपयोग करके यीशु के पुनरुत्थान की भी व्याख्या करती है। आरंभिक वेदों में, मनु सभी मानव जाति के पूर्वज थे। हम सब उसकी सन्तान हैं। पुराण प्रत्येक कल्प या युग (इस कल्प में श्राद्धदेव मनु के रूप में अवतरित हैं) एक नए मनु को सम्मिलित करते हैं। इब्रानी वेद बताते हैं कि यह मनु आदम था, मानव जाति पर मृत्यु आने के पश्चात् क्योंकि यह उससे उसकी सन्तान पर आई थी सभों के ऊपर आ गई।

परन्तु यीशु अगला मनु है। मृत्यु पर अपनी विजय के साथ उसने एक नए कल्प का उद्घाटन किया। उसकी सन्तान के रूप में हम भी यीशु की तरह जी उठते हुए मृत्यु पर इस विजय में हिस्सा लेंगे। उसका पुनरुत्थान सबसे पहले हुआ और हमारा पुनरुत्थान बाद में आएगा। वह हमें नए जीवन के अपने प्रथम फल का पालन करने के लिए आमंत्रित करता है।

ईस्टर: उस रविवार के पुनरुत्थान का उत्सव है

ईस्टर ईस्टर और होली दोनों रंगों के साथ मनाए जाते हैं

आज, हम अक्सर यीशु के पुनरुत्थान को ईस्टर कहते हैं, और ईस्टर ईतवार को उस रविवार की स्मरण दिलाता है, जिस दिन वह जी उठा था। कई लोग नए जीवन के प्रतीकों को रंगाई पुताई करते हुए ईस्टर के त्योहार को मनाते हैं, जैसे घरों की। जैसे हम होली को रंग के साथ मनाते हैं, वैसे ही ईस्टर को भी मनाया जाता है। जैसा कि होली नए आरम्भ का उत्सव मनाना है, ठीक वैसा ही ईस्टर के साथ है। ईस्टर मनाने का विशेष तरीका उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। प्रथम फल की पूर्ति के रूप में यीशु का पुनरुत्थान और उससे प्राप्त होने वाले लाभों को प्राप्त करना अधिक महत्वपूर्ण है।

हम इसे सप्ताह में दी हुई समयरेखा में देखते हैं:

 यीशु ने प्रथम फल के त्योहर पर मृत्यु में से जी उठा – मृत्यु से नए जीवन का प्रस्ताव आपको और मुझे दिया गया है।

गुड फ्राइडेका उत्तर दिया गया

यह हमारे प्रश्न ‘गुड फ्राइडे’ अर्थात् शुभ शुक्रवार ‘अच्छा’ क्यों है के बारे में उत्तर देता है।

9 ಆದರೂ ದೂತರಿಗಿಂತ ಸ್ವಲ್ಪ ಕಡಿಮೆಯಾಗಿ ಮಾಡಲ್ಪಟ್ಟ ಒಬ್ಬಾತನು ಅಂದರೆ ಯೇಸುವು, ಪ್ರಭಾವವನ್ನೂ ಮಾನವನ್ನೂ ಕಿರೀಟವಾಗಿ ಹೊಂದಿರುವದನ್ನು ನಾವು ನೋಡುತ್ತೇವೆ; ಆತನು ಮೃತಪಟ್ಟದ್ದರಿಂದಲೇ ಮಾನ ಪ್ರಭಾವಗಳನ್ನು ಹೊಂದಿದನು; ಆತನು ದೇವರ ಕೃಪೆ ಯಿಂದ ಎಲ್ಲರಿಗೋಸ್ಕರ ಮರ

ब्रानियों 2:9

पर हम यीशु को जो स्वर्गदूतों से कुछ ही कम किया गया था, मृत्यु का दु:ख उठाने के कारण महिमा और आदर का मुकुट पहिने हुए देखते हैं, ताकि परमेश्‍वर के अनुग्रह से वह हर एक मनुष्य के लिये मृत्यु का स्वाद चखे।

जब यीशु ने ‘मौत का स्वाद चखा’ तो उसने आपके, मेरे और सभी के लिए ऐसा किया। गुड फ्राइडे अर्थात् शुभ शुक्रवार ‘अच्छा’ इसलिए है, क्योंकि यह हमारे लिए अच्छा था।

यीशु के जी उठने पर विचार किया जाना

यीशु ने अपने पुनरुत्थान को प्रमाणित करने के लिए कई दिनों तक स्वयं को जीवित दिखाया, इसे यहाँ नीचे लिपिबद्ध किया गया है। परन्तु शिष्यों पर उसका पहला प्रगटीकरण:

…कहानी सी जान पड़ा

लूका 24:10

इसके लिए यीशु को यह करना पड़ा:

27 ಮೋಶೆಯ ಮತ್ತು ಎಲ್ಲಾ ಪ್ರವಾದಿ ಗಳಿಂದ ಆರಂಭಿಸಿ ಸಮಸ್ತ ಬರಹಗಳಲ್ಲಿ ತನ್ನ ವಿಷಯವಾದವುಗಳನ್ನು ಅವರಿಗೆ ವಿವರಿಸಿದನು

.लूका 24:27

और फिर इसके बाद में:

44 ಆಗ ಆತನು ಅವರಿಗೆ–ಮೋಶೆಯ ನ್ಯಾಯ ಪ್ರಮಾಣದಲ್ಲಿಯೂ ಪ್ರವಾದನೆಗಳಲ್ಲಿಯೂ ಕೀರ್ತನೆ ಗಳಲ್ಲಿಯೂ ನನ್ನನ್ನು ಕುರಿತಾಗಿ ಬರೆಯಲ್ಪಟ್ಟವು ಗಳೆಲ್ಲವು ನೆರವೇರುವದು ಅಗತ್ಯವಾಗಿದೆ ಎಂಬ ಈ ಮಾತುಗಳನ್ನು ನಾನು ನಿಮ್ಮೊಂದಿಗೆ ಇದ್ದಾಗಲೇ ಹೇಳಿದ್ದೆನು ಅಂದನು.

लूका 24:44

हम कैसे सुनिश्चित हो सकते हैं कि यही वास्तव में हमारे लिए सदैव के जीवन को देने के लिए परमेश्वर की योजना है? केवल परमेश्वर ही भविष्य को जानता है। ऋषियों ने सैकड़ों वर्षों पहले संकेत और भविष्यद्वाणियाँ को लिखा था ताकि हम यह सत्यापित कर सकें कि यीशु ने उन्हें पूरा किया है…

4 ಹೀಗೆ ನಿನಗೆ ಬೋಧಿಸಲ್ಪಟ್ಟವುಗಳು ಸ್ಥಿರವಾದವುಗಳೆಂದು ಇದರಿಂದ ನೀನು ತಿಳಿಯಬಹುದು.

लूका 1:4

यीशु की मृत्यु और पुनरुत्थान के बारे में जानकारी पाने के लिए, हम पता लगाते हैं:

1. इब्रानी वेद सृष्टि के बाद से दु:ख भोग सप्ताह को एक नाटकीय रूप में दिखाता है

2. ऐतिहासिक दृष्टिकोण से पुनरुत्थान के प्रमाण।

3. पुनरुत्थान के इस जीवन के उपहार को कैसे प्राप्त किया जाए।

4. भक्ति के माध्यम से यीशु को समझें

5. रामायण की दृष्टि से सुसमाचार।

दिन 7: सब्त के विश्राम में स्वस्तिक

शब्द स्वस्तिक  निम्न शब्दों से मिलकर बना है:

सु  – अच्छा, भला, मंगल

अस्ति  (अस्ति) – “यह है”

स्वस्तिक लोगों या स्थानों के कल्याण की कामना करने वाला एक आशीर्वाद या आशीष वचन है। यह परमेश्वर और आत्मा में विश्वास की घोषणा है। यह एक मानक, आत्मिक अभिव्यक्ति है, जिसका उपयोग एक व्यक्ति द्वारा अपनी भली मंशा को व्यक्त करने के लिए सामाजिक वार्तालाप और धार्मिक सभाओं में किया जाता है।

यह आशीष वचन/आशीर्वाद अपने दृश्य प्रतीक में, स्वस्तिक  के माध्यम से भी व्यक्त किया जाता है। दो-रेखाओं से बना स्वस्तिक  (卐) सहस्राब्दी के लिए दिव्यता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। परन्तु इसके विभिन्न तरह के अर्थ मिलते हैं, और नाजियों द्वारा सह-विकल्प के रूप में इसका पालन करने से इसे चारों ओर प्रतिष्ठा मिली है, इसलिए यह अब पूरे एशिया में पारम्परिक रूप से सकारात्मक भावना की तुलना में पश्चिम में नकारात्मक भावना को उत्पन्न करता है। स्वस्तिक की इस व्यापक रूप से विभिन्न तरह की धारणाओं के कारण ही यह शुभ शुक्रवार के बाद के दिन – दिन 7 के लिए उपयुक्त प्रतीक बनाता है।

दिन 7 – सब्त का विश्राम

दिन 6 में यीशु को क्रूस पर चढ़ाते हुए देखा गया था। उस दिन का अंतिम कार्यक्रम एक अधूरे कार्य को पूरा किए बिना यीशु का गाड़ा जाना था।

55 और उन स्त्रियों ने जो उसके साथ गलील से आईं थीं, पीछे पीछे जाकर उस कब्र को देखा, और यह भी कि उस की लोथ किस रीति से रखी गई है।
56 और लौटकर सुगन्धित वस्तुएं और इत्र तैयार किया: और सब्त के दिन तो उन्होंने आज्ञा के अनुसार विश्राम किया॥

लूका 23:55-56

स्त्रियाँ उसके शरीर पर सुंगधित द्रव्य लगानी चाहती थीं, परन्तु समय समाप्त हो गया था और सब्त का विश्राम शुक्रवार शाम को आरम्भ हो चुका था। यह सप्ताह के 7वें दिन आरम्भ हुआ, अर्थात् सब्त के दिन। यहूदी सब्त के दिन काम नहीं करते हैं, जो कि सृष्टि के वृतान्त को स्मरण दिलाता है। परमेश्वर द्वारा सारी सृष्टि की रचना 6 दिनों में किए जाने के पश्चात् इब्रानी वेदों कहते हैं कि:

आकाश और पृथ्वी और उनकी सारी सेना का बनाना समाप्त हो गया।
2 और परमेश्वर ने अपना काम जिसे वह करता था सातवें दिन समाप्त किया। और उसने अपने किए हुए सारे काम से सातवें दिन विश्राम किया

।उत्पत्ति 2:1-2

यद्यपि, स्त्रियाँ उसके शरीर के ऊपर सुंगन्धित द्रव्य मलना चाहती थीं, परन्तु उन्होंने अपने वेदों का पालन किया और विश्राम किया।

