आरम्भ से ही – मोक्ष की प्रतिज्ञा

मेरे पिछले कुछ लेखों में मैंने यह देखा कि कैसे उसकी आरम्भिक रची हुई अवस्था से पाप में गिर कर मनुष्य पतित हो गया। परन्तु बाइबल (वेद पुस्तक) एक ऐसी योजना को आगे बढ़ाती है जो परमेश्‍वर के पास आरम्भ से ही था। यह योजना एक ऐसी प्रतिज्ञा के ऊपर आधारित है जिसे तब निर्गत किया गया था और यही वह योजना है जो पुरूषासूक्ता में भी गूँजती रहता है।

बाइबल – एक वास्तविक पुस्तकालय

इस प्रतिज्ञा की विशेषता की सराहना करने के लिए हमें बाइबल के बारे में कुछ मूल सच्चाइयों को जानना आवश्यक है। यद्यपि यह एक पुस्तक है, और हम इसे इसी रूप में सोचते हैं, यह एक चलित पुस्तकालय है ऐसा सोचना वास्तव में और अधिक सटीक होगा है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह पुस्तकों का एक संग्रह, जो कि विभिन्न परिस्थितियों से आने वाले लेखकों के द्वारा, लगभग 1500 वर्षों से अधिक लम्बी अवधि के मध्य में लिखी गई है। आज यह पुस्तकें एक ही पुस्तक – बाइबल में इकट्ठी कर दी गई हैं । यही एक तथ्य बाइबल को संसार की महान् पुस्तकों में ऋग्वेद की तरह विशेष बना देता है। विभिन्न तरह के लेखकों के होने के अतिरिक्त, बाइबल की विभिन्न पुस्तकें कथनों, उदघोषणाओं और भविष्यद्वाणियों की भी घोषणा करती है जिन्हें बाद के लेखक आधारित हुए हैं। यदि बाइबल केवल एक ही लेखक, या लेखकों के समूह के द्वारा जो एक दूसरे को जानते हों लिखी गई होती, तो यह कोई विशेष योग्यता नहीं रखती। परन्तु सैकड़ों और यहाँ तक कि हजारों वर्षों के अन्तराल पर, विभिन्न तरह की सभ्यताओं में, भाषाओं में, सामाजिक ताने बाने, और साहित्यिक शैलियों की पृथकता के कारण एक दूसरे से भिन्न थे – तथापि उनके सन्देशों और भविष्यद्वाणियों को मूल रूप से उनके पश्चात् आने वाले लेखकों के द्वारा या बाइबल से बाहर के प्रमाणित इतिहास के तथ्यों के द्वारा पूर्ण हुई हैं। यही वह कारण जो बाइबल को पूर्ण रूप से एक भिन्न स्तर के ऊपर विशेष बना देता है – और यह जानकारी हमें इसके सन्देश को प्रेरित करनी चाहिए। पुराने नियम (की वे पुस्तकें जो यीशु के आने से पहले लिखी गईं) की पुस्तकों की विद्यमान पाण्डुलिपियों का लेखनकार्य 200 ईसा पूर्व पहले था, इस कारण बाइबल के मूलपाठ की नींव, संसार की अन्य प्राचीन पुस्तकों से कहीं अधिक उत्तम है।

वाटिका में मोक्ष की प्रतिज्ञा

बाइबल में उत्पत्ति की पुस्तक के आरम्भ में ही सृष्टि की रचना और पतन के वृतान्त में ही हमें इस पहलू की प्रतिछाया स्पष्टता से दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि हम इसे आरम्भ में ही देखते हैं, परन्तु यह अन्त को ध्यान में रखते हुए लिखा गया था। यहाँ पर हम एक प्रतिज्ञा को देखते हैं जब परमेश्‍वर अपने विरोधी शैतान का सामना करता है, जो कि बुराई का अवतार था, जो कि सर्प के रूप में था, और उससे एक पहेली में बात करते हुए ठीक इसके पश्चात् मनुष्य को पाप में पतित कर दिया

“…और मैं (परमेश्‍वर ) तेरे (शैतान) और इस स्त्री के बीच में, और तेरे वंश और इसके वंश के बीच में बैर उत्पन्न करूँगा; वह तेरे सिर को कुचल डालेगा और तू उसकी एड़ी को डसेगा।” (उत्पत्ति 3:15)

इसे ध्यान से पढ़ने के पश्चात् आप देखेंगे कि यहाँ पर पाँच विभिन्न पात्रों का उल्लेख किया गया है और यह कि यह अपने आप में भविष्यद्वाणी है कि यह आने-वाले-समय (जिसे भविष्यसूचक काल में उपयोग होने वाले शब्द ‘गा’ के दुहराव में देखा जा सकता है) की ओर देख रहा है। यह पात्र निम्न हैं:

  1. परमेश्‍वर
  2. शैतान/सर्प
  3. स्त्री
  4. स्त्री का वंश
  5. शैतान का वंश

और पहेली यह भविष्यद्वाणी करती है कि कैसे भविष्य में यह पात्र एक दूसरे के साथ सम्बन्धित होंगे। इसे नीचे दिखलाया गया है

Offspring
उत्पत्ति में प्रतिज्ञा किए हुए पात्रों के मध्य को सम्बन्ध को चित्रित किया गया है

 

परमेश्‍वर इसका प्रबन्ध करेगा कि दोनों अर्थात् शैतान और स्त्री के यहाँ ‘वंश’ होगा। वहाँ पर दोनों के वंशों अर्थात् स्त्री और शैतान के मध्य में ‘बैर’ या घृणा होगी। शैतान स्त्री के वंश की एड़ी को डसेगा जबकि स्त्री का वंश शैतान के ‘सिर को कुचल’ डालेगा।

वंश की कटौती– एक ‘नर’

अभी तक हमने सीधे ही मूलपाठ से अवलोकन किया है। अब तर्क के लिए कुछ कटौतियाँ की जाए। क्योंकि स्त्री के ‘वंश’ को ‘नर’ और ‘डालेगा’ कह कर सूचित किया गया इससे हम जानते हैं कि यह एक एकल नर – एक पुरूष होगा । इससे हम कुछ सम्भव व्याख्याओं को छोड़ सकते हैं। एक ‘नर’ के रूप में वंश का होना एक नारी नहीं है और इस कारण यह एक स्त्री नहीं हो सकती है। एक ‘नर’ के रूप में यह ‘वे’ नहीं हो सकते हैं, जो यह विश्‍वसनीय ढंग से, कदाचित् एक समूह के लोगों, या एक नस्ल, या एक समूह, या एक जाति के साथ हो सकता था। विभिन्न समयों पर और विभिन्न तरीकों से लोगों ने यह सोचा है कि ‘वे’ इसका उत्तर हो सकते हैं। परन्तु वंश लोगों का समूह न होकर एक नर है चाहे यह एक जाति, या एक निश्चित धर्म के लोग जैसे हिन्दू, बुद्धवादी, ईसाई या मुस्लिम आदि के लिए ही क्यों न सूचित किया गया है। ‘नर’ होने के रूप में यह वंश कोई ‘ठोस’ वस्तु (एक व्यक्ति का वंश है) भी नहीं है। यह इस संभावना को भी समाप्त कर देती है कि वंश एक विशेष दर्शन, शिक्षा, प्रौद्योगिकी, राजनीतिक तंत्र प्रणाली या धर्म है। एक ‘ठोस’ वस्तु कदाचित् ही ऐसी होती, और कदाचित ही हमारे संसार की समस्याओं के उत्तर के लिए हमारे पंसदीदा विकल्प होते। हम सोचते हैं कि हमारी परिस्थितियों को किसी तरह की कोई ‘ठोस’ वस्तु ठीक कर देगी, इसलिए सबसे सर्वोत्तम मानवीय विचारक सदियों से विभिन्न राजनीतिक तंत्र प्रणालियों, शैक्षणिक तंत्र प्रणालियों, प्रौद्योगिक तंत्र प्रणालियों और धार्मिक तंत्र प्रणालियों आदि के प्रति तर्क देते आए हैं। परन्तु इस प्रतिज्ञा में दिशासूचक एक बिल्कुल ही भिन्न दिशा की ओर पूर्ण रूप से संकेत कर रहा है। परमेश्‍वर के मन में कुछ और ही – अर्थात् एक ‘नर’ था। और यह ‘नर’ सर्प के सिर को कुचल डलेगा।

जो कुछ नहीं कहा गया है उससे एक और दिलचस्प अवलोकन निकल कर सामने आता है। परमेश्‍वर यह प्रतिज्ञा पुरूष से नहीं करता जैसी वह स्त्री के साथ प्रतिज्ञा करता है। यह बहुत ही असाधारण बात है विशेष कर जब पूरी बाइबल और पूरे प्राचीन संसार में पिता के द्वारा वंश चलने के ऊपर जोर दिया गया है। सच्चाई तो यह है, कि बाइबल में दी हुई वंशावलियों के लिए दी गई आलोचनाओं में से एक आलोचना आधुनिक पश्चिमी विद्वानों की यह है कि वे खून के उस रिश्ते को अन्देखा कर देते हैं जो कि स्त्री की ओर ले चलता है। यह पाश्चात्य की दृष्टि में ‘लैंगिकवाद’ है क्योंकि यह केवल पुरूष के वंश के ऊपर ही ध्यान देता है। परन्तु इस घटना में ऐसी कोई प्रतिज्ञा नहीं की गई है कि एक सन्तान (एक ‘नर’) एक पुरूष से आएगी। यह केवल इतना ही कहता है कि एक सन्तान या वंश आएगा जो केवल स्त्री से ही, पुरूष का नाम का उल्लेख किए बिना आ रहा है।

मनुष्य के पतित हो जाने के पश्चात् जब से वह विद्यमान है, मैं सभी मनुष्य के प्रति ऐतिहासिक या मिथक रूप से यही सोच सकता हूँ, कि एक ही व्यक्ति ऐसा है जिसकी माता के होने का दावा तो है परन्तु ठीक उसी समय उसका कोई भी शारीरिक पिता नहीं था। यह यीशु (यीशु सत्संग) था जिसके बारे में नया नियम (इस प्रतिज्ञा के दिए जाने के हजारों वर्षों पश्चात् लिखा गया) दावा करता है कि वह एक कुँवारी से उत्पन्न हुआ – इस कारण एक माता तो थी परन्तु उसका शारीरिक पिता नहीं था। क्या यीशु इस पहेली में समय के आरम्भ में ही प्रतिछाया में दिखाई दे रहा है? यह इस उक्ति को पूरा करता है कि वंश एक ‘नर’ होगा न कि एक ‘नारी’, ‘वे’ या कोई ‘ठोस’ वस्तु । इस दृष्टिकोण से, यदि आप इस पहेली को पढ़ें तो बहुत सी बातें अपने सही आकार में आ जाएंगी।

‘उसकी एड़ी को डसेगा’??

इसका क्या अर्थ है कि शैतान/सर्प उसकी ‘एड़ी को डसेगा’? मैं इसे तब तक समझ नहीं पाया जब तक मैं अफ्रीका के जंगलों में नहीं चला गया। हमें मोटे रबड़ से बने हुए जुते पहनने पड़ते थे यहाँ तक जब उमस से भरी हुई गर्मी ही क्यों न होती थी – क्योंकि वहाँ लम्बी घास में सर्प लेटे रहते थे और हमारे पैर को – अर्थात् हमारी एड़ी को डस सकते थे– और इससे हम मर सकते थे। अपने पहले ही दिन मैं लगभग एक सर्प के ऊपर पैर रखने वाला था और सम्भवतः मैं इससे मर सकता था। इस पहेली ने मुझे इसके अर्थ को समझा दिया था। वह ‘नर’ इस सर्प (‘तेरे सिर को कुचल डालेगा’) को मार देगा, परन्तु इसके लिए उसे कीमत अदा करनी पड़ेगी, हो सकता है कि वह मार (‘उसकी एड़ी को डसेगा’) दिया जाए। यह उस विजय की प्रतिछाया में दिखाई देता है जो यीशु के बलिदान के द्वारा प्राप्त की गई।

सर्प का वंश?

परन्तु उसका दूसरा शत्रु कौन है, यह शैतान का वंश है? यद्यपि हमारे पास इसके बारे में विस्तृत रूप से पता लगाने के लिए यहाँ पर स्थान नहीं है, परन्तु उत्तरोत्तर पुस्तकें एक आने वाले व्यक्ति के बारे में बात करती हैं। इस विवरण के ऊपर ध्यान दें:

हे भाइयो, अब हम अपने प्रभु यीशु मसीह के आने, और उसके पास अपने इकट्ठे होने के विषय में तुम से विनती करते हैं…कि किसी आत्मा, या वचन, या पत्री के द्वारा जो कि मानों हमारी ओर से हो, यह समझकर कि प्रभु का दिन आ पहुँचा है, तुम्हारा मन अचानक अस्थिर न हो जाए; और न तुम घबराओ। किसी रीति से किसी के धोखे में न आना क्योंकि वह दिन न आएगा, जब तक धर्म का त्याग न हो ले, और वह पाप का पुरूष अर्थात् विनाश का पुत्र प्रगट न हो। जो विरोध करता है, और हर एक से जो परमेश्‍वर, या पूज्य कहलाता है, अपने आप को बड़ा ठहराता है, यहाँ तक कि वह परमेश्‍वर के मन्दिर में बैठकर अपने आप को ईश्‍वर ठहराता है। (2 थिस्सलुनीकियों 2:1-4; पौलुस के द्वारा यूनान में 50 ईस्वी सन् में लिखा गया)

ये उत्तरोत्तर पुस्तकें स्पष्टता से उस टकराव के बारे में उल्टी गिनती की बात करती हैं जो स्त्री के वंश और पुरूष के वंश के मध्य में होने वाले हैं। परन्तु यह मानवीय इतिहास के बिल्कुल आरम्भ में ही उत्पत्ति में दी हुए इस प्रतिज्ञा के बारे में प्रथम बार भ्रूण-के-रूप में, इस व्याख्या के पूर्ण होने की प्रतीक्षा में उल्लिखित किया गया है। इस तरह से इतिहास का चरमोत्कर्ष, शैतान और परमेश्‍वर के मध्य में अन्तिम प्रतियोगता की उल्टी गिनती, वाटिका में ही बहुत पहले आरम्भ हो चुकी है, जिसे आरम्भ में ही – आरम्भिक पुस्तकों में देखा गया है।

मेरे पहले के लेखों में हमने पुरूषसूक्ता के भजनों के ऊपर ध्यान दिया था। हमने देखा कि इस भजन में भी आने वाले एक सिद्ध पुरूष – पुरूषा – की बात की गई है, जो कि साथ ही मनुष्य की सामर्थ्य से नहीं आएगा। यही मनुष्य वास्तव में बलिदान में दे दिया जाएगा। सच्चाई तो यह है कि हमने यह देखा है कि यह पहले से ही समय के आरम्भ में परमेश्‍वर के मन में निर्धारित और नियुक्त किया हुआ था। और ये दोनों पुस्तकें एक ही व्यक्ति के बारे में बात करती हैं? मैं विश्‍वास करता हूँ कि वे करती हैं। वह एक दिन एक पुरूष के रूप में देहधारण करेगा ताकि यही व्यक्ति बलिदान में दिया जा सके – जो कि सभी मनुष्यों के लिए चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो के लिए एक विश्‍वव्यापी आवश्यकता है। परन्तु यह प्रतिज्ञा न केवल ऋग्वेद और बाइबल के मध्य में सामान्तर पाई जाती है । अपितु क्योंकि यह आरम्भिक मानवीय इतिहास का उल्लेख करती हैं इसलिए वे साथ ही अन्य सामान्तरों का भी उल्लेख करती हैं जिसे हम हमारी अगली पोस्ट अर्थात् लेख में देखेंगे।

भ्रष्ट (भाग 2)… आपने निशाने से चूक जाना

मेरे पिछले लेख में मैंने यह देखा था कि कैसे वेद पुस्तक (बाइबल) हमें यह विवरण देती है कि हम परमेश्‍वर के वास्तविक स्वरूप जिसमें हमें निर्मित किया गया था, में भ्रष्ट हो गए। एक चित्र जिसने मुझे इसे अच्छी तरह से देखने में सहायता दी वह पृथ्वी के मध्य में रहने वाले – ओर्कस् की थी। इस तरह से बाइबल हमारे बारे में विवरण देती है। परन्तु यह कैसे घटित हुआ?