जबकि दूसरों ने काम किया

परन्तु मुख्य पुजारीगण अर्थात् याजक सब्त के दिन अपने काम को करते रहे।

62 दूसरे दिन जो तैयारी के दिन के बाद का दिन था, महायाजकों और फरीसियों ने पीलातुस के पास इकट्ठे होकर कहा।
63 हे महाराज, हमें स्मरण है, कि उस भरमाने वाले ने अपने जीते जी कहा था, कि मैं तीन दिन के बाद जी उठूंगा।
64 सो आज्ञा दे कि तीसरे दिन तक कब्र की रखवाली की जाए, ऐसा न हो कि उसके चेले आकर उसे चुरा ले जाएं, और लोगों से कहने लगें, कि वह मरे हुओं में से जी उठा है: तब पिछला धोखा पहिले से भी बुरा होगा।
65 पीलातुस ने उन से कहा, तुम्हारे पास पहरूए तो हैं जाओ, अपनी समझ के अनुसार रखवाली करो।
66 सो वे पहरूओं को साथ ले कर गए, और पत्थर पर मुहर लगाकर कब्र की रखवाली की॥

मत्ती 27:62-66

क्योंकि सब्त के दिन मुख्य पुजारियों ने काम किया, इसलिए उन्होंने उसकी कब्र की सुरक्षा पर प्रहरी को लगा दिया, जिसमें यीशु का मृत शरीर पड़ा हुआ था, जबकि स्त्रियों ने आज्ञाका पालन करते हुए विश्राम किया।

नरक में बन्दी आत्मा को छुटकारा देना

यद्यपि मनुष्य की दृष्टि में ऐसा लग लग रहा था कि मानो यीशु अपनी लड़ाई हार चुका था, तथापि इस दिन नरक में कुछ हुआ। बाइबल बताती है:

8 इसलिये वह कहता है, कि वह ऊंचे पर चढ़ा, और बन्धुवाई को बान्ध ले गया, और मनुष्यों को दान दिए।
9 (उसके चढ़ने से, और क्या पाया जाता है केवल यह, कि वह पृथ्वी की निचली जगहों में उतरा भी

था।इफिसियों 4:8-9

यीशु सबसे निचले क्षेत्रों में उतरा, जिसे हम नरक या पितृलोक कहते हैं, जहाँ पर हमारे पितरों (मृत पूर्वजों) को यम (यमराज) और यम-दूतों के द्वारा बन्दी बनाया जाता है। यम और चित्रगुप्त (धर्मराज) ने मृतकों को इसलिए बन्दी बना लिया था क्योंकि उनके पास उनके कर्मों का न्याय करने और उनके गुणों को तौलने का अधिकार था। परन्तु सुसमाचार ने घोषणा की कि यीशु, जबकि अपने शरीर में 7वें दिन मृत्यु में विश्राम कर रहा था, तौभी उसकी आत्मा उतरी और वहाँ के बन्दियों को मुक्त किया, तब इसके बाद उनके साथ स्वर्ग में ऊपर गई। जैसा कि आगे बताया गया है…

यम, यम-दूत और चित्रगुप्त को पराजित कर दिया

और रियासतों और शक्तियों को बिगाड़ने के बाद, उसने उन पर खुलेआम वार किया, और उन पर विजय पाई।

कुलुस्सियों 2:15

यीशु ने नरक के अधिकारियों (यम, यम-दूत और चित्रगुप्त) को पराजित किया, जिन्हें बाइबल शैतान (दोष लगाने वाला), इब्लीस (विरोधी), सर्प (नाग) और उनके अधीन कार्य करने वाले अधिकारी कहती है। यीशु की आत्मा इन अधिकारियों द्वारा बन्दी बनाए गए लोगों को छुटकारा देने के लिए नीचे उतरी थी।

जब यीशु इन बन्धुओं को नरक से मुक्त कर रहा था, तो पृथ्वी पर विद्यमान लोग इससे अनजान थे। जीवित लोगों ने सोचा कि यीशु अपनी मृत्यु के साथ लड़ाई में पराजित हो चुका है। यही क्रूस का विरोधाभास है। परिणाम एक साथ विभिन्न दिशाओं में इंगित करता है। दिन 6 उसकी मृत्यु से निकलने वाले दुखदायी परिणामों के साथ समाप्त हुआ। परन्तु यह नरक में बन्दियों के लिए जीत में परिवर्तित हो गया। दिन 6 की पराजय उनकी दिन 7 पर हुई जीत थी। जैसे स्वस्तिक एक साथ विपरीत दिशाओं की ओर इंगित करता है, इसी तरह क्रूस भी करता है।

प्रतीक के रूप में स्वस्तिक पर चिंतन

स्वस्तिक की केंद्रीय भुजाओं का चौराहा एक क्रूस को बनाता है। यही कारण है कि यीशु के आरम्भिक अनुयायियों ने स्वस्तिक को उनके अपने प्रतीक के रूप में उपयोग किया था।

क्योंकि क्रॉस ‘स्वस्तिक’ में है, स्वस्तिक यीशु को भक्ति दिखाने वाला एक पारंपरिक प्रतीक है
स्वस्तिक की केन्द्रीय भुजाएँ क्रूस का निर्माण करती हैं मध्यकालीन अंग्रेजी कब्र के ऊपर स्वस्तिक

इसके अतिरिक्त, भुजाओं के मुड़े हुए किनारे चारों दिशाओं में इंगित करते हैं, जो क्रूस के इन विरोधाभासों के प्रतीक हैं; दोनों में, अपनी पराजय और विजय, अपने लाभ और हानि, विनम्रता और जीत, दु:ख और आनन्द, मृत्यु में विश्राम करने वाला शरीर और स्वतंत्रता के लिए काम करने वाली आत्मा। उस दिन एक साथ कई विरोधास सामने आए, क्योंकि स्वस्तिक इसे बहुत अच्छी तरह से दिखाता है।

प्रत्येक स्थान के लिए स्वस्तिक

क्रूस का आशीर्वाद पृथ्वी के चारों कोनों तक चलता रहता है; उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम की ओर, यह चारों दिशाओं का प्रतीक है, जिसे मुड़ी हुई भुजाएँ संकेत देती हैं।

नाजी द्वेष भावना ने स्वस्तिक से आने वाले कल्याण को दूषित कर दिया है। अधिकांश पश्चिमी लोग अब इसे सकारात्मक रूप से स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए स्वस्तिक स्वयं इस बात का प्रतीक है कि अन्य प्रभाव कैसे भ्रष्ट कर सकते हैं और वे किसी भी चीज की पवित्रता को विकृत कर सकते हैं। पश्चिमी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद ने इसी तरह से सुसमाचार का अपहरण कर लिया। मूल रूप से मृत्यु की आशंका में आशा और शुभ सन्देश के इस एशियाई संदेश को, कई एशियाई अब यूरोपीय या पश्चिमी संस्कृति के पहिरावे में देखते हैं। जैसा कि हमने पश्चिमी लोगों को स्वास्तिक के नाजी सह-विकल्प को उसके गहरे इतिहास और प्रतीकवाद के अतीत से देखने के लिए प्रेरित किया, स्वस्तिक हमारे लिए बाइबल के पृष्ठों में पाए गए मूल सुसमाचार सन्देश के साथ ऐसा ही करने के लिए याद दिलाने वाला है।

अगले दिन की ओर इंगित करते हुए

परन्तु स्वस्तिक की यह तुला स्वरूप पाई जाने वाली पार्श्व भुजाएँ हैं, जो विशेष रूप से सब्त के 7वें दिन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

दिन 7का दृष्टिकोण:  पीछे दिन 6 और आगे पुनरुत्थान के पहले फलों की ओर देखते हुए

दिन 7 क्रूस और अगले दिन क्रसीकरण के बीच में आता है। परिणामस्वरूप, स्वस्तिक की निचली पार्श्व भुजा शुभ शुक्रवार और उसकी घटनाओं की ओर इंगित करती है। ऊपरी पार्श्व भुजा अगले दिन, नए सप्ताह के रविवार की ओर इंगित करती है, जब यीशु उस दिन मृत्यु को पराजित कर देता है, जिसे मूल रूप से प्रथम फल  कहा जाता है।

दिन 7 :इब्रानी वेदों के नियमों की तुलना में यीशु के शरीर के लिए सब्त का विश्राम

दिन 6: शुभ शुक्रवार – यीशु की महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि (शिव की बड़ी रात) का उत्सव फाल्गुन (फरवरी/मार्च) के 13वें दिन की शाम को आरम्भ होता है, 14वें दिन में जारी रहता है। अन्य त्योहारों से अलग, यह सूर्यास्त के बाद आरम्भ होता है और पूरी रात चलता हुआ अगले दिन सुबह तक जाता है। अन्य त्योहारों के विशेष उल्लासपूर्ण भोज समारोह और आनन्द के स्थान पर यह त्योहार उपवास, आत्मविश्लेषण और सतर्कता को चिह्नित करती है। महाशिवरात्रि जीवन और संसार में “अंधकार और अज्ञान पर जय पाने” को स्मरण करती है। उत्साही भक्त पूरी रात जागरण करते हैं।

महाशिवरात्रि एवं समुद्र का मंथन करना

पौराणिक कथाओं में महाशिवरात्रि के कई कारण दिए गए हैं। कुछ कहते हैं कि इस दिन भगवान् शिव ने समुद्र मंथन के समय उत्पन्न हलाहल विष को अपने कंठ में रख लिया था। इसने उनके गले को नीला कर दिया और इसलिए उनका नाम नीलकंठ  पड़ गया। भागवत पुराण, महाभारत और विष्णु पुराण इस गाथा का वर्णन करते हैं, जो साथ ही अमरता के अमृत की व्याख्या भी करते हैं। कहानी कुछ इस प्रकार मिलती है कि देवों और असुरों ने एक अस्थायी गठबंधन बनाकर, अमरता के इस अमृत को प्राप्त करने के लिए समुद्र का मंथन किया। समुद्र का मंथन करने के लिए उन्होंने मंदार पर्वत को एक लाठी के रूप में उपयोग किया। उन्होंने वासुकी का उपयोग किया, जो कि एक नागराज है, जिसे उन्होंने शिव के गले के साथ, मंथन वाली एक रस्सी के रूप में बाँध दिया।

समुद्र के मंथन ने बहुत अधिक कलाकृति को जन्म दिया ह

समुद्र के आगे-पीछे मंथन करने से, साँप वासुकी ने एक घातक जहर को इतनी अधिक शक्ति के साथ उगला कि यह न केवल समुद्र को अपितु संसार के सभी कुछ को भी नष्ट कर देती। उन्हें बचाने के लिए शिव ने जहर को अपने मुँह में थाम लिया और इससे उनका गला नीला हो गया। कुछ संस्करण कहते हैं कि भगवान शिव ने जहर को निगल लिया था और जहर के उनके शरीर में प्रवेश करते ही उन्हें अत्याधिक पीड़ा हुई। इस कारण से, श्रद्धालु इस अवसर को उपवास के साथ,  सौहार्दपूर्ण और आत्मविश्लेषण वाले तरीके से मनाते हैं।

बहरूपिया शिव साँप के जहर को लेने का मंचन करते हुए

इस उत्सव को मनाती हुई समुद्र मंथन और महाशिवरात्रि की कहानी, उस विषय के लिए संदर्भ प्रदान करती है जिसे यीशु ने दु:ख भोग के 6वें दिन में किया था, इसलिए हम इसके अर्थ की सराहना कर सकते हैं।

यीशु और प्रतीकात्मक समुद्र मंथन

जब यीशु ने 1ले दिन यरुशलेम में प्रवेश किया, तो वह मोरिय्याह पहाड़ के ऊपर खड़ा था, जहाँ 2000 वर्षों पहले अब्राहम ने भविष्यद्वाणी की थी कि एक महान बलिदान प्रदान किया ‘जाएगा’ (भविष्य में)। तब यीशु ने घोषणा की थी कि:

31 अब इस जगत का न्याय होता है, अब इस जगत का सरदार निकाल दिया

जाएगा।यूहन्ना 12:31
क्रूस पर सामना करते हुए साँप की बहुत सी कलाकृतियों को बनाया गया है

यह ‘संसार’ उस पर्वत पर होने वाले संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमने वाला है, जो कि उसके और इस संसार के ‘राजकुमार‘, शैतान के बीच होने पर है, जिसे अक्सर एक साँप के रूप में दर्शाया जाता है। प्रतीकात्मक रूप से बोलना, मोरिय्याह पर्वत मंदार पर्वत, एक घूमने वाली लाठी, जो आने वाले युद्ध में पूरे संसार का मंथन करेगी।

साँप (नागराज) शैतान ने यीशु मसीह पर आक्रमण करने के लिए 5वें दिन यहूदा में प्रवेश किया था। जैसे वासुकी एक मंथन की रस्सी बन गए थे, आलंकारिक रूप से बोलना मोरिय्याह पर्वत के चारों ओर मंथन करने वाली रस्सी शैतान बन जाएगा क्योंकि इन दोनों के बीच लड़ाई अपने चरमोत्कर्ष पर थी।

अन्तिम भोज

अगली शाम यीशु ने अपने शिष्यों के साथ अंतिम भोज को साझा किया। यह माह की 13वीं शाम थी, जैसे महाशिवरात्रि महीने की 13वीं तिथि को आरम्भ होती है। उस भोज में यीशु ने उस ‘प्याले’ के बारे में साझा किया था जिसे वह पीने के लिए जा रहा था, ठीक वैसे जैसे शिव ने वासुकी का जहर पिया था। यहाँ वह चर्चा इस प्रकार दी गई है।

27 फिर उस ने कटोरा लेकर, धन्यवाद किया, और उन्हें देकर कहा, तुम सब इस में से पीओ।
28 क्योंकि यह वाचा का मेरा वह लोहू है, जो बहुतों के लिये पापों की क्षमा के निमित्त बहाया

जाता है।मत्ती 26:27-28

फिर उसने उदाहरण के माध्यम से समझाया और एक दूसरे से प्रेम करने और हमारे लिए परमेश्वर के महान प्रेम के बारे में शिक्षा दी, इसे यहाँ सुसमाचार से लिपिबद्ध किया गया है। इसके बाद, उसने सभी विश्वासियों के लिए प्रार्थना की (यहाँ पढ़ें)।

गतसमनी की वाटिका में

फिर, जैसा कि हमें महाशिवरात्रि में मिलता है, उसने वाटिका में अपनी पूरी रात को आरम्भ किया

36 तब यीशु ने अपने चेलों के साथ गतसमनी नाम एक स्थान में आया और अपने चेलों से कहने लगा कि यहीं बैठे रहना, जब तक कि मैं वहां जाकर प्रार्थना करूं।
37 और वह पतरस और जब्दी के दोनों पुत्रों को साथ ले गया, और उदास और व्याकुल होने लगा।
38 तब उस ने उन से कहा; मेरा जी बहुत उदास है, यहां तक कि मेरे प्राण निकला चाहते: तुम यहीं ठहरो, और मेरे साथ जागते रहो।
39 फिर वह थोड़ा और आगे बढ़कर मुंह के बल गिरा, और यह प्रार्थना करने लगा, कि हे मेरे पिता, यदि हो सके, तो यह कटोरा मुझ से टल जाए; तौभी जैसा मैं चाहता हूं वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।
40 फिर चेलों के पास आकर उन्हें सोते पाया, और पतरस से कहा; क्या तुम मेरे साथ एक घड़ी भी न जाग सके?
41 जागते रहो, और प्रार्थना करते रहो, कि तुम परीक्षा में न पड़ो: आत्मा तो तैयार है, परन्तु शरीर दुर्बल है।
42 फिर उस ने दूसरी बार जाकर यह प्रार्थना की; कि हे मेरे पिता, यदि यह मेरे पीए बिना नहीं हट सकता तो तेरी इच्छा पूरी हो।
43 तब उस ने आकर उन्हें फिर सोते पाया, क्योंकि उन की आंखें नींद से भरी थीं।
44 और उन्हें छोड़कर फिर चला गया, और वही बात फिर कहकर, तीसरी बार प्रार्थना की।
45 तब उस ने चेलों के पास आकर उन से कहा; अब सोते रहो, और विश्राम करो: देखो, घड़ी आ पहुंची है, और मनुष्य का पुत्र पापियों के हाथ पकड़वाया जाता है।
46 उठो, चलें; देखो, मेरा पकड़वाने वाला निकट आ पहुंचा है॥

मत्ती 26:36-46

शिष्य जागते नहीं रह पाए और जागरण तो बस अभी आरम्भ ही हुआ था! सुसमाचार फिर वर्णन करता है कि कैसे यहूदा ने उसे धोखा दिया।

वाटिका में गिरफ्तारी

2और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी वह जगह जानता था, क्योंकि यीशु अपने चेलों के साथ वहां जाया करता था।
3 तब यहूदा पलटन को और महायाजकों और फरीसियों की ओर से प्यादों को लेकर दीपकों और मशालों और हथियारों को लिए हुए वहां आया।
4 तब यीशु उन सब बातों को जो उस पर आनेवाली थीं, जानकर निकला, और उन से कहने लगा, किसे ढूंढ़ते हो?
5 उन्होंने उस को उत्तर दिया, यीशु नासरी को: यीशु ने उन से कहा, मैं ही हूं: और उसका पकड़वाने वाला यहूदा भी उन के साथ खड़ा था।
6 उसके यह कहते ही, कि मैं हूं, वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पड़े।
7 तब उस ने फिर उन से पूछा, तुम किस को ढूंढ़ते हो।
8 वे बोले, यीशु नासरी को। यीशु ने उत्तर दिया, मैं तो तुम से कह चुका हूं कि मैं ही हूं, यदि मुझे ढूंढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।
9 यह इसलिये हुआ, कि वह वचन पूरा हो, जो उस ने कहा था कि जिन्हें तू ने मुझे दिया, उन में से मैं ने एक को भी न खोया।
10 शमौन पतरस ने तलवार, जो उसके पास थी, खींची और महायाजक के दास पर चलाकर, उसका दाहिना कान उड़ा दिया, उस दास का नाम मलखुस था।
11 तब यीशु ने पतरस से कहा, अपनी तलवार काठी में रख: जो कटोरा पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे न पीऊं?
12 तब सिपाहियों और उन के सूबेदार और यहूदियों के प्यादों ने यीशु को पकड़कर बान्ध लिया।
13 और पहिले उसे हन्ना के पास ले गए क्योंकि वह उस वर्ष के महायाजक काइफा का ससुर था

।यूहन्ना 18:2-13
यीशु की गिरफ्तारी: फिल्म का दृश्य

यीशु प्रार्थना करने के लिए वाटिका में गया था। वहाँ यहूदा अपने साथ उसे गिरफ्तार करने के लिए सैनिकों को ले आया। यदि गिरफ्तारी हमें खतरे में डालती है तो हम इससे लड़ने, इससे भागने या छिपाने का प्रयास कर सकते हैं। परन्तु यीशु ने स्वीकार किया कि उसने इनमें से कुछ भी नहीं किया था। उसने स्वीकार किया कि वह वही व्यक्ति था जिसे वे खोज रहे थे। उसकी स्पष्ट स्वीकारोक्ति (“मैं ही वही हूँ”) ने सैनिकों को चौंका दिया इस कारण उसके शिष्य वहाँ से भाग गए। यीशु को गिरफ्तार कर लिया गया और पूछताछ के लिए ले जाया गया।

पहली पूछताछ

सुसमाचार लिपिबद्ध करता है कि उन्होंने उससे कैसे पूछताछ की:

19 तक महायाजक ने यीशु से उसके चेलों के विषय में और उसके उपदेश के विषय में पूछा।
20 यीशु ने उस को उत्तर दिया, कि मैं ने जगत से खोलकर बातें की; मैं ने सभाओं और आराधनालय में जहां सब यहूदी इकट्ठे हुआ करते हैं सदा उपदेश किया और गुप्त में कुछ भी नहीं कहा।
21 तू मुझ से क्यों पूछता है? सुनने वालों से पूछ: कि मैं ने उन से क्या कहा? देख वे जानते हैं; कि मैं ने क्या क्या कहा
22 तब उस ने यह कहा, तो प्यादों में से एक ने जो पास खड़ा था, यीशु को थप्पड़ मारकर कहा, क्या तू महायाजक को इस प्रकार उत्तर देता है।
23 यीशु ने उसे उत्तर दिया, यदि मैं ने बुरा कहा, तो उस बुराई पर गवाही दे; परन्तु यदि भला कहा, तो मुझे क्यों मारता है?
24 हन्ना ने उसे बन्धे हुए काइफा महायाजक के पास भेज दिया॥

यूहन्ना18:19-24

इसलिए उन्होंने यीशु से दूसरी बार पूछताछ के लिए महायाजक के पास भेजा।

दूसरी पूछताछ

वहाँ उन्होंने सभी अगुवों के सामने उससे पूछताछ की। सुसमाचार में यह दूसरी पूछताछ इस तरह से लिपिबद्ध है:

53 फिर वे यीशु को महायाजक के पास ले गए; और सब महायाजक और पुरिनए और शास्त्री उसके यहां इकट्ठे हो गए।
54 पतरस दूर ही दूर से उसके पीछे पीछे महायाजक के आंगन के भीतर तक गया, और प्यादों के साथ बैठ कर आग तापने लगा।
55 महायाजक और सारी महासभा यीशु के मार डालने के लिये उसके विरोध में गवाही की खोज में थे, पर न मिली।
56 क्योंकि बहुतेरे उसके विरोध में झूठी गवाही दे रहे थे, पर उन की गवाही एक सी न थी।
57 तब कितनों ने उठकर उस पर यह झूठी गवाही दी।
58 कि हम ने इसे यह कहते सुना है कि मैं इस हाथ के बनाए हुए मन्दिर को ढ़ा दूंगा, और तीन दिन में दूसरा बनाऊंगा, जो हाथ से न बना हो।
59 इस पर भी उन की गवाही एक सी न निकली।
60 तब महायाजक ने बीच में खड़े होकर यीशु से पूछा; कि तू कोई उत्तर नहीं देता? ये लोग तेरे विरोध में क्या गवाही देते हैं?
61 परन्तु वह मौन साधे रहा, और कुछ उत्तर न दिया: महायाजक ने उस से फिर पूछा, क्या तू उस पर म धन्य का पुत्र मसीह है?
62 यीशु ने कहा; हां मैं हूं: और तुम मनुष्य के पुत्र को सर्वशक्तिमान की दाहिनी और बैठे, और आकाश के बादलों के साथ आते देखोगे।
63 तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़कर कहा; अब हमें गवाहों का और क्या प्रयोजन है
64 तुम ने यह निन्दा सुनी: तुम्हारी क्या राय है? उन सब ने कहा, वह वध के योग्य है।
65 तब कोई तो उस पर थूकने, और कोई उसका मुंह ढांपने और उसे घूसे मारने, और उस से कहने लगे, कि भविष्यद्वाणी कर: और प्यादों ने उसे लेकर थप्पड़ मारे॥

मरकुस 14:53-65

यहूदी अगुवों ने यीशु पर मृत्यु दण्ड का दोष लगाया। चूँकि रोमी उनके ऊपर शासन करते थे, परिणामस्वरूप केवल रोमी राज्यपाल ही मृत्यु दण्ड दिए जाने की अनुमति दे सकता था। इसलिए वे यीशु को रोमी राज्यपाल पिन्तुस पिलातुस के पास ले गए। सुसमाचार यह भी बताता है कि यहूदा इस्करियोती, यीशु के साथ विश्वासघात करने वाले के साथ क्या हुआ।

विश्वासघात करने वाले का क्या हुआ?

ब भोर हुई, तो सब महायाजकों और लोगों के पुरनियों ने यीशु के मार डालने की सम्मति की।
2 और उन्होंने उसे बान्धा और ले जाकर पीलातुस हाकिम के हाथ में सौंप दिया॥
3 जब उसके पकड़वाने वाले यहूदा ने देखा कि वह दोषी ठहराया गया है तो वह पछताया और वे तीस चान्दी के सिक्के महायाजकों और पुरनियों के पास फेर लाया।
4 और कहा, मैं ने निर्दोषी को घात के लिये पकड़वाकर पाप किया है? उन्होंने कहा, हमें क्या? तू ही जान।
5 तब वह उन सिक्कों मन्दिर में फेंककर चला गया, और जाकर अपने आप को

फांसी दी।मत्ती 27:1-5

यीशु की पूछताछ रोमी राज्यपाल द्वारा किया जाना

11 जब यीशु हाकिम के साम्हने खड़ा था, तो हाकिम ने उस से पूछा; कि क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उस से कहा, तू आप ही कह रहा है।
12 जब महायाजक और पुरिनए उस पर दोष लगा रहे थे, तो उस ने कुछ उत्तर नहीं दिया।
13 इस पर पीलातुस ने उस से कहा: क्या तू नहीं सुनता, कि ये तेरे विरोध में कितनी गवाहियां दे रहे हैं?
14 परन्तु उस ने उस को एक बात का भी उत्तर नहीं दिया, यहां तक कि हाकिम को बड़ा आश्चर्य हुआ।
15 और हाकिम की यह रीति थी, कि उस पर्व्व में लोगों के लिये किसी एक बन्धुए को जिसे वे चाहते थे, छोड़ देता था।
16 उस समय बरअब्बा नाम उन्हीं में का एक नामी बन्धुआ था।
17 सो जब वे इकट्ठे हुए, तो पीलातुस ने उन से कहा; तुम किस को चाहते हो, कि मैं तुम्हारे लिये छोड़ दूं? बरअब्बा को, या यीशु को जो मसीह कहलाता है?
18 क्योंकि वह जानता था कि उन्होंने उसे डाह से पकड़वाया है।
19 जब वह न्याय की गद्दी पर बैठा हुआ था तो उस की पत्नी ने उसे कहला भेजा, कि तू उस धर्मी के मामले में हाथ न डालना; क्योंकि मैं ने आज स्वप्न में उसके कारण बहुत दुख उठाया है।
20 महायाजकों और पुरनियों ने लोगों को उभारा, कि वे बरअब्बा को मांग ले, और यीशु को नाश कराएं।
21 हाकिम ने उन से पूछा, कि इन दोनों में से किस को चाहते हो, कि तुम्हारे लिये छोड़ दूं? उन्होंने कहा; बरअब्बा को।
22 पीलातुस ने उन से पूछा; फिर यीशु को जो मसीह कहलाता है, क्या करूं? सब ने उस से कहा, वह क्रूस पर चढ़ाया जाए।
23 हाकिम ने कहा; क्यों उस ने क्या बुराई की है? परन्तु वे और भी चिल्ला, चिल्लाकर कहने लगे, “वह क्रूस पर चढ़ाया जाए”।
24 जब पीलातुस ने देखा, कि कुछ बन नहीं पड़ता परन्तु इस के विपरीत हुल्लड़ होता जाता है, तो उस ने पानी लेकर भीड़ के साम्हने अपने हाथ धोए, और कहा; मैं इस धर्मी के लोहू से निर्दोष हूं; तुम ही जानो।
25 सब लोगों ने उत्तर दिया, कि इस का लोहू हम पर और हमारी सन्तान पर हो।
26 इस पर उस ने बरअब्बा को उन के लिये छोड़ दिया, और यीशु को कोड़े लगवाकर सौंप दिया, कि क्रूस पर चढ़ाया

जाए॥मत्ती 27:11-26

क्रूसीकरण, मृत्यु एवं यीशु का गाड़ा जाना

सुसमाचार फिर यीशु के क्रूस के विवरण को लिपिबद्ध करता है।

27 तब हाकिम के सिपाहियों ने यीशु को किले में ले जाकर सारी पलटन उसके चहुं ओर इकट्ठी की।
28 और उसके कपड़े उतारकर उसे किरिमजी बागा पहिनाया।
29 और काटों को मुकुट गूंथकर उसके सिर पर रखा; और उसके दाहिने हाथ में सरकण्डा दिया और उसके आगे घुटने टेककर उसे ठट्ठे में उड़ाने लगे, कि हे यहूदियों के राजा नमस्कार।
30 और उस पर थूका; और वही सरकण्डा लेकर उसके सिर पर मारने लगे।
31 जब वे उसका ठट्ठा कर चुके, तो वह बागा उस पर से उतारकर फिर उसी के कपड़े उसे पहिनाए, और क्रूस पर चढ़ाने के लिये ले चले॥
32 बाहर जाते हुए उन्हें शमौन नाम एक कुरेनी मनुष्य मिला, उन्होंने उसे बेगार में पकड़ा कि उसका क्रूस उठा ले चले।
33 और उस स्थान पर जो गुलगुता नाम की जगह अर्थात खोपड़ी का स्थान कहलाता है पहुंचकर।
34 उन्होंने पित्त मिलाया हुआ दाखरस उसे पीने को दिया, परन्तु उस ने चखकर पीना न चाहा।
35 तब उन्होंने उसे क्रूस पर चढ़ाया; और चिट्ठियां डालकर उसके कपड़े बांट लिए।
36 और वहां बैठकर उसका पहरा देने लगे।
37 और उसका दोषपत्र, उसके सिर के ऊपर लगाया, कि “यह यहूदियों का राजा यीशु है”।
38 तब उसके साथ दो डाकू एक दाहिने और एक बाएं क्रूसों पर चढ़ाए गए।
39 और आने जाने वाले सिर हिला हिलाकर उस की निन्दा करते थे।
40 और यह कहते थे, कि हे मन्दिर के ढाने वाले और तीन दिन में बनाने वाले, अपने आप को तो बचा; यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो क्रूस पर से उतर आ।
41 इसी रीति से महायाजक भी शास्त्रियों और पुरनियों समेत ठट्ठा कर करके कहते थे, इस ने औरों को बचाया, और अपने को नहीं बचा सकता।
42 यह तो “इस्राएल का राजा है”। अब क्रूस पर से उतर आए, तो हम उस पर विश्वास करें।
43 उस ने परमेश्वर का भरोसा रखा है, यदि वह इस को चाहता है, तो अब इसे छुड़ा ले, क्योंकि इस ने कहा था, कि “मैं परमेश्वर का पुत्र हूं”।
44 इसी प्रकार डाकू भी जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे उस की निन्दा करते थे॥
45 दोपहर से लेकर तीसरे पहर तक उस सारे देश में अन्धेरा छाया रहा।
46 तीसरे पहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकारकर कहा, एली, एली, लमा शबक्तनी अर्थात हे मेरे परमेश्वर, हे मेरे परमेश्वर, तू ने मुझे क्यों छोड़ दिया?
47 जो वहां खड़े थे, उन में से कितनों ने यह सुनकर कहा, वह तो एलिय्याह को पुकारता है।
48 उन में से एक तुरन्त दौड़ा, और स्पंज लेकर सिरके में डुबोया, और सरकण्डे पर रखकर उसे चुसाया।
49 औरों ने कहा, रह जाओ, देखें, एलिय्याह उसे बचाने आता है कि नहीं।
50 तब यीशु ने फिर बड़े शब्द से चिल्लाकर प्राण छोड़ दिए।
51 और देखो मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो टुकड़े हो गया: और धरती डोल गई और चटानें तड़क गईं।
52 और कब्रें खुल गईं; और सोए हुए पवित्र लोगों की बहुत लोथें जी उठीं।
53 और उसके जी उठने के बाद वे कब्रों में से निकलकर पवित्र नगर में गए, और बहुतों को दिखाई दिए।
54 तब सूबेदार और जो उसके साथ यीशु का पहरा दे रहे थे, भुईंडोल और जो कुछ हुआ था, देखकर अत्यन्त डर गए, और कहा, सचमुच “यह परमेश्वर का पुत्र था”

।मत्ती 27:27-54
क्रूसित यीशु: उसके जीवन का सबसे अधिक चित्रित दृश्य

उसकी पसली में बेधा जाना

यूहन्ना का सुसमाचार क्रूस का एक आकर्षक विवरण लिपिबद्ध करता है। यह कहता है:

31 और इसलिये कि वह तैयारी का दिन था, यहूदियों ने पीलातुस से बिनती की कि उन की टांगे तोड़ दी जाएं और वे उतारे जाएं ताकि सब्त के दिन वे क्रूसों पर न रहें, क्योंकि वह सब्त का दिन बड़ा दिन था।
32 सो सिपाहियों ने आकर पहिले की टांगें तोड़ीं तब दूसरे की भी, जो उसके साथ क्रूसों पर चढ़ाए गए थे।
33 परन्तु जब यीशु के पास आकर देखा कि वह मर चुका है, तो उस की टांगें न तोड़ीं।
34 परन्तु सिपाहियों में से एक ने बरछे से उसका पंजर बेधा और उस में से तुरन्त लोहू और पानी निकला।
35 जिस ने यह देखा, उसी ने गवाही दी है, और उस की गवाही सच्ची है; और वह जानता है, कि सच कहता है कि तुम भी विश्वास करो।