पाप का आरम्भ

बाइबल की उत्पत्ति नामक पुस्तक में इसका उल्लेख है। परमेश्‍वर के स्वरूप में रचे जाने के ठीक थोड़े समय के ही पश्चात् प्रथम मनुष्य की जाँच हुई। वहाँ पर लिखा हुआ वृतान्त एक ‘सर्प’ के साथ हुई बातचीत का उल्लेख करता है। सर्प को सदैव से ही विश्‍वव्यापी रूप में शैतान –परमेश्‍वर के विरोध में खड़े होने वाली आत्मा के रूप में समझा गया है। बाइबल के द्वारा – शैतान अक्सर किसी अन्य व्यक्ति के बोलने के द्वारा बुराई करने के लिए परीक्षा में डालता है। इस घटना में वह सर्प के द्वारा बोला। इसे इस तरह से उल्लेख किया गया है।

यहोवा परमेश्‍वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, “क्या सच है, कि परमेश्‍वर ने कहा‘तुम इस बाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना?’”

स्त्री ने सर्प से कहा, “इस बाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं;पर जो वृक्ष बाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।”

तब सर्प ने स्त्री से कहा, “तुम निश्चय न मरोगे,वरन परमेश्‍वर आप जानता है, कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएंगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।

अत: जब स्त्री ने देखा कि उस वृक्ष का फल खाने में अच्छा, और देखने में मनभाऊ, और बुद्धि देने के लिये चाहने योग्य भी है, तब उस ने उस में से तोड़कर खाया; और अपने पति को भी दिया, और उस ने भी खाया। तब उन दोनों की आँखें खुल गईं, और उनको मालूम हुआ कि वे नंगे हैं; सो उन्हों ने अंजीर के पत्ते जोड़ जोड़ कर लंगोट बना लिये। (उत्पत्ति 3:1-6)

उनके चुनाव का मूल कारण, और परीक्षा ऐसी थी, कि वह ‘परमेश्‍वर के तुल्य हो’ सकते थे। इसी समय तक उन्होंने हर बात के लिए परमेश्‍वर पर भरोसा किया था और सभी बातों के लिए केवल उसके वचन को साधारण से रूप में ही मान लिया था। परन्तु अब वह इस बात को पीछे छोड़ते हुए स्वय पर निर्भर होते हुए और प्रत्येक बात के लिए अपने शब्दों के ऊपर भरोसा करते हुए, ‘परमेश्‍वर के तुल्य’ हो जाना चाहते थे। वह स्वयं के लिए ‘ईश्‍वर’ अपने जहाज के लिए स्वयं कप्तान, अपने गंतव्य के लिए स्वयं के स्वामी, स्वायत्ती और केवल स्वयं के प्रति जवाबदेह होना चाहते थे।

परमेश्‍वर के प्रति विद्रोह के कारण उनमें कुछ परिवर्तन आ गया था। जैसे का यह संदर्भ उल्लेख करता है, उन्होंने शर्म को महसूस किया, और स्वयं को ढकने की कोशिश की। सच्चाई तो यह है, कि इसके पश्चात्, जब परमेश्‍वर ने आदम का उसकी अनाज्ञाकारिता के लिए सामना किया, आदम ने हव्वा (और परमेश्‍वर जिसने उसे रचा था) पर दोष लगा दिया। उसने इसकी एवज में सर्प पर दोष लगा दिया। कोई भी अपनी जवाबदेही को स्वीकार नहीं करना चाहता था।

आदम के विद्रोह के परिणाम

और जो कुछ उस दिन आरम्भ हुआ वह आज भी निरन्तर चल रहा है क्योंकि हम में उसी ही का निहित स्वभाव है जिसे हमने जन्मजात उत्तराधिकार में पाया है। इसी लिए हम आदम की तरह व्यवहार करते हैं – क्योंकि हमने उसी के स्वभाव को विरासत में पाया है। कुछ इससे गलतफ़हमी में पड़ जाते हैं कि बाइबल के कहने का अर्थ है कि हमें आदम के विद्रोह के लिए दोषी ठहराया गया है। सच्चाई तो यह है कि, केवल आदम ही है जिस पर दोष लगाया जाना चाहिए परन्तु हम उसके विद्रोह के परिणाम स्वरूप जीवन यापन कर रहे हैं। हम इसे अनुवांशिकीय रूप में सोच सकते हैं। बच्चे अपने अच्छे और बुरे – गुणों को अपने अभिभावकों से– उनके जीनों को उत्तराधिकार में प्राप्त करते हुए करते हैं। हमने आदम के इस विद्रोही स्वभाव को उत्तराधिकार में पाया है और इस प्रकार सहजता से, लगभग अनजाने ही, परन्तु जानबूझकर उस विद्रोह को निरन्तर बनाए हुए हैं जिसे उसने आरम्भ किया था। हो सकता है कि हम पूरे ब्रह्माण्ड का परमेश्‍वर नहीं बनना चाहते हों, परन्तु हम हमारे संदर्भों के ईश्‍वर बनते हुए, परमेश्‍वर से पृथक स्वायत्ती होना चाहते हैं।

पाप के प्रभाव स्पष्टता से आज दिखाई देते हैं

और यह मानवीय जीवन का इतना अधिक विवरण देता है कि हम इसके सही मूल्य को नहीं समझते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक स्थान पर लोगों को अपने घरों के दरवाजों को बन्द रखना पड़ता है, उन्हें पुलिस, वकीलों, बैंक व्यवस्था के लिए न भेदे जाने वाले पासवर्डों की आवश्यकता पड़ती है – क्योंकि हमारे अभी की परिस्थितियों में हम एक दूसरे से चोरी करते हैं। यही वह कारण है जिससे साम्राज्य और समाज अन्तत: पतन की ओर जाते और खत्म हो जाते हैं – क्योंकि इन सभी साम्राज्यों में नागरिक की प्रवृत्ति पतन होने की थी। सभी तरह की सरकारों और आर्थिक प्रणालियों को उपयोग कर लेने के पश्चात्, और यद्यपि कुछ अन्यों की अपेक्षा अधिक उत्तम तरीके से कार्य करती हैं, ऐसा जान पड़ता है कि प्रत्येक राजनैतिक और आर्थिक प्रणाली अन्त में स्वयं ही खत्म हो जाएगी – क्योंकि जो लोग इन विचारधाराओं में जीवन व्यतीत कर रहे हैं, की प्रवृत्ति ऐसी है कि वह अन्त में पूरे के पूरे तंत्र को ही नीचे की ओर खींचते हुए खत्म कर डालेंगे। इसलिए ही यद्यपि हमारी पीढ़ी अभी तक की सबसे अधिक शिक्षित क्यों न हो हम में अभी भी यह समस्याएँ बनी हुई हैं, क्योंकि शिक्षण का स्तर बहुत नीचे तक पहुँच चुका है। इसलिए ही हम स्वयं को प्रतासना मंत्र की प्रार्थना के साथ पहचान कर सकते हैं – क्योंकि यह हमें बहुत ही अच्छे तरह से वर्णित करता है।

पाप – निशाने को ‘चूकना’ है

यही वह कारण है कि क्यों कोई भी धर्म उनके समाज के लिए अपने दर्शन को पूरी तरह से लेकर नहीं आ पाया है – अपितु यहाँ तक कि अनिश्‍वरवादी भी (सोवियत संघ के स्टालिन, चीन के माओ, कम्बोडीया के पॉल पोट के बारे में सोचें) – क्योंकि कोई ऐसी बात है जो हमारे मार्ग में हमें हमारे दर्शन को पूरा करने में चूक जाने के लिए खड़ी रहती है। सच्चाई तो यह है, कि शब्द ‘चूकना’ हमारी परिस्थितियों का सार है। बाइबल का एक वचन इसका एक चित्र देता है जिसने मुझे इसे अच्छी तरह से समझने में सहायता दी है। यह कहता है

इन सब लोगों में से सात सौ बैंहत्थे चुने हुए पुरूष थे, जो सब के सब ऐसे थे कि गोफ़न से पत्थर मारने में बाल भर भी न चूकते थे। (न्यायियों 20:16)

यह वचन ऐसे सैनिकों का उल्लेख करता है जो गोफ़न मारने में कुशल थे और अपने निशाने को कभी नहीं चूकते थे। ‘चूकने’ के लिए मूल इब्रानी अनुवादित शब्द יַחֲטִֽאहै। इसी इब्रानी शब्द बाइबल के अधिकांश स्थानों में पाप शब्द के लिए अनुवाद किया गया है । उदाहरण के लिए, ‘पाप’ के लिए यही इब्रानी शब्द उपयोग हुआ है जब यूसुफ को मिस्र में दासत्व के लिए बेच दिया गया था, जो अपने स्वामी की पत्नी के साथ व्यभिचार नहीं करता, यहाँ तक कि वही स्त्री ऐसा करने के लिए उससे निवेदन करती रही । उसने उससे कहा कि

इस घर में मुझ से बड़ा कोई नहीं, और उसने तुझे छोड़, जो उसकी पत्नी है, मुझ से कुछ नहीं रख छोड़ा, इसलिये भला, मैं ऐसी बड़ी दुष्टता करके परमेश्‍वर का पापी क्यों बनूँ? (उत्पत्ति 39:9)

और दसवीं आज्ञा का उल्लेख करने के ठीक पश्चात् वह कहता है:

मूसा ने लोगों से कहा, “डरो मत; क्योंकि परमेश्‍वर इसलिये आया है कि तुम्हारी परीक्षा करे, और उसका भय तुम्हारे मन में बना रहे कि तुम पाप न करो।” (निर्गमन 20:20)

इन दोनों ही स्थानों में इसी इब्रानी शब्दיַחֲטִֽא का उपयोग किया गया है जिसका अनुवाद ‘पाप’ के रूप में किया गया है। यही सैनिक के लिए ‘चूकने’ के लिए उपयोग किया गया ठीक वही शब्द है जो गोफ़न से अपने निशाने को कभी नहीं चूकते थे जैसा कि इन वचनों में वर्णन किया गया है जिसका अर्थ है ‘पाप’ जब बात लोगों के द्वारा एक दूसरे के साथ व्यवहार करने की आती है। इस बात को हमें समझ प्रदान करने के लिए कि ‘पाप’ क्या है एक चित्र का प्रबन्ध किया है। सैनिक एक पत्थर को लेता है और उसे गोफ़न में बाँध कर निशाने के ऊपर मारता है। यदि वह चूक जाता है तो वह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल हो गया। ठीक इसी तरह से, हम स्वरूप में रचे हुए होने के कारण किस तरह से हम स्वयं को उससे सम्बन्धित और कैसे हम अन्यों से व्यवहार करते हैं, के निशाने से कहीं चूकते तो नहीं हैं। ‘पाप’ करने का अर्थ उस उद्देश्य से, या निशाने से चूक जाना है, जिसे हमारे लिए इच्छित किया गया था, और जिसे हम हमारी भिन्न तंत्र प्रणालियों, धर्मों और विचारधाराओं में भी स्वयं के लिए इच्छित करते हैं।

‘पाप’ का बुरा समाचार – प्राथमिकता का नहीं अपितु सत्य का विषय है

मनुष्य की इस भ्रष्ट और निशाना-चूकने का चित्र सुन्दर नहीं है, यह अच्छा-महसूस किए जाने वाला नहीं है, न ही यह आशावादी है। वर्षों के पश्चात्, इस विशेष शिक्षा के विरोध में दृढ़ता से मैंने लोगों को प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पाया है। मुझे यहाँ कनाडा में महाविद्यालय के इस विद्यार्थी का स्मरण है जो मुझे बहुत अधिक गुस्से से भरा हुआ देखते हुए ऐसा कहने लगा था, “मैं तुम में विश्‍वास नहीं करता क्योंकि मैं जो कुछ तुम कह रहे हो उसे मैं पसन्द नहीं करता है।” हो सकता कि हम अब इसे पसन्द न करें, परन्तु इसके ऊपर ध्यान केन्द्रित करना ही निशाने को चूकना है। किसी की ‘पसन्द’ का किसी बात के सत्य होने या न होने से क्या लेना देना है? मुझे टैक्स देना, युद्ध, एड्स और भूकम्प पसन्द नहीं है – किसी को भी नहीं होते हैं – परन्तु क्या वे इससे चले जाते हैं, और न ही हम इनमें से किसी को भी अनदेखा कर सकते हैं।

कानून, पुलिस, ताले, चाबीयाँ, सुरक्षा आदि की सभी तरह की तंत्र प्रणालियाँ, जिन्हें हमने हमारे स्वयं के समाजों में एक दूसरे की सुरक्षा के लिए निर्मित किया है, इस बात का सुझाव अवश्य देते हैं कि कहीं पर कुछ गलत है। सच्चाई तो यह है कि त्यौहार जैसे कुम्भ मेला लाखों लोगों को उनके ‘पापों को धोने’ के लिए अपनी ओर खींचता है, यह संकेत देता है कि हम स्वयं अपनी सहज बुद्धि से जानते हैं कि किसी न किसी तरीके से हम निशान से ‘चूक’ गए हैं। सच्चाई तो यह है कि स्वर्ग जाने के लिए बलिदान दिए जाने की शर्त की विचारधारा सभी धर्मों में एक सुराग के रूप में पाई जाती है कि हम स्वयं में ही कुछ है जो कि ठीक नहीं है। सबसे अन्त में, इस धर्मसिद्धान्त तो निष्पक्ष तरीके से देखे जाने की आवश्यकता है।

परन्तु पाप का यह धर्मसिद्धान्त लगभग सभी धर्मों, भाषाओं और जातियों में विद्यमान है – जिसके कारण हम सभी निशाने से ‘चूक’ जाते हैं, जो एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाता है। परमेश्‍वर इसके बारे में क्या करने वाला था? हम परमेश्‍वर की प्रतिक्रिया के बारे में हमारी अगली पोस्ट या लेख में देखेंगे –जहाँ हम आने वाले उद्धारक – पुरूषा की प्रथम प्रतिज्ञा को देखते हैं जिसे हमारे लिए भेजा जाएगा।

परन्तु पृथ्वी-के-मध्य में रहने वाले – ओर्कस् की तरह भ्रष्ट

मेरे पिछले लेख में मैंने बाइबल आधारित उस नींव को देखा था कि – कैसे हमें यह देखना चाहिए कि हम परमेश्वर के स्वरूप में रचे हुए हैं। परन्तु वेद पुस्तक (बाइबल) – इस नींव पर और आगे की ओर विकास करती है। अपने परमेश्वर की आराधना के लिए पुराने नियम के इब्रानियों के द्वारा पवित्र गीतों और भजनों के संग्रह के रूप में भजन संहिता उपयोग की जाती थी। भजन 14 राजा दाऊद (जो एक ऋषि भी था) के द्वारा लगभग 100 ईसा पूर्व में रचा गया था, और उसका यह भजन जीवन-की-वस्तुस्थिति को परमेश्वर के दृष्टिकोण से देखने का वर्णन करता है।

परमेश्वर ने स्वर्ग में से मनुष्यों पर दृष्टि की कि देखे कि कोई बुद्धिमान, कोई परमेश्वर का खोजी है या नहीं, वे सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए;कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं। ( भजन संहिता 14:2-3)

वाक्य ‘भ्रष्ट हो गए’ का उपयोग पूरी मानवजाति के विवरण को देने के लिए किया गया है। क्योंकि यह कुछ ऐसी बात है जो हम ‘बन’ गए हैं, यहाँ पर भ्रष्टता का उल्लेख ‘परमेश्वर के स्वरूप’ में रचे हुए होने की आरम्भिक स्थिति के लिए किया गया है। यह संदर्भ कहता है कि यह भ्रष्टता स्वयं में ही निर्धारित की हुई परमेश्वर से पृथक आत्म-निर्भरता है (‘वे’ सभी ‘परमेश्वर का खोजी’ बनने से भटक गए हैं), और साथ ही कोई भी भले के कार्य को नहीं कर रहा है।

अल्वस् और ओर्कस् के बारे में सोचना

Orcs
ओर्कस् अर्थात् दानवों और मानव स्त्रियों के मेल से उत्पन्न हुए लोग कई तरीकों से घिनौने थे। परन्तु वे साधारण रूप में अल्वस् की भ्रष्ट सन्तानें थे।

पृथ्वी-के-मध्य में रहने वाले – ओर्कस् के बारे में सर्वोत्तम रूप से समझने के लिए लॉर्ड आफ द रिंग्स् अर्थात् अंगूठी का स्वामी फिल्म एक उदाहरण है। दिखने, व्यवहार और पृथ्वी के साथ उनके व्यवहार में ओर्कस् घृणित प्राणियों के जैसे थे। तथापि ओर्कस् अल्वस् की सन्तानें जो साऊरोन के

Elves
अल्वस् कुलीन और तेजस्वी थे

द्वारा भ्रष्ट हो गया था।जब आप प्रकृति के साथ दिखाई देने वाली तेजस्वी, सद्वभावपूर्ण और सम्बन्ध को देखते हैं जो अल्वस् (लॉग्लोस के बारे में सोचें)के थे और यह पहचान लेते हैं कि भ्रष्ट ओर्कस् कभी अल्वस् थे जो ‘भ्रष्ट हो गए’ तब आप जो कुछ यहाँ लोगों के बारे में कहा गया है उसे अधिक समझ पाएंगे। परमेश्वर ने अल्वस् की रचना की थी परन्तु वे ओर्कस् बन गए।

यह उस बात के लिए बिल्कुल सही है जिसे हमने लोगों के मध्य में विश्वव्यापी प्रवृत्ति के रूप में ध्यान दिया है, अर्थात् स्वयं के पापों के प्रति जागरूक और इससे शुद्ध होने की आवश्यकता – जैसा की कुम्भ मेला त्यौहार में दिखलाया गया है। इस तरह से हम यहाँ पर इस दृष्टिकोण पर पहुँचते हैं: लोगों के संवेदनशील, व्यक्तिगत् और नैतिक होने के बाइबल आधारित आरम्भिक बिन्दु का जो कि बहुत ही अधिक शिक्षाप्रद है, परन्तु तथापि भ्रष्ट भी, उस बात के लिए सही है जिसे हमें स्वयं के बारे में देखते हैं। लोगों के स्वयं के आंकलन के प्रति – यह चतुराई पहचान में आ जाती है कि हममें निहित नैतिक स्वभाव है जिसे बड़ी आसानी से अन्देखा किया जा सकता है क्योंकि हमारे व्यवहार के कार्य वास्तव में – इस भ्रष्टता के कारण – कभी भी उसके अनुरूप नहीं होते हैं जिसकी मांग यह स्वभाव करता है। बाइबल की सोच मनुष्य के जीवन के सही बिल्कुल सही है। तथापि, यह एक स्पष्ट प्रश्न को उत्पन्न कर देती है: क्यों परमेश्वर ने हमें इस तरह से – एक नैतिक दिशासूचक के साथ रचा और तथापि यह भ्रष्ट है? प्रसिद्ध नास्तिक क्रिस्टोफ़र हच्चिन्स ऐसे शिकायत करता है:

“…यदि परमेश्वर वास्तव में चाहता कि लोग इस तरह के विचारों से स्वतन्त्र हों [अर्थात् भ्रष्टता से भरे हुए], तो उसे और अधिक सावधानी से एक भिन्न प्रजाति का अविष्कार करना चाहिए।”क्रिस्टोफ़र हच्चिन्स. 2007. परमेश्वर महान् नहीं है: कैसे धर्म सब कुछ को खराब कर देता है. पृष्ठ 100.

परन्तु यही वह बात है जहाँ पर आकर वह अपनी जल्दबाजी में बाइबल के ज्ञान को स्वीकार करने से इन्कार कर देता है अर्थात् वह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात को खो देता है। बाइबल ऐसा नहीं कहती है कि परमेश्वर ने हमें इस तरीके से बनाया है, परन्तु क्योंकि आरम्भिक सृष्टि के पश्चात् से कुछ बहुत ही बुरा घटित हो गया जो मानव को इस-तरह-की-वस्तु-स्थिति में ले आया। मानव इतिहास में उसकी सृष्टि होने के पश्चात् एक महत्वपूर्ण घटना घटित हो गई। प्रथम मनुष्य ने परमेश्वर की आज्ञा तोड़ दी, जैसा कि उत्पत्ति में वर्णित किया गया है – बाइबल (वेद पुस्तक) की पहली और सबसे प्रथम पुस्तक, और उनके द्वारा आज्ञा पालन न किए जाने के कारण वे परिवर्तित और भ्रष्ट हो गए। इस लिए ही हम अब तमस, या अन्धकार में जीवन व्यतीत करते हैं।

मनुष्य का पाप में गिरना

मानवीय इतिहास में इस घटना को अक्सर पतन में गिरना कह कर पुकारा जाता है। आदम, प्रथम पुरूष, परमेश्वर के द्वारा रचा गया था। परमेश्वर और आदम के मध्य में एक तरह का करार था, जैसे विवाह में विश्वासयोग्यता होता है, और आदम ने इसे तोड़ दिया। बाइबल वर्णन करती है कि आदम ने ‘भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष’ के फल में से तोड़ कर खा लिया, यद्यपि वे सहमत थे कि वे इस वृक्ष में से तोड़ कर नहीं खाएंगे। समझौता और स्वयं वृक्ष ने, आदम को परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य रहना है या नहीं के लिए चुनाव करने की स्वतन्त्र इच्छा दे दी। आदम को परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया था, और उसे परमेश्वर के साथ मित्रता के सम्बन्ध में रखा गया था। परन्तु सृष्टि के प्रति आदम के पास किसी तरह का कोई चुनाव नहीं था, इसलिए परमेश्वर ने उसको होने दिया कि वह परमेश्वर के साथ उसकी मित्रता को बनाए रखने का चुनाव कर सकता था। ठीक वैसे ही जैसे यदि बैठना असम्भव हो तो खड़े रहने का चुनाव वास्तविक नहीं होता, परमेश्वर के प्रति आदम की मित्रता और भरोसा भी एक चुनाव की तरह ही थी। यह चुनाव एक आज्ञा के ऊपर आधारित थी कि एक वृक्ष के फल को नहीं खाना है। और आदम ने विद्रोह करने को चुन लिया। जो कुछ आदम ने अपने विद्रोह से आरम्भ किया वह न-रूकते-हुए एक के पश्चात् दूसरी पीढ़ी में आज के दिन तक चलता चला आ रहा है। इसका क्या अर्थ है इसे हम अपने अगले लेख में देखेंगे

परमेश्‍वर के स्वरूप में

हमने पहले ही देख लिया है कि कैसे पुरूषासूक्ता का आरम्भ समय के आरम्भ होने से पहले होता है और यह कैसे परमेश्‍वर की मनसा (प्रजापति) को पुरूषा के बलिदान करने के निर्णय का वर्णन करता है। इस निर्णय के पश्चात् सृष्टि की वस्तुओं का सृजन होता है – जिसमें मानवजाति की सृष्टि भी सम्मिलित है।

आइए अब इस बात पर ध्यान दें कि वेद पुस्तक (बाइबल) मनुष्य की सृष्टि के बारे में क्या कहती है जिससे कि हम उस समझ को सृष्टि के विवरण के मुख्य संदर्भ को देखते हुए प्राप्त कर सकें जिसके द्वारा बाइबल हमारे बारे में शिक्षा देती है।

फिर परमेश्‍वर ने कहा, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ…।” तब परमेश्‍वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार उत्पन्न किया, अपने ही स्वरूप के अनुसार परमेश्‍वर ने उसको उत्पन्न किया; नर और नारी करके उसने मनुष्यों की सृष्टि की। (उत्पत्ति 1:26-27)

“परमेश्‍वर के स्वरूप में”

इसका क्या अर्थ है कि ‘मनुष्य की सृष्टि परमेश्‍वर के स्वरूप के अनुसार हुई?’ जबकि इसका यह अर्थ नहीं है कि परमेश्‍वर दो हाथ, एक सिर आदि के साथ बना हुआ एक भौतिक प्राणी है। इसकी अपेक्षा, गहनता के साथ यह ऐसा कह रहा है कि लोगों के मूलभूत गुण परमेश्‍वर के जैसे ही गुणों के ऊपर आधारित हैं। उदाहरण के लिए, दोनों अर्थात् परमेश्‍वर (बाइबल में) और लोगों (का अवलोकन करने पर) के पास बुद्धि, भावनाएँ और इच्छा है। बाइबल में कई बार परमेश्‍वर को उदास, दुखित, क्रोधित या आनन्दित होते हुए चित्रित किया है – उसी तरह की सीमा में भावनाएँ जिसे हम मनुष्य अनुभव करते हैं। हम दैनिक आधार पर निर्णयों को लेते और चुनावों को करते हैं। ठीक इसी तरह से बाइबल में परमेश्‍वर उन चुनावों को करता है जो उसके निर्णयों से आती हैं। तर्क और सोचने की हमारी क्षमता बड़ी सूक्ष्मता के साथ परमेश्‍वर से आती है। हमारे पास बुद्धि, भावना और इच्छा की क्षमता है क्योंकि परमेश्‍वर के पास है और हम उसके स्वरूप में सृजे हुए हैं।

गहनता के स्तर पर हम देखते हैं कि हम संवेदनशील, स्वयं-के-प्रति जागरूक और ‘मैं’ और ‘आप’ के विवेक के साथ सृजे हुए प्राणी हैं। हम व्यक्तित्वहीन ठोस ‘वस्तु’ नहीं हैं। हम ऐसा इसलिए हैं क्योंकि परमेश्‍वर इसी तरह का है। इस मूलभूत दृष्टिकोण में, बाइबल के परमेश्‍वर का चित्रण जानी-पहचानी स्टार वॉर फिल्म में ‘शक्ति’ की तरह व्यक्तित्वहीन सर्वेश्वरवाद के रूप में नहीं किया गया है। यह सच्चाई कि मनुष्य ‘ठोस’ वस्तु होने की अपेक्षा संवेदनशील व्यक्ति है परमेश्‍वर के बारे में इस आरम्भिक शिक्षा के प्रकाश के आलोक में अर्थपूर्ण है। हम ऐसे इसलिए हैं क्योंकि परमेश्‍वर इस तरह का है, और हम उसके स्वरूप में सृजे गए हैं।

हमें सौंदर्य बोध क्यों है

हम कला और नाटक से भी प्रेम करते हैं। हम स्वाभाविक रूप से सराहना करते हैं और यहाँ तक कि हमें सुंदरता की आवश्यकता है। इसमें संगीत और साहित्य को शामिल करते हुए यह दृश्य सौंदर्य से परे चला जाता है। संगीत के बारे में सोचें कि यह हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है- यहाँ तक कि हम कैसे नाचने के लिए कितना अधिक प्रेम करते थे। संगीत तो हमारे जीवन को बहुत अधिक समृद्ध करता है ।हम आज भी अच्छी कहानियों, चाहे वह उपन्यासों या नाटकों, या अधिक सामान्य रूप में फिल्मों में ही क्यों न हो, प्रेम करते हैं। कहानियों के नायक, खलनायक, कथा, और प्रसिद्ध कहानियाँ तो इन नायकों, खलनायकों और कथा को हमारी कल्पनाओं में ही मिश्रित कर देती हैं। मनोरंजन, पुनर्जीवन, और स्वयं की ताजगी के कई तरीकों में कला की सराहना और उपयोग करना हमारे लिए बहुत ही स्वाभाविक है। क्योंकि परमेश्‍वर एक कलाकार है और हम उसके स्वरूप में सृजे गए हैं।

यह प्रश्न पूछना महत्वपूर्ण है। हम क्यों स्वाभाविक रूप से चाहे वह कला, नाटक, संगीत या साहित्य ही क्यों न हो, में इतने अधिक सौंदर्य बोधित होते हैं? जब कभी भी में भारत की यात्रा पर जाता हूँ मैं सदैव भारतीय फिल्मों को लेकर आश्चर्यचकित रहा हूँ जो पश्चिम में निर्मित फिल्मों से कहीं अधिक संगीत और नृत्य के गुणों से भरी हुई होती हैं। डैनियल डिनेट,एक मुखर नास्तिक और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं की समझ रखने वाला एक विद्वान, भौतिकवादी दृष्टिकोण इसका उत्तर देता है:

“परन्तु इस अनुसन्धान में अधिकांश अभी भी संगीत को गंभीरता से नहीं लेते हैं। यह शायद ही कभी पूछता है: कि क्यों संगीत अस्तित्व में है? इसका एक संक्षिप्त उत्तर है, जहाँ तक संगीत की बात है: इसका अस्तित्व इस लिए है क्योंकि हम इसे प्रेम करते हैं और इसलिए हम और अधिक इसे अस्तित्व में लाते चले जाते हैं। परन्तु हम इसे क्यों प्रेम करते हैं? क्योंकि हम पाते हैं कि यह बहुत ही सुन्दर है। परन्तु यह हमारे लिए सुन्दर क्यों है? यह तो अपने में पूर्ण एक अच्छा जैविक प्रश्न है, परन्तु इसका अभी तक कोई एक अच्छा उत्तर नहीं मिला है। (डैनियल डिनेट. जादू को तोड़ना: एक प्राकृतिक घटना के रूप में धर्म. पृष्ठ 43)