यूहन्ना 19:31-35

यूहन्ना ने देखा कि भाले के साथ रोमी सैनिकों ने यीशु की पसली को बेधा था। इसमें से लहू और पानी अलग निकल कर आए, जो यह दर्शाता हैं कि वह ह्दय गति रुकने से मरा था।

यीशु की पसली को बेधा गया

बहुत से लोग महाशिवरात्रि के उत्सव को इसलिए भी मनाते हैं क्योंकि वे ये मानते हैं कि इस दिन शिव ने पार्वती से विवाह किया था। शुभ शुक्रवार के समांतर महाशिवरात्रि के इसी दिन यीशु ने अपनी रहस्यमय दुल्हन को भी जीत लिया था, जिस पर उसकी पसली में भाला बेधने से छाप लगा दी गई है, इसे आगे यहाँ बताया गया है।

यीशु का गाड़ा जाना

सुसमाचार उस दिन की अंतिम घटना – उसके गाड़े जाने को लिपिबद्ध करता है ।

57 जब सांझ हुई तो यूसुफ नाम अरिमतियाह का एक धनी मनुष्य जो आप ही यीशु का चेला था आया: उस ने पीलातुस के पास जाकर यीशु की लोथ मांगी।
58 इस पर पीलातुस ने दे देने की आज्ञा दी।
59 यूसुफ ने लोथ को लेकर उसे उज्ज़वल चादर में लपेटा।
60 और उसे अपनी नई कब्र में रखा, जो उस ने चट्टान में खुदवाई थी, और कब्र के द्वार पर बड़ा पत्थर लुढ़काकर चला गया।
61 और मरियम मगदलीनी और दूसरी मरियम वहां कब्र के साम्हने बैठी

थीं॥मत्ती 27:57-61

दिन 6शुभ शुक्रवार

यहूदी पंचांग अर्थात् कैलेंडर में प्रत्येक दिन सूर्यास्त के समय आरम्भ होता है। इसलिए दिन 6 का आरम्भ यीशु ने अपने शिष्यों के साथ अपने अंतिम भोज को साझा करने के साथ किया। उस दिन के अंत में उसे गिरफ्तार कर लिया गया था, उसकी जाँच पूरी रात भर में कई बार हुई, उसे क्रूस पर चढ़ाया गया, भाले से बेधा गया और गाड़ा गया। यह वास्तव में ‘यीशु की बड़ी रात थी।’  पीड़ा, दुःख, अपमान और मृत्यु ने इस दिन को चिह्नित किया और इसलिए लोग इसे महाशिवरात्रि के रूप में स्मरण करते हैं। इस दिन को ‘शुभ शुक्रवार’ कहा जाता है। परन्तु कैसे विश्वासघात, यातना और मृत्यु वाले दिन को ‘शुभ’ कहा जा सकता है?

क्यों शुभ शुक्रवार और क्यों नहीं ‘बुरा शुक्रवार’?

जैसे शिव के द्वारा साँप के जहर को निगलने के द्वारा संसार बचा था, वैसे ही यीशु के द्वारा प्याले में से पीने के द्वारा संसार को बचा लिया गया है। यह दिन निसान महीने के 14वें दिन आया,  उसी फसह के दिन जब बलिदान किए गए मेम्नों ने 1500 वर्षों पहले मृत्यु से बचाया था, जो यह दिखाता है कि इस योजना को पहले से ही बनाया गया था।

दिन 6 – शुक्रवार, इब्रानी वेदों के नियमों की तुलना में

लोगों के वृतान्त उनकी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाते हैं, परन्तु यीशु का नहीं। इसके बाद दिन 7 – सब्त का दिन आया।

दिन 5: होलिका के विश्वासघात के साथ, शैतान मारने के लिए फन उठता है

हिंदू वर्ष की अंतिम पूर्णिमा होली का प्रतीक है। यद्यपि बहुत से लोग इसे आनन्द के साथ मनाते हैं, तथापि केवल कुछ ही पहचानते हैं कि इसका समानांतर एक अन्य प्राचीन त्योहार – फसह में पाया जाता है।

फसह भी वसंत ऋतु में पूर्णिमा के दिन आता है। चूंकि इब्रानी कैलेंडर के सौर वर्ष चंद्र चक्रों के साथ भिन्न तरीके से मेल खाते हैं, इसलिए कभी-कभी यह उसी पूर्णिमा पर, या कभी-कभी आने वाली पूर्णिमा के दिन आता है। 2021 में, फसह और होली दोनों रविवार, 28 मार्च से आरम्भ होगी। परन्तु 2022 में, होली 18 मार्च से आरम्भ होगी, जबकि फसह आने वाली पूर्णिमा के साथ आरम्भ होगा। यद्यपि, यह होली की शाम या होलिका दहन है, जिसमें फसह की समानताएँ पाए जाती हैं।

होलिका दहन

होली आरम्भ होने से एक रात पहले लोग होलिका दहन (छोटी होली या कामदु की चिता) करते हैं। होलिका दहन में प्रह्लाद की भलाई और रक्षिका होलिका  को जलाना स्मरण किया जाता है। कहानी राक्षस राजा हिरण्यकश्यप और उसके पुत्र प्रह्लाद के साथ आरम्भ होती है। हिरण्यकश्यप ने पूरी पृथ्वी पर विजय प्राप्त की। उसे इतना अधिक घमण्ड हो गया था कि उसने अपने राज्य में हर किसी को केवल उसकी ही पूजा करने की आज्ञा दी। परन्तु उसे बड़ी निराशा तब हुई, जब उसके अपने ही पुत्र, प्रह्लाद ने ऐसा करने से मना कर दिया।

अपने पुत्र के स्पष्ट इन्कार से क्रोधित, हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को मौत की सजा दी और उसे मारने के कई प्रयास किए, परन्तु वह सभी प्रयास विफल रहे। जहरीले सापों के काटने से, हाथियों द्वारा रौंदने से, प्रह्लाद सदैव बिना किसी परेशानी के बना रहा।

अंत में, हिरण्यकश्यप अपनी राक्षणी बहन होलिका की ओर सहायता के लिए मुड़ा। उसके पास एक लबादा था जिसके ओढने से आग का प्रभाव शून्य हो जाता है। इसलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका को प्रह्लाद को जलाकर मारने के लिए कहा। होलिका एक चिता पर बैठी और मित्रता का नाटक करते हुए युवा प्रहलाद को अपनी गोद में ले लिया। फिर शीघ्रता से किए जाने वाले विश्वासघात में, उसने अपने परिचारकों को चिता को जलाने का आदेश दिया। यद्यपि, होलिका का लबादा उसके ऊपर से उतर गया और उसने प्रह्लाद को ढक लिया। आग की लपटों ने प्रह्लाद को नहीं जलाया, जबकि होलिका अपनी बुरी साजिश के साथ जल कर मर गई। इस प्रकार, होली दहन का नाम होलिका दहन से मिलता है।

यहूदा: होलिका की तरह विश्वासघात से नियन्त्रित

बाइबल शैतान को आतमाओं पर शासन करने वाले राक्षक के रूप में चित्रित करती है। हिरण्यकश्यप की तरह, शैतान भी यीशु सहित सभी को उसकी आराधना करने की साजिश रच रहा था। जब वह अपने प्रयास में असफल हो गया तो उसने यीशु की हत्या करने के लिए अपनी साजिश पर काम करने के लिए लोगों के साथ चालाकी से काम किया। जैसे हिरण्यकश्यप ने होलिका के माध्यम से प्रह्लाद को मारने के लिए काम किया था, शैतान ने यीशु को मारने के लिए 5वें दिन यहूदा का उपयोग किया, ठीक उसके बाद यीशु ने उसके फिर से लौट आने के विषय में शिक्षा दी। यहाँ पर विवरण दिया गया है:

1अखमीरी रोटी का पर्व जो फसह कहलाता है, निकट था; 2और प्रधान याजक और शास्त्री इस बात की खोज में थे कि उसको कैसे मार डालें, पर वे लोगों से डरते थे। 3 ‘तब शैतान यहूदा में समाया’, जो इस्करियोती कहलाता और बारह चेलों में गिना जाता था। 4उसने जाकर प्रधान याजकों और पहरुओं के सरदारों के साथ बातचीत की कि उसको किस प्रकार उनके हाथ पकड़वाए। 5वे आनन्दित हुए, और उसे रुपये देने का वचन दिया। 6उसने मान लिया, और अवसर ढूँढ़ने लगा कि जब भीड़ न हो तो उसे उनके हाथ पकड़वा दे।

लूका 22:1-6

शैतान ने यीशु के साथ विश्वासघात करने के लिए यहूदा में ‘प्रवेश’ करते हुए उनके संघर्ष से लाभ उठाया। इससे हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सुसमाचार शैतान का वर्णन इस तरह से करता है:

7फिर स्वर्ग में लड़ाई हुई, मीकाईल और उसके स्वर्गदूत अजगर से लड़ने को निकले; और अजगर और उसके दूत उससे लड़े, 8परन्तु प्रबल न हुए, और स्वर्ग में उनके लिये फिर जगह न रही। 9तब वह बड़ा अजगर, अर्थात् वही पुराना साँप जो इब्लीस और शैतान कहलाता है और सारे संसार का भरमानेवाला है, पृथ्वी पर गिरा दिया गया, और उसके दूत उसके साथ गिरा दिए गए।

प्रकाशितवाक्य 12:7-9

बाइबल शैतान की तुलना एक शक्तिशाली अजगर के रूप में करती है जो इतना अधिक चालाक है कि पूरे संसार को भटका सकता है, वह हिरण्यकश्यप के जैसे शक्तिशाली रक्षक है। मानव इतिहास के आरम्भ में हुए संघर्ष की भविष्यद्वाणी करने का वर्णन करते हुए उसकी तुलना एक साँप से भी की जाती है। यह प्राचीन साँप अब मारने के लिए फन उठाता है। उसने यीशु को खत्म करने के लिए यहूदा के साथ धूर्ततापूर्ण रीति से काम किया ठीक वैसे ही जैसे हिरण्यकश्यप ने होलिका के माध्यम से काम किया था। सुसमाचार इसे इस तरह से लिपिबद्ध करता है:

तब से यहूदा ने उसे सौंपने के अवसर के लिए देखा।

मत्ती 26:16

अगले दिन, दिन 6, फसह का त्योहार था। यहूदा के माध्यम से शैतान, कैसे मारेगा? यहूदा का क्या होगा? हम इसे अगले लेख में देखते हैं।

दिन 5 सारांश

समयरेखा बताती है कि सप्ताह के इस 5वें दिन में, बड़ा राक्षस अजगर, शैतान अपने शत्रु यीशु को मारने के लिए फन उठाता है।

दिन 5: शैतान, बड़ा राक्षस अजगर, यीशु को मारने के लिए यहूदा में प्रवेश करता है

दिन 4: सितारों से प्रकाश को ले लेने के लिए कल्कि की तरह सवारी करना

यीशु ने अपने देश को बन्धुवाई में जाने के लिए, 3रे-दिन एक शाप का उच्चारण किया। यीशु ने यह भी भविष्यद्वाणी की थी कि उसका शाप समाप्त हो जाएगा, जो इस युग का समाप्त करने वाली घटनाओं को गतिमान करेगा। शिष्यों ने इसके बारे में पूछा और यीशु ने कल्कि (कल्किन) की तरह अपने वापस लौटने का वर्णन करते हुए उन्हें समझाया।

उसने यह कहते हुए आरम्भ किया।

ब यीशु मन्दिर से निकलकर जा रहा था, तो उसके चेले उस को मन्दिर की रचना दिखाने के लिये उस के पास आए।
2 उस ने उन से कहा, क्या तुम यह सब नहीं देखते? मैं तुम से सच कहता हूं, यहां पत्थर पर पत्थर भी न छूटेगा, जो ढाया न जाएगा।
3 और जब वह जैतून पहाड़ पर बैठा था, तो चेलों ने अलग उसके पास आकर कहा, हम से कह कि ये बातें कब होंगी और तेरे आने का, और जगत के अन्त का क्या चिन्ह होगा?