मानव जाति के ऊपर भौतिकवादी दृष्टिकोण का हमारी मानवीय प्रकृति के बारे में इस मूलभूत प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। बाइबल के दृष्टिकोण से यह पता चलता है कि परमेश्‍वर एक कलाकार और सौंदर्यबोधक है। उसने वस्तुओं को सुन्दरता से सृजा और वह इसका आनन्द लेता है। हम, उसके स्वरूप में सृजे गए, उस के जैसे हैं।

हम नैतिक क्यों हैं

इसके अतिरिक्त, ‘परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे होना,’स्वाभाविक नैतिक क्षमता का वर्णन करता है जो किसी भी संस्कृतियों में तो सामान्य पाई जाती है, और जिसे हमने गुरु साईं बाबा की नैतिक शिक्षाओं में देख लिया है।क्योंकि हम परमेश्‍वर के स्वरूप और नैतिकता के तत्व में हैं, जैसे कि एक कम्पास चुंबकीय उत्तर की ओर निर्देशित रहता है, हमारा ‘निष्पक्षता’, ‘भलाई’, ‘सही’ के लिए निर्देशित रहना भी इसी तरह से सृजा हुआ है क्योंकि परमेश्‍वर इसी तरह से बना हुआ है। यह मात्र धार्मिक लोग ही नहीं है जो इस तरह से सृजे हुए हैं – अपितु प्रत्येक इसी तरह से सृजा हुआ है। इसकी पहचान करना गलतफ़हमियों को उत्पन्न करता है। उदाहरण के लिए भौतिकवादी अमेरिकन सैम हैरिस से इस चुनौती को लें।

“यदि आपका यह विश्‍वास करना सही है कि धार्मिक आस्था ही नैतिकता के लिए वास्तविक आधार प्रदान करती है, तब तो नास्तिकों को विश्वासियों से कम नैतिक होना चाहिए।” सैम हैरिस. 2005. एक ईसाई राष्ट्र को पत्र. पृष्ठ 38-39

हैरिस यहाँ पर गलत है। बाइबल आधारित होकर कहना, नैतिकता के बारे में हमारी समझ धार्मिक व्यक्ति होने की अपेक्षा परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे होने के ऊपर आधारित है। और यही कारण है कि नास्तिकों के पास, हम सभी बाकी की तरह, यह नैतिक भावना है और वे नैतिक रूप से कार्य कर सकते हैं। नास्तिकवाद के साथ कठिनाई यह है कि वे किसके प्रति जबावदेह हों कि हमारे पास नैतिकता क्यों है –परन्तु परमेश्‍वर के नैतिक स्वरूप में सृजा हुआ होना ही इसका एक सरल और सीधा सा विवरण है।

क्यों हम इतने संबंध परक हैं

बाइबल के अनुसार, स्वयं को समझने के लिए प्रारंभिक बिंदु इस बात की पहचान करना है कि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे हुए हैं। यही कारण है, कि जब हम या तो परमेश्‍वर के प्रति अंतर्दृष्टि (जो कुछ उसके बारे में बाइबल में प्रकाशित किया है के द्वार) या लोगों के प्रति (अवलोकन और प्रतिबिम्ब के द्वारा) हम साथ ही अन्यों के प्रति भी अन्तर्दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। इस कारण, उदाहरण के लिए, यह ध्यान देना आसान है कि लोग सम्बन्धों को इतना अधिक महत्व क्यों देते हैं। यह ठीक है कि एक अच्छी फिल्म को देखा जाए परन्तु यह और भी अधिक उत्तम अनुभव होगा कि इसको किसी एक मित्र के साथ देखा जाए। हम स्वाभाविक रूप से अपने अनुभवों को साझा करने के लिए मित्रों की खोज करते हैं। सार्थक मित्रता और पारिवारिक सम्बन्ध हमारी भलाई के भाव के लिए कुँजी है। इसके विपरीत, अकेलापन और/या खंडित पारिवारिक सम्बन्ध और मित्रता के सम्बन्ध में दरारें हमें तनाव में ले आती हैं। हम अन्यों के साथ हमारे सम्बन्धों की स्थिति के द्वारा अविचलित या तटस्थ नहीं होते हैं। एक बार फिर से, भारत में निरन्तर यात्रा करने वाले के रूप में यह बात बड़ी दृढ़ता के साथ भारतीय फिल्मों में दिखाई देती है। ऐसा जान पड़ता है कि वहाँ सदैव पारिवारिक और रोमांटिक सम्बन्धों को बड़ी दृढ़ता के साथ इन फिल्मों में चित्रित किए जाते हैं।

अब, यदि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे गए हैं, तब हमें परमेश्‍वर के साथ इसी तरह के सम्बन्ध के ऊपर महत्व दिए जाने की अपेक्षा करनी चाहिए, और सच्चाई यह है कि हम इसे पाते हैं। बाइबल कहती है कि, “परमेश्‍वर प्रेम है…” (1 यूहन्ना 4:8)। इस महत्वपूर्णता के बारे में बाइबल में बहुत कुछ लिखा गया है जिसे परमेश्‍वर उसके और अन्यों के प्रति हमारे प्रेम के ऊपर देता है – सच्चाई तो यह है कि उन्हें यीशु (यीशु सत्संग) के द्वारा बाइबल में दो बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश में कहा गया है जब आप इसके बारे में सोचते हैं, तो प्रेम को सम्बन्धपरक होना चाहिए क्योंकि इसे कार्यरूप में प्रगट करने के लिए एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो प्रेम (प्रेमी) करता हो और एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता होती है जो इस प्रेम का बिन्दु हो – अर्थात् इसका प्रियत्तम हो।

इस प्रकार हमें परमेश्‍वर को एक प्रेमी के रूप में सोचना चाहिए। यदि हम उसे केवल ‘मुख्य संचालक’, या ‘प्रथम कारक’, ‘सर्वज्ञानी ईश्‍वर’,‘परोपकारी प्राणी‚ या कदाचित ‘व्यक्तिहीन आत्मा’, के रूप में ही सोचेंगे तो हम बाइबल के परमेश्‍वर के बारे में नहीं सोच रहे हैं – इसकी अपेक्षा हमने हमारे मनों में अपने ही देवता की रचना कर ली है। यद्यपि उसके पास यह सब कुछ है, उसे सम्बन्धों में लगभग बेतहाशा भावुक चित्रित किया गया है। उसके ‘पास’ प्रेम नहीं है। वह प्रेम ‘है’। परमेश्‍वर का लोगों के सम्बन्ध के लिए बाइबल में दो प्रमुख रूपक दिए गये हैं जो पिता का उसके बच्चों के साथ और एक पति का उसकी पत्नी के साथ सम्बन्ध के हैं। ये ‘प्रथम कारक’ के अभावुक दार्शनिक उदाहरण नहीं है, अपितु ये मानवीय सम्बन्धों में बहुत ही अन्तरंग और गहनता के साथ हैं।

इस तरह से अभी तक हमने नींव को निर्मित कर लिया है। लोग परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे हुए हैं जो उनके मनों, भावनाओं और इच्छा से मिलकर बना हुआ है। हम संवेदनशील और स्वयं-के-प्रति जागरूक हैं। हम हमारी ‘नैतिक-व्याकरण’ के साथ नैतिक प्राणी हैं जो हमें ‘सही’ और ‘निष्पक्ष’ और जो निष्पक्ष नहीं है, के प्रति जन्मजात रूप से निर्देशित करती है। हमारे पास सभी तरह के रूपों में सुन्दरता, कला और कहानी की सराहना और विकास करने की सहज क्षमता है। और हम जन्मजात और स्वाभाविक रूप से सम्बन्धों को अन्यों के साथ मित्रता की खोज करते और इसका विकास करते हैं। हम यह सब कुछ हैं क्योंकि परमेश्‍वर यह सब कुछ है और हम परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे हुए हैं। इस नींव को निर्मित करते समय यह सब कटौतियाँ कम से कम उन सबके साथ बनी हुई हैं जिसे हम हमारे बारे में अवलोकन करते हैं। हम हमारी अगली पोस्ट अर्थात लेख में कुछ

मोक्ष – कर्मों से स्वतंत्रता को प्राप्त करना

कर्म, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, एक ऐसी व्यवस्था है जो कि आपके और मेरे ऊपर कार्यरत् है। कर्म का अर्थ बहुत सी बातें हो सकती हैं, परन्तु इसका मौलिक विचार हमारे द्वारा किए हुए कामों से है और धार्मिक कार्यों के लाभ और बुरे कार्यों के लिए दण्ड हमारे प्राणों के साथ जुड़ा हुआ है। जब तक हमारे कार्य पूरी तरह से धार्मिक नहीं होते तब तक हम पर इनका दण्ड है, और जब तक यह दण्ड नहीं  दे दिया जाता हम बन्धन में पड़े हुए हैं।

हम सभी किसी न किसी तरीके से सहज बुद्धि से इनका अहसास करते हैं। और हमारी बुद्धि और ज्ञान के द्वारा हमने बहुत से ऐसे तरीकों को इन जमा किए हुए कर्मों से निपटारा करने के लिए आविष्कृत कर लिया है। एक मार्ग कर्म मार्ग है (कामों का एक मार्ग) जिसमें हम भले कामों के लिए बहुत ही कठिन मेहनत करते हैं। मंत्र और पूजा हैं जिनका उच्चारण किया जाता है। त्योहार और पवित्र स्नान जैसी बातें हैं जिनमें भाग लिया जाता है, जैसे कुम्भ मेला त्योहार। ये तरीके बहुत ही कठिन हैं और हमें कभी भी आश्वस्त नहीं किया गया है कि हमारे प्रयास पर्याप्त हैं। क्या हमारे कर्मों के पीछे की गई मंशा भली थी? क्या भले कर्मों की सँख्या की मात्रा पर्याप्त है? हम इसके लिए कभी भी सुनिश्चित नहीं हैं। और इसलिए, गुरत्वाकर्षण की तरह ही, हम कर्मों में बने रहते हुए, स्वयं को मोक्ष प्राप्त करने और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सक्षम नहीं हैं। इसलिए ही पूजा करने से पहले अधिकांश लोग प्ररथास्नाना (या प्रतासना) मंत्र (“मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ। मैं पाप में उत्पन्न हुआ। मेरा प्राण पाप के अधीन है। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।”) का उच्चारण करते हैं।

प्रजापति/यहोवा: ऐसा परमेश्‍वर जो बलिदान में प्रबन्ध करता है 

इसलिए अब “बलिदान का यह प्रभु कौन है?” और यह कैसे हमें कर्मों की व्यवस्था से बचा सकता है? सबसे प्राचीन वेद  के लेखों में, परमेश्‍वर जो सारी सृष्टि का प्रभु था – जिसने इसे रचा और ब्रह्माण्ड को अपने नियंत्रण में रखता है – को प्रजापति कह कर पुकारा जाता था। यह प्रजापति ही है जिसके द्वारा बाकी का सब कुछ अस्तित्व में आया है।

ऋग्वेद के लिखे जाने के समय के आस पास ही, लगभग 1500 ईसा पूर्व पवित्रशास्त्र का एक और हिस्सा पृथ्वी की दूसरी छोर – जिसे अब मध्य पूर्व द्वीप कह कर पुकारा जाता है, पर लिखा जा रहा था। वेद पुस्तक (बाइबल) के ये आरम्भिक इब्रानी मूल प्रतियाँ को तोरह  के नाम से जाना जाता है। तोरह इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि एक ही परमेश्‍वर है जो इस  पूरे ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। मूल इब्रानी भाषा के लिप्यान्तरण में इस परमेश्‍वर को या तो इलोहीम  या फिर यहोवा  कह कर पुकारा जाता था, और इन नामों को एक दूसरे के स्थान पर और इन इब्रानी मूल प्रतियों में सभी स्थानों पर उपयोग किया जाता था। इस प्रकार, ऋग्वेद के प्रजापति के जैसे ही, तोरह का यहोवा  या इलोहीम  पूरी सृष्टि का प्रभु था (और है)।

तोरह के आरम्भ में, यहोवा ने स्वयं को उस परमेश्‍वर में प्रगट किया है जो एक ऋषि जिसे अब्राहम कह कर पुकारा जाता है, के साथ हुई मुठभेड़ में उल्लेखनीय तरीके से ‘प्रबन्ध करने वाले’ के रूप में स्वयं को प्रगट करता है। हम बाद में इस मुठभेड़ पर और अधिक विस्तार से देखेंगे। अभी कुछ पलों के लिए, मैं चाहता हूँ कि आप यहोवा जो प्रबन्ध करता है (इब्रानी भाषा के यहोवा-यिरे का लिप्यान्तरण) और ऋग्वेद के प्रजापति जो कि “सृजे हुओं का समर्थक और सुरक्षा करने वाला”  है, के मध्य पाई जाने वाली समानताओं  के ऊपर ध्यान दें।

किस तरीके में यहोवा प्रबन्ध करता है? हमने पहले ही इस आवश्यकता की ओर ध्यान दे दिया है कि हमें कर्मों से छुटकारा प्राप्त करना है, और हमने उस मंत्र के ऊपर भी ध्यान दे दिया है जिसमें ‘बलिदान वाले प्रभु’ से प्रार्थना की गई है। ऋग्वेद निम्न बात कहते हुए उसी के ऊपर और अधिक विस्तार करता है:

वास्तविक बलिदान स्वयं प्रजापति ही है”

[संस्कृति: प्रजापतिर य़ाञा:]

शतपथ ब्राह्मण का भाषान्तरण करते हुए संस्कृत के विद्वान ऐच. अगुलीआर निम्न टिप्पणी देते है:

“और वास्तव में, इस बलिदान को पूरा करने के लिए और कोई भी (पीड़ित) नहीं था, परन्तु केवल प्रजापति ही था और देवताओं ने उसे बलिदान के लिए तैयार कर दिया। इस कारण इस संदर्भ के सम्बन्ध में ऋषि ने कहा है, ‘कि देवताओं ने बलिदान की सहायता से इस बलिदान को भेंट में चढ़ा दिया – क्योंकि बलिदान की सहायता के द्वारा उन्होंने उस को (प्रजापति) भेंट में चढ़ा दिया, बलिदान – ये सबसे पहले विधान थे, क्योंकि व्यवस्थाएँ सबसे पहले स्थापित की गई थीं।” ऐच. अगुलीआर, ऋग्वेद में बलिदान

प्राचीन समय से वेद घोषणा करते आ रहे हैं कि प्रजापति (या यहोवा) ने हमारी आवश्यकता की पहचान कर ली थी इसलिए उसने हमारे कर्मों के लिए स्वयं-को-बलिदान के लिए देने का प्रबन्ध किया। उसने ऐसा कैसे किया हम बाद के लेखों में देखेंगे जब हम ऋग्वेद के पुरूषासूक्ता में पुरूषा-प्रजापति के बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करेंगे, परन्तु अभी के लिए केवल इतना ही सोचें कि यह कितना महत्वपूर्ण है। श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8 ऐसे कहता है:

‘अनन्त जीवन का अन्य कोई मार्ग नहीं है’ (संस्कृत में :णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