मत्ती 24:1-3

उसने अपने शाप का विवरण देकर आरम्भ किया। तब शाम को उसने मंदिर को यरूशलेम से बाहर जैतून के पहाड़ पर जाते हुए छोड़ दिया (i)। चूंकि यहूदी दिन सूर्यास्त के बाद आरम्भ होता है, इसलिए अब वह सप्ताह का 4था दिन था जब उसने अपने वापस लौट आने का वर्णन किया।

पौराणिक कथाओं में कल्कि

गरुड़ पुराण में कल्कि को विष्णु के दशावतार (दस प्राथमिक अवतार/जन्म लेने) के अंतिम अवतार के रूप में वर्णित किया गया है। कलियुग, अर्थात् वर्तमान युग के अंत में कल्कि का अवतार होगा। पुराणों में कहा गया है कि कल्कि के प्रकट होने से ठीक पहले संसार पतित हो जाएगी, धर्म समाप्त हो जाएगा। लोग अप्राकृतिक यौन संबंधों में संलग्न होंगे, उनका लगाव नग्नता और अधर्मी आचरण से, विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं और विपत्तियों के साथ हो जाएगा । समय के इस बिंदु पर, कल्कि का, उग्र तलवार चलाने वाले और घोड़े की सवारी करते हुए अवतार दिखाई देगा। कल्कि पृथ्वी पर एक नए युग का सूत्रपात करते हुए इसमें रहने वाले दुष्ट निवासियों को नष्ट कर देगा, जिससे संसार में सतयुग की वापसी हो जाएगी।

यद्यपि, विकिपीडिया कहता है कि वेदों में कल्कि/कल्किन का उल्लेख नहीं मिलता है। वह परशुराम के विस्तार, 6वें अवतार के रूप में महाभारत में पहली बार दिखाई देता है। महाभारत के इस संस्करण में, कल्कि केवल दुष्ट शासकों को नष्ट करता है, परन्तु सतयुग के बारे में नवीकरण को नहीं लाता है। विद्वानों का सुझाव है कि 7-9वीं शताब्दी ईस्वी सन् में कल्कि का आदिरूप विकसित होता दिखाई देता है।

कल्कि के लिए तीव्र इच्छा को होना

कल्कि और अन्य परंपराओं में इसी तरह के व्यक्तियों (बौद्ध धर्म में मैत्रेय, इस्लाम में महदी, और सिख धर्म में महदी मीर) का विकास हमारे सहज ज्ञान को दर्शाता है कि संसार में कुछ तो गलत है। हम चाहते हैं कि कोई आए और इसे सही करे। हम चाहते हैं कि वह दुष्ट अत्याचारियों को हटाए, भ्रष्टाचार को दूर करे और धर्म का उत्थान करे। परन्तु हम भूल जाते हैं कि उसे न केवल संसार से बुराई को दूरकरना चाहिए अपितु हमारे भीतर व्याप्त भ्रष्टाचार को भी दूर करना चाहिए। इससे पहले कि अन्य पवित्र ग्रंथों ने उसके आगमन के विषय में बात की, बुराई को पराजित करने और किसी के आगमन की तीव्र इच्छा के विषय में यीशु ने शिक्षा दी कि कैसे वह दो-भागों वाले इस काम को करेगा। अपने पहले आगमन पर हमारे भीतरी भ्रष्टाचार को शुद्ध करता है, परन्तु अपने दूसरे आगमन पर वह सरकार और सामाजिक अधर्म के साथ निपटारा करता है। यीशु ने इस सप्ताह के 4थे दिन अपने फिर से लौट आने के चिन्हों का वर्णन करते हुए अपने दूसरे आगमन की बात की।

दिन 4 – उसके वापसी के चिन्ह

4 यीशु ने उन को उत्तर दिया, सावधान रहो! कोई तुम्हें न भरमाने पाए।
5 क्योंकि बहुत से ऐसे होंगे जो मेरे नाम से आकर कहेंगे, कि मैं मसीह हूं: और बहुतों को भरमाएंगे।
6 तुम लड़ाइयों और लड़ाइयों की चर्चा सुनोगे; देखो घबरा न जाना क्योंकि इन का होना अवश्य है, परन्तु उस समय अन्त न होगा।
7 क्योंकि जाति पर जाति, और राज्य पर राज्य चढ़ाई करेगा, और जगह जगह अकाल पड़ेंगे, और भुईंडोल होंगे।
8 ये सब बातें पीड़ाओं का आरम्भ होंगी।
9 तब वे क्लेश दिलाने के लिये तुम्हें पकड़वाएंगे, और तुम्हें मार डालेंगे और मेरे नाम के कारण सब जातियों के लोग तुम से बैर रखेंगे।
10 तब बहुतेरे ठोकर खाएंगे, और एक दूसरे से बैर रखेंगे।
11 और बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बहुतों को भरमाएंगे।
12 और अधर्म के बढ़ने से बहुतों का प्रेम ठण्डा हो जाएगा।
13 परन्तु जो अन्त तक धीरज धरे रहेगा, उसी का उद्धार होगा।
14 और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा॥
15 सो जब तुम उस उजाड़ने वाली घृणित वस्तु को जिस की चर्चा दानिय्येल भविष्यद्वक्ता के द्वारा हुई थी, पवित्र स्थान में खड़ी हुई देखो, (जो पढ़े, वह समझे )।
16 तब जो यहूदिया में हों वे पहाड़ों पर भाग जाएं।
17 जो को ठे पर हों, वह अपने घर में से सामान लेने को न उतरे।
18 और जो खेत में हों, वह अपना कपड़ा लेने को पीछे न लौटे।
19 उन दिनों में जो गर्भवती और दूध पिलाती होंगी, उन के लिये हाय, हाय।
20 और प्रार्थना किया करो; कि तुम्हें जाड़े में या सब्त के दिन भागना न पड़े।
21 क्योंकि उस समय ऐसा भारी क्लेश होगा, जैसा जगत के आरम्भ से न अब तक हुआ, और न कभी होगा।
22 और यदि वे दिन घटाए न जाते, तो कोई प्राणी न बचता; परन्तु चुने हुओं के कारण वे दिन घटाए जाएंगे।
23 उस समय यदि कोई तुम से कहे, कि देखो, मसीह यहां हैं! या वहां है तो प्रतीति न करना।
24 क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिन्ह और अद्भुत काम दिखाएंगे, कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी भरमा दें।
25 देखो, मैं ने पहिले से तुम से यह सब कुछ कह दिया है।
26 इसलिये यदि वे तुम से कहें, देखो, वह जंगल में है, तो बाहर न निकल जाना; देखो, वह को ठिरयों में हैं, तो प्रतीति न करना।
27 क्योंकि जैसे बिजली पूर्व से निकलकर पश्चिम तक चमकती जाती है, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का भी आना होगा।
28 जहां लोथ हो, वहीं गिद्ध इकट्ठे होंगे॥
29 उन दिनों के क्लेश के बाद तुरन्त सूर्य अन्धियारा हो जाएगा, और चान्द का प्रकाश जाता रहेगा, और तारे आकाश से गिर पड़ेंगे और आकाश की शक्तियां हिलाई जाएंगी।
30 तब मनुष्य के पुत्र का चिन्ह आकाश में दिखाई देगा, और तब पृथ्वी के सब कुलों के लोग छाती पीटेंगे; और मनुष्य के पुत्र को बड़ी सामर्थ और ऐश्वर्य के साथ आकाश के बादलों पर आते देखेंगे।
31 और वह तुरही के बड़े शब्द के साथ, अपने दूतों को भेजेगा, और वे आकाश के इस छोर से उस छोर तक, चारों दिशा से उसके चुने हुओं को इकट्ठे

करेंगे।मत्ती 24:4-31

4थे दिन यीशु ने मंदिर पर आने वाले विनाश को देखा। उन्होंने शिक्षा दी कि बढ़ती हुई बुराई, भूकम्प, अकाल, युद्ध और सताव उनके फिर से लौट आने से पहले इस संसार के गुण होंगे। तौभी, उसने भविष्यद्वाणी की कि सुसमाचार अभी भी पूरे संसार में घोषित किया जाएगा (पद 14)। जैसे-जैसे संसार मसीह के बारे में शिक्षा प्राप्त करता जाएगा वैसे-वैसे उसके और उसके आगमन के विषय में इसमें झूठे शिक्षकों और मिथ्या दावों करने वालों की गिनती बढ़ेगी। निर्विवाद लौकिक गड़बड़ी युद्धों, अराजकता और संकट के बीच में उसकी वापसी का सच्चा चिन्ह होगा। वह सितारों, सूरज और चन्द्रमा से प्रकाश को ले लेगा।

उसकी वापसी का वर्णन

यूहन्ना ने बाद में उसकी वापसी का वर्णन करते हुए कहा कि यह कल्कि की तरह होगा:

11 फिर मैं ने स्वर्ग को खुला हुआ देखा; और देखता हूं कि एक श्वेत घोड़ा है; और उस पर एक सवार है, जो विश्वास योग्य, और सत्य कहलाता है; और वह धर्म के साथ न्याय और लड़ाई करता है।
12 उस की आंखे आग की ज्वाला हैं: और उसके सिर पर बहुत से राजमुकुट हैं; और उसका एक नाम लिखा है, जिस उस को छोड़ और कोई नहीं जानता।
13 और वह लोहू से छिड़का हुआ वस्त्र पहिने है: और उसका नाम परमेश्वर का वचन है।
14 और स्वर्ग की सेना श्वेत घोड़ों पर सवार और श्वेत और शुद्ध मलमल पहिने हुए उसके पीछे पीछे है।
15 और जाति जाति को मारने के लिये उसके मुंह से एक चोखी तलवार निकलती है, और वह लोहे का राजदण्ड लिए हुए उन पर राज्य करेगा, और वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के भयानक प्रकोप की जलजलाहट की मदिरा के कुंड में दाख रौंदेगा।
16 और उसके वस्त्र और जांघ पर यह नाम लिखा है, राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु॥
17 फिर मैं ने एक स्वर्गदूत को सूर्य पर खड़े हुए देखा, और उस ने बड़े शब्द से पुकार कर आकाश के बीच में से उड़ने वाले सब पक्षियों से कहा, आओ परमेश्वर की बड़ी बियारी के लिये इकट्ठे हो जाओ।
18 जिस से तुम राजाओं का मांस, ओर सरदारों का मांस, और शक्तिमान पुरूषों का मांस, और घोड़ों का, और उन के सवारों का मांस, और क्या स्वतंत्र, क्या दास, क्या छोटे, क्या बड़े, सब लोगों का मांस खाओ॥
19 फिर मैं ने उस पशु और पृथ्वी के राजाओं और उन की सेनाओं को उस घोड़े के सवार, और उस की सेना से लड़ने के लिये इकट्ठे देखा।
20 और वह पशु और उसके साथ वह झूठा भविष्यद्वक्ता पकड़ा गया, जिस ने उसके साम्हने ऐसे चिन्ह दिखाए थे, जिन के द्वारा उस ने उन को भरमाया, जिन्हों ने उस पशु की छाप ली थी, और जो उस की मूरत की पूजा करते थे, ये दोनों जीते जी उस आग की झील में जो गन्धक से जलती है, डाले गए।
21 और शेष लोग उस घोड़े के सवार की तलवार से जो उसके मुंह से निकलती थी, मार डाले गए; और सब पड़ी उन के मांस से तृप्त हो गए॥

प्रकाशितवाक्य 19:11-21

चिन्हों का आंकलन करना

हम देख सकते हैं कि युद्ध, संकट और भूकम्प बढ़ रहे हैं – इसलिए उसकी वापसी का समय निकट आ रहा है। परन्तु अभी भी स्वर्ग में कोई हलचल नहीं पाई जाती  है, इसलिए उसकी वापसी अभी तक नहीं हुई है।

हम उसके कितने निकट हैं?

इसका उत्तर देने के लिए यीशु आगे बताता है

32 अंजीर के पेड़ से यह दृष्टान्त सीखो: जब उस की डाली को मल हो जाती और पत्ते निकलने लगते हैं, तो तुम जान लेते हो, कि ग्रीष्म काल निकट है।
33 इसी रीति से जब तुम इन सब बातों को देखो, तो जान लो, कि वह निकट है, वरन द्वार ही पर है।
34 मैं तुम से सच कहता हूं, कि जब तक ये सब बातें पूरी न हो लें, तब तक यह पीढ़ी जाती न रहेगी।
35 आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे, परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।

मत्ती 24:32-35

अंजीर का पेड़ हमारी आंखों के सामने हरा हो रहा है

उस अंजीर के पेड़ को स्मरण करें, जो इस्राएल का प्रतीक है, जिसे उसने 3रे दिन शाप दिया था? 70 ईस्वी सन्न में इस्राएल का सूखना अर्थात् खत्म होना तब आरम्भ हुआ था जब रोमियों ने मन्दिर को नष्ट कर दिया और यह 1900 वर्षों तक मुरझाया रहा। यीशु ने हमें बताया कि अंजीर के पेड़ से निकलने वाली हरी रंग की शाखाओं को देखने से पता लगा लें कि उसकी वापसी “निकट” है। पिछले 70 वर्षों में हमने इस अंजीर के पेड़को हरे होते हुए और फिर से पत्तियों को अंकुरित होते हुए देखा है। हाँ, इसने हमारे समय में युद्धों, संकट और परेशानियों को जोड़ा है, परन्तु इससे हमें यह आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि हमें उसने इसके बारे में पहले से ही चेतावनी दी है।

इसलिए, हमें अपने समय में चिन्ता और सतर्कता का अभ्यास करना चाहिए क्योंकि उसने अपनी वापसी के बारे में लापरवाही और उदासीनता के विरूद्ध चेतावनी दी थी।

36 उस दिन और उस घड़ी के विषय में कोई नहीं जानता, न स्वर्ग के दूत, और न पुत्र, परन्तु केवल पिता।
37 जैसे नूह के दिन थे, वैसा ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा।
38 क्योंकि जैसे जल-प्रलय से पहिले के दिनों में, जिस दिन तक कि नूह जहाज पर न चढ़ा, उस दिन तक लोग खाते-पीते थे, और उन में ब्याह शादी होती थी।
39 और जब तक जल-प्रलय आकर उन सब को बहा न ले गया, तब तक उन को कुछ भी मालूम न पड़ा; वैसे ही मनुष्य के पुत्र का आना भी होगा।
40 उस समय दो जन खेत में होंगे, एक ले लिया जाएगा और दूसरा छोड़ दिया जाएगा।
41 दो स्त्रियां चक्की पीसती रहेंगी, एक ले ली जाएगी, और दूसरी छोड़ दी जाएगी।
42 इसलिये जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारा प्रभु किस दिन आएगा।
43 परन्तु यह जान लो कि यदि घर का स्वामी जानता होता कि चोर किस पहर आएगा, तो जागता रहता; और अपने घर में सेंध लगने न देता।
44 इसलिये तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी के विषय में तुम सोचते भी नहीं हो, उसी घड़ी मनुष्य का पुत्र आ जाएगा।
45 सो वह विश्वासयोग्य और बुद्धिमान दास कौन है, जिसे स्वामी ने अपने नौकर चाकरों पर सरदार ठहराया, कि समय पर उन्हें भोजन दे?
46 धन्य है, वह दास, जिसे उसका स्वामी आकर ऐसा की करते पाए।
47 मैं तुम से सच कहता हूं; वह उसे अपनी सारी संपत्ति पर सरदार ठहराएगा।
48 परन्तु यदि वह दुष्ट दास सोचने लगे, कि मेरे स्वामी के आने में देर है।
49 और अपने साथी दासों को पीटने लगे, और पियक्कड़ों के साथ खाए पीए।
50 तो उस दास का स्वामी ऐसे दिन आएगा, जब वह उस की बाट न जोहता हो।
51 और ऐसी घड़ी कि वह न जानता हो, और उसे भारी ताड़ना देकर, उसका भाग कपटियों के साथ ठहराएगा: वहां रोना और दांत पीसना होगा॥

मत्ती 24:36-51

यीशु अपनी शिक्षा देते रहते हैं। इसका लिंक यहाँ पर है।

दिन 4 का सार

दु:ख भोग सप्ताह के 4थे दिन बुधवार को, यीशु ने अपनी वापसी के चिन्हों का वर्णन – आकाश के सभी गणों के अन्धेरा होने के चरमोत्कर्ष के साथ किया।

दिन 4:इब्रानी वेदों के नियमों की तुलना में दु:ख भोग सप्ताह की घटनाएँ

उसने हम सभी को उसकी वापसी के लिए सावधानीपूर्वक प्रतिक्षा की चेतावनी दी। चूंकि अब हम अंजीर के पेड़ को हरा-भरा देख सकते हैं, इसलिए हमें ध्यान रखना चाहिए।

सुसमाचार लिपिबद्ध करता है कि कैसे उसका शत्रु अगले, दिन 5 में उसके विरूद्ध गया।

________________________________________

[i] उस सप्ताह के प्रत्येक दिन का वर्णन करते हुए, लूका ऐसा बताते हैं:

लूका 21:37

दिन 3: यीशु सूखाने वाले शाप को उच्चारित करते हैं

दुर्वासा शकुंतला को शाप देता हैं

हम पुराणों में शापों (श्राप) के बारे में पढ़ते और सुनते हैं। शायद यह शाप सबसे अधिक प्रसिद्ध, प्राचीन नाटककार कालिदास (400 ईस्वी सन्) के अभिज्ञान शाकुन्तलम्  (शकुंतला की स्वीकृति) नाटक में मिलता है, जिसका मंचन आज भी नियमित रूप से किया जाता है। इसमें राजा दुष्यंत जंगल में मिलने वाली एक खूबसूरत स्त्री शकुंतला से मिलते हैं और उसके प्रेम में पड़ जाते हैं। दुष्यंत जल्दी ही उससे विवाह कर लेते हैं, परन्तु जल्द ही उन्हें राजपाठ के कार्यों के लिए राजधानी लौटना होगा और इसलिए वह प्रस्थान करते हैं, वह शकुंतला को छाप लगाने वाली अपनी अंगूठी के साथ छोड़ देते हैं। शकुंतला, गहरे प्रेम में पड़े हुए, अपने नए पति के ख्यालों में डूबी रहती है।

जब वह अपने काल्पनिक संसार में खोई हुई थी तब वहाँ उसके सामने से एक शक्तिशाली ऋषि दुर्वासा गुजरे, क्योंकि उसने ऋषि पर कोई ध्यान न दिया और उनका अभिवादन नहीं किया परिणामस्वरूप ऋषि क्रोधित हो गए। इसलिए उन्होंने उसे शाप दिया कि वह जिस किसी के बारे में कल्पना कर रही थी, वह उससे सदैव अपरिचित रहेगी। फिर उसने शाप के प्रभाव को यह कहते हुए कम कर दिया कि यदि वह उस व्यक्ति द्वारा दिए गए उपहार को वापस कर दे तो वह उसे स्मरण करेगा। इसलिए शकुंतला ने अंगूठी के साथ राजधानी की यात्रा इस आशा को करते हुए की कि राजा दुष्यंत उसे स्मरण करेंगे। परन्तु उस यात्रा में अंगूठी कहीं खो गई परिणामस्वरूप राजा ने उसके पहुँचने पर उसे नहीं पहचाना।

भृगु विष्णु को शाप देते हैं

मतस्य पुराण सदा देव-असुर युद्धों के बारे में बताता है, जिसमें देवता सदैव जीतते हैं। अपमानित, असुरों के गुरु, शुक्राचार्य, शिव के मृतसंजीवनी स्तोत्र, या असुरों को अजेय बनाने के लिए शिव से संपर्क स्थापित किया, और इसलिए उसने अपने असुरों को अपने पिता (भृगु) के आश्रम में शरण लेने दी। परन्तु शुक्राचार्य के जाने के बाद, देवों ने असुरों पर फिर से आक्रमण किया। यद्यपि, असुरों ने भृगु की पत्नी से सहायता प्राप्त की, जिसने इंद्र को गतिहीन कर दिया। बदले में इंद्र ने भगवान् विष्णु से छुटकारा पाने के लिए आग्रह किया। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से भृगु की पत्नी का सिर काटकर अलग कर दिया। जब ऋषि भृगु ने देखा कि उनकी पत्नी के साथ क्या हुआ है, तो उन्होंने विष्णु को पृथ्वी पर बार-बार जन्म लेने का शाप दिया, जिससे कि वे सांसारिक जीवन की पीड़ा से पीड़ित हों। इसलिए, विष्णु को कई बार अवतार लेना पड़ा।