यदि आप कर्मों से बचने की रूचि रखते हैं, यदि आप मोक्ष या आत्म जागृति की इच्छा रखते हैं तब इस बात की जानकारी होना बुद्धिमानी है कि क्यों और कैसे प्रजापति (या यहोवा) ने हमारे लिए यीशु में स्वयं-के-बलिदान के द्वारा प्रबन्ध करते हुए प्रगट किया है ताकि हम कर्मों से बच सकें और स्वर्ग को प्राप्त कर सकें। और वेद हमें मार्ग में नहीं छोड़ देते हैं। ऋग्वेद में पुरूषासूकता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान होने का विवरण देता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को देखने के लिए क्लिक करें जो पुरूषा का विवरण वैसे ही देता है जैसे बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) का करती है और उसका बलिदान आप तक मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेकर आता है। इसके पश्चात् हम इन वेदों के अध्ययन को जारी रखेंगे और देखेंगे कि कैसे प्राचीन ऋषि अय्यूब कर्मों से स्वयं की स्वतन्त्रता की घोषणा और शाश्‍वत जीवन – उसे मोक्ष प्रदान किया गया था, की अपेक्षा कर सका।

बलिदान की विश्वव्यापी आवश्यकता

ऋषि और मुनिगण युगों से जानते थे कि लोग छल अर्थात् माया और पाप में जीवन व्यतीत करेंगे। यह सभी धर्मों, युगों के लोगों और शैक्षणिक योग्यताओं के स्तर पर एक सहज ज्ञान की जागरूकता के साथ प्रगट हुआ कि उन्हें किसी न किसी तरीके से ‘शुद्ध’ होने की आवश्यकता है। इसलिए ही बहुत से लोग कुम्भ मेले के त्योहार में भाग लेते हैं और क्यों पूजा करने से पहले लोग प्ररथास्नाना (या प्रतासना) मंत्र की प्रार्थना करो करते हैं (“मैं एक पापी हूँ। मैं पाप का परिणाम हूँ। मैं पाप में उत्पन्न हुआ। मेरा प्राण पाप के अधीन है। मैं सबसे बड़ा पापी हूँ। हे प्रभु जिसके पास सुन्दर आँखें हैं, मुझे बचा ले, बलिदान देने वाले हे प्रभु।”)। शुद्ध होने के इस सहज ज्ञान के साथ-साथ बलिदान देने की आवश्यकता का भाव भी है कि किसी न किसी तरीके से हमारे पापों के जुर्माने या हमारे जीवन के अन्धकार (तमस) को ‘अदा’ कर दिया जाए। और एक बार फिर से बलिदानों की पूजा में, या कुम्भ मेले और अन्य त्योहारों में लोग समय, धन, तपस्या को देते हैं ताकि बलिदान के इस सहज ज्ञान की आवश्यकता को पूर्ण कर सकें। मैंने सुना है कि लोग गाय को लेते हैं और उसकी पूँछ पकड़े हुए नदी के उस पार उतरते हैं। यह एक पूजा या बलिदान के रूप में क्षमा को कमाने के लिए किया जाता है।

बलिदान को देने की आवश्यकता तब तक हमारे चारों ओर रहेगी जब तक प्राचीनत्तम धार्मिक लेख हमारे चारों ओर रहेंगे। और ये लेख पुष्टि करते हैं कि जो कुछ हमारा सहज ज्ञान हमें कहता है – वह यह है कि बलिदान बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसे दिया ही जाना चाहिए। उदाहरण के लिए नीचे दी हुई शिक्षाओं के ऊपर विचार करें:

कठोपनिषद् (हिन्दू लेख) में नायक नचीकेता कहता है:

“मैं सचमुच में जानता हूँ कि बलिदान स्वर्ग की ओर ले चलते हैं और स्वर्ग की प्राप्ति का मार्ग है”

कठोपनिषद् 1/14

हिन्दू पुस्तक कहती है:

“बलिदान के माध्यम से ही मनुष्य स्वर्ग पहुँचता है” शतपथब्राह्मण VII. 6/1/10

“बलिदान के तरीके से, न केवल मनुष्य अपितु देवता भी अमरत्व को प्राप्त कर लेते हैं” शतपथब्राह्मण II. 2/2/8-14

परिणामस्वरूप, बलिदान के माध्यम से ही हम अमरत्व और स्वर्ग (मोक्ष) को प्राप्त करते हैं। परन्तु प्रश्न अभी भी बना हुआ है कि किस तरह का बलिदान और कितना अधिक दण्ड की कीमत ‘अदा’ करने के लिए पर्याप्त है या हमारे पापों/तमस के विरूद्ध लाभ कमाने के लिए आवश्यक है? क्या 5 वर्षों की तपस्या इसके लिए पर्याप्त है? क्या गरीबों को धन देना एक बलिदान के लिए पर्याप्त है? और इसी तरह की अन्य बातें, कितना पर्याप्त है?

प्रजापति/यहोवा : बलिदान का प्रबन्ध करने वाला परमेश्‍वर

सबसे प्राचीनत्तम वेद के लेखों में, परमेश्‍वर जो सृष्टि का प्रभु था–जिसने इसे रचा और ब्रह्माण्ड को अपने नियंत्रण में रखता है – को प्रजापति कह कर पुकारा जाता था। यह प्रजापति ही है जिसके द्वारा बाकी का सब कुछ अस्तित्व में आया है।

ऋग्वेद के लिखे जाने के समय के आस पास ही, लगभग 1500 ईसा पूर्व पवित्रशास्त्र का एक और हिस्सा पृथ्वी की दूसरी छोर – जिसे अब मध्य पूर्व द्वीप कह कर पुकारा जाता है, पर लिखा जा रहा था। वेद पुस्तक (बाइबल) के ये आरम्भिक इब्रानी मूल प्रतियाँ को तोरह के नाम से जाना जाता है। तोरह इस घोषणा के साथ आरम्भ होती है कि एक ही परमेश्‍वर है जो इस पूरे ब्रह्माण्ड का सृष्टिकर्ता है। मूल इब्रानी भाषा के लिप्यान्तरण में इस परमेश्‍वर को या तो इलोहीम या फिर यहोवा कह कर पुकारा जाता था, और इन नामों को एक दूसरे के स्थान पर और इन इब्रानी मूल प्रतियों में सभी स्थानों पर उपयोग किया जाता था। इस प्रकार, ऋग्वेद के प्रजापति के जैसे ही, तोरह का यहोवा या इलोहीम पूरी सृष्टि का प्रभु था (और है)।

तोरह के आरम्भ में, यहोवा स्वयं को प्रबन्ध करने वाले परमेश्‍वर के रूप में एक ऋषि जिसे अब्राहम कह कर पुकारा जाता है, के साथ हुई मुठभेड़ में उल्लेखनीय तरीके से स्वयं को प्रगट करता है। हम बाद में इस मुठभेड़ पर और अधिक विस्तार से देखेंगे। अभी कुछ पलों के लिए, मैं चाहता हूँ कि आप यहोवा जो प्रबन्ध करता है (इब्रानी भाषा के यहोवा-यिरे का लिप्यान्तरण) और ऋग्वेद के प्रजापति जो कि “सृजे हुओं का समर्थक और सुरक्षा करने वाला” है, के मध्य पाई जाने वाली समानताओं के ऊपर ध्यान दें।

किस तरीके में यहोवा प्रबन्ध करता है? हमने पहले ही इस लोगों के द्वारा बलिदान दिए जाने की आवश्यकता के ऊपर ध्यान दे दिया है परन्तु इस बात की निश्चितता के बिना कि जिस बलिदान को हम ला रहे हैं वह पर्याप्त है। सबसे अधिक रूचिपूर्ण बात जो है वह यह है कि हमारी आवश्यकता के इस विशेष क्षेत्र में तन्डयामाहा ब्राह्मण यह घोषणा करता है कि कैसे हमारी आवश्यकता के लिए प्रजापति प्रबन्ध करेगा। यह कहता है:

प्रजापति (सारी सृष्टि के प्रभु) ने स्वयं-का-बलिदान को देवताओं की भेंट के लिए चढ़ा दिया” तन्डयामाहा ब्राह्मण, अध्याय 7 का 2रा काण्ड। [संस्कृत में – “प्रजापतिर्द्देवेभ्यम् अत्मनम्य़ज्नम्क्र्त्व प्रयच्चत्”]

यहाँ पर प्रजापति एक वचन है। केवल एक ही प्रजापति है, ठीक वैसे ही जैसे तोरह में एक ही यहोवा है। बाद में पुराणों के साहित्य (ईस्वी सन् 500-1000 में लिखे गए) में कई प्रजापतियों की पहचान की गई है। परन्तु सबसे प्राचीनत्तम लेखों में जैसा कि ऊपर लिखा गया है प्रजापति एकवचन है। और इस कथन में हम देखते हैं कि प्रजापति स्वयं को दे देता है या वह स्वयं बलिदान है और वह अन्यों के बदले में स्वयं को दे देता है। ऋग्वेद यह कहते हुए पुष्टि करते हैं:

“वास्तविक बलिदान स्वयं प्रजापति ही है” [संस्कृत: प्रजापतिरय़ाञा:]

शतपथब्राह्मण का भाषान्तरण करते हुए संस्कृत के विद्वान ऐच. अगुलीआर निम्न टिप्पणी देते हैं:

“और वास्तव में, इस बलिदान को पूरा करने के लिए और कोई भी (पीड़ित) नहीं था, परन्तु केवल प्रजापति ही था और देवताओं ने उसे बलिदान के लिए तैयार कर दिया। इस कारण इस संदर्भ के सम्बन्ध में ऋषि ने कहा है, ‘कि देवताओं ने बलिदान की सहायता से इस बलिदान को भेंट में चढ़ा दिया– क्योंकि बलिदान की सहायता के द्वारा उन्होंने उसको (प्रजापति) भेंट में चढ़ा दिया, बलिदान– ये सबसे पहले विधान थे, क्योंकि व्यवस्थाएँ सबसे पहले स्थापित की गई थी।” ऐच. अगुलीआर, ऋग्वेद में बलिदान

प्राचीन समय से वेद घोषणा करते आ रहे हैं कि प्रजापति (या यहोवा) ने हमारी आवश्यकता की पहचान कर ली थी इसलिए उसने हमारे कर्मों के लिए स्वयं-को-बलिदान के लिए देने का प्रबन्ध किया। उसने ऐसा कैसे किया हम बाद के लेखों में देखेंगे जब हम ऋग्वेद के पुरूषासूक्ता में पुरूषा-प्रजापति के बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करेंगे, परन्तु अभी के लिए केवल इतना ही सोचें कि यह कितना महत्वपूर्ण है। श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8 ऐसे कहता है:

‘अनन्त जीवन का अन्य कोई मार्ग नहीं है’ (संस्कृत में :णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

यदि आप शाश्‍वत जीवन में रूचि रखते हैं, यदि आप मोक्ष या आत्म जागृति की इच्छा रखते हैं तब इस बात की जानकारी होना बुद्धिमानी है कि क्यों और कैसे प्रजापति (या यहोवा) ने हमारे लिए यीशु में स्वयं-के-बलिदान के द्वारा प्रबन्ध करते हुए प्रगट किया है ताकि हम कर्मों से बच सकें और स्वर्ग को प्राप्त कर सकें। और वेद हमें मार्ग में नहीं छोड़ देते हैं। ऋग्वेद में पुरूषासूक्ता है जो प्रजापति के देहधारण और उसके द्वारा हमारे लिए बलिदान होने का विवरण देता है। यहाँ पर पुरूषासूक्ता के परिचय को देखने के लिए क्लिक करें जो पुरूषा का विवरण वैसे ही देता है जैसे बाइबल (वेद पुस्तक) यीशु सत्संग (नासरत के यीशु) का करती है और उसका बलिदान आप तक मोक्ष या मुक्ति (अमरत्व) को लेकर आता है। यहाँ पर यह समझने के लिए क्लिक करें कि यीशु के इस बलिदान से शुद्ध को कैसे प्राप्त किया जाए।

पुरूषा का बलिदान: सभी वस्तुओं की उत्पत्ति

श्लोक 3 और 4 के पश्चात् पुरूषासूक्ता अपने घ्यान को पुरूषा के गुणों की ओर से पुरूषा के बलिदान के ऊपर केन्द्रित करता है। श्लोक 6 और 7 इस पर अपने ध्यान को इस तरीके से लगाता है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

पुरूषासूक्ता में श्लोक 6-7

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
य़त्पुरुसेन हविसादेवा यज्नम् अतन्वतावासन्तो अस्यसिद् अज्यम् ग़्रिस्मा इध्माह् सरद्धविह् तम् य़ज्नम् बर्हिसि पुरूषाकान्पुरूषाम् जतम्ग्रतह् तेना देवा अयाजन्त साध्य रास्यास च ये जब देवताओं ने बलि के रूप में पुरूषा का बलिदान किया, तब वंसत पिघले हुए घी की आहुति, ग्रीष्म ऋतु ईंधन, और शरद ऋतु इसकी बलि थी। पुआल में बलि के रूप में आरम्भ में उत्पन्न हुए पुरूषा को उन्होंने छिड़क दिया। देवताओं, साधुओं और ऋषियों ने उसे शिकार की तरह बलिदान कर दिया।

यद्यपि इन श्लोकों के सभी पहलू तुरन्त स्पष्ट नहीं होते हैं, परन्तु जो कुछ यहाँ पर स्पष्ट है वह यह है कि इसका ध्यान पुरूषा के बलिदान के ऊपर है। प्राचीन वैदिक टीकाकार शंकराचार्य ने इस तरह से टिप्पणी की थी:

“ऋषियों – मुनियों और देवताओं ने बलि के शिकार –  पुरूषा को – बलिदान की वेदी के साथ एक बलि किए जाने वाले यज्ञ पशु के रूप में बाँध लिया और अपने मनों से यज्ञ में उसकी भेंट चढ़ाई।” ऋग्वेद 10/90/7 के ऊपर शंकराचार्य की टीका

श्लोक 8-9 का आरम्भ वाक्यांश “तस्मद्यज्नत्सर्वहुतह्…” से होता है जिसका अर्थ है कि उसके बलिदान में पुरूषा ने सब कुछ भेंट चढ़ा दिया जो कुछ उसके पास था – उसने कुछ भी अपने पास न रख छोड़ा। इसने उस प्रेम को प्रदर्शित किया जो उसने अपने बलिदान को देने के द्वारा प्रकट किया। यही केवल वह प्रेम है जिसमें हम स्वयं को अन्यों को देने के लिए दे सकते हैं और अपने पास कुछ भी नहीं रख छोड़ते। यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने वेद पुस्तक (बाइबल) में कहा है कि:

“इससे बड़ा प्रेम किसी का नहीं: कि कोई अपने मित्रों के लिये अपना प्राण दे” (यूहन्ना 15:13)

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने यह अपने शिष्यों से कहा जब वह स्वेच्छा से स्वयं को क्रूस के ऊपर जाने के द्वारा अपना बलिदान देने के लिए अर्पण कर रहा था। क्या पुरूषा के बलिदान और यीशु सत्संग के मध्य में कोई सम्बन्ध है? पुरूषासूक्ता श्लोक 5 (जिस हमने अभी तक छोड़ दिया है) हमें एक सुराग प्रदान करता है – परन्तु यह सुराग हमें सर्वप्रथम यह संकेत देगा कि इसमें कोई सम्बन्ध नहीं है। यहाँ पर श्लोक 5 है

 पुरूषासूक्ता में श्लोक 5

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
तस्मद् विरालजयत विराजो अधि पुरूषाह् ष जतो अत्यरिच्यत पास्चद्भुमिम् अथो पुरह् उस से – पुरूषा के एक भाग से – ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था और इसे पुरूषा का सिंहासन बनाया गया और वह सर्वव्यापी बन गया।

पुरूषासूक्ता के अनुसार, पुरूषा का बलिदान समय के आरम्भ में कर दिया गया था और इसके परिणामस्वरूप ब्रह्माण्ड की सृष्टि हई । इस प्रकार यह बलिदान पृथ्वी पर नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह बलिदान ऐसा था जिसके द्वारा पृथ्वी निकल कर आई थी। श्लोक 13 स्पष्ट दिखाता है कि यह सृष्टि पुरूषा के बलिदान के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई है। यह कहता है कि:

 पुरूषासूक्ता में श्लोक 13

संस्कृत में हिन्दी भाषान्तरण
चन्द्रम मनसो जतस् चक्सोह् सुर्यो अजयत्मुखद् ईन्द्र स्च आग्निस्च प्रनद् वायुर् अजयत् चन्द्रमा का जन्म उसके मन से हुआ था। सूर्य उसकी आँख से निकल कर आया। बिजली, वर्षा और अग्नि उसके मुँह से उत्पन्न हुए। उसकी श्वास से वायु का जन्म हुआ था।

वेद पुस्तक (बाइबल) की इस गहन समझ में, यह सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। हम इस स्पष्टता के आरम्भ को तब देखते हैं जब हम ऋषि (भविष्यद्वक्ता) मीका के रचनाओं को पढ़ते हैं। वह ईसा पूर्व 750 के आसपास रहा और यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के आगमन से 750 वर्षों तक रहते हुए उसने उसके आगमन को उस शहर के ऊपर ध्यान देते हुए देख लिया जिसमें उसका जन्म होना था। उसने ऐसे लिखा है कि:

हे बैतलहम एप्राता,

यदि तू ऐसा छोटा है

कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता,

तौभी तुझ में से मेरे लिये एक पुरूष निकलेगा,

जो इस्राएलियों में प्रभुता करनेवाला होगा;

और उसका निकलना प्राचीनकाल से, 

वरन् अनदि काल से होता आया है। (मीका 5:2)

मीका ने भविष्यद्वाणी की थी कि प्रभुता करने वाला (या मसीह) बैतलहम के शहर से निकल कर आएगा। 750 वर्षों के पश्चात् यीशु मसीह (यीशु सत्संग) ने इस दर्शन की पूर्णता में इस शहर में जन्म लिया। सत्य के खोजी अक्सर अपने आश्चर्य को मीका के इस दर्शन के इस पहलू के ऊपर केन्द्रित करते हैं। कुछ भी हो, मैं इस समय हमारे ध्यान को इस आने वाले के उद्गमों  के विवरण के ऊपर केन्द्रित करना चाहता हूँ। मीका भविष्य में आने वाले की भविष्यद्वाणी की घोषणा करता है, परन्तु वह कहता है कि इस आने वाले का उद्गम अतीत की गहराई में है। उसका ‘निकलना प्राचीनकाल से वरन् अनादि काल से होता आया’ है। इस आने वाले का उद्गम उसके पृथ्वी पर प्रगट होने से पूर्वतिथि का है! ‘प्राचीनकाल से…’ के लिए कितनी अतीत में जाना होगा? यह अनादि काल के दिनों  तक चला जाता है। वेद पुस्तक (बाइबल) में दिए हुए सत्य ज्ञान के अन्य वचन इसे आगे स्पष्ट कर देते हैं। कुलुस्सियों 1:15 में ऋषि पौलुस (जिसने इसे लगभग 50 ईस्वी सन् में लिखा था) ने यीशु के बारे में ऐसी घोषणा की कि:

वह तो अदृश्य परमेश्‍वर का प्रतिरूप और सारी सृष्टि में पहिलौठा है (कुलुस्सियों 1:15)

यीशु को ‘अदृश्य परमेश्‍वर का प्रतिरूप’ और ‘सारी सृष्टि में पहिलौठा होने’ की घोषणा की गई है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि यीशु का देहधारण अर्थात् अवतार लेना इतिहास में सटीक समय (ईसा पूर्व 4 – 30 ईस्वी सन्) में हुआ था, वह किसी भी वस्तु की सृष्टि से पहले – यहाँ तक कि अतीत में अनन्तकाल से अस्तित्व में था । उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि परमेश्‍वर (प्रजापति) सदैव अतीत के अनन्तकाल से अस्तित्व में है, और उसका ‘प्रतिरूप’ होने के कारण यीशु (यीशु सत्संग) भी सदैव से अस्तित्व में था।

जगत की सृष्टि से पहले किया हुआ बलिदान सब वस्तुओं की उत्पति 

परन्तु न केवल वह अतीत के अनन्तकाल से अस्तित्व में है, अपितु ऋषि (भविष्यद्वक्ता) यूहन्ना ने स्वर्ग के एक दर्शन में इस यीशु (यीशु सत्संग) का वर्णन इस तरह से किया है:

“मेम्ना…जो जगत की उत्पति के समय से घात हुआ है।” (प्रकाशितवाक्य 13:8)

क्या यह एक विरोधाभास नहीं है? क्या यीशु (यीशु सत्संग) को 30 ईस्वी सन् में घात नहीं किया गया था? यदि वह तब घात किया गया था, तब वह कैसे ‘जगत की उत्पति के समय’ भी घात किया जा सकता है? इस विरोधाभास में ही हम देखते हैं कि पुरूषासूक्ता और वेद पुस्तक (बाइबल) एक ही बात का विवरण दे रहे हैं। हमने देखा कि पुरूषासूक्ता का श्लोक 6 कहता है कि पुरूषा का बलिदान आरम्भ था। यूसुफ़ पदनीज़ेरकारा अपने द्वारा रचितप्राचीन वेदों में मसीह  नामक पुस्तक में संकेत देते हैं कि पुरूषासूक्ता के ऊपर संस्कृति की टीका हमें बताती है कि पुरूषा का आरम्भ में हुआ बलिदान ‘परमेश्‍वर के ह्दय में’ था (उसने इसका अनुवाद संस्कृति केयगम् के अर्थ से किया है)। वह साथ ही संस्कृति के विद्वान एन. जे. शिन्दे का उद्धरण देता है जो यह कहते हैं कि आरम्भ में हुए यह बलिदानमानसिक या प्रतीकात्मक रहा था (एन. जे. शिन्दे द्वारा लिखित पुस्तक ‘वैदिक साहित्य में पुरूषासूक्ता’ (संशोधित 10-90) (पूना विश्वविद्यालय, के संस्कृत के उच्च अध्ययन केंद्र द्वारा प्रकाशित)1965.

इस तरह से अब पुरूषासूक्ता का रहस्य स्पष्ट हो जाता है। पुरूषा परमेश्‍वर और परमेश्‍वर का प्रतिरूप, अतीत के अनन्तकाल से था। वह किसी भी वस्तु के होने से पहले से था। वह सभी वस्तुओं में पहिलौठा था। परमेश्‍वर, अपने सर्वज्ञान में, पहले से ही जानता था कि मनुष्य की सृष्टि के लिए एक बलिदान की आवश्यकता होगी। इस बलिदान में उस सब की आवश्यकता होगी जिसका प्रबन्ध वह – पुरूषा के देहधारण अर्थात् अवतार के माध्यम से इस जगत में पापों की शुद्धता या शोधन को बलिदान के रूप में पूरा करेगा। इस समय परमेश्‍वर को यह निर्णय लेना था कि वह ब्रह्माण्ड तथा मानव जाति की रचना करे या नहीं। इस निर्णय में पुरूषा ने स्वयं के स्वेच्छा से बलिदान होने का निर्णय लिया, और इस तरह से सृष्टि की रचना हुई। इस तरह से, मानसिक रूप में, या परमेश्‍वर के हृदय में, पुरूषा “जगत की सृष्टि के समय से घात किया”हुआ था जैसा कि वेद पुस्तक (बाइबल) घोषणा करती है।

एक बार जब – यहाँ तक कि समय के आरम्भ होने से पहले – निर्णय ले लिया गया –परमेश्‍वर (प्रजापति – सारी सृष्टि के प्रभु) ने समय, ब्रह्माण्ड तथा मानव जाति की सृष्टि को रच दिया। इस तरह से पुरूषा के स्वेच्छा से होने वाले बलिदान ‘ब्रह्माण्ड की रचना’ (श्लोक 5), चन्द्रमा, सूर्य, बिजली और वर्षा (श्लोक 13), और यहाँ तक कि स्वयंसमय  के आरम्भ होने (श्लोक 6 में उल्लिखित वसंत्, ग्रीष्म और शरद ऋतु की रचना) का कारक बन गया। पुरूषा ही इन सभी का पहिलौठा था।

 वे देवतागण कौन हैं जिन्होंने पुरूषा का बलिदान किया था?

परन्तु एक पहेली अभी भी अनसुलझी बाकी है। पुरूषासूक्ता श्लोक 6 कहता है कि ‘देवतागणों’ (देवों) ने पुरूषा का बलिदान किया था? यह देवतागण कौन हैं? वेद पुस्तक (बाइबल) इसकी व्याख्या करती है। दाऊद नामक एक ऋषि ने ईसा पूर्व 1000 वर्षों पहले एक पवित्र स्तुतिगान में लिखा है जो यह प्रकाशित करता है कि कैसे परमेश्‍वर (प्रजापति) ने पुरूषों और स्त्रियों के लिए बोला:

“मैं ने कहा था, ‘तुम “ईश्‍वर” हो; और सब के सब परमप्रधान के पुत्र हो।'” (भजन संहिता 82:6)

1000 वर्षों पश्चात् यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने ऋषि दाऊद द्वारा रचित इस पवित्र स्तुतिगान के ऊपर यह कहते हुए टिप्पणी दी कि:

यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “क्या तुम्हारी व्यवस्था में नहीं लिखा है, ‘मैंने कहा, तुम ईश्‍वर हो?’ 35 यदि उसने उन्हें ईश्‍वर कहा जिनके पास परमेश्‍वर का वचन पहुँचा – और पवित्रशास्त्र की बात असत्य नहीं हो सकती – 36 तो जिसे पिता ने पवित्र ठहराकर जगत में भेजा है, तुम उसके विषय में क्या कहते हो?” (यूहन्ना 10:34-36)

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) पुष्टि करते हैं कि ऋषि दाऊद ने सत्य पवित्रशास्त्र में शब्दावली देवता अर्थात् ‘ईश्‍वर’ का उपयोग किया है। उन्होंने ऐसा किन अर्थों में किया है? हम देखते हैं कि वेद पुस्तक (बाइबल) की सृष्टि के विवरण में हम ‘परमेश्‍वर के स्वरूप’ में सृजे गए हैं (उत्पत्ति 1:27)। इसी भाव में कदाचित् हमें देवता या ‘र्ईश्वर’ के रूप में माना जा सकता है क्योंकि हम परमेश्‍वर के स्वरूप में सृजे गए हैं। परन्तु वेद पुस्तक (बाइबल) इसकी व्याख्या आगे करती है। यह घोषणा करती है कि वह जो पुरूषा के इस बलिदान को स्वीकार करते हैं उन्हें:

जैसा उसने हमें जगत की उत्पति से पहले उसमें चुन लिया कि हम उसके निकट प्रेम में पवित्र और निर्दोष हों। और अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार हमें अपने लिये पहले से ठहराया कि यीशु मसीह के द्वारा हम उसके लेपालक पुत्र हों (इफिसियों 1:4-5)

जब जगत की सृष्टि से पूर्व ही प्रजापति-पुरूषा ने पुरूषा के बलिदान को एक पूर्ण बलिदान के रूप में आहुति देने के लिए निर्णय ले लिया था, तब परमेश्‍वर ने उसके लोगों को भी  चुन लिया था।उसने उनका चुनाव किस कार्य के लिए किया था? यह बड़ी स्पष्टता से कहता है कि उसने हमारा चुनाव अपने पुत्र होने के लिए किया था।

दूसरे शब्दों में, वेद पुस्तक (बाइबल) घोषणा करती है कि पुरूष और स्त्रियों का चुनाव तब किया गया जब परमेश्‍वर ने स्वयं को पूर्ण बलिदान में आहुति देने के लिए चुनना तय किया ताकि वह उसके बलिदान के द्वारा परमेश्‍वर की सन्तान बन जाए। इन अर्थों में हमें ‘ईश्‍वर’ या देवता कहा गया है। यह उन लोगों के लिए सत्य है (जैसा कि यीशु सत्संग ऊपर घोषणा करते हैं) जिनके लिए परमेश्‍वर का वचन आया– अर्थात् उनके लिए जो उसके वचन को ग्रहण करते हैं। और इन्ही अर्थों में यह भविष्य की ईश्‍वर की सन्तान की आवश्कयता थी जिसने पुरूषा के बलिदान को विवश किया। जैसा कि पुरूषासूक्ता श्लोक 6 कहता है कि ‘जब देवताओं ने बलि के रूप में पुरूषा का बलिदान किया।’ पुरूषा का बलिदान हमारा शोधन था।

पुरूषा का बलिदान स्वर्ग का मार्ग

इस तरह से हम प्राचीन पुरूषासूक्ता और वेद पुस्तक में प्रकाशित दिए हुए ज्ञान में परमेश्‍वर की योजना को देखते हैं। यह एक विस्मित करने वाली योजना है – ऐसी जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। यह हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि जैसे पुरूषासूक्ता 16वें श्लोक में सार सहित समाप्त होता है कि:

संस्कृत में हिन्दी भाषान्तरण
य़ज्ञनान यज्नमजयन्त देवस्तनि धर्मनि प्रथमन्यसन् तेह नकम् महिमनह् सचन्त य़त्र् पुर्वे सध्यह् सन्तिदेवह् देवताओं ने पुरूषा को यज्ञपशु के रूप में बलि कर दिया। यह सबसे प्रथम स्थापित सिद्धान्त है। इसके माध्यम से ऋषियों ने स्वर्ग की प्राप्ति की।

एक ‘ऋषि’ एक बुद्धिमान व्यक्ति होता है। और स्वर्ग की प्राप्ति के लिए तरसना वास्तव में एक बुद्धिमानी की बात है। यह हमारी पहुँच से परे नहीं है। यह असम्भव नहीं है। यह केवल सबसे अधिक तपस्वी पवित्र लोगों के लिए ही नहीं है जो अपने चरम अनुशासन और ध्यान के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह केवल गुरूओं के  लिए नहीं है। इसके विपरीत यह एक ऐसा मार्ग है जिसे स्वयं पुरूषा ने यीशु मसीह (यीशु सत्संग) के रूप में अपने देहधारण अर्थात् अवतार के द्वारा प्रबन्ध किया है।

पुरूषा का बलिदान स्वर्ग के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं 

सच्चाई तो यह है कि इसका प्रबन्ध न केवल हमारे लिए किया गया अपितु पुरूषासूक्ता श्लोक 15 और 16 के मध्य में शंकराचार्य की संस्कृति की टीका ऐसे कहती है कि:

संस्कृत में  हिन्दी भाषातंरण 
तमेव विद्वनम्र्त इह भवति णन्यह् पन्त अयनय वेद्यते इस तरह, वह जो इसे जानता है मृत्युहीनता की स्थिति में पहुँचने के लिए सक्षम हो जाता है। यहाँ तक पहुँचने के लिए किसी अन्य मार्ग की पहचान नहीं की गई है

अनन्त जीवन (मृत्युहीनता) तक पहुँचने के लिए किसी अन्य मार्ग की पहचान नहीं की गई है! निश्चित रूप से इस विषय का अध्ययन थोड़ा अधिक अच्छे से करना बुद्धि की बात है। अभी तक मैंने वेद पुस्तक (बाइबल) के चारों ओर अध्ययन यह दिखाने के लिए किया है कि यह कैसे परमेश्‍वर, मनुष्य और वास्तविकता की एक व्यापक कथा को बतलाता है जो पुरूषासूक्ता में कही हुई कथा के साथ गूँजती है। परन्तु मैंने विस्तार या क्रम में इस कथा को नहीं देखा है। इसे सीखना बहुत अधिक बात है, बहुत अधिक ऋषि और स्तुतिगान और सिद्धान्त हैं जिन्हें प्रकाशित किया गया है। इस उद्देश्य के साथ, मैं आपको निमंत्रण देना चाहता हूँ कि मेरे साथ वेद पुस्तकों को और अधिक विस्तार के साथ, आरम्भ से शुरू करते हुए, सृष्टि के बारे में सीखते हुए अध्ययन करें, कि ऐसा क्या हुआ कि पुरूषा के बलिदान की आवश्यकता पड़ी,  उस जगत के साथ क्या हुआ जिसके कारण मनु (वेद पुस्तक में नूह) का जल प्रलय आया और कैसे जातियों ने सीखा और संरक्षित रखा कि एक पूर्ण बलिदान होगा जो मृत्यु से उन्हें छुटकारा देगा और स्वर्ग में अनन्त जीवन प्रदान करेगा निश्चित ही सीखने और इसके लिए जीवन यापन करने के लिए यह कोईयोग्य बात है। 

श्लोक 3 एवं 4 – पुरूषा का देहधारण

पुरूषासूक्ता श्लोक 2 से आगे निम्न बातों के साथ जारी रहता है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

संस्कृत में

हिन्दी भाषान्तरण

इतवन् अस्य महिम अतो ज्ययम्स्च पुरूष:पादो-अस्य विस्व भ् उ तनि त्रिपद् अस्यम्र्त्म् दिवित्रिपद् उर्ध्व उदैत् पुरुष: पदोउ-अस्येह अ भवत् पुन: ततो विस्वन्न्वि अक्रमत् ससननसने अभि सृष्टि में पुरूषा की महिमा – उसकी महिमा अति प्रतापयोग्य है। वह इस सृष्टि से भी बहुत अधिक महान् है। पुरूषा [उसके व्यक्तितत्व] का एक चौथाई भाग इस जगत में है। उसका तीन चौथाई भाग अभी भी स्वर्ग की अनन्तता में वास कर रहा है। पुरूषा स्वयं की तीन चौथाइयों के साथ ऊपर की ओर उठा है। उसकी एक चौथाई का जन्म यहाँ हुआ था। जिससे उसने सभी जीवित प्राणियों में जीवन का विस्तार किया है।

यहाँ पर ऐसी कल्पना का प्रयोग हुआ है जिसे समझना कठिन है। परन्तु फिर भी, यह स्पष्ट है कि ये श्लोक पुरूषा की महानता और प्रताप के बारे में बात कर रहे हैं। यह बहुत स्पष्ट कहता है कि वह अपनी सृष्टि की तुलना में अधिक महान् है। हम यह भी समझ सकते हैं कि इस जगत में उसकी महानता का केवल एक ही भाग प्रगट हुआ है। परन्तु साथ ही यह इस जगत में उसके देहधारण अर्थात् अवतरण की भी बात करता है – ऐसे जगत के लोगों से जहाँ मैं और आप रहते हैं (‘उसकी एक चौथाई का जन्म यहाँ हुआ था’)। इस तरह से जब परमेश्‍वर ने देहधारण किया तो इस जगत में उसकी महिमा का केवल एक भाग ही प्रगट हुआ। जब उसने जन्म लिया तो उसने स्वयं को इस तरह से शून्य कर दिया। यह श्लोक 2 में पुरूषा ने – स्वयं को ‘दस अंगुलियों में सीमित कर दिया’ के वर्णन के अनुरूप है।

साथ ही यह जिस तरह से वेद पुस्तक (बाइबल) में नासरी के यीशु के देहधारण अर्थात् अवतार के वर्णन के अनुरूप भी है। यह उसके लिए ऐसा कहा गया है कि:

मेरा ध्येय यह है कि…उनके मनों में शान्ति हो और वे प्रेम से आपस में गठे रहें, और वे पूरी समझ का सारा धन प्राप्त करें, और परमेश्‍वर पिता के भेद को अर्थात् मसीह को पहचान लें। जिसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं। (कुलुस्सियों 2:2-3)

इस तरह से परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतरण मसीह था परन्तु इसका प्रगटीकरण बहुत अधिक मात्रा में ‘छिपा’ हुआ था। यह कैसे ‘छिपा’ हुआ था? इसकी व्याख्या आगे दी गई है:

 जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो:

6 जिसने, परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी

परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में

रखने की वस्तु न समझा;
7 वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया,

और दास का स्वरूप धारण किया,

और मनुष्य की समानता में हो गया।

8 और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने

आप को दीन किया,

और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु –

हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली!

इस कारण परमेश्‍वर ने उसको अति महान् भी किया,

और उसको वह नाम दिया जो सब नामों में श्रेण्ठ है, (फिलिप्पियों 2:5-9)

इस तरह से अपने देहधारण अर्थात् अवतरण में यीशु ने ‘स्वयं को शून्य’ कर दिया और उस स्थिति में स्वयं को बलिदान देने के लिए तैयार किया। उसने अपनी महिमा का केवल आंशिक ही प्रकट किया, ठीक वैसे ही जैसे पुरूषासूक्ता कहता है। ऐसा उसके आने वाले बलिदान के कारण हुआ। पुरूषासूक्ता इसी विषय का अनुसरण करता है क्योंकि इन श्लोकों के पश्चात् यह पुरूषा की आंशिक महिमा से उसके बलिदान के ऊपर ध्यान केन्द्रित करने के वर्णन की ओर मुड़ जाता है। इसे हम हमारे अगली पोस्ट अर्थात लेख में देखेंगे।

श्लोक 2- पुरूषा अमरत्व का प्रभु है

हमने पुरूषासूक्ता के प्रथम श्लोक में देखा कि पुरूषा का विवरण अच्छी तरह से सर्व-ज्ञानी, सर्व-सामर्थी और सर्व-व्यापी के रूप में वर्णित किया गया था। तब हमने यह प्रश्न पूछा था कि क्या यह पुरूषा यीशु सत्संग (यीशु मसीह) हो सकता है या नहीं और इस प्रश्न को ध्यान में रखते हुए पुरूषासूक्ता के माध्यम से अध्ययन की यात्रा का आरम्भ किया था। इस तरह से हम पुरूषासूक्ता के दूसरे श्लोक तक आ पहुँचे हैं जो निरन्तर पुरूषा नामक इस व्यक्ति का वर्णन बहुत ही असामान्य शब्दों में करता चला जाता है। यहाँ पर संस्कृति और उसका हिन्दी भाषान्तरण दिया हुआ है। (संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।)

पुरूषासूक्ता का दूसरा श्लोक

संस्कृत में

हिन्दी भाषान्तरण

पुरूष: एवेदम् सर्वम् यद्भुतम् यच्च भव्यम् उतम्र्तत्वस्येसनो यदन्नेनतिरोहति पुरूष: ही पूर्ण ब्रह्माण्ड है, जो कुछ है और जो कुछ होगा। और वह अमरत्व का प्रभु है, जिसे वह भोजन [प्राकृतिक पदार्थ] रहित प्रबन्ध करता है

पुरूषा की योग्यताएँ

पुरूषा ब्रह्माण्ड (अंतरिक्ष और पदार्थ की पूरी सीमा) में सर्वोच्च है और समय का प्रभु है (‘जो कुछ है और जो कुछ होगा’) साथ ही साथ वह ‘अमरत्व का प्रभु’– अर्थात् अनन्त जीवन है। हिंदु पौराणिक कथाओं में बहुत से देवतागण पाए जाते हैं,  परन्तु किसी को भी इस तरह की अनन्त योग्यताएँ नहीं दी गई हैं।

यह ऐसी विस्मित करने वाले प्रेरणादायक गुण हैं जो केवल एक सच्चे परमेश्‍वर– स्वयं सृष्टि के प्रभु से ही सम्बन्धित हो सकते हैं। यह ऋग्वेद का प्रजापति होगा (इब्रानी पुराने नियम के यहोवा का पर्यायवाची)। इस प्रकार, यह व्यक्ति पुरूषा, ही केवल इस एक परमेश्‍वर– सारी सृष्टि के प्रभु का देहधारी अर्थात् अवतार हो सकता है।

परन्तु हमारे लिए इससे भी अधिक प्रासंगिक यह है कि यह पुरूषा हमारे लिए अमरत्व (अनन्त जीवन) का ‘प्रबन्ध’ करता है। वह ऐसा प्राकृतिक पदार्थ का उपयोग करते हुए नहीं करता, अर्थात् वह अनन्त जीवन देने या प्रदान करने के लिए ब्रह्माण्ड की प्राकृतिक प्रक्रियाओं या प्राकृतिक पदार्थ/उर्जा का उपयोग नहीं करता है। हम सभी मृत्यु और कर्म के अभिशाप के अधीन हैं। यह हमारे अस्तित्व की निरर्थकता है जिससे हम छुटकारा पाने की लालसा रखते हैं और जिसके लिए हम पूजा, पवित्र स्नान और अन्य तपस्वी प्रथाओं को करने वाले कठिन कार्यों को करते हैं। यदि यहाँ पर थोड़ी सी भी सम्भावना है कि यह सत्य है और यह कि पुरूषा के पास दोनों अर्थात् अमरत्व को प्रदान करने की इच्छा और सामर्थ्य है, तो यह बुद्धिमानी होगा कि कम से कम इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर ली जाए।

वेद पुस्तक (बाइबल) के ऋषियों के साथ तुलना 

इस बात को ध्यान में रखते हुए आइए मानवीय इतिहास की सबसे प्राचीन पवित्र रचनाओं में से एक के ऊपर ध्यान दें। यह इब्रानी नियम (जिसे बाइबल का पुराना नियम या वेद पुस्तक कह कर पुकारा जाता है) में पाई जाती है। ऋग्वेद की तरह ही, यह पुस्तक विभिन्न ऋषियों की देववाणियों, स्तुतिगान, इतिहास और भविष्यद्वाणियों का एक संग्रह है, यद्यपि जिन्होंने उन्हें बहुत पहले ही लिख दिया था, वह इतिहास के विभिन्न युगों में रहे और लिखा। इस तरह से पुराना नियम विचारों का एक सर्वोत्तम संग्रह या विभिन्न प्रेरणाप्रदत्त रचनाओं का पुस्तकालय एक पुस्तक के रूप में संकलित है। इन ऋषियों की अधिकांश रचनाएँ इब्रानी में थीं और इस प्रकार यह महान् ऋषि अब्राहम के वंशज् थे जो लगभग 2000 ईसा पूर्व रहे। परन्तु फिर भी, एक रचना ऐसी है, जिसे ऋषि अय्यूब के द्वारा लिखा गया था जो अब्राहम से भी बहुत पहले रहे थे। उनके रहने के समय तक इब्रानी जाति उत्पन्न नहीं हुई। वे जिन्होंने अय्यूब का अध्ययन किया है यह अनुमान लगाते हैं कि वह लगभग 2200 ईसा पूर्व, अर्थात् 4000 वर्षों पहले रहे थे।

…अय्यूब की पुस्तक में

अपनी पवित्र पुस्तक, जिसे अय्यूब के नाम से पुकारा जाता है, हम निम्न वचन को उसके साथियों को कहते हुए सुनते हैं:

मुझे तो निश्चय है कि मेरा छुड़ानेवाला जीवित है,

और वह अन्त में पृथ्वी पर खड़ा होगा।

और अपनी खाल के इस  प्रकार नष्ट हो जाने के बाद भी,

मैं शरीर में होकर परमेश्‍वर का दर्शन पाऊँगा।

उसका दर्शन मैं आप अपनी आँखों से

अपने लिये करूँगा – और कोई दूसरा नहीं।

यद्यपि मेरा हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर भी हो जाए! (अय्यूब 19:25-27)

अय्यूब एक आने वाले छुड़ानेवाले अर्थात् ‘उद्धारक’ की बात करता है। हम जानते हैं कि अय्यूब भविष्य की ओर देखता है क्योंकि उद्धारक पृथ्वी के ऊपर खड़ा ‘होगा’ (अर्थात् भविष्य काल में)। परन्तु यह उद्धारक वर्तमान काल में भी रहता है – यद्यपि पृथ्वी के ऊपर नहीं। इस कारण यह उद्धारक, पुरूषासूक्ता के इस श्लोक में पुरूषा की तरह ही, समय का प्रभु है क्योंकि उसका अस्तित्व हमारी तरह समय के साथ बँधा हुआ नहीं है।

अय्यूब तब घोषणा करता है कि ‘अपनी खाल के इस प्रकार नष्ट हो जाने के बाद,’ (अर्थात् अपनी मृत्यु के पश्चात्) वह उसे (इस उद्धारक को) देखेगा और उसी समय वह ‘परमेश्‍वर को देखता’ है। दूसरे शब्दों में आने वाला यह उद्धारक परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतार है, ठीक वैसे ही जैसे पुरूषा प्रजापति का देहधारण है। परन्तु कैसे अय्यूब उसे अपनी मृत्यु के पश्चात देख सकता है? और इस बात को सुनिश्चित करने के लिए हम इस बात अनजान न रह जाएं कि अय्यूब यह घोषणा करता है कि ‘मेरे स्वयं की आँखों से – मैं और कोई और नहीं’ जगत पर खड़े हुए इस छुड़ानेवाले को देखेगा। इसकी केवल एक ही व्याख्या है कि इस उद्धारक ने अय्यूब को अमरत्व प्रदान किया है और वह उस दिन की अपेक्षा कर रहा है जब छुड़ानेवाला, जो परमेश्‍वर है, जगत के ऊपर चलेगा और उसने अय्यूब को अमरत्व प्रदान किया है ताकि वह भी फिर से पृथ्वी के ऊपर चले और छुड़ानेवाले को अपनी स्वयं की आँखों से देखे। इस दिन की अपेक्षा ने उसे इतना अधिक मंत्र मुग्ध कर दिया है कि उसका ‘हृदय अन्दर ही अन्दर चूर चूर’ हो जाता है। यह वह मंत्र है जिसने उसे परिवर्तित कर दिया था।

…और यशायाह

इब्रानी ऋषि ने आने वाले एक व्यक्ति के विषय में भी बोला है जिसका विवरण बहुत अधिक अय्यूब के छुड़ानेवाले और पुरूषा के इस विवरण के जैसा दिखाई देता है। यशायाह एक ऐसा ऋषि है जो लगभग 750 ईसा पूर्व रहा। उसने बहुत से वचनों को ईश्वरीय प्रेरणा से लिखा। वह अब आने वाले इस व्यक्ति का वर्णन करता है:

तौभी संकट भरा अन्धकार जाता रहेगा। पहले तो उसने जबूलून और नप्ताली के देशों का अपमान किया परन्तु अन्तिम दिनों में ताल की ओर यरदन के पार की अन्यजातियों के गलील को महिमा देगा –

2 जो लोग अन्धियारे में चल रहे थे

उन्होंने बड़ा उजियाला देखा;

और जो लोग घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे,

उन पर ज्योति चमकी…

6 क्योंकि हमारे लिये एक बालक उत्पन्न हुआ,

हमें एक पुत्र दिया गया है;

और उसका नाम

अद्भुत युक्ति करनेवाला, पराक्रमी परमेश्‍वर

अनन्तकाल का पिता, शान्ति का राजकुमार रखा जाएगा। (यशायाह 9:1-2, 6)

दूसरे शब्दों में, ऋषि यशायाह एक पुत्र के जन्म को पहले से देख रहा था और उसकी भविष्यद्वाणी कर रहा था और इस पुत्र को ‘पराक्रमी परमेश्‍वर… कह कर पुकारा जाएगा’। यह समाचार विशेषकर उन लोगों के लिए सहायतापूर्ण था जो ‘घोर अन्धकार से भरे हुए मृत्यु के देश में रहते थे’। इसका क्या अर्थ है? हमारा जीवन इस बात को जानते हुए यापन होता है कि हम अपनी आने वाली मृत्यु और उन कर्मों से जो हमारे ऊपर शासन करते हैं, से बच नहीं सकते हैं। इसलिए हम वास्तव में ‘मृत्यु की छाया में’ जीवन यापन करते हैं। इस तरह से आने वाले इस पुत्र को ‘पराक्रमी परमेश्‍वर’ कह कर पुकारा जाएगा, जो हम लोगों के लिए बड़ा उजियाला या आशा होगी जो अपनी आनेवाली मृत्यु की छाया में जीवन यापन करते हैं।

… और मीका

एक और ऋषि जो यशायाह (750 ईसा पूर्व) के समय में ही रहे थे, ने भी आने वाले व्यक्ति के बारे में ईश्वरीय वचन को कहा है। उन्होंने लिखा है कि:

हे बैतलहम एप्राता,

यदि तू ऐसा छोटा है कि यहूदा के हजारों में गिना नहीं जाता,

तौभी तुझ में से मेरे लिये एक पुरूष निकलेगा,

जो इस्राएलियों में प्रभुता करने वाला होगा;

और उसका निकलना प्रचीनकाल से, 

वरन् अनादि काल से होता आया है। (मीका 5:2)

मीका ने कहा कि एक व्यक्ति एप्राता क्षेत्र के बैतलहम नामक शहर से निकल कर आएगा, जहाँ पर यहूदा का गोत्र (अर्थात् यहूदी लोग) रहता था। इस व्यक्ति के लिए सबसे अनूठा यह है कि यद्यपि यह इतिहास में एक निश्चित समय पर बैतलहम से ‘निकल कर आएगा,’ परन्तु वह अपने मूल में पूर्व से ही समय के आरम्भ से अस्तित्व में था। इस प्रकार पुरूषासूक्ता के श्लोक 2 और अय्यूब के आनेवाले छुड़ानेवाले की तरह, यह व्यक्ति भी हमारी तरह समय के बन्धन में बँधा हुआ नहीं होगा। वह समय का प्रभु होगा। यह ईश्वरीय योग्यता है, न कि मानवीय, और इस तरह से वह सभी एक ही व्यक्ति को उदधृत कर रहे हैं।

यीशु सत्संग (यीशु मसीह) में पूर्ण होना

परन्तु यह व्यक्ति कौन है? मीका इसके लिए हमें एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सुराग देता है। आने वाला व्यक्ति बैतलहम से आएगा। बैतलहम एक वास्तविक शहर है जो कि हजारों वर्षों से आज तक अस्तित्व में है जिसे आज के समय इस्राएल/वेस्ट बैंक के नाम से पुकारा जाना जाता है। आप इसको गूगल की पृथ्वी पर पा सकते और मानचित्र पर देख सकते हैं। यह एक बड़ा शहर नहीं है, और न ही कभी रहा है। परन्तु यह संसार में प्रसिद्ध है और वार्षिक वैश्विक समाचारों में बना रहता है। क्यों? क्योंकि यह यीशु मसीह (या यीशु सत्संग) का जन्म स्थान है। यह वह शहर है जहाँ पर उसने लगभग 2000 वर्षों पहले जन्म लिया था। यशायाह हमें एक और सुराग को देता है क्योंकि वह कहता है कि यह व्यक्ति गलील के ऊपर प्रभाव डालेगा।और यद्यपि यीशु सत्संग (यीशु मसीह) ने बैतलहम (जैसा की मीका ने पहले से ही देख लिया था) में जन्म लिया था, वह गलील में पला बढ़ा और एक शिक्षक के रूप में उसने वहाँ सेवा की, जैसा कि यशायाह ने पहिले से ही भविष्यद्वाणी कर दी थी। बैतलहम उसका जन्मस्थान होने के कारण और गलील उसकी सेवकाई का स्थान होने के कारण यीशु सत्संग (यीशु मसीह) के जीवन के सबसे अधिक जाने जाने वाले दो स्थान हैं। इस तरह से हम यहाँ विभिन्न ऋषियों के द्वारा की गई भविष्यद्वाणियों को देखते हैं जो यीशु मसीह (यीशु सत्संग) में पूर्ण हो जाती हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि यीशु ही वह पुरूषा/छुड़ानेवाला/शासक हो जिसे इन प्राचीन ऋषियों ने पहले से देख लिया था? इस प्रश्न का यह उत्तर ऐसी कुँजी हो सकती है जो इस बात को खोल देती है कि कैसे हम जो ‘मृत्यु की छाया’ (और कर्मों) में रह रहे हैं को ‘अमरत्व’ प्रदान किया जा सकता है, इस बात पर हमारी सोच निश्चित ही हमारे समय में विचारयोग्य है। इस कारण हम अपनी खोजबीन को जारी रखेंगे जब हम पुरूषासूक्ता के अध्ययन के माध्यम से और आगे बढ़ते हैं और इब्रानी वेद पुस्तकों के ऋषियों से इसकी तुलना करेंगे।

पुरूषासूक्ता पर ध्यान देना – पूरूषा की स्तुति का भजन

कदाचित् ऋग्वेद की सबसे प्रसिद्ध कविता या प्रार्थना पुरूषासूक्ता (पुरूषा सुक्तम्) है। यह 90वें अध्याय और 10वें मंडल में पाई जाती है। यह एक विशेष व्यक्ति –पुरूष: (जिसे पुरूषा के नाम से पुकारा जाता है) के लिए गाया गया गीत है। क्योंकि यह ऋग्वेद में पाया जाता है, इसलिए यह संसार का सबसे प्राचीन मंत्र है, इस कारण इस का अध्ययन यह देखने के लिए लाभप्रद है कि हम कैसे मुक्ति या मोक्ष (ज्ञानोदय) के तरीके को सीख सकते हैं।

अब पुरूषा कौन है? वैदिक ग्रंथ हमें बताते हैं कि

 “पुरूषा और प्रजापति एक और एक ही व्यक्ति है।” (संस्कृत में पुरूषोही प्रजा पति)

माध्यन्दिनी शतपथ ब्राह्मण VII. 4/1/156

उपनिषद् इसी सोच को जारी रखते हुए कहते हैं कि

“पुरूषा सभी बातों में सर्वश्रेष्ठ है। कुछ भी [कोई भी] पुरूषा से श्रेष्ठ नहीं है। वही अन्त है और उच्चतम लक्ष्य है” (अव्यक्त पुरूष: परह्। पुरूषान परम् किन्चित्स कस्थ स पर गति) कठोपनिषद् 3/11

“और वास्तव में सर्वोच्च पुरूषा अव्यक्त से परे है…वह जो उसे जानता है वह मुक्त हो जाता है और अमरत्व को प्राप्त कर लेता है (अव्यक्त उ परह् पुरूष:…यज्न त्व मुच्यते ज़न्तुरम्तत्वम् च गच्चति) कठोपनिषद् 6/8

इस तरह से पुरूषा ही प्रजापति (सारी सृष्टि का प्रभु) है। परन्तु,कदाचित् इससे भी अधिक महत्वपूर्ण सीधे उसे जानना है जो आपको और मुझे प्रभावित करता है। उपनिषद् कहता है कि:

“अनन्त जीवन का (पुरूषा को छोड़कर) अन्य कोई मार्ग नहीं है” (णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

इस कारण हम पुरूषासूक्ता, ऋग्वेद के भजन का अध्ययन करेंगे, जो पुरूषा का विवरण देते हैं। और जब हम ऐसा करते हैं, तो मैं कदाचित् एक विलक्षण एवम् अनूठे विचार को हमारे सोचने के लिए रखूँगा: क्या पुरूषासूक्ता में कहा गया यह पुरूष लगभग 2000 वर्षों पहले यीशु सत्संग (नासरी के यीशु) में देहधारी हुआ? जैसा कि कहा गया है, कदाचित् यह एक विलक्षण धारणा है, परन्तु यीशु सत्संग (नासरी का यीशु) सभी धर्मो में एक पवित्र व्यक्ति के रूप में जाना जाता है और उसने परमेश्‍वर के देहधारण अर्थात् अवतार होने का दावा किया था, और दोनों अर्थात् परमेश्‍वर और पुरूषा का बलिदान (जैसा कि हम देखेंगे) हुआ, इस कारण यह हमें इस विचार के ऊपर विचार करने और इसका पता लगाने के लिए अच्छे कारण देता है। संस्कृति का भाषान्तरण और पुरूषा के ऊपर मेरे बहुत से विचार जोसफ़ पदनीज़ेरकारा द्वारा रचित पुस्तक प्राचीन वेदों में मसीह (346 पृष्ठों की, 2007 में लिखी हुई) नामक पुस्तक के अध्ययन से आए हैं।

पुरूषासूक्ता का प्रथम श्लोक

संस्कृत में हिन्दी भाषातंरण
षहस्र सिर्सा-पुरूषाह्षहस्र क्सह् सह्स्रपत्ष भुमिम् विस्वतो व् र्त्वात्यतिस्थद्दसन्गुलम् पुरूषा के एक हज़ार सिर, एक हज़ार आँखें और एक हज़ार पैर हैं। सृष्टि को चहूँ ओर से घेरते हुए, वह चमकता है। और वह स्वयं को दस अंगुलियों में सीमित है।

जैसा कि हमने ऊपर देखा कि पुरूषा ही प्रजापति है। प्रजापति, जैसा कि यहाँ विवरण दिया गया,कि उसे प्राचीन वेदों में ऐसा परमेश्‍वर माना जाता था, जिसने सब कुछ की रचना की है – वह “सारी सृष्टि का प्रभु” था।

पुरूषासूक्ता के आरम्भ में ही हम पुरूषा के ‘एक हज़ार सिर, एक हज़ार आँखें और एक हज़ार पैर हैं,’ को देखते हैं, इसका क्या अर्थ है? ‘हज़ार’ का अर्थ यहाँ किसी विशेष गिनती की हुई संख्या से नहीं है, अपितु इसका अर्थ ‘अगणित’ या ‘सीमा से परे’ के अर्थो से है। इस तरह से पुरूषा का सीमारहित ज्ञान (‘सिर’) है। कि सृष्टि को चहूँ ओर से घेरते हुए, वह चमकता है। और वह स्वयं दस अंगुलियों में सीमित है। आज की भाषा में हम कह सकते हैं कि वह सर्वज्ञानी या सब-कुछ जानने वाला है। यह परमेश्‍वर (प्रजापति) का एक गुण है जो केवल एक ही ऐसा है जिसे सब-कुछ का पता है। साथ ही, परमेश्‍वर देखता और सब बातों की जानकारी भी रखता है। पुरूषा की ‘एक हज़ार आँखें’ हैं के कहने का अर्थ यह है कि पुरूषा सर्वव्यापी है – वह सब बातों को जानता है क्योंकि वह सभी स्थानों में उपस्थित है। इसी तरह से, ‘एक हज़ार पैर’– सर्वसामर्थ्य अर्थात् सर्वशक्तिमत्ता– असीमित शक्ति को प्रस्तुत करते हैं।

इस तरह से हम पुरूषासूक्ता के आरम्भ में ही देखते हैं कि पुरूषा को सर्वज्ञानी, सर्वव्यापी और सर्वसामर्थी व्यक्ति के रूप में परिचित कराया गया है। परमेश्‍वर का देहधारण अर्थात् अवतार ही केवल इस तरह का व्यक्ति हो सकता है। तौभी, यह श्लोक यह कहते हुए समाप्त होता है कि ‘उसने स्वयं को दस अंगुलियों में सीमित किया है।’ इसका क्या अर्थ है? एक देहधारी व्यक्ति होने के नाते, पुरूषा ने स्वयं को ऐसा शून्य कर दिया कि उसने अपनी ईश्वरीय शक्तियों को छोड़ दिया और एक सामान्य मानव के स्वरूप में  – ‘दस अंगुलियों’ जितना सीमित कर दिया। इस तरह से, यद्यपि पुरूषा ईश्र्वर था, ईश्‍वरत्व के सभी गुणों के होने पर भी, उसने स्वयं के देहधारण में, स्वयं को मनुष्य की समानता में कर लिया।

वेद पुस्तक (बाइबल), जब यीशु सत्संग (नासरी के यीशु) के लिए बोलती है तो इसी विचार को अक्षरश: व्यक्त करती है। वह कहती है कि:

…जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो:

6 जिसने परमेश्‍वर के स्वरूप में होकर भी

परमेश्‍वर के तुल्य होने को अपने वश में

रखने की वस्तु न समझा; 7 वरन् अपने आप को ऐसा शून्य कर दिया,

और दास का स्वरूप धारणा किया,

और मनुष्य की समानता में हो गया।

8 और मनुष्य के रूप में प्रगट होकर अपने

आप को दीन किया,

और यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु –

हाँ, कूस्र की मृत्यु भी सह ली! (फिलिप्पियों 2:5-8)

आप देख सकते हैं कि वेद पुस्तक (बाइबल) अक्षरश: वैसे ही विचारों – असीमित परमेश्‍वर का एक सीमित मनुष्य में देहधारण होने – का उपयोग करती है जैसे कि पुरूषा को परिचित कराने के लिए पुरूषासूक्ता में दिए गए हैं। परन्तु बाइबल का यह प्रसंग शीघ्रता से उसके बलिदान का विवरण– जैसा कि पुरूषासूक्ता भी करेगा –करने की ओर बढ़ता चला जाता है। इस लिए इन भविष्यवाणियों का पता लगाना किसी भी उस व्यक्ति के लिए सार्थक है जो मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखता है, क्योंकि, जैसा कि उपनिषदों में कहा गया है कि:

“अनन्त जीवन का (पुरूषा को छोड़कर) अन्य कोई मार्ग नहीं है” (णन्यह्पन्थ विद्यते – अयनय) श्वेताश्वतरोपनिषद् 3/8

हम पुरूषासूक्ता श्लोक 2 में यहाँ जारी रखेंगे।