विष्णु को श्राप देने के लिए भृगु आते हैं

कहानियों में शाप बहुत अधिक डरावने मिलते हैं, परन्तु वे यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या वास्तव में ऐसा हुआ था या नहीं। दुर्वासा का शकुंतला को या भृगु का विष्णु को शाप दिया जाना गंभीरता को उत्पन्न करता है यदि हम यह जाने लें कि वास्तव में ऐसा ही हुआ था।

यीशु ने पवित्र सप्ताह के दिन 3 में इसी तरह के एक शाप को दिया था। पहले हम सप्ताह की समीक्षा करते हैं।

यीशु की ओर से बढ़ता हुआ संघर्ष

यीशु के द्वारा भविष्यद्वाणी किए हुए रविवार के दिन यरूशलेम में प्रवेश करने के बाद और फिर सोमवार के दिन मंदिर को बंद करने से, यहूदी अगुवों ने उसे मारने की योजना बनाई। परन्तु ऐसा सीधे-सीधे नहीं होगा।

परमेश्वर ने यीशु को अपने फसह के मेम्ने के रूप में चुना था जब यीशु ने निसान 10 के दिन मंदिर में प्रवेश किया था। इब्रानी वेद संचालित करते हैं कि चुने हुए फसह के मेम्नों के साथ क्या करना है

और उसे चाहे भेड़ों में से लेना चाहे बकरियों में से। 6और इस महीने के चौदहवें दिन तक उसे रख छोड़ना।

निर्गमन 12:5ब-6अ

जैसे लोग फसह के अपने मेम्ने की देखभाल करते हैं, ठीक वैसे ही परमेश्वर फसह के अपने मेम्ने की देखभाल की और यीशु के शत्रु उसे (अभी तक) पकड़ नहीं पाए थे। इसलिए सुसमाचार लिपिबद्ध करता है कि यीशु ने उस सप्ताह के अगले दिन, मंगलवार, दिन 3 में क्या किया।

यीशु ने अंजीर के पेड़ को शाप दिया

17तब वह उन्हें छोड़कर (सोमवार दिन 2, निसान 10) नगर के बाहर बैतनिय्याह को गया और वहाँ रात बिताई। 18भोर (मंगलवार निसान 11, दिन 3) को जब वह नगर को लौट रहा था तो उसे भूख लगी। 19सड़क के किनारे अंजीर का एक पेड़ देखकर वह उसके पास गया, और पत्तों को छोड़ उसमें और कुछ न पाकर उससे कहा, “अब से तुझ में फिर कभी फल न लगें।” और अंजीर का पेड़ तुरन्त सूख गया।

मत्ती 21:17-19
यीशु अंजीर के पेड़ को शाप देते हैं

उसने ऐसा क्यों किया?

इसका क्या अर्थ था?

अंजीर के पेड़ का अर्थ

पूर्व में आए भविष्द्वक्ताओं ने इसके विषय में हमें समझ दी है। यहाँ देखें कि कैसे इब्रानी वेदों ने इस्राएल पर न्याय के चित्र के लिए अंजीर के पेड़ का उपयोग किया है:

होशे इससे भी आगे, अंजीर के पेड़ के चित्र का उपयोग करते हुए और फिर इस्राएल को शाप देते हुए बताता है:

10 मैं ने इस्राएल को ऐसा पाया जैसे कोई जंगल में दाख पाए; और तुम्हारे पुरखाओं पर ऐसे दृष्टि की जैसे अंजीर के पहिले फलों पर दृष्टि की जाती है। परन्तु उन्होंने पोर के बाल के पास जा कर अपने तईं लज्जा का कारण होने के लिये अर्पण कर दिया, और जिस पर मोहित हो गए थे, वे उसी के समान घिनौने हो गए।

होशे 9:10

16 एप्रैम मारा हुआ है, उनकी जड़ सूख गई, उन में फल न लगेगा। और चाहे उनकी स्त्रियां बच्चे भी न जनें तौभी मैं उनके जन्मे हुए दुलारों को मार डालूंगा॥
17 मेरा परमेश्वर उन को निकम्मा ठहराएगा, क्योंकि उन्होंने उसकी नहीं सुनी। वे अन्यजातियों के बीच मारे मारे फिरेंगे॥

होशे 9:16-17 (एप्रैम = इस्राएल)

586 ईसा पूर्व में यरूशलेम के विनाश ने इन और मूसा के शापों (इतिहास देखें) को पूरा किया। जब यीशु ने अंजीर के पेड़ को शाप दिया, तो वह प्रतीकात्मक रूप से यरूशलेम पर आने वाले एक और  विनाश और इसकी भूमि से यहूदियों के निर्वासित होने का उच्चारण कर रहा था। उसने उन्हें फिर से निर्वासित होने का शाप दिया।

अंजीर के पेड़ को शाप देने के बाद, यीशु ने मंदिर में फिर से प्रवेश किया, शिक्षा दी और बहस की। सुसमाचार इसे इस तरह से लिपिबद्ध करता है।

शाप अधिकार जमा लेता है

हम इतिहास से जानते हैं कि यरूशलेम और उसके मंदिर का नाश, और यहूदियों का विश्वव्यापी निर्वासन 70 ईस्वी सन् में हुआ। इनमें से कुछ निर्वासित यहूदी भारत में आए।

70 ईस्वी सन् में मंदिर के नाश के साथ ही इस्राएल का सूखना आरम्भ हुआ और यह हजारों वर्षों तक मुरझाया रहा।

70 ईस्वी सन् से यरूशलेम के मंदिर का रोमियों द्वारा विनाश। संरक्षित रोमी मूर्तियां उन्हें मंदिर को लूटने और मेनोराह जैसी चीजों (बड़ी, 7-मोमबत्ती अधिकारियों वाली दीवट) को अपने अधिकार में लेती हुई दिखाती हुईं।

यह शाप केवल सुसमाचार कहानी के पृष्टों तक ही सीमित नहीं है। हम इतिहास में इस घटना के घटित होने को सत्यापित कर सकते हैं, जिसने भारत के इतिहास को भी प्रभावित किया। यीशु द्वारा उच्चारित सूखाने का यह शाप  वास्तव में सामर्थी था। उसके दिन में लोगों ने उसे उनके अपने विनाश के लिए इसे अनदेखा कर दिया था।

मंदिर के विनाश का प्रदर्शन आज भी चल रहा है

शाप समाप्त हो जाएगा।

यीशु ने बाद में स्पष्ट किया कि वह शाप कैसे आएगा और यह कब तक चलेगा।

वे (यहूदी) तलवार के कौर हो जाएँगे, और सब देशों के लोगों में बन्दी होकर पहुँचाए जाएँगे; और जब तक अन्य जातियों का समय पूरा न हो, तब तक यरूशलेम अन्य जातियों से रौंदा जाएगा।

लूका 21:24

उसने शिक्षा दी कि उसका शाप (निर्वासन और यरूशलेम पर गैर-यहूदी नियंत्रण) केवल तब ‘तक चलेगा जब तक कि अन्यजातियों (गैर-यहूदियों) का समय पूरा नहीं हो जाता’, यह भविष्यद्वाणी करते हुए कि उसका शाप समाप्त हो जाएगा। उसने इसे आगे 4थे दिन में समझाया है।

शाप हटा लिया गया

उनके निर्वासन की दो अवधियों को दिखाते हुए – बड़े पैमाने पर यहूदियों की ऐतिहासिक समयरेखा

यहाँ विवरण के साथ यह समयरेखा यहूदियों के इतिहास को दिखाती हैं। आज के आधुनिक दिन में, इस समयरेखा से पता चलता है कि निर्वासन समाप्त हो गया है। 1948 में, संयुक्त राष्ट्र की एक घोषणा के अनुसार, आधुनिक राज्य इस्राएल की स्थापना हुई थी। 1967 के छह दिवसीय युद्ध में उन्होंने यरूशलेम शहर पर कब्जा कर लिया, जो अब इस्राएल की राजधानी है। हम समाचार के उल्लेखों पाते हैं कि ‘अन्यजातियों के समय’ का अन्त हो रहा है।

बड़े पैमाने पर यहूदियों की ऐतिहासिक समयरेखा – निर्वासन के अपने दो अवधियों की विशेषता

यीशु के शाप का आरम्भ और समाप्ति, जो प्रतीकात्मक रूप से अंजीर के पेड़ के लिए बोला गया और फिर उसके श्रोताओं को समझाया गया था, केवल सुसमाचार के पृष्ठों पर ही नहीं मिलता है। ये घटनाएँ सत्य हैं, आज समाचारों की सुर्खियाँ बनती हैं (उदाहरण के लिए, यूएसए ने अपने दूतावास को यरूशलेम में स्थानांतरित कर दिया)। यीशु ने बड़े ओजस्वी तरीके से शिक्षा दी, प्राकृति के ऊपर ‘ओम’ बोलते हुए और अब हम देखते हैं कि उसका शाप हजारों वर्षों तक राष्ट्रों पर अपनी छाप को छोड़ता है। हम उसे अपने संकट में अनदेखा करते हैं।

यहूदी अब मंदिर स्थल पर फिर से प्रार्थना करते हैं

यीशु के शाप का आरम्भ और समाप्ति, जो प्रतीकात्मक रूप से अंजीर के पेड़ के लिए बोला गया और फिर उसके श्रोताओं को समझाया गया था, केवल सुसमाचार के पृष्ठों पर ही नहीं मिलता है। ये घटनाएँ सत्य हैं, आज समाचारों की सुर्खियाँ बनती हैं (उदाहरण के लिए,यूएसए ने अपने दूतावास को यरूशलेम में स्थानांतरित कर दिया)। यीशु ने बड़े ओजस्वी तरीके से शिक्षा दी, प्राकृति के ऊपर ‘ओम’ बोलते हुए और अब हम देखते हैं कि उसका शाप हजारों वर्षों तक राष्ट्रों पर अपनी छाप को छोड़ता है। हम उसे अपने संकट में अनदेखा करते हैं।

दिन 3 का सारांश

अपडेट किया गया चार्ट यीशु को मंगलवार दिन 3, में अंजीर के पेड़ को शाप देते हुए दिखाता है, जबकि साथ ही परमेश्वर के चुने हुए मेम्ने के रूप में उस पर ध्यान देता है। 4थे दिन वह अपनी आने वाली वापसी का वर्णन करता है, एक कल्कि जो सभी गलतियों को सही करेगा।

दिन 3: यीशु ने अंजीर के पेड़ को शाप दिया